आपने श्रवण कुमार की कहानियां तो पढ़ी ही होंगी, जिन्होंने अपने अंधे माता-पिता को कंधों पर उठाकर तीर्थयात्रा करवाई थी। ठीक वैसा ही काम कर्नाटक मैसूर के रहने वाले एक बेटे ने किया है। हालांकि इन्होंने तीर्थयात्रा कंधे पर बिठाकर नहीं बल्कि स्कूटर पर बिठा कर कराई है। डी. कृष्ण कुमार ने अपनी 70 वर्षीय मां को तीर्थयात्रा पर स्कूटर से ले गए। डी. कृष्ण कुमार अपनी मां को स्कूटर पर बिठाकर 48 हजार किमी की यात्रा की। डी. कृष्ण कुमार और उनकी मां का वीडियो देश के बड़े उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने शेयर किया है।
वीडियो शेयर करते हुए उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने लिखा है, ”मां और देश के लिए प्यार की एक सुंदर कहानी। इसे शेयर करने के लिए मनोज का धन्यवाद। यदि आप इनसे संपर्क कर सकें, तो मैं उन्हें खुद एक महिंद्रा KUV100 NXT गिफ्ट करना चाहूंगा। ताकि वह अपनी अगली यात्रा में मां को कार से ले जा सकें।”
इस वीडियो को ट्विटर पर मनोज कुमार ने शेयर किया था। मनोज कुमार दी फाउंडेशन के सीईओ हैं। आनंद महिंद्रा ने इन्ही के ट्वीट को रिट्वीट किया था।
वीडियो को शेयर कर दावा किया गया है कि उसके मुताबिक अपनी मां को तीर्थयात्रा पर ले जाने के लिए कृष्ण कुमार ने नौकरी तक छोड़ दी है। कृष्ण कुमार ने जिस स्कूटर से मां को तीर्थयात्रा करवाया है वह 20 साल पुराना चेतक स्कूटर है। दावा किया गया है कि कृष्ण कुमार की मां ने इससे पहले कभी शहर नहीं देखा था।
दिवाली में बहुत कम दिन बचे हुए हैं। ऐसे में हम में से बहुत से लोगों की तैयारियां चल रही हैं। इन तैयारियों के बीच अगर आप अपने लिए दिवाली शॉपिंग करने का टाइम नहीं निकाल पाए हैं, तो फिक्र करने की जरुरत नहीं है बल्कि आप अपने वार्डरोब में रखी पुरानी ड्रेसेस को थोड़े एक्सपेरिमेंट के साथ दिवाली का फ्यूजन लुक क्रिएट कर सकते हैं। ये हैं कुछ टिप्स-
अगर आपके पास कोई सिल्क,नेट वाली कोई साड़ी रखी हुई है, तो आप मार्केट से कोई ट्रेंडी-सी बेल्ट खरीद सकते हैं। वहीं, अगर आपका बेल्ट खरीदने का मूड नहीं है, तो आप कोई लंबी-सी मोतियों की माला को भी साड़ी के साथ बेल्ट की तरह पहन सकते हैं।
अगर आपके पास कोई फेस्टिव सीजन वाला लॉन्ग या शॉर्ट कुर्ता रखा हुआ है, तो आप इसे लॉन्ग स्कर्ट के साथ टीमअप करके पहन सकते हैं। साथ ही इसके साथ ट्रेंडी ईयररिंग्स पहनना न भूलें। इससे आपका लुक बेहतरीन लगेगा।
अगर आपके पास कोई सिल्क या सेमी गिल्टर शर्ट है, तो आप उसे किसी सिम्पल कलरफुल प्लाजो के साथ कैरी कर सकते हैं। यह आपको बेहद स्टाइलिश लुक देगा।
आप कोई रफल टॉप लेकर उसके साथ साड़ी पहन सकते हैं, इससे आप ब्लाऊज के झंझट से भी बच जाएंगे और यह काफी ट्रेंडी भी लगेगा।
आपके पास कोई भी अनारकली ड्रेस है, तो आप किसी डेनिम जैकेट या एथनिक जैकेट के साथ इसे कैरी करके अपना नया लुक बना सकते हैं। इस लुक के साथ आप ईयररिंग्स जरूर कैरी करें।
फ़ेस्टिव सीजन शुरू होते ही ऑटो मोबाइल कंपनियों में नई गाड़ियां लॉंच करने की होड़ शुरू हो जाती है। रॉयल एनफील्ड ने अपनी सबसे ताकतवर बाइक Bobber 838 को EICMA मोटर शो 2018 में पेश किया था हालांकि उस समय कंपनी ने इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं दी थीं। लेकिन अब खबरें आ रही हैं कि कंपनी इसे भारत में लॉन्च करने की तैयारी में है। आइए जानते हैं इस बाइक के इंजन कीमत और फीचर्स के बारे में….
