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इंजीनियर पिता व भाई ने किया तैयार बिना हेलमेट पहने स्कूटी नहीं होगी स्टार्ट…

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हल्द्वानी में एक नाबालिग के पिता और भाई ने ऐसा हेलमेट तैयार किया है, जिसे न पहनने पर स्कूटी स्टार्ट ही नहीं होगी। अगर बीच रास्ते में हेलमेट उतारने की कोशिश की तो स्कूटी भी बंद हो जाएगी। खास किस्म का हेलमेट बनाने वाले पिता इंजीनियर है तो बड़ा बेटा भी उसी फील्ड की पढ़ाई कर रहा है।

ऐसे काम करेगी तकनीक : पवन के मुताबिक स्कूटी के इंजन में एक खास किस्म का ट्रांसमीटर लगाया गया। इसका रिसीवर हेलमेट में फीट किया गया। गाड़ी चलाने वाले के सिर पर जब तक यह हेलमेट नहीं होगा। इंजन को स्टार्ट होने का सिग्नल नहीं मिलेगा। चलती गाड़ी में अगर सेकेंड भर के लिए भी हेलमेट उतारा तो सिग्नल ऑफ होने की वजह से स्कूटी बंद हो जाएगी।

लगा एक माह का समय : इंजीनियर पवन के मुताबिक इस सिस्टम को तैयार करने में कई तकनीकी दिक्कतें भी सामने आई। इससे पिता-पुत्र का लगभग एक माह का समय लग गया। हेलमेट की दूसरी बड़ी खासियत यह है कि गाड़ी चोरी भी नहीं होगी। क्योंकि बगैर उस हेलमेट गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हो सकती।

पारिवारिक सदस्य की हो चुकी है मौत : पवन के मुताबिक उनके एक रिश्तेदार की एक हादसे में जान चली गई थी। हादसे के दौरान हेलमेट नहीं पहनने की वजह से सिर पर गंभीर चोट आई थी। इसलिए सभी को दुपहिया वाहन चलाते समय बेहतर क्वालिटी का हेलमेट जरूर पहनना चाहिए।

यहां से मिली प्रेरणा

देवलचौड़ सत्यलोक कॉलोनी निवासी पवन वर्मा पेशे से मैकेनिकल इंजीनियर हैं। वह गुरुग्राम की कंपनी में कार्यरत है। बड़ा बेटा तनिष्क सोनी (19) गुजरात में बैचलर ऑफ डिजायन का कोर्स कर रहा है छोटा बेटा वृतांत (17) बिरला स्कूल में 12वीं का छात्र है। पवन के मुताबिक स्कूटी चलाते समय वृतांत कभी-कभार हेलमेट उतार देता था। इसके बाद इंजीनियरिग की पढ़ाई कर रहे तनिष्क ने ऐसा डिजायन तैयार किया जाए, जिससे बगैर हेलमेट पहने स्कूटी स्टार्ट ही न हो।

उम्र के हिसाब से आपके शरीर का वजन इतना होना चाहिए , हर व्यक्ति को जानना चाहिए जानिए…

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शरीर के वजन में बढ़ोतरी को वजन वृद्धि कहते हैं। यह, या तो मांसपेशियों में बढ़ोतरी और वसा के एकत्रीकरण से हो सकता है या फिर अतिरिक्त तरल पदार्थ जैसे पानी के कारण हो सकता है।
व्यायाम या शरीर सौष्ठव के परिणाम स्वरूप मांसपेशी में वृद्धि या वजन में बढ़ोतरी हो सकती है, जिसमे शक्ति प्रशिक्षण के माध्यम से मांसपेशियों में वृद्धि होती है।

जन्म से लेकर 11 महीने तक का वजन

1 -जन्म के समय लड़के का वजन 3.3 किलोग्राम और लड़की का वजन 3.2 किलोग्राम के लगभग होना चाहिए.
2- 3 महीने से लेकर 5 महीने के लड़के का वजन 6 किलोग्राम और लड़की का वजन लगभग 5.4 किलोग्राम के लगभग होना चाहिए.
3- 6 से लेकर 8 महीने के लड़के का वजन 7.8 किलोग्राम और लड़की का वजन 7.2 किलोग्राम के लगभग होना चाहिए. 
4- 9 से लेकर 11 महीने के लड़के का वजन 9.2 किलोग्राम और लड़की का वजन 8.6 किलोग्राम के लगभग होना चाहिए. 

