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कांग्रेस और डीएमके के बीच सीट बंटवारे पर बातचीत जारी…

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तमिलनाडु कांग्रेस के अध्यक्ष के. सेल्वपेरुंथगई ने सोमवार को बताया कि कांग्रेस और द्रविड़ मुन्नेत्र कज़गम (डीएमके) के बीच सीट बंटवारे पर बातचीत के बाद एक समझौता होगा।

उन्होंने कहा कि दोनों दलों के बीच कोई गलतफहमी नहीं है। हर चुनाव में बातचीत होती है, और सभी पार्टियां अधिक सीटों की मांग करती हैं, लेकिन अंततः एक समझौता हो जाता है। इस बार भी ऐसा ही होगा। हम कुछ अतिरिक्त सीटों की मांग कर रहे हैं, और समझौता हो जाएगा।

सेल्वपेरुंथगई ने आगे कहा कि डीएमके और कांग्रेस, जो इंडिया ब्लॉक गठबंधन का हिस्सा हैं, एक स्वाभाविक और वैचारिक गठबंधन हैं। उन्होंने कहा कि असहमति की कोई बात नहीं है। हर चुनाव में सभी पार्टियां, यहां तक कि छोटी पार्टियां भी, अधिक सीटों की मांग करती हैं। जो भी आवश्यक होगा, हम मांग करेंगे। हमारे मुख्यमंत्री स्टालिन इस पर विचार करेंगे। कोई समस्या नहीं है; सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा है। उन्होंने कांग्रेस और तमिलगा वेट्री कज़गम (टीवीके) के बीच बातचीत की अफवाहों को भी खारिज किया, यह कहते हुए कि हमने टीवीके से कोई बातचीत नहीं की। किसने कहा कि हमने टीवीके से बात की? मैं पीसीसी अध्यक्ष हूं। मेरे हाई कमांड ने भी मुझे उनसे बात करने का कोई निर्देश नहीं दिया। हम कोई गुप्त राजनीति नहीं करते।

यह बयान राज्य में सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस और डीएमके के बीच चल रही बातचीत के संदर्भ में आया है। इस बीच, तमिलनाडु के अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) प्रभारी गिरीश चोडंकर ने भी डीएमके नेतृत्व के साथ सीटों के बंटवारे पर चल रही बातचीत को लेकर सकारात्मकता व्यक्त की।

चोडंकर ने कहा कि हमने अपनी इच्छाओं की सूची साझा कर दी है और जैसे ही यह अंतिम रूप लेगी, हम आपको सूचित करेंगे। हमें पूरा विश्वास है कि हमारी इच्छाएं पूरी होंगी। तमिलनाडु विधानसभा की 234 सदस्यीय विधानसभा के लिए 2026 के पहले छह महीनों में चुनाव होंगे, जहां एमके स्टालिन के नेतृत्व वाला गठबंधन भाजपा-एआईडीएमके गठबंधन के खिलाफ जीत हासिल करने के लिए ‘द्रविड़ मॉडल 2.0’ को पेश करने की कोशिश करेगा।

संजू सैमसन की शानदार पारी ने कोहली के रिकॉर्ड को तोड़ा…

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संजू सैमसन की अद्भुत पारी

2022 में पाकिस्तान के खिलाफ MCG पर विराट कोहली की 82 नाबाद की पारी को भारत की सबसे बेहतरीन T20 विश्व कप पारी माना जाता है। इसे देखने वाले कई लोगों का मानना था कि इसे पार करना मुश्किल होगा।

लेकिन संजू सैमसन ने वेस्ट इंडीज के खिलाफ महत्वपूर्ण मैच में 50 गेंदों पर नाबाद 97 रन बनाकर सबको चौंका दिया। पूर्व क्रिकेटर कृष्णा श्रीकांत ने कहा कि यह पारी कोहली की मेलबर्न में खेली गई पारी के समान थी।

हाल के महीनों में भारतीय टीम के लिए संघर्ष कर रहे सैमसन ने अपनी शांत पारी से टीम को जीत दिलाई और T20 विश्व कप के सेमीफाइनल में जगह बनाई। श्रीकांत ने अपने यूट्यूब चैनल पर इस पारी की प्रशंसा करते हुए कहा, ‘संजू – मैंने जो सबसे बेहतरीन चेज़ देखी है, वह यही है। जब विराट ने पाकिस्तान के खिलाफ खेली थी, मैं वहां था। यह उसी स्तर की लग रही थी।’ उन्होंने कहा कि सैमसन ने बिना किसी गलत शॉट के खेला और ऐसा लगा जैसे उनके पास हर शॉट खेलने के लिए अतिरिक्त समय था।

श्रीकांत ने कहा, ‘संजू के पास हर शॉट खेलने के लिए अतिरिक्त समय था। एक भी लापरवाह शॉट नहीं। वह कभी भी आउट होते हुए नहीं दिखे। बैकफुट से सीधे ड्राइव और टेनिस स्टाइल के पंच – क्या शॉट थे! यह बल्लेबाजी का एक अलग स्तर था।’ उन्होंने सैमसन की बल्लेबाजी की विविधता की तारीफ की और कहा कि उन्होंने जो शॉट खेले, वह अद्भुत थे।

