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मुस्लिम धर्म में महिलाएं क्यों पहनती है बुर्का, जानिए असली वजह..!

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हर धर्म के लोगों को अपना अलग ही पहनावा होता है और उनका उसके हिसाब से ही रहन सहन होता है ।लेकिन आज हम आपको मुस्लिम धर्म की महिलाओं के बारे में बताने जा रहे हैं क्या आप जानते हैं ​कि आखिर मुस्लिम धर्म में महिलाएं बुर्का क्यों पहनती है । तो चलिए आज हम आपको इसके बारे में बता दें । वैसे कई व्यक्ति नहीं जानते कि इस्लाम में मुस्लिम महिलाओं को बुर्का पहनना क्यों पड़ता है ।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि, इस्लाम धर्म का सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रन्थ कुरान है। इस्लाम धर्म के समस्त रीती-रिवाज इसी पाक किताब पर आधारित है । इसी कुरान में बताया गया है की, मुस्लिम महिलाओं को कैसे कपड़े पहनने चाहिए ? कुरान के अनुसार मुस्लिम महिलाओं को ऐसे कपड़े पहनने चाहिए जिसमें उनकी आंखें, चेहरा, उनके हाथ-पैर किसी अनजान आदमी को ना दिख सके और यहीं कारण है कि मुस्लिम महिलाओं को बुर्का पहनना पडता है ।

रात को अच्छी नींद लेने में भारतीय सबसे आगे, जानिए चीन और जापान का नंबर

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हाल ही में, एक सर्वे किया गया जिसमें बताया गया है कि रात को अच्छी नींद लेने में भारतीय लोग सबसे आगे है जिसके बाद सउदी अरब का नंबर आता है और उसके बाद चीन का । बताया जा रहा है कि ये सर्वे करीब 11066 लोगों पर किया गया । दुनिया भर के करीब 62 प्रतिशत लोगों ने इस बात को स्वीकार किया कि रात को वो जब सोने के लिए जाते हैं तो उनको अच्छी नींद नहीं आती है ।

अनिद्रा की आदत को लेकर सबसे बुरी हालत दक्षिण कोरिया की और उसके बाद जापान की, विश्व के वयस्क हफ्ते में रात के दौरान औसतन 6.8 घंटे की नींद लेते हैं । वहीं वे छुट्टी के दिन रात को 7.8 घंटे की नींद लेते हैं। इस सर्वे में पता चला है कि प्रत्येक दिन आठ घंटे की नींद पूरी करने के लिए 10 में से छह वयस्क सप्ताहांत में अधिक सोते हैं ।

हलांकि, 26 प्रतिशत लोगों ने माना है कि, उनकी नींद अच्छी हुई है, जबकि 31 प्रतिशत ने कहा है कि उनकी नींद लेने की आदतों में कोई बदलाव नहीं आया है ।

आधार कार्ड अधिकारियों का कारनामा, पिता-बेटी की उम्र बताई समान

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आधार कार्ड अधिकारियों ने अजीब कारनामा किया है. आधार कार्ड में पिता और बेटी की उम्र समान बता दी है. 11 साल की बच्ची की उम्र उसके पिता की उम्र के समान दर्ज कर दी है. बच्ची के आधार कार्ड पर उसकी उम्र 36 साल दर्ज हुई है, इससे बच्ची का बैंक अकाउंट भी नहीं खुल पा रहा है.

आधार कार्ड में गड़बड़ी से बच्ची का बैंक अकाउंट नहीं खुल पा रहा है, इससे सरकारी योजनाओं से मिलने वाली मदद भी उसे नहीं मिल पा रही है. ये कोई पहली घटना नहीं है इससे पहले भी आधार कार्ड और वोटर कार्ड बनाने वाले अधिकारियों की लापरवाही सामने आई थी.

इस बार ये घटना पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्दवान जिले के गलसी इलाके की यह घटना है. यहां रहने वाले चंदन रुईदास की जन्म तिथि 1 जनवरी 1983 है. जबकि जब उन्होंने अपनी बेटी का आधार कार्ड बनवाया तो उसकी भी जन्म तिथि 1 जनवरी 1983 ही लिख दी गई. चंदन रुईदास ने बताया कि उनकी बेटी का जन्म 12 दिसंबर 2008 को हुआ था, लेकिन आधार कार्ड अधिकारियों की गड़बड़ी की वजह से उनकी बेटी की जन्म की तारीख उनके पिता की जन्मतिथि के बराबर कर दी गई.

चंदन ने बताया कि वे अपनी बेटी के लिए बैंक खाता खोलना चाहते हैं, और इसके लिए वे लगातार बैंक और आधार कार्ड दफ्तर के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन कोई भी उनकी मदद नहीं कर रहा है. इस वजह से उन्हें खासा परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. स्कूल से मिलने वाली सुविधाओं और लड़की के लिए सरकारी मदद भी नहीं मिल पा रही है. इस तरह से पिता और पुत्री की जन्मतिथि और साल एक ही करने की यह घटना पूरे इलाके में चर्चा का केंद्र बनी हुई है.