एक साल से लेकर चार साल तक का वजन 

1- 1 साल के लड़के का वजन 10.2 किलोग्राम और लड़की का वजन 9.5 किलोग्राम के लगभग होना चाहिए. 
2- 2 साल के लड़के का वजन 12.3 किलोग्राम और लड़की का वजन 11.8 किलोग्राम से लगभग होना चाहिए. 
3- 3 साल के लड़के का वजन 14.6 किलोग्राम और लड़की का वजन 14.1 किलोग्राम के लगभग होना चाहिए. 
4- 4 साल के लड़के का वजन 16.7 किलोग्राम और लड़की का वजन 16 किलो के लगभग होना चाहिए. 

5 साल से लेकर 11 साल तक का वजन 

1- 5 साल के लड़के का वजन 18.7 किलोग्राम और लड़की का वजन लगभग 17 किलोग्राम होना चाहिए. 
2- 6 साल के लड़के का वजन 20.8 किलोग्राम और लड़की का वजन 19.5 किलोग्राम के लगभग होना चाहिए. 
3- 7 साल के लड़के का वजन 22.9 किलोग्राम और लड़की का वजन 20.8 किलोग्राम के लगभग होना चाहिए. 
4- 8 साल के लड़के का वजन 25.3 किलोग्राम और लड़की का वजन 24.8 किलोग्राम के लगभग होना चाहिए. 
5- 9 साल के लड़के का वजन 28.1 किलोग्राम और लड़की का वजन 28.5 किलोग्राम होना चाहिए. 
6- 10 साल के लड़के का वजन 31.4 किलोग्राम और लड़की का वजन 32.5 किलोग्राम के लगभग होना चाहिए. 
7- 11 साल के लड़के का वजन 32.2 किलोग्राम और लड़की का वजन 35.7 किलोग्राम होना चाहिए.

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद फिल्मों में आया ये अभिनेता, निगेटिव किरदार से हुए मशहूर

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निगेटिव किरदार से मशहूर हुए शरत सक्सेना का जन्म 17 अगस्त 1950 को मध्य प्रदेश के सतना जिले में हुआ था। उन्होंने स्कूली पढ़ाई भोपाल से की जबकि इंजीनियरिंग की पढ़ाई जबलपुर से की। शरत को बचपन से ही एक्टिंग का शौक था और एक्टर बनना चाहते थे।

शरत के पिता ने जब फिल्मों में जाने की बात सुनी तो उन्हें काफी डांट लगाई और पहले पढ़ाई खत्म करने के लिए कहा। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बावजूद शरत एक्टर बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे। फिल्मों में आने के बाद उन्हें विलेन के रोल ऑफर होने लगे। उनके निगेटिव किरदारों को लोगों ने खूब पसंद किया। उनके निभाए किरादर दर्शकों के बीच लोकप्रिय हुए जिसकी वजह से उनके पास फिल्मों की लंबी लाइन लग गई।

फिल्मी बैकग्राउंड नहीं होने की वजह से शरत को शुरुआती दिनों में काफी संघर्ष करना पड़ा। उनकी कड़ी मेहनत का ही नतीजा रहा कि आज वो बॉलीवुड में इतने सक्सेसफुल हैं। निगेटिव किरदार के साथ-साथ वो सहायक भूमिकाओं में पसंद किए जाने लगे।

शरत की पहली रिलीज फिल्म 1977 में आई एजेंट विनोद थी। इसकी बाद उन्होंने काला पत्थर, मिस्टर इंडिया, अग्निपथ, घायल, गुप्त, डुप्लीकेट, बादशाह, फना, बजरंगी भाईजान और ठग्स ऑफ हिंदोस्तान जैसी फिल्मों में नजर आ चुके हैं। 

फिल्मों में आने के बाद शरद ने शोभा से शादी की। उनके दो बच्चे हैं वीरा और विशाल। फिलहाल उनके बच्चे इंडस्ट्री से दूर हैं। शरत अपने परिवार के साथ मुंबई के मड आइलैंड (Madh Island) में रहते हैं।

