भारत देश में कई बांध बने हुए हैं जो पर्यटकों के लिए भी आकर्षक का केंद्र बनते हैं कई बांध पर दो टूरिस्ट स्पॉट भी बना हुआ है जहां जाकर वहां उन शानदार नजारों का आनंद ले सकते हैं आज हम आपको भारत देश के पांच ऐसे बांध के बारे में बताएंगे जो सबसे खूबसूरत हैं।
Salaulim Dam
Salaulim नदी पर बना बांध काफी आकर्षक है इसका डिजाइन दूसरे बांधों से बहुत ही अलग है आप यहां पर पूरा दिन बिता सकते हैं क्योंकि यह एक टूरिस्ट स्पॉट भी है इस बांध के आसपास के कई झरने और यहां के खूबसूरत नजारे देख कर हर किसी की सांसे थम जाती है.
Sardar Sarovar Dam
गुजरात में नर्मदा नदी पर बना सरदार सरोवर बांध भारत के सबसे बड़े बांधों में से एक है यहां वाहन गुजरात के कई बड़े इलाकों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराता है.
Srisailam Dam
कृष्णा नदी पर बना यह बांध बहुत ही विशाल बांध है यह बांध अब तेलगाना में स्थित है इस बांध के आसपास के पहाड़ी क्षेत्र को देखकर हर कोई मंत्रमुग्ध हो जाता है.
Idukki Dam
केरल में स्थित इस बांध को देखकर आप ऐसा प्रतीत करेंगे जैसे आप विदेश में आ गए हो क्योंकि इस तरह का बांध सिर्फ आप ने विदेशों में ही देखा होगा हालांकि भारत के इस बांध के बारे में बहुत कम व्यक्ति जानते हैं.
Tehri Dam
भागीरथी नदी पर बना यह बांध भारत का सबसे ऊंचा बांध है इस बांध से ही संपूर्ण उत्तराखंड के पानी की आपूर्ति होती है.
बिहार में बेगूसराय लोकसभा सीट से वामपंथी दलों के साझा उम्मीदवार एवं जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके समर्थकों के खिलाफ मारपीट करने के आरोप में बेगूसराय जिले के गढ़पुरा थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई है।
पुलिस के एक अधिकारी ने सोमवार को बताया कि कन्हैया कुमार के समर्थकों और स्थानीय लोगों के एक समूह के बीच रविवार को उस समय झड़प हो गई थी जब कुमार गढ़पुरा खंड के कोराय गांव में रोड शो कर रहे थे। आरोप है कि रोड शो के दौरान यहां काले झंडे दिखाए गए थे, उसके बाद कन्हैया के समर्थकों ने विरोध करने वालों से मारपीट की थी।
गढ़पुरा के थाना प्रभारी प्रतोश कुमार ने बताया कि कोराय गांव निवासी कुमार राहुल के लिखित बयान के आधार पर गढ़पुरा थाने में मारपीट के आरोप में एक प्राथमिकी दर्ज की गई है, जिसमें कन्हैया कुमार समेत 12 लोगों को नामजद आरोपी और 100 अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया है। उन्होंने बताया कि पुलिस पूरे मामले की छानबीन कर रही है।
बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र में कन्हैया कुमार का मुकाबला केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के तनवीर हसन से है।
बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार ने आज एक ट्वीट क्या किया ट्विटरबाजों ने कयासबाजी शुरू कर दी कि वो बीजेपी में शामिल होने जा रहे हैं. जब सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनलों तक ये खबर सामने आग की तरह फैलने लगी तो खुद अक्षय को ट्वीट करके सफाई देनी पड़ी.
सबसे पहले हम बताते हैं कि आखिर अक्षय ने अपने ट्वीट में ऐसा क्या लिख दिया कि लोग ये कयास लगाने लगे.
मैं ऐसा कुछ कर रहा हूं, जो मैंने पहले कभी नहीं किया. मैं उत्साहित और नर्वस दोनों हूं.
इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर अक्षय के फैंस अटकलें लगाने लगे कि वह बीजेपी ज्वाइन कर लोकसभा चुनाव लड़ सकते हैं.
कुछ ट्विटर यूजर्स ने तो यहां तक ऐलान कर दिया कि अक्षय कुमार कहां से चुनाव लड़ेंगे.
4 घंटे में जब कयासबाजी कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगी तो खुद अक्षय कुमार ने ट्वीट कर ये साफ कर दिया कि वो ना तो राजनीति में आ रहे हैं और ना ही चुनाव लड़ने की कोई योजना है.
