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मोहन भागवत का भाषण : क्या आरएसएस का क़द मोदी-शाह के सामने छोटा पड़ गया है?

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक का दशहरे- संगठन का स्थापना दिवस- के मौके पर दिया जाने वाला भाषण अपने आप में अहम माना जाता है, क्योंकि इसे भारतीय जनता पार्टी समेत समस्त संघ परिवार के कार्यकर्ताओं के लिए राजनीतिक नक़्शे की तरह देखा जाता है, जिसका अनुसरण उन्हें करना होता है.

लेकिन मोहन भागवत के 2019 के भाषण के बारे में शायद ऐसा नहीं कहा जा सकता है. भविष्य का नजरिया- कोई भी नजरिया- पेश करने की जगह उन्होंने लगभग एक घंटा मोदी सरकार का उन मोर्चों पर बचाव करने में खर्च किया, जिन पर उसका प्रदर्शन निराशाजनक रहा है.

आरएसएस खुले तौर पर भाजपा से अपना जुड़ाव प्रकट नहीं करता है. भागवत ने खुद यह कई बार कहा है कि संघ उसकी विचारधारा पर चलने वाली किसी भी पार्टी की मदद कर सकता है और भाजपा के साथ उसका कोई संबंध नहीं है.

लेकिन फिर भी अपने भाषण में भागवत ने केवल अपने संगठन को भगवा पार्टी की सहयोगी के तौर पर पेश किया, बल्कि सहायक भूमिका में दिखने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई.

भागवत के पहले दिए गए दशहरे के भाषण

आप याद कर सकते हैं कि 2016 के अपने दशहरा भाषण में भागवत ने सीमा पार की गई सफल सर्जिकल स्ट्राइक पर केंद्र सरकार को बधाई दी थी, लेकिन साथ ही कई प्रशासनिक मुद्दों को भी उठाया था, जिन पर उनके अनुसार सरकार को काम करने की जरूरत थी.

उन मुद्दों में विस्थापित कश्मीरी पंडितों और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के मीरपुर, मुजफ्फराबाद, गिलगित और बाल्टिस्तान के उत्पीड़ित हिंदू अल्पसंख्यकों के पुनर्वास का मुद्दा शामिल था. उन्होंने मोदी सरकार से पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रमण्यम की नई शिक्षा नीति (एनईपी) की समीक्षा करने के लिए और और ‘गो-रक्षकों’ और ‘असामाजिक तत्वों’ के बीच अंतर करने के लिए भी कहा था.

मोदी सरकार अब एक नागरिकता विधेयक के लिए अभियान चला रही है, जो मुस्लिमों को छोड़कर सभी धर्मो के शरणार्थियों को भारत में शरण लेने की इजाज़त देगा. इसके साथ ही इसने सुब्रमण्यम समिति की नई शिक्षा नीति को भी खारिज कर दिया और के कस्तूरीरंगन के मसौदे को लागू करने के लिए लेकर आयी.

इसी तरह से 2017 में सरसंघचालक ने सीमा के साथ पाकिस्तान और चीन के किसी शत्रुतापूर्ण कदम का मजबूत और संकल्पवान तरीके से जवाब देने की जरूरत पर जोर दिया था. साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने के किसी भी फैसले से पहले इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि वे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा और अखंडता के लिए खतरा’ हैं.

उन्होंने सरकार द्वारा बड़े मूल्य वाले नोटों के विमुद्रीकरण और जीएसटी के क्रियान्वयन के सरकार के फैसले, जिनका खामियाजा संघ परिवार के मुख्य आधार वर्ग- छोटे और मझोले व्यापारियों- को उठाना पड़ रहा था, को लेकर भी अप्रकट तरीके से खतरे की घंटी बजाई थी.

पुराने ‘आर्थिक सिद्धांतों’ पर चलने के लिए उन्होने नीति आयोग को आड़े हाथों लिया था और यह दलील दी थी कि आर्थिक नियोजन ‘देश की जमीनी सच्चाई’ को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए.

2018 में भागवत ने बाहरी खतरों से निपटने के लिए सरकारी प्रयासों को प्रमुखता दिया था, लेकिन साथ ही संघ के हिंदुत्व के संस्करण पर सवाल उठानेवाले यानी ‘अर्बन नक्सलियों या ‘नव-वाम’ की आलोचना करते हुए आंतरिक सुरक्षा को भी मजबूत करने की जरूरत जताई थी.

आजाद भारत में सरकारों के जन-केंद्रित होने की जरूरत के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा, ‘केंद्र सरकार और राज्य सरकारों और अर्धसैनिक बल इस संबंध में सफलतावूर्पक कार्रवाई कर रहे हैं. उन्हें अथक चौकसी के साथ इसे जारी रखना होगा.’

सरकार की आलोचना करते हुए भागवत ने कहा था, ‘सरकार की अच्छी नीतियों के क्रियान्वयन में प्रशासनिक संवेदनशीलता, तत्परता, पारदर्शिता और पूर्णता अभी भी उम्मीद के मुताबिक नहीं है. इसका नतीजा यह है कि इन नीतियों का असर अभी तक समाज के आखिरी पायदान पर खड़े व्यक्ति तक छनकर नहीं पहुंच पा रहा है.’

पिछले पांच सालों में सरसंघचालक सरकार को इसके प्रमुख वादों को पूरा करने की याद दिलाते रहे, जिनमें से कुछ आरएसएस की पुरानी मांगें रही हैं- मसलन, अनुच्छेद 370 की समाप्ति, अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर का निर्माण और समान नागरिक संहिता का निर्माण.

इस साल का भाषण

इसके विपरीत, नागपुर में कार्यकर्ताओं को दिए गए भाषण में भागवत धारा 370 हटाने के लिए मोदी सरकार की तारीफ और पिछले पांच सालों में भारत की आर्थिक तरक्की पर ग्रहण लगाने वाली आर्थिक मुसीबतों को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित न होने की अपील के बीच ही चक्कर काटते रहे.

निश्चित तौर पर इस भाषण में उनके प्रिय विषय- राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, विदेशी खतरे के तौर पर पाकिस्तान और चीन, भी शामिल थे, लेकिन उनके पूरे भाषण में सरकार के खिलाफ एक भी शिकायत, भले ही कितनी ही दिखावटी ही क्यों न हो- नहीं थी. इसकी जगह उन्होंने सरकार का बचाव करने की भरपूर कोशिश की.

