Home Blog Page 77

क्या है खेत बचाओ अभियान, जिसे 1 से 30 जून देशभर में चलाने जा रही सरकार?

0

देश की खेती-किसानी को एक नया मोड़ देने के लिए केंद्र सरकार ने इस साल जून के महीने में एक बेहद खास और बड़ा कदम उठाया है. केंद्रीय कृषि मंत्रालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की देखरेख में 1 जून से 30 जून 2026 तक पूरे देश में खेत बचाओ अभियान चलाया जा रहा है. इस राष्ट्रव्यापी मुहिम की शुरुआत खुद केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के रामसिया गांव से की है.

लगातार बढ़ते केमिकल्स और कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से हमारी उपजाऊ जमीन की सेहत लगातार खराब हो रही है. इसी संकट को भांपते हुए सरकार ने इस महीने गांव-गांव और पंचायत स्तर पर जाकर मिट्टी को बचाने का यह बीड़ा उठाया है. आइए जानते हैं कि आखिर यह अभियान क्या है और इससे हमारे किसान भाइयों को क्या बड़े फायदे होने वाले हैं.

मिट्टी की सेहत सुधारना और लागत घटाना है लक्ष्य

इस अभियान का सबसे बड़ा और मुख्य उद्देश्य मिट्टी की घटती उपजाऊ शक्ति को बचाना और खेती में लगने वाली भारी-भरकम लागत को कम करना है. आज के समय में ज्यादा पैदावार के चक्कर में खेतों में यूरिया और अन्य रासायनिक खादों का इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा होने लगा है. इससे जमीन के अंदर मौजूद फायदेमंद मित्र कीट और बैक्टीरिया खत्म हो रहे हैं.

इस अभियान के तहत कृषि वैज्ञानिकों और अधिकारियों की 1600 से ज्यादा टीमें सीधे गांवों में जाकर किसानों से संवाद कर रही हैं. किसानों को सॉइल हेल्थ कार्ड यानी मृदा परीक्षण के आधार पर ही संतुलित मात्रा में खाद डालने की सलाह दी जा रही है. जब किसान जरूरत के हिसाब से सही मात्रा में खाद डालेंगे तो उनकी जेब का खर्च बचेगा और जमीन की ताकत भी लंबे समय तक बनी रहेगी.

जैविक खेती को बढ़ावा

मिट्टी सुधारने के साथ-साथ यह अभियान किसानों को बदलते मौसम के हिसाब से स्मार्ट फार्मिंग करने के तौर-तरीके भी सिखा रहा है. अभियान के दौरान किसानों को भारी रसायनों की जगह ट्राइकोडरमा और वर्टिसिलियम जैसे जैविक इनपुट्स और हरी खाद का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है.

जल संरक्षण और आधुनिक तकनीकों पर जोर

इसके अलावा गिरते भूजल स्तर को देखते हुए ड्रिप इरिगेशन, स्प्रिंकलर सिंचाई और पर ड्रॉप मोर क्रॉप जैसी आधुनिक जल संरक्षण तकनीकों की लाइव ट्रेनिंग दी जा रही है. तो इसके साथ ही गांवों में एक पेड़ मां के नाम थीम के तहत बड़े स्तर पर पौधे भी लगाए जा रहे हैं.

इस अभियान के जरिए सरकार का पूरा फोकस इस बात पर है कि किसानों को नकली खाद-बीज से बचाया जाए कृषि मशीनों पर मिलने वाली सब्सिडी की जानकारी सीधे उन तक पहुंचे और भारतीय खेती को पूरी तरह टिकाऊ और मुनाफेदार बनाया जा सके.

Polymer Currency: भारत में प्लास्टिक नोट लाने की तैयारी में RBI, गवर्नर संजय मल्होत्रा का बड़ा बयान…

0

बढ़ती करेंसी की मांग के बीच आरबीआई पॉलीमर करेंसी यानी प्लास्टिक के नोट लाने की तैयारी में है. इसे लेकर गर्वनर ने ऐलान भी किया है. यहां से आप इसके बारे में विस्तार से जान सकते हैं.

आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने घोषणा की है कि भारतीय रिजर्व बैंक देश में पॉलीमर के करेंसी नोट लाने के प्रस्ताव पर विचार कर रहा है. माल्होत्रा ​​ने कहा कि यह प्रस्ताव फिलहाल प्रारंभिक चरण में है. बता दें कि पहले भी प्लास्टिक के नोट लाने की कोशिश की गई थी, लेकिन तब ये प्रयास सफल नहीं हुआ था.

साल 2012 में क्यों हुआ फेल?

बता दें कि भारत ने फरवरी, 2012 में भी 5 शहरों (कोच्चि, मैसूर, जयपुर, भुवनेश्वर और शिमला) में प्लास्टिक के 10 रुपये के नोट का टेस्ट किया था. लेकिन एटीएम और मशीन की वजह से काफी परेशानी हुई, तो इसे नहीं रोकना पड़ गया.

पॉलीमर करेंसी क्या है?
पॉलीमर करेंसी, पॉलीमर बैंकनोट कपास के बजाय पलते, लचीले प्लास्टिक सबस्ट्रेट से बनाए जाते हैं. ये नोट Bi-axially Oriented Polypropylene (BOPP) से बनते हैं. पॉलीमर नोट कार्ड जैसे हार्ड नहीं होते हैं, इसलिए इन्हें कागज के नोट जैसे मोड़ा भी जा सकता है.

पॉलीमर करेंसी की खासियत क्या है?

पेपर करेंसी के उलट पॉलीमर या प्‍लास्टिक नोट ज्‍यादा टिकाऊ होते हैं.

पॉलीमर करेंसी पर गंदगी और नमी का असर कम होता है.

पॉलीमर करेंसी की ज्‍यादा लंबी उम्र की वजह से बार-बार नोट छापने की जरूरत कम हो जाती है.

किन देशों में पहले से चल रहे हैं प्लास्टिक के नोट?
भारत में इस करेंसी का आना कोई नई बात नहीं होगी. ऑस्ट्रेलिया ने सबसे पहले पॉलीमर करेंसी का इस्तेमाल किया था. इसके बाद कनाडा, ब्रिटेन, सिंगापुर, मलेशिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया और रोमानिया में भी पॉलीमर करेंसी यूज होने लगीं.