ख़बरदार Swiggy और Zomato से खाना मंगाने वालों के लिए बड़ी खबर, FSSAI ने फूड सेफ्टी को लेकर दिया ये आदेश…

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आप रेस्टोरेंट में जाकर खाते हैं या स्विगी (Swiggy) और जोमैटो (Zomato) जैसे ऑनलाइन फूड ऐप्स के जरिए खाना मंगाते हैं तो ये खबर आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है. दरअसल अब हर तरह के कैटरर्स को अपनी फूड सेफ्टी की थर्ड पार्टी ऑडिटिंग करानी होगी. इसमें क्लाउड किचन भी शामिल हैं. फूड रेगुलेटर FSSAI (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया) की ओर से नया आदेश जारी हो गया है. इसके मुताबिक, अब ऐसे हर तरह के खाने को थर्ड पार्टी ऑडिटिंग कराने को कहा गया है जो हाई रिस्क कैटेगरी में आते हैं . इनमे कैटरर्स के अलावा डेयरी, पोल्ट्री और मीट बिजनेस भी शामिल हैं .

फूड बिजनेस करने वालों को ये ऑडिटिंग किसी मान्यता प्राप्त प्राइवेट एजेंसी से करानी होंगी. वे कंपनियां जो न्यूट्रीशनल प्रोडक्ट बनाने का दावा करती हैं उन्हें भी इस तरह की ऑडिटिंग करानी होगी .

FSSAI ने दिया आदेश--हर तरह के कैटरर्स को फूड सेफ्टी की थर्ड पार्टी ऑडिटिंग करानी होगी. मतलब साफ है कि अब उन सभी कंपनियों को अपने प्रोडक्ट की जांच थर्ड पार्टी से करानी होगी. जो अपने प्रोडक्ट्स को बेस्ट न्यूट्रीशन वाला बताते हैं. साथ ही कई और बड़े दावे करते है. अब उन सभी बिजनेस करने वालों को इसकी जांच कराकर रिपोर्ट सौंपनी होगी.

फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसआई) ने राजस्थान समेत देश के सभी राज्यों को आदेश दिया है कि 30 जून से टी-बैग में स्टेपल का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया जाए. खानपान सामग्री का कारोबार करने वाली कंपनियों से जून महीने से पहले पिन लगे टी बैग का उत्पादन, स्टोरेज और वितरण रोकने के लिए कहा गया है. चाय के साथ पिन अगर व्यक्ति के पेट में चला जाए तो इससे काफी परेशानी पैदा हो सकती है. केंद्र सरकार ने पहले तो नए साल से ही रोक लगा दी थी. पर किन्हीं कारणों से तिथि में बदलाव करना पड़ा.

दुनिया की सबसे ताकतवर सब्जी जो एक बार खाने से 6 महीने तक फायदे देती है…

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गलत खानपान के कारण हमें कई खतरनाक बीमारी का सामना करना पड़ता है। लेकिन बीमारियों से बचने के लिए हमें खान पान का सहारा लेना होगा। आज हम आपको ऐसी हरी के बारे में बताएँगे जिसे दुनिया की सबसे ताकतवर सब्जी माना जाता है। इसका नाम है कंटोला जिसे ककोड़े, मीठा करेला जैसे नामों से भी जाना जाता है। कंटोला में भरपूर मात्रा प्रोटीन, फाइबर पाया जाता है।

कंटोला में एंटी-एलर्जन और एनाल्जेसिक ल्युटेन और केरोटोनोडइस जैसे तत्व पाएं जाते है। जो कि कैंसर से आपका बचाव करते है। इसका सेवन आपको आसानी से निजात मिल जाएगा।

कंटोला में भरपूर मात्रा में में विटामिन ‘ए’ पाया जाता है। जो कि आंखो के लिए बहुत ही अच्छा माना जाता है। इस मौसम में अधिक मात्रा में इसका सेवन करें। इससे आपके आंखो की रोशनी ठीक हो जाएगी।

