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आयुक्त ने एसएलआरएम सेंटर प्रभारियों की बैठक में दिए कचरा पृथककरण और स्वच्छता को लेकर अहम निर्देश

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राजनांदगांव। स्वच्छता अभियान को और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से आयुक्त श्री अतुल विश्वकर्मा ने एसएलआरएम (सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट) सेंटर प्रभारियों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की। बैठक में उन्होंने कचरा पृथककरण के लिए जन जागरूकता बढ़ाने और पूरी तरह से यूजर चार्ज वसूली सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश दिए।

आयुक्त ने कहा कि स्वच्छता सर्वेक्षण को ध्यान में रखते हुए सेंटर प्रभारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि प्रत्येक घर से कचरा एकत्रित किया जाए और उसमें गीले एवं सूखे कचरे का पृथककरण हो। इसके लिए नागरिकों को स्वच्छता के प्रति जागरूक करना बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि कचरा पृथककरण के लिए नागरिकों से फीडबैक भी लिया जाए और उन्हें घर में ही गीला कचरा हरे डब्बे में और सूखा कचरा नीले डब्बे में डालने के लिए प्रेरित किया जाए।

बैठक में बताया गया कि कुछ नागरिक कचरे को पृथक नहीं करते, जिनके लिए एसएलआरएम सेंटर के कर्मचारी उन्हें समझाकर कचरा पृथक करने की प्रक्रिया सिखाते हैं। इसके अलावा, कई लोग यूजर चार्ज भी नहीं देते, और डस्टबिन की मांग करते हैं। इस पर आयुक्त ने निर्देश दिया कि सभी सेंटर सुपरवाइज़र को प्रत्येक घर का सर्वे करना चाहिए और यूजर चार्ज न देने वालों को समझाना चाहिए कि इसी शुल्क से स्वच्छता दीदियों का वेतन दिया जाता है।

आयुक्त ने यह भी कहा कि एसएलआरएम सेंटर में आए हुए कचरे का उसी दिन पृथककरण किया जाए, और उसका खाद बनाने की प्रक्रिया शुरू की जाए। इसके साथ ही तैयार खाद का विक्रय भी किया जाए। उन्होंने पीआईयू से सेंटरों का नियमित निरीक्षण करने और आवश्यक सुधार सुनिश्चित करने का आदेश दिया।

गाड़ियों की स्थिति पर भी चर्चा की गई, आयुक्त ने कहा कि सभी खराब गाड़ियों को जल्द से जल्द ठीक किया जाए, साथ ही जिन गाड़ियों के स्पीकर खराब हैं, उन्हें भी सुधारा जाए। प्रत्येक गाड़ी में कचरा निकालने के लिए एक संदेश और कचरे के पृथककरण की जानकारी देने वाले गीत बजाए जाएं।

स्वच्छता के प्रति नागरिकों को और अधिक जागरूक करने के लिए आयुक्त ने कहा कि उन्हें गीला और सूखा कचरा अलग-अलग रखने, प्रतिबंधित प्लास्टिक का उपयोग न करने, और कचरा नाली या सड़क पर न डालने के बारे में बताया जाए। उन्होंने आगामी स्वच्छता सर्वेक्षण में उच्च स्थान प्राप्त करने के लिए एक कार्य योजना तैयार करने का भी निर्देश दिया।

बैठक में स्वास्थ्य अधिकारी श्री राजेश मिश्रा, मिशन क्लीन सिटी सहायक प्रभारी श्री पवन कुर्रे, जिला समन्वयक एस.बी.एम. श्री देवेश साहू, श्री कीर्तन साहू और एस.एल.आर.एम. सेंटर प्रभारी उपस्थित थे।

कैसे राजी हुआ पाकिस्तान? किसके कहने पर लिया यू-टर्न? ICC ने कितनी शर्तें मानी? लाहौर मीटिंग की इनसाइड स्टोरी…

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कुछ दिन पहले तक पाकिस्तान, भारत के साथ मैच ना खेलने की बात पर अडिग था. मगर अब उसने यू-टर्न लेते हुए 15 फरवरी को टी20 वर्ल्ड कप में टीम इंडिया के साथ खेलने के लिए हामी भर दी है. आखिर पाकिस्तान बॉयकॉट के फैसले को बदलने के लिए राजी कैसे हो गया?

आईसीसी, पीसीबी और बीसीबी प्रतिनिधियों के बीच लाहौर में हुई उस बैठक में आखिर ऐसा क्या हुआ, जिसके एक दिन बाद ही पाकिस्तान ने अपना बॉयकॉट का फैसला बदल दिया. पाकिस्तान ने कुछ शर्तें भी रखी थीं, उनमें से कुछ शर्तों को आईसीसी ने मान भी लिया. क्या केवल मांगों के माने जाने पर ही पाकिस्तान ने अपना फैसला बदला? यहां जानिए इस मामले की पूरी इनसाइड स्टोरी.