सैमसन ने कोहली के T20 विश्व कप में सबसे अधिक स्कोर का रिकॉर्ड तोड़ दिया, जो भारतीय सफल रन-चेज़ में था।

खामेनेई की मौत के बाद ईरान में कौन ले रहा फैसले? अगले सुप्रीम लीडर की रेस में ये 5 चेहरे…

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ईरान इन दिनों संकट में है. सुप्रीम लीडर खामेनेई इजरायली-अमेरिकी हमले में मारे जा चुके हैं. 40 दिन का राष्ट्रीय शोक है. फिर भी ईरानी सुरक्षा बल सतर्क हैं. जवाबी कार्रवाई से लेकर हमले करने तक में पीछे नहीं हैं.

गल्फ के लगभग सभी देशों पर ईरानी सेना ने हमले करके नए स्तर की दुश्मनी मोल ले ली है. ईरानी ने अपने सुप्रीम लीडर की हत्या के बाद इजरायल-अमेरिका को बदला लेने की चेतावनी दी है.

इस बीच कई सवाल खड़े हो गए हैं. मसलन, सुप्रीम लीडर के न होने की स्थिति में देश के बड़े और नीतिगत फैसले कौन लेता है? अगला सुप्रीम लीडर कौन बनेगा? इस सर्वोच्च पद के सबसे बड़े दावेदार कौन-कौन हैं? आइए, इन सभी सवालों को विस्तार से जानते हैं.

तीन सदस्यीय काउंसिल चला रही देश

ईरान में सुप्रीम लीडर सबसे ऊंचा पद है. वह देश और सिस्टम का अंतिम निर्णायक माना जाता है. लेकिन सुप्रीम लीडर की मौत हो जाए या पद खाली हो जाए, तो भी देश बिना नेतृत्व नहीं रहता. ईरान के संविधान में इसका तरीका स्पष्ट रूप से दर्ज है. इसे आर्टिकल 111 कहा जाता है. इसके मुताबिक एक अस्थायी तीन सदस्यीय परिषद सुप्रीम लीडर की जिम्मेदारियां संभालती है.

ईरान सुप्रीम लीडर अली खामेनेई नहीं रहे.

यह परिषद तब तक काम करती है, जब तक नया सुप्रीम लीडर नहीं चुन लिया जाता. इस परिषद में राष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश तथा गार्डियन काउंसिल का एम मौलवी सदस्य, मिलकर देश चलाएंगे. फिलहाल यही व्यवस्था लागू हो गई है. फैसले एक व्यक्ति की जगह इस अस्थायी परिषद के जरिए आगे बढ़ते हैं.

सुप्रीम लीडर बनने की रेस में कौन-कौन?

अब दुनिया और ईरान के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगला सर्वोच्च लीडर कौन होगा? इस पद के दावेदार कौन-कौन हैं? कुछ नामों की चर्चा चर्चा है हालांकि अंतिम फैसला असेंबली के विशेषज्ञों का होगा.

मोज्तबा खामेनेई:

ये दिवंगत सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के दूसरे बेटे बताए गए हैं. ताकतवर हलकों में प्रभाव रखते हैं. खासकर प्रशासन और IRGC (सेना) में उनकी पकड़ की चर्चा अक्सर होती है. लेकिन उनके खिलाफ सबसे बड़ा मुद्दा वंशानुगत उत्तराधिकार का है.

मोज्तबा खामेनेई.

में पिता से बेटे को सत्ता मिलना कई लोगों को पसंद नहीं आता. साल 1979 की क्रांति में शाह की राजशाही हटाई गई थी. ऐसे में पिता-पुत्र वाला मॉडल आलोचना का विषय बन सकता है.

आयतोल्लाह अलीरेज़ा आराफ़ी:

यह नाम धार्मिक व्यवस्था में बेहद प्रभावशाली है. इनकी उम्र 67 साल बताई गई है. वे असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के डिप्टी चेयरमैन भी हैं. वे गार्डियन काउंसिल के सदस्य भी रहे हैं. इन्हें राष्ट्रपति एवं मुख्य न्यायाधीश के साथ अस्थायी नेतृत्व परिषद का सदस्य भी बनाया गया है.

आयतोल्लाह अलीरेज़ा आराफ़ी.

वे क़ुम के फ्राइडे प्रेयर लीडर बताए गए हैं. वे ईरान की सेमिनरी व्यवस्था के प्रमुख भी बताए गए हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वे राजनीतिक रूप से स्वीकार्य नेता नहीं माने जाते. यह बात उनके खिलाफ जाती है.

मोहम्मद मेहदी मीरबाघेरी:

इन्हें अल्ट्रा-हार्डलाइन मौलवी बताया जाता है. वे असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के सदस्य बताए गए हैं. उनका नजरिया पश्चिम-विरोधी बताया गया है. वे क़ुम के इस्लामिक साइंसेज़ अकैडमी के प्रमुख बताए गए हैं.