कैबिनेट फैसला /6,268 करोड़ रुपए की चीनी निर्यात सब्सिडी को मंजूरी

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 सरकार ने बुधवार को चीनी निर्यात के लिए 6278 करोड़ तक की सब्सिडी देने का देने की बात को मंजूरी दे दी है और इसके तहत मार्केटिंग वर्ष 2019 में करीब 60 लाख टन टन चीनी के निर्यात का भी लक्ष्य रखा गया है.

वहीं इसके अलावा आपको बता दें कि मार्केटिंग वर्ष 2019 20 अक्टूबर में शुरू किया जाएगा वहीं निर्यात पर सब्सिडी देने का मकसद सर्कस घरेलू स्टॉक खफा ना और किसानों की भारी-भरकम गन्ना बकाए का भुगतान करने में चीनी मिलों की मदद करना बताया जा रहा है.

इसके अलावा आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में चीनी निर्यात के लिए सब्सिडी देने का फैसला किया है इसके अलावा कैबिनेट बैठक के बाद इस बात की सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावेडकर ने यह बताया है कि किसानों के हित में एक अहम फैसला इस सरकार के तहत लिया गया.

इसके अलावा कैबिनेट ने 2019 में करीब करीब 7000000 टन चीनी के निर्यात के लिए सब्सिडी की मंजूरी दे दी गई है. वहीं चीनी मिलों के लिए प्रति यूनिट एक मुफ्त करीब ₹10000 तक की सब्सिडी भी दिए जाने की बात बताई जा रही है.

मीडिया में आ रही खबरों के अनुसार बताया जा रहा है कि सरकार के इस ऐलान से उत्तर प्रदेश महाराष्ट्र और कर्नाटक का के लाखों किसानों को लाभ मिल सकता है. वही आपको बता दें कि देश भर में भारी वित्तीय संकट और बेरोजगारी व्याप्त है और ऐसे में अब सरकार के लिए बहुत जरूरी है कि वह कृषि की और अपना पूरा ध्यान दें.

रेप से बचने के लिए यहां की लड़कियों को बचपन से ही झेलना पड़ता हैं इस प्रथा दर्द!

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आजकल हम लोग आए दिन दुष्कर्म की वारदातों के बारे में सुनते रहते हैं और इसके कारण कई लडकियां कुप्रथाओं की भेट चढ जाती है । आज हम फिर एक बार आपने के लिए कुछ ऐसी ही अजीबों गरीब खबर लेकर आए हैं । बताया जा रहा है कि अफ्रीका में लडकियों को दुष्कर्म से बचाने के लिए यहां के लोग कुछ ऐसा करते हैं जिसके बारे में सुनकर आपकी भी रूह कांप जाएंगी ।

दरअसल, अफ्रीका के कई देशों जैसे साउथ अफ्रीका, कैमरून और नाइजीरिया जैसी जगहों पर लड़कियों को रेप से बचने के लिए उन्हें असहनीय पीड़ा और दर्द से गुजरना होता है । इस अनोखी प्रथा का नाम है ‘ब्रेस्ट आयरनिंग’, इस प्रथा में, किशोरावस्था के शुरू होते ही लड़कियों के ब्रेस्ट को गर्म लकड़ी के टुकड़ों से दागा जाता है, ताकि वे बढ़ न सकें और लडकियां खूबसूरत नहीं दिख सके । ब्रेस्ट आयरनिंग’ प्रथा में किशोरावस्था में ही लड़कियों के स्तन विकसित होने की प्रक्रिया को रोक दिया जाता है । 10 साल से कम उम्र की कई लड़कियां भी हर रोज़ इस प्रथा का शिकार होती हैं । आपको जानकर बेहद हैरानी होगी ये काम उस लडकी की मां खूद करती है ।

प्लास्टिक की बोतलों की जगह बाजार में आ गई बांस की बोतलें, जानिए फायदे और कीमत!

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आज के समय में यदि हमारे सामने कोई सबसे बडी समस्या है तो वो हैं पर्यावरण प्रदूषण की समस्या जिसके कारण कई लोगों की मौत भी हो चुकी है और इस प्रदूषण को बढाने में प्लास्टिक अपना सबसे बडा रोल अदा करता है । लेकिन आज हम आपको एक ऐसी पानी की बोतल के बारे में बताएंगे जो कि प्लास्टिक की बनी ही नहीं है और इससे पर्यावरण को भी कोई खतरा नहीं होता है ।

