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chhattisgarh : राजनांदगांव के कचरा संग्रहण केंद्र में लगी भीषण आग

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राजनांदगांव। मंगलवार की सुबह शहर के बजरंगपुर नवागांव के मणिकांचन कचरा संग्रहण केंद्र में भीषण आग लग गई। मौके पर पहुंची फायर ब्रिगेड की टीमों ने करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया। इस कचरा संग्रहण केंद्र में पूरे शहर से एकत्र किया गया कचरा लाया जाता है और यहां इसे छांटा जाता है।

आग लगने का कारण शॉर्ट सर्किट को बताया जा रहा है। घटना में किसी के भी हताहत होने की खबर नहीं है। पुलिस आगजनी की इस घटना की जांच कर रही है। आग लगने के बाद क्षेत्र में कई घंटों तक बिजली बहाली भी ठप रही। शॉर्ट सर्किट की वजह से मेन लाइन के तार भी जल गए हैं। बताया जा रहा कचरा संग्रहण केंद्र में दो दिनों पहले भी आग लगी थी।

प्रियंका का अयोध्या दौरा एक दिन के लिए टला, अब 29 को जाएंगी

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लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की वापसी कराने को लेकर महासचिव प्रियंका गांधी लगातार सक्रिय हैं और इसी सिलसिले में वह हिंदुत्व के एजेंडे पर बीजेपी को घेरने की कवायद में बुधवार को दिल्ली से अयोध्या के लिए रवाना होने वाली थीं, लेकिन अब उनके कार्यक्रम को बदल दिया गया है.

कार्यक्रम में फेरबदल के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी अब अमेठी और रायबरेली जाने के बाद अयोध्या का दौरा करेंगी. प्रियंका 27 मार्च को अमेठी जाएंगी और इसके बाद वह अगले दिन 28 मार्च को रायबरेली में रहेंगी. इन 2 जगहों का दौरा करने के बाद प्रियंका गांधी 29 मार्च को अयोध्या जाएंगी. वह दिल्ली से लखनऊ तक हवाई मार्ग से जाएंगी और यहीं से वह क्षेत्रों का दौरा करेंगी. अब सवाल उठता है कि क्या प्रियंका गांधी अयोध्या में रामलला के दर्शन भी करेंगी? बता दें कि 1989 में राजीव गांधी ने अपने चुनावी अभियान का आगाज अयोध्या से किया था.

पहले ऐसी खबर आई थी कि कांग्रेस महासचिव और पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी नौका यात्रा के बाद अब रेल यात्रा के जरिए लोगों से संपर्क साधेंगी और इस मुहिम के जरिए प्रियंका गांधी 27 मार्च को दिल्ली से अयोध्या के बीच रेल यात्रा करेंगी. अपनी इस यात्रा के दौरान बीच में आने वाले सभी सीटों पर लोगों से बातचीत भी करेंगी. इससे पहले मतदाताओं से संपर्क के लिए प्रियंका गांधी ने प्रयागराज से वाराणसी के बीच नौका यात्रा की थी. हालांकि सुरक्षा कारणों से प्रियंका अब हवाई मार्ग के जरिए लखनऊ जाएंगी.

सॉफ्ट हिंदुत्व का एजेंडा

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी लोकसभा चुनाव से पहले सॉफ्ट हिंदुत्व के एजेंडे के जरिए अपने चुनावी अभियान को धार देने में जुटी हैं. उन्होंने पिछले दिनों अपने चुनाव प्रचार की शुरुआत प्रयागराज के हनुमान मंदिर में और गंगा की पूजा-आरती के साथ शुरू की थी. इसके बाद उन्होंने विंध्याचल में मां विंध्यवासिनी देवी का दर्शन किया. फिर नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वारणसी में काशी विश्वनाथ में माथा टेका और दशाश्वमेध घाट गईं थी.