इंजन और कीमत
इंजन की बात करें तो Bobber 838 में लिक्विड कूल्ड, फ्यूल इंजेक्टेड 834cc का सबसे दमदार इंजन दिया गया है। जोकि करीब 90-100 Hp की ताकत मिलती है।
इसमें 6 स्पीड गियर बॉक्स भी मिलेंगे।
इस बाइक को पोलारिस इंडस्ट्रीज और Eicher मोटर्स ने मिल कर तैयार किया है।
इतने बड़े इंजन में आने वाली यह रॉयल एनफील्ड की पहली बाइक होगी।
इस नई बाइक में ट्विन एग्जॉस्ट मफलर, फ्रंट व्हील में ट्विन डिस्क ब्रेक्स, फ्लैट हैंडलबार और बड़े व्हीलबेस दिए गए हैं।
इस बाइक के फ्रंट में टेलिस्कोपिक फॉर्क और रियर व्हील में मोनोशॉक सस्पेंशन दिए गए हैं।
साथ ही इसे ड्युअल चैनल ABS फीचर से लैस किया गया है।
इसमें सिंगल सीट दी गई है।
दूसरी सीट के लिए इसमें ऑप्शन भी मिलने की सम्भावना है।
इसमें फुल एलइडी हेडलैंप के साथ डीएलआर दिए गए हैं।
EICMA मोटर शो 2018 में Bobber 838 का कॉन्सेप्ट मॉडल पेश किया था लेकिन इसका प्रोडक्शन मॉडल भी काफी हद तक कॉन्सेप्ट जैसा हो सकता है।
इसे अगले साल होने वाले ऑटो एक्सपो के दौरान लॉन्च कर सकती है।
इस बाइक को 2021 में उतारा जा सकता है, वैसे कंपनी ने अभी तक इस बाइक के लॉन्च को लेकर कुछ नहीं बताया।
Bobber 838 की संभावित कीमत 6 लाख रुपये के आस-पास हो सकती है।
आजकल दुर्घटनाएं दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। यह एयरबैगनुमा यह खास हेलमेट एक स्वीडिश होवडिंग डिवाइस है। दुर्घटना होने पर यह यह डिवाइस किसी तकिया की तरह फूलकर आपके गले और सिर को पूरी तरह ढक लेता है। खास बात यह है कि हवा की अधिकतम मात्रा न होने पर भी यह एयरबैग आपकी सुरक्षा कर सकता है। सामान्य बाइक हेलमेट के मुकाबले यह एयरबैग हेलमेट कहीं मोटा और मुलायम है।
स्वीडिश होवडिंग डिवाइस :
यह हेलमेट एक एयरबैग है, जो आपकी सिर की सुरक्षा के लिए है। लेकिन, इसे आपको साइकिल चलाते वक्त सामान्य हेलमेट की तरह घर से पहनकर नहीं चलना। इसे कॉलर की तरह सिर्फ गले में डालकर चलना है। एक्सीडेंट या किसी मुश्किल की घड़ी में यह खुद-ब-खुद आपके सिर को ढक लेता है, जब किसी तरह की दुर्घटना की आशंका होती है। यह हेलमेट साइकिल सेफ्टी को देखकर डिजाइन किया गया है। यह हेलमेट कॉलर की तरह है, जिसे आप गले में पहनकर चल सकते हैं।
कैसे करता है काम:
यही कॉलर मुसीबत की घड़ी में फैलकर बाकायदा फूलकर एक हेलमेट बन जाता है और आपके सिर को ढक लेता है। इस हेलमेट जैसे एयरबैग की खासियत यह है कि यह आपकी हर मूवमेंट को प्रति सेकेंड में 200 बार रिकॉर्ड करता है। यानि आप कब मुसीबत की घड़ी में पड़ सकते हैं, यह एयरबैग आपसे पहले भांप लेता है और फटाफट हेलमेट में तब्दील होकर आपकी सुरक्षा करता है। एयरबैग के सेंसर एल्गोरिदम का इस्तेमाल करके होने वाली दुर्घटना की पहचान करते हैं।
सप्ताह के दूसरे कारोबारी दिन मंगलवार को सोने की कीमतों (Gold Price Today) में तेजी आई. घरेलू बाजार में मांग बढ़ने के चलते दिल्ली सर्राफा बाजार में 10 ग्राम सोने का भाव (Gold Prices) 50 रुपये बढ़ गया. वहीं सोने की तरह चांद की कीमतों (Silver Price Today) में भी उछाल आया. चांदी का दाम (Silver Prices) में 160 रुपये प्रति किलोग्राम की बढ़ोतरी हुई.
