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cg” नाबालिग से छेड़छाड़ के आरोपी को महज 3 घंटे में किया गिरफ्तार..’

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👉 भारतीय न्याय संहिता एवं पॉक्सो एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज कर आरोपी को न्यायिक अभिरक्षा में भेजा गया।

👉 महिला एवं बच्चों के विरुद्ध अपराधों पर राजनांदगांव पुलिस की सख्त कार्रवाई जारी।

गिरफ्तार आरोपी

नाम – हरिश सोनवानी उर्फ कान्हा, पिता भोला सोनवानी, उम्र 35 वर्ष, निवासी प्रभात नगर, उड़िया मोहल्ला, थाना बसंतपुर, जिला राजनांदगांव।

घटना का संक्षिप्त विवरण

“दिनांक 02.07.2026 को प्रार्थिया ने थाना बसंतपुर में रिपोर्ट दर्ज कराई कि ड्यूटी से घर लौटने पर उसने  हरिश सोनवानी उर्फ कान्हा को घर से निकलते देखा।”

“पूछताछ करने पर उसकी नाबालिग पुत्री ने बताया कि आरोपी जबरन घर में घुस आया तथा उसकी इच्छा के विरुद्ध हाथ एवं बांह पकड़कर छेड़छाड़ करने लगा और गलत काम करने की बात कही।”

पीड़िता द्वारा विरोध एवं शोर मचाने पर आरोपी मौके से फरार हो गया।

“रिपोर्ट के आधार पर थाना बसंतपुर में अपराध क्रमांक 307/2026 के तहत धारा 74, 331(1) भारतीय न्याय संहिता एवं धारा 8 पॉक्सो एक्ट में अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना प्रारंभ की गई।”

पुलिस की त्वरित कार्रवाई

“मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक राजनांदगांव सुश्री अंकिता शर्मा (भा.पु.से.) के निर्देशन तथा अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्री कीर्तन राठौर एवं नगर पुलिस अधीक्षक श्रीमती वैशाली जैन (भा.पु.से.) के मार्गदर्शन में आरोपी की शीघ्र गिरफ्तारी हेतु विशेष टीम गठित की गई।”

“निरीक्षक एमन साहू, थाना प्रभारी बसंतपुर के नेतृत्व में पुलिस टीम ने तत्काल कार्रवाई करते हुए आरोपी के संभावित ठिकानों पर दबिश दी और घटना के मात्र 03 घंटे के भीतर आरोपी को गिरफ्तार कर लिया।”

“पूछताछ में आरोपी द्वारा अपराध स्वीकार करने तथा पर्याप्त साक्ष्य मिलने पर उसे विधिवत गिरफ्तार कर न्यायालय में प्रस्तुत किया गया, जहां से न्यायिक अभिरक्षा में जिला जेल राजनांदगांव भेजा गया।”

सराहनीय भूमिका

“इस कार्रवाई में  उप निरीक्षक ईशा ओगरे,सउनि मनमोहन साहू, प्रधान आरक्षक दीपक जायसवाल, महिला प्रधान आरक्षक मेनका साहू, आरक्षक अतहर अली, आरक्षक कुश बघेल एवं थाना बसंतपुर के समस्त स्टाफ की सराहनीय भूमिका रही।”

केबिनेट बैठक 08 जुलाई को….

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 केबिनेट बैठक 08 जुलाई को

 

 

 

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय की अध्यक्षता में राज्य मंत्रिपरिषद् (केबिनेट) की बैठक बुधवार, 08 जुलाई को सवेरे 11.30 बजे नवा रायपुर अटल नगर स्थित मंत्रालय (महानदी भवन) में होगी।

 

सहकारिता मंत्रालय के पांच वर्ष पूर्ण होने पर राज्य स्तरीय सहकारी सम्मेलन आयोजित…

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  • 162 करोड़ से अधिक की तेंदूपत्ता प्रोत्साहन राशि वितरण का शुभारंभ, 1352 नई सहकारी समितियों के गठन से गांवों तक पहुंचा सहकार का विस्तार”
  • पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, वनोपज, मत्स्य पालन और ग्रामीण उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में भी सहकारिता को मिल रहा है बढ़ावा”
  • किसानों की आय बढ़ाने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और आत्मनिर्भरता का सबसे प्रभावी माध्यम बन रही है सहकारिता”
  • उत्कृष्ट सहकारी समितियों को सहकार प्रेरणा पुरस्कार से किया गया सम्मानित, महिला स्व सहायता समूह को वितरित किया गया लाभांश”

“प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सहकारिता मंत्रालय का गठन देश के विकास की दिशा में एक ऐतिहासिक निर्णय है। यह निर्णय ‘सहकार से समृद्धि’ के संकल्प को साकार करने वाला है।”

“डबल इंजन की सरकार छत्तीसगढ़ में सहकारिता के माध्यम से किसानों, वनवासियों, महिला समूहों और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने तथा उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए लगातार काम कर रही है।”

“मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने आज इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कृषि मंडपम में भारत सरकार के सहकारिता मंत्रालय के पांच वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित राज्य स्तरीय सहकारी सम्मेलन एवं सहकारी सप्ताह कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यह बात कही। ”

“मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने इस अवसर पर उत्कृष्ट समितियों को सहकार प्रेरणा पुरस्कार प्रदान किया तथा संग्रहण वर्ष 2023 के 7.14 लाख तेंदूपत्ता संग्राहकों के लिए 162 करोड़ रुपये से अधिक की प्रोत्साहन पारिश्रमिक राशि के वितरण का शुभारंभ किया।”

‘मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कहा कि मैं किसान का बेटा हूं और बचपन से ही सहकारिता से मेरा गहरा रिश्ता रहा है। तभी से मुझे विश्वास था कि सहकारिता के क्षेत्र में असीम संभावनाएं हैं। आज प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ‘सहकार से समृद्धि’ का वही सपना धरातल पर साकार होता दिखाई दे रहा है।’

”उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के प्रथम कार्यकाल में उन्हें राज्यमंत्री के रूप में साथ काम करने का अवसर मिला और उन्होंने किसानों के प्रति प्रधानमंत्री की संवेदनशीलता तथा समर्पण को बहुत करीब से देखा है।”

”किसानों के कल्याण के प्रति इसी प्रतिबद्धता के कारण प्रधानमंत्री ने कृषि मंत्रालय का दायरा बढ़ाते हुए उसका नाम ‘कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय’ किया, ताकि किसानों का समग्र विकास सरकार की प्राथमिकता बने।”

”सहकारिता किसानों की आय बढ़ाने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और आत्मनिर्भरता का सबसे प्रभावी माध्यम बन रही है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में सहकारिता क्षेत्र को नई दिशा मिली है और इसका लाभ सीधे किसानों एवं ग्रामीण परिवारों तक पहुंच रहा है। ”

”’मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि केंद्र सरकार केवल कृषि ही नहीं बल्कि पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, वनोपज, मत्स्य पालन और ग्रामीण उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में भी सहकारिता को मजबूत कर रही है”’।

”’उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के सहयोग से प्रदेश में दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में व्यापक बदलाव दिखाई देने लगे हैं। राज्य सरकार पशुपालन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयास कर रही है।”

”मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि पहले किसानों को खेती-किसानी के लिए 16 से 18 प्रतिशत दर पर ऋण लेना पड़ता था और भारी-भरकम ब्याज का बोझ उन्हें आर्थिक रूप से परेशान कर देता था।”

”आज सहकारिता व्यवस्था और किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) के माध्यम से किसानों को बिना ब्याज ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है।”

”उन्होंने बताया कि इस वर्ष प्रदेश के 15 लाख से अधिक किसानों को 8 हजार करोड़ रुपये से अधिक का ऋण उपलब्ध कराया गया है, जिससे किसानों को खेती के लिए सुलभ वित्तीय सहायता मिल रही है और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है। ”

”मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि जिस प्रकार दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन, केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह के नेतृत्व और सुरक्षा बलों के साहस से नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक सफलता मिली है, उसी प्रकार सहकारिता के माध्यम से भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ा परिवर्तन लाया जाएगा।”

”उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि सहकारी सप्ताह के दौरान विषय विशेषज्ञों के मंथन से प्रदेश में सहकारिता के नए आयाम स्थापित होंगे और इसका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचेगा।”

”सहकारिता मंत्री श्री केदार कश्यप ने कहा कि सहकारिता मंत्रालय की स्थापना के पांच वर्ष पूरे होना देश के लिए गौरव का विषय है।”

”इस अवसर पर 29 जून से 06 जुलाई तक सहकारिता सप्ताह के अंतर्गत विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि पिछले दो वर्षों में छत्तीसगढ़ में सहकारिता के क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य हुए हैं और विकसित छत्तीसगढ़ के निर्माण में सहकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।”

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना सहकारिता का मूल उद्देश्य है।” 

मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व में प्रदेश की कोई भी पंचायत सहकारिता से वंचित न रहे, इस दिशा में कार्य करते हुए राज्य में 1352 नई सहकारी समितियों का गठन किया गया है।”

इस अवसर पर मुख्यमंत्री श्री साय ने सहकारिता विभाग के ऑनलाइन पोर्टल का शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि इसके माध्यम से किसानों का पंजीयन पूरी तरह ऑनलाइन, पारदर्शी एवं समयबद्ध तरीके से किया जा सकेगा।”

मुख्यमंत्री ने सहकारिता से जुड़े विभिन्न स्टालों का किया अवलोकन”

कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने विभिन्न सहकारी संस्थाओं द्वारा लगाए गए प्रदर्शनी स्टॉलों का अवलोकन किया और सहकारिता के माध्यम से किसानों, महिला स्व-सहायता समूहों तथा वनधन समितियों द्वारा किए जा रहे नवाचारों की सराहना की।”

उन्होंने हरित क्रांति आदिवासी सहकारी समिति जशपुर, महामाया बहुउद्देशीय सहकारी समिति कोरबा, बिलासा हैंडलूम एम्पोरियम, छत्तीसगढ़ हर्बल्स, राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम, भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (नाफेड), छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी दुग्ध महासंघ, इफको तथा गंगा मैया दुग्ध उत्पादक संघ बालोद सहित विभिन्न संस्थाओं के स्टॉलों का अवलोकन कर उनके कार्यों की जानकारी ली।”

मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम में 5 नवीन पैक्स समितियों को माइक्रो एटीएम वितरित किए तथा छत्तीसगढ़ हर्बल्स के पांच नए उत्पादों का लोकार्पण किया।”

उन्होंने उत्कृष्ट तेंदूपत्ता संग्राहकों को प्रशस्ति पत्र प्रदान किए, वन-धन समितियों की हैंडबुक का विमोचन किया, महिला स्व-सहायता समूहों को लाभांश वितरित किया तथा विभिन्न हितग्राहियों को सामग्री, प्रोत्साहन राशि और केसीसी ऋण वितरित किए।”

कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ भवन एवं अन्य सन्निर्माण कर्मकार मंडल के अध्यक्ष डॉ. रामप्रताप सिंह,

अपेक्स बैंक के प्राधिकृत अधिकारी श्री केदारनाथ गुप्ता, छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज सहकारी संघ के अध्यक्ष श्री रूपसाय सलाम, छत्तीसगढ़ तेलघानी विकास बोर्ड के अध्यक्ष श्री जितेंद्र साहू, प्राधिकृत अधिकारी विपणन संघ श्री शशिकांत द्विवेदी, सहकार भारती के श्री कनिराम, छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी संघ के प्राधिकृत अधिकारी श्री सौरभ शर्मा, छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी अंत्यावसायी वित्त एवं विकास निगम के अध्यक्ष श्री सुरेंद्र कुमार बेसरा, छत्तीसगढ़ राज्य हाथकरघा विकास एवं विपणन सहकारी संघ के अध्यक्ष श्री भोजराम देवांगन, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक के अध्यक्षगण, सहकारिता सचिव डॉ. सी.आर. प्रसन्ना, आयुक्त सहकारिता श्री रमेश शर्मा सहित जनप्रतिनिधि, विभिन्न सहकारी संस्थाओं के पदाधिकारी, किसान एवं बड़ी संख्या में हितग्राही उपस्थित थे।”

” सीजेआई को पत्र लिखकर एसआईआर पर रोक की मांग” ” चुनावी प्रक्रिया हेरफेर का लगाया आरोप” 

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देश के 23 प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति सूर्यकांत और सुप्रीम कोर्ट के अन्य न्यायाधीशों को संयुक्त पत्र लिखकर चुनावी प्रक्रिया में कथित हेरफेर पर गंभीर चिंता जताई है।

विपक्ष ने मतदाता सत्यापन की मौजूदा प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाने की मांग करते हुए कहा है कि इससे लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर हो रही है।

पत्र पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी समेत इंडी गठबंधन और अन्य विपक्षी दलों के 23 नेताओं के हस्ताक्षर हैं।**

विपक्ष का कहना है कि उन्होंने यह असाधारण कदम इसलिए उठाया है क्योंकि गणतंत्र के मूल स्तंभ गंभीर दबाव में हैं।

“पत्र में नेताओं ने आरोप लगाया कि देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की मूल अवधारणा से समझौता किया जा रहा है, जिसके कारण हालिया चुनाव परिणामों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।”

“पत्र में कहा गया, “हम सभी समान विचारधारा वाले राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो भाजपा के विरोधी हैं। हमारा मानना है कि चुनावी प्रक्रिया में हेरफेर किया जा रहा है और कई मामलों में चुनाव परिणाम जनता की वास्तविक इच्छा को प्रतिबिंबित नहीं करते।”

“विपक्ष की सबसे बड़ी आपत्ति चुनाव आयोग (ईसीआई) द्वारा शुरू की गई स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर है। विपक्ष ने इसे “स्वभाव से ही बहिष्करणकारी और राजनीतिक रूप से प्रेरित” बताते हुए आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के कारण लाखों वास्तविक मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित हो गए हैं। इनमें विशेष रूप से गरीब, अशिक्षित, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग शामिल हैं, जिनके पास आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।”

“28 जून को लिखे गए इस पत्र पर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के तिरुचि शिवा, राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की सांसद सुप्रिया सुले, नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव डी. राजा और माकपा सांसद जॉन ब्रिटास सहित कई विपक्षी नेताओं ने हस्ताक्षर किए हैं।”

“इसके अलावा आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह, झारखंड मुक्ति मोर्चा के सरफराज अहमद, भाकपा (माले) के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के सैयद सादिक अली शिहाब थंगल, पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती, एमडीएमके प्रमुख वाइको, वीसीके नेता थोल तिरुमावलवन और आरएसपी सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन भी हस्ताक्षरकर्ताओं में शामिल हैं।”

“पत्र में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों का हवाला देते हुए दावा किया गया कि ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ नामक श्रेणी के तहत 27 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे, जिससे वे मतदान नहीं कर सके।”

विपक्ष ने इस दावे के समर्थन में न्यायिक ट्रिब्यूनलों के निष्कर्षों का भी उल्लेख किया। पत्र के अनुसार, न्यायमूर्ति टी.एस. शिवगणनम की अध्यक्षता वाले 19 ट्रिब्यूनलों में से एक ने 1,777 अपीलों की सुनवाई के दौरान पाया कि 1,717 मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए थे। यानी लगभग 96 प्रतिशत नामों को अनुचित रूप से सूची से हटाया गया था।”