राज्यसभा में NDA की नजर दो-तिहाई बहुमत पर, 24 सीटों से कितना बदलेगा समीकरण, किसकी बढ़ेगी ताकत?

0

18 जून को 10 राज्यों की 24 राज्यसभा सीटों पर चुनाव होने जा रहे हैं, जिनके नतीजे उसी दिन आने की संभावना है.यह चुनाव एनडीए के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है

देश के 10 राज्यों की 24 राज्यसभा सीटों के लिए 18 जून को मतदान होगा. संभावना है कि वोटिंग के बाद उसी दिन चुनाव परिणाम भी घोषित कर दिए जाएंगे. यह चुनाव केंद्र में सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. मौजूदा आंकड़ों के अनुसार एनडीए राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े से अभी 15 सांसद दूर है. ऐसे में सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि भारतीय जनता पार्टी और उसके सहयोगी दल इस चुनाव में कितनी सीटें अपने नाम कर पाते हैं.

राज्यसभा में क्या है मौजूदा गणित?

245 सदस्यीय राज्यसभा में इस समय एनडीए के पास कुल 148 सांसद हैं. इनमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी भारतीय जनता पार्टी की है, जिसके 113 सदस्य उच्च सदन में मौजूद हैं. दो-तिहाई बहुमत के लिए एनडीए को अभी 15 और सांसदों की जरूरत है. किसी भी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत महत्वपूर्ण माना जाता है. हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस चुनाव के बाद भी एनडीए का दो-तिहाई बहुमत तक पहुंचना आसान नहीं होगा, लेकिन कई राज्यों में उसकी स्थिति मजबूत हो सकती है.

किन राज्यों में हो रहे हैं चुनाव?

इस बार आंध्र प्रदेश और गुजरात की 4-4 सीटों पर चुनाव होंगे. वहीं मध्य प्रदेश और राजस्थान में 3-3 सीटों पर मतदान कराया जाएगा. इसके अलावा मणिपुर और मेघालय में 1-1 सीट, झारखंड में 2 सीट, अरुणाचल प्रदेश में 1 सीट, कर्नाटक में 4 सीट और मिजोरम में 1 सीट पर चुनाव होगा. साथ ही राज्यसभा की 2 सीटों पर उपचुनाव भी कराए जाएंगे.

कर्नाटक में मुकाबला दिलचस्प

कर्नाटक में राज्यसभा की चार सीटों पर चुनाव होना है. मौजूदा राजनीतिक समीकरणों के अनुसार एनडीए के खाते में एक सीट जाना लगभग तय माना जा रहा है. वहीं कांग्रेस दो सीटों पर जीत दर्ज कर सकती है. चौथी सीट को लेकर मुकाबला रोचक माना जा रहा है और इसका फैसला विधायकों के मतदान के रुख पर निर्भर करेगा.

आंध्र प्रदेश में एनडीए की मजबूत स्थिति

आंध्र प्रदेश की 175 सदस्यीय विधानसभा में तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के पास 135 विधायक हैं. जन सेना पार्टी के 21 विधायक हैं, जबकि भाजपा के पास 8 विधायक हैं. दूसरी ओर वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के पास 11 विधायक हैं. इस प्रकार एनडीए के पास कुल 164 विधायकों का समर्थन है. ऐसे में माना जा रहा है कि गठबंधन राज्यसभा की सभी चार सीटों पर जीत दर्ज कर सकता है.

गुजरात में भाजपा को सभी सीटों की उम्मीद

गुजरात विधानसभा में कुल 182 सदस्य हैं. इनमें भाजपा के पास 161 विधायकों का मजबूत बहुमत है. इस संख्या बल के आधार पर भाजपा को राज्यसभा की चारों सीटों पर जीत मिलने की पूरी उम्मीद है. पार्टी के लिए यहां मुकाबला काफी आसान माना जा रहा है.

राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस के बीच बंट सकता है समीकरण

राजस्थान विधानसभा में कुल 200 सदस्य हैं. भाजपा के पास 115 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के खाते में 69 विधायक हैं. मौजूदा संख्या बल के आधार पर माना जा रहा है कि भाजपा दो सीटें जीत सकती है, जबकि एक सीट कांग्रेस के खाते में जा सकती है.

मध्य प्रदेश में भी भाजपा को बढ़त

मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव के नतीजे भी काफी हद तक स्पष्ट नजर आ रहे हैं. विधानसभा में भाजपा के मजबूत संख्या बल को देखते हुए पार्टी दो सीटें जीत सकती है. वहीं एक सीट कांग्रेस के खाते में जाने की संभावना जताई जा रही है.

झारखंड में रणनीति पर टिकी नजर

झारखंड में इस समय इंडिया गठबंधन की सरकार है. राज्य की 81 सदस्यीय विधानसभा में इंडिया गठबंधन के पास 56 विधायक हैं, जबकि एनडीए के पास 24 विधायक हैं. संख्या बल के आधार पर दोनों सीटें सत्तारूढ़ गठबंधन के खाते में जाती दिख रही हैं. हालांकि राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि रणनीतिक मतदान के जरिए एनडीए एक सीट पर मुकाबला दिलचस्प बना सकता है.

दोतिहाई बहुमत की ओर एनडीए की नजर

राज्यसभा चुनाव के नतीजे भले ही एनडीए को तत्काल दो-तिहाई बहुमत तक न पहुंचाएं, लेकिन कई राज्यों में बेहतर प्रदर्शन उसे उच्च सदन में और मजबूत स्थिति दिला सकता है. ऐसे में 18 जून का चुनाव केवल सीटों की संख्या का नहीं, बल्कि आने वाले राजनीतिक समीकरणों और संसद में शक्ति संतुलन का भी महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है.