अपनी इसी मुहिम को आगे बढ़ाते हुए प्रियंका गांधी अब भगवान राम की नगरी अयोध्या का दौरा करने जा रही हैं, जहां वो हनुमान गढ़ी जाएंगी. प्रियंका लगातार अपने दौरे से बीजेपी के लिए चुनौती बनती जा रही हैं.

इससे पहले उत्तर प्रदेश कांग्रेस समिति के सचिव राजेंद्र प्रताप सिंह ने बताया था कि प्रियंका गांधी दिल्ली से कैफियत एक्सप्रेस से अयोध्या के लिए रवाना होंगी. रेलवे स्टेशन के नजदीक थोड़ी देर होटल में रुकने के बाद वह सुबह 10 बजे अयोध्या में रोड शो शुरू करेंगी. और इस रोड शो में 32 पड़ाव होंगे. राजेंद्र सिंह ने यह भी कहा था कि प्रियंका इस दौरान स्थानीय लोगों से मिलेंगी और अयोध्या में दो जनसभाओं को भी संबोधित करेंगी. प्रियंका एक स्कूल में बच्चों से भी मिलेंगी

ऐसे आ सकते हैं कांग्रेस के अच्छे दिन

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जीवनभर कांग्रेस के विरोधी रहे समाजवादी नेता मधु लिमये ने अपने आखिरी दिनों में कहा था कि ‘सुधरी हुई कांग्रेस ही विविधताओं से भरे इस देश को बेहतर ढंग से चला सकती है.’ गैर-कांग्रेसी दलों की खिचड़ी सरकारों के कामों को नजदीक से देखने के बाद लिमये इस नतीजे पर पहुंचे थे.

उनका मानना था कि ‘मध्यमार्गी पार्टी कांग्रेस के कार्यकर्ता देशभर में हैं. वह सभी समुदायों को भरसक अपने साथ बांधकर रख सकती है. यह गुण न तो क्षेत्रीय दलों में है और न ही भाजपा में.’ मधु लिमये का यह सपना पूरा नहीं हुआ, तो इसके लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है.

अब देश को चलाने की बात कौन कहे, कांग्रेस पार्टी में प्रतिपक्ष को चलाने की भी क्षमता नहीं बची. प्रतिपक्षी दल इससे दूर भाग रहे हैं. उधर इस बीच भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर ‘सबका साथ सबका विकास’ करने की कोशिश की है. देश और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि भाजपा के मुकाबले स्वस्थ व मजबूत प्रतिपक्ष नहीं है. वैसे अधिकतर क्षेत्रीय दल घोर जातिवाद, वंशवाद और पैसावाद के आरोपों से सने हैं.

कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो क्षेत्रीय दल भी कांग्रेस को अपने साथ लेने को तैयार नहीं हैं. ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि उन्हें कांग्रेस एक कमजोर पार्टी नजर आ रही है. उन्हें कांग्रेस मददगार के बदले बोझ लग रही है. यहां तक कि जिन उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस कभी काफी ताकतवर थी, वहां भी क्षेत्रीय दलों के सामने वह निरीह बन चुकी है. इसके लिए खुद कांग्रेस ही अधिक जिम्मेदार रही है.

इसलिए फिर से ताकतवर बनने के लिए उसे ही खुद को बदलना होगा. पर क्या बदलने की ताकत भी कांग्रेस में अब बची हुई है? कई बार अपनी ताकत न भी हो, तो सत्ताधारी दल की विफलताओं का लाभ प्रतिपक्ष को मिल जाता है. लेकिन, उस लाभ को बनाये रखने के लिए तो खुद उसे ही प्रयास करना पड़ता है.

साल 2014 में केंद्र में राजग के सत्ता में आने के लिए खुद राजग या नरेंद्र मोदी को 40 प्रतिशत ही श्रेय जाता है. बाकी 60 प्रतिशत लाभ तो उन्हें मनमोहन सरकार की विफलताओं के कारण मिला. यहां तक कि हाल में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली सफलता के पीछे भी भाजपा सरकारों की विफलताएं ही अधिक थीं.