वैसे अक्षय कुमार के बीजेपी ज्वाइन करने की खबरें अक्सर मीडिया में आती रही हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह हैं अक्षय कुमार की पीएम मोदी से करीबी. अक्षय कई मौकों पर सरकार की कई योजनाओं की तारीफ करते रहे हैं. यहां तक कि उन्होंने ‘टॉयलेट एक प्रेम कथा’ फिल्म भी बनाई. इस फिल्म की खुद पीएम मोदी ने तारीफ की थी.
(पीएम मोदी के साथ अक्षय कुमार )
अक्षय कुमार की चुनाव लड़ने की खबरों के बीच कुछ लोगों ने उनके नागरिकता पर भी सवाल पूछ दिया कि आखिर वो कैसे चुनाव लड़ेंगे. क्योंकि अक्षय कुमार के पास कनाडा की नागरिकता है. वैसे मीडिया में जब भी अक्षय के चुनाव लड़ने की खबर आती है, तो यही सवाल उठना है. लेकिन अक्षय की तरफ से कभी भी उनकी नागरिकता को लेकर कोई बयान नहीं आया.
भाजपा की मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने की रणनीति के परिणाम भयावह होंगे.
मेनका गांधी का भगवा खेमे में होना एक संयोग है. वे संघी संस्कृति में पली-बढ़ी नहीं हैं और 1989 से शुरू करके पहले जनता दल, फिर निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पीलीभीत से (और एकबार आंवला से) जीतकर संसद पहुंचीं.
इस तरह कह सकते हैं कि अपने क्षेत्र में उनका अपना राजनीतिक रसूख है; लेकिन यह भी सच है कि एक निर्दलीय उम्मीदवार इतना ही कर सकता है. इसलिए 2004 में वे भाजपा में शामिल हो गईं और उनका जीत का रिकॉर्ड तब से बरकरार रहा है. 2009 में उनके बेटे वरुण गांधी पीलीभीत से चुनाव लड़े और जीते.
भाजपा अपने लक्ष्यों के प्रति पूर्ण समर्पण की मांग करती है और नए आगंतुकों से केंद्रीय एजेंडे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का प्रदर्शन करने की उम्मीद की जाती है.
दो चुनावों के बीच के समय में मां पशु कल्याण के अपने पसंदीदा शगल के लिए काम करती हैं और बेटा गरीबी पर विद्धतापूर्ण लेख और कविताएं लिखता है. लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान उनसे पार्टी की भाषा बोलने की उम्मीद की जाती है- जिसमें अल्पसंख्यकों को अपशब्द कहना और नेहरू-गांधी परिवार, यानी जिस परिवार से वे आते हैं, उसकी आलोचना करना शामिल है.
ऐसा लगता है कि मेनका और वरुण भाजपा के वफादारी के इम्तिहान को अच्छे अंकों से पास करने की उम्मीद कर रहे थे.
इसलिए 2009 में 29 वर्ष के वरुण गांधी ने अपने निर्वाचन क्षेत्र के मुस्लिमों को धमकी दी कि अगर वे हिंदुओं की ओर उंगली भी उठाएंगे, तो वे उनके हाथ काट देंगे. इस बार उन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में अपने नेता नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करते हुए कहा कि मोदी ने उनके परिवार से बने प्रधानमंत्रियों से भी ज्यादा भारत का सम्मान बढ़ाया है.
दूसरी तरफ उनकी मां ने पार्टी के एजेंडे पर चलते हुए अपने निर्वाचन क्षेत्र के मुसलमानों को कहा है कि अगर वे उन्हें वोट नहीं देते तो उन्हें उनसे मदद की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. खबरों के मुताबिक उन्होंने कहा था, ‘मैं यह चुनाव पहले ही जीत चुकी हूं, इसलिए फैसला आपको करना है.’
उन्नाव में मुस्लिमों के उग्र विरोधी साक्षी महाराज, जिन पर अतीत में हत्या और बलात्कार का आरोप लगा था, कहा कि अगर वे उन्हें वोट नहीं देंगे, तो उन्हें इसका पाप लगेगा.
चुनाव वह समय होता है, जब उम्मीदवार लोगों को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ता और मतदाताओं से हर तरह के वादे करता है. पहले के चुनावों में खुलेआम सांप्रदायिक भाषण देनेवाले नरेंद्र मोदी ने 2014 में अपना स्वर बदलते हुए मुख्य तौर पर भ्रष्टाचार और रोजी-रोटी के मसलों, आर्थिक विकास और रोजगार आदि के बारे बात की थी.
उन्हें यह बात अच्छी तरह से मालूम थी कि मतदाता यूपीए से त्रस्त थे और उन्हें नए विचारों और दृष्टि वाले वास्तविक विकल्प की तलाश थी.
