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कैब में प्रेमी के साथ घूम रही थी पत्नी, गुस्साए पति ने बीच सड़क पर जमकर पीटा

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उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले में 10 अक्टूबर को एक पति, पत्नी और वो का ड्रामा देखने को मिला है। यहां ब्वॉयफ्रेंड के साथ कैब में घूम रही अपनी पति को देखकर गुस्साए पति ने दोनों की बीच सड़क पर पिटाई कर दी। बीच सड़क पर मारपीट होता देख मौके पर राहगीरों की भीड़ लग गई। इस बीच एक राहगीर ने पति, पत्नी और वो का बवाल देखकर वीडियो बना लिया। अब यह वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कानपुर जिले के बर्रा के जरौली इलाके में रहने वाले युवक की शादी 6 साल पहले एक युवती से हुई थी। वह डीटीएच की छतरी लगाने का काम करता है। उसके 5 साल की बेटी भी है। उसने बताया कि उसकी विक्की मल्होत्रा नाम के युवक से उसकी पत्नी की 8 माह पहले दोस्ती हुई थी। विक्की एमआर की जॉब करता है। युवक ने बताया कि गुरुवार को वह नौबस्ता में काम कर रहा था, तभी उसने पत्नी को विक्की के साथ एक कैब में बैठता देखा।

इसके बाद उसने बाइक से कैब का पीछा किया और अनवरगंज इलाके में उसे रोक लिया। नाराज युवक ने दोनों को कैब से निकाला और फिर विक्की की जमकर पिटाई की। युवक ने बताया कि जरौली में जहां हमारा घर है उसके ठीक बगल में विक्की ने प्लाट खरीदा था। विक्की का प्लाट बन रहा था तो उसने निर्माण के लिए पानी मांगा था। इसके साथ ही मेरे घर पर ही सीमेंट की बोरियां रखवाई थीं। इसी दौरान विक्की ने उसकी पत्नी की नजदीकी बढ़ीं। उसने बताया कि चार माह पहले उसे पत्नी के अफेयर की जानकारी मिली। जिसका उसने विरोध किया और बर्रा थाने में लिखित शिकायत की थी। इसके बाद पुलिस ने उनका लिखित समझौतानामा कराया था। इस घटना के बाद से ही पत्नी 5 साल की बेटी को छोड़कर मायके में रह रही थी।

छत्तीसगढ़ – मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल से लवन के नागरिकों ने की मुलाकात : लवन को तहसील का दर्जा देने के लिए दिया धन्यवाद…

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मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल से कल रात यहां उनके निवास कार्यालय में विधायक सुश्री शकुंतला साहू के नेतृत्व में बलौदाबाजार जिले के लवन क्षेत्र के नागरिकों के प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात की। उन्होंने लवन को तहसील का दर्जा देने की घोषणा के लिए मुख्यमंत्री को धन्यवाद दिया। प्रतिनिधिमंडल में सर्वश्री अनुराग पाण्डेय, देवीलाल बारवे, पुन्नूराम बंजारे, प्रताप डहरिया, अभिषेक पाण्डेय, मृत्युन्जय वर्मा, बनवारी बारवे और विनोद अनंत शामिल थे। प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से लवन नगर पंचायत की जल आवर्धन  योजना का कार्य जल्द पूर्ण कराने का आग्रह किया। लगभग 11 करोड़ रूपए की लागत से इस जल आवर्धन योजना के लिए पानी लाने हेतु 10 किलोमीटर दूर शिवनाथ नदी से पाइप लाइन बिछाई जा रही है। पानी टंकी और फिल्टर प्लांट का कार्य पूरा हो गया है। प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री को लवन आने का आमंत्रण भी दिया।

छत्तीसगढ़ – 13 अक्टूबर को लोकवाणी की तीसरी कड़ी का प्रसारण…

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मुख्यमंत्री की मासिक रेडियोवार्ता लोकवाणी की तीसरी कड़ी का प्रसारण आगामी 13 अक्टूबर को होगा। लोकवाणी का प्रसारण छत्तीसगढ़ स्थित आकाशवाणी के सभी केन्द्रों, एफ.एम. रेडियो तथा क्षेत्रीय न्यूज चैनलों से सुबह 10.30 से 10.55 बजे तक होगा।

उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल ने समाज के हर वर्ग की भावनाओं, सवालों और सुझावों से अवगत होने तथा अपने विचार साझा करने के लिए लोकवाणी रेडियोवार्ता प्रारंभ की है। लोकवाणी में इस बार का विषय ‘स्वास्थ्य एवं मातृशक्ति‘ रखा गया है।

प्रियंका गांधी रायबरेली में 3 दिवसीय कार्यशाला आयोजित करेंगी…

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कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा उत्तर प्रदेश कांग्रेस की नई टीम के सदस्यों के लिए तीन दिवसीय कार्यशाला 14 से 16 अक्टूबर तक रायबरेली में आयोजित करेंगी। कार्यशाला के दौरान कमेटी के नए सदस्यों को जनता से जुड़े रहने और उनके प्रासंगिक मुद्दों का समाधान करने के टिप्स दिए जाएंगे।

कार्यशाला के दौरान, कांग्रेस ट्रेनिंग सेल और सोशल मीडिया सेल के प्रमुख भी नए सदस्यों को संबोधित करेंगे और उनके सवालों के जवाब देंगे।

इस दौरान कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी के भी अपने निर्वाचन क्षेत्र रायबरेली का दौरा करने की संभावना है, साथ ही वह नई टीम से मुलाकात भी कर सकती हैं।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया, “उप्र की कांग्रेस टीम में नए लोग शामिल हुए हैं और उन्हें पार्टी की विचारधारा और कार्य-प्रणाली के बारे में बताया जाएगा। वरिष्ठ नेता उनके सवालों के जवाब देंगे और उन्हें राजनीतिक परिस्थितियों से किस तरह निपटा जाता है, यह भी सिखाएंगे।”

इस सप्ताह की शुरुआत में घोषित की गई उत्तर प्रदेश कांग्रेस की नई टीम में युवा नेताओं को मौका दिया गया है, जबकि पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को पूरी तरह से किनारे कर दिया गया है।

पार्टी के इस कदम से वरिष्ठ नेताओं में नाराजगी भी है।

वहीं, पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कार्यशाला के आयोजन के समय पर सवाल उठाते हुए कहा, “पार्टी के नेता उस वक्त कार्यशाला की तैयारी में लगे हुए हैं, जब उन्हें कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए जोर शोर से प्रचार करना चाहिए था। इस कार्यशाला का आयोजन उपचुनाव के बाद किया जा सकता था। जाहिर तौर पर इससे उपचुनाव पर काफी प्रभाव पड़ेगा।”

सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बीच गहराता कांग्रेस का संकट…

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तीसरी पीढ़ी के कांग्रेसी नेता सलमान खुर्शीद ने हे हाउस से 2015 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘द अदर साइड ऑफ द माउंटेन’ में नरमी के साथ पार्टी के उन सहयोगियों को निशाने पर लिया था जिन्होंने पाला बदल लिया था.

खुर्शीद ने अपनी पुस्तक में सर थॉमस मूर के रिचर्ड रोपर पर की गई एक दिलचस्प प्रतिक्रिया का जिक्र किया था. रॉबर्ट बोल्ट के नाटक, ‘मैन फॉर आल सीजंस’ के मुताबिक थॉमस मूर पर चलाए जा रहे राजद्रोह के मुक़दमे में रिचर्ड रोपर को वेल्स का अटॉर्नी जेनरल नियुक्त किया गया था. मूर कहते हैं, “वेल्स के लिए? क्यों रिचर्ड दुनिया के लिए आत्मा देने वाले शख़्स को कोई मुनाफ़ा नहीं हो रहा है…लेकिन वेल्स के लिए?”

चार सालों के बाद, खुर्शीद खुद असंतुष्ट नेता की तरह बर्ताव कर रहे हैं, बयान दे रहे हैं. उनका यह रूप तब सामने आया है जब कांग्रेस महराष्ट्र और हरियाणा के चुनावी मैदान में है.

ऐसे में, राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद अचानक छोड़ने को लेकर किया जा रहा विलाप, ग़लत समय में सामने आया है और यह शरारत भरा लग रहा है. खुर्शीद का व्यवहार, गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान मणिशंकर अय्यर के नासमझी भरे बयान से कहीं ज़्यादा कुटिलता भरा जान पड़ रहा है.

