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दुनिया में 5 सबसे ज्यादा गांजा फूंकने वाले शहर, भारत के कौन से शहर है…

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यह शहर दुनिया में सबसे ज्यादा गांजा फूंकने के साथ ही गांजा को सबसे कम कीमत में बेचने वाले शहरों की लिस्ट में शामिल है जर्मनी की एक मार्केट रिसर्च संस्था ABCD के अनुसार साल 2018 में उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर बताया गया है ABCD के द्वारा किए गए वैश्विक सर्वे में दुनिया के 120 शहरों को इस लिस्ट में शामिल किया गया था।

ABCD द्वारा प्रकाशित कैनाबिस प्राइस इंडेक्स 2018 में बताया गया कि गांजा की खपत सबसे ज्यादा यह सबसे कम कहां है साथ ही किस देश में गांजा का कितना मूल्य है आपकी जानकारी के लिए बता दें कि दुनिया में सबसे गांजा की खपत करने वाले शीर्ष 10 शहरों की सूची में भारत के 2 शहर इस लिस्ट में अपना स्थान बनाते हैं इसके अलावा अमेरिका, ब्रिटेन और रूस जैसे बड़े शहर भी इस लिस्ट में शामिल हैं भारत के 2 शहर इस लिस्ट में शामिल है जिनका नाम नई दिल्ली और मुंबई है नई दिल्ली इस लिस्ट में 3 नंबर पर आती है और मुंबई 6 नंबर पर आती है।

दुनिया के 5 सबसे ज्यादा गांजा फूंकने वालों की लिस्ट-

  1. अमेरिका का न्यूयॉर्क शहर जिसकी सालाना खपत 77.44 है।
  2. पाकिस्तान का कराची शहर जिसकी सालाना खपत 41.95 है।
  3. भारत का नई दिल्ली शहर जिसकी सालाना खपत 38.26 है।
  4. अमेरिका का लॉस एंजेलिस शहर जिसकी सालाना खपत 36.06 है।
  5. मिस्त्र का शहर का काहीरा जिसकी सालाना खपत 32.38 है।

नीता अंबानी की जिंदगी से जुड़े ये 4 राज जिनके बारे में आप भी नहीं जानते होंगे…

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दुनिया के अमीर आदमियों में से एक मुकेश अंबानी की पत्नी नीता अंबानी की लोकप्रियता काफी अधिक है। नीता अंबानी की शख्सियत बड़ी ही खास है। वे हमेशा से अपने आप में भी अलग पहचान रखती हैं। वैसे तो नीता अंबानी की लाइफस्टाइल की बात करे तो हमेशा से वो चर्चे में रही है। आज हम आपको उनकी जिंदगी से जुड़े ऐसे फैक्ट्स के बारे में बताने जा रहे हैं जिनसे आप भी अनजान होंगे। तो आइए जानते हैं इस बारे में।

1.धीरूभाई अंबानी ने नीता अंबानी को एक नृत्य गायन में देखा और उन्होंने उनसे पूछा कि क्या वह उनके बड़े बेटे मुकेश से मिलना चाहेगी। वह अंततः मुकेश अंबानी से मिली और कुछ मुलाकातों के बाद, मुकेश अंबानी और नीता ने एक दूसरे के साथ रहने के फैसला किया।

2. नीता अंबानी का पसंदीदा खेल क्रिकेट है और वो IPL टीम मुंबई इंडियन्स की मालकिन भी है। इस साल चौथी बार मुंबई इंडियंस ने आईपीएल का ख़िताब जीता था।

3. नीता अंबानी का सपना वकील बनाने का था,मगर अपने ससुर की बीमारी के कारण नीता अंबानी को एलएलबी बीच में ही छोड़ना पड़ा।

4. नीता अंबानी एक भरतनाट्यम नर्तक भी हैं और उनका अपने दिन की शुरुआत करने का तरीका भी अलग है। वे जापान देश की सबसे प्राचीन क्रॉकरी ‘नोरिटेक’ के कप में चाय पीकर अपने दिन की शुरुआत करती है और इस कप की कीमत ₹1.5 करोड़ है।

केंद्रीय राज्यमंत्री निरंजन ज्योति के गांव में भाजपा को मिली हार, इस पार्टी को मिले सबसे ज्यादा वोट जानिए…