कंटोला में मोमोरडीसिन और फाइबर अधिक मात्रा में पाया जा है। जो कि बीपी के मरीजों के लिए रामबाण है। इसका सेवन करने से बीपी कंट्रोल हो जाता है। आयुर्वेद में कई रोगों का इलाज इस औषधि से किया जाता है। इसका सेवन करने पाचन तंत्र ठीक से काम करता है।

करेले की सब्जी को खाने से नहीं होती है ये बीमारी…

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करेला की सब्जी जितनीलाभकारीहोती है, उतना ही उसका रस हमारे स्वास्थ्य के लिएफायदेमंदहोता है।लेकिन कई लोग इसे खाने से दूर भागते हैं।

करेला उन्हें कड़वा लगता है, लेकिन इसका कड़ापन ही आपकी कई बिमारियों को दूर करता है।इसका स्वाद कड़वा जरूर होता है, लेकिन इसका रस हमारे शरीर में होने वाले एन्टीवायरस जीवाणु को नष्ट करते है।करेले का जूस हमरे शरीर के लिएलाभकारीहोता है, इसका सेवन शरीर के लिए बहुतफायदेमंदहोता है।आज हम आपको बताने जा रहे हैं कि इसके जूस से कितनेफायदाहोते हैं।

1.स्कीनपर फफूंद के संक्रमण की रोकथाम के लिए करेले का जूस बहुतलाभकारीहोता है।

2. गठिया रोग में जो दर्द होता है उसका मुख्य कारण रक्त में अशुद्धियों का होना होता हैवकरेला रक्त की अशुद्धियों को दूर करता है।

3. शराब के अत्यधिक सेवन के नशे को करेले का रस पी कर उतारा जा सकता है साथ ही यह लीवर को भी साफ़ कर देता है।

4. हैजा होने पर दो चम्मच करेले के रस को बराबर मात्रा में सफ़ेद प्याज के रस के साथरोजानालेने से हैजे में सुधर होता है।

5. मधुमेह में करेले का रस बहुत हीफायदेमंदहोता है।इसके आधे कप रस के सेवन करने से शरीर में इन्सुलिन की मात्रा बढ़ जाती है।

जानिए इस गांव की मिट्टी से फसल नहीं बल्कि निकलता है शिवलिंग, हर तरफ होती है पूजा…

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एक या दो नहीं, सौ से ज्यादा शिवलिंग, वह फिर एक ही गांव की परिसीमा में। सुन कर अजीब लगाता है। ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर से उत्तर दिशा की ओर करीबन 150 किलोमीटर की दूरी पर तिहड़ी ब्लॉक में है गांव नरेंद्र पुर।

इस गांव की कहानी सुन कर आपको अजीब लगेगा लेकिन बात सच है। यहां कि मिट्टी से फसल के बदले शिवलिंग उपजता है। गांव में हर जगह आपको शिवलिंग ही नजर आएगा। क्योंकि अगर कोई खेती या किसी भी काम से गड्ढा खोदता है तो मिट्टी के अंदर से शिवलिंग निकलता है।

नरेंद्र पुर गांव में जहां भी जाइये, सभी जगह शिवलिंग ही दिखाई देंगे। छोटे से लेकर बड़े इस तरह सौ से ज्यादा शिवलिंग गांव के विभिन्न कोने में पूजे जाते हैं। कितनों के लिए मंदिर बने है। लेकिन बहुत सारे शिवलिंग खुले आकाश के नीचे ही पूजे जाते हैं। जिसकों गांव वाले आबाल वृद्ध वनिता पूजा करते हैं।

अब यहां के लोग नहीं खोदते गड्ढा

कहा जाता है कि गांव के जिस जगह भी गड्ढा खोदोगे, वहां से कोई छोटा या बड़ा शिवलिंग दिखाई जरुर देगा। इसी भय से गांव की परिसीमा में गड्ढा खोदना प्राय बंद कर रखा है।

अपने गांव से उपजे इन शंकर भगवान को सभी गांव वाले बड़ी ही श्रद्धा पूर्वक पूजा करते हैं। सबसे बड़ी बात तो ये है कि यहां के लोगों को पावन श्रावण की महिने में और कहीं जलाभिषेक करने जानेकी आवश्यक नहीं होगी। लोग अपने घर या आसपास में ही महादेव का जलाभिषेक करते हैं।