किसी जमाने में नोटबंदी और जीएसटी के आलोचक रहे भागवत का जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों में बचाव करना, उनमें आए बड़े बदलाव की ओर इशारा करता है. कार्यक्रम, जिसमें एचसीएल के संस्थापक शिव नादर मुख्य अतिथि थे, उनके भाषण का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा अर्थव्यवस्था को समर्पित था.

भागवत ने कहा, ‘हम बढ़ रहे हैं, लेकिन सारे विश्व में अर्थव्यवस्था में एक चक्र चलता है. इसमें गतिरोध आ जाता है. वह स्लो हो जाता है. तो कहते हैं कि मंदी आ गई है.’ उन्होंने साथ ही जोड़ा, ‘एक अर्थशास्त्र के जानकार सज्जन ने बताया, ने मुझे कहा कि मंदी तब का जाता है, जब ग्रोथ रेट जीरो से नीचे चली जाए. लेकिन हमारी वृद्धि दर 5% के करीब है. आप इसको लेकर चिंता जाहिर कर सकते हैं, लेकिन इस पर चर्चा क्यों करें.’

उन्होंने कहा, ‘इसको लेकर चर्चा करने से एक वातावरण बनता है- वातावरण में मनुष्यों का आचरण होता है. तथाकथित आर्थिक मंदी के बारे में बहुत ज्यादा चर्चा से अर्थ-व्यापार में लगे में लोगों को यह विश्वास हो जाएगा कि अर्थव्यवस्था में वास्तव में गिरावट आ रही है और वे और भी ज्यादा सुरक्षात्मक ढंग से काम करने लगेंगे. रखने लगेंगे. इसका नतीजा यह होगा कि हमारी अर्थव्यवस्था की गति और घट जाएगी.’

अपने स्वाभाविक आलोचनात्मक रवैये से हटकर उन्होंने कहा, ‘सरकार ने इस मुद्दे की ओर संवेदनशीलता दिखाई गई है, इसने उपाय किए हैं. हमें अपनी सरकार पर विश्वास रखना चाहिए. हमने कई उपाय किए हैं, आने वाले समय में कुछ सकारात्मक प्रभाव दिखाई देगा.’ इसके आगे उन्होंने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध जैसे बाहरी कारकों के कारण नौकरियों की मुश्किल हो गई है.

लिंचिंग पर टिप्पणी

इसके बाद उन्होंनें जब उन्होंने लिंचिंग को ‘पश्चिमी की गढ़ी हुई चीज’ बताया, तब ऐसा लगा कि यह लगा कि यह कुछ और नहीं बस लोगों का ध्यान भटकाने की चाल थी.

उन्होंने इसे भारत को बदनाम करने की इच्छा रखने वाले लोगों द्वारा चलाया गया नकारात्मक अभियान बताया और हिंदुत्व के समर्थकों द्वारा दिन-दहाड़े मुस्लिमों और दलितों की हत्या के सामने आए अनेक मामलों को उन्होंने सुविधाजनक ढंग से भुला दिया.

इसकी जगह उन्होंने इन हत्याओं को, जिसके पीछे साफतौर पर परंपरागत हिंदुत्ववादी पूर्वाग्रह का हाथ है, ईसाइयत और इस्लाम से आयातित चीज बताया और बड़ी आसानी से इसका दोष अब्राहमी धर्मों पर मढ़ दिया.

उन्होंने कहा, ‘हिंसा की घटनाएं बढ़ती हैं तो ऐसे भी समाचार आए हैं कि एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदाय के किसी इक्का-दुक्का व्यक्ति को पकड़कर पीटा, मार डाला, हमला किया. ये भी ध्यान में आता है कि किसी एक ही समुदाय की ओर से दूसरे समुदाय को रोका गया जबकि ऐसा नहीं है. उल्टा भी हुआ है. ये भी हुआ है कि कुछ नहीं हुआ है, तो बना दिया गया. उकसाकर घटनाएं कराई गई हैं. दूसरे किसी मामले को भी इसका रंग दे दिया गया लेकिन अगर 100 घटनाओं की रिपोर्ट छपी होंगी तो दो-चार में तो ये बात ऐसे ही हुई होगी, जिसे स्वार्थी शक्तियां दूसरे ढंग से उजागर करती हैं.’

भागवत ने आगे कहा, ‘किसी एक समुदाय के कुछ लोगों ने कुछ किया तो उसे उस पूरे समुदाय पर थोप देंगे. ये किसी के पक्षधर नहीं हैं. समाज के दो समुदायों के बीच झगड़ा हो यही उनका उद्देश्य है. समाज के पक्षधर लोगों को उसमें घसीटेंगे. संघ का नाम लेंगे.

उन्होंने यह भी कहा, ‘हमारे यहां ऐसा कुछ हुआ नहीं, ये छिटपुट समूहों की घटनाएं हैं, जिन पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए. हमारे देश की परंपरा उदारता, भाईचारे से रहने की है. दूसरे देश से आई परंपरा से हमारे ऊपर शब्द (लिंचिंग) थोपेंगे और हमारे समाज, देश को दुनिया में बदनाम करने की कोशिश करेंगे.’

उनके दावे इसलिए ध्यान भटकाने वाले इसलिए लगती हैं क्योंकि भागवत के भाषण ने आरएसएस को एक जीवंत संगठन के तौर पर पेश किया, जो समय की जरूरतों के हिसाब से खुद को बदलने के लिए हमेशा तैयार रहता है.

उन्होंने पूर्व सरसंघचालक बालासाहेब देवरस के शब्दों को उधार लेते हुए कहा कि आरएसएस के बारे में सिर्फ एक चीज स्थायी है और वह है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और बाकी सारी चीजें समय की जरूरतों के हिसाब से बदली जा सकती हैं.

मिसाल के लिए उन्होंने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने और निजीकरण को प्रोत्साहित करने के लिए मोदी सरकार द्वारा किए गए प्रयासों का स्वागत किया- यह देखते हुए कि संगठन द्वारा किसी जमाने में स्वदेशी पर जोर दिया जाता था, यह एक बड़ा बदलाव कहा जा सकता है.

