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तिहाड़ जेल में कैदियों की मौज, बनाते हैं टिक-टॉक VIDEO और पीते हैं शराब

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वीडियो में देखा जा सकता है कि तिहाड़ में बंद कैदी जेल को अपना ऐशगाह बनाते जा रहे हैं.

नई दिल्ली: देश की सबसे सुरक्षित जेल तिहाड़  के बारे में कहा जाता है कि यहां बिना इजाजत परिंदा भी पर नहीं मार सकता, लेकिन ये सिर्फ कहावत है. हक़ीक़त इससे कोसों दूर है. ज़ी न्यूज के हाथ लगे वीडियो में देखा जा सकता है कि तिहाड़ में बंद कई कैदी जेल को अपना ऐशगाह बनाते जा रहे हैं. वे अपने पास तमाम महंगे मोबाइल फ़ोन समेत नशीले पदार्थ और नुकीले हथियार रखते हैं.

मई और जून के महीने में तिहाड़ की पूर्वी दिल्ली की मंडोली जेल के वार्डों में चलाए गए तलाशी अभियान में जेल प्रशासन को अलग-अलग मामलों में सजा काट रहे कैदियों से तमाम महंगे मोबाइल फ़ोन और ब्लूटूथ इयर फोन, सर्जीकल ब्लेड और नुकीले समान, बटन से खुलने वाले शार्प चाकू, एक से एक महंगी शराब की खाली बोतलें, हैंड मेड हीटर और लूज़ वायर समेत नशीले पदार्थ मिले.

सबसे हैरान कर देने वाली बात तो यह है कि तमाम सुरक्षा कर्मियों के बीच और बॉडी स्कैनर से गुजरते हुए भी कैदियों के पास जेल में प्रतिबंधित सामान बरामद हो रहा है.

टेनिस बॉल के जरिए भेजते हैं नशीले पदार्थ
ज़ाहिर है वीडियो चौंकने वाली हैं और देश के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले तिहाड़ जेल के उस खेल का खुलासा करती हैं कि कैसे पैसे और रसूख के दम पर कैदी जेल के अंदर से अपने गोरखधंधे को अंजाम दे रहे हैं. जांच में पता चला है कि जेल के आस-पास रहने वाले लोग टेनिस बॉल को काटकर उसमें नशीला पदार्थ डालकर अंदर फेंक देते हैं, जो कि फिर कैदियों तक पहुंच जाता है. वहीं, जानकारों के मुताबिक तिहाड़ में कैदियों तक 70 फीसदी सामान तिहाड़ प्रशासन की लापरवाही से तो 30 प्रतिशत मिलीभगत की वजह से मिलता है.

ब्लेड से वारदात करते हैं कैदी
तिहाड़ में यह खुला खेल सिर्फ महंगे मोबाइल और चाकू और नशीले पदार्थों तक ही सीमित नहीं है बल्कि जेल में बंद बाहर बैठे अपने आकाओं के इशारे पर कई गंभीर साजिशों को भी अंजाम दे रहे हैं जबकि जेल के आसपास जैमर लगा हुआ है.

कैदियों के मोबाइल का नेटवर्क
इस बारे में जानकारों का कहना है कि जेल में 3 जी जैमर लगा हुआ है और कैदी 4 जी का इस्तेमाल करते हैं जिससे जैमर इन्हें बात करने से रोक नहीं पाता, लेकिन अब जेल प्रशासन ऐसा हाईटेक जैमर लगाने जा रहा है जिससे कैदियों के मोबाइल का नेटवर्क नहीं मिल पाएगा.

टिकऑक अपलोड कर देते हैं वीडियो
यही नहीं, कैदियों ने अपना लाइफ स्टाइल तक बदल ली है. वे बेखौफ होकर जेल में रह कर अपना वीडियो बनाते हैं और फिर सोशल मीडिया के साथ उसको मोबाइल ऐप टिकऑक अपलोड कर देते हैं. यह बात तब सामने आई जब तिहाड़ में बंद एक गैंगस्टर का सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, जिसके बाद देश का सबसे सुरक्षित जेल सवालों के घेरे में आ गया था.