मोहम्मद मेहदी मीरबाघेरी.

घोलाम-हुसैन मोहसनी-एजेई:

ये ईरान की न्यायपालिका के प्रमुख हैं. रिपोर्ट के मुताबिक उन्हें 2021 में यह पद खामेनेई ने दिया था. ये पहले खुफिया मंत्री भी रह चुके हैं. अभियोजक-जनरल और डिप्टी चीफ जस्टिस भी रहे हैं. उन्हें कट्टरपंथी और रूढ़िवादी खेमे के करीब बताया गया है. चूंकि वे अस्थायी परिषद का हिस्सा भी हैं, इसलिए उनका नाम और मजबूत दिखता है.

घोलाम-हुसैन मोहसनी-एजेई.

हसन खुमैनी:

ये वर्तमान ईरान के संस्थापक आयतोल्लाह रूहोल्लाह खुमैनी के पोते हैं. इनकी उम्र रिपोर्ट में 54 वर्ष है. ये अपने दादा के मकबरे के संरक्षक बताए गए हैं. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ये सुधारवादी और अपेक्षाकृत उदार विचारों वाले माने जाते हैं. इन्होंने साल 2016 में असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स का चुनाव लड़ना चाहा था, लेकिन उन्हें अयोग्य ठहराया गया था. इसलिए उनकी राह एकदम से आसान नहीं मानी जाती.

हसन खुमैनी.

इस तरह एक बात स्पष्ट है. सुप्रीम लीडर की हत्या के बाद संविधान के मुताबिक एक अस्थाई व्यवस्था ने अपना कामकाज संभाल लिया है. अगली व्यवस्था होने तक यही परिषद देश की कमान संभालेगी. सुप्रीम लीडर के प्रमुख दावेदारों की चर्चा का यह मतलब कतई नहीं है कि सुप्रीम लीडर इन्हीं में से कोई चुना जाए. हो सकता है कि कोई नया नाम सामने आ जाए. वैसे भी यह फैसला अंतिम रूप से संस्थागत वोटिंग और शक्ति-संतुलन पर निर्भर करेगा.

ऐसे में एक बात तय है कि दावेदार जीतने भी होंगे, सब अपने-अपने तरीके से प्रयास करेंगे. किसकी किस्मत का ताल खुलेगा, यह भविष्य में ही पता चलेगा. ईरान में यह ऐसा पद है, जिस पर एक बार बैठने के बाद आदमी आजीवन रहेगा.

नया सुप्रीम लीडर कैसे चुना जाता है?

ईरान में सुप्रीम लीडर को असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स चुनती है. यह 88 सदस्यों वाली धार्मिक संस्था है. इसके सदस्य का चुनाव जनता करती है और हर आठ साल में चुनावी प्रक्रिया संचालित होती है. चुनाव से पहले एक बड़ी छानबीन होती है. असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के उम्मीदवारों को गार्डियन काउंसिल मंजूरी देती है.

यही परिषद तय करती है कि कौन चुनाव लड़ सकता है और कौन नहीं. संविधान में दर्ज है कि जब सुप्रीम लीडर का पद खाली होगा तो असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स बैठक करती है. फिर वोटिंग करके नया सुप्रीम लीडर चुना जाता है. वर्तमान हालात में भी यही प्रॉसेस अपनाया जाएगा. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक साधारण बहुमत से सर्वोच्च लीडर चुन लिया जाता है. संविधान के मुताबिक उम्मीदवार में कुछ गुण होना जरूरी है. उसे शिया इस्लाम के कानून और धार्मिक ज्ञान में बड़ा विद्वान होना चाहिए. उसमें राजनीतिक समझ होनी चाहिए. उसमें साहस और प्रशासनिक क्षमता भी होनी चाहिए.

कनाडा के PM कार्नी का पहला भारत दौरा, दिल्ली में की पीएम मोदी से मुलाकात…

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को दिल्ली में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क जे कार्नी से मुलाकात की. दोनों नेता हैदराबाद हाउस में मिले और जल्द ही डेलीगेशन-लेवल की बातचीत करने वाले हैं.

इससे पहले 2 मार्च को ही विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी से मुलाकात की. ये देश के उनके आधिकारिक दौरे का हिस्सा था. दोनों देशों के बीच आगे की पार्टनरशिप बनाने के उनके कमिटमेंट की तारीफ की. कनाडा के PM बाद में हैदराबाद हाउस में PM मोदी से मिले.

सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि वह नेशनल कैपिटल के अपने दौरे के दौरान प्राइम मिनिस्टर कार्नी से मिलकर काफी खुश हैं. EAM की पोस्ट में लिखा था कि आज सुबह नई दिल्ली में कनाडा के प्राइम मिनिस्टर मार्क जे कार्नी से मिलकर खुशी हुई. आगे की पार्टनरशिप बनाने के उनके कमिटमेंट की तारीफ करता हूं. कनाडा के प्राइम मिनिस्टर मुंबई के एक अच्छे दौरे के बाद रविवार शाम को नेशनल कैपिटल पहुंचे.