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भाजपा प्रत्याशी युवराज सिंह को भले ही पूरे विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं ने हाथों हाथ लेकर विजयश्री दिलाने का काम किया हो, लेकिन भाजपा नेताओं के गांवों में पार्टी को पराजय मिली है। केंद्रीय राज्यमंत्री साध्वी निरंजन ज्योति के पैतृक गांव पत्योरा में तो भाजपा कांग्रेस के मुकाबले पराजित हो गई। केंद्रीय राज्यमंत्री निरजंन ज्योति के पैतृक गांव पत्योरा में भाजपा को 283, सपा को 258, बसपा को 136 तथा कांग्रेस को 440 मत प्राप्त किए। यहां पर भाजपा प्रत्याशी कांग्रेस से 157 मतों से पीछे रहे। इसी तरह भाजपा के मंडल अध्यक्ष अर्जुन सिंह अपने गांव बंडा में पार्टी को नहीं जिता सके। भाजपा के मंडल अध्यक्ष अर्जुन सिंह के गांव बंडा में भाजपा को 255, सपा को 263 तथा बसपा को 177 व कांग्रेस को 11 मत मिले।

यहां पर भाजपा को सपा नै 8 मतों से पीछे किया। सबसे बुरा हाल कांग्रेस का कस्बा भरुआ सुमेरपुर में हुआ। कस्बे में विकास पुरुष की छवि रखने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता खुद कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर चेयरमैन बने, मगर विधानसभा उपचुनाव में वह कांग्रेस प्रत्याशी को 500 मत भी नहीं दिला सके और कांग्रेस को कस्बे में शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा।

यहां कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को उम्मीद थी कि कस्बे में कांग्रेस का चेयरमैन है। इसलिए पार्टी यहां बेहतर प्रदर्शन करेगी। कांग्रेस प्रत्याशी को कस्बे में महज 398 मत ही प्राप्त हो सके। सपा को 2198, बसपा को 1903 तथा भाजपा को 6091 मत प्राप्त हुए।

तमाम कयासों एवं अनुमानों को दरकिनार कर सपा अपने पुराने घर बचाने में सफल रही। सपा प्रत्याशी डॉ. मनोज कुमार प्रजापति को अपने पैतृक गांव पौथिया में भरपूर समर्थन मिला। सपा को 1485, भाजपा को 650, बसपा को 80 एवं कांग्रेस को 55 मत मिले। वहीं दर्जा प्राप्त राज्यमंत्री बाबूराम निषाद अपने पैतृक गांव मोराकांदर परसनी में भाजपा को जिताने में सफल रहे।

पूर्व मेयर के घर मिला 11793 किलोग्राम सोना, छिपा रखा था आलीशान घर में

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चीन में पूर्व मेयर के घर छापेमारी में इतना सोना मिला है जिसकी दुनियाभर में चर्चा हो रही है। चीन पुलिस ने डेनझोऊ के पूर्व मेयर झांग काई के घर से 13.5 टन (करीब 11793 किलोग्राम) सोना मिला है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पूर्व मेयर के घर के बेसमेंट से 13.5 टन सोने की ईटें मिली हैं।

उल्लेखनीय है कि पूर्व मेयर ने कई हजार वर्ग में फैले अपने आलीशान घर में सोने को छिपा रखा था। बता दें कि चीन में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून है, जो भी भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है उसे कड़ी सजा मिलती है, ऐसे मामलों में आजीवान कारावास या फिर मौत की सजा तक भी हो जाती है।

सलमान खान की एक दिन की खाने की कीमत आपके दिमाग को झकझोर देगी, देखिये जरूर…

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सलमान खान (salman khan) बॉलीवुड के सुपरस्टार हैं, जिनकी हर फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कमाई का नया रिकॉर्ड बनाती है। सलमान खान (salman khan) की उम्र अब 50 के पार हो गई है, लेकिन फिटनेस के मामले में वह अभी भी नए अभिनेताओं को पीछे छोड़ते हैं। सलमान खान (salman khan) के करियर की शुरुआत 1988 में फिल्म बीवी से हुई।