इससे पहले दो कैदी अपने पेट में मोबाइल छिपाकर जेल में अंदर ले जा रहे थे, लेकिन उन पर शक होने पर जब उनका मेडिकल करवाया गया तो उस मोबाइल के बारे में पता चल सका था. लेकिन अब हाईटेक बॉडी स्कैनर के बाद उसमें से गुजरने पर ही पता चल जाएगा कि कैदी या बंदी के शरीर में क्या है? वहीं जल्द ही हाईटेक जैमर भी लगने वाला है जिससे किसी भी नेटवर्क पर बात कर पाना मुश्किल होगा यानी कि अब आने वाले दिन कैदियों के लिए आरामदायक नहीं है.

जानिए,क्या है आरे के जंगलों का विवाद जिस पर मचा है मुंबई में बवाल?

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BMC की ट्री अथॉरिटी ने 29 अगस्त, 2019 को मुंबई की आरे कॉलोनी में मेट्रो 3 प्रोजेक्ट के लिए कार शेड बनाने की योजना को मंजूरी दी थी. इस शेड के लिए करीब 2600 पेड़ काटे जाने थे. तभी से इस प्रोजेक्ट का विरोध हो रहा है. आम लोगों से लेकर बॉलीवुड सितारों तक इस योजना का विरोध कर रहे हैं.

4 अक्टूबर को तमाम लोगों की उम्मीदों को झटका देते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरे कॉलोनी को ‘जंगल’ घोषित करने की सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया.

कांग्रेस से चुनाव लड़ चुकीं एक्टर उर्मिला मातोंडकर ने 4 अक्टूबर की रात शुरू हुई पेड़ों की कटाई पर गहरा अफसोस जताया.

कैसे हुई शुरुआत?

जून, 2014 में वर्सोवा से घाटकोपर तक मुंबई मेट्रो प्रोजेक्ट का पहला फेज जनता के लिए खुला था. उसके एक्टेंशन के लिए पार्किंग शेड की जरूरत थी. मेट्रो परियोजना से जुड़ी कंपनी मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लमिटेड (MMRCL) ने फिल्म सिटी गोरेगांव वाले इलाके की आरे कॉलोनी को इसके लिए चुना. इसे ही ‘आरे के जंगल’ भी कहते हैं.

शेड बनाने के लिए खुला मैदान चाहिए था जिसका मतलब था आरे के बरसों पुराने पेड़ों की कटाई. विरोध को देखते हुए राज्य सरकार ने मेट्रो कंपनी से कोई और लोकेशन देखने को भी कहा लेकिन उस इलाके में और कोई खाली जगह नहीं थी.

एनजीटी से हाथ लगी निराशा

पर्यावरण संरक्षण संगठन ‘वनशक्ति’ और ‘आरे बचाओ ग्रुप’ ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की पुणे बेंच में याचिका आरे को ‘जंगल’ घोषित करने की याचिका दर्ज की. उनकी दलील थी कि संजय गांधी नेशनल पार्क आरे कॉलोनी में ही आता है और वहां के पेड़-पौधे भी वही हैं जो आरे के जंगलों के. दिसंबर 2016 में एनजीटी ने निर्माण ना कराने का आदेश दिया.

लेकिन वन विभाग ने आरे कॉलोनी इलाके को जंगल मानने से ही इनकार कर दिया. इसके बाद सितंबर 2018 में एनजीटी ने हाथ खींच लिए और मामले में किसी भी दखलंदाजी से इनकार कर दिया. एनजीटी ने ‘वनशक्ति’ को कोर्ट में गुहार लगाने को कहा.

हाईकोर्ट पहुंचा मामला

एनजीटी से निराशा हाथ लगने के बाद पर्यावरण एक्टिविस्ट जोरू भटेना ने दो सितंबर को बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की. याचिका में कहा गया था कियह इंसान बनाम इंसान का मामला नहीं है. यह मानवता के खिलाफ पर्यावरण और पेड़ों का मामला है.

लेकिन हाई कोर्ट ने 4 अक्टूबर को फैसला सुनाते हुए पेड़ों की कटाई पर रोक से इनकार कर दिया.