इस दरगाह में है चमत्कार,किन्नर भी दे रहे है बच्चे को जन्म…

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माँ बनना हर लड़की का सपना होता है और यह वरदान सिर्फ महिला को ही मिला है। वहीं बात करें किन्नरों की, इन्हें ना तो पुरुष समझा जाता है न ही महिला में समझा जाता है। ऐसे में किन्नर भी उन्ही में शामिल होते हैं जो बच्चे को जन्म नहीं दे सकते है। लेकिन ये जानकर आप हैरान रह जायेंगे कि एक मंदिर ऐसा है जहां से आशीर्वाद लेते है किन्नर भी बच्चे को जन्म दे पाते हैं।

किन्नर भी दे रहे है बच्चे को जन्म:

राजस्थान के अजमेर जिले में बनी मोहम्मद शरीफ की दरगाह की जहां कई चमत्कार होते हैं। वैसे तो यहां हज़ारों लोग आते हैं अपनी मन्नतों को लेकर जो पूरी भी होती हैं। उन लोगों की आस्था इस दरगाह से जुड़ी होती है। लेकिन किन्नरों की बात करें तो उनकी भी इस दरगाह में गहरी आस्था होती है जिसके चलते वो यहां आते हैं।

दरगाह में है ये चमत्कार:

अजमेर की ये दरगाह में किन्नर अधिक आते हैं, इस जगह एक मीरां सैयद हुसैन खिंहगसवार की एक दरगाह है। यहां पर एक करिश्माई लाल बूंदी का पेड़ है जिससे चमत्कार होते हैं जो भी इस पेड़ के फल को खाता है उसे संतान जरूर होती है। ऐसे ही एक किन्नर ने इस फल को खाया था जिसके बाद उसने एक लड़के को जन्म भी दिया।

भारत को तेजी से शिकंजे में ले रहा है कैंसर…

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एक ताजा स्टडी कहती है कि आने वाले दशकों में भारत में कैंसर का प्रकोप बढ़ने का अंदेशा है. इनमें से उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा और राजस्थान में इसका सबसे ज्यादा असर होगा.यह अध्ययन जर्नल ऑफ ग्लोबल आन्कोलाजी में प्रकाशित हुआ है. कोलकाता स्थित टाटा मेडिकल सेंटर के डिपार्टमेंट ऑफ डाइजेस्टिव डिजीस के मोहनदास के मल्लाथ और किंग्स कालेज, लंदन के शोधछात्र राबर्ट डी स्मिथ की ओर से एक फेलोशिप के तहत यह अध्ययन किया गया है. अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में हर 20 साल में कैंसर के मामले दोगुने हो जाएंगे. भारत में वर्ष 2018 में कैंसर के 11.50 लाख नए मामले सामने आए थे. वर्ष 2040 तक इस तादाद के दोगुनी होने का अंदेशा है. वर्ष 1990 से 2016 के बीच के 26 वर्षों के दौरान देश में इस बीमारी से मरने वालों की दर भी दोगुनी हो गई है. ये भी पढ़िए: कितने तरह के कैंसर जानते हैं आप? आयुर्वेदिक काल से कैंसर “हिस्ट्री ऑफ द ग्रोइंग बर्डेन ऑफ कैंसर इन इंडियाः फ्रॉम एंटीक्विटी टू ट्वेंटीफर्स्ट सेंचुरी” शीर्षक वाली इस अध्ययन रिपोर्ट में खास तौर पर दो पहलुओं का जिक्र किया गया है. इसमें इस मिथक को खारिज किया गया है कि कैंसर पश्चिमी सभ्यता की देन है.