असम के एक उद्यमी इन दिनों अपने नए आ‌विष्कार को लेकर इंटरनेट में छा गए हैं जिन्होंने बांस की बोतलों का आविष्कार किया है । गुवाहाटी के बिश्वनाथ चाराली में रहने वाले धृतिमान बोरा ने इन बांस की बोतलों का आविष्कार किया है । धृतिमान के अनुसार, उन्हें बांस की कटाई, सुखाने पॉलिशिंग जैसे अन्य प्रोसेस को मिलाकर 1 बोतल बनाने में कम से कम 4 से 5 घंटे का समय लगता है ।धृतिमान का कहना है कि इन्हें बनाने में उन्हें लगभग 17 साल लगे हैं । बांस की ये ऑर्गेनिक बोतलें एकदम वॉटर प्रूफ हैं ।

आपको बता दें कि, ये बोतलें टिकाऊ बांस – भालुका के साथ बनाई गई हैं । इन बोतलों की बाहरी परत को वाटरप्रूफ ऑयल से पॉलिश किया गया है । यहां तक की बोतल का ढक्कन भी बांस से तैयार किया गया है । बांस से बनी ये बोतलें पूरी तरह जैविक हैं । आपको यह बोतलें आसानी से ऑनलाइन मिल जाएगी । इन बोतलों की कीमत करीब 400 से 600 रुपए तय की गई है ।

कश्मीर जाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया इस युवक ने

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4 अगस्त की रात को मो. अलीम सैयद अपने भाई से मोबाइल पर बात कर रहे थे. बात उनके भाइयों की शादी से जुड़ी तैयारियों के बारे में हो रही थी.

17 अगस्त को उनके चचेरे भाई की शादी थी. उन्होंने जून के महीने में ही 14 अगस्त का हवाई टिकट बुक कराई थी ताकि वे अपने भाई की शादी में घर जा सके.

बात हो ही रही थी कि अचानक रात के 11 बजकर 59 मिनट पर कॉल कट जाता है और उसके बाद उनकी बात उनसे नहीं हो पाती है.

सुबह पता चला कि कश्मीर में कर्फ्यू लगा दिया गया है और राज्य को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को ख़त्म कर दिया गया है.

मोबाइल-इंटरनेट सहित संचार के सभी साधनों पर रोक लगा दी जाती है. हर दिन अपने घरवालों से बात करने वाले की उनसे पांच दिनों तक बात नहीं हो पाती है. इसी बीच उन्हें हिंसा से जुड़ी कई ख़बरें भी मिलती है.

घरवालों का हाल जानने अलीम कश्मीर जाना चाहते हैं पर पाबंदियों के चलते वो जा नहीं पाते हैं. अंत में वो सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हैं और याचिका दायर कर सुरक्षित घर जाने की मांग करते हैं.

उनकी याचिका पर बुधवार को चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई की और कश्मीर प्रशासन को उन्हें सुरक्षित घर तक पहुंचाने को कहा है.

24 साल के मोहम्मद अलीम सैयद आनंतनाग के रहने वाले हैं. उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से लॉ की पढ़ाई की है.

पढ़ाई के बाद हाल ही में नई नौकरी पाने वाले अलीम ने बीबीसी को बताया कि उन्हें घर जाने की बेचैनी थी लेकिन अनुच्छेद 370 के हटाए जाने के बाद वहां के बिगड़े माहौल को देखते हुए उन्हें डर था कि वो घर पहुंच पाएंगे भी या नहीं.

उन्होंने कहा, “अंतिम बार मैंने अपने घर वालों से 4 अगस्त की रात को बात की थी. उसके बाद से अपने घर पर बात नहीं कर पा रहा हूं.”

“इस बीच ऐसी न्यूज़ आ रही थी कि कश्मीर में हालात खराब हैं. माहौल गंभीर हैं. मेरे परिवार के प्रति जो चिंता थी वो और बढ़ गई. इन्हीं चिंताओं की वजह से मैंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. मैंने हाल ही में लॉ की पढ़ाई पूरी की है, तो मेरे पास यह विकल्प मौजूद था कि मैं सुप्रीम कोर्ट से मदद लूं.”

अलीम की जब आखिरी बार अपनी मां से बात हुई थी तब कश्मीर का माहौल बदल रहा था. उनकी मां को लग रहा था अफ़वाहें फैलाई जा रही हैं. उन्हें यह भी नहीं पता था कि अगले दिन कर्फ़्यू लगा दिया जाएगा और मोबाइल और टेलीफोन लाइनें बंद हो जाएंगी.

वो बताते हैं, “उन्होंने इस परिस्थिति के लिए पहले से कोई तैयारी भी नहीं की थी. राशन की भी व्यवस्था नहीं की गई थी. इन्हीं वजहों से मेरी चिंता और बढ़ गई. अगर कॉल करने की सुविधा होती तो मेरी चिंता ख़त्म हो जाती, पर बात हो ही नहीं पा रही थी. मैं परेशान हो रहा था.”

बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में कश्मीर से जुड़ी 14 याचिकाओं पर सुनवाई हुई, उनमें से एक याचिका अलीम की भी थी.