इस पृष्ठभूमि में मौजूदा लोकसभा चुनाव के बाद शायद कांग्रेस नेतृत्व को आत्मनिरीक्षण करने का अवसर मिल सकता है, यदि वह चाहे. देश में स्वस्थ लोकतंत्र के विकास के लिए उसे ऐसा करना ही चाहिए. बेहतर होता कि एक खास परिवार के बदले कुछ समझदार, राष्ट्रहित चिंतक व ईमानदार कांग्रेसियों की वर्किंग कमेटी, पार्टी को निर्देशित करती.

इस बीच कांग्रेस के लिए यह जान लेना जरूरी है कि 1984 के बाद से ही कांग्रेस लगातार निरीह क्यों होती चली गयी. हालांकि, उसका बीजारोपण पहले ही हो चुका था. यदि कांग्रेस ने सबका साथ लेकर सबके विकास की चिंता आजादी के बाद से ही की होती, तो आज उसे यह दिन नहीं देखना पड़ता.

आज के अधिकतर जाति आधारित क्षेत्रीय दल इस बहाने खड़े हुए और ताकतवर बने, क्योंकि कांग्रेस ने उनकी जातियों के साथ न्याय नहीं किया. न्याय का सबसे बड़ा आधार आरक्षण हो सकता था. भारतीय संविधान के अनुच्छेद-340 में सामाजिक न्याय का प्रावधान भी किया गया.

पर, कांग्रेस ने लगातार उसका विरोध किया. साल 1990 में जब वीपी सिंह सरकार ने मंडल आरक्षण लागू किया, तो कांग्रेस ने कई बहाने से उसका विरोध किया.यानी समर्थन नहीं किया. राममंदिर पर भी कांग्रेस की ढुलमुल नीति के चलते कांग्रेस का जन समर्थन काफी घट गया. उसके बाद कभी उसे लोक सभा में बहुमत नहीं मिल सका.

आजादी के बाद उत्तर प्रदेश और बिहार में जब-जब कांग्रेस को विधानसभाओं में पूर्ण बहुमत मिला, उसने सिर्फ सवर्णों को ही मुख्यमंत्री बनाया. जबकि, ये राज्य पिछड़ा बहुल हैं.

कांग्रेस के पास पिछड़ों में शालीन नेता भी थे, लेकिन जब पिछड़े राज्यों में राजनीति की बागडोर गैर-कांग्रेसी ताकतों के हाथों में चली गयी, तो कांग्रेस ने पिछड़ों के बीच से ऐसे नेताओं को उभारा, जो ‘पिछड़ों के साथ हुए अन्याय का सूद सहित बदला’ ले सकें. अब स्थिति यह है कि कांग्रेस के पास उत्तर प्रदेश में मात्र 6.2 प्रतिशत और बिहार में मात्र 6.7 प्रतिशत वोट ही बच गये हैं. इसके बावजूद मनमोहन सरकार ने दस साल तक कुछ ऐसे विवादास्पद काम किये, जिनसे भाजपा व खासकर नरेंद्र मोदी को राजनीतिक लाभ मिला. हालांकि मनमोहन के कुछ काम अच्छे भी थे.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद गठित एके एंटोनी कमेटी ने अपनी रपट में कहा था कि ‘कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता पर से लोगों का विश्वास उठ रहा है और वे मानते हैं कि कांग्रेस अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण में लगी हुई है.’

एंटोनी की रपट के अलावा कांग्रेस के कमजोर होने में उसके घोटालों की खबरों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. इन दो तत्वांे के संबंध में अपनी राह बदलकर कांग्रेस अब भी भाजपा को कमजोर कर सकती है. पर फिलहाल इसके संकेत नहीं हैं. इस लोकसभा चुनाव के बाद शायद कांग्रेस इन मुद्दों पर चिंतन करे.