अगर खुर्शीद और दूसरे असंतुष्ट नेता पार्टी में किसी बदलाव को लेकर वाक़ई गंभीर हैं तो उन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्यों में से 15 प्रतिशत लोगों को एकजुट करना चाहिए ताकि सोनिया गांधी को नेतृत्व के मुद्दे पर पार्टी का सत्र बुलाने के लिए बाध्य किया जाता. 1993-95 के दौर में अर्जुन सिंह ने पीवी नरसिम्हाराव के समय में यही करने की कोशिश की थी.

राहुल के पास कोई ज़िम्मेदारी नहीं

मौजूदा चुनावी परिदृश्य से राहुल गांधी ग़ायब हैं और कांग्रेस इसका कोई स्पष्टीकरण पेश नहीं कर पाई है. वायनाड से संसद में प्रतिनिधित्व करने के सिवा राहुल गांधी के पास आधिकारिक तौर पर फ़िलहाल पार्टी में कोई पद नहीं है.

हो सकता है कि चुनाव से दूर रहने के लिए यह राहुल गांधी की सोची समझी रणनीति हो. राहुल थोड़े अपरंपरागत राजनीतिज्ञ हैं और कुछ मौकों पर बेहद स्पष्टता से बयान देते आए हैं. हो सकता है उनका अपना आंकलन ये रहा हो, कि उनकी मौजूदगी से चुनाव में कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है या फिर आशंका के मुताबिक ही कांग्रेस के कमज़ोर प्रदर्शन के बाद, उनकी ग़ैरमौजूदगी को बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके.

राहुल की शंकाएं निराधार नहीं हैं. 2019 के आम चुनाव में हार के बाद, कई कांग्रेसी नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि राहुल के आक्रामक बयान ‘चौकीदार चोर है’ और रफ़ाल का मुद्दा उठाने से पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा.

सैद्धांतिक तौर पर कहा जाए, तो यह समझना ज़रूरी है कि नेहरू-गांधी परिवार के किसी सदस्य की विफलता का पहले कोई उदाहरण नहीं रहा है. हर तरह का कांग्रेसी गांधी परिवार के सदस्यों को अपना निर्विवाद नेता मानता है और इसके बदले में चुनावी कामयाबी और सत्ता की उम्मीद करता है. जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी, राजीव और सोनिया गांधी (1998 से 2017 तक के अवतार) तक नेहरू-गांधी परिवार का कोई सदस्य ना तो नाकाम रहा और ना ही अचानक से राजनीति से दूर हुआ.

इसके चलते कांग्रेसी नेता आंखें मूंद कर परिवार के सदस्यों को फॉलो करते आए और उनसे अलग कुछ देखना नहीं चाहा. ऐसे में राहुल गांधी और अब प्रियंका गांधी के सामने, भव्यता के इस भ्रमजाल के साथ रहने और कांग्रेसियों के राजनीतिक प्रवृति को सही साबित करने की चुनौती है.

एक और बात है, राहुल गांधी का इस्तीफ़ा, पार्टी और नेहरू गांधी परिवार के बीच बने सुंतलन की स्थिति को भी तोड़ने की कोशिश है. यह एक तरह से परिवार के बाहर के नेताओं पर बेहतर करने और सामने आकर नेतृत्व करने के लिए भी दबाव डालता है. यह वह पहलू है जिसे ना तो पार्टी और ना ही पार्टी के नेता अब तक स्वीकार कर पाए हैं.

उदाहरण के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया का उदाहरण ही देखें, वे अपनी वंशावली के चलते खुद को महान मराठा के तौर पर पेश करते आए हैं लेकिन महाराष्ट्र और ख़ासकर पश्चिमी महाराष्ट्र में उनका योगदान और उनकी मौजूदगी नगण्य ही है. एआईसीसी स्क्रीनिंग कमेटी के प्रमुख के तौर पर सिंधिया ने कई चूकों को छिपाया है. केवल जालेगांव ज़िले को ही देखें तो कांग्रेस ने सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) को 10 सीटें दे दी हैं, जबकि यहां कांग्रेस सात और एनसीपी चार सीटों पर चुनाव लड़ती रही हैं. कांग्रेस ने अपने दमदार और जीतने वाले उम्मीदवारों की उपेक्षा क्यों की, इसका कोई ठोस जवाब नहीं है.