सोने का भाव- मंगलवार को दिल्ली सर्राफा बाजार में सोने का दाम 50 रुपये की तेजी के साथ 38,810 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गया. पिछले सत्र के कारोबार में सोना 38,760 रुपये प्रति 10 ग्राम पर बंद हुआ था. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सोना 1,488 डॉलर और चांदी 17.64 डॉलर प्रति औंस रही.
चांदी की कीमत- इसी तरह चांदी 160 रुपये बढ़कर 46,690 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गयी. पिछले कारोबारी दिवस पर यह 46,530 रुपये प्रति किलोग्राम पर बंद हुई थी. सोने में तेजी की वजह- एचडीएफसी सिक्युरिटीज के सीनियर एनालिस्ट (कमोडिटीज) तपन पटेल ने कहा, धनतेरस से पहले आभूषण इत्यादि की मांग बढ़ी जिससे हाजिर बाजार में सोने में उछाल देखा गया है.
हर शहर में क्यों अलग होती हैं शुद्ध सोने की कीमतें- आप जिस कीमत पर सोना ज्वैलर्स से खरीदते हैं, वह स्पॉट प्राइस यानी हाजिर भाव होता है. ज्यादातर शहरों के सर्राफा एसोसिएशन के सदस्य मिलकर बाजार खुलने के समय दाम तय करते हैं. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि MCX वायदा बाजार में जो दाम आते हैं, उसमें वैट, लेवी एवं लागत जोड़कर दाम घोषित किए जाते हैं. वहीं दाम पूरे दिन चलते हैं.यहीं वजह है कि अलग-अलग शहरों में सोने की कीमतें अलग-अलग होती हैं. इसके अलावा, स्पॉट मार्केट में सोने की कीमत शुद्धता के आधार पर तय होती है. 22 कैरेट और 24 कैरेट सोने की कीमत अलग-अलग होती है.
लखनऊ. राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद (Ram Mandir- Babri Masjid Dispute) की लंबी-चौड़ी गाथा की चर्चा इसके दूरगामी राजनीतिक प्रभाव पर विचार किए बिना पूरी नहीं हो सकती है. ये जानना दिलचस्प है कि कैसे भारत (India) की आजादी के 70 साल से अधिक वर्षों के दौरान इस मामले ने राजनीति को फिर से परिभाषित किया है और विभिन्न राजनीतिक दलों की किस्मत को एक नए सिरे से गढ़ा.
आजादी के समय एक स्थानीय मुद्दा दशकों से किस तरह एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया और देश के केंद्र में आ गया. यह मुद्दा कांग्रेस सबसे बड़ी हार के रूप में बनकर उभरा. इसने कमंडल की लहर पर चलने वाली भाजपा के लिए मार्ग प्रशस्त किया और समाजवादियों के लिए मंडल की लहर को ऊंचा उठाया.
कांग्रेस हालांकि अयोध्या के मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति में केवल 1984 के आसपास प्रमुखता मिली, 1949 में जब बाबरी मस्जिद के अंदर राम और लक्ष्मण की मूर्तियां रखी गईं, तब उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और गोविंद बल्लभ पंत मुख्यमंत्री थे. तब इस मामले को हल्के में लेने में उनकी भूमिका संदेह में आई थी. आलोचकों का कहना है कि प्रशासन हिंदू लोगों को उकसाने को आंखें मूंदकर देखता रहा. संभवत: यह ऐसी पहली घटना थी जिसने कांग्रेस नेतृत्व की तुष्टिकरण की राजनीति के आरोपों को बल दिया. हालांकि, जानकारों का कहना है कि उस समय पार्टी के भीतर कुछ और मामला था, जिसमें पंत खुद अपने राष्ट्रीय नेतृत्व के बजाय नरम हिंदुत्व का अभ्यास कर रहे थे. उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पंत के बीच लिखित पत्राचार के रिकॉर्ड इस बात का प्रमाण हैं.