इस बार बदला सुर
इस बार जबकि मोदी ओर उनकी पार्टी के पास आर्थिक विकास के मोर्चे पर दिखाने के लिए कुछ नहीं है और उनकी सरकार क्रोनी-कैपिटलिज़्म के आरोपों से घिरी है, मोदी और उनकी पार्टी ने अपने सुर बदलने का बदलने का फैसला किया है- वे मतदाताओं को उनका समर्थन करने के लिए धमका और डरा रहे हैं.
मतदाताओं को खासकर हिंदुओं में डर भरने के लिए शत्रुओं- वास्तविक या काल्पनिक, देश के भीतर के या बाहर के- को खड़ा किया जा रहा है.
इस बारे में कोई बात नहीं की जा रही है कि अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिए भाजपा सरकार द्वारा क्या किया जाएगा- इसकी जगह पार्टी खुलेआम यह कह रही है कि पार्टी हर तरह के दुश्मनों- तथाकथित बाहरियों से लेकर विरोधियों तक के खिलाफ कठोर नीतियां अपनाएगी.
राजनाथ सिंह- जो मोदी और अमित शाह जैसे कट्टरपंथियों की तुलना में ज्यादा संतुलित माने जाते हैं- ने ऐलान किया है कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में वापस आती है, तो वह राजद्रोह कानून को इतना सख्त बनाएगी कि ‘उनकी रूह कांप जाएगी’.
यहां ‘उनके’ या ‘वे’ से मतलब हर तरह के ‘देशद्रोहियों’ से है. इसके भीतर वे सब आ सकते हैं, जो कठिन सवाल पूछते हैं या सरकार के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करते हैं.
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यह खुलकर कहा है कि अगर उनकी पार्टी जीतती है, तो ‘बौद्ध, हिंदू और सिख’ के अलावा हर घुसपैठिए को देश से निकाल बाहर किया जाएगा. इसका अर्थ यह निकलता है कि किसी मुस्लिम शरणार्थी को देश में घुसने नहीं दिया जाएगा. लेकिन यह उनके बयान की उदार व्याख्या होगी. इसका असली अर्थ स्पष्ट है: मुसलमानों (और ईसाइयों) को यह पता होना चाहिए कि वे तब तक संदेह के घेरे में आएंगे, जब तक वे खुद को इसके विपरीत साबित न कर दें.
और अगर उन्हें भारत में रहने की इजाजत दे भी दी जाती है, तो इसके लिए उन्हें काफी कुछ सहना होगा. यह विचार मुसलमानों और ईसाइयों को भारत का मूलनिवासी नहीं मानता और उन्हें किसी बाहरी शक्ति के प्रति वफादार मानता है. यह भाजपा और संघ परिवार का पुराना बुनियादी सिद्धांत रहा है, लेकिन अब इसकी घोषणा खुले तौर पर की जा रही है.
नागरिकता (संशोधन) विधेयक ने उत्तर-पूर्व में तूफान खड़ा कर दिया है, लेकिन इससे तौबा करने की जगह, भले चुनाव के दौरान ऐसा रणनीतिक तौर पर ही किया जाता, भाजपा ने उन सबको चुन-चुनकर देश से बाहर निकालने की अपनी योजना को आगे बढ़ाने का ही काम किया है, जिन्हें वह विदेशी मानती है.
यह सोचना कि इससे हिंदू वोटों को लामबंद करने में मदद मिल सकती है, इस आक्रामकता की अधूरी व्याख्या होगी. भाजपा पूरी शिद्दत के साथ इस बात में यकीन करती है कि हिंदू ही भारत के एकमात्र असली वारिस और नागरिक हैं और बाकी किसी न किसी तरह से भारत में अनाधिकार प्रवेश करने वाले हैं.
पार्टी के भीतर कुछ लोग यह भी मानते हैं कि मोदी सरकार ने कुछ ज्यादा ही देर कर दी और उन्हें इस विधेयक को शुरू में ही लाना चाहिए था, जब इसे कहीं ज्यादा समर्थन और प्रेम हासिल था. ऐसा होता, तो अब तक यह पारित भी हो चुका होता.
पुराने हथकंडों पर भरोसा
भाजपा ने पिछले दिनों चुनाव के लिए जिन भी रणनीतियों को आजमाया, उनमें से कई लोगों के बीच उम्मीद के मुताबिक लोकप्रिय नहीं हो सके- पुलवामा और बालाकोट के सहारे राष्ट्रवाद का उफान लाने की कोशिश पर तुरंत पानी फिर गया.