जोड़ी के तौर पर कामयाब

इसके अलावा, यह भी याद रखे जाने की ज़रूरत है कि कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के एक जोड़ीदार के तौर पर काम करने का लंबा इतिहास रहा है. तालमेल बनाकर काम करने और रफ़्तार से काम करने के लिए ज़रूरी है कि नजदीकी लोगों की समीक्षा जरूरी होती है.

जब इंदिरा गांधी ने सत्ता संभाली तब पार्टी के पुराने वफ़ादारों और खुद को नेहरू का करीबी बताने वालों को पार्टी से बाहर जाना पड़ा था. अगर थोड़े समय के लिए महासचिव का पद छोड़ दें तो संजय गांधी (1974-80) भी पार्टी में किसी आधिकारिक पद पर नहीं रहे लेकिन कई संस्थागत और प्रशासनिक मामलों में उनकी इंदिरा गांधी जितनी ही चलती थी.

जून, 1980 में हवाई दुर्घटना में हुई उनकी मौत से कुछ सप्ताह पहले ही उनके सहयोगी रहे रामचंद्र रथ उन्हें पार्टी अध्यक्ष के तौर पर देख रहे थे. रथ उस वक्त कहा करते थे, “सुभाष चंद्र बोस और जवाहर लाल नेहरू बेहद कम उम्र में कांग्रेस अध्यक्ष बन गए थे. ऐसे में अगर संजय गांधी पार्टी अध्यक्ष बनते हैं तो पूरी तरह से लोकतांत्रिक ही होगा. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है.”

संजय गांधी के बड़े भाई राजीव गांधी 1983 में कांग्रेस महासचिव बने, तब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं. कांग्रेस मुख्यालय 24, अकबर रोड में उन्हें इंदिरा गांधी की बगल वाला कमरा आवंटित किया गया था. राजीव जो कहा करते थे वह सबसे महत्वपूर्ण होता था लेकिन संजय गांधी के नजदीक रहने वाले लोग कहीं नजर नहीं आ रहे थे. इसी तरह राजीव गांधी के समय में महत्वपूर्ण माने जाने वाले कई लोग सोनिया गांधी के समय में नजर नहीं आए.

सोनिया गांधी का राहुल गांधी के साथ (2006 से 2014 तक-जब वे कांग्रेस महासचिव के तौर पर कार्यरत थे) कामकाजी रिश्ते के दौरान यह स्पष्ट दिखा था कि टीम राहुल (अजय माकन, आरपीएन सिंह, मिलिंद देवड़ा, सचिन पायलट जैसे युवा नेताओं) से अलग यूपीए सरकार के मंत्रियों को राहुल गांधी से ऊपर जाकर फैसला लेने के लिए प्रोत्साहित नहीं किया जाता था.

सोनिया गांधी की मुश्किल

हालांकि सोनिया गांधी का अपना आजमाया हुआ तरीका है, ‘ठंडा कर के खाओ’. यह राहुल गांधी के कामकाजी तरीके से एकदम अलग है.

कांग्रेस पार्टी में अबी 150 महत्वपूर्ण नेता है, जो विभिन्न स्तर पर अहम पदों पर काबिज हैं. मौजूदा समय में सोनिया गांधी संतुलन साधने की कोशिश कर रही हैं ताकि सत्ता का हस्तांतरण आसानी से हो जाए. ऐसे में कांग्रेसी नेताओं के बयानबाजी का एक उद्देश्य सोनिया गांधी का ध्यान आकर्षित करने के लिए भी हो सकता है ताकि 150 प्रभावी कांग्रेसी नेताओं- वर्किंग कमेटी, पार्टी मुख्यालय, प्रदेश कांग्रेस प्रमुख, विधानसभा में नेता (विपक्ष) या फिर नजदीकी नेताओं की मंडली में शामिल हो पाएं.

सोनिया गांधी की मुश्किल यह है कि उनकी नजर इस बात पर है कि इतिहास उनका आकलन किस तरह से करेगा? ऐसे में वह नहीं चाहती हैं कि राहुल गांधी की नाकामी का उनके अपने शानदार रिकॉर्ड, 2004 और फिर 2009 में कांग्रेस को सत्ता में लाने पर कोई असर पड़े. इसलिए वह पार्टी अनुशासन का डंडा नहीं चलाना चाहतीं.