विपक्षी नेताओं ने मतदाता सूची के अलावा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर भी चिंता जताई और चुनाव प्रक्रिया में जनता का पूर्ण विश्वास बहाल करने के लिए बैलेट पेपर प्रणाली पर दोबारा व्यापक सार्वजनिक चर्चा की मांग की।

पत्र में यह भी आरोप लगाया गया कि केंद्रीय जांच एजेंसियों- केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) का व्यवस्थित तरीके से विपक्षी नेताओं को निशाना बनाने और चुनावी माहौल को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

पत्र के अंत में नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट को संविधान का अंतिम संरक्षक बताते हुए कहा कि जब अन्य संस्थाएं नागरिकों को न्याय देने में विफल हो जाती हैं, तब लोगों की अंतिम उम्मीद न्यायपालिका ही होती है।

उन्होंने अपनी अंतिम अपील में लिखा, “जब संस्थाएं स्वयं दमन का साधन बन जाएं और सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ाने लगें, तब हमारे लोकतंत्र का भविष्य गंभीर खतरे में पड़ जाता है।”

अचानक दिल का दौरा त्वरित पहचान, समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप और हृदय की देखभाल कितनी महत्वपूर्ण…

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यह दर्शाता है कि दिल का दौरा पड़ने के बाद त्वरित पहचान, समय पर चिकित्सा हस्तक्षेप और हृदय की देखभाल कितनी महत्वपूर्ण हैं।

 बिना चेतावनी स्वस्थ दिखने वाले व्यक्तियों में भी।

दिल का दौरा हृदय को अचानक धड़कना बंद कर देता है, जिससे मस्तिष्क और अन्य महत्वपूर्ण अंगों में रक्त प्रवाह रुक जाता है। बिना तात्कालिक उपचार के, यह कुछ ही मिनटों में घातक हो सकता है।

जब आप थोड़े अस्वस्थ महसूस करें, तो कुछ त्वरित कदम उठाना महत्वपूर्ण है।

लक्षणों को पहचानें

यदि लक्षण प्रकट होते हैं, तो शांत रहना और तुरंत चिकित्सा सहायता लेना आवश्यक है।

डॉ. वोरा के मामले में, पहले लक्षण बाईं जॉ और बाईं कंधे में दर्द थे, लेकिन लक्षण व्यक्ति से व्यक्ति में भिन्न हो सकते हैं। उन्होंने कहा, “मेरे लिए यह बाईं जॉ और कंधे में दर्द से शुरू हुआ।

लेकिन किसी और को भारी पसीना, अनियोजित थकान, या अचानक सांस फूलने का अनुभव हो सकता है। इसलिए, इन लक्षणों पर ध्यान दें।”

डिस्प्रिन चबाएं

दिल के दौरे का संदेह  डिस्प्रिन (एस्पिरिन)

 डिस्प्रिन ;

यह दिल के दौरे के मामले में जीवन रक्षक दवा है।”

परिवार के सदस्यों के लिए इसे आसानी से उपलब्ध स्थान पर रखना चाहिए ताकि आपातकाल में इसे जल्दी से पाया जा सके।

हालांकि, एस्पिरिन सभी के लिए सुरक्षित नहीं है और इसे केवल तभी लेना चाहिए जब दिल के दौरे का संदेह हो।

चिकित्सा देखभाल

दिल फिर से धड़कने के बाद भी, मरीजों को विशेष अस्पताल देखभाल की आवश्यकता होती है ताकि मस्तिष्क की चोट को रोका जा सके और अंतर्निहित कारण का इलाज किया जा सके।

डॉक्टर आपातकालीन एंजियोप्लास्टी कर सकते हैं, पेसमेकर या डिफिब्रिलेटर लगा सकते हैं, दवाएं लिख सकते हैं, या उन छिपे हुए हृदय रोगों की पहचान कर सकते हैं जो दिल के दौरे का कारण बने।

अधिक जोखिम

दिल का दौरा किसी को भी प्रभावित कर सकता है, लेकिन कुछ लोगों में जोखिम अधिक होता है:

  • कोरोनरी आर्टरी रोग
  • पिछला दिल का दौरा
  • दिल की विफलता
  • कार्डियोमायोपैथी
  • असामान्य हृदय ताल (अरेथमिया)
  • उच्च रक्तचाप
  • मधुमेह
  • उच्च कोलेस्ट्रॉल
  • धूम्रपान या भारी शराब का सेवन
  • अचानक हृदय मृत्यु का पारिवारिक इतिहास

चेतावनी के संकेत जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए”

कुछ लोग दिल के दौरे से पहले लक्षणों का अनुभव करते हैं, जैसे:

  • छाती में दर्द या दबाव
  • सांस फूलना
  • अचानक चक्कर आना
  • दिल की धड़कन तेज होना
  • अत्यधिक थकान
  • बेहोशी या अनियोजित चेतना का खोना

जोखिम को कम करने के तरीके

हृदय विशेषज्ञ नियमित व्यायाम, फल, सब्जियों, साबुत अनाज और स्वस्थ वसा से भरपूर हृदय-स्वस्थ आहार, रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने, धूम्रपान से बचने और शराब को सीमित करने, स्वस्थ वजन बनाए रखने, और नियमित हृदय जांच कराने की सिफारिश करते हैं।

जीवित रहने की कहानी यह याद दिलाती है कि दिल का दौरा एक चिकित्सा आपात स्थिति है जहां हर सेकंड महत्वपूर्ण होता है।

तात्कालिक CPR, प्रारंभिक डिफिब्रिलेशन, और त्वरित अस्पताल देखभाल जीवित रहने की संभावनाओं को बढ़ाते हैं।

आज इन जीवन-रक्षक कौशलों को सीखना और अपने दिल की देखभाल करना एक दिन आपकी या किसी और की जान बचा सकता है।

” ऑटिज़्म और मनोविकृति: एक नई समझ” ऑटिज़्म और मनोविकृति के बीच संबंध ” 

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मनोविकृति क्या है? अध्ययन में क्या पाया गया?