राज्य स्तरीय गठबंधन भाजपा के सामने असली चुनौती पेश कर रहे हैं. अब भाजपा अपने आजमाए हुए हथकंडों- मुसलमानों को अलग-थलग करके हिंदू ध्रुवीकरण करने और नेहरू-गांधी परिवार की नाकामियों के पुराने और थके हुए घोड़े पर चाबुक बरसाने- को फिर से आजमा रही है.
गांधी परिवार पर हमला बोलना भाजपा को भी सवालों के कठघरे में खड़ा कर देता है, क्योंकि भाजपा में खुद वंशवादियों की कमी नहीं है. लेकिन गांधी परिवार के अपराधों और गलतियों की लंबी फेहरिस्त अपने वफादारों तक पहुंचने में हमेशा मददगार साबित होती है.
यह हथकंडा अपने समर्पित भक्तों के अलावा बाकियों को कितना प्रभावित कर पाता है और क्या यह संकटों का सामना कर रहे किसानों, मुसीबत झेल रहे छोटे कारोबारियों और बेरोजगार स्नातकों को दिलासा दे पाने के लिए काफी हो पाएगा, यह देखने की बात है.
पार्टी द्वारा उठाए जानेवाले मुद्दे अब थके हुए और मुरझाए से लगने लगे हैं और उनमें कुछ भी नयापन नहीं है. लेकिन खुली धमकियां निश्चित तौर पर एक अब तक अनदेखी-अनसुनी थीं. अतीत में राजनेताओं ने कभी भी इतने प्रत्यक्ष तौर पर अपने नागरिकों को चेतावनी नहीं दी थी. काल्पनिक दानव खड़ा करना एक आजमाई हुई राजनीतिक रणनीति है और यह अक्सर कामयाब भी होती है.
दरार गहरी करने की राजनीति
लेकिन भाजपा की मौजूदा रणनीति, जो हिटलर द्वारा यहूदियों, स्तंभकारों और जर्मनी की बहुसंख्यकवादी लोकशाही के लिए अन्य आंतरिक चुनौतियों के सतत दमन की याद दिलाती है, हमारे राजनीतिक शब्दकोश में शामिल हुई एक डरावनी चीज है.
इससे समाज का एक बड़ा तबका अलग-थलग होगा और इसकी आखिरी नतीजा चाहे जो कुछ भी हो, यह देश के नागरिकों के बीच धर्म के आधार पर एक गहरी दरार पैदा करेगा.
मुसलमानों और अन्यों को संदेह की निगाहों से भारत में बाहरी के तौर पर और देश के प्रति शत्रुता भाव रखनेवाले के तौर पर देखा जाएगा. यह संदेह कई रूपों में खुद को प्रकट करेगा- कभी हिंसक तरीके से तो कभी निगरानी के तौर पर. मजबूत जवाबी आवाज की गैर-मौजूदगो में, नागरिकों की समानता के विचार के पक्ष में बोलनेवाला कोई नहीं मिलेगा.
दूसरे, ज्यादा गंभीर पार्टियों को इस दानव का मुकाबला पूरी ताकत के साथ करने की जरूरत है. कांग्रेस ने कहा है कि वह राजद्रोह के ब्रिटिश कालीन कानून को समाप्त करेगी, जो काबिले तारीफ है, लेकिन उसे इससे ज्यादा करने की जरूरत है.
यह चुनाव गुजर जाएगा, लेकिन भाजपा ने भारतीय नागरिकों के प्रति जिस नफरत को भड़काया है, वह जल्दी समाप्त नहीं होगी. इस चुनाव को जीतने के लिए भाजपा ने एक ऐसा दानव छोड़ दिया है, जो हमारे बीच लंबे समय तक रहेगा.