उन्होंने दावा किया, ‘स्वदेशी वह है जो एक भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था में रहता है, मगर सिर्फ उन परिस्थितियों में जो भारत के हित में हों. अगर कोई चीज मेरे देश में बनाई जा सकती है, तो हम इसे किसी दूसरे जगह से क्यों खरीदेंगे और इस तरह से अपने घरेलू व्यापार को नुकसान पहुंचाएंगे?’

उन्होंने आगे कहा, ‘हमें स्वदेशी के रास्ते पर चलना चाहिए.. दूसरे देशों से खरीदने की कोशिश कीजिए, लेकिन सिर्फ अपनी शर्तों पर.’

अंत में उन्होंने धारा 370 को कमजोर करने समेत मोदी सरकार की अन्य सफलताओं की लंबी फेहरिस्त पेश की. अपने पहले के भाषणों से उलट उनके पास सरकार के लिए कोई सलाह नहीं थी.

उनके दूसरे भाषणों की तुलना में आरएसएस प्रमुख के भाषण में कोई नई बात नहीं थी; संघ के कार्यकर्ताओं के लिए राजनीतिक रोडमैप की बात तो दूर रही. उन्होंने बस वही दुहराया जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों में बार-बार दोहरा चुके हैं.

क्या संघ परिवार में भूमिकाओं की अदला-बदली हो गई है? यह माना जाता है कि जब भी एनडीए सत्ता में आती है, इसकी डोर आरएसएस के हाथों में होती है. लेकिन ऐसे में जबकि मोदी और शाह की तूती बोल रही है, क्या भागवत संघ परिवार में महत्व की सीढ़ी में दूसरे पायदान पर धकेल दिए गए हैं?

अटकलों का बाजार गर्म है, मगर विजयादशमी को भागवत के भाषण ने निश्चित तौर मोदी-शाह के युग में सरसंघचालक का कद कम होने की संभावना की और संकेत किया है.

भूपेश : चौकीदार बनकर आए लोग तानाशाह बन रहे…

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छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने ‘गांधी विचार यात्रा’ के समापन अवसर पर गुरुवार को किस का नाम लिए बगैर भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार पर बड़ा हमला बोला। उन्होंने कहा, ‘सामाजिक मूल्यों का पैरोकार और चौकीदार बनकर आए लोग अब तानाशाह बनकर सामने आने लगे हैं।’ सात दिवसीय राज्यस्तरीय ‘गांधी विचार यात्रा’ का समापन गुरुवार को रायपुर के उसी मैदान में हुआ, जिसमें महात्मा गांधी 86 साल पहले सन् 1933 में आए थे। इस मौके पर बघेल ने गांधी के राष्ट्रवाद और हिंदू धर्म की खूबियों को गिनाया।

उन्होंने कहा, ‘भारत के जनतंत्र में धर्म का आवरण भी है, यहां साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी गई और जीती गई। धार्मिकता में भी स्वतंत्रता है, राम जन-जन के राम हैं। कबीर ने उन्हें मंदिर से मुक्त कर घट-घट का राम बना दिया और तुलसी ने राम को अवध से मुक्त कर वैश्विक बनाया। अवध वह जगह है, जहां वध न हो, जहां हिंसा न हो। छत्तीसगढ़ के कण-कण में राम है। गांधी ने राम को पंडित और पाखंड से मुक्त किया।’

बघेल ने कहा, ‘हमने साम्राज्यवाद को भगा दिया, अब पूंजीवाद नए रूप में आ रहा है। नवपूंजीवाद काले धन का भी रास्ता है, उसके लिए मनुष्य और राष्ट्र दोनों बोझ हैं। नकली उच्चता पर खड़े कुछ संगठनों के भी यही विचार हैं। उन्हें अपने हक भीड़ की शक्ल में चाहिए। उन्हें भक्त भीड़ की शक्ल में चाहिए। उन्हें विचारवान मनुष्य की आवश्यकता नहीं है।’

मुख्यमंत्री ने आगे कहा, ‘विचारवान मनुष्य सवाल खड़ा करते हैं और इनसे सवाल पूछो तो घबरा जाते हैं और राष्ट्रद्रोह का सार्टिफिकेट बांटते हैं। सवाल आपको मुक्त करता है, सवाल आपको आगे बढ़ाता है, एक नई चेतना से भर देता है, इसलिए इन्हें सवाल करने वाले नहीं, बल्कि भीड़ चाहिए। इसलिए नवपूंजीवाद ने काले धन, उन्माद और धार्मिकता को बड़ी दुकान में बदल दिया है, धर्म को कर्मकांड और चमकीले हाईटेक आयोजन में बदल दिया गया है।’

उन्होंने भाजपा और संघ का नाम लिए बगैर कहा कि काला धन, सांप्रदायिकता और उत्तेजक राष्ट्रवाद के गठजोड़ को समझना होगा, क्योंकि यह गरीब और मेहनतकश लोगों के वर्षो से चली आ रही आस्थाओं के अपहरण का पुरजोर प्रयास कर रही है। इस गठजोड़ के चेहरे से धार्मिकता के नकाब को नोंचकर उनके चेहरे को सामने लाने की आवश्यकता है। यही चेहरा काले धन की मदद से संस्कृति की आड़ में संगठित शक्ति बनने का प्रयास कर रहा है। गांधी की 150वीं जयंती की इस विचार यात्रा में इसको समझना जरूरी है।

बघेल ने आगे कहा, ‘ऋषि परंपरा के चिंतन से हमारा देश संस्कारित हुआ है, निडर हुआ है, जो किसी से नहीं हारता। हम कृष्ण की पूजा करें, हम राम की पूजा करें, हम घर में रहें, हम नास्तिक हों या अस्तिक, फिर भी हम हिंदू हो सकते हैं। यह इतना विस्तार हमारे समाज में हमारे संत महात्माओं ने दिया है। हमारी धार्मिकता हमें ऐसी आजादी और निडरता देती है। हम मानें या ना मानें, यह निडरता केवल हमारा समाज देता है, मगर आज पूंजीवादी, साम्राज्यवादी ताकतें जो कट्टर हैं व धार्मिक चोला पहनकर आई हैं, उसे पहचानने की जरूरत है।’