इसके बाद, उनकी फिल्म मैने प्यार किया (Maine Pyaar Kiya), जो एक ब्लॉकबस्टर थी, उन्हें सुपरस्टार बना दिया गया। इस फिल्म ने सलमान खान की जिंदगी बदल दी। सलमान खान (salman khan) अपने स्वास्थ्य की शुरुआत से ही सतर्क रहे हैं। सलमान अपनी हर फिल्म में अपनी बॉडी भी दिखाते हैं। हर कोई जानता है कि इस उम्र में इस तरह की फिटनेस बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत के साथ सही आहार का होना भी आवश्यक है।

कोई भी व्यक्ति विशेष आहार के बिना ऐसा स्वास्थ्य नहीं बना सकता है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि सलमान खान (salman khan) की सेहत का राज क्या है। इसके साथ ही हम आपको बताएंगे कि सलमान के 1 दिन के खाने में कितना खर्च हैं ।

सलमान खान (salman khan) मसालेदार खाना और जंक फूड बिल्कुल नहीं खाते हैं। सलमान अपने दिन की शुरुआत लेमन हनी वॉटर से करते हैं और ऐसा स्नैक लेते हैं, जिसमें प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का कॉम्बो शामिल होता है। इसलिए वह सुबह के नाश्ते में 4 अंडे खाते हैं और जिसमें आमलेट ज्यादातर बनाया जाता है, यह सलमान का पसंदीदा है।

इसके बाद सलमान खान रात के खाने में चिकन खाना पसंद करते हैं और सलाद जरूरी है। इस सब के अनुसार, सलमान खान के एक दिन के भोजन की कीमत लगभग 8000 रुपये है, जो उन्हें फिट और युवा बनाने के लिए है।

TI, ASI और 2 सिपाही, कॉलगर्ल के साथ मिलकर हनी ट्रैप रैकेट चला रहे थे: IG का खुलासा

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मध्य प्रदेश में हनी ट्रैप मोटी कमाई का जरिया बन चुका है। केवल एक रैकेट नहीं है जो वीवीआईपी को टारगेट कर रहा है बल्कि यह लघु उद्योग जैसा है। कई गैंग काम कर रहीं हैं और अपने अपने स्तर के लोगों को शिकार बना रहीं हैं। यह चौंकाने वाली खबर है। मप्र पुलिस का टीआई हरीश यादव, एएसआई बहादुर पटेल, सिपाही रुपन राजू और संघरत्ना सिंह कॉलगर्ल के साथ मिलकर हनी ट्रैप रैकेट चला रहे थे। आईजी भोपाल से इसका खुलासा किया है।

टीआई हरीश यादव, एएसआई बहादुर पटेल, सिपाही रुपन राजू और संघरत्ना सिंह सस्पेंड

24 सितंबर को पकड़ी गई गैंग शादीशुदा और व्यापारियों को ज्यादती के झूठे केस में फंसाने की धमकी देकर ब्लैकमेल करती थी। कॉलगर्ल के मोबाइल फोन में हरीश यादव, मिसरोद में पदस्थ एएसआई बहादुर पटेल, अयोध्या नगर थाने में पदस्थ सिपाही रुपन राजू और सिपाही संघरत्ना सिंह के खिलाफ पुख्ता सबूत मिले हैं। भोपाल में पदस्थ तीनों पुलिसकर्मियों को डीआईजी ने तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। टीआई हरीश यादव के खिलाफ कार्रवाई के लिए आईजी सागर को बोला गया है। हरीश यादव अभी सागर के बहेरिया थाने में टीआई है।

सिपाही रुपन राजू ने हरीश यादव को मिलवाया था

अयोध्या नगर थाने में पदस्थ सिपाही रुपन राजू कॉल गर्ल्स और दोनों दलालों के संपर्क में था। उसने ही हरीश यादव को इस गैंग से मिलाया था। हरीश यादव ने उन्हें धमकाया था कि मेरे थाना क्षेत्र में कुछ भी करो उसकी जानकारी मुझे होना चाहिए। कॉल गर्ल्स अयोध्या नगर की एक सोसायटी में ही रह रहीं थी।