वहीं दूसरी ओर, मिलिंद देवड़ा, ज्योतिरादित्य सिंधिया, संजय निरूपम और टीम राहुल के तमाम दूसरे नेता अब पार्टी गतिविधियों से खुद को कटा हुआ महसूस कर रहे हैं. वे उम्मीद कर रहे थे राहुल गांधी के नेतृत्व में वे खुद तो चमकेंगे ही साथ ही बड़े फ़ैसले लेंगे. लेकिन इसके बजाए, अहमद पटेल, गुलाम नबी आज़ाद, आनंद शर्मा और दूसरे अन्य नेताओं ने वापसी की है. ऐसे में लग रहा है कि थोड़े समय के लिए कांग्रेस के अंदर ये आंतरिक संघर्ष जारी रहेगा.

फिर से सबसे अमीर भारतीय बने मुकेश अंबानी, जानिए कितनी है कुल संपत्ति

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 रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी एक बार फिर से भारत के सबसे अमीर शख्स बन गए हैं। फोर्ब्स ने भारत के टॉप 100 सबसे अमीर लोगों की सूची जारी की है, जिसमें लगातार 12वें साल मुकेश अंबानी शीर्ष स्थान पर बने हुए हैं। वहीं, इस सूची में अडानी पोर्ट्स के मालिक गौतम अडानी दूसरे स्थान पर हैं। गौतम अडानी ने इस सूची में आठ अंकों की बड़ी छलांग लगाई है। सूची में तीसरे स्थान पर अशोक लेलैंड के हिन्दुजा ब्रदर्स, चौथे स्थान पर शापूर्जी पल्लोंजी ग्रुप के पी. मिस्त्री और पांचवें स्थान पर कोटक महिंद्रा बैंक के उदय कोटक हैं। उदय कोटक ने पहली बार इस सूची में शीर्ष पांच में अपनी जगह बनाई है।

इस महिला साध्वी ने की हुई है पीएचडी, जानकर यकीन नहीं होगा आपको..

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साध्वी भगवती सरस्वती ने अपनी ज़िन्दगी के 25 साल ट्रेडिशनल वेस्टर्न तरीके से जिये| भगवती सरस्वती ने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से पीएचडी किया है| और वह 17 सालों से ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन आश्रम में रह रही हैं|

उनके गुरु स्वामी चिदानदं सरस्वती जी हैं, और उन्होंने उन्ही की छत्र छाया में ज्ञान धारण किया| साध्वी अपना जीवन पढ़ाने, और धार्मिक ज्ञान देने में व्यतीत कर रही हैं| वह ध्यान में लीं रहती हैं, और उपदेश भी देती हैं|

साध्वी बहुत ही प्रसिद्ध, खूबसूरत और ज्ञानी भी हैं|आज वह एक साधारण सा जीवन जी रही हैं| साध्वी का जन्म अमेरिका में हुआ तह और उनकी शिक्षा भी वही हुयी है,लेकिन 17 सालों से वह भारत में रह रही हैं|

इन घरेलू नुस्खों से दूर करें भूख न लगने की समस्या को…

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वर्तमान समय में हर कोई दिन में यह बात बार-बार अवश्य दोहराता है कि खाने का मन नही कर रहा या फिर मुझे भूख नही है। लेकिन क्या आप यह जानते है कि यह एक गंभीर रोग भी हो सकता है।

जिसका शरीर पर बहुत ही बुरा असर भी पड़ सकता है। वजन कम होना,कमजोरी महसूस होने जैसे कई तरह की कमियां भी आ सकती हैं। आइये घरेलू नुस्खों से दूर करें भूख न लगने की समस्या..

* 30 ग्राम पानी में हरे धनिये का रस पानी में मिला कर प्रतिदिन पीने से भूख लगनी शुरू हो जाती है।

* लस्सी में सेंधा नमक,भुना जीरा और काली मिर्च डालकर पीने से बहुत अधिक फायदा मिलता है।

* खाना खाने के बाद पानी के साथ अजवायन खाने से भोजन बहुत ही आसानी से पच जाता है और
भूख भी लगने लगती है।

* एक गिलास गर्म पानी में आधा चम्मच मीठा सोडा डालकर पीने से अवश्य ही भूख लगनी शुरू हो
जाती है लेकिन इसे भूख लगने पर पीना बंद कर दें।