पिछले दिनों भारत-पाक द्वंद्व और बालाकोट प्रकरण के बाद कई प्रमुख कांग्रेसी नेताओं के जो बयान आये, उनसे तो यही लगता है कि कांग्रेस अपनी पिछली गलतियों से कोई सबक लेने को तैयार नहीं है. उत्तर प्रदेश में तो सपा-बसपा ने कांग्रेस को पूरी तरह अलग-थलग कर ही दिया, पर बिहार में राजद ने कुछ सीटें जरूर कांग्रेस के लिए छोड़ी हैं.

कांग्रेस ने 1999 में राष्ट्रपति शासन का राज्यसभा में विरोध करके भंग राबड़ी सरकार को वापस करवा दिया था. साथ ही साल 2000 के विधानसभा चुनाव में जब राजद को बहुमत नहीं मिला, तो कांग्रेस ने राजद से मिलकर सरकार बना ली. इससे कांग्रेस की एक ऐसी पार्टी की छवि बन गयी, जो राजद की छवि से बहुत अलग नहीं थी. उसका भारी नुकसान कांग्रेस को हुआ.

कांग्रेस यह कहती रही कि ‘सांप्रदायिक तत्वों को सत्ता में आने से रोकने के लिए’ हम लालू-राबड़ी सरकार को बाहर-भीतर से समर्थन देते हैं. पर, इस विधि से कांग्रेस न तो भाजपा को सत्ता में आने से रोक सकी और न ही अपनी खुद की राजनीतिक ताकत बनाये रख सकी.

इन सबके बावजूद अब भी यदि कांग्रेस का राष्ट्रीय नेतृत्व घोटालों के प्रति खुद में नफरत पैदा करे और स्वस्थ व संतुलित धर्मनिरपेक्षता की राह पर चले, तो एक बार फिर कांग्रेस के अच्छे दिन आ ही सकते हैं.

भाजपा के स्टार प्रचारकों की लिस्ट से आडवाणी और जोशी का नाम गायब

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लोकसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने स्टार प्रचारकों की सूची जारी की है. इस सूची में खास बात यह है कि पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में शामिल लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे दिग्गज नेताओं को इसमें जगह नहीं दी गयी है. गौर हो कि लालकृष्ण आडवाणी को इस बार टिकट भी नहीं दिया गया है. वे गुजरात के गांधीनगर से सांसद रह चुके हैं.

वर्तमान में कानपुर से सांसद मुरली मनोहर जोशी के बारे में भी खबरें हैं कि उनका भी टिकट पार्टी काट सकती है.

इस स्टार प्रचारक की लिस्ट में कलराज मिश्रा, सुषमा स्वराज और उमा भारती के नाम नजर आ रहे हैं जिन्होंने खुद से चुनाव ना लड़ने का ऐलान किया है. यूपी में पहले और दूसरे चरण में होने वाले चुनावों के लिए जारी की गयी इस सूची में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, राजनाथ सिंह, योगी आदित्यनाथ, केशव प्रसाद मौर्य, उमा भारती, हेमा मालिनी, नितिन गडकरी और अरुण जेटली जैसे दिग्गज नेताओं के नाम को जगह दी गयी है.

लोकसभा चुनाव 2019: छत्तीसगढ़ में प्रचार के लिए प्रियंका गांधी ने अब तक नहीं दिया समय

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कांग्रेस प्रियंका गांधी में इंदिरा गांधी की छवि देखते हुए बस्तर में सभा कराने की तैयारी कर रही है. इसलिए प्रियंका गांधी विधिवत निमंत्रण भी भेजा गया है, लेकिन प्रियंका गांधी का कार्यक्रम अब तक तय नहीं हो पाया है. मामले की जानकारी देते हुए कांग्रेस संचार विभाग के अध्यक्ष शैलेष नितिन त्रिवेदी ने कहा कि यूपी के व्यस्त कार्यक्रमों के बीच प्रियंका गांधी छत्तीसगढ़ आ पाएंगी की नहीं यह अब तक नहीं हो पाया है, लेकिन अगर वे आती हैं तो कांग्रेस के लिए बेहतर होगा.