17 अप्रैल, 1950 को पंत को लिखे गए पत्र में अयोध्या के लिए नेहरू की असहमति के प्रमाण मिलते हैं. नेहरू ने लिखा ‘मैंने लंबे समय से महसूस किया है कि सांप्रदायिक दृष्टिकोण से यूपी का पूरा माहौल बद से बदतर हो गया है. वास्तव में यूपी मेरे लिए एक विदेशी भूमि बनता जा रहा है.’ पंत के लिए स्पष्ट आह्वान में, उन्होंने आगे लिखा, ‘मुझे ऐसा लगता है कि किसी कारण से या किसी और वजह से या शायद केवल राजनीतिक अभियान के लिए, हम इस बीमारी से बहुत अधिक पीड़ित हैं.’
ऐतिहासिक रूप से स्थापित तथ्य है कि पंत उस युग में, आचार्य नरेंद्र देव की अगुआई में कांग्रेस के नेतृत्व में समाजवादियों के विरोध का सामना कर रहे थे, ऐसे में वह अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने के लिए नरम सांप्रदायिकता के साथ छेड़खानी कर रहे थे.
भले ही 1949 में 22-23 दिसंबर की मध्यरात्रि को होने वाली घटनाओं को एक उद्देश्य के साथ आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं थी. लेकिन यह तथ्य कि मूर्तियों को रखा गया था और फिर एक सप्ताह बाद अदालत के आदेशों के माध्यम से मस्जिद के मुख्य द्वार पर ताला लगा दिया गया था और मुसलमानों को प्रवेश से मना कर दिया गया, संपत्ति को “विवादित” घोषित किया गया था. इस विवाद ने जो बीज बोए थे वह तीन दशकों तक चले. बाद में इसने कांग्रेस पर भी अपनी छाया डाल दी.
1975 में आपातकाल लगाने के प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के फैसले के बाद पार्टी के लिए स्थिति काफी बदल गई. दो साल बाद आम चुनावों में लगभग बाहर का रास्ता देखने वाली कांग्रेस ने एक नया चुनावी आधार बनाने के लिए सॉफ्ट कम्यूनल कार्ड खेलने के प्रयोग करने की बात कही. हालांकि, 1984 के बाद ही जब राजीव गांधी अपनी मां की हत्या के बाद प्रधानमंत्री बने और उन्होंने पार्टी की कमान संभाली तब हिंदू और मुस्लिम दोनों पक्षों के कट्टरपंथियों को खुश करने की कोशिशों का खुला सिलसिला शुरू हो गया.
सरकार ने बहुचर्चित शाह बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलट कर पहले मुसलमानों को खुश करने की कोशिश की. अप्रैल 1978 में, 62 वर्षीय मुस्लिम महिला ने अदालत में एक याचिका दायर की, जिसमें उसने तलाकशुदा पति मध्य प्रदेश के इंदौर में प्रसिद्ध वकील मोहम्मद अहमद खान से गुजारा भत्ता या रखरखाव की मांग की. सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में फैसला सुनाया कि सीआरपीसी (दंड प्रक्रिया संहिता) सभी भारतीय नागरिकों पर उनके धर्म की परवाह किए बिना लागू होती है और यह शाहबानो के मामले में भी लागू होता है. राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिलाओं (तलाक अधिनियम पर संरक्षण) को पारित करके सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलट दिया.
ऐसा करने के बाद प्रशासन ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह इस्लामी मौलवियों और कट्टरपंथियों के दबाव में था और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की मांगों के आगे झुक गया था. इसने बहुसंख्यक हिंदू समुदाय के एक बड़े हिस्से को प्रभावित किया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी राजनीतिक शाखा, भारतीय जनता पार्टी-जिसने तब तक राम जन्मभूमि मुद्दे पर आवाज उठानी शुरू कर दी थी- को कांग्रेस को निशाना बनाने के लिए पर्याप्त सामग्री मिल गई और उन्होंने इसे ‘हिंदू विरोधी’ कहा.
प्रतिक्रिया का सामना करते हुए, राजीव गांधी सरकार ने एक और गलत फैसला किया. मामले को बराबरी का करने के लिए बाबरी मस्जिद के ताले खोल दिए गए. हालांकि ये आदेश 1986 में फैजाबाद के जिला न्यायाधीश ने दिया था. विश्लेषकों का कहना है कि परिस्थितियों और घटनाएं जिस तरह से घट रही थीं उससे यह साफ था कि चीजें राजनीतिक सहमति से हो रही थीं.
एक बार ताले खोले जाने के बाद, राम मंदिर आंदोलन के लिए हिंदुत्ववादी ताकतों को प्रोत्साहन मिल गया और उन्होंने इसके लिए अभियान छेड़ दिया.