पंडित नेहरू ने रखी थी कॉलोनी की नींव

आजादी के दो साल बाद यानी साल 1949 में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने आरे कॉलोनी की नींव रखी थी ताकि मुबंई शहर के लिए डेरी और दुग्ध उत्पादों का संचालन वहां से हो सके.

मार्च 1951 में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू आरे कॉलोनी में पेड़ लगाते हुए.

पीएम के पौधारोपण के बाद इस इलाके में इतने पेड़ लगाए गए कि करीब 3166 एकड़ क्षेत्रफल में फैले जमीन के उस हिस्से ने कुछ ही सालों में जंगल का रूप ले लिया.

एटीएम से पैसा निकालने वालों को तगड़ा झटका, अब नहीं निकाल सकेंगे 2000 के नोट

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एसबीआई का एटीएम प्रयोग करने वाले लोगों के लिए जरूरी खबर है। अब आपको एसबीआई के एटीएम से 2000 के नोट नहीं मिलेंगे। बड़े नोट धीरे-धीरे एसबीआई बैंक के साथ एटीएम में भी कम होंगे।

आरबीआइ से मिले संकेत के बाद भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) ने अपने एटीएम से बड़े नोट की कैसेट हटाना शुरू किया है। कई जिलों लगभग सभी एटीएम से कैसेट निकाली जा चुकी है। इसके बाद तैयारी 500 रुपये के नोट की है। सिर्फ 100 व 200 रुपये के नोट ही एटीएम में रह जाएंगे। जानकारी के अनुसार छोटे नोटों को बढ़ावा देने के लिए यह कदम उठाया गया है।

उन्नाव के स्टेट बैंक के चीफ मैनेजर सुनील कुमार ने बताया कि करीब एक साल से 2000 के नोट एसबीआई के एटीएम में नहीं लगाए जा रहे हैं। अब एटीएम मशीनों में लगे 2000 के नोट रखने वाले कैसेट (बॉक्स) को फिलहाल हटाया जा रहा है ताकि अन्य नोट रखे जा सकें।

तेजी से बढ़ रहा है प्लॉगिंग का ट्रेंड, खुद पीएम मोदी ने की अपील, जानिए ये है क्या

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्टूबर से एक नई पहल की- प्लॉगिंग यानी जॉगिंग के दौरान कचरा उठाते चलना. इसके तहत Fit India Plogging Run के तहत अपील की जा रही है कि सारे लोग 2 किलोमीटर दौड़ते हुए उस दायरे में आने वाला कचरा भी इकट्ठा करते चलें. स्वीडिश भाषा से आया ये शब्द प्लॉगिंग पूरी दुनिया में काफी लोकप्रिय हो रहा है.

फिटनेस के लिए आप क्या करते हैं? जिमिंग, योग और दौड़ लगाना! लेकिन स्वीडन में लोग अपनी सेहत बनाने के साथ पर्यावरण की सेहत के लिए जागरुक हो चुके हैं. यही वजह है कि वे जॉगिंग की बजाए प्लॉगिंग पर जोर दे रहे हैं. स्वीडिश भाषा में प्लोका मतलब कोई चीज उठाना, और जॉग यानी दौड़ना. pick and jog इन दोनों शब्दों से मिलकर बना है प्लॉगिंग.

इसलिए हुई स्वीडन से शुरुआत
अपने पर्यावरण प्रेम के लिए पूरी दुनिया में मशहूर स्वीडन के बारे में एक चौंकाने वाला तथ्य ये है कि यहां सड़कों पर मिलने वाले कचरे में लगभग 80 प्रतिशत कचरा सिगरेट बट से होता है. स्वीडिश एनवायरमेंटल प्रोटेक्शन एजेंसी जिसे स्वीडिश भाषा में Naturvårdsverket, ने इसे साफ करने के लिए बाकायदा अभियान चलाए. फाइन लगाए जाने पर भी हालात नहीं बदलने पर कैंपेन चलाए गए. इन्हीं में से एक है प्लॉगिंग.

साल 2016 में एरिक एलस्ट्रोम ने स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम से इसकी शुरुआत की. इसके लिए एक ब्लॉग Plogga भी शुरू हुआ. इसमें दौड़ते हुए झुक-झुककर अपने आसपास का कचरा जमा करने और उसे डस्टबिन में फेंकने की अपील की गई.