वसायुक्त यकृत फैटी लीवर ) एक ऐसा विकार है जो वसा के बहुत ज्यादा बनने के कारण होता है, जिससे यकृत यानी आपके जिगर का क्षय हो सकता है। वर्ष 2019-2018 की तुलना में इस साल गैर-अल्कोहल फैटी लीवर रोग एनएएफएलडी) के मामलों में वृद्धि हुई है। हालांकि, अभी तक कोई निश्चित आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि वे हर महीने कम से कम 10 से 12 नए मामले देख रहे हैं जो हर आयु वर्ग के हैं।
सभी प्रकार के एनएएफएलडी घातक नहीं हैं, लेकिन इनकी अनदेखी आगे चलकर परेशानी का सबब बन सकती है। एक बार पता लगने के बाद, रोगी को यह जानने के लिए आगे के परीक्षणों से गुजरना होता है कि जिगर में जख्म या सूजन तो नहीं है। जिगर की सूजन के लगभग 20 प्रतिशत मामलों में सिरोसिस विकसित होने की संभावना होती है। इसे एक ‘मौन हत्यारे’ के रूप में जाना जाता है। जब तक स्थति में प्रगति न हो, तब तक लक्षणों की स्पष्ट कमी होती है।
हेल्थ केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया एचसीएफआई) के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ.के.के. अग्रवाल का कहना है कि एनएएफएलडी में यकृत की अनेक दशाओं को शामिल माना जाता है, जो ऐसे लोगों को प्रभावित करती हैं जो शराब नहीं पीते हैं। जैसा कि नाम से पता चलता है, इस स्थिति की मुख्य विशेषता यकृत कोशिकाओं में बहुत अधिक वसा का जमा होना है। एक स्वस्थ जिगर में कम या बिल्कुल भी वसा नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा, “एनएएफएलडी की मुख्य जटिलता सिरोसिस है, जो यकृत में देर से पड़ने वाले निशान फाइब्रोसिस) हैं। सिरोसिस यकृत की चोट की प्रतिक्रिया में होता है, जैसे कि नॉनक्लॉजिक स्टीटोहेपेटाइटिस में जिगर सूजन को रोकने की कोशिश करता है, और इसके लिए यह स्कारिंग क्षेत्रों फाइब्रोसिस) को उत्पन्न करता है। निरंतर सूजन के साथ, फाइब्रोसिस अधिक से अधिक यकृत ऊतक ग्रहण करने के लिए फैलता है।”
डॉ. अग्रवाल ने कहा कि इस स्थिति के कुछ संकेतों और लक्षणों में बढ़ा हुआ जिगर, थकान और ऊपरी दाएं पेट में दर्द शामिल हैं। जब यह सिरोसिस की ओर बढ़ता है, तो यह जलोदर, बढ़ी हुई वाहिकाओं, तिल्ली, लाल हथेलियों और पीलिया का कारण बन सकता है।
उन्होंने कहा, “एनएएफएलडी वाले लोगों में हृदय रोग विकसित होने की अधिक संभावना रहती है और यह उनमें मृत्यु के सबसे आम कारणों में से एक है। वजन में लगभग 10 प्रतिशत की कमी लाने से वसायुक्त यकृत और सूजन में सुधार हो सकता है।”
कुछ अध्ययनों के अनुसार, दालचीनी अपने एंटीऑक्सिडेंट और इंसुलिन-सेंसिटाइजर गुणों के कारण लिपिड प्रोफाइल और एनएएफएलडी को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।
डॉ. अग्रवाल के कुछ सुझाव
फलों, सब्जियों, साबुत अनाज और स्वस्थ वसा से भरपूर वनस्पति आधारित आहार का सेवन करें।
यदि आप अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त हैं, तो प्रत्येक दिन खाने वाली कैलोरी की संख्या कम करें और अधिक व्यायाम करें। यदि आपका स्वस्थ वजन है, तो स्वस्थ आहार का चयन करके और व्यायाम करके इसे बनाए रखने के लिए काम करें।
सप्ताह के अधिकांश दिनों में व्यायाम करें। हर दिन कम से कम 30 मिनट की शारीरिक गतिविधि करने की कोशिश करें।
मध्य प्रदेश के इंदौर लोकसभा सीट पर बीजेपी ने प्रत्याशी घोषित कर दिया है. ताई और भाई की रस्सा-कशी के बीच पार्टी ने सांई पर विश्वास जताया है. बीजेपी ने इंदौर लोकसभा सीट से सांई यानि शंकर लालवानी को उम्मीदवार बनाया है. जिसके बाद ये नारा उछल पड़ा है कि ‘न ताई न भाई इंदौर से सांई’.
बीजेपी लम्बी जद्दोजहद के बाद इंदौर सीट से शंकर लालवानी का नाम तय कर पाई. टिकट मिलने के बाद शंकर लालवानी सुमित्रा महाजन के घर पहुंचे और उनका आशीर्वाद लिया. सुमित्रा महाजन इंदौर सीट से पिछली आठ लोकसभा चुनाव लगातार जीतती आ रही हैं. लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने इस बार चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया था. इसके बाद यहां मुख्य दावेदार भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को माना जा रहा है था. लेकिन उन्होंने भी चुनाव में उतरने से इंकार कर दिया था.