एक अन्य याचिका सीपीएम नेता सीताराम येचुरी की तरफ से भी दायर की गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें भी कश्मीर के अपने दोस्त से मिलने की इजाजत दी. येचुरी ने अपनी पार्टी के विधायक एमवाई तारिगामी से मिलने की अनुमति मांगी थी.

सरकार कोर्ट में इसका विरोध कर रही थी. इस पर चीफ़ जस्टिस ने कहा कि सरकार उन्हें कश्मीर जाने से नहीं रोक सकती है. वो देश के नागरिक हैं और अपने मित्र से मिलना चाहते हैं. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि वो वहां सिर्फ़ अपने दोस्त से मिलेंगे, इसके अलावा उन्हें किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि के लिए मना किया गया है.

येचुरी गुरुवार को श्रीनगर गए थे, जहां उन्हें एयरपोर्ट से वापस लौटा दिया गया था.

मोहम्मद अलीम सैयद को भी कश्मीर जाने की इजाजत सुप्रीम कोर्ट ने दे दी है. कोर्ट ने उनसे कहा है कि अगर उनको अपने परिवार को लेकर कोई चिंता है तो वो अपने घर चले जाएं.

कोर्ट ने अलीम से दिल्ली वापस लौटने के अपने अनुभवों पर आधारित एक रिपोर्ट भी फाइल करने को कहा है.

अलीम का घर श्रीनगर से 55 किलोमीटर दूर अनंतनाग में है. बिगड़े माहौल के कारण उन्हें यह यक़ीन नहीं था कि वो श्रीनगर से अनंतनाग सुरक्षित घर पहुंच पाएंगे.

उन्होंने कहा, “14 अगस्त को श्रीनगर के लिए अपनी हवाई टिकट बुक कराई थी, जो कैंसिल कर दी गई. एक ईमेल के ज़रिए मुझे यह बताया गया. अगर मैं दोबारा टिकट बुक कर चला भी जाता तो डर था कि घर पहुंच पाऊंगा या नहीं.”

“अनंतनाग में स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. वहां का माहौल काफी तनावपूर्ण रहता है. मुझे इस बात का यक़ीन था कि मैं श्रीनगर तो पहुंच जाऊंगा पर वहां से घर पहुंच पाऊंगा या नहीं, ये यक़ीन नहीं था.”

अलीम ने कहा, “अगर टेलीफोन से बात भी हो जाती तो कम से कम मैं अपने घर वालों को बता देता और वो एयरपोर्ट चले आते, पर मैं बात भी नहीं कर पा रहा हूं.”

“कश्मीर की स्थिति को लेकर असमंजस है. आधे लोग हालात ठीक बता रहे हैं, आधे लोग बुरा बता रहे हैं. आधे लोग माहौल को हिंसक बता रहे हैं और आधे लोग सबकुछ सामान्य बता रहे हैं. इस स्थिति में आप किस पर विश्वास करेंगे.”

मो. अलीम सैयद गुरुवार की सुबह श्रीनगर जा रहे हैं.

इसके बाद वो अपने मां-बाप और दो बड़े भाइयों से मिलेंगे. उनके मां-बाप सरकारी नौकरी में थे और अब रिटायर हो चुके हैं.

अनुच्छेद 370 हटाए जाने पर एक कश्मीरी की तरफ सरकार के इस फ़ैसले को वो कैसे देखते हैं, इस सवाल पर उन्होंने कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया.

“मैं किसी तरह का निजी राय नहीं देना चाहता हूं. मामला सुप्रीम कोर्ट में है. सब कुछ कानून तय करेगा.”

अलीम का कहना है कि फ़िलहाल वो अपने घरवालों के लेकर चिंतित हैं और वो उनसे जल्द से जल्द मिलना चाहते हैं.

“मेरे जैसे बहुत सारे लोग हैं जो घर पर बात नहीं कर पा रहे हैं. कई कश्मीरी दोस्त जो बाहर रह रहे हैं, उन्होंने अपना-अपना संदेश अपने घरवालों को पहुंचाने के लिए मुझे कहा है.”