सड़कों पर मिलने वाले कचरे में लगभग 80 प्रतिशत कचरा सिगरेट बट से होता है

जल्दी ही स्वीडन की सड़कों पर सिगरेट बट कम होने लगे

और फिर इसकी धूम दुनियाभर में सुनाई पड़ने लगी. पर्यावरण की सफाई के साथ अपने हेल्थ बेनिफिट के चलते प्लॉगिंग दुनिया के 40 देशों में जल्दी ही फैल गया. दक्षिणी ब्रिटेन के ससेक्स में रह रहे अमेरिकन लेखक और कॉमेडियन David Sedaris ने भी इसे अपनाया. वे एक दिन में लगभग 60,000 कदम चला करते और पूरे वक्त रास्ते में आने वाला कचरा समेटते चलते. इसके लिए वे साथ में एक थैला लेकर चलते. उनके एक कदम से उनका आसपास एकदम साफ रहने लगा. इसी तर्ज पर कीप अमेरिका ब्यूटीफुल कैंपेन, जिसके तहत सारे स्टेट्स में जॉगिंग की बजाए प्लॉगिंग की बात होने लगी. प्लॉगिंग का विश्व रिकॉर्ड मेक्सिको सिटी के नाम दर्ज है जहां एक दिन में चार हजार लोग प्लॉगिंग में हिस्सेदार बने.

भारत में भी प्लॉगिंग की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी है
इस टर्म की शुरुआत करने वाले एरिक ने Reuters से अपनी एक बातचीत में कहा था कि भारत में लगभग 10 हजार लोग रोज ये कर रहे हैं. कर्नाटक में गो प्लॉग के नाम से एक संस्था बन चुकी है जो लोगों को दौड़ने के दौरान कचरा इकट्ठा करने और उसे सही जगह पर डालने के लिए प्रेरित करती है. सिंगल यूज प्लास्टिक बैन के दौरान पीएम ने लोगों से प्लॉगिंग करने की भी अपील की.

सिंगल यूज प्लास्टिक बैन के दौरान पीएम ने लोगों से प्लॉगिंग करने की भी अपील की

आप भी ऐसे कर सकते हैं शुरुआत
ये बहुत ही आसान है. दौड़ने के लिए निकलते हुए अपने साथ एक कैरी बैग लेकर निकलें. अगर चाहें तो हाथों में ग्लव्स भी पहन सकते हैं ताकि किसी भी तरह का कचरा उठा सकें. जॉग के दौरान कचरा थैले में डालते चलें. अगर आप किसी पथरीली सड़क या बीच के आसपास प्लॉग कर रहे हैं तो बीच-बीच में स्ट्रेचिंग करते रहें ताकि कमर या पैरों में जकड़न न आए. सड़क पार करते हुए या बीच से कचरा उठाते हुए अपने आसपास के प्रति सचेत रहें, किसी भी हाल में ट्रैफिक के नियम न भूलें. प्लॉगिंग की अहम शर्त ये भी है कि आपके पास अच्छे जूते हों क्योंकि बार-बार झुकने, दौड़ने के दौरान पैरों को आराम मिलना चाहिए.

प्लॉगिंग काफी शारीरिक मेहनत मांगने वाली एक्टिविटी है

प्लॉगिंग से सेहत को फायदे
इसमें खूब दौड़ना और स्क्वाटिंग शामिल है. कचरा उठाने के लिए जैसे ही नीचे झुकते हैं, शरीर के निचले हिस्से की एक्सरसाइज होती है. डाटा कहते हैं कि लगभग 30 मिनट की प्लॉगिंग से 288 कैलोरीज बर्न होती हैं. इससे कार्डियोवस्कुलर हेल्थ सुधरती है, बीपी कंट्रोल में रहता है, शरीर के सारे हिस्सों को पूरी ऑक्सीजन मिलती है.

हालांकि प्लॉगिंग काफी शारीरिक मेहनत मांगने वाली एक्टिविटी है इसलिए इसकी शुरुआत छोटे-छोटे स्टेप्स से की जा सकती है. प्लॉगिंग के फाउंडर एरिक के अनुसार पहले plalking यानी वॉक करते हुए कचरा उठाने से शुरू किया जा सकता है ताकि शरीर को आदत हो सके. जिन्हें लोअर बैक और घुटनों में किसी भी तरह की समस्या हो, उन्हें डॉक्टर से बात करके ही शुरुआत करनी चाहिए.