Explained: अन्नामलाई का इस्तीफा बीजेपी की पूरी रणनीति पर सवालिया निशान

0

BJP Annamalai Factor: तमिलनाडु में बीजेपी के लिए हालात सबसे कठिन हैं. अगर पार्टी ने दक्षिण के हर राज्य को उत्तर भारत की तर्ज पर जीतने की कोशिश जारी रखी, तो अन्नामलाई का जाना महज एक शुरुआत हो सकती है.

तमिलनाडु की राजनीति में कुछ दिनों पहले तक के अन्नामलाई बीजेपी के लिए किसी ‘रॉकस्टार’ से कम नहीं थे. पूर्व IPS अधिकारी, शानदार पर्सनैलिटी और DMK को खुली चुनौती देने वाली आक्रामक शैली ने उन्हें तमिलनाडु बीजेपी का अब तक का सबसे चर्चित चेहरा बना दिया था. पार्टी को उम्मीद थी कि उन्हीं के सहारे वह पहली बार सच्चे मायनों में तमिल धरती पर पैर पसार पाएगी. लेकिन अचानक आए के अन्नामलाई के इस्तीफे ने पूरा खेल पलट दिया.

आखिर तमिलनाडु समेत पूरे दक्षिण में बीजेपी की ताकत का इतिहास और मौजूदा हाल क्या है, अब आगे कौन तमिल चेहरा हो सकता है और यहां हिंदुत्व की राजनीति की राह इतनी पथरीली क्यों है

अन्नामलाई का इस्तीफा बीजेपी की पूरी रणनीति पर सवालिया निशान

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि के अन्नामलाई का इस्तीफा आखिर बड़ी खबर क्यों है. मार्च 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी तमिलनाडु में अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी, जबकि अन्नामलाई पूरे जोश के साथ चुनाव लड़ रहे थे. इस हार के बाद भी पार्टी नेतृत्व ने उन्हें बदलने की बजाय उन्हीं पर भरोसा जताया, लेकिन जून 2026 में अचानक उन्होंने पार्टी से ही इस्तीफा दे दिया. यह इस्तीफा बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव नितिन नबीन ने तुरंत स्वीकार कर लिया, जिससे यह साफ लगता है कि अन्नामलाई और आलाकमान के बीच कुछ दिनों से खींचतान चल रही थी.

द वीक की एक रिपोर्ट बताती है कि इस इस्तीफे के पीछे सिर्फ चुनावी हार नहीं, बल्कि पार्टी की कार्यशैली और केंद्रीय नेतृत्व से गहरे मतभेद थे. तमिलनाडु में बीजेपी को खड़ा करने का दावा करने वाला चेहरा अगर यह कहकर जा रहा है कि पार्टी की दिशा ही गलत है, तो यह सिर्फ एक नेता का जाना नहीं, बल्कि दक्षिण भारत में बीजेपी के पूरे प्रोजेक्ट के लिए एक बड़ा झटका है.

तमिलनाडु में बीजेपी की ताकत का इतिहास: कभी एकदो सीट, कभी शून्य

यह पहली बार नहीं है कि बीजेपी ने तमिलनाडु में मेहनत की हो. पार्टी और उसकी पूर्ववर्ती जनसंघ 1960 के दशक से राज्य में मौजूद है, लेकिन असली सफलता मिली 1990 के दशक के अंत में.

1998 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने AIADMK के साथ गठबंधन करके 3 और और 1999 में 4 सीटें जीती थीं। यही बीजेपी का तमिलनाडु में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. इसके बाद AIADMK से गठबंधन टूटा और पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता गया. 2004 के बाद से लगातार कई चुनावों में बीजेपी का खाता तक नहीं खुला. 2014 की मोदी लहर भी तमिलनाडु की दहलीज नहीं लांघ पाई और पार्टी सिर्फ 2 फीसदी से कम वोटों पर सिमट गई.

विधानसभा में भी बीजेपी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है. 2016 में पार्टी ने 234 सीटों पर चुनाव लड़ा और एक भी सीट नहीं जीत पाई. 2021 में थोड़ा सुधार हुआ और पार्टी ने 4 सीटें जीतीं, लेकिन इसके बावजूद उसका वोट शेयर महज 2.84 फीसदी ही रहा. यह आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु में बीजेपी की जमीनी पकड़ कितनी कमजोर है.

तमिलनाडु के अलावा पूरे दक्षिण में बीजेपी की स्थिति क्या?

केरल: द्विध्रुवीय राजनीति में तीसरी शक्ति बनने की कोशिश

यहां राजनीति परंपरागत रूप से दो ध्रुवीय रही है यानी कांग्रेस की अगुवाई वाला UDF और वामदलों का LDF. बीजेपी इस द्विध्रुवीय राजनीति में तीसरी शक्ति बनने की कोशिश करती रही है लेकिन सफलता बहुत सीमित रही है. 140 सदस्यीय विधानसभा में 2016 के चुनाव में बीजेपी ने पहली बार एक सीट जीतकर अपना खाता खोला. 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन और बेहतर हुआ लेकिन सीटों के लिहाज से वह फिर शून्य पर रही. हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने केरल में पहली बार एक सीट जीतकर इतिहास रचा जब अभिनेता-राजनेता सुरेश गोपी त्रिशूर से जीते. लेकिन यह जीत व्यक्तिगत लोकप्रियता का नतीजा थी, संगठनात्मक ताकत का नहीं. केरल में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य की जनसांख्यिकी है. यहां मुस्लिम और ईसाई समुदाय कुल आबादी का करीब 45 फीसदी हैं, जिनके बीच हिंदुत्व की राजनीति कोई खास जगह नहीं बना पाई.