यहां तक कि आलोचकों ने प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व वाली उस समय की कांग्रेस सरकार को पूरी क्षमता से मस्जिद की सुरक्षा को सुनिश्चित न कर पाने के लिए दोषी ठहराया. हालांकि इसका कोई ठोस सबूत नहीं मिला है, लेकिन पार्टी इस तरह की धारणा को बदल नहीं पाई है.
इसमें कोई संदेह नहीं है कि दोनों पक्षों द्वारा सांप्रदायिक कार्ड खेले जाने के बाद भी किसी को भी इससे कोई फायदा नहीं हुआ. जहां कांग्रेस की गलतियों की वजह से हिंदुत्व के एजेंडे के लिए जगह बनी वहीं मुसलमान इसके कारण कांग्रेस से नाराज हो गए वहीं हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग भाजपा की ओर शिफ्ट हो गया. आरक्षण पर मंडल आयोग की रिपोर्ट के बाद जाति-आधारित राजनीति में उछाल के साथ कांग्रेस को एक और झटका लगा.
भारतीय जनता पार्टी 1980 में स्थापना के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शुरू में भारतीय जनसंघ का एक अधिक विद्रोही स्वरूप था जो कि 1951 से 1977 तक अस्तित्व में थी. 1949 से 1980 तक जहां राष्ट्रीय राजनीतिक स्पेक्ट्रम में कांग्रेस का बोलबाला था वहीं आरएसएस और प्रारंभिक राजनीतिक संगठन जनसंघ, हिंदू राष्ट्रवाद, या हिंदुत्व के सिद्धांतों के आधार पर अपने सामाजिक-राजनीतिक विस्तार को जारी रखता रहा. हालांकि, इस अवधि के दौरान राम जन्मभूमि और अयोध्या दोनों ही पार्टियों के लिए केंद्र बिंदु नहीं थे, लेकिन आंदोलन से जुड़े लोगों को समर्थन देने के मामले में जमीनी कार्य किया जा रहा था. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से पैदा हुई सहानुभूति की लहर की सवार होते हुए आम चुनावों में कांग्रेस की आश्चर्यजनक जीत के बाद, 1984 में घटनाओं ने एक निर्णायक मोड़ लिया. 1980 में अपनी शुरुआत के बाद से उदारवादी हिंदुत्व की भाजपा की रणनीति को बहुत अधिक फायदा नहीं मिला क्योंकि 1984 में उसने सिर्फ दो लोकसभा सीटें जीती थीं.
बीजेपी ने इसके बाद एक महत्वपूर्ण कदम उठाया उसी वर्ष आरएसएस से जुड़े विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए एक अभियान चलाया, जबकि लाल कृष्ण आडवाणी को भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया. कट्टर आडवाणी के नेतृत्व में पार्टी ने राम मंदिर के लिए खुद को प्रतिबद्ध किया.
अगले पांच वर्षों में बड़े पैमाने पर राजनीतिक उथल-पुथल देखी गई. बाबरी मस्जिद के ताले खोलने से भाजपा को और गति मिली, जिसमें दावा किया गया कि बड़े पैमाने पर जनता की राय के दबाव के चलते सरकार ने ये फैसला किया. चूंकि देश भर में शिलान्यास और शिलापूजन कार्यक्रम आयोजित किए गए थे, इसलिए मंदिर की नींव रखने के प्रतीक के रूप में, पार्टी हिंदुत्व की विचारधारा के आसपास राष्ट्रीय स्तर पर इस संदेश को फैलाने में सफल रही. इस कदम का फायदा भी हुआ, 1984 में जहां बीजेपी को 2 सीटें मिली थीं वहीं 1989 के लोकसभा चुनावों में उसे 85 सीटें मिलीं.
इसने पार्टी की महत्वाकांक्षाओं और उसके राजनीतिक दबदबे को बढ़ाने की इच्छा को बढ़ावा दिया. आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से लेकर यूपी के अयोध्या तक राम रथ यात्रा निकाली. अगले संसदीय चुनावों तक 1991 में भाजपा लोकसभा में 120 सदस्यों वाली पार्टी थी.
1992 में मस्जिद का विध्वंस हुआ. तब तक, भाजपा भारतीय राजनीति की एक मजबूत धुरी बन गई थी. तब से पार्टी मजबूती से सत्ता में आ रही है. 1999 में, भाजपा और उसके सहयोगियों ने एक सरकार बनाई, जिसने पांच साल पूरे किए. मील का पत्थर हासिल करने वाली यह पहली गैर-कांग्रेसी सरकार थी.