क्या सच में महिषासुर दलित या आदिवासी था?

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हिंदू माइथोलॉजी के मुताबिक महिषासुर दानवों का राजा था. वो अपनी असीमित शक्तियों के बूते तीनों लोकों में उत्पात मचाने लगा. उसका अंत करने के लिए देवताओं के तेज से मां दुर्गा का जन्म हुआ, जिसने महिषासुर का संहार किया. लेकिन महिषासुर की सिर्फ यही कहानी नहीं है. देश के कई हिस्से ऐसे हैं, जहां महिषासुर की पूजा होती है. कुछ जनजाति लोग उसे अपना पूर्वज मानते हैं. कुछ इलाकों में महिषासुर को दलित माना जाता है. आखिर महिषासुर को लेकर इतनी कहानियां क्यों प्रचलित हैं?

हिंदू माइथोलॉजी के मुताबिक महिषासुर की कहानी

हिंदू माइथोलॉजी के मुताबिक महिषासुर एक असुर था. उसका पिता असुरों का राजा रंभ था. रंभ को एक महिषी (भैंस) से प्रेम हो गया. महिषासुर इन्हीं दोनों की संतान था. इंसान और भैंस के समागम से पैदा होने की वजह से महिषासुर जब चाहे मनुष्य और जब चाहे भैंस का रूप धारण कर सकता था.

महिषासुर ने भगवान ब्रह्मा की कठोर तपस्या की. उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे वरदान मांगने को कहा. महिषासुर ने कहा कि उसे ये वरदान दें कि देवता या दानव कोई उस पर विजय प्राप्त न कर सके. ब्रह्मा का वरदान पाकर महिषासुर आततायी हो गया. वो देवलोक में उत्पात मचाने लगा. उसने इंद्रदेव पर विजय पाकर स्वर्ग पर कब्जा जमा लिया. ब्रह्मा विष्णु महेश समेत सभी देवतागण परेशान हो उठे. महिषासुर के संहार के लिए सभी देवताओं के तेज से मां दुर्गा का जन्म लिया.

मां दुर्गा को सभी देवताओं ने अपने अस्त्र-शस्त्र दिए. भगवान शिव ने अपना त्रिशूल दिया. भगवान विष्णु ने अपना चक्र दिया. इंद्र ने अपना वज्र और घंटा दिया. इसी तरह से सभी देवताओं के अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित मां दुर्गा शेर पर सवार होकर महिषासुर का संहार करने निकली.

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हिंदू माइथोलॉजी के मुताबिक देवी दुर्गा ने महिषासुर के आतंक से देवताओं को मुक्त करने के लिए उसका संहार किया.

महिषासुर और उसकी सेना के साथ देवी दुर्गा का भयंकर युद्ध हुआ. देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध कर देवताओं को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलवाई. महिषासुर के वध के कारण ही मां दुर्गा महिषासुर मर्दिनी कहलाईं.

आदिवासी और दलित क्यों मानते हैं महिषासुर को अपना पूर्वज?

महिषासुर को कुछ आदिवासी और दलित इलाकों में भगवान माना जाता है. इन इलाकों के आदिवासी और दलित इसे अपना पूर्वज मानते हैं. झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के कुछ आदिवासी इलाकों में महिषासुर को पूजा जाता है. इनका कहना है कि देवी दुर्गा ने छल से उसका वध किया था. महिषासुर उसके पूर्वज थे और देवताओं ने असुरों का नहीं बल्कि उनके पूर्वजों का संहार किया था.

झारखंड के गुमला में असुर नाम की एक जनजाति रहती है. ये लोग महिषासुर को अपना पूर्वज मानते हैं. झारखंड के सिंहभूम इलाके की कुछ जनजाति भी महिषासुर को अपना पूर्वज मानती है. इन इलाकों में नवरात्रों के दौरान महिषासुर का शहादत दिवस मनाया जाता है. बंगाल के काशीपुर इलाके में भी आदिवासी समुदाय के लोग महिषासुर के शहादत दिवस को धूमधाम से मनाते हैं.