कर्नाटक: दक्षिण का इकलौता राज्य जहां बीजेपी ने सरकार बनाई

दक्षिण भारत की पूरी तस्वीर में कर्नाटक एक अपवाद के तौर पर खड़ा है. यही इकलौता दक्षिण भारतीय राज्य है जहां बीजेपी ने कई बार अपने दम पर सरकार बनाई है. 2008 में बी.एस. येदियुरप्पा के नेतृत्व में पार्टी ने पहली बार कर्नाटक की सत्ता संभाली. इसके बाद 2018 और फिर 2019 में भी बीजेपी सत्ता में आई. कर्नाटक में बीजेपी की मजबूती का सबसे बड़ा आधार लिंगायत समुदाय रहा है, जो येदियुरप्पा का अपना समुदाय भी है. इसके अलावा तटीय कर्नाटक और मालनाड इलाके में पार्टी का संघ-समर्थित संगठनात्मक ढांचा काफी मजबूत है. हालांकि, 2023 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस ने बड़े बहुमत से सरकार बना ली. बीजेपी यहां लगातार एक बड़े क्षेत्रीय चेहरे की कमी से जूझती रही है और येदियुरप्पा के संन्यास के बाद तो यह संकट और गहरा गया है.

आंध्र प्रदेश: जहां गठबंधन के बिना चलना मुश्किल

आंध्र प्रदेश में बीजेपी की ताकत को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि यह राज्य हमेशा से क्षेत्रीय दलों का गढ़ रहा है. 2014 में राज्य के बंटवारे के बाद से यहां की राजनीति चंद्रबाबू नायडू की TDP और जगन मोहन रेड्डी की YSR कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है. बीजेपी को 2014 के चुनाव में TDP के साथ गठबंधन का फायदा मिला और उसने लोकसभा की 2 सीटें जीतीं. लेकिन 2018 में TDP से गठबंधन टूटने के बाद 2019 के चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई. 2024 के चुनाव में बीजेपी ने पवन कल्याण की जन सेना पार्टी और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के साथ गठबंधन किया और इस बार उसे लोकसभा की 3 सीटों पर जीत मिली. लेकिन यह सफलता पूरी तरह गठबंधन पर निर्भर थी. आंध्र प्रदेश में बीजेपी का अपना स्वतंत्र जनाधार बेहद कमजोर है और पार्टी यहां ज्यादातर शहरी और व्यापारी वर्ग तक सीमित है.

तेलंगाना: बीजेपी के लिए उभरती संभावना लेकिन लंबा रास्ता

तेलंगाना दक्षिण भारत का वह राज्य है जहां बीजेपी ने पिछले कुछ सालों में सबसे तेज बढ़ोतरी दिखाई है, लेकिन यहां भी वह सत्ता के करीब नहीं पहुंच पाई. 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी महज एक सीट जीत पाई थी. लेकिन 2020 के हैदराबाद नगर निगम चुनाव में पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 48 सीटें जीतीं और AIMIM के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई. 2023 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 8 सीटें जीतीं और उसका वोट शेयर बढ़कर करीब 14 फीसदी हो गया. लेकिन इसके बावजूद पार्टी कांग्रेस और BRS जैसे दलों को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में नहीं है. तेलंगाना में बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत शहरी और अर्ध-शहरी इलाके हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी पहुंच सीमित है. पार्टी यहां हिंदुत्व के एजेंडे के साथ-साथ तेलंगाना अस्मिता और विकास के मुद्दों को भी जोड़ने की कोशिश कर रही है, लेकिन अभी उसे एक मजबूत क्षेत्रीय चेहरे की कमी खल रही है. बंदी संजय कुमार और किशन रेड्डी जैसे नेताओं के बावजूद पार्टी अभी तक कोई ऐसा चेहरा नहीं खड़ा कर पाई है जो पूरे राज्य में केसीआर या रेवंत रेड्डी को टक्कर दे सके.

आखिर क्यों हिंदुत्व का रास्ता तमिलनाडु समेत पूरे दक्षिण भारत में इतना मुश्किल है?

यहीं पर पूरी कहानी का सबसे बुनियादी पहलू आता है. पहले बात तमिलनाडु की…

तमिलनाडु भारत का वो राज्य है जहां हिंदुत्व की राजनीति के सामने एक पूरी विचारधारात्मक दीवार खड़ी है- द्रविड़ आंदोलन की दीवार. 20वीं सदी की शुरुआत में पेरियार ई.वी. रामास्वामी के नेतृत्व में जो ‘आत्म-सम्मान आंदोलन’ शुरू हुआ, उसने धर्म, जाति और उत्तर भारतीय सांस्कृतिक वर्चस्व को एक साथ चुनौती दी. इस आंदोलन ने तमिल पहचान को हिंदू पहचान से इस कदर अलग कर दिया कि यहां का आम मतदाता मंदिर तो जाता है, लेकिन हिंदुत्व के राजनीतिक प्रोजेक्ट को संदेह से देखता है.

हिंदुत्व की जो धारणा उत्तर भारत में हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान के नारे पर चलती है, वह तमिल भाषा और संस्कृति के गर्व के आगे टिक नहीं पाती. द वायर की रिपोर्ट साफ कहती है कि बीजेपी भले ही बंगाल जैसे राज्यों को भेदने में कामयाब हो गई हो, लेकिन तमिलनाडु और केरल में उसे जो प्रतिरोध झेलना पड़ता है, वह महज राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक है. यहां की राजनीति में ‘उत्तर भारतीय थोपे जाने वाले मॉडल’ की जगह स्थानीय अस्मिता और सामाजिक न्याय का मुद्दा हमेशा हावी रहता है.

वहीं, दक्षिण भारत के ज्यादातर राज्यों में हिंदुत्व की राजनीति के सामने कई परतों वाली चुनौतियां हैं:

दक्षिण भारत में पिछड़ी जातियों, दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण और सामाजिक अधिकारों का आंदोलन बहुत मजबूत रहा है. बीजेपी का मुख्यधारा का हिंदुत्व एजेंडा अक्सर इसे कमजोर करने वाली ताकत के रूप में देखा जाता है.

दक्षिण भारत में हिंदी को लेकर एक स्वाभाविक प्रतिरोध रहा है. बीजेपी की हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान की राजनीति यहां उत्तर भारतीय सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की तरह देखी जाती है.

तमिलनाडु में DMK-AIADMK, केरल में वामदल और कांग्रेस, आंध्र में TDP-YSR कांग्रेस और तेलंगाना में BRS-कांग्रेस जैसे दल इतने मजबूत हैं कि बीजेपी के लिए जगह बनाना बेहद कठिन हो जाता है.