एएसआई बहादुर पटेल और सिपाही संघरत्ना सिंह पहले से ही रैकेट में थे

एएसआई बहादुर पटेल और सिपाही संघरत्ना सिंह, बाबू मंडल और गिरि के साथ पहले से ही जुड़े हुए थे। हरीश यादव ने थाना प्रभारी अयोध्या नगर के अपने पांच महीने (12 अक्टूबर 2018 से 2 मार्च 2019) के कार्यकाल में पांच से ज्यादा बिजनेसमैन को ब्लैकमेल करके लाखों रुपए वसूल किए थे। व्यापारियों से जो रकम टीआई द्वारा वसूली जाती थी उसमें से 10 से 15 हजार रुपए ही कॉल गर्ल्स को दिए जाते थे।

हमें साक्ष्य मिले हैं: आईजी भोपाल

योगेश देशमुख, आईजी भोपाल रेंज ने बताया कि इस मामले में थाना प्रभारी के खिलाफ कुछ साक्ष्य मिले हैं। मैंने आईजी सागर को पत्र लिखकर थाना प्रभारी के खिलाफ सख्त कार्रवाई की अनुशंसा की है।

थायराइड के इन लक्षणों पर ध्यान देना है बहुत जरूरी

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थाइरॉयड बॉडी के सिस्टम को संतुलित रखने में मददगार है। इस हार्मोन में गड़बड़ी आने पर शरीर में बहुत सी परेशानियां और चेंज आ जाते हैं।

इसके लक्षणों से इसके बारे में पता लगाया जा सकता है और सही समय पर इलाज से इस रोग से होने वाली दिक्कतों से मुक्ति पाया जा सकता है। आइए जाने इसके लक्षणों के बारे में जिन पर ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

  1. कोई भारी काम न करने के बाद भी थकावट महसूस हो और दिन भर सुस्ती बनी रहे तो थाइरॉयड की जांच अवश्य करवाएं।
  2. खाना खाने के बाद भी भूख महसूस होना भी थायरॉइड का एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है।
  3. शरीर में अचानक से खून का दौरा बढ़ जाएं तो हो सकता है आप थाइरॉयड के शिकार हो गए हैं। ऐसे में जांच अवश्य करवाएं।
  4. बालों के तेजी से टूटने और झड़ने का कारण भी थाइरॉयड ही हो सकता है।
  5. डाइट का पूरा ध्यान रखने के बावजूद भी वजन तेजी से कम हो रहा हो तो अपनी सेहत की ओर विशेष ध्यान जरूर दें। इसका मुख्या कारण थायरॉइड भी हो सकता है।
  6. बिना किसी वजह के तनाव में रहना या अपने आप को दुखी महसूस कर रहे हैं तो थाइरॉइड की जांच अवश्य करवाएं।
  7. अपने आस-पास की चीजों को भूल जाना और दिमाग पर ज्यादा जोर डालना भी थाइरॉयड का मुख्या कारण हो सकता है।
  8. जिन महिलाओं को पीरियड्स के दौरान ज्यादा ब्लीडिंग या दर्द महसूस हो तो वे अपनी जांच अवश्य करवाएं।

समय आ गया है कि हम सामुदायिकता का मोह छोड़कर व्यक्ति के पुनर्गठन की ओर लौटें…

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श्रीकांत वर्मा के तीसरे रास्ते पर जो गंभीर और आलोकप्रद विचार-विमर्श रायपुर में हुआ उसमें एक बिंदु यह उभरा कि इस समय संसार भर में जो हो रहा है उसका एक चिंताजनक पक्ष यह है कि आधुनिकता के एक अद्वितीय आविष्कार व्यक्ति का लोप होने जा रहा है. व्यक्ति को नष्ट करने का एक संयुक्त उपक्रम राजनीति, आर्थिकी और बाज़ार, तकनालजी, धर्म, मीडिया आदि सब एक विचित्र और असाधारण गठबंधन में जाने-अनजाने कर रहे हैं. हम महात्मा गांधी के 150 वर्ष पूरे होने के बहुत नज़दीक हैं और इसलिए यह याद करना उचित होगा कि एक ओर तो गांधी जी ने अभूतपूर्व सामुदायिकता विकसित की और दूसरी ओर व्यक्ति की महिमा पहचान कर व्यक्ति को एक तरह से नयी नैतिक ज़िम्मेदारी और अन्तःकरण के घर के रूप में प्रतिष्ठित किया.