कई जगहों पर महिषासुर को राजा भी माना जाता है. असुर जनजाति के लोग नवरात्रों के दौरान दस दिनों तक शोक मनाते हैं. इस दौरान किसी भी तरह के रीति रिवाज या परंपरा का पालन नहीं होता है. आदिवासी समुदाय के लोग बताते हैं कि उस रात विशेष एहतियात बरता जाता है, जिस रात महिषासुर का वध हुआ था.

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कई इलाकों में महिषासुर को पूजा जाता है

कुछ आदिवासी मानते हैं कि महिषासुर का असली नाम हुडुर दुर्गा था. वो एक वीर योद्धा था. महिषासुर महिलाओं पर हथियार नहीं उठाता था. इसलिए देवी दुर्गा को आगे कर उनकी छल से हत्या कर दी गई. आदिवासी आज भी महिषासुर के किस्सों को अपने बच्चों को बताते हैं.

आदिवासी और दलित मिथकों में क्या है महिषासुर की कहानी

महिषासुर को आदिवासी या दलित बताने वाले समुदाय के मुताबिक ये आर्यों और अनार्यों के बीच की लड़ाई की कहानी है. इस कहानी के मुताबिक करीब 3 हजार साल पहले महिषासुर अनार्यों का राजा था. उस दौर में अनार्य भैंसों की पूजा करते थे. महिषासुर के पास असीमित शक्ति थी. उसने अपनी ताकत के बल पर कई आर्य राजाओं को शिकस्त दी थी. उत्तरी आर्यावर्त में महिषासुर की ख्याति थी.

उसी दौर में उत्तरी आर्यावर्त के एक हिस्से में एक रानी ने शासन संभाला. वो आर्य राजा जो महिषासुर से हार चुके थे, सबने मिलकर उस रानी से महिषासुर के खिलाफ युद्ध लड़ने की प्रार्थना की. रानी ने युद्ध के लिए विभिन्न अस्त्र-शस्त्रों से लैस शक्तिशाली सेना बनाई. जबकि महिषासुर के पास सेना कम पड़ गई. उसके पास सैनिकों की कमी हो गई थी.

महिषासुर को लगता था कि वो एक रानी से नहीं हार सकता. फिर भी उसने रानी के पास बातचीत के लिए अपने दूत भेजे. रानी ने दूत को बिना बातचीत के वापस लौटा दिया. लेकिन महिषासुर बार-बार बातचीत का न्यौता देने के लिए अपने दूत भेजता रहा. तब तक रानी ने अपनी विशालकाय सेना के साथ महिषासुर पर आक्रमण कर दिया. महिषासुर के पास भी शक्तिशाली सेना थी. महिषासुर को लग रहा था कि वो जीत जाएगा. लेकिन रानी ने महिषासुर के सीने को अपने त्रिशूल से छलनी कर दिया. रानी के पालतू शेर ने महिषासुर को खत्म कर दिया.

महिषासुर को अपना पूर्वज मानने वाले आदिवासी और दलित उसकी यही कहानी बताते हैं.

B.Ed की छात्रा को अपने ट्यूटर से ही हुआ लव, बात आगे बढ़ी तो हुआ ये अंजाम

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दिल्ली पुलिस ने करावल नगर में 25 साल की एक युवती की हत्या का मामला सुलझाने का दावा किया है. पुलिस के मुताबिक युवती की उसके ही ट्यूटर नौशाद ने हत्या कर दी थी. पुलिस ने आरोपी नौशाद के एक रिश्तेदार को भी गिरफ्तार किया है. बीते रविवार को दिल्ली के करावल नगर इलाके में नाले के किनारे एक बैग पड़ा मिला था. बैग से बदबू आने पर लोगों ने पुलिस को इसकी सूचना दी थी. पुलिस ने मौके पर पहुंचकर बैग को खोला तो उसके अंदर एक युवती की लाश मिली. लाश काफी सड़ी-गली हालत में थी. पुलिस ने अपनी शुरुआती जांच में युवती की पहचान कर ली थी. मृतक बीएड की छात्रा थी जो बीते 25 सितंबर से अपने घर से लापता थी.