* खाने में धनिया,नींबू और अदरक जरूर शामिल करें।

* पीसी काली मिर्च,नमक मूली पर लगाकर खाने से फायदा मिलता है।

8% भारतीय डिप्रेशन के शिकार, 3.1 करोड़ लोगों पर सिर्फ एक हॉस्पिटल…

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भारत में डिप्रेशन के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक़ फ़िलहाल 18 फ़ीसदी भारतीय डिप्रेशन के शिकार हैं. जो डब्ल्यूएचओ के दक्षिण पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में सबसे अधिक है. संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी के नवीनतम आकलन से पता चलता है कि चीन और भारत दुनिया भर में अवसाद के साथ रहने वाले कुल 322 मिलियन लोगों के लगभग 50% के लिए सबसे खराब प्रभावित देश हैं.

दिल्ली स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ़ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज़ (इब्हास) के निदेशक डॉक्टर निमीश देसाई के अनुसार अमरीका में जहां 60-70 हज़ार मनोचिकित्सक हैं वहीं भारत में ये संख्या चार हज़ार से भी कम है. यहाँ इस वक़्त 15 से 20 हज़ार मनोचिकित्सकों की ज़रूरत है.

देश में फ़िलहाल 43 मेंटल अस्पताल हैं. डॉक्टर निमीश देसाई के अनुसार इन मेंटल अस्पतालों में से दो या तीन सुविधाओं के स्तर पर बेहतर माने जाते हैं, 10-12 में सुधार हो रहा है जबकि 10-15 अभी भी कस्टोडियल मेंटल हॉस्पिटल बने हुए हैं.

अवसाद के अलावा, भारत और अन्य मध्यम आय वाले देशों में आत्महत्याओं के लिए चिंता का एक बड़ा कारण भारत और चीन दोनों में बहुत अधिक प्रचलित है। 2015 में भारत में 3.8 करोड़ लोग 3% की व्यापकता दर के साथ चिंता विकारों से पीड़ित थे।
आंकड़ों से पता चलता है कि 78% वैश्विक आत्महत्याएँ निम्न और मध्यम आय वाले देशों में हुईं, जबकि आत्महत्या का कारण दुनिया भर में होने वाली सभी मौतों का 1.5% था, जो 2015 में मृत्यु के शीर्ष 20 प्रमुख कारणों में शामिल है।

2014 में प्रकाशित डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में आत्महत्याओं की दुनिया में सबसे अधिक अनुमानित संख्या थी, जिसमें पाया गया कि वैश्विक स्तर पर हर 40 सेकंड में एक व्यक्ति आत्महत्या करता है। अवसाद और चिंता दोनों ही पुरुषों की तुलना में महिलाओं में कहीं अधिक सामान्य पाए गए।

आप यह जानकर चौंक जाएंगे कि दुनिया भर में 30 करोड़ से अधिक लोग अवसाद से पीड़ित हैं। उम्र के बाद से अवसाद और खराब मानसिक स्वास्थ्य को एक गंभीर मुद्दे के रूप में नजरअंदाज कर दिया गया है। लेकिन, क्या आप जानते हैं, अवसाद सबसे बुरी स्थिति में मृत्यु का कारण बन सकता है?

भारत में औसत आत्महत्या की दर प्रति लाख लोगों पर 10.9 है और आत्महत्या करने वाले अधिकांश लोग 44 वर्ष से कम उम्र के हैं। जब देशों की बात आती है, तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत दुनिया का सबसे अवसाद वाला देश है, जिसके बाद चीन और अमेरिका हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार भारत, चीन और अमेरिका चिंता, सिज़ोफ्रेनिया और द्विध्रुवी विकार से सबसे अधिक प्रभावित देश हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन का कहना है कि कुछ आँकड़े कहते हैं 40 में से एक व्यक्ति या 20 में से एक व्यक्ति कभी न कभी डिप्रेशन का शिकार रहा है या अभी डिप्रेशन में है. वो बताते हैं कि इससे पहले 1987 में क़ानून लाया गया था लेकिन बाद में देखा गया कि उसकी प्रासंगिकता ख़त्म हो गई और वो अमानवीय था.

डॉक्टर हर्षवर्धन ने बताया कि सरकार मेंटल हेल्थकेयर एक्ट 2017 लाया, जिसमें कई प्रावधान किए गए. इनमें से एक आत्महत्या को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालना भी है.