शंकर लालवानी को पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान का करीबी माना जाता है. साथ ही सुमित्रा महाजन के भी वे करीबी हैं. वे इंदौर विकास प्राधिकरण के अध्यक्ष रहने के साथ ही शहर भाजपा अध्यक्ष भी रह चुके हैं. लालवानी की उम्मीदवारी के बाद सुमित्रा महाजन ने कहा कि हम सब उनके साथ हैं और चुनाव जीतकर दिखाएंगे. वहीं शंकर लालवानी ने कहा कि शहर की आवश्यकता को ध्यान में रखकर जनप्रतिनिधियों, वरिष्ठजनों और प्रबुद्धजनों के साथ मास्टर प्लान बनाकर इंदौर को देश का नंबर वन शहर बनाना हमारा लक्ष्य .है सिंधी वोटर्स की दम पर टिकट के सवाल पर लालवानी ने कहा कि बीजेपी जाति देखकर टिकट नहीं देती.
भोपाल सीट पर दिग्विजय सिंह को जिताने के लिए एकजुट कांग्रेस के जवाब में बीजेपी बिखरी दिख रही है. बीजेपी प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर का प्रचार अभियान ठंडा पड़ा हुआ है. यही वजह है कि अब उनके पक्ष में माहौल बनाने के लिए खुद शिवराज सिंह चौहान ने कमान संभाल ली है.शिवराज ने भोपाल सीट के सभी विधायक, सांसद और पार्टी नेताओं की बैठक बुलाई है. इसमें प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव कैंपेन पर चर्चा होगी. प्रज्ञा सिंह ठाकुर मंगलवार को नामांकन दाखिल करने वाली हैं.
दिग्विजय सिंह के समर्थन में मोर्चा संभालेंगे ये नेता
सीहोर- मंत्री जयवर्धन सिंह, सुरेंद्र सिंह ठाकुर
बैरसिया- पूर्व सांसद सुरेंद्र सिंह,जोधाराम गुर्जर
हुजूर- अवनीश भार्गव, नरेश ज्ञानचंदानी
भोपाल उत्तर- मंत्री आरिफ अकील
नरेला- कैलाश मिश्रा, सुनील सूद, महेंद्र सिंह चौहान
भोपाल मध्य- विधायक आरिफ मसूद
भोपाल दक्षिण- मंत्री पीसी शर्मा
गोविंदपुरा- राजकुमार, विभा पटेल
प्रज्ञा सिंह ठाकुर के पक्ष में प्रचार करने वाले चेहरे
सीहोर- विधायक सुदेश राय
हुजूर- विधायक रामेश्वर शर्मा
भोपाल उत्तर-आलोक शर्मा
नरेला- विधायक विश्वास सारंग
भोपाल मध्य-सुरेंद्र नाथ सिंह
दक्षिण- उमाशंकर गुप्ता
बैरसिया- विधायक विष्णु खत्री
और अब खुद शिवराज सिंह चौहान मोर्चा संभाल रहे है,
शिवराज सिंह चौहान ने आज भोपाल में बीजेपी दफ़्तर में पार्टी विधायकों-सांसदों सहित नेताओं और कार्यकर्ताओं की बैठक बुलायी है. इसमें प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव कैंपेन की रणनीति तय होगी. लेकिन उससे पहले मंगलवार को वो नामांकन दाखिल करने वाली हैं. इसलिए नामांकन के दौरान पार्टी क्या स्ट्रेटजी अपनाएगी इस पर विचार किया जाएगा.
चरखी दादरी जिले के कई गांवों के किसानों व प्रचायत प्रतिनिधियों ने एकजुट होकर फैसला लिया है कि उनकी मांगे पूरी नहीं होने पर राज्य सरकार के प्रतिनिधियों व भाजपा नेताओं का विरोध किया जाएगा. किसान पंचायत ने यह भी फैसला लिया है कि सरकारी प्रतिनिधियों और बीजेपी नेताओं को गांवों में नहीं घुसने दिया जाएगा. किसान पंचायत के प्रतिनिधियों ने कहा कि हमलोगों ने सरकार को एक सप्ताह का अल्टीमेटम दिया है. महापंचायत में जिले के 17 गांवों के किसानों को मुआवजा राशि बढ़ोतरी सहित कई अहम मुद्दों पर चर्चा की गई. गांव मकड़ाना में जिले के कई गांवों के किसान व ग्रामीणों की महापंचायत सरपंच प्रतिनिधि सुरेश कुमार की अध्यक्षता में आयोजित की गई. मंदिर परिसर में आयोजित किसान महापंचायत में कई अहम फैसले लिए गए.
पंचायत में यह निर्णय लिया गया कि जिले के 17 गांवों के किसानों की जमीन अधिग्रहण का प्रति एकड़ दो करोड़ मुआवजा नहीं मिलने पर सरकार व सरकार के प्रतिनिधियों का विरोध करेंगे और उनको गांवों में नहीं घुसने देंगे. इसके अलावा उन्होंने बताया कि उनके क्षेत्र में बिजली-पानी की समुचित व्यवस्था नहीं होने से काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि उनको मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाए.