किसके कहने पर लिया यू-टर्न?

पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड और बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड के साथ लाहौर में हुई बैठक में इमरान ख्वाजा आईसीसी के प्रतिनिधियों में से एक रहे. इमरान ख्वाजा आईसीसी के उपाध्यक्ष हैं और क्रिकेट जगत में उनका नाम बहुत सम्मान से लिया जाता है. बताया जा रहा है कि पाकिस्तान के फैसले बदलने में उनका बहुत बड़ा हाथ रहा.

इमरान ख्वाजा पेशे से एक लॉयर हैं. चूंकि आईसीसी के एसोसिएट और फुल मेंबर देश भी इमरान ख्वाजा को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, ऐसे में आमतौर पर राजनीतिक रूप से संवेदनशील मुद्दों का हल निकालने के लिए ICC, ख्वाजा को ही आगे करता है. पीसीबी और बीसीबी के साथ बैठक में ख्वाजा की भागीदारी साफ कर रही थी कि इस मसले का हल निकालने के लिए आईसीसी को उनपर पूरा भरोसा था.

पाकिस्तान की कितनी मांगें स्वीकार हुईं?

पाकिस्तान ने उस बैठक में कई सारी मांगें रखी थीं. उनमें से बांग्लादेश के टी20 वर्ल्ड कप 2026 से बाहर होने के बावजूद उसे मुआवजा देने की मांग स्वीकार ली गई. बताया जा रहा है कि मुआवजे के तौर पर बांग्लादेश को आईसीसी टूर्नामेंटट्स की मेजबानी मिल सकती है. वहीं बांग्लादेश के आईसीसी राजस्व पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा.

दूसरी ओर पाकिस्तान की आईसीसी राजस्व में हिस्सा बढ़ाने की मांग विचाराधीन है, जिसको लेकर आईसीसी का कहना था कि वो इस पर विचार करेगा. वहीं भारत के साथ द्विपक्षीय सीरीज को दोबारा शुरू करने की मांग को आईसीसी ने साफतौर पर ठुकरा दिया था. पाकिस्तान-बांग्लादेश-भारत की त्रिकोणीय सीरीज की डिमांड भी की गई, लेकिन आईसीसी ने इसे अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर बताकर ठुकरा दिया था. साथ ही बीसीसीआई की पाकिस्तानी खिलाड़ियों के साथ नो-हैंडशेक पॉलिसी को बदले जाने की मांग को भी आईसीसी ने खारिज कर दिया था.

चंद्रयान-4 मिशन में ISRO की बड़ी उपलब्धि, तकनीक ऐसी कि दो साल पहले ही हासिल कर लिया ये मुकाम…

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भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने चंद्रयान-4 मिशन के लिए एक अहम उपलब्धि हासिल करते हुए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र में लैंडर के उतरने का स्थान तय कर लिया है। बड़ी बात यह है कि मिशन की लॉन्चिंग से कम से कम दो साल पहले ही लैंडिंग साइट की पहचान कर ली गई है, जिसे इसरो की तकनीकी तैयारी में बड़ा कदम माना जा रहा है।

केंद्र सरकार पहले ही चंद्रयान-4 मिशन को मंजूरी दे चुकी है। इस मिशन के तहत चंद्रमा की सतह से नमूने पृथ्वी पर लाए जाएंगे, जिससे यह भारत का अब तक का सबसे जटिल और महत्वाकांक्षी चंद्र मिशन बन जाएगा।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के अध्यक्ष वी. नारायणन ने पहले कहा था, “हम चंद्रयान-4 के लिए 2028 का लक्ष्य रख रहे हैं।” इसरो के अधिकारियों के अनुसार, उन्होंने मोंस माउटन (एमएम) क्षेत्र के चार स्थलों का चयन किया और उनमें से एक को चंद्रमा की सतह पर उतरने के लिए उपयुक्त पाया। मोंस माउटन चंद्रमा का एक क्षेत्र है। अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने एमएम-1, एमएम-3, एमएम-4 और एमएम-5 स्थानों की पहचान की, जिनमें से एमएम-4 को लैंडिंग के लिए चुना गया।

एमएम-4 को उपयुक्त जगह माना

उन्होंने कहा, “मोंस माउंटेन क्षेत्र के चारों स्थलों को उनकी ऊंचाई और जमीन की आकृति के आधार पर ऑर्बिटर हाई रिजॉल्यूशन कैमरा (ओएचआरसी) और विभिन्न तस्वीरों की मदद से पूरी तरह से जांचा गया।” अधिकारियों ने कहा, “इस दौरान पता चला कि एमएम-4 के आसपास एक किलोमीटर लंबा और एक किलोमीटर चौड़ा क्षेत्र सबसे सुरक्षित है। यहां की औसत ढलान पांच डिग्री, औसत ऊंचाई 5334 मीटर है, और 24 मीटर लंबे व 24 मीटर चौड़े सबसे ज्यादा सुरक्षित ग्रिड हैं। इसलिए, चंद्रयान-4 मिशन के लिए एमएम-4 को उपयुक्त जगह माना जा सकता है।”