27 फरवरी को आए थे भारत

कार्नी का ये उनके इंडिया के ऑफिशियल दौरे का अगला फेज था. यूनियन मिनिस्टर ऑफ स्टेट फॉर कॉमर्स एंड इंडस्ट्री और इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, जितिन प्रसाद ने एयरपोर्ट पर मेहमान लीडर का स्वागत किया. रविवार शाम को, जयशंकर ने अपनी कैनेडियन काउंटरपार्ट, अनीता आनंद से भी मुलाकात की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इनविटेशन पर, कार्नी 27 फरवरी से 2 मार्च तक इंडिया के ऑफिशियल दौरे पर हैं. यह प्राइम मिनिस्टर कार्नी का देश का पहला ऑफिशियल दौरा है. वो 27 फरवरी को ही मुंबई आ गए थे.

जून 2025 में कनानास्किस और नवंबर 2025 में जोहान्सबर्ग में G7 और G20 समिट के दौरान हुई अपनी पिछली मीटिंग्स को आगे बढ़ाते हुए, दोनों देशों के लीडर्स ट्रेड और इन्वेस्टमेंट, एनर्जी, जरूरी मिनरल्स, एग्रीकल्चर, एजुकेशन, रिसर्च और इनोवेशन और लोगों के बीच संबंधों जैसे खास पिलर में चल रहे कोऑपरेशन का भी जायजा लेंगे.

विदेश मंत्रालय के एक बयान के मुताबिक, वे रीजनल और ग्लोबल डेवलपमेंट्स पर भी अपने विचार शेयर करेंगे. अपनी फॉर्मल बातचीत के अलावा, पीएम मोदी और पीएम कार्नी इंडिया-कनाडा CEOs फोरम में भी शामिल होंगे. यह दौरा इंडिया-कनाडा बाइलेटरल रिलेशन्स के नॉर्मल होने के एक अहम मोड़ पर हो रहा है, जिसमें सोमवार को होने वाली चर्चा दोनों देशों के बीच आपसी फायदे के मुख्य स्ट्रेटेजिक और इकोनॉमिक मुद्दों पर फोकस होगी.

देश में बजा हरियाणा का डंका! टैक्स वसूली में छोड़ा सबको पीछे, बना डाला बड़ा रिकॉर्ड…

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हरियाणा के एक्साइज और टैक्सेशन कमिश्नर विनय प्रताप सिंह के अनुसार केंद्रीय फाइनेंस मिनिस्ट्री के जारी लेटेस्ट डेटा के मुताबिक, राज्य का ग्रॉस SGST कलेक्शन 2025-26 में पिछले फाइनेंशियल ईयर के मुकाबले रिकॉर्ड 22 परसेंट की दर से बढ़ रहा है.

उन्होंने कहा कि मौजूदा फाइनेंशियल ईयर के लिए हरियाणा का ग्रॉस SGST कलेक्शन (सेटलमेंट के बाद) 44,460 करोड़ रुपए तक पहुंच गया है, जो पिछले फाइनेंशियल ईयर में फरवरी तक के कलेक्शन से 7,918 करोड़ रुपए ज़्यादा है, इस तरह 22 परसेंट की ग्रोथ रेट दर्ज की गई है. उन्होंने कहा कि यह देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे ज़्यादा है.

देश में सबसे ज्यादा ग्रोथ

एक ऑफिशियल बयान के मुताबिक, उन्होंने आगे कहा कि फाइनेंस मिनिस्ट्री के जारी डेटा के मुताबिक, मौजूदा फाइनेंशियल ईयर में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का ग्रॉस SGST कलेक्शन नेशनल एवरेज 6 परसेंट की दर से बढ़ा है. फरवरी महीने में, हरियाणा का ग्रॉस SGST ग्रोथ रेट पिछले फाइनेंशियल ईयर के फरवरी महीने के मुकाबले 23 परसेंट ग्रोथ के साथ ज़्यादा बना हुआ है. सितंबर 2025 में GST काउंसिल द्वारा GST रेट रैशनलाइजेशन किए जाने के बाद के महीनों में भी, हरियाणा SGST कलेक्शन में लगातार ग्रोथ दिखा रहा है, जो न केवल कुशल टैक्स एडमिनिस्ट्रेशन बल्कि राज्य की इकोनॉमी की अच्छी हालत को भी दिखाता है.

हरियाणा के सभी जिलों में GST सुविधा केंद्र खोले गए

हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने सितंबर 2025 में हुई GST काउंसिल मीटिंग में GST रेट रैशनलाइजेशन रिफॉर्म्स का स्वागत और समर्थन किया था और प्रधानमंत्री और केंद्रीय वित्त मंत्री को धन्यवाद दिया था. एक्साइज एंड टैक्सेशन कमिश्नर ने कहा कि हरियाणा में कुल 6,22,478 GST टैक्सपेयर्स हैं, और GST कानून के तहत रजिस्ट्रेशन की सुविधा के लिए हरियाणा के सभी जिलों में GST सुविधा केंद्र खोले गए हैं. उन्होंने कहा कि राज्य में टैक्स कम्प्लायंस में सुधार के कारण GST में अच्छी ग्रोथ हो रही है, जिसका मुख्य कारण पिछले कुछ सालों में GST सिस्टम में किए गए कई सुधार और हरियाणा के एक्साइज एंड टैक्सेशन डिपार्टमेंट के अधिकारियों द्वारा अपनाए गए बेहतर टैक्स एनालिसिस सिस्टम हैं.