किसान पंचायत में पहुंचे पंचायत प्रतिनिधियों ने बताया कि क्षेत्र के किसान व ग्रामीण एकजुट हैं और अपनी मांगों को पूरा करवाने के लिए आर-पार की लड़ाई लड़ेंगे. उन्होंने कहा कि लंबे समय से किसानों द्वारा धरना देने के बावजूद उनकी मांगें नहीं सुनी गई है, इसलिए जमीन अधिग्रहण से प्रभावित जिले के सभी 17 गांव सरकार का विरोध जारी रखेंगें.
किसान पंचायत की अध्यक्षता कर रहे सरपंच प्रतिनिधि सुरेश कुमार ने बताया कि पंचायत में किसानों व ग्रामीणों ने एकजुट होकर फैसला लिया है. सरकार या तो उनकी मांगें पूरी करें अन्यथा एक सप्ताह बाद सरकार के प्रतिनिधियों व भाजपा नेताओं का गांवों में घुसने पर रोकते हुए विरोध करेंगे.
आभासी राजनीतिक क्रांति के गवाह छत्तीसगढ़ ने लोकसभा चुनाव के महाभारत में बहुत अधिक ध्यान आकर्षित नहीं किया है. भाजपा ने अपने सभी 10 मौजूदा लोकसभा सांसदों को दरकिनार कर दिया और पार्टी महासचिव सरोज पांडे को टिकट से वंचित कर दिया. यहां तक कि भाजपा ने तीन बार मुख्यमंत्री रहे रमन सिंह के मौजूदा सांसद पुत्र अभिषेक सिंह को भी टिकट देने से इनकार कर दिया.
यह पार्टी महासचिव अनिल जैन और राज्य के वरिष्ठ नेता पवन सहाय के नेतृत्व में ‘नई भाजपा’ का उदय था. पार्टी के कद्दावर नेता रमेश बैंस को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. हकीकत में उनमें से किसी ने भी टिकट से इनकार नहीं किया और उन्हें पार्टी के लिए प्रचार करने के लिए कहा गया है. इसके पीछे वजह यह थी कि कांग्रेस ने भी सभी 11 लोकसभा क्षेत्रों में नए चेहरों को उतारा है. यह मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और पार्टी महासचिव पी. एल. पुनिया की अगुवाई में ‘नई कांग्रेस’ का उदय था, जिसने राज्य में चुपचाप पार्टी का चेहरा बदल दिया.
‘नई भाजपा’ और ‘नई कांग्रेस’ के जंग में भाजपा के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मा को छोड़कर छोड़कर राज्य में कोई शक्तिशाली नेता नहीं है. ज्वार तब तक भाजपा के खिलाफ है, जब तक कि प्रधानमंत्री मोदी की लहर इसकी दिशा नहीं बदल देती. राज्य में बाकी सात लोकसभा सीटों के लिए 23 अप्रैल को वोटिंग होगी. हकीकत में छत्तीसगढ़ शायद एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां कांग्रेस आलाकमान ने उम्मीदवारों के चयन और प्रचार अभियान की रणनीति के लिए खुली छूट दी.
दो दशकों के बाद छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की 2018 के विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत के बाद ऐसा किया गया. वहां पार्टी ने 90 सदस्यीय विधानसभा में 68 सीटें जीतीं और 43 प्रतिशत वोट हासिल की. वहीं, भाजपा को 15 सीटें और 33 प्रतिशत वोट लेकर करारी हार का सामना करना पड़ा. यदि भाजपा लोकसभा की 10सीटों को बरकरार रखना चाहती है, तो उसे ‘नई कांग्रेस’ के साथ कड़ी जंग लड़नी होगी, लेकिन पार्टी के लिए कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है. उदाहरण के लिए अजीत जोगी जो कांग्रेस के वोट बैंक में भाजपा के लिए मुख्य आधार थे, वे पूरी तरह से दृश्य से हट गए हैं.
यहां तक कि उनके बेटे अमित जोगी भी कहीं नहीं दिख रहे हैं. उनकी पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जेसीसी) के कार्यकर्ता लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए काम कर रहे हैं. जेसीसी को विधानसभा चुनाव में 7.6 प्रतिशत वोट मिले थे. उनकी वापसी से कांग्रेस को फायदा मिलेगा. क्षेत्रीय पार्टी जीजीपी जो पहले कांग्रेस के वोट में सेंधमारी करती थी, उसने भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए राजनांदगांव से अपने उम्मीदवार को उतारा है.