कुल पांच प्रमुख मॉड्यूल शामिल

चंद्रयान-4 में पांच मुख्य हिस्से प्रोपल्शन मॉड्यूल (पीएम), डिसेंडर मॉड्यूल (डीएम), एसेंडर मॉड्यूल (एएम), ट्रांसफर मॉड्यूल (टीएम) और री-एंट्री मॉड्यूल (आरएम) हैं। डीएम और एएम से मिलकर एक स्टैक बनेगा, जो चंद्रमा की निर्धारित सतह पर धीरे-धीरे उतरेगा। एएम और डीएम के सही मार्ग और नेविगेशन, गाइडेंस और कंट्रोल सिस्टम की मदद से मुख्य लैंडिंग होगी। साथ ही, सुरक्षित लैंडिंग के लिए ऐसा लैंडिंग स्थल चुना जाएगा जो लैंडर की सभी जरूरतों के अनुरूप हो।

यह दावा गलत कि लोकसभा में प्रधानमंत्री को खतरा नहीं था, क्यों आया ये स्पष्टीकरण…

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कुछ विपक्षी नेताओं का यह दावा निराधार है कि बीते गुरुवार को सदन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कोई तात्कालिक खतरा नहीं था। लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने सोमवार को यह बात कही। इसमें कहा गया है कि उस दिन सदन के घटनाक्रमों से लग रहा था कि कुछ भी अप्रत्याशित हो सकता है।

यह स्पष्टीकरण उस वक्त आया है, जब नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने संसद परिसर में मीडिया से बातचीत में कहा कि प्रधानमंत्री पर सदन में किसी विपक्षी सदस्य द्वारा हमला करने का कोई सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने कहाकि अगर किसी ने कोई ऐसी हरकत करने को कहा भी हो तो प्राथमिकी दर्ज करके उसे तत्काल गिरफ्तार किया जाना चाहिए।

सही परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत

लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने कहाकि आरोप लगाया गया है कि लोकसभा अध्यक्ष द्वारा प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने के लिए सदन में न आने की दी गई सलाह तथ्यों से परे थी। प्रधानमंत्री को कोई तात्कालिक खतरा नहीं था। उन्होंने कहाकि विषय को सही परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए यह जरूरी है कि अध्यक्ष द्वारा दिए गए उक्त वक्तव्य को उस दिन सदन में उत्पन्न हुई गंभीर एवं अभूतपूर्व अव्यवस्था की पृष्ठभूमि में देखा जाए। कार्यवाही के आरंभ से ही सदन का वातावरण तेजी से बिगड़ गया था, जिससे सुरक्षा, शिष्टाचार तथा संसदीय कार्यप्रणाली की गरिमा को लेकर गंभीर चिंताएं उत्पन्न हो गई थीं। इसके मुताबिक कार्यवाही के बीच में ही विपक्षी दलों के कई सांसद स्थापित संसदीय मर्यादाओं की खुलेआम अवहेलना करते हुए आसन के निकट पहुंच गए। स्थिति उस समय और अधिक बिगड़ गई जब कुछ सदस्यों ने मेज के आसपास आकर सरकारी कागजात फाड़े और उन्हें पीठासीन सभापति की ओर फेंका।

महिला सांसदों के रुख पर चिंता

आगे कहा गया कि यह कृत्य अनुशासनहीनता को दर्शाते हैं और लोकसभा में घटित सबसे दुर्भाग्यपूर्ण एवं अवांछनीय घटनाओं में से एक थे। इन पर न केवल सदन के भीतर बल्कि देश और विदेश में भी व्यापक स्तर पर चिंता व्यक्त की गई। सूत्रों का दावा है कि इस अव्यवस्था के बीच, कई महिला सांसद आक्रामक रूप से प्रधानमंत्री की सीट की ओर बढ़ीं और उसके चारों ओर एक प्रकार का घेरा बना लिया। और भी चिंताजनक यह था कि कुछ महिला सदस्य बैनर और तख्तियां लेकर सत्तापक्ष की दीर्घा की ओर बढ़ गईं और खुले तौर पर टकराव की मुद्रा में थीं। उन्होंने न केवल प्रधानमंत्री की सीट को घेर लिया, बल्कि उन स्थानों तक भी पहुंच गईं जहां वरिष्ठ मंत्री बैठे थे, जिससे सदन के भीतर अव्यवस्था और असुरक्षा की भावना और बढ़ गई।