मध्य प्रदेश की 40 नदियां फिर होंगी प्रवाहमान

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मध्य प्रदेश में बीते कुछ सालों में तीन सैकड़ा से अधिक नदियों का अस्तित्व समाप्त होने के कगार पर पहुंच चुका है। इन नदियों में पानी बहुत कम समय ही नजर आता है। इन्हीं में से 40 नदियों को राज्य सरकार ने पुनर्जीवित करने के लिए चुना है। मुख्यमंत्री कमलनाथ के नेतृत्व वाली सरकार जल संरक्षण की दिशा में खास प्रयास कर रही है। सरकार ने राज्य में हर व्यक्ति को पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए पानी का अधिकार कानून लागू करने का निर्णय लिया है। इस कानून के प्रारूप को अंतिम रूप दिया जा रहा है।

वहीं दूसरी ओर सरकार ने वर्षा और भू-जल सरंक्षण को भी बढ़ावा देने की मुहिम तेज कर दी है। इस काम में जल संसाधन, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, कृषि विभाग आदि को लगाया गया है, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को सौंपी गई है।

राज्य के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री कमलेश्वर पटेल का कहना है, ‘पारम्परिक जल स्त्रोतों को पुनर्जीवित करने की कार्ययोजना तैयार की गई है। जहां तक नदियों की बात है तो मानसून के समय महज चार माह ही पानी का प्रवाह रहता है, लेकिन वर्षा काल के बाद यह प्रवाह जल्द ही समाप्त हो जाता है। इस प्रवाह को वर्ष भर बनाए रखने के लिए ‘नदी पुनर्जीवन’ कार्यक्रम तैयार किया गया है।’

सरकारी सूत्रों के अनुसार, छिंदवाड़ा, नीमच, आगर-मालवा, अलिराजपुर, छतरपुर, सिवनी, शहडोल, श्योपुर सहित राज्य के 36 जिलों की 40 नदियों का चयन किया गया है। इन नदियों की कुल लंबाई 2,192 किलोमीटर है और कैचमेंट एरिया दो लाख हेक्टेयर से अधिक है। ये नदियां 1863 ग्राम पंचायतों के 3621 गांवों से होकर गुजरती हैं। औसतन एक नदी का कैचमेंट एरिया 55 किलोमीटर है।

राज्य सरकार द्वारा नदी पुनर्जीवन को लेकर तैयार की गई परियोजना के मुताबिक, नदी कैचमेंट एरिया में कुएं, तालाब, बावड़िया और हैंडपंप रिचार्ज हो जाएंगे। साथ ही इन जल स्त्रोतों के प्रति सामाजिक भागीदारी बढ़ेगी, परम्परागत जलस्त्रोतों के प्रति संवेदनशीलता व आस्था में वृद्धि होगी। वहीं मिट्टी का कटाव रुकने के साथ ही मिट्टी में नमी बढ़ेगी, जो फसल उत्पादन में सहायक होगी।

योजना के मुताबिक, जल संरक्षण के लिए सभी कार्य मनरेगा के तहत कराए जाएंगे। इससे जहां ग्रामीणों को रोजगार के अवसर मिलेंगे, वहीं निर्माण कार्य के प्रति स्थानीय लोगों में अपनेपन का भाव भी पैदा होगा। जल संरक्षण के लिए तालाब, खेत तालाब, मेंढ़ बंधान, चैक डेम अथवा स्टाप डेम आदि का निर्माण कराया जाएगा।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र और बुंदेलखंड में जल संरक्षण के लिए काम करने वाले राम बाबू तिवारी का कहना है, ‘नदियों और स्थाई जल संरचनाओं का गुम होना ही जल संकट का बड़ा कारण है। बुंदेलखंड में कभी हजारों तालाब, कुंए और बाबड़ियां हुआ करती थीं, मगर उनमें से अधिकांश गुम हो गए हैं। इस इलाके में जल संकट गहराने लगा और देश के सबसे समस्या ग्रस्त क्षेत्र में इस इलाके का नाम आ गया है।’

उन्होंने आगे कहा, ‘मध्य प्रदेश सरकार ने राज्य की 40 नदियों को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया है, वास्तव में यह संकल्प धरातल पर उतरा तो हालात बदलना आसान होगा। पुराने अनुभव बताते हैं कि सरकार की योजनाएं कागजों तक ही सिमट कर रह गई हैं।’

जम्‍मू के 5 जिलों में मोबाइल फोन सेवा शुरू की गईं, जनजीवन हो रहा सामान्‍य

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जम्मू क्षेत्र के पांच जिलों- डोडा, किश्‍तवाड़ा, रामबन, राजौरी और पूंछ में फिर से मोबाइल फोन सेवा शुरू कर दी गई है. यहां 5 अगस्त के बाद से मोबाइल फोन सेवाएं बंद कर दी गई थीं.

नई दिल्ली : कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए लगाए गए प्रतिबंधों में धीरे-धीरे ढील दी जा रही है, जिससे वहां जनजीवन सामान्‍य हो रहा है. फिलहाल जम्मू क्षेत्र के पांच जिलों- डोडा, किश्‍तवाड़ा, रामबन, राजौरी और पूंछ में फिर से मोबाइल फोन सेवा शुरू कर दी गई है. यहां 5 अगस्त के बाद से मोबाइल फोन सेवाएं बंद कर दी गई थीं. लेकिन मोबाइल इंटरनेट को बहाल नहीं किया गया है. इससे पहले जम्मू के 5 जिलों में मोबाइल सेवा बहाल की गई थीं, जोकि जम्मू, सांबा, कठुआ, उधमपुर, रिआसी थे, लेकिन मोबाइल इंटरनेट को यहां भी बहाल नहीं किया गया है. जम्मू के 10 जिलों में मोबाइल सेवा बहाल हो गई. अभी जम्‍मू में स्कूल कॉलेज खुले हुए हैं. ट्रांसपोर्ट सामान्य है. सरकारी दफ्तर खुले हुए हैं, जहां काम काज सुचारू रूप से चल रहा है.