ये सारी चुनौतियां मिलकर बीजेपी के लिए दक्षिण भारत को सबसे कठिन राजनीतिक भूभाग बनाती हैं.

पूरे दक्षिण में बीजेपी की असली कमजोरी क्या है?

पॉलिटिकल एक्सपर्ट अमिताभ तिवारी कहते हैं, ‘अगर पूरे दक्षिण भारत की तस्वीर को एक साथ जोड़कर देखें तो बीजेपी की सबसे बड़ी कमजोरी सिर्फ वैचारिक प्रतिरोध नहीं है, बल्कि संगठनात्मक कमजोरी और चेहरे की कमी है. उत्तर भारत में बीजेपी के पास नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ, शिवराज सिंह चौहान जैसे कई बड़े क्षेत्रीय चेहरे हैं. लेकिन दक्षिण भारत में कर्नाटक को छोड़कर बाकी राज्यों में पार्टी के पास कोई ऐसा नेता नहीं है जो पूरे राज्य में पहचाना जाए और जिसकी स्वीकार्यता जातीय और सामाजिक सीमाओं को लांघ सके. दूसरी बड़ी कमजोरी है जमीनी संगठन की कमी. बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का नेटवर्क खड़ा करने में बीजेपी दक्षिण भारत में लगातार पिछड़ी रही है.’

इसके अलावा स्थानीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़ने में नाकामी. बीजेपी का हिंदुत्व अक्सर एक उत्तर भारतीय राजनीतिक मॉडल की तरह दिखता है, जबकि दक्षिण भारत की अपनी समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं हैं. इनका राजनीतिक इस्तेमाल उसी भाषा और संदर्भ में होना चाहिए जो स्थानीय लोगों को अपना लगे.

तो क्या अन्नामलाई के बाद तमिलनाडु बीजेपी बिना चेहरे के हो गई है और दक्षिण की रणनीति क्या होगी?

अन्नामलाई के जाने के बाद बीजेपी के सामने तमिलनाडु में चेहरे का संकट गहरा गया है. पिछले कुछ सालों में अन्नामलाई ने जिस तरह राज्य भर में खुद को अकेले दम पर प्रोजेक्ट किया, वैसा कोई दूसरा नेता फिलहाल नजर नहीं आता. हालांकि, कुछ नामों की चर्चा जरूर है. डॉ. तमिलिसाई सुंदरराजन, जो तेलंगाना की राज्यपाल रह चुकी हैं और तमिलनाडु बीजेपी की पूर्व अध्यक्ष भी रहीं, एक अनुभवी और आक्रामक चेहरा हैं. दूसरा नाम एच. राजा का है, जो हिंदुत्व के मुखर चेहरे हैं, लेकिन विवादों के चलते उनको मौका मिलना मुश्किल है. तीसरी संभावना है पार्टी किसी पूरी तरह नए और युवा चेहरे पर दांव लगाए. लेकिन सच तो यह है कि अन्नामलाई जैसा ‘पैन-तमिल’ चेहरा फिलहाल पार्टी के पास नहीं है.

अमिताभ तिवारी का कहना है कि बीजेपी को अब अपनी पूरी दक्षिण भारत रणनीति पर नए सिरे से सोचना होगा. सबसे पहली जरूरत हर राज्य के लिए अलग-अलग रणनीति बनाने की है. कर्नाटक में जो फॉर्मूला काम कर गया, जरूरी नहीं कि वह तमिलनाडु या केरल में भी काम करे. तमिलनाडु में पार्टी को एक ऐसा चेहरा चाहिए जो पार्टी के राष्ट्रीय एजेंडे और स्थानीय द्रविड़ अस्मिता के बीच पुल बन सके, न कि दोनों को टकराए. केरल में बीजेपी को अल्पसंख्यक समुदायों के साथ संवाद का रास्ता खोलना होगा और सिर्फ हिंदुत्व के बजाय विकास और सुशासन के मुद्दों पर जोर देना होगा.

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में फिलहाल गठबंधन की राजनीति ही पार्टी के लिए आगे बढ़ने का रास्ता है. सबसे जरूरी बात, पार्टी को दक्षिण भारत में हिंदुत्व को एक आक्रामक उत्तर भारतीय राजनीतिक मॉडल की तरह नहीं, बल्कि स्थानीय मंदिर संस्कृति, संत परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत के साथ जोड़कर पेश करना होगा. तभी वह ‘दिल्ली का एजेंडा’ होने के आरोप से बच सकेगी.

तो क्या पूरे दक्षिण में बीजेपी का सफर पंक्चर है या हवा भरी जा सकती है?

पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई कहते हैं, ‘अन्नामलाई के इस्तीफे ने तमिलनाडु में बीजेपी की रफ्तार पर तो ब्रेक लगाया ही है, लेकिन पूरे दक्षिण भारत की तस्वीर को देखें तो यह कहना कि सफर पूरी तरह पंक्चर हो गया है, जल्दबाजी होगी. कर्नाटक में बीजेपी अब भी सत्ता के करीब है और कभी भी वापसी कर सकती है. तेलंगाना में पार्टी का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है. केरल में पहली बार लोकसभा सीट जीतना एक बड़ी सेंध है. आंध्र प्रदेश में गठबंधन के जरिए पार्टी सत्ता का स्वाद चख रही है. लेकिन तमिलनाडु में बीजेपी के लिए हालात सबसे कठिन हैं.’

रशीद किदवई आगे कहते हैं कि बीजेपी अगर लंबी सांस लेकर, सही चेहरों और स्थानीय संस्कृति के प्रति सम्मान के साथ मेहनत करे, तो दक्षिण भारत में उसकी राह आसान हो सकती है. लेकिन अगर पार्टी ने दक्षिण के हर राज्य को उत्तर भारत की तर्ज पर जीतने की कोशिश जारी रखी, तो अन्नामलाई का जाना महज एक शुरुआत हो सकती है. फिलहाल, दक्षिण भारत में बीजेपी के लिए सबसे बड़ी लड़ाई विचारधारा की नहीं, बल्कि विश्वास और स्थानीय स्वीकार्यता की है. इसे जीतने में अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है.