लोकसभा अध्यक्ष कक्ष का किया रुख

सूत्रों के मुताबिक उसी दिन, विपक्षी सदस्यों ने लोकसभा अध्यक्ष के कक्ष का रुख किया। वहां उन्होंने असंसदीय भाषा का प्रयोग किया और देखते हैं पीएम का क्या करते हैं जैसे धमकी भरे वक्तव्य दिए। ऐसा आचरण माननीय सांसदों के लिए पूरी तरह से अनुचित था और उस दिन की स्थिति की गंभीरता को और अधिक बयां करता है। उन्होंने कहाकि इन घटनाक्रमों को देखते हुए, माननीय अध्यक्ष को प्रधानमंत्री की सुरक्षा तथा सदन में व्यवस्था बनाए रखने को लेकर वास्तविक और ठोस चिंताएं थीं। ऐसे समय में प्रधानमंत्री को सदन में प्रवेश न करने की दी गई सलाह का उद्देश्य केवल संसदीय कार्यों के सुचारु संचालन को सुनिश्चित करना तथा संसद की गरिमा और पवित्रता की रक्षा करना था। सदन में शिष्टाचार, मर्यादा और व्यवस्था बनाए रखना माननीय अध्यक्ष का सर्वोपरि संवैधानिक दायित्व है, और उनके सभी कार्य इसी दायित्व से प्रेरित थे।

पाकिस्तान की उड़ेगी नींद, सुपरपावर बनने को तैयार है IAF; 114 राफेल खरीदने की तैयारी में भारत…

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फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के भारत दौरे से ठीक पहले रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) में 114 राफेल लड़ाकू विमानों की मेगा डील को मंजूरी मिलने की तैयारी जोरों पर है। करीब 3.25 लाख करोड़ रुपये की इस खरीद से IAF का बेड़ा मजबूत होगा और ‘मेक इन इंडिया’ को नई ऊंचाई मिलेगी।

DAC की बैठक 12 फरवरी 2026 को होने वाली है, जहां आवश्यकता स्वीकृति (Acceptance of Necessity) दी जा सकती है। मैक्रों 18-20 फरवरी के आसपास AI Impact Summit के लिए भारत आएंगे, और इस दौरान डील को आगे बढ़ाने या फाइनल टच देने की संभावना है।

प्रस्ताव के मुताबिक, भारत फ्रांसीसी कंपनी डसॉल्ट एविएशन से 18 तैयार (फ्लाई-अवे) राफेल विमान खरीदेगा, जबकि बाकी 96 लड़ाकू विमान भारत में निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ साझेदारी में बनाए जाएंगे। इनमें से कई विमान दो-सीट वाले होंगे, जिनका इस्तेमाल प्रशिक्षण के लिए किया जाएगा। रक्षा अधिग्रहण परिषद द्वारा भारतीय वायुसेना को 114 राफेल बहु-भूमिका लड़ाकू विमानों की खरीद के लिए आवश्यकता स्वीकृति (AoN) देने की उम्मीद है। रक्षा खरीद नियमों के अनुसार, परिषद से AoN मिलना खरीद प्रक्रिया का पहला औपचारिक कदम है। डीपीबी से पहले ही मंजूरी मिल चुकी है।

डीएसी की मंजूरी के बाद अगला चरण वाणिज्यिक बातचीत होगा, और फिर इस योजना को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली सुरक्षा मामलों की कैबिनेट समिति (CCS) से हरी झंडी मिलनी होगी। अधिकारियों ने पहले ही बताया था कि प्रस्तावित 114 विमानों की खरीद से भारतीय वायुसेना की समग्र क्षमता में होने वाली वृद्धि की अनुमानित लागत लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये होगी।

गौरतलब है कि भारत के पास पहले से ही 36 राफेल लड़ाकू विमान मौजूद हैं, जिन्हें पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तैनात किया गया था। ये विमान उन लड़ाकू विमानों में शामिल थे जिन्होंने पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी तथा सैन्य ठिकानों पर भारतीय हमलों में अहम भूमिका निभाई थी।

बता दें कि राफेल जेट उन्नत हथियारों से लैस हैं, जिनमें स्कैल्प मिसाइलें, मेटियोर हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें और हैमर सटीक निर्देशित बम शामिल हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इन हथियारों ने न सिर्फ पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को तबाह किया, बल्कि पाकिस्तानी विमानों को भी नष्ट किया। अक्तूबर 2025 में वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने नए लड़ाकू विमानों समेत सैन्य उपकरणों को तेजी से शामिल करने की जरूरत पर जोर दिया था।

उन्होंने कहा था कि राफेल भारतीय वायुसेना के लड़ाकू बेड़े को मजबूत करने के प्रमुख विकल्पों में से एक है। साथ ही उन्होंने विदेशी मूल उपकरण निर्माता और भारतीय कंपनी के बीच साझेदारी से भारत में 114 बहु-भूमिका लड़ाकू विमानों के निर्माण की आवश्यकता पर बल दिया। रक्षा खरीद बोर्ड (डीपीबी) द्वारा पिछले महीने हरी झंडी मिलने के बाद यह प्रस्ताव अब डीएसी के समक्ष रखा जा रहा है। डीपीबी की अध्यक्षता रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह कर रहे हैं।