दरअसल 1972 में इंदिरा गांधी बस्तर पर आई हुई थी, जिसका अत्यधिक लाभ कांग्रेस को मिला था. मगर छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद बस्तर में अदद एक जीत के लिए तरह रही कांग्रेस पार्टी अब प्रियंका से इंदिरा जैसी चमत्कार की उम्मीद कर रही है. यही कारण है कि इस चुनाव में प्रियंका गांधी को चुनाव प्रचार करने बुलाने की तैयारी कर रही हैं.

बता दें कि मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने पहले बयान दिया था कि लोकसभा चुनाव में प्रियंका गांधी और राहुल गांधी प्रचार के लिए आएंगे. दोनों का समय अभी तय नहीं ​हुआ है. इसके बाद से उम्मीद जताई जा रही है कि प्रियंका गांधी प्रदेश में दो सभाएं करेंगी. सभाओं की तैयारी भी शुरू कर दी गई है.

लोकसभा चुनाव 2019: इस सीट पर जीत का हैट्रिक लगा पाएगी बीजेपी?

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छत्तीसगढ़ की एक मात्र एससी वर्ग के लिए आरक्षित लोकसभा सीट जांजगीर-चांपा में चुनावी मुकाबला त्रिकोणीय होने की पूरी संभावना है. जांजगीर-चांपा लोकसभा सीट पर भाजपा, कांग्रेस के अलावा बसपा भी अपनी किस्मत अजमा रही है. बसपा, कांग्रेस और बीजेपी सभी ने अपने प्रत्याशियों का इस सीट पर ऐलान कर दिया है. गौरतलब हो कि भाजपा ने दो बार से सांसद रही कमला देवी पाटले को बदलकर जुहाराम अजगले को मैदान में उतार दिया है. वहीं कांग्रेस ने नए चेहरे रविशेखर भाद्वाज और बसपा से दाउराम रत्नाकर मैदान में है. भाजपा ने अपने मौजूदा सांसद कमला देवी पाटले को टिकट न देकर नए चेहरे पर दांव लगाया है.

जांजगीर-चांपा सीट पर भाजपा ने लगातार दो बार अपनी जीत दर्ज की है. लेकिन विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद भाजपा की हैट्रिक आसान नहीं दिख रही है. भाजपा के कब्जे वाली इस संसदीय सीट में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर सबसे ज्यादा रहा है. इसके बाद बसपा-जेसीसीजे और सबसे पीछे भाजपा रही है. यह लोकसभा सीट एससी वर्ग के लिए आरक्षित सूबे की इकलौती सीटों में से है. बावजूद इसके भाजपा इस सीट से जीतने का दावा कर रही है. भाजपा प्रवक्ता सच्चिदानंद उपासने का कहना है कि इस सीट पर त्रिकोणीय संघर्ष की पूरी संभावनाएं है.इसका लाभ बीजेपी को ही मिलेगा.

मध्य प्रदेश में तीन करोड़ की नकदी और पौने तीन करोड़ की शराब जब्त

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भोपाल. चुनाव की आचार संहिता लागू होने के बाद से अब तक प्रदेश में तीन करोड़ रुपए से ज्यादा की अवैध नकदी जब्त हो चुकी है. इसी तरह पौने तीन करोड़ रुपए की शराब, 14 लाख रुपए के मादक पदार्थ और सवा करोड़ रुपए से ज्यादा के वाहन और हथियार भी जब्त किए जा चुके हैं.

मतदाता सूची में नाम जुड़वाने का काम नामांकन दाखिले के अंतिम दिन से दस दिन पहले तक चलेगा. अभी तक नाम जोड़ने, हटाने और संशोधन के लिए सात लाख आवेदन मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय को जिलों के माध्यम से मिले हैं. उधर, चुनाव याचिका की वजह से उलझी 24 विधानसभा क्षेत्रों की ईवीएम और वीवीपैट का इस्तेमाल लोकसभा चुनाव में होगा. हाईकोर्ट ने इसकी इजाजत दे दी है.

मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी वीएल कांताराव ने पत्रकारवार्ता में बताया कि दस मार्च को आचार संहिता लागू होने के साथ ही पूरे प्रदेश में अवैध नकदी, शराब, मादक पदार्थ, वाहन और हथियारों की धरपकड़ का अभियान चल रहा है. एक लाख 17 हजार 215 लीटर अवैध शराब जब्त की गई है.

कुल मिलाकर सात करोड़ 60 लाख रुपए मूल्य की अवैध शराब, नकदी, मादक पदार्थ, वाहन और हथियार जब्त किए जा चुके हैं. मतदाता सूची में नाम जोड़ने का काम हर चरण में नामांकन की अंतिम तारीख से दस दिन पहले तक चलेगा.

अभी तक नाम जोड़ने के लिए 3.64 लाख, हटाने के 71 हजार 875, संशोधन के लिए एक लाख 46 हजार और विधानसभा क्षेत्र में निवास परिवर्तन के लिए 25 हजार 806 आवेदन मिले हैं. एक अप्रैल से सभी जिलों में मतदाता परिचय पत्र उपलब्ध कराने के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा. वहीं, मतदाता जागरुकता के लिए सोशल मीडिया के जरिए साप्ताहिक गतिविधियां चलाई जाएंगी. इसके लिए कैलेंडर का सोमवार को विमोचन किया गया.

राजनीतिक दलों ने 323 शिकायतें की

मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी ने बताया कि एक जनवरी से अभी तक तीन हजार 715 शिकायतें मिली हैं. इनमें से तीन हजार 73 का निराकरण भी हो चुका है. राजनीतिक दलों से 323 शिकायतें मिली थीं, इनमें सिर्फ 57 ही कार्रवाई के लिए बची हैं.

जेट एयरवेज के चेयरमैन नरेश गोयल ने छोड़ा पद

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नई दिल्ली। एयरलाइन कंपनी जेट एयरवेज के चेयरमैन नरेश गोयल ने अपना  पद छोड़ दिया है। उनकी पत्नी अनिता गोयल ने भी बोर्ड से दूरी बना ली है।

बता दें कि जेट एयरवेज का नियंत्रण अभी तक नरेश गोयल के पास था जिनके पास 51 प्रतिशत हिस्सेदारी है। अबुधाबी स्थित एतिहाद एयरवेज के पास 24 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इससे पहले पैसों की कमी की वजह से जेट एयरवेज ने अपने 40 से ज्यादा विमानों को खड़ा कर दिया। बताया जा रहा है कि जेट एयरवेज पर 8,200 करोड़ रुपए का कर्ज है और उसे इसी माह यानी मार्च के अंत तक 1,700 करोड़ रुपए भुगतान करने हैं। नरेश गोयल के त्यागपत्र देने की खबर से जेट एयरवेज के शेयर में 17 फीसदी तक का इजाफा हुआ।

कारोबार के दौरान जेट एयरवेज का शेयर प्राइस 266 रुपए तक पहुंच गया जबकि बाजार बंद होने पर कंपनी का शेयर 254.50 रुपए के भाव पर रहा। जेट एयरवेज के शेयर में इतनी बड़ी बढ़ोतरी करीब दो महीने पहले देखने को मिली थी। जेट एयरवेज के शेयर का 52 हफ्ते का उच्चतम 650.50 रुपये है जबकि न्यूनतम स्तर 163 रुपये है। गौरतलब हो कि गत सप्ताह स्टेट बैंक आफ  इंडिया ने जेट एयरवेज को कर्ज से मुक्ति दिलाने के संकेत दिए थे। बैंक के चेयरमैन रजनीश कुमार ने  कहा था कि जेट एयरवेज को परिचालन में बनाए रखना कर्जदाताओं तथा उपभोक्तओं के हित में है। इस बीच एयरलाइन इंडिगो ने सैलरी संकट से जूझ रहे जेट एयरवेज के 100 पायलटों को नौकरी दी है।