रिपोर्ट के मुताबिक, आम लोगों की बढ़ती औसत उम्र इस बीमारी की सबसे प्रमुख वजह है. मल्लाथ कहते हैं, “आम लोगों में यह गलत धारणा है कि पश्चिमीकरण और आधुनिक जीवनशैली की वजह से ही देश में कैंसर की बीमारी तेजी से फैल रही है.” मल्लाथ ने स्मिथ के साथ मिलकर लंदन स्थित ब्रिटिश लाइब्रेरी और वेलकम कलेक्शन लाइब्रेरी में बीते दो सौ वर्षों के दौरान भारत में कैंसर से संबधित विभिन्न प्रकाशनों का अध्ययन किया. पुराने आंकड़ों और नए अध्ययनों के तुलनात्मक अध्ययन से उनको भारत में कैंसर के सफर की एक साफ तस्वीर मिली. मल्लाथ कहते हैं कि वैज्ञानिक पहले ही यह बात कह चुके हैं कि सभ्यता नहीं बल्कि उम्र बढ़ने के साथ कैंसर के मामले भी बढ़ते हैं.

लोगों की औसत उम्र बढ़ने की वजह से समाज में कैंसर का प्रकोप बढ़ना भी तय है. ये भी पढ़िए: इन कारणों के चलते भारत में जाती हैं जानें मल्लाथ कहते हैं कि भारत में कैंसर की बीमारी सदियों पुरानी है. अथर्ववेद समेत कई पुराने ग्रंथों में इस बीमारी से मिलते-जुलते लक्षणों का जिक्र करते हुए बचाव के उपाय सुझाए गए हैं. लेकिन कैंसर की प्राथमिक पहचान उन्नीसवीं सदी में की गई थी.

उसके बाद 1910 में इंडियन मेडिकल सर्विस ने कैंसर के मामलों का ब्यौरा भी प्रकाशित करना शुरू किया. रिपोर्ट में कहा गया है कि कैंसर की बीमारी देश में आयुर्वेदिक काल से ही है. लेकिन 19वीं सदी में पश्चिमी दवाओं की स्वीकार्यता बढ़ने के बाद इस बीमारी की जांच शुरू हुई. मल्लाथ बताते हैं कि बीती सदी के दौरान भी कई विशेषज्ञों ने कैंसर के बढ़ते खतरे के प्रति चेताया था.

लेकिन तब इस पर खास ध्यान नहीं दिया गया. कुछ राज्यों पर प्रभाव ज्यादा रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में कैंसर का प्रकोप सबसे ज्यादा होगा. इसकी वजह यह है कि ये राज्य महामारी के संक्रमण काल से गुजर रहे हैं. इन राज्यों में कैंसर के इलाज की सुविधाएं नगण्य हैं.

मल्लाथ कहते हैं कि अगर इलाज में मांग और आपूर्ति के भारी अंतर को पाटने की दिशा में शीघ्र पहल नहीं की गई तो इन राज्यों को और गंभीर चुनौतियों का सामना करना होगा. मल्लाथ कहते हैं, “देश में कैंसर के इलाज का आधारभूत ढांचा बेहतर नहीं है. सरकारी अस्पतालों में ऐसी सुविधाओं का अभाव है जबकि निजी अस्पताल आम लोगों की पहुंच से दूर हैं.” ये भी पढ़िए: ये खाएं कैंसर भगाएं रिपोर्ट में कहा गया है कि कैंसर से बचाव के उपायों के बावजूद देश में यह बीमारी बढ़ेगी. इसकी वजह आम लोगों की औसत उम्र बढ़ना है.

मिसाल के तौर पर अगर तंबाकू पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी जाए तो आम लोगों की औसत उम्र और 10 साल बढ़ जाएगी और महिलाओं में स्तन कैंसर और पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर जैसे ऐसे मामले बढ़ेंगे जो बढ़ती उम्र से संबंधित हैं. मल्लाथ कहते हैं, “सरकार को कैंसर की शुरुआती दौर में पहचान और इलाज की पहल करनी चाहिए. लेकिन केंद्र और राज्य की आपसी खींचतान का खामियाजा आम मरीजों को उठाना पड़ रहा है.” विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को निजी अस्पतालों को कैंसर केयर प्रोग्राम चलाने की इजाजत नहीं देनी चाहिए. निजी क्षेत्र में इलाज का खर्च बहुत ज्यादा है और ज्यादातर लोग यह खर्च नहीं उठा सकते. कोलकाता के एक सरकारी कैंसर अस्पाल से जुड़े डॉ. मनोहर माइती कहते हैं, “केंद्र सरकार को कैंसर के इलाज के लिए वर्ष 1946 में बनी भोरे समिति की रिपोर्ट और मुदलियार समिति की रिपोर्ट को लागू करना चाहिए.” इन दोनों समितियों ने तमाम मेडिकल कॉलेजों में बहुआयामी कैंसर ट्रीटमेंट यूनिट स्थापित करने और हर राज्य में केरल के तिररुअनंतपुरम स्थित रीजनल कैंसर सेंटर की तर्ज पर कैंसर स्पेशिलिटी अस्पताल 