बिना शादी के बच्चे पैदा करने में ये देश सबसे आगे, जानें भारत के पड़ोसी और एशिया का हाल…

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शादी, परिवार और संतान… जिन्हें कभी समाज की स्थायी नींव माना जाता था, लेकिन बदलते समय में दुनिया के कई हिस्सों में ये अवधारणाएं नए सिरे से परिभाषित हो रही हैं। बदलती जीवनशैली, कानूनी व्यवस्था और सामाजिक स्वीकृति के कारण विवाह के बाहर बच्चों का जन्म कुछ देशों में सामान्य हो चुका है, जबकि कहीं यह अभी भी सामाजिक कलंक बना हुआ है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, कई देशों में विवाह के बाहर बच्चों का जन्म अब आम बात हो गई है। हालांकि एशिया और कुछ अन्य क्षेत्रों में यह प्रवृत्ति अभी भी बहुत कम है। ये बदलाव सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े हैं, जहां विवाह हर जगह संतान प्राप्ति की शर्त नहीं रहा। यूं कहें तो बिना शादी के परिवार बसाना कई जगहों पर ‘न्यू नॉर्मल’ बन गया है।

ओईसीडी (OECD) के नए आंकड़ों के अनुसार, विश्व के कई देशों में औसतन लगभग 43% बच्चे विवाह के बाहर पैदा हो रहे हैं। यानी बिना शादी के महिलाएं मां बन रही हैं। आइए जानते हैं कि इस मामले में कौन-से देश सबसे आगे हैं…

सबसे आगे लैटिन अमेरिका

लैटिन अमेरिकी देश इस मामले में सबसे आगे हैं। कोलंबिया में 87% बच्चे विवाह के बाहर जन्म ले रहे हैं। इसके बाद चिली (78.1%), कोस्टा रिका (74%) और मैक्सिको (73.7%) का नंबर आता है। यहां लिव-इन रिलेशनशिप लंबे समय से सामाजिक और कानूनी रूप से स्वीकार्य है, जिससे औपचारिक शादी की जरूरत कम हो गई है। ऐतिहासिक असमानता और कानूनी पहुंच की कमी ने भी इन बदलावों को बढ़ावा दिया है।

नॉर्डिक देशों में कल्याण व्यवस्था के साथ हाई रेशियो

नॉर्डिक देशों ने परिवार के मानदंडों को नए सिरे से परिभाषित किया है। आइसलैंड में 69.4%, नॉर्वे में 61.2%, स्वीडन में 58% (लगभग) और डेनमार्क में 55% के आसपास बच्चे विवाह के बाहर पैदा हो रहे हैं। यहां मजबूत सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था और बच्चों को माता-पिता की वैवाहिक स्थिति से अलग कानूनी संरक्षण मिलने से विवाह अब व्यक्तिगत चुनाव बन गया है। लिव इन में रहने वाले जोड़ों को विवाहित जोड़ों के बराबर अधिकार प्राप्त हैं।

एशिया और पूर्वी भूमध्यसागरीय में न्यूनतम दरें

दूसरी ओर एशिया के कई देशों में स्थिति बिल्कुल उलट है। जापान में सिर्फ 2.4%, दक्षिण कोरिया में 4.7%, तुर्की में 3.1%, इजरायल में 8.6% और ग्रीस में 9.7% बच्चे विवाह के बाहर जन्म लेते हैं। यहां सांस्कृतिक मूल्य, धार्मिक परंपराएं और सख्त कानूनी ढांचा विवाह को संतान से जोड़े रखते हैं। एकल माता-पिता को सामाजिक कलंक और कम सहायता मिलने से यह प्रवृत्ति दबाव में रहती है।

भारत जैसे देशों में भी विवाह के बाहर जन्म की दर बहुत कम बनी हुई है। यही विवाद के बाहर बच्चों की जन्म दर एक फीसदी से भी कम है। भारत के पड़ोसी देशों और एशिया में भी यही स्थिति है, जहां सांस्कृतिक और सामाजिक मानदंड विवाह को प्राथमिकता देते हैं।

एंग्लो-अमेरिकी और पश्चिमी यूरोप

संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस और ज्यादातर पश्चिमी यूरोपीय देश बीचों बीच खड़े हैं। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में लगभग 40 प्रतिशत बच्चे विवाह के बाहर पैदा होते हैं, जो ऑस्ट्रिया और इटली के स्तर के करीब है।

इन आंकड़ों से साफ है कि विवाह के बाहर बच्चों का जन्म सिर्फ सामाजिक बदलाव नहीं, बल्कि कानूनी संरचना, कल्याणकारी नीतियों और सांस्कृतिक स्वीकार्यता का संयुक्त परिणाम है। आने वाले वर्षों में यह अंतर और बढ़ सकता है, जिसका असर भारत समेत अन्य एशियाई देशों पर भी पड़ सकता है।