लखनऊ में बड़ा इमामबाड़ा बंद, मेन गेट पर लगाए गए अयातुल्ला खामेनेई के पोस्टर और काले झंडे…

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ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई की मौत की खबर के बाद यूपी की राजधानी लखनऊ में शोक की लहर फैल गई. शनिवार को शहर के प्रमुख धार्मिक नेता मौलाना कल्बे जवाद ने तीन दिन के शोक का ऐलान करते हुए सभी इमामबारगाहों, घरों और धार्मिक स्थलों पर काले परचम लगाने की अपील की थी.

इस दौरान शहर में विभिन्न शोक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए थे. वहीं, आज मौलाना कल्बे जवाद की अपील का असर देखने को मिला.

ईरान में अयातुल्ला खामेनेई की मौत के बाद जहां देश के अलग-अलग शहरों में शिया समुदाय के लोग मातम बना रहे हैं. शोक सभाएं आयोजित कर रहे हैं, वहीं आज पुराने लखनऊ में शोक का माहौल देखने को मिला. यहां आज बड़ा-छोटा इमामबाड़ा, भूल भुलैया पूरी तरह से बंद हैं. इसके अलावा, पुराने लखनऊ के बाजार भी पूरी तरह से बंद हैं. धार्मिक भावनाओं और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ये निर्णय लिया गया है. वहीं 3 मार्च के बाद पर्यटकों के लिए इमामबाड़े खुलेंगे.

शोक में डूबा शिया समुदाय

लखनऊ में शिया समुदाय के लोगों ने बड़े इमामबाड़े से छोटे इमामबाड़े तक दुकानों को बंद कर रखा है. इसके असावा शिया समुदाय ने तीन दिन तक शोक का ऐलान किया है. बड़ा इमामबाड़ा और छोटा इमामबाड़ा पर्यटकों के लिए भी बंद रहेगा. प्रशासन ने यह एहतियातन फैसला लिया है. इसके अलावा खामेनेई के बड़े-बड़े पोस्टर इमारतों पर लगाए गए. शिया समुदाय के लोग अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत का विरोध कर रहे हैं.

मौलाना कल्बे जवाद की अपील

मौलाना कल्बे जवाद की अपील की अनुसार, लखनऊ के ऐतिहासिक छोटे इमामबाड़े में शाम को विशेष शोकसभा का आयोजन होगा. शोकसभा में धार्मिक विद्वान, सामाजिक कार्यकर्ता और बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होंगे. इस दौरान कुरआनखानी, दुआ और श्रद्धांजलि सभा आयोजित की जाएगी, जिसमें आयतुल्ला खामेनेई के योगदान को याद किया जाएगा. इसके अलावा कैंडल मार्च भी निकाला जाएगा.

Holika Dahan 2026: सावधान, अशुभ मुहूर्त में होलिका दहन बन सकता है संकट की वजह!

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हिंदू धर्म में किसी भी पूजा या अनुष्ठान के लिए मुहूर्त का विशेष महत्व होता है. होली के पर्व पर होलिका दहन केवल लकड़ियों को जलाने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह नकारात्मकता को समाप्त करने वाली एक विशेष पूजा है.

साल 2026 में होलिका दहन 2 मार्च को किया जाएगा. शास्त्रों के अनुसार, यदि कोई भी धार्मिक कार्य उसके निर्धारित समय पर न किया जाए, तो उससे मिलने वाले फलों में कमी आने की आशंका बनी रहती है. यदि बिना सही गणना के गलत समय पर अग्नि जलाई जाए, तो इसका असर परिवार की सुख-शांति और वातावरण पर पड़ सकता है. इस लेख में हम जानेंगे कि गलत मुहूर्त में होलिका दहन करने से किस प्रकार की परेशानियां आ सकती हैं.

आध्यात्मिक और मानसिक शांति पर पड़ने वाला नकारात्मक प्रभाव

शास्त्रों के अनुसार, होलिका दहन के लिए प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के बाद का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है. यदि अग्नि को गलत नक्षत्र या अशुभ समय में जलाया जाता है, तो घर के सदस्यों के बीच कलह और मानसिक अशांति का कारण बन सकता है. मान्यता है कि अग्नि देव की पूजा यदि अनुचित काल में हो, तो इससे घर की सकारात्मक ऊर्जा प्रभावित होती है. ऐसे समय में लोगों के मन में अनावश्यक डर और भ्रम पैदा हो सकता है, जिससे उनकी सहजता कम हो जाती है. यह समय आत्म-शुद्धि का होता है, परंतु गलत मुहूर्त के कारण व्यक्ति को वह आध्यात्मिक लाभ नहीं मिल पाता जिसकी वह कामना करता है. इसलिए हमारे बुजुर्ग हमेशा शुभ मुहूर्त में ही करने की सलाह देते थे.