BJP से इस्तीफे के बाद के अन्नामलाई ने किया नई पार्टी बनाने का ऐलान…

0

तमिलनाडु BJP के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई ने शुक्रवार (5 जून) को भारतीय जनता पार्टी से इस्तीफा देने के बाद एक नए राजनीतिक सफर की शुरुआत का ऐलान किया. उन्होंने कहा कि आज से वह एक नए राजनीतिक आंदोलन की शुरुआत कर रहे हैं और जनता से इस अभियान में साथ देने की अपील की.

नई राजनीतिक दिशा की ओर बढ़ रहे

अन्नामलाई ने अपने राजनीतिक सफर को याद करते हुए बताया कि उन्होंने वर्ष 2009 में DMDK के साथ इंटर्नशिप की थी और साल 2020 में BJP में शामिल हुए थे. अब वह एक नई राजनीतिक दिशा की ओर बढ़ रहे हैं.

रजनीकांत ने साथ आने का दिया था प्रस्ताव

उन्होंने खुलासा किया कि 24 अगस्त 2020 को BJP में शामिल होने से पहले अभिनेता रजनीकांत ने उन्हें फोन कर अपनी संभावित राजनीतिक पार्टी में शामिल होने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन BJP के राष्ट्रीय संगठन महासचिव बीएल संतोष को पहले ही वचन दे चुके होने के चलते उन्होंने रजनीकांत के प्रस्ताव को अस्वीकार कर BJP का दामन थाम लिया.

शुरू करेंगे नया राजनीतिक आंदोलन

अन्नामलाई ने कहा कि उनका मकसद जमीन से जुड़ी, स्वच्छ और पारदर्शी राजनीति की शुरुआत करना है. उन्होंने बताया कि उनके नए राजनीतिक आंदोलन का नाम “We The Leader” होगा. इसके साथ ही “APJ Abdul Kalam Ethics in Politics” नामक संस्था के माध्यम से इस आंदोलन से जुड़ने वाले सदस्यों को राजनीतिक और नैतिक नेतृत्व की ट्रेनिंग दी जाएगी.

उन्होंने कहा कि जब उनकी राजनीतिक पार्टी का गठन होगा, तब उसमें टर्म लिमिट लागू की जाएगी ताकि परिवारवाद और वंशवादी राजनीति पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके.

पीएम मोदी के लिए जताया सम्मान

अन्नामलाई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि उनके मन में पीएम मोदी के लिए हमेशा आदर रहेगा. हालांकि यदि किसी मुद्दे पर BJP और उनके विचारों में मतभेद होगा तो वह उसे पूरी गंभीरता और स्पष्टता के साथ उठाएंगे. उन्होंने यह भी कहा कि तीन-भाषा नीति का उन्होंने BJP के भीतर रहते हुए भी विरोध किया था.

बीजेपी से इस्तीफे पर क्या बोले?

इस्तीफे के बारे में बोलते हुए अन्नामलाई ने बताया कि उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर पार्टी में महसूस की गई कमियों और अपने विचारों को स्पष्ट रूप से रखा, जिसके बाद इस्तीफा दिया. अन्नामलाई ने कहा कि वह उन लोगों में से नहीं हैं जो दूर बैठकर इस्तीफा भेज देते हैं, बल्कि उन्होंने पार्टी नेतृत्व के सामने अपनी बात रखकर सम्मानजनक तरीके से अलग होने का फैसला लिया.

शिक्षा के साथ कौशल विकास से बढ़ता है आत्मविश्वास : श्री अरुण साव…

0

लोरमी में 250 युवाओं को कंप्यूटर, सिलाई और ब्यूटी पार्लर का प्रशिक्षण, उप मुख्यमंत्री ने किया संवाद’

उप मुख्यमंत्री श्री अरुण साव ने लोरमी में कौशल विकास प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे युवाओं से आत्मीय संवाद किया। उन्होंने युवाओं को जीवन में निरंतर आगे बढ़ने और अपने कौशल को लगातार विकसित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने प्रशिक्षण केंद्र में संचालित गतिविधियों का अवलोकन कर प्रशिक्षणार्थियों के अनुभव भी सुने।

श्री साव ने कहा कि स्थानीय युवाओं को उनकी रुचि और आवश्यकता के अनुरूप निःशुल्क कौशल प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि एसईसीएल के सहयोग से 1 अप्रैल से 250 युवा कंप्यूटर, सिलाई एवं ब्यूटी पार्लर का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। युवाओं में नए कौशल सीखने को लेकर उत्साह और उमंग दिखाई दे रहा है, जो उनके उज्ज्वल भविष्य की सकारात्मक तस्वीर प्रस्तुत करता है।

उप मुख्यमंत्री ने कहा कि, आज के समय में शैक्षणिक योग्यता ही पर्याप्त नहीं है। पढ़ाई के साथ किसी एक व्यावहारिक कौशल का होना भी अत्यंत आवश्यक है। ब्यूटीशियन, सिलाई, डाटा एंट्री जैसे प्रशिक्षण युवाओं को अतिरिक्त दक्षता प्रदान करते हैं, जिससे उन्हें रोजगार और स्वरोजगार के बेहतर अवसर प्राप्त होते हैं। उन्होंने कहा कि, कौशल विकास युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ ही उनके व्यक्तित्व को भी सशक्त बनाता है।

श्री साव ने युवाओं से कहा कि प्रशिक्षण पूरा होने के बाद भी सीखने की प्रक्रिया कभी नहीं रुकनी चाहिए। निरंतर अभ्यास और सीखने की प्रवृत्ति ही सफलता का आधार है। उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति के पास अतिरिक्त कौशल होता है तो उसका आत्मविश्वास बढ़ता है और वह हर परिस्थिति में सम्मानपूर्वक जीवन जीने में सक्षम बनता है। यही आत्मविश्वास जीवन में आगे बढ़ने की सबसे बड़ी शक्ति है जो सफलता की नई राहें खोलता है।