उनका कहना था ‘मेंटल हेल्थ सेवाओं को ज़मीनी स्तर पर ले जाया गया है. पूरे भारत में 650 ज़िलों में स्थित प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों में सपोर्ट सिस्टम बनाए गए हैं जिसके तहत सभी प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों में एक मनोचिकित्सक विशेषज्ञ के साथ एक सोशल वर्कर, मनोवैज्ञानिक विशेषज्ञ और आयुष्मान भारत के तहत आने वाले डेढ़ लाख हेल्थ और वेलनेस सेंटर में भी मेंटल हेल्थ पर फोकस किया गया.’

हालांकि उन्होंने इस बात को माना कि जितनी गंभीर ये समस्या है उसके मुताबिक भारत में मनोचिकित्सकों का संख्या कम है और इस दिशा में काम हो रहा है.

हालांकि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने कुछ मेंटल संस्थानों में कस्टोडियल कमरों की बात से इनकार करते हुए कहा , ‘मेंटल हेल्थ संस्थानों, मेडिकल कॉलेज, साइक्रेटिक विभागों की बुनियादी सुविधाएं बढ़ाने और उन्हें विकसित करने के लिए पूरा सपोर्ट किया जा रहा है और मनोचिकित्सों की संख्या भी बढ़ाई जाएगी.’

पीएम मोदी और अमित शाह के साथ दिखे कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया, जानिए क्या है वजह

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जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले के समर्थन में भिंड में एक पोस्टर लगाया गया है। हैरानी की बात ये है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के स्वागत में लगाए गए इस पोस्टर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की फोटो भी है। इस पोस्टर में सिंधिया के साथ पीएम मोदी और अमित शाह की फोटो को लेकर सियासत गरमाने लगी है।कांग्रेस
पोस्टर में मोदी-शाह के साथ सिंधिया

दरअसल, गुरुवार को कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया भिंड के दौरे पर थे। सिंधिया के नगर आगमन को लेकर पूरे शहर में जगह-जगह पोस्टर लगाए गए थे। वहीं, उनके आगमन पर भाजपा जिला को-ऑर्डिनेटर द्वारा एक पोस्टर लगवाया गया, जिसपर सियासी पारा चढ़ता दिखाई दे रहा है। हृदेश शर्मा ने आर्टिकल 370 हटाने के फैसले पर मोदी सरकार का समर्थन करने पर आभार जताया है। इसको लेकर कांग्रेस की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

आर्टिकल 370
ज्योतिरादित्य ने किया था आर्टिकल 370 का समर्थन

वहीं, बीजेपी ने भी इससे किनारा कर लिया है। बता दें कि कांग्रेस महासचिव पद से इस्तीफा देने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने आर्टिकल 370 पर अलग राय दी थी। सिंधिया ने मोदी सरकार के फैसले का समर्थन किया था और ट्वीट कर कहा था, ‘मैं जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख पर उठाए गए कदम और इसके भारत के संघ में पूरी तरह से एकीकरण का समर्थन करता हूं।’ हालांकि, सिंधिया ने ये भी कहा था कि अगर संवैधानिक प्रक्रिया का पालन किया जाता तो ज्यादा अच्छा होता। तब कोई सवाल नहीं उठाए जाते।

मोदी सरकार
कांग्रेस के कई नेताओं ने किया था मोदी सरकार के फैसले का समर्थन

सिंधिया अकेले ऐसे नेता नहीं थे जिनकी राय आर्टिकल 370 पर पार्टी लाइन से अलग थी। जनार्दन द्विवेदी,अदिति सिंह, दीपेंदर सिंह हुड्डा, मिलिंद देवड़ा जैसे नेताओं ने इस मुद्दे पर सरकार का समर्थन किया था। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने हाल ही में सलमान खुर्शीद द्वारा राहुल गांधी के इस्तीफे को लेकर दिए बयान पर भी प्रतिक्रिया दी थी। सिंधिया ने कहा था कि वे किसी दूसरे के बयान पर टिप्पणी नहीं करेंगे, लेकिन यह सच है कि कांग्रेस को आत्मचिंतन की जरूरत हैं। वर्तमान में कांग्रेस की जो स्थिति है उसका अवलोकन करने की आवश्यकता है।