अरुण जेटली को वेंटिलेटर से हटाकर ECMO पर रखा गया हालत नाजुक…

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एक सप्ताह से एम्स में भर्ती पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। वे आईसीयू में भर्ती हैं। उनकी हालत इस वक्त इतनी खराब है कि उन्हें वेंटिलेटर से हटाकर ईसीएमओ यानी एक्सट्राकॉर्पोरियल मेंब्रेन ऑक्सीजिनेशन (Extracorporeal membrane oxygenation) पर रखा गया है। गौरतलब है कि ईसीएमओ पर मरीज को तभी रखते हैं जब दिल, फेफड़े काम करना बंद कर देते हैं और वेंटीलेटर का भी फायदा नहीं होता। इससे मरीज के शरीर में ऑक्सीजन पहुंचाया जाता है। मालूम हो कि उन्हें संक्रमण ने चपेट में ले लिया है। शनिवार सुबह जेटली का हालचाल जानने राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह एम्स पहुंचे। गृहमंत्री अमित शाह आज दोबारा जेटली का हाल जानने एम्स पहुंचे हैं। इसके साथ ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन भी पहुंचे हैं। 

शुक्रवार को भी पहुंचे थे कई मंत्री

शुक्रवार को उनकी तबीयत में अचानक गिरावट दिखी। उनका उपचार कर रहे एम्स के वरिष्ठ डॉक्टरों ने आनन-फानन में दवाओं की डोज बढ़ाने का फैसला लिया। उधर, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद उनके स्वास्थ्य की जानकारी लेने और उनके परिजनों से मिलने के लिए एम्स पहुंचे। उनके साथ केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और राज्यमंत्री अश्विनी कुमार चौबे भी थे।

जानकारी के अनुसार, पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली को 9 अगस्त को सांस लेने में तकलीफ के कारण एम्स में भर्ती कराया गया था। परिजनों के अनुसार, सुबह नाश्ते के वक्त अरुण जेटली को अचानक सांस लेने में तकलीफ हुई थी।

एम्स के डॉक्टरों ने भी शुरू में इसे रुटीन प्रक्रिया बताया, लेकिन दोपहर बाद जांच रिपोर्ट आने पर पता चला कि उन्हें फेफड़े में पानी भरने के कारण सांस लेने और छोड़ने में तकलीफ है। इसकी वजह से उनके दिल पर भी काफी दवाब पड़ रहा है।

डॉक्टरों ने आनन-फानन में उन्हें भर्ती करने का फैसला लिया। तब से एम्स के पल्मोनरी, हार्ट, नेफ्रोलॉजी, एंडोक्रोनोलॉजी इत्यादि पांच विभागों के वरिष्ठ डॉक्टरों की टीम की निगरानी में उनका उपचार जारी है। 

एम्स के एक वरिष्ठ डॉक्टर ने बताया कि भर्ती होने के कुछ समय बाद पूर्व वित्त मंत्री के स्वास्थ्य में स्थिरता देखने को मिली थी। संक्रमण होने के कारण दो दिन से उनकी तबियत में थोड़ी गिरावट देखने को मिली है। उन्होंने बताया कि पूर्व वित्त मंत्री के स्वास्थ्य की निगरानी के लिए एम्स की टीम 24 घंटे अलर्ट पर है। उन्हें जल्द से जल्द स्वस्थ करने की हर संभव कोशिश की जा रही है।

डॉक्टरों ने अरुण जेटली के स्वास्थ्य को लेकर सोशल मीडिया पर पिछले कई दिन से चल रही खबरों को अफवाह बताते हुए अपील की है कि किसी भी प्रकार की भ्रामक जानकारी पर प्रतिक्रिया न दें।