श्रम विभाग ने नियमों में किया बड़ा संशोधन ऑनलाइन प्रक्रिया हुई और भी आसान…

0

छत्तीसगढ़ शासन के श्रम विभाग ने राज्य में व्यापार और उद्योग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दुकानों एवं प्रतिष्ठानों के पंजीयन की प्रक्रिया को अधिक सरल, पारदर्शी और समयबद्ध बना दिया है। राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ दुकान एवं स्थापना (नियोजन एवं सेवा की शर्तों का विनियमन) नियम, 2021 में महत्वपूर्ण संशोधन करते हुए नई अधिसूचना जारी की है, जो 3 जून 2026 से पूरे राज्य में प्रभावी हो गई है।

24 घंटे के भीतर जारी होगा ऑनलाइन प्रमाणपत्र

संशोधित नियमों के तहत अब किसी भी दुकान या स्थापना के लिए श्रम पहचान संख्या ( Labour Identification Number & LIN ) का पंजीयन प्रमाणपत्र ऑनलाइन आवेदन प्राप्त होने के मात्र 24 घंटे के भीतर जारी कर दिया जाएगा। इसके लिए नियोक्ताओं को निर्धारित प्रारूप में ऑनलाइन आवेदन के साथ आवश्यक दस्तावेज अपलोड करने होंगे और ई-चालान के माध्यम से शुल्क जमा करना होगा। यह पूरी व्यवस्था स्व-घोषणा पर आधारित और सिस्टम-जनरेटेड होगी, जिसमें किसी भौतिक हस्ताक्षर की आवश्यकता नहीं होगी।

दस्तावेजों का डिजिटलीकरण और पारदर्शिता

नई व्यवस्था के तहत जारी सभी श्रम पहचान संख्या प्रमाणपत्र अधिनियम के अंतर्गत पूर्णतः वैध माने जाएंगे। इसके साथ ही, श्रम विभाग के पोर्टल पर दुकानों और प्रतिष्ठानों का ऑनलाइन रजिस्टर संधारित किया जाएगा, जिससे अभिलेखों का डिजिटलीकरण और उनकी निगरानी बेहद आसान हो जाएगी।

नियोक्ताओं की होगी जिम्मेदारी, डिस्प्ले करना अनिवार्य

अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि यदि आवेदन में कोई भी जानकारी, तथ्य या दस्तावेज गलत अथवा भ्रामक पाए जाते हैं, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित नियोक्ता की होगी। इसके अलावा, सभी दुकानदारों को अपने प्रतिष्ठान परिसर में नाम-पट्ट के साथ इस पंजीयन प्रमाणपत्र को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करना अनिवार्य होगा।

संशोधन प्रक्रिया भी हुई बेहद सरल

यदि कोई नियोक्ता अपने पंजीयन प्रमाणपत्र में नाम, पता, कर्मचारियों की संख्या या व्यवसाय की प्रकृति जैसे विवरणों में कोई बदलाव करना चाहता है, तो वह मात्र 100 रुपये का संशोधन शुल्क देकर ऑनलाइन आवेदन कर सकता है। ऐसे मामलों में भी संशोधित प्रमाणपत्र 24 घंटे के भीतर ही जारी कर दिया जाएगा। सरकार के इस इज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस कदम से कागजी कार्यवाही कम होगी और व्यापारियों को एक सुविधाजनक माहौल मिलेगा।

नैनो उर्वरक के उपयोग से धान उत्पादन में हुई वृद्धि, लागत में आई कमी – किसान निरंजन…

0

कृषि में आधुनिक तकनीकों और नवाचारों को अपनाकर किसान उत्पादन में वृद्धि के साथ खेती की लागत को भी कम करने में सफल हो रहे हैं। महासमुंद  जिले के विकासखंड बसना अंतर्गत ग्राम दूधीपाली के प्रगतिशील किसान श्री निरंजन सिदार ने भी विगत वर्ष अपनी धान की फसल में नैनो डीएपी एवं नैनो यूरिया का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग कर बेहतर परिणाम प्राप्त किए हैं। श्री सिदार ने बताया कि वे धान की खेती में नैनो डीएपी से बीज उपचार कर खेती की शुरुआत की। इसके बाद फसल की वृद्धि अवस्था में नैनो डीएपी तथा नैनो यूरिया का छिड़काव किया। आधुनिक उर्वरक तकनीक के उपयोग से उनकी फसल में रोग एवं कीटों का प्रकोप अपेक्षाकृत कम देखने को मिला, जिससे फसल स्वस्थ एवं मजबूत बनी रही। इसके साथ ही धान की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ। उन्होंने बताया कि नैनो उर्वरकों के उपयोग से खेती की लागत में कमी आई है। नैनो उर्वरकों को कीटनाशकों के साथ मिलाकर छिड़काव किए जाने की सुविधा के कारण अलग-अलग बार मजदूरी लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, जिससे समय और श्रम दोनों की बचत होती है।

कृषि विभाग द्वारा किसानों को नैनो उर्वरकों के वैज्ञानिक उपयोग के संबंध में लगातार जागरूक किया जा रहा है। विभाग के अनुसार नैनो डीएपी का उपयोग बीजोपचार, पौध उपचार तथा प्रारंभिक वृद्धि अवस्था में छिड़काव के रूप में किया जा सकता है, जबकि नैनो यूरिया का उपयोग फसल की पोषण आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विभिन्न अवस्थाओं में किया जाता है। विशेषज्ञों द्वारा अनुशंसित मात्रा एवं विधि से उपयोग करने पर उत्पादन वृद्धि, गुणवत्ता सुधार तथा लागत में कमी आती है। विशेषज्ञों के अनुसार नैनो डीएपी से बीज उपचार के लिए 1 किलोग्राम बीज में 5 एमएल नैनो डीएपी के घोल को बीज में अच्छे तरीके से मिलाएं, उसके पश्चात 20 मिनट तक छांव में सूखने दें और फिर बुवाई करें। नैनो डीएपी से थरहा (पौध) उपचार के लिए 1 लीटर पानी में 5 एमएल नैनो डीएपी की दर से घोल बनाएं एवं रोपाई से पहले 20 मिनट तक थरहा को इस घोल में डूबे रहने दें, उसके पश्चात रोपाई करें। पहला छिड़काव फसल 30-35 दिन का होने पर जब फसल में पत्तियां अच्छी आ जाएं, तब 1 लीटर पानी में 4-5 एमएल की दर से नैनो डीएपी एवं नैनो यूरिया प्लस का पत्तियों में स्प्रेयर के माध्यम से छिड़काव करें। दूसरा छिड़काव, प्रथम छिड़काव के 25-30 दिन बाद फूल आने से पहले 1 लीटर पानी में 4-5 एमएल की दर से नैनो यूरिया प्लस का पत्तियों में स्प्रेयर के माध्यम से छिड़काव करें। साथ ही नैनो उर्वरकों को कीटनाशकों के साथ मिलाकर भी स्प्रे किया जा सकता है। लेकिन कॉपर युक्त कीटनाशक एवं फफूंद नाशक के साथ इसे नहीं मिलाया जाता है।