ऑटिज़्म और मनोविकृति को दो अलग-अलग स्थितियों के रूप में देखा गया है।

ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) एक न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है जो संचार, व्यवहार और सामाजिक इंटरैक्शन को प्रभावित करती है, जबकि मनोविकृति ऐसे लक्षणों का समूह है जो किसी व्यक्ति के लिए वास्तविकता और काल्पनिकता के बीच अंतर करना कठिन बना सकता है।

हाल ही में किए गए शोध से पता चलता है कि इन दोनों के बीच एक मजबूत संबंध हो सकता है।

एक हालिया समीक्षा में पाया गया है कि ऑटिज़्म से ग्रसित व्यक्तियों में सामान्य जनसंख्या की तुलना में मनोविकृति के लक्षणों का अनुभव करने या मनोविकृति संबंधी विकार विकसित करने की संभावना अधिक होती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऑटिज़्म मनोविकृति का कारण नहीं बनता, लेकिन ये निष्कर्ष डॉक्टरों को उन लोगों की पहचान करने में मदद कर सकते हैं जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य की निगरानी की आवश्यकता हो सकती है।

शोधकर्ताओं ने ऑटिज़्म और मनोविकृति पर उपलब्ध साक्ष्यों का विश्लेषण किया, यह देखने के लिए कि ये दोनों स्थितियाँ कितनी बार एक साथ होती हैं और क्या इनमें सामान्य जैविक या विकासात्मक मार्ग हैं।

समीक्षा में शामिल कई अध्ययनों से पता चलता है कि ऑटिज़्म से ग्रसित लोग मनोविकृति के लक्षणों का अनुभव करने की अधिक संभावना रखते हैं।

एक व्यापक रूप से उद्धृत मेटा-विश्लेषण में पाया गया कि ASD वाले व्यक्तियों में सामान्य जनसंख्या की तुलना में मनोविकृति विकसित करने की संभावना लगभग 3.5 गुना अधिक हो सकती है, हालांकि कुल जोखिम अपेक्षाकृत कम रहता है।

यह महत्वपूर्ण है कि यह एक संबंध है, यह प्रमाण नहीं है कि ऑटिज़्म सीधे मनोविकृति का कारण बनता है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह ओवरलैप साझा आनुवंशिक और मस्तिष्क विकास के कारकों से उत्पन्न हो सकता है। दोनों स्थितियों में मस्तिष्क के विकास और सामाजिक जानकारी को संसाधित करने के तरीके में भिन्नताएँ होती हैं।

कुछ लक्षणों में सामाजिक अलगाव, असामान्य सोच के पैटर्न, या सामाजिक संकेतों की व्याख्या में कठिनाई शामिल हैं।

इसलिए, ऑटिज़्म से संबंधित लक्षणों और प्रारंभिक मनोविकृति के लक्षणों के बीच अंतर करना कभी-कभी चुनौतीपूर्ण हो सकता है, विशेषकर किशोरों और युवा वयस्कों में। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इन समानताओं के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।

ऑटिज़्म में सामान्यतः देखे जाने वाले कई व्यवहार मनोविकृति के लक्षण नहीं होते।

मनोविकृति स्वयं में एक बीमारी नहीं है, बल्कि लक्षणों का एक समूह है। मनोविकृति का अनुभव करने वाले व्यक्ति को भ्रांतियाँ, मतिभ्रम, अव्यवस्थित सोच, या वास्तविकता और कल्पना के बीच अंतर करने में कठिनाई हो सकती है।

यह स्किज़ोफ्रेनिया, बाइपोलर डिसऑर्डर, गंभीर अवसाद, या कुछ चिकित्सा स्थितियों और पदार्थों के उपयोग के कारण हो सकता है। ऑटिज़्म होने का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति इन लक्षणों का अनुभव करेगा।

ये निष्कर्ष माता-पिता या ऑटिज़्म से ग्रसित व्यक्तियों को चिंतित करने के लिए नहीं हैं। बल्कि, यह मानसिक स्वास्थ्य में बदलावों को पहचानने के महत्व को उजागर करते हैं जो किसी व्यक्ति के सामान्य व्यवहार से भिन्न होते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि देखभाल करने वालों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को ध्यान देना चाहिए यदि ऑटिज़्म से ग्रसित व्यक्ति अचानक स्थायी भ्रांतियाँ, निश्चित झूठे विश्वास, या सोचने, व्यवहार करने, या दैनिक कार्यों में महत्वपूर्ण बदलाव विकसित करता है।