इससे पहले बुधवार को ही जम्मू एवं कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने घोषणा की थी कि सरकार कुपवाड़ा और हंदवाड़ा जिलों में मोबाइल फोन कनेक्टिविटी खोलने जा रही है. इसके अलावा उन्होंने दावा किया था कि फोन और इंटरनेट का उपयोग लोगों द्वारा कम किया जाता है, जबकि इसका ज्यादातर इस्तेमाल आतंकवादियों द्वारा किया जाता है.

उन्होंने कहा, “यह हमारे खिलाफ इस्तेमाल किया जाने वाला एक प्रकार का हथियार है, इसलिए हमने इसे रोक दिया है. धीरे-धीरे सेवाएं फिर से शुरू की जाएंगी.”

कश्मीर का सुल्तान जिसे बिहार में क़ब्र मिली

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बिहार की राजधानी पटना से तक़रीबन 70 किलोमीटर दूर नालंदा ज़िले के इस्लामपुर में बेशवक गांव.

यहां कश्मीर पर हुकूमत कर चुके एक सुल्तान युसूफ़ शाह चक अपनी क़ब्र में आराम फ़रमा रहे हैं.

बदरंग हो चुकी चार दीवारी से घिरी इस क़ब्र के पास बरसात में उग आई हरी घास, चरती गाय और बकरियां इसकी बदहाली बयान कर रही हैं.

ऐसा लगता है कि एक विशाल मैदान में एक नाउम्मीद बादशाह तन्हा खड़ा अपनी ज़िंदगी के क़िस्से सुना रहा है.

और जिसे सुनने को कोई तैयार नहीं.

आप सोच रहे होंगे कि युसूफ़ शाह चक कौन हैं और वे कश्मीर से नालंदा किन हालात में आए होंगे.

युसूफ़ शाह चक कौन थे?

ये मुग़लों के कश्मीर पहुंचने से पहले की बात है. तब कश्मीर एक ख़ुदमुख़्तार रियासत हुआ करती थी और युसूफ़ शाह चक उसके आख़िरी सुल्तानों में से एक.

1578 ईस्वी से 1586 ईस्वी तक कश्मीर पर हुकूमत करने वाले युसूफ़ शाह ‘चक’ वंश के शासक थे.

14 फ़रवरी 1586 को मुग़ल बादशाह अकबर ने उन्हें क़ैद किया और 30 महीने तक क़ैद में रखा.

उसके बाद अकबर ने अपने सेनापति मानसिंह के सहायक के तौर पर युसूफ़ शाह चक को 500 मनसब (एक तरह का ओहदा) देकर नालंदा के बेशवक परगना में निर्वासित करके भेज दिया. सितंबर, 1592 में उनकी मौत हो गई.निदेशक इम्तियाज़ अहमद बताते हैं कि युसूफ शाह का जिक्र कई ऐतिहासिक लेखों में मिलता है.

इतिहास में युसूफ़ शाह चक

पटना स्थित ख़ुदा बक्श लाइब्रेरी के पूर्व निदेशक इम्तियाज़ अहमद बताते हैं, “युसूफ़ शाह का जि़क्र ‘अकबरनामा’, ‘आइन-ए-अकबरी’ के अलावा ‘बहारिस्तान-ए-शाही’ में भी मिलता है. “बहारिस्तान-ए-शाही की पांडुलिपि फारसी में है. ये मध्ययुगीन कश्मीर में चल रही राजनैतिक उठापटक का दस्तावेज़ है. इसकी पांडुलिपि इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी, लंदन में मौजूद है.”

अंग्रेज़ी में इस पांडुलिपि का अनुवाद जम्मू-कश्मीर यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर रहे काशी नाथ पंडित ने किया है.

इस किताब के 14वें और 15वें चैप्टर में युसूफ़ शाह चक और उस वक़्त के कश्मीर के बारे में विस्तार से ज़िक्र है.

‘बहारिस्तान-ए-शाही’

‘बहारिस्तान-ए-शाही’ के मुताबिक़ शासन संभालने के बाद युसूफ़ चक अपने ही सामंतों से बहुत परेशान थे.

1580 ईस्वी में उन्होंने आगरा जाकर अकबर से मदद मांगी. अकबर ने राजा मान सिंह को युसूफ़ चक की मदद के लिए भेजा. लेकिन मुग़ल सेना के कश्मीर पहुंचने से पहले ही युसूफ़ चक और विद्रोही सामंत अब्दाल भट्ट के बीच समझौता हो गया.