राजनांदगांव रमन सिंह परिवार की पारंपरिक सीट रही है. भूपेश बघेल सरकार ने वादा के मुताबिक 80 लाख टन धान की खरीद की है. राज्य की अर्थव्यवस्था इस पर पर आधारित है. इससे उन्हें वोट पाने में मदद मिलेगी. बसपा ने लोकसभा की सभी 11 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं. वैसे, पिछले कई चुनावों में पार्टी को महज 2 से 3 प्रतिशत वोट ही मिले. एक अन्य महत्वपूर्ण कारक यह था कि नक्सलियों ने आदिवासियों को स्वतंत्र रूप से मतदान करने की अनुमति दी थी. यही कारण था कि इस बार बस्तर में सर्वाधित 66 प्रतिशत वोटिंग हुई.
अबू धाबी में पहले हिंदू मंदिर की आधारशिला रखने के लिए भूमि पूजन समारोह पूरा हो चुका है. ये समारोह काफी धूमधाम से हुआ, जिसमें बीएपीएस स्वामिनारायण संस्था के शीर्ष लोग मौजूद थे. साथ ही संयुक्त अरब अमीरात के कई मंत्रियों ने भी इस समारोह में शिरकत की
मंदिर की आधारशिला भारत से ले जाए गए गुलाबी पत्थरों से रखी गई है. ये राजस्थान से अबूधाबी भेजे गए थे. ये मंदिर 2020 तक पूरा होगा. इसमें मंदिर के साथ भारतीय संस्कृति की भव्य गैलरीज़ भी होंगी.
कैसा होगा ये मंदिर
ये कुल 55,000 स्क्वायर मीटर या 14 एकड़ में बनेगा. ये अपने आप में काफी अनूठा होगा. इसमें प्रार्थना हॉल के अलावा आगंतुक हाल, भारतीय संस्कृति को दिखाने वाली गैलरीज, बच्चों के लिए खेलने की जगह, फूड कोर्ट, गार्डन के साथ किताबों व गिफ्ट की दुकानें होंगी.
कितने स्तंभ होंगे
इस मंदिर में कुल सात मुख्य स्तंभ होंगे. दुबई में दो हिंदू मंदिर हैं. अब तक अबू धाबी में रहने वाले लोगों को दर्शन करने के लिए दुबई जाना पड़ता था. इस मंदिर के निर्माण के बाद ऐसी समस्या खत्म हो जायेगी.
अबू धाबी में पहले हिंदू मंदिर की आधारशिला पूजन का कार्यक्रम
पत्थरों को कहां तराशा जाएगा
मंदिर का निर्माण स्वामिनारायण संस्थान की देख-रेख में भारतीय शिल्पकार कर रहे हैं. मंदिर का निर्माण 2020 में पूरा हो जाने की उम्मीद है. इस मंदिर मे लगने वाले पत्थरों को भारत में ही अलग-अलग डिज़ाइनों में काटा जायेगा और बाद में इसे यूएई में ही एक-दूसरे से जोड़कर मंदिर का निर्माण किया जायेगा.
2000 कारीगर
इसके लिए भारत में 2000 कारीगर लगातार इसके पत्थरों को तराशेंगे. जिस पिंक सैंडस्टोन का इस्तेमाल इसे बनाने में किया जा रहा है, जयपुर का हवामहल भी उन्हीं पत्थरों से तैयार हुआ है.
क्या है पत्थर की खासियत
बताया जा रहा है कि ये पत्थर 50 डिग्री सेंटीग्रेड में भी गरम नहीं होते हैं और इनमें भीषण गर्मी को झेलने की क्षमता होती है. ये पत्थर राजस्थान में ही मिलते हैं
अबूधाबी से कितनी दूर
दुबई-अबू धाबी हाइवे पर बनने वाला यह अबू धाबी का पहला पत्थर से निर्मित मंदिर होगा. ये अबू धाबी से 30 मिनट की दूरी पर है. न सिर्फ अबू धाबी में बल्कि पश्चिमी एशिया में पत्थरों से बनने वाला यह पहला मंदिर होगा.
बनने के बाद ऐसा होगा अबू धाबी का स्वामिनारायण मंदिर
यूएई में कितने भारतीय
यूएई में करीब 30 लाख भारतीय रहते हैं. जब 2015 में प्रधानमंत्री अबू धाबी गए थे, उस समय मंदिर को ज़मीन देने का वादा किया गया था. इस मंदिर के निर्माण की वजह से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान होगा व द्विक्षीय रिश्ते मजबूत होंगे.
यूएई में कितने धार्मिक स्थान
यूएई में सैकड़ों मस्जिदों के अलावा 40 चर्च, दो गुरुद्वारे और दो मंदिर है.ये दोनों मंदिर यूएई में हैं