प्रारंभिक मूल्यांकन एक महत्वपूर्ण अंतर ला सकता है, क्योंकि मनोविकृति अक्सर पहचानने और तुरंत उपचार करने पर बेहतर प्रतिक्रिया देती है।

वैज्ञानिक सहमत हैं कि कई प्रश्न अनुत्तरित हैं।

सभी ऑटिज़्म से ग्रसित व्यक्तियों का जोखिम बढ़ा हुआ नहीं होता, और शोधकर्ता अभी भी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि कुछ व्यक्तियों में मनोविकृति क्यों विकसित होती है जबकि अन्य में नहीं।

वे यह भी जांच कर रहे हैं कि क्या आनुवंशिकी, चिंता, पर्यावरणीय कारक, या मस्तिष्क विकास में भिन्नताएँ ओवरलैप में योगदान करती हैं। फिलहाल, यह जागरूकता का एक संदेश है, चिंता का नहीं।

ऑटिज़्म और मनोविकृति अलग-अलग स्थितियाँ हैं, लेकिन यह पहचानना कि वे कभी-कभी सह-अस्तित्व में हो सकती हैं, चिकित्सकों को पहले से अधिक समर्थन और व्यक्तिगत देखभाल प्रदान करने में मदद कर सकता है।

जैसे-जैसे शोध आगे बढ़ता है, संबंध की बेहतर समझ से ऑटिज़्म से ग्रसित व्यक्तियों के लिए निदान, उपचार और दीर्घकालिक परिणामों में सुधार हो सकता है।

“EPF” कर्मचारी भविष्य निधि” केंद्र सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव…”

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“केंद्र सरकार ने कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) ढांचे में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है, जिसके तहत वैधानिक वेतन सीमा से ऊपर की सैलरी पर योगदान अब नियोक्ताओं और कर्मचारियों के लिए स्वैच्छिक होगा।”

यह निर्णय श्रम और रोजगार मंत्रालय द्वारा जारी नए कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 2026 के तहत लिया गया है। संशोधित नियमों से भविष्य निधि योगदान में अधिक स्पष्टता आने की उम्मीद है, जबकि अनिवार्य EPF जमा के लिए मौजूदा वेतन सीमा 15,000 रुपये प्रति माह बनी रहेगी।”

नई EPF योजना के अनुसार, कर्मचारियों और नियोक्ताओं द्वारा अनिवार्य भविष्य निधि योगदान अब केवल मौजूदा वेतन सीमा 15,000 रुपये प्रति माह तक ही गणना की जाएगी। चूंकि दोनों पक्ष पात्र वेतन का 12 प्रतिशत योगदान करते हैं, इसलिए अनिवार्य योगदान वर्तमान सीमा के आधार पर 1,800 रुपये प्रति माह होगा।”

यदि किसी कर्मचारी का मूल वेतन 15,000 रुपये से अधिक है, तो इस सीमा से ऊपर के योगदान को अब अनिवार्य नहीं किया जाएगा। इसके बजाय, ऐसे अतिरिक्त जमा EPF खाते में केवल तभी किए जाएंगे जब नियोक्ता और कर्मचारी दोनों निर्धारित सीमा से अधिक योगदान करने का निर्णय लें।”

पहले की कर्मचारी भविष्य निधि योजना, 1952 के तहत, अनिवार्य EPF कवरेज उन कर्मचारियों पर लागू होता था जो संगठन में शामिल होने के समय 15,000 रुपये प्रति माह तक कमाते थे। निर्धारित सीमा से अधिक कमाने वाले कर्मचारी स्वैच्छिक आधार पर EPF के सदस्य बन सकते थे।”

हालांकि, एक बार नामांकित होने के बाद, भविष्य निधि योगदान आमतौर पर कर्मचारी के वास्तविक मूल वेतन पर आधारित होता था, भले ही वह वैधानिक वेतन सीमा से अधिक हो। नियोक्ताओं को कर्मचारी के योगदान के बराबर राशि का योगदान देना आवश्यक था.”

हालांकि नए ढांचे के तहत वेतन सीमा से ऊपर के EPF योगदान स्वैच्छिक हैं, कर्मचारी पेंशन योजना (EPS) 2014 के संशोधन के तहत लागू मौजूदा सीमाओं के तहत काम करती है। नियोक्ता EPF प्रणाली में वेतन का 12 प्रतिशत योगदान करते हैं, जिसमें कर्मचारी भी समान योगदान करते हैं।”

नियोक्ता के हिस्से में से 8.33 प्रतिशत कर्मचारी पेंशन योजना के लिए आवंटित किया गया है, जो 15,000 रुपये की वेतन सीमा तक सीमित है, जिससे अधिकतम मासिक पेंशन योगदान 1,250 रुपये होता है।”

” दिल्ली में मौसम का बदलाव ” दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों में शुक्रवार की सुबह से घने बादल”

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दिल्ली में मौसम की स्थिति’

दिल्ली और उसके आस-पास के क्षेत्रों में शुक्रवार की सुबह से घने बादल छाए हुए हैं, जिससे गर्मी में कमी आई है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने दिल्ली-एनसीआर के लिए मध्यम बारिश और गरज-चमक के साथ वर्षा का ‘येलो अलर्ट’ जारी किया है। IMD ने दिनभर के लिए मध्यम बारिश और गरज-चमक के साथ वर्षा का अलर्ट जारी किया है। शहर में न्यूनतम तापमान 28.1 डिग्री सेल्सियस रिकॉर्ड किया गया है। अधिकतम तापमान 32 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहने की संभावना है।