सामाजिक और आर्थिक जीवन में आने वाली संभावित बाधाएं

ज्योतिष शास्त्र में भद्रा काल को बहुत महत्वपूर्ण माना गया है. यदि भद्रा के समय होलिका दहन किया जाता है, तो ऐसी मान्यता है कि इससे समाज और राष्ट्र में विघ्न आने की आशंका रहती है. व्यक्ति के निजी जीवन की बात करें तो गलत मुहूर्त में किए गए इस अनुष्ठान से आर्थिक कार्यों में रुकावटें आ सकती हैं. नए व्यवसाय के संचालन में बाधाएं आ सकती हैं या बनते हुए काम बिगड़ सकते हैं. यदि नियमों की अनदेखी की जाए, तो धन की हानि और परिवार के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ने की आशंका बढ़ जाती है. सही समय पर किया गया पूजन ही मां लक्ष्मी की कृपा दिलाने और जीवन में समृद्धि लाने की संभावना को बढ़ाता है.

ग्रहों की उग्रता और भविष्य की सुरक्षा के सूत्र

होलिका दहन के समय ग्रहों की स्थिति बहुत संवेदनशील होती है. यदि गलत समय पर पूजा की जाए तो ग्रहों की उग्रता के कारण लिए गए फैसले भविष्य में गलत साबित होने की आशंका रहती है. ज्योतिषियों का मानना है कि शुभ मुहूर्त एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, जो हमें ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव से बचाता है. गलत मुहूर्त में अग्नि का स्पर्श करने से पिता की संपत्ति से जुड़े विवाद या पारिवारिक संबंधों में तनाव को बढ़ा सकता है. अपनी सुरक्षा और बेहतरी के लिए हमेशा पंचांग के अनुसार ही कार्य करना चाहिए. होलिका दहन के समय ईश्वर का ध्यान करना एक बढ़िया विकल्प है, जो आने वाले समय को सुखद बनाने में मदद करता है.

बिहार में बड़ा बदलाव, राज्य के सभी प्राइवेट एजुकेशन इंस्टीट्यूट की फीस अब प्रदेश सरकार तय करेगी…

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बिहार के एजुकेशन सिस्टम में बड़ा बदलाव होने जा रहा है. इसका सीधा फायदा बिहार के स्टूडेंट्स और उनके अभिभावकों को होने जा रहा है. असल में अब बिहार में संचालित प्राइवेट एजुकेशन इंस्टीट्यूट मनमानी फीस नहीं वसूल सकेंगे.

इसको लेकर बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने तैयारियां कर ली हैं, जिसके तहत बिहार सरकार ने बीते दिनों विधानसभा में बिहार निजी व्यावसायिक शैक्षणिक संस्थान (नामांकन विनियमन एवं शुल्क निर्धारण) बिल 2026 पारित किया है. इस बिल के कानून बन जाने के बाद राज्य में संचालित सभी प्राइवेट एजुकेशन इंस्टीट्यूट में फीस प्रदेश सरकार तय करेगी.

आइए जानते हैं कि पूरा मामला क्या है? जानेंगे कि बिहार सरकार की तरफ से विधानसभा में पारित बिहार निजी व्यावसायिक शैक्षणिक संस्थान (नामांकन विनियमन एवं शुल्क निर्धारण) बिल 2026 क्या है और ये कैसे काम करेगा?

फीस तय करने के लिए बनेगी कमेटी

बिहार सरकार राज्य में संचालित सभी प्राइवेट एजुकेशन इंस्टीट्यूट की फीस तय करेगी. इस संबंध में राज्य सरकार की तरफ से विधानसभा में बिहार निजी व्यावसायिक शैक्षणिक संस्थान (नामांकन विनियमन एवं शुल्क निर्धारण) बिल 2026 पारित किया गया है.

इस बिल में प्रावधान किया गया है कि राज्य के सभी प्राइवेट एजुकेशन इंंस्टीट्यूट की फीस तय करने की जिम्मेदारी एक उच्च स्तरीय कमेटी की होगी. इस कमेटी का गठन बिहार सरकार की तरफ से किया जाएगा, जिसका अध्यक्ष प्रख्यात शिक्षाविद् या सेवानिवृत पदाधिकारी (प्रधान सचिव से जूनियर नहीं होना चाहिए) को बनाया जाएगा. ये कमेटी प्राइवेट एजुकेशन इंस्टीट्यूट की एडमिशन से लेकर परीक्षा तक की फीस तय करेगी.

अधिक फीस वसूली तो कार्रवाई

बिहार सरकार राज्य में प्राइवेट एजुकेशन इंस्टीट्यूट की तरफ से वसूली जा रही मनमाफिक फीस पर रोकथाम के लिए बिहार निजी व्यावसायिक शैक्षणिक संस्थान (नामांकन विनियमन एवं शुल्क निर्धारण) बिल 2026 लेकर आई है, जिसे विधानसभा में पारित कर दिया गया है, जो अब राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद कानून बन जाएगा.