आवास एवं पर्यावरण मंत्री श्री ओ.पी. चौधरी ने विश्व पर्यावरण दिवस की दी शुभकामनाएं…

0

आवास एवं पर्यावरण मंत्री ओ.पी. चौधरी ने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर प्रदेशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई दी है। अपने शुभकामना संदेश में मंत्री श्री चौधरी ने कहा कि स्वच्छ, सुरक्षित और संतुलित पर्यावरण मानव जीवन तथा सतत विकास की आधारशिला है। पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का नैतिक दायित्व भी है। उन्होंने कहा कि प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के लिए हमें जल, जंगल और जमीन के संरक्षण के साथ-साथ वृक्षारोपण, जल संरक्षण, ऊर्जा बचत तथा प्रदूषण नियंत्रण जैसे उपायों को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना होगा।

मंत्री श्री चौधरी ने प्रदेशवासियों से पर्यावरण संरक्षण के लिए सक्रिय भागीदारी निभाने का आह्वान करते हुए कहा कि आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ और हरित वातावरण उपलब्ध कराने के लिए हमें आज से ही सामूहिक प्रयास करने होंगे। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जनभागीदारी और जागरूकता के माध्यम से छत्तीसगढ़ को पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में एक आदर्श राज्य बनाया जा सकता है। उन्होंने विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर सभी नागरिकों से कम से कम एक पौधा लगाने तथा उसके संरक्षण का संकल्प लेने की अपील की।

’हाथियों के संरक्षण को मिलेगी नई मजबूती -वन मंत्री श्री केदार कश्यप’

0

छत्तीसगढ़ में हाथियों के संरक्षण और मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के उद्देश्य से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ आज वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री केदार कश्यप ने अपने निवास कार्यालय में वर्चुअल माध्यम से किया। इस अवसर पर वन बल प्रमुख श्री अरुण कुमार पाण्डेय भी साथ में थे। इस कार्यशाला में देशभर के वन्यजीव विशेषज्ञ, वैज्ञानिक, पशु चिकित्सक और वन अधिकारी शामिल हुए।

संरक्षण प्रयासों से बढ़ी हाथियों की संख्या’

वन मंत्री श्री कश्यप ने कहा कि छत्तीसगढ़ जैव विविधता और वन संपदा से समृद्ध राज्य है। राज्य सरकार के संरक्षण प्रयासों का सकारात्मक परिणाम सामने आया है। वर्ष 2022 में प्रदेश में लगभग 240 हाथी थे, जिनकी संख्या बढ़कर वर्ष 2026 में करीब 450 हो गई है। यह वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है।

मानव-हाथी संघर्ष कम करना सरकार की प्राथमिकता’

श्री कश्यप ने बताया कि वर्तमान में हाथियों का विचरण सरगुजा, बिलासपुर, रायगढ़, रायपुर और दुर्ग संभाग के कई क्षेत्रों तक फैल चुका है। ऐसे में हाथियों के संरक्षण के साथ-साथ प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। राज्य सरकार जनभागीदारी, सतत निगरानी और वैज्ञानिक प्रबंधन के माध्यम से मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है।

आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर जोर’

वन मंत्री ने कहा कि राज्य सरकार हाथियों के संरक्षण के लिए दीर्घकालिक और वैज्ञानिक रणनीति पर कार्य कर रही है। आधुनिक तकनीक, विशेषज्ञों के मार्गदर्शन और प्रशिक्षित मानव संसाधन की मदद से वन्यजीव प्रबंधन को और मजबूत बनाया जा रहा है। इस तरह की कार्यशालाएं अधिकारियों और कर्मचारियों को नवीनतम जानकारी और व्यावहारिक अनुभव प्रदान करती हैं।

विशेषज्ञ देंगे स्वास्थ्य प्रबंधन और संरक्षण का प्रशिक्षण’

कार्यशाला में भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून तथा भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बरेली सहित विभिन्न प्रतिष्ठित संस्थानों के विशेषज्ञ वन अधिकारियों और पशु चिकित्सकों को प्रशिक्षण दे रहे हैं। प्रशिक्षण के दौरान हाथियों की मृत्यु के कारणों की वैज्ञानिक जांच, नमूनों का संरक्षण, स्वास्थ्य परीक्षण, शव प्रबंधन और स्वास्थ्य निगरानी जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से जानकारी दी जाएगी।

वन्यजीव संरक्षण में छत्तीसगढ़ बन रहा मॉडल राज्य’

वन मंत्री श्री कश्यप ने विश्वास व्यक्त किया कि कार्यशाला से प्राप्त ज्ञान और अनुभव हाथियों के संरक्षण, सुरक्षा और प्रभावी प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ वन्यजीव संरक्षण और वैज्ञानिक प्रबंधन के क्षेत्र में देश के लिए एक मजबूत मॉडल के रूप में उभर रहा है।

विशेषज्ञों और प्रतिभागियों का किया आभार व्यक्त’

वन मंत्री ने सभी विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए जैव विविधता संरक्षण तथा मानव-वन्यजीव सहअस्तित्व को बढ़ावा देने के लिए निरंतर बेहतर कार्य करने का आह्वान किया।