सामुदायिकता के जोश, प्रवाह और उत्साह में वे व्यक्ति और उसकी पूरी अद्वितीयता और नैतिक सत्ता को कभी ओझल नहीं होने देते थे. आज भारत में ही नहीं सारे संसार में व्यक्ति का क़द, उस की नैतिक सत्ता और जवाबदेही को लगातार घटाया जा रहा है. उसका समुदाय, समाज, बिरादरी, जाति, धर्म आदि में घटाया जाना लगातार जारी है और उसके निजी नैतिक अन्तःकरण को एक सुनियाजित लेकिन नीति-निरपेक्ष सामुदायिक अंतःकरण से अपदस्थ करने की चेष्टा विकराल और भयावह रूप से हो रही है. इस समय लोकतंत्र का एक बड़ा संकट यह है कि उसमें अब व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता की कोई आशंका नहीं बची है और न ही ऐसी किसी आकांक्षा के लिए कोई संभावना.

इस विषर्यास में, जो कि झूठ-अन्याय-ग़ैर बराबरी-हिंसा के विचित्र घालमेल से बढ़ रहा है, यह स्थिति तेज़ी से और मान्य हो रही है कि व्यक्ति की अपने से कोई ज़िम्मेदारी, सांस्कृतिक या नैतिक, राजनैतिक या सामाजिक नहीं है. सब कुछ सामुदायिकता के हिस्से या मत्थे जा रहा है. किसी सही या ग़लत सामुदायिक लक्ष्य के लिए व्यक्ति की बलि देने में नियामक शक्तियों को कोई संकोच नहीं है और क़ानून भी अब उसमें बाधा नहीं बन सकते. कोई भी सामुदायिक झूठ सच माना जा सकता है इस आधार पर कि बड़ी संख्या में लोग उसे सच मानते हैं या कि उनसे मनवाया जा सकता है. सच की कैसी भी व्यक्तिगत सत्ता ध्वस्त हो रही है.

समय आ गया है कि हम सामुदायिकता का मोह छोड़कर व्यक्ति के पुनर्गठन की ओर लौटें और सत्याग्रह का पुनराविष्कार करें. यह आसान भले न हो असंभव नहीं है. हमें इस सच्चाई पर वापस आना होगा कि हमारे कुछ सच साझा और सामुदायिक हैं और कुछ व्यक्तिगत और दोनों में तालमेल रखकर ऐसा आचरण किया जा सकता है जो निजी और सामाजिक एक साथ हो. अगर झूठ के घटाटोप और सामाजिक आतंक का हमें सामना करना हो निजी सत्याग्रह से तो वह हमारी तेज़ी से घटती नैतिक ऊर्जा का पुनर्वास करेगा. राज के बरक़्स नीति की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा अंततः सामाजिक प्रतिफल भी लायेगी. किसी भी व्यक्ति के लिए आज सच पर अड़ना एक साथ नैतिक और सामाजिक होना है.

अज्ञातकुलशील की छबियों का अनंंत

यह तो व्यापक तौर पर जाना-माना जाता है कि आधुनिकता की एक बड़ी और अक्षय देन यह रही है कि उसने पौराणिक-ऐतिहासिक-मिथकीय नायकों को साहित्य और कलाओं के क्षेत्र से अपदस्थ कर उनकी जगह पर, ध्यान और सृजन में, साधारण को, साधारणता की निपट और अदम्य-विविध मानवीयता को प्रतिष्ठित कर दिया है. यह नहीं कि पहले की कला या साहित्य में साधारण की कोई जगह नहीं थी, थी पर केंद्र में नहीं, हाशियों पर थी. आधुनिकता ने उसे केंद्र में लाने का अथक यत्न किया है. यह बात शिद्दत से लगी जब पिछले सप्ताह प्रसिद्ध चित्रकार जोगेन चौधरी की एक बड़ी प्रदर्शनी का, जो लगभग पुनरवलोकी प्रदर्शनी है, शुभारम्भ बांग्ला अभिनेता और कवि सौमित्र चटर्जी, बैंकर अरुन्धती भट्टाचार्य और मैंने पिछले सप्ताह कोलकाता में इमामी द्वारा हाल में स्थापित ‘कोलकता सेंटर फ़ार क्रिएटिविटी’ में किया.