2014 के बाद से, केंद्र में भाजपा की बहुमत की सरकार सत्ता में है. इसकी अलग-अलग अभिव्यक्तियों में हिंदुत्व की राजनीति आगे बढ़ती रही है. अयोध्या और राम मंदिर को लेकर अब लामबंदी नहीं की जा सकती है क्योंकि यह मामला न्यायिक है, लेकिन पार्टी ने इस बात से कभी इनकार नहीं किया कि यह मुद्दा उसके दिल के करीब है. वह जानते हैं कि अयोध्या और राम मंदिर आंदोलन अब तक की प्रगति के केंद्र रहे हैं.
मंडल और समाजवादी क्षत्रपों का उदय दो प्रमुख पार्टियों कांग्रेस और बीजेपी के अलावा, “हिंदी हृदय प्रदेश” यूपी और बिहार के तथाकथित जाति आधारित क्षेत्रीय खिलाड़ियों ने विशेष रूप से कमंडल की राजनीति में भारी घटनाक्रम के माध्यम से फायदा हासिल किया.
1990 में भाजपा के हिंदुत्व की जांच करने के लिए प्रधानमंत्री वीपी सिंह व्याकुल थे जिन्होंने इसे फिर से जिंदा करने के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों को फिर से लागू किया. सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में पिछड़े वर्गों को 27 फीसदी आरक्षण देने के लिए रास्ता साफ हो गया. इस निर्णय का देश की राजनीति पर बड़ा प्रभाव पड़ा.
जबकि भाजपा ने इसे अपनी हिंदू को इकट्ठा करने की रणनीति को बाधित करने के प्रयास के रूप में देखा, इस कदम ने पिछड़े समूहों को जमीन पर लाने के लिए प्रभावित किया. इस मनुहार की सवारी करते हुए जातिवादी नेता यूपी में मुलायम सिंह यादव और बिहार में लालू प्रसाद यादव जिन्होंने अब तक समाजवादी राजनीति में खुद को तैयार किया था सत्ता में आ गए.
इन दोनों नेताओं ने अपने-अपने राज्यों में जुझारू भाजपा और उसकी हिंदुत्व की राजनीति से मुस्लिम हितों के चैंपियन के रूप में सामना किया. 1990 में जब लालू ने आडवाणी की रथ यात्रा को रोककर उन्हें हिरासत में रखा, उसी साल मुख्यमंत्री के रूप में, मुलायम ने अधिकारियों को अयोध्या में कारसेवकों (दक्षिणपंथी कार्यकर्ताओं) पर गोली चलाने का आदेश दिया. उनका दावा था, ‘परिंदा भी पर नहीं मार सकेगा (विवादित स्थल तक कोई नहीं पहुंच पाएगा)’ उस समय के सबसे विवादास्पद बयानों में से एक बन गया.
इसलिए, राम मंदिर आंदोलन की घटनाओं के दौरान अभी तक एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के साथ, मुलायम और लालू दोनों ने हिंदू पिछड़े समूहों और मुसलमानों का एक स्थायी संयोजन बनाया, जिसने आने वाले सालों के लिए चुनाव जीतने की उनकी महत्वाकांक्षाओं को पूरा किया.
मूर्ति बाजार (Murti Bazar) में इस त्योहारी सीजन (Festive Season) में ‘मेक इन इंडिया’ (Make in India) का जलवा है. ‘मेड इन चाइना’ काफी हद तक गायब है. पिछले कई बरसों से दिवाली (Diwali) पर देवी-देवताओं की मूर्तियों के बाजार में ‘ड्रैगन’ (Dragon) का ‘कब्जा’ था. लेकिन इस बार ऐसा नहीं है और देश में बनी मूर्तियां ज्यादा दिखाई दे रही हैं.
मूर्तियों के बाजार से चीन गायब राजधानी के सदर बाजार में पिछले तीन दशक से अधिक समय से उपहार सामग्री का कारोबार कर रहे स्टैंडर्ड ट्रेडिंग के सुरेंद्र बजाज ने कहा, इस बार मूर्तियों के बाजार से चीन काफी हद तक गायब है. बहुत कम व्यापारी चीन से आयातित मूर्तियां बेच रहे हैं.