ट्रेड डील नहीं, अमेरिका के पक्ष में झुका समझौता; पूर्व वित्तमंत्री ने उठा दिया बड़ा सवाल…

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भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील के बीच पूर्व वित्तमंत्री पी चिदंबरम ने बड़ा दावा किया है। वरिष्ठ कांग्रेसी नेता का कहना है कि यह कोई ट्रेड डील नहीं है। बल्कि यह एक अंतरिम समझौता है, जिसे द्विपक्षीय ट्रेड डील कहकर सेलिब्रेट किया जा रहा है।

पी चिदंबरम ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि दोनों पक्षों द्वारा साइन किया हुआ कोई डील डॉक्यूमेंट पब्लिक डोमेन में मौजूद नहीं है। उन्होंने कहाकि हमें जो उपलब्ध कराया गया है वह वाइट हाउस द्वारा जारी किया गया एक संयुक्त वक्तव्य है। इस संयुक्त वक्तव्य को पढ़ने के बाद मैं यही कह सकता हूं कि यह पूरी तरह से अमेरिका के पक्ष में झुका हुआ है।

सरकार बचना क्यों चाहती है

पी चिदंबरम ने आगे कहाकि सेक्शन 232 जांच भी पब्लिक में जारी नहीं की गई है। एनडीटीवी के मुताबिक यूपीए सरकार के दौरान वित्तमंत्री रहे चिदंबरम ने कहाकि बिना इन कागजातों और जांच की डिटेल के आप संयुक्त वक्तव्य से क्या हासिल कर लेंगे। उन्होंने कहाकि मैं सिर्फ इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि यह अंतरिम समझौता भर है। जो, एक अंतरिम समझौता बन सकता है।

जब चिदंबरम से पूछा गया कि वह सरकार से क्या चाहते हैं? इस पर उन्होंने कहाकि आखिर सरकार राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा पारित आदेशों को सामने लाने से बचना क्यों चाहती है। सरकार को यह बताना चाहिए कि आखिर डोनाल्ड ट्रंप के आदेशों में है क्या? चिदंबरम ने यह भी सवाल उठाया कि क्या सरकार को सेक्शन 232 इंवेस्टिगेशन के बारे में नहीं पता? अगर उसे इस बारे में जानकारी नहीं है तो फिर उसने संयुक्त वक्तव्य जारी ही क्यों किया।

कैसे कहेंगे डिप्लोमैटिक जीत?

इस डील को भारत की डिप्लोमैटिक जीत कहे जाने पर भी चिदंबरम ने नाखुशी जताई। उन्होंने कहाकि मुझे यह बात समझ नहीं आ रही है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहाकि वह भारत-अमेरिका ट्रेड एग्रीमेंट के बारे में कुछ नहीं जानते। अगर विदेश मंत्री को ही इस बारे में जानकारी नहीं है तो मैं इसे कैसे डिप्लोमैटिक जीत मान लूं। उन्होंने यह भी कहा कि इस सौदे में मौजूद असमानता उनके लिए चिंता का विषय थी।

चिदंबरम ने आगे कहाकि अप्रैल 2025 से पहले टैरिफ क्या थे? यह औसतन दो से तीन प्रतिशत के बीच था। कुछ वस्तुओं में, यह थोड़ा अधिक हो सकता था… अप्रैल 25 से पहले के टैरिफ की तुलना में, यह एक बड़ा उछाल है।

खराब हेयर कटिंग पर कंज्यूमर फोरम ने ठोका 2 करोड़ का जुर्माना, SC ने घटाकर 25 लाख किया…

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सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद चर्चित मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के उस फैसले को आंशिक रूप से पलट दिया है जिसमें दिल्ली के प्रतिष्ठित होटल आईटीसी मौर्य को एक मॉडल के खराब हेयरकट के लिए 2 करोड़ रुपये का भारी-भरकम मुआवजा देने का आदेश दिया गया था।

जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने स्पष्ट किया कि करोड़ों रुपये के मुआवजे का दावा विश्वसनीय सबूतों द्वारा समर्थित नहीं था।

अदालत ने कहा, “मुआवजा केवल अनुमानों या शिकायतकर्ता की सनक और इच्छाओं के आधार पर नहीं दिया जा सकता है। विशेष रूप से जब दावा करोड़ों रुपये का हो तो हर्जाना साबित करने के लिए विश्वसनीय सबूत पेश किए जाने चाहिए।”अदालत ने मुआवजे की राशि को घटाकर 25 लाख रुपये कर दिया है। यह राशि मॉडल को पहले ही जारी की जा चुकी थी।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला अप्रैल 2018 का है। मॉडल आशना रॉय एक इंटरव्यू के लिए जाने वाली थीं। उससे पहले वह नई दिल्ली के आईटीसी मौर्य होटल के सैलून में हेयरकट के लिए गई थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके बालों को निर्देश से बहुत छोटा काट दिया गया। इसके बाद होटल ने उन्हें मान-मनौव्वल के लिए मुफ्त उपचार की पेशकश की, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। हालांकि, रॉय ने बाद में दावा किया कि उस उपचार से उनके बालों और खोपड़ी को नुकसान पहुंचा।

इसके बाद, रॉय ने उपभोक्ता फोरम का रुख किया और सेवा में कमी का आरोप लगाते हुए लिखित माफी के साथ-साथ उत्पीड़न, अपमान और मानसिक आघात के लिए 3 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की।

NCDRC के फैसले पर क्या बोला SC?