उन्होंने कहा कि कुछ लोग सामाजिक और नैतिक मूल्यों के पैरोकार और हिमायती बनकर आते हैं, अपने को चौकीदार बताते हैं और अंत में तानाशाह बनकर सामने आ रहे हैं, यह सब अपने को घोषित पहरेदार बताकर जनमानस को आतंक तक ले जाते हैं।

बघेल ने कहा, ‘आज गांधी को दुनिया क्यों याद कर रही है? गांधी को दुनिया में इसलिए याद नहीं किया जा रहा कि उन्होंने भारत को आजाद कराया, बल्कि इसलिए याद किया जा रहा है कि उन्होंने भारत को तो आजाद कराया ही, मगर इसके लिए जो अहिंसा का रास्ता अपनाया, वह किसी ने नहीं अपनाया था।’

कांग्रेस नेता ने कहा, ‘महात्मा गांधी को अहिंसा पर अटूट विश्वास था। सवाल है कि क्या अहिंसा महात्मा गांधी की खोज है? नहीं। अहिंसा को बुद्ध, महावीर ने अपनाया था, अहिंसा उपनिषद में है, भारत की परंपरा में है। बुद्ध ने अपने और अपने अनुयायियों के लिए अपनाई थी अहिंसा को, मगर गांधी की अहिंसा व्यक्ति के लिए नहीं, आम जनता के लिए थी। इसी अहिंसा को उन्होंने अंग्रेजों की तोप व गोले के सामने खड़ा किया और कामयाब हुए।’

उन्होंने कहा कि गांधी दुबले-पतले थे, लेकिन उन्होंने पशुबल के सामने आत्मबल को खड़ा किया। गांधी का सत्य और अहिंसा में अटूट विश्वास था। गांधी ने अहिंसा, गाय और ध्वज को अपनाया। उन्होंने गंभीर राष्ट्रवाद की बात की। यह गंभीर विमर्श व चिंतन को जन्म देती है। यह सभी धर्मो की अच्छाइयों को अपनाने की प्रेरणा देती है। यह वही राष्ट्रवाद है जो किसानों को उसका हक दिलाती है, नारी को सम्मान दिलाती है, मैला ढोने वालों को उन्होंने सम्मान दिया। गांधी ने सब को जोड़ने का काम किया, यही गांधी का राष्ट्रवाद है।

टमाटर की महंगाई पर सरकार हरकत में आई , जमाखोरी पर कसी लगाम…

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 प्याज के बाद टमाटर की महंगाई को काबू करने के लिए गुरुवार को सरकार हरकत में आई। देश की राजधानी दिल्ली में टमाटर की सप्लाई की कमी की भरपाई के लिए शुक्रवार से सफल के आउटलेट पर सस्ती दरों पर टमाटर प्यूरी उपलब्ध कराए जाएंगे। इसके अलावा, दिल्ली सरकार ने टमाटर की जमाखोड़ी पर लगाम लगाने के लिए एसडीएम स्तर के अधिकारियों की अगुवाई में गठित टीमों को इस काम में लगाया है।

सफल के आउटलेट पर 25 रुपये में 200 ग्राम टमाटर प्यूरी का पैक मिलेगा जोकि 800 ग्राम टमाटर के बराबर है। टमाटर प्यूरी का इससे बड़ा 825 ग्राम का एक पैक 85 रुपये में ग्राहकों को उपलब्ध होगा जो 2.5 किलो टमाटर के बराबर है। टमाटर प्यूरी का स्टॉक सफल के आउटलेट पर उपलब्ध करवा दिया गया है।

यह जानकारी केंद्रीय उपभोक्ता मामले मंत्रालय की ओर से गुरुवार को जारी एक बयान में दी गई।

बयान के अनुसार, केंद्रीय उपभोक्ता मामले मंत्रालय की अध्यक्षता में गुरुवार को एक अंतर-मंत्रालयी बैठक हुई जिसमें देश के अन्य हिस्सों के साथ-साथ दिल्ली-एनसीआर में टमाटर के दाम में हुई वृद्धि का जायजा लिया गया।

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के प्रतिनिधियों ने बैठक में बताया कि महाराष्ट्र और कर्नाटक में लगातार हुई बारिश के कारण टमाटर की सप्लाई प्रभावित हुई है जोकि मानसून सीजन के समाप्त होने के साथ अगले 10 दिन में सामान्य हो जाएगी।

टमाटर के दाम में हुई वृद्धि को काबू करने के लिए बैठक में सप्लाई में कमी की भरपाई के अलावा अन्य उपायों पर भी चर्चा हुई।

बयान के अनुसार, टमाटर उत्पादक राज्यों से दिल्ली समेत अन्य राज्यों में सप्लाई बढ़ाने का आग्रह किया जाएगा ताकि उपलब्धता बढ़ने से कीमतों को काबू किया जा सके। उन्हें नियमित तौर पर एपीएमसी, ट्रेडर और ट्रांसपोटरों से बातचीत करने को कहा गया जिससे नियमित सप्लाई सुनिश्चित हो।

महाराष्ट्र, कर्नाटक, हिमाचल और आंध्रप्रदेश से भी टमाटर की सप्लाई बढ़ाने के साथ-साथ नियमित सुनिश्चित करने को कहा गया है।

उधर, दिल्ली सरकार ने बताया कि टमाटर की जमाखोड़ी पर लगाम लगाने के लिए एसडीएम स्तर के अधिकारियों की अगुवाई में गठित टीमों को इस काम में लगाया है।

दिल्ली की आजादपुर मंडी में गुरुवार को टमाटर का थोक भाव 12-46 रुपये प्रति किलो था जबकि दिल्ली-एनसीआर में टमाटर का खुदरा भाव 40-70 रुपये प्रति किलो था।

रमन ने कांग्रेस पर भगवान राम को पार्टियों में बांटने का लगाया आरोप…

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 भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उस पर भगवान राम को भी बांटने का आरोप लगाया है।

डा. सिंह ने आज यहां पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा कि कांग्रेस ने भगवान राम को भी बांट दिया है, यह राजनीति में गिरावट की प्राकाष्ठा है। उन्होंने राज्य सरकार द्वारा प्रदेश भर में गायों की देखरेख के लिए बनाए जा रहे गौठान का जिक्र करते हुए कहा कि गौठान ऐसा स्थान बन गया है जहां सबसे ज्यादा गायों की मौत हो रही है।