इस बिल में जहां फीस तय करने की जिम्मेदारी एक उच्च स्तरीय कमेटी को दी गई है. वहीं दूसरी तरफ अधिक फीस वसूले जाने पर कार्रवाई का प्रावधान भी किया गया है. मसलन, अगर कोई एजुकेशन इंस्टीट्यूट अधिक फीस लेता है तो उसे अधिक वसूली गई फीस वापिस करनी हाेगी, तो उस पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

मिडिल ईस्ट में इतना है मेड-इन-इंडिया कारों का एक्सपोर्ट, युद्ध से इतना होगा असर…

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अमेरिका-ईरान युद्ध के बाद मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के कारण भारत के ऑटोमोबाइल निर्यात पर असर की चिंता जताई जा रही है. इस बीच देश की सबसे बड़ी कार कंपनी मारुति सुजुकी इंडिया ने कहा है कि उसके कुल निर्यात का केवल करीब 12.5% हिस्सा ही मध्य पूर्व (मिडिल-ईस्ट) से जुड़ा है.

इससे कंपनी पर सीधा असर सीमित माना जा रहा है.

मारुति सुजुकी की मासिक सेल्स कॉल के दौरान कॉरपोरेट अफेयर्स के सीनियर एग्जीक्यूटिव ऑफिसर राहुल भारती ने कहा कि इस साल कंपनी के कुल निर्यात में मध्य पूर्व की हिस्सेदारी लगभग 12.5% है. उन्होंने कहा, हम स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं, लेकिन निर्यात के क्षेत्र के रूप में मध्य पूर्व में हमारी हिस्सेदारी बहुत ज्यादा नहीं है. इस साल यह करीब 12.5% है.

अलग-अलग देशों में निर्यात

मारुति सुजुकी करीब 100 देशों में कारें निर्यात करती है. इससे उसका निर्यात लैटिन अमेरिका, अफ्रीका, एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व जैसे अलग-अलग क्षेत्रों में फैला हुआ है. राहुल भारती ने कहा कि इतने ज्यादा देशों में निर्यात होने से कंपनी का पोर्टफोलियो संतुलित है और जोखिम कम है. कंपनी सिर्फ निर्यात बढ़ा ही नहीं रही, बल्कि अलग-अलग बाजारों में विस्तार भी कर रही है, जिससे जोखिम कम बना रहे.

निर्यात में मजबूत बढ़त

अप्रैल से फरवरी FY26 के दौरान कंपनी का निर्यात साल-दर-साल 33.75% बढ़कर 4,00,734 यूनिट हो गया, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 2,99,617 यूनिट था. अगर 12.5% हिस्सेदारी के हिसाब से देखें, तो इस अवधि में करीब 50,000 गाड़ियां मध्य पूर्व भेजी गईं. राहुल भारती ने बताया कि कंपनी ने FY26 के लिए 4 लाख यूनिट निर्यात का सालाना लक्ष्य पहले 11 महीनों में ही पूरा कर लिया है और मार्च का निर्यात अतिरिक्त होगा. मारुति सुजुकी की पहली इलेक्ट्रिक कार e Vitara का निर्यात 21,000 यूनिट से ज्यादा हो चुका है. यह कार अब 39 देशों में निर्यात की जा रही है. इसके प्रमुख बाजार यूके, नॉर्वे, डेनमार्क, जर्मनी और स्विट्जरलैंड हैं.

उद्योग की स्थिति

मध्य पूर्व भारतीय यात्री वाहन निर्यातकों के लिए एक बड़ा बाजार रहा है, खासकर छोटी और मध्यम आकार की कारों के लिए, लेकिन लंबे समय तक चलने वाला भू-राजनीतिक तनाव शिपिंग रूट, माल भाड़ा, बीमा खर्च, तेल की कीमत और ग्राहकों की मांग पर असर डाल सकता है. उद्योग के जानकारों के मुताबिक, हुंडई मोटर इंडिया और निसान मोटर इंडिया जैसी अन्य बड़ी कंपनियों के निर्यात में भी मध्य पूर्व की हिस्सेदारी आमतौर पर कम दो अंकों (लगभग 10-15%) में रहती है. हुंडई भारत से 80 से ज्यादा देशों में कारें निर्यात करती है, जबकि निसान करीब 65 देशों में वाहन भेजती है.

ईरान युद्ध से बंद हुआ समंदर का रास्ता, अडानी को हो सकता है बड़ा नुकसान, गैस-पेट्रोल होंगे महंगे!

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अमेरिका और इजराइलकी संयुक्त सैन्य कार्रवाई के बाद ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिया है. इसके साथ ही लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित बाब अल-मंडेब (Bab el-Mandab) में भी व्यापारिक आवाजाही पूरी तरह से ठप होने की खबरें हैं.