यों तो जोगेन ने पशु-पक्षी, फूल-पौधे आदि भी दक्षता और कल्पनाशीलता से चित्रित किये हैं पर उनकी लंबी और अत्यन्त समृद्ध छबि-श्रृंखला में अज्ञातकुलशील व्यक्तियों के अनेक मनोहारी या विचलित-द्रवित करनेवाले चित्र हैं. वे सभी अनायक, लगभग सन्दर्भहीन, इतिहास से छूटे हुए हैं. उनके कोई नाम नहीं हैं और उनका जोगेन के किसी चित्र में होना जैसे नामहीनता से बाहर नाममयता के वृत्त में आना है. चित्र, बिना नाम लिये, इन लगभग असंख्य लगते साधारण लोगों को नाम देते हैं. जोगेन मानवीय को, लगातार और अथक रूप से, साधारण में अवस्थित करते हैं. उनके यहाँ मानवीय, ग़ैर-मानवीय, वानस्पतिक, खनिमूलक सब में एकता जैसी है. मानवीय अपनी सहज नाटकीयता, सघन गीतिपरकता, विडम्बना, ऐन्द्रियता, सहजता, अपनी पीड़ा और उछाह में साधारण में ही प्रगट होता है.

कला के देवता, जैसा कि पहले भी कई बार कहा गया है, ब्यौरों में बसते हैं. जोगेन तो ब्यौरों में बहुत संलग्नता और हुनर से काम करनेवाले चित्रकार हैं. ये ब्यौरे अकसर एक जटिल गुंथाव में होते हैं. वे कई बार अप्रत्याशित और विस्मयकारी भी होते हैं- कई रैखिक तनावों में उलझे हुए.

इन चित्रों को साधारण जीजन के एक लंबे, लगभग असमाप्य, नाटक के रूप में भी देखा जा सकता है. इन नाटक में अवसाद, आशा, निराशा, वासना, क्षरण, सहारा, निहत्थापन आदि कई तरह के प्रसंग आते रहते हैं. जोगेन का स्थायी भाव वे असंख्य ढंग हैं जिनसे साधारण मनुष्य संघर्ष करते, इसरार करते, खोजते-पाते, भटकते हैं, सिर्फ़ मानवीय हो सकने की कोशिश में. जोगेन से पूछे गये एक प्रश्न के उत्तर में कि उनकी कृतियों में कोई स्पष्ट सामाजिक सन्दर्भ नहीं होता, मैंने यह कहने की कोशिश की कि साधारण को जगह देना, उन्हें सृजन के केन्द्र में लाना अपने आप में सामाजिक कर्म है और ऐसी कला को अलग या मुखर रूप से अपने को सामाजिक दिखाने-बनाने की सरकार नहीं.

समापन की ओर

1945 में संसार में कुल 12 लोकतंत्र थे, पिछली सदी के अंत पर उनकी संस्था बढ़कर 87 हो गयी लेकिन नयी सदी के दो दशकों के समापन पर संसार भर में लोकतंत्र समापन की ओर बढ़ रहे हैं. 3 दशकों पहले इतिहास के अन्त की घोषणा हुई थी- इतिहास तो बच गया लगता है पर लोकतंत्र समापन की ओर है. यह स्थापना की है येल, आक्सफ़र्ड और हार्वर्ड विश्वविद्यालयों से डिग्री प्राप्त राजनैतिक मनोविज्ञानी शान रोज़ेनबर्ग ने. उनकी राय है कि लोकतंत्र स्वयं को खा रहा है और इस स्थिति के लिए ‘हम लोग’ ज़िम्मेदार हैं. पश्चिमी क़िस्म के लोकतंत्र संसार भर में सिकुड़ रहे हैं और उनका स्थान दक्षिणपंथी लोकलुभावन सत्ताएं ले रही हैं जो मतदाताओं को जटिल प्रश्नों के सरल उत्तर प्रस्तुत कर रहे हैं. रोज़ेनबर्ग का तर्क है कि लोकतंत्र कठिन श्रम की अपेक्षा करता है और जो उसमें हिस्सेदार होते हैं उनसे अधिक अपेक्षाएं करता है. उसे ऐसे लोग चाहिये अपने से अलग मत रखनेवाले लोगों का आदर करें, उनका भी जो उन जैसे नहीं दीखते. वह नागरिकों से कहता है कि उन्हें सूचनाओं के अम्बार से अच्छा नबेर सकना चाहिये, बुरे को छोड़ते हुए. उनमें विचारशीलता, अनुशासन और तर्क की दरकार होती है. होता, लेकिन, यह है कि हमारे दिमाग़ तरह-तरह के पूर्वग्रहों से ग्रस्त रहते हैं. उस सुबूत को हम दरकिनार कर देते हैं जो हमारे लक्ष्य से मेल नहीं खाता और ऐसी सूचना स्वीकार करते हैं जो हमारे पूर्वग्रहों की पुष्टि करती है. आधुनिक लोकतंत्र के लिए हमारे दिमाग़ ख़तरनाक साबित हो रहे हैं. मनुष्य लोकतंत्र के लिए नहीं बने हैं. जिन संस्थाओं ने अभी तक लोगों को उनकी अलोकतांत्रिक वृत्तियों से बचाया था उन पर भद्र समुदाय कब्ज़ा घट रहा है.