खुफिया एजेंसियों ने दिल्ली, मुंबई और गोवा में जताई आतंकी हमले की आशंका

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नई दिल्ली। खुफिया एजेंसियों ने गोवा, मुंबई और दिल्ली में अलकायदा और आईएस के आतंकियों द्वारा हमले की आशंका जताई है। सूत्रों के अनुसार, खुफिया एजेंसियों ने बताया है कि न्यूजीलैंड हमले का बदला लेने के यह आतंकी हमला हो सकता है। इसे लेकर चार दिनों के अंदर दो इनपुट मिले हैं। इनमें कहा गया है कि भारत में स्थित यहूदी स्थलों को निशाना बनाया जा सकता है।

बताया जा रहा है कि आतंकी हमला करने के लिए गाड़ी या चाकू का इस्तेमाल कर सकते हैं। खुफिया एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि मुंबई में इजरायली दूतावास, महावाणिज्यिक दूतावास और छाबड़ हाऊस की सुरक्षा और निगरानी तत्काल बढ़ाई जाए। पहला इनपुट 20 मार्च को दिया गया था। इसमें कहा गया था कि न्यूजीलैंड में हुए हमले का बदला लेने के लिए आईएस और उससे हमदर्द योजना बना रहे हैं।

यह हमला न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में हुए गोलीबारी में 50 लोगों के मौत का बदला लेने के लिए किया जा सकता है। बताते चलें कि इस हमले को 29 साल के ऑस्ट्रेलियाई मूल के नागरिक ब्रैंटन टैरेंट ने अंजाम दिया था। उसे बाद में गिरफ्तार कर लिया गया था।

बताते चलें कि खुफिया एजेंसियों को कई सूत्रों से ऐसे हमले का इनपुट मिला है, जिसके बाद सुरक्षा बढ़ाने की सिफारिश की गई है। दिल्ली पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि जानकारी मिलने के बाद पूजा स्थलों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

वहीं, 23 मार्च को मिले इनपुट में कहा गया है कि भारत में यहूदी रिहायशी ठिकानों पर अल-कायदा हमले की योजना बना रहा है। एजेंसियों को मिली जानकारी के अनुसार, यह हमला गैर-पारंपरिक हथियारों से किया जाएगा। अकेले हमले में चाकू, कार या ट्रक का इस्तेमाल किया जा सकता है।

Gujarat Elections 2019: गुजरात की सभी 26 सीटों पर चुनाव लड़ेगी BSP, भाजपा-कांग्रेस की बढ़ेगी मुश्किलें

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अहमदाबाद(ब्यूरो)। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करने के बाद अब गुजरात में भी बहुजन समाज पार्टी ने सभी 26 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। बसपा के गुजरात की सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने से भाजपा और कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ना तय हैं। बता दें कि बसपा का दलित वोटबैंक काफी मजबूत है, ऐसे में इन दोनों पार्टियों को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है।

पार्टी सुप्रीमों 17 अप्रैल को गुजरात में आयोजित होने वाली रैली में शामिल होकर कार्यकर्ताओं को संबोधित भी करेंगी। गुजरात में 23 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान होना हैं।

गुजरात में बसपा के प्रभारी रामअचल राजभर ने बताया कि बसपा कार्यकर्ताओं की राय है कि संगठन को और मजबूत बनाने के लिए पार्टी सभी सीटों से अपना प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारे। गुजरात में सभी 26 सीटों पर भाजपा का कब्जा है। यहां 2014 में भी बसपा ने सभी बैठकों पर चुनाव लड़ा था, किन्तु सभी प्रत्याशी हार गये थे।

वहीं 2017 में के विधानसभा चुनाव में भी बसपा ने 138 सीट से अपने प्रत्याशी चुनाव में उतारे थे, लेकिन सभी हार गये थे। हालांकि पार्टी को 2.02 लाख वोट मिले थे, जो कुल वोट का 0.6 प्रतिशत था।