उन्होंने कहा कि गौठानों में न पीने का पानी, न भूसा और न ही देखरेख की व्यवस्था है। इस प्रकार पूरे प्रदेश में गौठानों में अपराधिक काम हो रहा है जहां गायों को ले जाकर ठूंस दिया जा रहा है और उन्हें देखने वाला कोई नहीं है।

मुंबई में वित्त मंत्री को करना पड़ा गुस्से का सामना, सीतारमण के खिलाफ पीएमसी बैंक के खाताधारकों की नारेबाज़ी, …

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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को गुरुवार को मुंबई में घोटाले का शिकार पीएमसी बैंक के गुस्साए खाताधारकों का कोपभाजन बनना पड़ा। सीतारमण मुंबई बीजेपी दफ्तर में प्रेस कांफ्रेंस करने पहुंची थी, जहां आए खाताधारकों ने उनके खिलाफ नारेबाजी की और उनके पैसे वापस लौटाने की मांग उठाई।

पीएमसी बैंक के खाताधारक बीजेपी दफ्तर के बाहर बड़ी संख्या में जमा हो गए थे। नारेबाजी और हंगामे के बाद वित्त मंत्री ने कुछ खाताधारकों को बातचीत के लिए अंदर बुलाया। बाद में उन्होंने कहा कि, “मैंने खाताधारकों की समस्या सुनी और उन्हें बताया कि बहुराज्यीय सहकारी बैंक आरबीआई के नियंत्रण में होते हैं और इसमें सरकार की भूमिका बहुत सीमित होती है।” लेकिन उन्होंने आश्वासन दिया कि वे इस बारे में आरबीआई गवर्नर शक्तिकांता दास से बात करेंगी और खाताधारकों की समस्या उनके सामने रखेंगी।

जब सीतारमण से पूछा गया कि क्या खाताधारकों को उनका पैसा वापस मिलेगा तो उनका जवाब था कि यह प्रक्रिया का मामला है जो आरबीआई और रिजर्व बैंक द्वारा पीएमसी बैंक के लिए नियुक्त प्रशासक ही तय करेंगे।

बाद हरबंस सिंह नाम के एक खाताधारक ने बताया कि वित्त मंत्री को कम से कम यह आश्वासन तो देना चाहिए था कि उनका पैसा सुरक्षित है, लेकिन उन्होंने निराश किया। हरबंस सिंह ने बताया, “बैंक के 16 लाख से ज्यादा खाताधारक परेशान हैं। इसमें हमारी क्या गलती है? आपके पास 4000 करोड़ की संपत्तियां हैं, इन्हें बेचकर आप हमारा पैसा लौटाओ और आरोपियों के खिलाफ जो चाहे कार्रवाई करो।”

गौरतलब बै कि पीएमसी बैंक में करीब 4500 करोड़ का घोटाला सामने आया है जिसके बाद आरबीआई ने बैंक से पैसे निकालने पर रोक लगा दी है। इस पूरे मामले पर सीतारमण ने कहा कि पीएमसी बैंक के सिलसिले में आर्थिक मामलों के सचिव, वित्तीय सेवाओं के सचिव, ग्रामीण मामलों के सचिव और शहरी विकास मामलों के सचिव के अलावा आरबीआई के डिप्टी गवर्नर को शामिल कर एक कमेटी बनाई जाएगी।

उन्होंने बताया कि यह कमेटी जरूरी समाधान सुझाएगी ताकि आने वाले दिनों में किसी और बैंक में ऐसा घोटाला न होने पाए। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ी तो इस बारे में कानून भी बनाया जाएगा।

आखिर वो कौन है जिसे किताब की तरह रोज़ पढ़ती हैं खूबसूरत रेखा…

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फिल्म उमराव जान में शायरी के उस्ताद उमराव जान से कहते हैं “या किसी को अपना कर लो या किसी के हो लो” इस पर उमराव जान कहती है “कोशिश तो की थी”। पर्दे की उमराव जान और असल ज़िंदगी की रेखा ने भी कोशिश तो कई बार की लेकिन खैर।

मोहब्बत में मिले दर्द से सबको हमदर्दी हो जाती है। फिल्मी पर्दे पर जोड़ियां तो बहुत बनी। इनमें से कुछ ने निजी जीवन में जोड़ी बना ली तो कुछ नाकाम रहे। लेकिन लोगों में चर्चा उन्हीं फिल्मी जोड़ियों की ज्यादा देर तक रहती है जो नाकाम हो गयीं। हिंदी सिनेमा के इतिहास की सबसे सफल जोड़ी धर्मेंद्र और हेमा मालिनी ने 40 से अधिक फिल्में साथ-साथ कीं, लेकन फिर शादी कर ली और बात खत्म हो गयी। मगर रेखा और अमिताभ की जोड़ी की चर्चा खत्म नहीं हो पाती।

रेखा ने जब फिल्मी पर्दे का रुख किया तो वे बच्ची थीं। पहली हिंदी फिल्म सावन भादों रिलीज होते समय वे शरीर से भले ही किशोरी दिखती थीं, लेकिन दिल बच्चों जैसा ही था। दिल का ये बचपना कफी समय तक उनके साथ रहा। तभी तो वे फिल्मी पर्दे के प्रेम और वास्तविक जीवन के प्रेम का फर्क नहीं समझ पायीं। और जब तक वे ये फर्क समझ पातीं सैकड़ों अफवाहें उन्हें अपनी गिरफ्त में ले चुकी थीं।

रेखा डिप्रेशन का शिकार हो गयीं। वे करियर को लेकर लापरवाह और बद दिमाग बन गयीं। लेकिन उनके जीवन में फिर प्यार का अंकुर फूटा और इस बार रेखा को मानो नया जन्म मिल गया। रेखा ने अमिताभ बच्चन के साथ पहली बार साल 1973 में फिल्म नमक हराम में काम किया। जो लोग अमिताभ को करीब से जानते है या उनके साथ काम कर चुके हैं वे अमिताभ के शालीन और अद्भुत आकर्षण के कायल हैं। इसी खूबी ने रेखा को भी प्रभावित किया।