नतीजा ये हुआ कि मुग़ल सेना को कश्मीर के बाहर से लौटना पड़ा और अकबर युसूफ़ शाह चक से नाराज़ हो गए. बाद में 1586 में अकबर के आदेश पर राजा भगवान दास ने कश्मीर पर आक्रमण किया. थोड़े विरोध के बाद भगवान दास और युसूफ़ शाह चक के बीच एक समझौता हुआ.

लेकिन लाहौर में जब अकबर के सामने युसूफ़ शाह को पेश किया गया तो बादशाह ने समझौता मानने से इनकार कर दिया. इसके बाद अकबर ने युसूफ़ शाह चक को क़ैद किया और बाद में निर्वासित करके बिहार भेज दिया.

बेशवक में क़ब्रिस्तान

अकबर की तरफ़ से लड़ते हुए, उड़ीसा पर फ़तह के बाद युसूफ़ शाह चक की तबीयत ख़राब हुई और अगले ही दिन उनकी मृत्यु हो गई.

‘बहारिस्तान-ए-शाही’ के मुताबिक़ युसूफ़ शाह चक के शव बेशवक लाने में दो महीने लगे.

बेशवक में उन्हें दफ़नाया गया और उनकी क़ब्र के पास बहुत बड़े बग़ीचे का निर्माण किया गया.

इस क़ब्रगाह के की देखरेख करने वाले यासीर रशीद ख़ान कहते हैं, “बेशवक में हमारी छह बीघा और बग़ल के कश्मीरी चक में जहां चक वंश से जुड़े लोग रहते थे, वहां दो बीघा ज़मीन है.”

“ये राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है लेकिन 1947 के दंगों में यहां से चक ख़ानदान के ज्यादातर लोग चले गए और स्थानीय दबंगों ने ख़ाली पड़ी ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करना शुरू कर दिया.”

क़ब्रगाह की चार दीवारी

यासिर रशीद साल 2013 से इन ज़मीनों को बचाने के लिए राज्य के सभी संबंधित अधिकारियों को पत्र लिख चुके हैं लेकिन नतीजा अब तक ज़ीरो रहा है.

उनका कहना है कि साल 2016 में उन लोगों ने राजा युसूफ़ चक सहित सात महत्वपूर्ण लोगों की क़ब्रगाह की चार दीवारी करवाई.

दिलचस्प है कि सत्ता में आने के बाद से ही साल 2006 से क़ब्रिस्तानों की घेराबंदी बिहार सरकार का मुख्य लक्ष्य रहा है, ऐसे में ये सवाल उठना लाज़िमी है कि बेशवक में कश्मीर के राजा, उनके ख़ानदान के लोगों की क़ब्र और उससे लगे क़ब्रिस्तान को उपेक्षित क्यों रखा गया?

हालांकि बीबीसी से बातचीत करते हुए पुरातत्व निदेशालय के निदेशक अतुल कुमार वर्मा ने कहा कि क़ब्रगाह की चार दीवारी सरकार ने कराई है और टेक्नीकल स्टॉफ़ की कमी के चलते निकट भविष्य में बेशवक के लिए कोई योजना नहीं है.

कविता और संगीत का शौक़

पीएनके बमज़ई की किताब ‘ए हिस्ट्री ऑफ़ कश्मीर’, प्रोफ़ेसर मोहिबुल हसन की किताब ‘कश्मीर अंडर सुल्तान’ और ‘बहारिस्तान-ए-शाही’ में युसूफ़ शाह चक के व्यक्तित्व का ज़िक्र है.

इन किताबों के मुताबिक़ युसूफ़ शाह बहुत शानदार व्यक्तित्व के मालिक थे. उन्हें संगीत कला का ज्ञान था. वो हिन्दी, कश्मीरी और फारसी कविता के जानकार थे.

उनकी खेल में रूचि थी और इसके अलावा वो सभी धर्मों को सम्मान देते थे.

युसूफ़ शाह चक की पत्नी का नाम हब्बा ख़ातून था. वो कश्मीर की बहुत मशहुर कवयित्री थीं.

इतिहासकार इम्तियाज़ अहमद बताते हैं, “हब्बा ख़ातून मध्यकालीन भारत की बहुत ही आज़ाद ख्याल वाली महिला थीं. वो किसान परिवार से आती थीं लेकिन बहुत पढ़ी लिखी थीं.”

“पहले पति को उन्होंने तलाक़ दे दिया था और युसूफ़ शाह उनके दूसरे पति थे. उनकी रचनाओं में धर्म को प्रधानता नहीं थी. उन्होंने ज़िंदगी अपनी शर्तों पर जी.”