तापमान की जानकारी’

IMD के आंकड़ों के अनुसार, पालम में न्यूनतम तापमान सामान्य से 1.9 डिग्री कम 25.9 डिग्री सेल्सियस, लोधी रोड पर सामान्य से 1.0 डिग्री अधिक 28.0 डिग्री सेल्सियस, रिज क्षेत्र में सामान्य से 0.9 डिग्री कम 24.6 डिग्री सेल्सियस और आयानगर में सामान्य से 1.0 डिग्री कम 25.8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया।

मौसम का पूर्वानुमान’

IMD ने दिनभर बादलों के छाए रहने और मध्यम बारिश की संभावना जताई है। पूर्वाह्न, दोपहर, शाम और रात के समय गरज-चमक, बिजली गिरने और 40 से 50 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं चलने का अनुमान है। इसके साथ हल्की से मध्यम बारिश भी हो सकती है।

इस बीच, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के अनुसार, सुबह नौ बजे दिल्ली का वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 89 दर्ज किया गया, जो ‘संतोषजनक’ श्रेणी में आता है।

एक्यूआई की श्रेणियां’

सीपीसीबी के अनुसार, एक्यूआई की श्रेणियां इस प्रकार हैं:

AQI की श्रेणियां’

0 से 50: ‘अच्छा’

51 से 100: ‘संतोषजनक’

101 से 200: ‘मध्यम’

201 से 300: ‘खराब’

301 से 400: ‘बहुत खराब’

401 से 500: ‘गंभीर’

” भारतीय सुप्रीम कोर्ट ” मणिपुर पंचायत चुनावों की समय सीमा बढ़ाने के आदेश को खारिज”

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सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसमें राज्य में पंचायत चुनावों की समय सीमा को इस वर्ष 16 अक्टूबर तक बढ़ा दिया गया था।

गुरुवार को न्यायमूर्ति एन कोटिस्वर सिंह और एनवी अंजरिया की एक आंशिक कार्यदिवस पीठ ने पीहिरोइजाम हेरामनी और अन्य द्वारा उच्च न्यायालय के 19 मई 2026 के निर्णय के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया।

पीठ ने मणिपुर सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की बातों पर ध्यान दिया, जिन्होंने कहा कि राज्य उच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य है और यदि स्थानीय निकायों के चुनाव नहीं कराए जाते हैं तो यह अवमानना का मामला बन सकता है।

पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने के लिए अपील में कोई merit नहीं है। उच्च न्यायालय ने छठे सामान्य पंचायत चुनावों के आयोजन की समय सीमा को 16 अक्टूबर तक बढ़ा दिया था।

मुख्य न्यायाधीश एम सुंदर और न्यायमूर्ति ए गुनेश्वर शर्मा की उच्च न्यायालय की पीठ ने राज्य को हाल ही में किए गए विधायी संशोधनों के अनुसार तीन-स्तरीय पंचायत राज प्रणाली अपनाने की अनुमति भी दी।

यह मामला उच्च न्यायालय के समक्ष मणिपुर सरकार द्वारा अगस्त 2025 के एक पूर्व आदेश की समीक्षा याचिकाओं से उत्पन्न हुआ था, जिसमें चुनावों को छह महीने के भीतर कराने का आदेश दिया गया था।

राज्य ने उच्च न्यायालय के समक्ष तर्क दिया कि वर्तमान कानून-व्यवस्था की स्थिति और राज्य में राष्ट्रपति शासन (फरवरी 2025 से प्रभावी) के कारण तत्काल चुनाव कराना असंभव है।

इन “असाधारण परिस्थितियों” को ध्यान में रखते हुए, उच्च न्यायालय ने अपने पूर्व निर्देश को संशोधित करते हुए राज्य और राज्य चुनाव आयोग को चुनावी प्रक्रिया पूरी करने के लिए 16 अक्टूबर 2026 तक का विस्तार दिया।

|” तक्षशिला की ऐतिहासिक धरोहर पर संकट” “संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक शाखा यूनेस्को ने कड़ी आपत्ति…”

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प्राचीन भारत की समृद्ध धरोहर तक्षशिला एक बार फिर पाकिस्तान की गतिविधियों के कारण विवादों में घिर गई है। इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने की पाकिस्तान की पुरानी आदत पर अब संयुक्त राष्ट्र की सांस्कृतिक शाखा यूनेस्को ने कड़ी आपत्ति जताई है।

यूनेस्को ने कहा है कि तक्षशिला के मोहरा मोरादु और सिरकप जैसे ऐतिहासिक स्थलों पर किए गए संरक्षण कार्यों ने उनकी वास्तविक पहचान और ऐतिहासिक स्वरूप को नुकसान पहुंचाया है। संस्था ने चेतावनी दी है कि यदि पाकिस्तान ने इस हस्तक्षेप को नहीं रोका और नुकसान की भरपाई नहीं की, तो तक्षशिला को खतरे वाली सूची में डाला जा सकता है और इसे विश्व धरोहर सूची से भी बाहर किया जा सकता है।