रेखा अमिताभ की अगली फिल्म थी दो अंजाने (1976)। इस, फिल्म के सेट पर कई बार प्यार में धोखा खा चुकीं रेखा ने अमिताभ को दिल दे दिया। अमिताभ शादी शुदा थे। रेखा भी जानती थीं कि अमिताभ जैसे व्यक्तितत्व वाला शख्स पनी पत्नी को नहीं छोड़ सकता, लेकिन रेखा को इन सबकी परवाह कहां थी वो तो प्यार को पलों को शिद्दत के साथ जीती रहीं। ईमान धरम, खून पसीना, अलाप (1977), गंगा की सौगंध, कस्में वादे, मुकद्दर का सिकंदर (1978), नटवर लाल, सुहाग (1979) और राम बलराम (1980) तक रेखा और अमिताभ की जोड़ी पर्दे पर और पर्दे के पीछे भी सुपर हिट साबित हुई।

इस बीच दोनों के रिश्तों को लेकर अफवाहों पर अफवाहें उड़ती रहीं। अमिताभ बहुत संयम से इन अफवाहों का मुकाबला कर रहे थे तो रेखा ने अपने चारों और रहस्य का ऐसा दायरा बना लिया जिसे कोई भेद नहीं सका। सबसे बड़ी हैरानी तो लोगों को ये देख कर हो रही थी कि रेखा के व्यवहार और अभिनय दोनों में जमीन आसमान का बदलाव आ गया था। नयी रेखा एक आत्मविश्वासी, गंभीर और अधिक आर्कषक रेखा बन चुकी थीं। कहते हैं प्यार अक्सर आदमी को इंसान और इंसान को महान बना देता है। यह बात रेखा पर पूरी तरह खरी उतरी। जिद्दी, बद दिमाग और लापरवाह रेखा की बोलचाल, व्यक्तित्व और अभिनय के तौर तरीकों के पीछे एक खास सोच नजर आने लगी। सेक्स सिंबल कहलाने वाली रेखा ने खूबसूरत, घर, उत्सव और उमरावजान जैसी फिल्मों में जैसा सहज और गंभीर अभिनय किया वह हैरत में डालने वाला था।

सस्ती सनसनी फैलाने वाली भूमिकाओं से हट कर अब रेखा को चैलेंजिंग रोल मिलने लगे। उधर, रेखा और अमिताभ के रिश्ते राष्ट्रीय दिलचस्पी का विषय बने रहे। सिलसिला (1981) वह अंतिम फिल्म थी, जिसमें रेखा और अमिताभ ने एक साथ काम किया। शायद घर टूटने से बचाने के लिये अमिताभ ने ही रेखा से सम्मानजनक किनारा कर लिया। लेकिन रेखा को इस बात का भी फर्क नहीं पड़ा वो तो प्यार के लम्हों को जीना चाहती थीं और अमिताभ से दूर रह कर भी रेखा प्यार की कैद से आजाद नहीं हुईं। अक्सर समारोहों में अमिताभ और रेखा का आमना सामना होने वाले लम्हे भी आते हैं। दोनों बहुत गरिमा के साथ उन लम्हों को जी रहे हैं।

अमिताभ से दूरी के बाद जब-जब रेखा से अमिताभ के बारे में पूछा गया तो उन्हें यह कहने में हिचक नहीं हुई कि वे अमिताभ से प्यार करती हैं। अपने एक इंटरव्यू में एक बार रेखा ने कहा था कि अमित जी एक किताब की तरह हैं। और रेखा आज भी इस किताब को पढ़ती रहती हैं।

रैनबैक्सी के पूर्व प्रमोटर शिविंदर सिंह गिरफ्तार,धोखाधड़ी के आरोप…

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दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने रैनबैक्सी के पूर्व प्रमोटर शिविंदर सिंह को गिरफ्तार कर लिया है. उनके साथ सुनील गोधवानी को भी गिरफ्तार किया गया है. रेलिगेयर फिनवेस्ट की एक शिकायत पर इन्हें गिरफ्तार किया गया है.

मलविंदर, शिविंदर पर 740 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप

रेलिगेयर एंटरप्राइजेज लिमिटेड की सब्सिडरी रेलिगेयर फिनवेस्ट (RFL) ने शिविंदर सिंह और उनके भाई मलविंदर मोहन सिंह के खिलाफ दिल्ली की आर्थिक अपराध शाखा में आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत में रेलिगेयर इंटरप्राइजेज लिमिटेड के पूर्व सीएमडी सुनील गोधवानी का भी नाम था. मलविंदर, शिविंदर और गोधवानी पर चीटिंग, फ्रॉड और 740 करोड़ रुपये के फंड के दुरुपयोग का आरोप है.

मलविंदर और शिविंदर के बीच चल रहा है झगड़ा

फरवरी 2018 में मलविंदर और शिविंदर के निकल जाने के बाद रेलिगेयर फिनवेस्ट लिमिटेड के बोर्ड का पुनर्गठन हुआ था. रेलिगेयर फिनवेस्ट लिमिटेड के नए बोर्ड और मैनेजमेंट की इंटरनल इनक्वायरी के आधार पर यह शिकायत दर्ज कराई गई थी. फरवरी 2018 तक रेलिगेयर इंटरप्राइजेज का कंट्रोल सिंह भाइयों (मलविंदर और शिविंदर) के हाथ में था. रेलिगेयर फिनवेस्ट में अब अलग-अलग क्षेत्र के प्रोफेशनल हैं, जिनका प्रमोटर्स से कोई संबंध नहीं है. इसी बोर्ड की इनक्वायरी में 740 करोड़ रुपये के फंड के दुरुपयोग सामने आया है. इसके बाद से दोनों की गिरफ्तारी के आसार जताए जा रहे थे.शिविंदर और मलविंदर के बीच पहले से ही भारी विवाद चल रहा है. दिसंबर, 2018 में दोनों के बीच झगड़े के बीच शिविंदर ने कहा था कि अब साथ काम करने की सारी संभावना खत्म हो चुकी है. फोर्टिस और रैनबैक्सी के प्रमोटर रहे दोनों भाइयों के बीच झगड़ा फंड को लेकर बढ़ा था.

दरअसल, जापानी दवा कंपनी डाइची सैंक्यो को 3,500 करोड़ रुपये के पेमेंट आर्बिट्रेशन अवॉर्ड को लेकर दोनों के बीच झगड़ा और बढ़ गया था. सितंबर 2018 में शिविंदर ने NCLT में एक पिटीशन दायर कर कहा था कि मलविंदर और रेलिगेयर के पूर्व चीफ सुनील गोधवानी की गतिविधियों की वजह से कंपनी को झटका लगा है.