दिल्ली व्यापार महासंघ के अध्यक्ष देवराज बावेजा कहते हैं, इस बार व्यापारियों ने चीन से बहुत कम मूर्तियों का आयात किया है. आयात कम होने की वजह चीन से आयातित मूर्तियों के दाम में वृद्धि है. उन्होंने कहा कि इसके अलावा भारतीय मूर्तिकारों ने अब चीन की तकनीक को समझ लिया है और अपने उत्पादों में उसी के अनुरूप सुधार किया है. यही वजह है कि आज भारतीय मूर्तिकारों ने चीन को पछाड़ दिया है. आज मूर्तियों के बाजार में चीन का हिस्सा बमुश्किल दस प्रतिशत रह गया, जो पांच-छह साल पहले तक 70-80 प्रतिशत पर पहुंच गया था. उल्लेखनीय है कि पिछले कई साल से विशेषरूप से दिवाली के मौके पर चीनी सामान के बहिष्कार का अभियान चलाया जा रहा है. व्यापारियों का मानना है कि चीन की मूर्तियों की मांग घटने की एक वजह यह अभियान भी हो सकता है.
देश में बनी मूर्तियां की बिक्री कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के महासचिव प्रवीन खंडेलवाल ने कहा, चीनी सामान के बहिष्कार का अभियान असर मूर्तियों के बाजार पर दिख रहा है. ज्यादातर व्यापारी इस बार देश में बनी मूर्तियां ही बेच रहे हैं. खंडेलवाल कहते है कि व्यापारियों का तो इसमें योगदान है ही, साथ ही ग्राहक भी अब चाइनीज गॉडफिगर खरीदने से कतराता है. ज्यादातर ग्राहक अब देश में निर्मित मूर्तियों की मांग करते हैं. ऐसे में जैसी मांग होगी, वैसा उत्पाद व्यापारी बेचेंगे.
व्यापारियों ने बताया कि बाजार में इस बार मुख्य रूप से दिल्ली के विभिन्न इलाकों मसलन बुराड़ी, पंखा रोड, गाजीपुर, सुल्तानपुरी, पुरानी दिल्ली के कुछ इलाकों में बनी मूर्तिंयां बिक रही हैं. इसके अलावा मेरठ भी मूर्तियों का बड़ा हब है. वहां की मूर्तियां भी बाजार में छाई हैं.
चीन से इम्पोर्टेड मूर्तियां महंगी बारी मार्केट ट्रेडर्स एसोसिएशन के प्रधान परमजीत सिंह ने कहा कि चीन की मूर्तियों के दाम इस बार बहुत ज्यादा हैं. साथ ही भारत में बनी मूर्तियां साजसज्जा और फिनिशिंग में चीन की मूर्तियों को कड़ी टक्कर दे रही हैं. उन्होंने कहा, भारतीय मूर्तियों की तुलना में चीन से आयातित मूर्तियां 30 से 40 प्रतिशत तक महंगी हैं. ऐसे में व्यापारियों के लिए भी देश में निर्मित मूर्तियां बेचना अधिक फायदे का सौदा है.
भगवान की मूर्तियों की मांग ज्यादा बजाज ने कहा, इस बार मूर्तियों के दाम पिछले साल के समान ही हैं और इनमें विशेष बदलाव नहीं आया है. आकार और साज-सज्जा के हिसाब से बाजार में 100 रुपये से लेकर 7,000-8,000 रुपये तक की मूर्तियां बिक रही हैं. दिवाली पर मुख्य रूप से लक्ष्मी, गणेश, रामदरबार, हनुमान, ब्रह्मा विष्णु महेश, शिव परिवार, दुर्गा और सरस्वती की मूर्तियों की मांग रहती है.
भारतीय मूर्तियां अधिक टिकाऊ बरसों से मूर्तियों का कारोबार कर रहे मोहम्मद सुलेमान ने कहा कि मूर्तियां ‘रेजिन’ मैटीरियल से बनाई जाती है, क्योंकि इसपर साजसज्जा करना आसान होता है. साथ ही इनकी साफ-सफाई भी आसान होती है. सुलेमान कहा कि भारतीय मूर्तियों की खास बात यह है कि ये अधिक टिकाऊ हैं. चीन की मूर्तियां बेशक आकर्षक दिखती हैं, लेकिन अधिक टिकाऊ नहीं होती.
व्यापारियों ने बताया कि इस बार बाजार में लाफिंग बुद्धा की मूर्तियों की काफी मांग है. बड़ी-बड़ी कंपनियों से इनके लिए आर्डर आ रहे हैं. उपहार में लॉफिंग बुद्धा देना अच्छा माना जाता है. विभिन्न आकार के लाफिंग बुद्धा की मूर्तियों के दाम 200 रुपये से 2,000 रुपये तक हैं.