तक्षशिला का ऐतिहासिक महत्व

तक्षशिला, जिसे प्राचीन काल में तक्षशिला नगरी कहा जाता था, दक्षिण एशिया की सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहरों में से एक मानी जाती है। यह केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं है, बल्कि भारतीय सभ्यता की हजारों साल पुरानी बौद्धिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। यह नगरी वैदिक काल में स्थापित की गई थी और प्राचीन भारत का एक प्रमुख शिक्षा केंद्र रही है, जहां विद्यार्थी दूर-दूर से अध्ययन के लिए आते थे। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में भी तक्षशिला का उल्लेख मिलता है। यहां के बौद्ध विहारों, प्राचीन नगरों, स्तूपों और मठों के अवशेष उस समृद्ध इतिहास की गवाही देते हैं, जिसने भारतीय उपमहाद्वीप की सांस्कृतिक दिशा तय की। यही कारण है कि यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर का दर्जा दिया था।

विवाद की शुरुआत

यह विवाद मार्च में शुरू हुआ, जब एक आगंतुक ने पेरिस स्थित यूनेस्को में पाकिस्तान के स्थायी प्रतिनिधि को कुछ तस्वीरें और सूचनाएं भेजीं। इन तस्वीरों में पंजाब पुरातत्व विभाग द्वारा किए जा रहे निर्माण कार्यों को दिखाया गया था। आरोप लगाया गया कि प्राचीन दीवारों को हटाकर नई दीवारें बनाई जा रही हैं और कई स्थानों पर उनकी ऊंचाई भी बढ़ाई जा रही है, जिससे ऐतिहासिक संरचनाओं की मौलिकता प्रभावित हो रही है।

यूनेस्को का निरीक्षण

इसके बाद, यूनेस्को ने पाकिस्तान के पुरातत्व और संग्रहालय विभाग तथा राष्ट्रीय धरोहर मंत्रालय के साथ मिलकर एक तकनीकी निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान पंजाब पुरातत्व विभाग अपने कार्यों को संरक्षण की प्रक्रिया बताता रहा, लेकिन वह मोहरा मोरादु और सिरकप में किए गए कार्यों से संबंधित आवश्यक दस्तावेज, प्रभाव मूल्यांकन रिपोर्ट और पहले तथा बाद की तस्वीरें प्रस्तुत नहीं कर सका। अधिकारियों ने स्वीकार किया कि कई स्थानों पर सीमेंट और आधुनिक निर्माण सामग्री का उपयोग किया गया है।

संरक्षण नियमों का उल्लंघन

तस्वीरों में स्पष्ट दिखाई दिया कि जहां प्राचीन पत्थर अनियमित आकार के थे, वहीं नई दीवारों में चमकदार और समान आकार के आधुनिक पत्थर लगाए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि विश्व धरोहर स्थलों पर सीमेंट का उपयोग यूनेस्को के संरक्षण नियमों का गंभीर उल्लंघन है। इससे न केवल ऐतिहासिक प्रमाणिकता कमजोर होती है, बल्कि किसी देश की सांस्कृतिक विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं।

पाकिस्तान की संरक्षण नीति पर सवाल

यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब पाकिस्तान 1997 से अपने 24 अन्य ऐतिहासिक स्थलों को भी यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने की कोशिश कर रहा है। लेकिन तक्षशिला में हुए कथित अवैज्ञानिक हस्तक्षेपों ने पाकिस्तान की मंशा और उसकी संरक्षण नीति दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

पंजाब पुरातत्व विभाग का बचाव

हालांकि, पंजाब पुरातत्व विभाग के महानिदेशक मलिक जहीर अब्बास ने इन आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि यह पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार किया जा रहा संरक्षण कार्य है। उन्होंने कहा कि इन उपायों का उद्देश्य कमजोर पड़ रही संरचनाओं को संभालना और धरोहरों की प्रामाणिकता बनाए रखना है।

विशेषज्ञों की चिंता

विशेषज्ञों का मानना है कि संरक्षण के नाम पर तक्षशिला की ऐतिहासिक आत्मा से छेड़छाड़ की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि मोहरा मोरादु के प्राचीन आंगनों को आधुनिक सामग्री से पाट दिया गया है, जिससे स्थल की मौलिक पहचान धुंधली पड़ रही है।

तक्षशिला का इतिहास

यह पहली बार नहीं है जब तक्षशिला संकट में आई हो। 1998 में भी भीर टीले के पास स्टेडियम निर्माण की योजना के कारण इसे खतरे वाली सूची में डालने की चेतावनी दी गई थी। तब भारी विरोध के बाद परियोजना रोकनी पड़ी थी।

संरक्षण और विनाश के बीच

आज तक्षशिला फिर उसी मोड़ पर खड़ी है, जहां संरक्षण और विनाश के बीच की रेखा धुंधली होती दिखाई दे रही है। यह केवल पाकिस्तान की प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता की साझा विरासत से जुड़ा प्रश्न है। तक्षशिला ने सदियों तक आक्रमण, उपेक्षा और साम्राज्यों का उत्थान-पतन देखा है, लेकिन अब सबसे बड़ा खतरा उन हाथों से पैदा हो गया है, जो इसे बचाने का दावा कर रहे हैं।