जब नए-नए थे अमिताभ, तभी महमूद ने उन्हें बता दिया था ‘सबसे तेज घोड़ा’

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महमूद’जिस आदमी को सक्सेस मिले, उसके दो बाप हो जाते हैं. एक बाप वो जो पैदा करता है, और एक बाप वो जो पैसा कमाना सिखाता है. पैदा करने वाला बाप तो बच्चन साहब हैं ही, और मैं एक बाप बैठा हूं जिसने पैसा कमाना सिखाया.’

बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन ने एक्टिंग की बारीकियां जिन लोगों से सीखीं, उनमें से महमूद भी एक थे. इकलौते महमूद ही थे, जिन्हें पूरा यकीन था कि 6 फुट लंबा ये हीरो लंबी रेस का घोड़ा साबित होगा.

ये कम लोग जानते हैं कि महमूद और अमिताभ के बीच एक वक्त गहरा रिश्ता हुआ करता था. प्यार और सम्मान से भरे इस रिश्ते का अंत हालांकि सभी की कल्पनाओं से परे हुआ.

अमिताभ के लिए भाईजान थे महमूद

अमिताभ महमूद को ‘भाईजान’ बुलाते थे. दोनों की मुलाकात ‘सात हिंदुस्तानी’ की स्क्रीनिंग के दौरान हुई, जब महमूद के छोटे भाई अनवर अली ने उन्हें अमिताभ से मिलाया. ‘सात हिंदुस्तानी’ में अमिताभ और अनवरी अली ने साथ काम किया था. इसी दौरान दोनों की अच्छी दोस्ती भी हो गई थी और अमिताभ अनवर के साथ महमूद के घर में रहने लगे.महमूद को ‘सात हिंदुस्तानी’ में अमिताभ भा गए, लेकिन ऑडियंस को फिल्म कुछ खास पसंद नहीं आई और अमिताभ का करियर ग्राफ वहीं रुक गया. एक्टिंग में काम न मिलने से निराश अमिताभ जब बोरिया-बिस्तर बांध कर घर वापस जाने को हुए, तो महमूद और अनवर ने उन्हें जाने से रोक लिया. महमूद को विश्वास था कि अमिताभ का एक दिन फिल्म इंडस्ट्री में नाम होगा, बस उन्हें सही मौका मिल जाए.

अमिताभ के लिए जो बन पाया, महमूद ने वो किया. महमूद ने कुछ बड़े डायरेक्टर और प्रोड्यूसर को अमिताभ को कास्ट करने के लिए कहा. इसी तरह अमिताभ को सुपरहिट फिल्म ‘आनंद मिली’. इस फिल्म में भले अमिताभ का साइड रोल हो, लेकिन उनके काम को सभी ने पसंद किया.

अमिताभ महमूद को ‘भाईजान’ बुलाते थे. दोनों की मुलाकात ‘सात हिंदुस्तानी’ की स्क्रीनिंग के दौरान हुई थी

महमूद की ही बदौलत अमिताभ को ‘बॉम्बे टू गोवा’ भी मिली थी. कुछ लोग मानते हैं कि महमूद ने एनसी सिप्पी के साथ पार्टनरशिप में प्रोड्यूस की वो फिल्म अमिताभ के लिए बनाई थी, लेकिन असल में वो फिल्म अरुणा ईराणी के लिए बनी थी, दो महमूद की दोस्त थीं. हनिफ जावेरी की किताब ‘महमूद: अ मैन ऑफ मैनी मूड्स’ के मुताबिक:महमूद ने अरुणा ईरानी से वादा किया था कि वो उन्हें हिरोइन बनाएंगे. हालांकि वो ये बात अच्छी तरह से जानते थे कि उस वक्त कोई जानामाना हीरो ईरानी के साथ काम नहीं करता, इसलिए उन्होंने अमिताभ को साइन किया.

अरुणा ईरानी के लिए भले इस फिल्म ने कमाल न किया हो, लेकिन अमिताभ को इससे काफी फायदा हुआ. ‘आनंद’ में गंभीर किरदार और ‘बॉम्बे टू गोवा’ के कॉमेडी रोल में उन्हें बहुत पसंद किया गया. ‘बॉम्बे टू गोवा’ में अमिताभ को देखने के बाद ही लेखक जोड़ी जावेद-अख्तर ने ‘जंजीर’ में उनकी सिफारिश की.

‘बॉम्बे टू गोवा’ में अमिताभ को देखने के बाद ही लेखक जोड़ी जावेद-अख्तर ने ‘जंजीर’ में उनकी सिफारिश की थी

अमिताभ पर महमूद के यकीन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रेडियो अनाउंसर अमीन सयानी को दिए इंटरव्यू में जब घोड़े के शौकीन महमूद से उनके सबसे तेज दौड़ने वाले घोड़े का नाम पूछा गया, तो उनका जवाब था अमिताभ बच्चन. इंटरव्यू में महमूद ने कहा था कि जिस दिन उन्होंने दौड़ना शुरू कर दिया, उस दिन वो सभी को पीछे छोड़ देंगे.

अमिताभ को बेटा मानकर महमूद ने जितना उनके लिए किया, उतना उन्हें वापस न मिल सका. सालों बाद एक इंटरव्यू में महमूद ने कहा था, ”मेरा बेटा अमित आज 25 साल का हो गया है, मतलब फिल्म लाइन में. ऐसे कई 25 साल उसे और नसीब हों. इससे बढ़कर क्या दुआ दे सकता हूं. अल्लाह उसके सेहत दे. जिस आदमी को सक्सेस मिले, उसके दो बाप हो जाते हैं. एक बाप वो जो पैदा करता है, और एक बाप वो जो पैसा कमाना सिखाता है. पैदा करने वाला बाप तो बच्चन साहब हैं हीं, और मैं एक बाप बैठा हूं जिसने पैसा कमाना सिखाया. अपने साथ में, घर में रख कर पिक्चरें दिलाईं, पिक्चरों में काम दिया. बहुत इज्जत करता है अमित मेरी. बैठा होगा, पीछे से मेरी आवाज सुनेगा, खड़ा हो जाएगा.”महमूद ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा था”लेकिन आखिरी-आखिरी में मुझे इतना फील हुआ, जब मेरा बाइपास हुआ, तो उसके एक-दो हफ्ते पहले उनके फादर, बच्चन साहब गिर गए थे. तो मैं उन्हें देखने के लिए अमित के घर गया. एक कर्टसी है. उसके एक हफ्ते बाद में मेरा बाइपास हुआ, तो अमित अपने वालिद को लेकर वहां आए, ब्रीच कैंडी, जहां मेरा बाइपास हुआ था, लेकिन अमित ने वहां ये दिखा दिया कि असली बाप असली होता है और नकली बाप नकली होता है. उसने आकर हॉस्पिटल में मुझे विश भी नहीं किया, मुझसे मिलने भी नहीं आया, एक गेट वेल सून का कार्ड भी नहीं भेजा, एक छोटा सा फूल भी नहीं भेजा. ये जानते हुए कि भाईजान भी इसी हॉस्पिटल में हैं. मेरे साथ में तो कर लिया, मैं बाप ही हूं उसका, मैंने माफ कर दिया.”