हरियाणा में 90 सीटों वाली विधानसभा के लिए सोमवार को मतदान हो गया। कई न्यूज एजेंसियों और चैनलों ने एक्जिट पोल में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिलने का अनुमान लगाया था। इस एक्जिट पोल के मुताबिक हरियाणा में बीजेपी की खट्टर सरकार खतरे में हैं और उसे बहुमत के लिए 46 सीटें मिलती नहीं नजर आ रही हैं। वहीं कांग्रेस भी बहुमत से दूर दिख रही है।
हरियाणा में बीजेपी को 90 में से 32 से 44 सीटें मिल सकती हैं। वहीं कांग्रेस के हिस्से में 30 से 42 सीटें आने का अनुमान लगाया गया है। वहीं जेजेपी को 6 से 10 और अन्य को भी 6 से 10 सीटें मिलने का अनुमान है। इसके अलावा बीजेपी और कांग्रेस दोनों पार्टियों के वोट शेयर में भी कोई ज्यादा अंतर नहीं दिख रहा है। सर्वे के मुताबिक बीजेपी को 33 फीसदी और कांग्रेस को 32 फीसदी वोट मिलने का अनुमान है।
गौरतलब है कि 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 47 और कांग्रेस ने 15 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि 28 सीटें अन्य के खाते में गई थीं। इसके अलावा 2014 में बीजेपी को 33 फीसदी वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस के हिस्से में 21 फीसदी वोट आए थे। अन्य के हिस्से में 46 फीसदी वोट गए थे।
एक्जिट पोल के लिए हरियाणा की सभी 90 विधानसभा सीटों पर 23,118 लोगों से बात की गई, जिसके बाद यह अनुमान लगाया गया।
ध्यान रहे कि कांग्रेस और बीजेपी ने हरियाणा की सभी 90 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जबकि बीएसपी ने 87 और आईएनएलडी ने 81 सीटों पर चुनाव लड़ा है। इसके अलावा सीपीआई ने 4 और सीपीएम ने 7 सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए थे। इनके अलावा 434 निर्दलीय उम्मीदवार भी मैदान में हैं।
गुमलाः गुमला शहर से चार किमी दूर नेशनल हाइवे 43 करमडीपा हवाई अड्डा के समीप बुधवार की सुबह साढ़े चार बजे बालाजी बस दुर्घटनाग्रस्त हो गयी. सड़क के किनारे खड़ी ट्रक से बस टकरा गयी. इस हादसे में 20 से अधिक यात्री घायल हैं. सभी घायलों को गुमला सदर अस्पताल में इलाज चल रहा है. पांच घायलों को रांची रिम्स रेफर किया गया है.
बताया जा रहा है कि बस गुमला से रांची जा रही थी. तभी करमडीपा हवाई अड्डा के समीप चालक का संतुलन खो गया. सड़क के किनारे खड़ी ट्रक को पीछे से बस ने ठोक दिया. इस जोरदार टक्कर के कारण बस के आगे के हिस्से का परखच्चे उड़ गया.
केबिन में बैठे सभी यात्री गंभीर रूप से घायल हो गये. हादसे के बाद लोग चीखपुकार मच गयी. लोग मदद की गुहार करने लगे. सूचना के बाद मौके पर पहुंची पुलिस ने घायलों को एंबुलेंस मंगाकर अस्पताल पहुंचाया. जहां से पांच को रांची रिम्स रेफर कर दिया गया.
विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत समूह आईटीसी ने मंगलवार को दुनिया की सबसे महंगी चॉकलेट पेश की. इसकी कीमत 4.3 लाख रुपये प्रति किलोग्राम है. आईटीसी ने इस चॉकलेट को अपने फैबेल ब्रांड के तहत पेश किया है.
आईटीसी के लक्जरी चॉकलेट ब्रांड फैबेल एक्सिक्विज़िट चॉकलेट ने अपनी सीमित श्रृंखला की चॉकलेट ट्रिनिटी ट्रफल्स एक्ट्राआर्डिनायर पेश की है. यह गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल हो गई हैं. इसे दुनिया की सबसे महंगी चॉकलेट बताया गया है.
आईटीसी के मुख्य परिचालन अधिकारी (चॉकलेट, कनफेक्शनरी, कॉफी और नयी श्रेणी) खाद्य विभाग अनुज रुस्तगी ने कहा कि फैबेल में हम नया बेंचमार्क स्थापित कर काफी खुश हैं. हमने सिर्फ भारतीय बाजार नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर यह उपलब्धि हासिल की है.
हम गिनीस वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल हो गए हैं. यह सीमित संस्करण हाथ से बने लकड़ी के बॉक्स में उपलब्ध होगा. इनमें 15 ग्राम की 15 ट्रफल्स होंगी. इस बॉक्स की कीमत सभी करों सहित एक लाख रुपये होगी.