सितंबर 2021 में NCDRC ने आईटीसी को सेवा में कमी का दोषी पाया और रॉय को 2 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। होटल ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। फरवरी 2023 में शीर्ष अदालत ने सेवा में कमी के निष्कर्ष को तो बरकरार रखा, लेकिन मुआवजे की राशि को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा था कि इतनी अधिक राशि को सही ठहराने के लिए रिकॉर्ड में कोई सामग्री नहीं है। मामले को हर्जाने का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए आयोग के पास वापस भेज दिया गया था।

दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट का रुख

मामला दोबारा NCDRC के पास जाने पर मॉडल ने अपना दावा बढ़ाकर 5.2 करोड़ रुपये कर दिया और यह दिखाने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज पेश किए कि उन्होंने महत्वपूर्ण पेशेवर अवसर खो दिए हैं। NCDRC ने 9% प्रति वर्ष की दर से ब्याज के साथ 2 करोड़ रुपये के दंड को फिर दोहराया। इसके बाद आईटीसी को दोबारा सुप्रीम कोर्ट जाना पड़ा।

मामले की ताजा सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह कोई ऐसा मामला नहीं था जहां मुआवजे का निर्धारण किसी अनुमान के आधार पर किया जा सके। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता को सेवा में कमी के कारण हुए वास्तविक नुकसान को साबित करना था।

अदालत ने गौर किया कि शिकायतकर्ता ने अपने दावे का समर्थन करने के लिए मुख्य रूप से ईमेल, प्रमाणपत्रों और संचार की फोटोकॉपी पर भरोसा किया था। अदालत ने कहा, “दस्तावेजों की केवल फोटोकॉपी पेश करके नुकसान साबित नहीं किया जा सकता है। अपीलकर्ता (आईटीसी) द्वारा बताई गई फोटोकॉपी में विसंगतियां भी नोट की गई हैं। इस प्रकार मामले के दोबारा मूल्यांकन के बाद भी शिकायतकर्ता इतनी बड़ी राशि के मुआवजे का मामला बनाने में सक्षम नहीं रही है।”

सावरकर को भारत रत्न दिलाना है तो BJP से बात करें, संजय राउत ने मोहन भागवत पर कसा तंज…

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शिवसेना (UBT ) के राज्यसभा सांसद और मुख्य प्रवक्ता संजय राउत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत को भाषणों में मुद्दा उठाने के बजाय भाजपा सरकार से सीधे विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न देने के लिए कहना चाहिए।

राउत ने कहा, ‘जब केंद्र में उनकी ही सरकार है और स्वयंसेवक सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर हैं, तो सावरकर को भारत रत्न क्यों नहीं दिया जाता , लाखों स्वयंसेवकों ने इस सरकार को सत्ता में लाने के लिए काम किया है। मोहन भागवत को यह बात सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से कहनी चाहिए, न कि मंच से भाषण में।’

यह मुद्दा तब प्रमुखता में आया जब आरएसएस प्रमुख ने मुंबई में ‘100 ईयर्स ऑफ संघ जर्नी-न्यू होराइजन्स” कार्यक्रम में कहा कि सावरकर को भारत रत्न देने से इस सम्मान की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।राउत ने भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते (बीटीए) के ढांचे की भी आलोचना की और अच्छे दिन नहीं आने के लिए संघ को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा को तो’अच्छे दिन मिले, लेकिन देश को नहीं। उन्होंने कहा कि भारत अमेरिका की शर्तों के आगे झुक गया है और इसकी जिम्मेदारी संघ नेतृत्व को लेनी चाहिए।

संयुक्त बयान के अनुसार, अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर 18 प्रतिशत का पारस्परिक शुल्क लगाएगा, जिसमें वस्त्र, चमड़ा, प्लास्टिक-रबर, ऑर्गेनिक केमिकल, होम डेकोर और कुछ मशीनरी शामिल हैं। विपक्ष ने इस समझौता ढांचे की आलोचना करते हुए कहा है कि इसके तहत भारत अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं पर शुल्क समाप्त या कम करेगा। साथ ही अमेरिका से आने वाले कई खाद्य और कृषि उत्पादों-जैसे ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स, पशु चारे के लिए लाल ज्वार, मेवे, ताजे और प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स आदि पर भी टैरिफ में कटौती या समाप्ति की जाएगी।