सोशल मीडिया और इंटरनेट ने अधिक लोकतंत्र फैलाया है पर विडंबना यह है कि वह एकाधिकारवाद की ओर बढ़ रहा है. लोकतंत्र सामंजस्य और विविधता के लिए सहिष्णुता की दरकार होती है. दक्षिणपंथी कल्पित शत्रु बनाते हैं और उन पर सारी बरबादी की ज़िम्मेदारी थोप देते हैं. लोकलुभावन दक्षिणपंथ लोकतंत्र के बरक़्स कुल एक मांग करता है: वफ़ादारी की. वफ़ादारी का मतलब है लोकलुभावन राष्ट्रवादी दृष्टि के लिए समर्पण. एक एकाधिपत्य मूलक नेता के प्रति वफ़ादारी, लोकतंत्र द्वारा चाहे गये सोच-विचार से, अधिक आसान होती है.

रोजे़नबर्ग का निष्कर्ष है कि अमरीकियों की बहुसंख्या लोकतांत्रिक संस्कृति, संस्थाओं, विधियों या नागरिकता को समझने या उनके महत्व को स्वीकार करने में असमर्थ है. यह विश्लेषण मुख्यतः अमरीकी और पश्चिमी लोकतंत्र की स्थिति बल्कि दुर्दशा का आकलन है. दुखद आश्चर्य यह है कि यह स्वयं भारतीय लोकतंत्र की वर्तमान दुर्दशा का लगभग प्रामाणिक विश्लेषण भी है. जिन विकृतियों का ज़िक्र रोजे़नबर्ग ने किया है वे हमारे यहां भी हैं और शायद अधिक विकराल रूप में. यह सोचना कष्टकर भले है पर हमें इस मुक़ाम पर ठिठककर पूरी बेबाकी से यह सोचना ज़रूर चाहिये कि स्थिति कितनी भयावह है. यह भी सोचने की बात है कि हमारा कोई बुद्धिजीवी ऐसी निर्भीकता पर तर्कसंगत ढंग से हमारी लोकतांत्रिक गिरावट का विश्लेषण क्यों नहीं करता? अगर करता है तो हमें उसकी ख़बर इतनी कम क्यों है?

भाजपा नेता ने मोदी सरकार पर साधा निशाना, कहा- हम सही आर्थिक नीतियां नहीं अपना रहे…

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भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने शनिवार को कहा कि देश सही आर्थिक नीतियां नहीं अपना रहा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वामी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ बहुत अच्छे कार्यक्रम जैसे कि ‘मेक इन इंडिया’ शुरू किए हैं लेकिन देश वृहद आर्थिक नीतियों के मोर्चे पर पिछड़ रहा है। स्वामी ने यहां एक कार्यक्रम में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू पर आरोप लगाया कि उन्होंने देश पर सोवियत संघ का आर्थिक मॉडल ‘थोपा’ और इसी वजह से हमारी अर्थव्यवस्था पीछे है। साथ ही, उन्होंने बचत बढ़ाने के लिए आयकर बंद करने की भी वकालत की।