महमूद की मौत के बाद अमिताभ ने एक ब्लॉग लिखकर अपने गुरु को श्रद्धांजलि दी थी

किताब ‘महमूद: अ मैन ऑफ मैनी मूड्स’ के मुताबिक, ऐसी अफवाहें थीं कि दोनों के बीच दूरियां महमूद की बहन जुबैदा और अमिताभ की करीबी के कारण आई थीं.

हालांकि महमूद की मौत के बाद अमिताभ ने एक ब्लॉग लिखकर अपने गुरु को श्रद्धांजलि दी थी.

ब्रिटेन : महात्मा गांधी के सम्मान में स्मारक सिक्का जारी करेगा…

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11 अक्टूबर (भाषा) ब्रिटेन के वित्त मंत्री साजिद जाविद ने कहा है कि ब्रिटेन सरकार ने महात्मा गांधी की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य पर एक स्मारक सिक्का जारी करने का फैसला किया है।

पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश वित्त मंत्री ने कहा कि उन्होंने ब्रिटेन के रॉयल मिंट से सिक्का बनाने के लिए कहा है ताकि दुनिया गांधी की सीख को कभी ना भूले।

उन्होंने गुरुवार को लंदन में वार्षिक ब्रिटिश एशियाई लोगों की सफलता का जश्न मनाने के लिए आयोजित जीजी2 समारोह में यह घोषणा की।

जाविद ब्रिटेन की प्रकाशन कंपनी ‘एशियन मीडिया ग्रुप (एएमजी) द्वारा जारी की गई शक्तिशाली लोगों वार्षिक सूची में शीर्ष पर हैं।

जाविद ने कहा, ”गांधी के 150वें जयंती समारोह के उपलक्ष्य में, आज रात का पुरस्कार समारोह इस घोषणा के लिए बिल्कुल उपयुक्त है। मैंने ब्रिटेन के रॉयल मिंट को उनके सम्मान में एक नया स्मारक सिक्का बनाने के लिए कहा है। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि गांधी ने दुनिया को क्या सिखाया था।”

उन्होंने कहा, ”गांधी ने हमें सिखाया कि ताकत केवल धन या उच्च पद से नहीं आती है। हमें उन मूल्यों को हमेशा याद रखना चाहिए जिन्हें उन्होंने अपने जीवन में अपनाया था।”

बोरिस जॉनसन की अगुवाई वाली ब्रिटिश सरकार में भारतीय मूल की गृह मंत्री प्रीति पटेल 2019 जीजी2 पॉवर सूची में दूसरे नंबर पर हैं।

जाविद के तहत काम करने वाले भारतीय मूल के उप मंत्री ऋषि सुनाक भी इस सूची में सातवें क्रम पर हैं। वह इंफोसस के सह संस्थापक नारायण मूर्ति के दामाद हैं।

23 लाख राशनकार्ड धारकों के लिए अच्छी खबर, अगले महीने से होने वाले इस बदलाव से मिलेगा बड़ा फायदा…

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उत्तराखंड में 23 लाख से अधिक राशनकार्ड धारकों के लिए अच्छी खबर है। सस्ता राशन उपभोक्ताओं के स्मार्ट राशन कार्ड अगले माह से बनने शुरू हो जाएंगे। खाद्य आपूर्ति विभाग ने स्मार्ट कार्ड बनाने के लिए टेंडर प्रक्रिया पूरी कर ली है। स्मार्ट कार्ड के लिए आधार नंबर लिंक करना जरूरी होगा। पहले चरण में उन उपभोक्ताओं के स्मार्ट राशन कार्ड बनाए जाएंगे, जिनका आधार नंबर राशन कार्ड से जुड़ चुका है। उत्तराखंड में पहली बार सस्ता राशन वितरण योजना के तहत स्मार्ट राशन कार्ड बनाए जाएंगे। इसके लिए विभाग ने तैयारी पूरी कर ली है।

स्मार्ट राशन बनाने के लिए टेंडर जारी किए गए हैं। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के बाद से प्रदेशभर में उपभोक्ताओं के नए राशन कार्ड बनने शुरू होंगे। वहीं, विभाग की ओर से स्मार्ट कार्ड बनाने से पहले पुराने कार्डों का सत्यापन और त्रुटियों को ठीक करने के लिए अभियान चलाया गया है।

खास बात यह है कि स्मार्ट राशन कार्ड में क्यूआर कोड होगा। जिससे उपभोक्ता प्रदेश के किसी भी सस्ते गल्ले की दुकान से सस्ता राशन प्राप्त कर सकते हैं। स्मार्ट कार्ड आधार नंबर से लिंक होने से सस्ता राशन वितरण में फर्जीवाड़ा रुकेगा। बता दें कि प्रदेश भर में अब तक 45 प्रतिशत राशन कार्डों को आधार नंबर से लिंक किया जा चुका है।

स्मार्ट राशन कार्ड बनाने के लिए टेंडर जारी कर दिए गए हैं। नवंबर माह से प्रदेश भर में स्मार्ट राशन कार्ड बनाने का शुरू किया जाएगा। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में पारदर्शिता लाने के लिए पहली बार स्मार्ट राशन बनाए जा रहे हैं। इससे यह पता लगेगा कि पात्र उपभोक्ता ने ही राशन लिया है या नहीं।