राउत ने आरएसएस शताब्दी कार्यक्रम में गायक अदनान सामी की उपस्थिति पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि अदनान सामी के पिता 1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान पाक वायुसेना में थे और पठानकोट एयरबेस हमले से जुड़े थे। उन्होंने सवाल उठाया, ”ऐसे व्यक्ति के परिवार से जुड़े शख्स को सम्मानित कर किस तरह की देशभक्ति दिखाई जा रही है।”

शिल्पा शेट्टी पर भी निशाना

राउत ने कहा, ‘एक अभिनेत्री वहां खड़ी होकर ‘आई लव भागवत’ कह रही थीं, जबकि उनके खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं के मामले में लुकआउट नोटिस जारी किया गया था। इतना ही नहीं, उनके पति पर अश्लील फिल्म बनाने से जुड़े एक गंभीर मामले का आरोप है। ऐसे संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले लोगों को आमंत्रित कर संघ किस तरह का चरित्र प्रस्तुत कर रहा है , जो लोग बैंक ऋण में चूक करते हैं और कानून के खिलाफ हैं, वे संघ के मंच पर आकर अपने पापों को ढकने की कोशिश कर रहे हैं।’

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कार्यक्रम में ऐसे लोगों को महत्व दिया गया जिन पर आर्थिक अनियमितताओं या अन्य गंभीर मामलों के आरोप रहे हैं। राउत ने कहा कि जिन प्रतिष्ठित व्यक्तियों के परिवारों का स्वतंत्रता संग्राम से संबंध रहा, जैसे जावेद अख्तर या शाहरुख खान, उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया। उन्होंने कहा, ‘हम संघ का सम्मान करते हैं, लेकिन जिस तरह विवादित पृष्ठभूमि वाले लोगों को महत्व दिया जा रहा है, उससे नैतिक पतन झलकता है।’

दुनिया में मचा हाहाकार तो भारत के पास कितने दिन का पेट्रोल भंडार, सरकार ने बताया…

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पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सोमवार को राज्यसभा को बताया कि वैश्विक उथल-पुथल की किसी स्थिति में उत्पन्न मांग को पूरा करने के लिए भारत का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार 74 दिनों के लिए पर्याप्त है।

पुरी उच्च सदन में प्रश्नकाल के दौरान पूरक प्रश्नों का उत्तर दे रहे थे।

उन्होंने कहा कि भारत जैसे देश के लिए, जो तेज गति से विकास कर रहा है, व्यवहार्य और सुरक्षित तेल भंडार आवश्यक है, ताकि वैश्विक उथल-पुथल की स्थिति में वह कमजोर स्थिति में नहीं हो। उन्होंने कहा कि भारत के पश्चिमी तट के साथ-साथ पूर्वी तट पर भी तेलशोधक संयंत्र हैं।

पुरी ने कहा, ‘अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार, आज हम विश्व में कच्चे तेल के तीसरे सबसे बड़े उपभोक्ता हैं। कच्चे तेल की हमारे पास विश्व की चौथी सबसे बड़ी शोधन क्षमता है। वर्तमान में लगभग 26 करोड़ मीट्रिक टन प्रति वर्ष है, जो बढ़कर 32 करोड़ मीट्रिक टन प्रति वर्ष हो जाएगी। और, हम विश्व में पेट्रोलियम उत्पादों के पांचवें सबसे बड़े निर्यातक भी हैं।’

उन्होंने कहा कि रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार यह सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है कि वैश्विक स्तर पर किसी भी प्रकार की उथल-पुथल की स्थिति में, हमारे पास अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त भंडार मौजूद हो। उन्होंने कहा कि आईईए के अनुसार, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार के तहत करीब 90 दिनों का भंडार होना चाहिए।

पुरी ने कहा कि भारत अपने भंडार का आकलन अपने तेलशोधक संयंत्रों में भी करता है। उन्होंने कहा कि अगर देश के कुल भंडारों को एक साथ देखें तो यह 74 दिनों के लिए पर्याप्त है। उन्होंने कहा कि आदर्श रूप से, यह 90 दिनों का होना चाहिए।

उन्होंने कहा, ‘मंत्री के रूप में, मैं 74 दिनों के भंडार के साथ सुरक्षित महसूस करता हूं। लेकिन, हम भविष्य में इसे और बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं।’ पुरी ने कहा, ‘कुल मिलाकर, रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार आर्थिक स्थिरता का बहुत महत्वपूर्ण घटक है। यह हमारी ऊर्जा सुरक्षा का महत्वपूर्ण घटक है।’

इसके अलावा, उन्होंने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा, ‘सरकार ने इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व लिमिटेड (ISPRL) नामक विशेष कदम के जरिए आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में तीन स्थानों पर 53.3 लाख मीट्रिक टन कच्चे तेल की कुल क्षमता वाली रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार सुविधाएं स्थापित की हैं। इन भंडारों में उपलब्ध कच्चे तेल की मात्रा बाजार की स्थितियों के आधार पर बदलती रहती है।