बहुत सारे लोगों का मानना है कि निर्वासित जीवन जी रहे युसूफ़ शाह चक के पास हब्बा ख़ातून बेशवक आई थीं और उनकी क़ब्र भी युसूफ़ शाह की क़ब्र के पास हैं.

लेकिन इम्तियाज़ अहमद इससे इनकार करते है, उनके मुताबिक़ युसूफ़ शाह की क़ैद के बाद हब्बा ख़ातून ने कश्मीर में ही अपना जीवन बिताया.

1977 में आए थे शेख़ अब्दुल्ला

नालंदा के इस्लामपुर थाने से बेशवक का रास्ता शेख़ अब्दुल्लाह रोड से होकर गुज़रता है.

जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन मुख्यमंत्री शेख़ अब्दुल्लाह 19 जनवरी 1977 को राज्य की कल्चरल एकैडमी की एक टीम के साथ बेशवक आए थे.

कुछ माह पहले कश्मीर के मुख्यमंत्री रहे और शेख अब्दुल्लाह के पोते उमर अब्दुल्लाह ने भी ट्वीटर पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से बेशवक में कश्मीर के इतिहास को संरक्षित करने की अपील की थी.

बिहार राज्य सुन्नी वक्फ़ बोर्ड में कश्मीरी चक और बेशवक की ज़मीन को डॉक्टर अब्दुल रशीद ख़ान ने रजिस्टर कराया था.

यासीर रशीद ख़ान उन्ही के पोते हैं और उनका दावा है कि वो युसूफ़ चक के वंशज हैं. यासीर रशीद ख़ान लगातार इस ऐतिहासिक धरोहर को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

वे बताते हैं, “देश विदेश से स्कॉलर, रिसर्चर यहां आना चाहते हैं, यहां हम सालाना उर्स आयोजित करते हैं. लेकिन आप बताएं कि उस क़ब्रगाह के पास किसी के बैठने तक की व्यवस्था है क्या?”

बिहार के पर्यटन मंत्री प्रमोद कुमार ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “जब वो जगह पर्यटन लायक़ हो जाएगी, तभी विभाग पर्यटन की संभावनाओं को देख सकता है. लेकिन अभी तो कला संस्कृति विभाग इस मामले को देखे.”दीनानाथ पांडेय का दावा है कि कब्र के नीचे हिंदू देवता का मंदिर था.

बेशवक के वर्तमान हालात

बेशवक स्थित क़ब्रगाह को दिखाते हुए स्थानीय निवासी और गांव के मुख्य पुजारी दीनानाथ पांडेय ने दावा किया कि क़ब्र के नीचे विष्णु मंदिर था.

दीनानाथ से बातचीत से ये अहसास होता है कि गांव में अब ये धारणा आम लोगों में घुसती जा रही है कि मंदिर के ऊपर क़ब्र बनाई गई है.

वहीं कश्मीरी चक नाम का टोला जो युसूफ़ चक की रिहाइश थी, वहां बीते दो साल से छह ग़रीब मुस्लिम परिवार आकर बस गए हैं.

जिसके चलते बेशवक के लोगों में नाराज़गी साफ़ देखी जा सकती है.

कश्मीरी चक में रह रही रूबी ख़ातून कहती हैं, “यहां हमको कोई सुविधा नहीं है. हमारे सूफी संतों की मज़ार पर दबंगों ने क़ब्ज़ा करके खेती करनी शुरू कर दी है. यहां बहुत परेशानी के बावजूद हम रह रहे हैं क्योंकि हम ग़रीब हैं.”

बिहार और कश्मीर के संबंध

कश्मीर चक के थोड़ी ही दूर पर हैदरचक है. ग़ौरतलब है कि हैदर चक युसूफ़ चक के समय का ही कश्मीरी सामंत थे.

स्थानीय लोग उसे युसूफ़ चक का भाई बताते हैं लेकिन इतिहासकार इम्तियाज़ अहमद के मुताबिक़ वो युसूफ़ शाह का बेटा था.

हैदरचक नालंदा के वर्तमान सांसद कौशलेन्द्र कुमार का भी पैतृक गांव है.

यासीर रशीद ख़ान और उनके लोगों की तरफ़ से ज़मीन पर अतिक्रमण के संबंध में हिलसा के अनुमंडल पदाधिकारी वैभव चौधरी ने कहा, “हमारी तऱफ से ज़मीन की नापी हो गई है लेकिन इसके आगे की कारवाई के लिए कोई आदेश अभी नहीं है.”

युसूफ़ शाह चक की क़ब्रगाह और उनका इतिहास बिहार और कश्मीर के संबंधों की एक कड़ी है.

कश्मीरियों में अपने इस राजा की याद को बचाने की तड़प देखी जा सकती है.

लेकिन जैसा कि इम्तियाज़ अहमद कहते हैं, “बिहार की सरकारों में इसके प्रति गहरी उदासीनता ‘बिहारी समाज और इतिहास’, दोनों का ही नुक़सान कर रही है.”