वृहद आर्थिक नीतियों की जरूरत

उन्होंने कहा, क्या आज हम सही आर्थिक नीतियां अपना रहे हैं, मैं माफी चाहूंगा, लेकिन नहीं हम ऐसा नहीं कर रहे हैं।’ स्वामी ने कहा कि मोदी ने ‘मेक इन इंडिया’, उज्ज्वला और खुले में शौच को रोकने जैसे कार्यक्रम और योजनाओं पर बहुत काम किया है। लेकिन ये सभी सूक्ष्म आर्थिक उपाय हैं जबकि देश को वृहद-आर्थिक नीतियों की जरूरत है और इस पर हमने अब तक कोई काम नहीं किया है। हमें अब यह करना होगा क्योंकि अब हम कुछ समस्याओं का सामना कर रहे हैं।

नीतिगत दर को लेकर रघुराम राजन की आलोचना की

स्वामी ने मुद्रास्फीति नियंत्रण के लिए ब्याज दरें बढ़ाए जाने को लेकर रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की भी आलोचना की। उन्होंने दावा किया कि इससे बेरोजगारी बढ़ी और लघु एवं मध्यम उद्योग को नुकसान पहुंचा। स्वामी ने कहा कि सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि बैंक ऋण पर ब्याज दरें नौ प्रतिशत से अधिक ना हों और लोगों को सावधि एवं बचत जमाओं पर नौ प्रतिशत ब्याज मिले। यदि सरकार ऐसा करती है तो निवेश तेज होगा और इससे आर्थिक वृद्धि होगी।

आयकर हटा देना चाहिए

उन्होंने कहा कि मौजूदा चरण में वस्तु एवं सेवा कर देश के लिए वांछित नहीं है। बचत बढ़ाने के लिए आयकर हटा देना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘नेहरू के समय हम सोचते थे कि हम 3.5 प्रतिशत से अधिक वृद्धि नहीं कर सकते। लेकिन आज हम सोचते हैं कि देश 10 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ सकता है। हमारे पास योग्यता, क्षमता और संसाधन है।’

डोमेन नाम बदल भारत लौटे प्रमुख ‘पोर्न पोर्टल’, विदेशी कंपनियों ने मोदी सरकार को ऐसे दिया चकमा!

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भारत सरकार द्वारा पोर्न वेबसाइट्स पर कार्रवाई के बावजूद बड़ी वैश्विक वेबसाइट्स ने इस प्रतिबंध से निपटने का तरीका निकाल लिया है और पोर्न अब भी देशभर में करोड़ों स्मार्टफोन्स पर बिना किसी डर के देखा जा रहा है। डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशंस ने सभी इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को एक पत्र जारी कर उन्हें (सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अनुच्छेद 79(3)(ब) के तहत) पोर्न वेबसाइट्स निष्क्रिय करने का निर्देश दिया था। आदेश के तहत 857 वेबसाइटों को अनैतिक और असभ्य बताकर निष्क्रिय कर दिया गया था।

हालांकि दो वैश्विक पोर्न पोर्टल – रेडट्यूब और पोर्नहब ने भारत में वापसी की है और किसी को इन साइटों पर एक्सेस करने के लिए कोई तरकीब लगाने की जरूरत नहीं है। पोर्नहब जहां ‘पोर्नहब डॉट ओआरजी’ के नाम से उपलब्ध है, वहीं रेडट्यूब को ‘रेडट्यूब डॉट नेट’ यूआरएल से एक्सेस किया जा रहा है।

चूंकि कार्रवाई डॉट कॉम डोमेन पर हुई है, तो पोर्न वेबसाइट्स बिना किसी वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (वीपीएन), वैकल्पिक ब्राउजर्स, प्रॉक्सीज और अन्य उपायों की जरूरत के बिना विभिन्न स्क्रीन्स पर आसानी से एक्सेस की जा सकती हैं।

पिछले साल दिसंबर में डीओटी के निर्देशों के बाद जियो, एयरटेल और वोडाफोन जैसे प्रमुख टेलीकॉम ओपरेटरों ने भी पोर्न या चाइल्ड पोर्नोग्राफिक कंटेंट दिखाने वाली वेबसाइट्स पर प्रतिबंध लगा दिया था। देश के अग्रणी साइबर कानून विशेषज्ञ पवन दुग्गल के अनुसार, भारत में कठोर साइबर सुरक्षा कानूनों को तत्काल लागू करने की जरूरत है।