ये दोनों रास्ते दुनिया के तेल और कार्गो व्यापार की लाइफलाइन माने जाते हैं. इनके बंद होने से न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय बाजार में खलबली मची है, बल्कि भारत के आयात-निर्यात तंत्र पर भी एक गहरा संकट मंडरा रहा है. जेएम फाइनेंशियल (JM Financial) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, इस बिगड़ते हालात का सबसे बुरा असर अडानी पोर्ट्स, जेएसडब्ल्यू इंफ्रास्ट्रक्चर और जीएमआर एयरपोर्ट्स जैसी दिग्गज भारतीय कंपनियों पर देखने को मिल सकता है.

समुद्री रास्तों पर नाकेबंदी, बढ़ रही है मालभाड़े की टेंशन

फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ने वाला होर्मुज और लाल सागर का बाब अल-मंडेब, दोनों ही एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के व्यापार के लिए बेहद अहम हैं. भारत का एक बड़ा व्यापारिक हिस्सा इन्हीं समुद्री रास्तों से होकर गुजरता है. रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025 तक भारत के कुल आयात-निर्यात (EXIM) का करीब 31 प्रतिशत हिस्सा मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका (MENA) से जुड़ा हुआ था.

अब इन रास्तों के बंद होने से व्यापारिक जहाजों को अफ्रीका के ‘केप ऑफ गुड होप’ से होकर लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा है. इस लंबी दूरी का सीधा मतलब है ज्यादा ईंधन की खपत, बीमा के बढ़ते प्रीमियम और सामान पहुंचने में भारी देरी. जाहिर है, जब माल ढुलाई का खर्च बढ़ेगा और जहाजों के फेरे कम होंगे, तो इसका असर बाजार में मिलने वाले हर छोटे-बड़े सामान की कीमत पर भी पड़ेगा. इससे भारतीय निर्यातकों की वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा भी कमजोर हो सकती है.

अडानी से लेकर JSW तक इन दिग्गजों की अटकी सांसें

इस भू-राजनीतिक संकट ने भारतीय लॉजिस्टिक और पोर्ट सेक्टर के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं. अगर जेएसडब्ल्यू इंफ्रास्ट्रक्चर (JSW Infra) की बात करें, तो संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के फुजैरा में उनका एक महत्वपूर्ण लिक्विड स्टोरेज टर्मिनल है. पिछले वित्तीय वर्ष में कंपनी के कुल मुनाफे (Ebitda) में इस टर्मिनल की करीब 13 प्रतिशत हिस्सेदारी थी. वहां काम प्रभावित होने से कंपनी की कमाई में सेंध लग सकती है. इसके अलावा, ओमान में कंपनी के प्रस्तावित विस्तार पर भी इस अस्थिरता के कारण ग्रहण लग सकता है.

वहीं, देश के सबसे बड़े प्राइवेट पोर्ट ऑपरेटर ‘अडानी पोर्ट्स’ (APSEZ) के लिए भी यह समय काफी चुनौतीपूर्ण है. भारत के कुल कार्गो में 27 प्रतिशत की बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले अडानी समूह को फारस की खाड़ी से आने वाले तेल, एलएनजी (LNG) और कंटेनरों की कमी का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि, इजराइलके हाइफा पोर्ट से उनका मुनाफा (1.5 प्रतिशत) अपेक्षाकृत कम है और तंजानिया व ऑस्ट्रेलिया जैसी जगहों पर उनके निवेश सुरक्षित हैं, लेकिन पूरे खाड़ी क्षेत्र में मची इस उथल-पुथल से समुद्री परिवहन के कारोबार पर नकारात्मक असर पड़ना तय है. इसके अलावा, गुजरात पीपावाव पोर्ट पर भी लाल सागर के रास्ते होने वाले व्यापार में रुकावट के चलते दबाव बढ़ सकता है और मालभाड़े में अस्थिरता आ सकती है.

आम आदमी की जेब पर पड़ेगा बोझ

यह संकट सिर्फ समुद्री बंदरगाहों तक सीमित नहीं रहने वाला. जीएमआर एयरपोर्ट्स (GMR Airports) के लिए भी यह एक चिंताजनक स्थिति है. मध्य पूर्व के लिए उड़ानों में कमी आने से दिल्ली जैसे बड़े हवाई अड्डों पर अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की संख्या घट सकती है. ट्रांजिट यात्रियों की कमी से एयरपोर्ट की उन गैर-विमानन कमाई (दुकानें, लाउंज आदि) पर सीधा असर पड़ेगा, जहां से उन्हें सबसे ज्यादा मुनाफा होता है.

आम आदमी के लिए सबसे बड़ी चिंता रसोई गैस यानी एलपीजी (LPG) को लेकर है. भारत अपनी कुल खपत का करीब 65 फीसदी एलपीजी आयात करता है, जिसमें से 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा मध्य पूर्व से आता है. एजिस लॉजिस्टिक्स (Aegis Logistics) जैसी गैस हैंडलिंग कंपनियों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा. सऊदी अरब ने पहले ही प्रोपेन गैस के दाम 50 डॉलर प्रति टन तक बढ़ा दिए हैं. अगर यह युद्ध लंबा खिंचा, तो जहाजों की कमी और महंगे किराए के कारण गैस की कीमतें आसमान छू सकती हैं.