प्यार में धोखा मिला

आरोप है कि बीएड छात्रा को उसे पढ़ाने आने वाले नौशाद से प्रेम हो गया. लेकिन शादी की बात करने पर युवती की हत्या कर लाश को नाले में फेंक दिया गया

पुलिस के मुताबिक, ‘नौशाद पर युवती शादी का दबाव बना रही थी, इससे परेशान नौशाद ने अपने एक रिश्तेदार के साथ मिलकर उसकी हत्या कर दी.’ पुलिस को तफ्तीश में पता चला कि यह प्रेम प्रसंग का मामला है. मृतका के दोस्तों ने दिल्ली पुलिस को बताया था कि उसका अपने ट्यूटर के साथ प्रेम संबंध था. पुलिस आरोपी ट्यूटर से लगातार पूछताछ कर रही थी, लेकिन वो लगातार उसे बरगला रहा था. लेकिन, जब उससे सख्ती से पूछताछ की गई तो उसने सारे राज उगल दिए और युवती की हत्या की बात कबूल कर ली.

जिस बेरहमी से युवती की हत्या की गई थी, उससे इलाके में सनसनी फैल गई थी. कातिलों ने युवती को मारकर लाश को बैग में डालकर नाले में फेंक दिया था. पुलिस ने नाले के आसपास लगे सीसीटीवी फुटेज को खंगालना शुरू किया तो उसमें आरोपी ट्यूटर नौशाद कुछ देर पहले उस इलाके से गुजरा दिखा.

शादी करने को लेकर हुई हत्या

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दिल्ली पुलिस ने युवती का शव बरामद होने के एक सप्ताह बाद कातिल ट्यूटर और उसके एक रिश्तेदार को गिरप्तार कर लिया


दिल्ली पुलिस पर इस ब्लाइंड मर्डर केस को सुलझाने का दवाब था. पुलिस ने करावल नगर के आसपास के इलाके और दिल्ली-एनसीआर में गुमशुदगी के कई मामलों की तफ्तीश की तो पता चला कि एक युवती तीन-चार दिन से अपने घर से गायब है. युवती की पहचान हुई तो उससे जुड़े राज एक-एक खुलते गए और आखिरकार दिल्ली पुलिस ने शनिवार को कातिल और उसके एक रिश्तेदार को गिरफ्तार कर लिया.

फर्जी कागज बनाकर कश्मीर के व्यापारी को 300 करोड़ में बेच दिया हैदराबाद का महल

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‘बंटी और बबली’ फिल्म में आपने अभिषेक बच्चन और रानी मुखर्जी को ताजमहल और कई बड़ी इमारतों को बेचते हुए देखा होगा. फिल्मी पर्दे की ये कहानी अगर सच साबित हो जाए तो आप क्या कहेंगे. मुंबई की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी ने अपने दो पूर्व कर्मचारियों पर आरोप लगाया है कि उन्होंने 300 करोड़ रुपये कीमत वाले हैदराबाद के एक महल को बिना उनकी जानकारी के कश्मीर के एक होटल व्यवसायी को बेच दिया. निहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर ने इसकी शिकायत मुंबई पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा में की है.

खबर के मुताबिक, कंपनी ने आरोप लगाया है कि उनके पूर्व कमचारी सुरेश कुमार और सी रविंद्र ने हैदराबाद की प्रॉपर्टी को उनसे पूछे बिना कश्मीर स्थित आइरिस हॉस्पिटैलिटी के अमित अमला और अर्जुन अमला को बेच दिया. निहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर ने 100 साल पुराना नजरी बाग पैलेस तीन साल पहले नजरी बाग पैलेस ट्रस्ट से खरीदा था. हैदाराबाद के पास हैदरगुडा में बना यह महल किंग कोठी के नाम से मशहूर है. इसी साल जून में जब कंपनी के कुछ कर्मचारी हैदराबाद प्रॉपर्टी के रजिस्ट्रार के दफ्तर पहुंचे तो पता चला कि महल का मालिकाना हक आइरिस हॉस्पिटैलिटी को ट्रांसफर कर दिया गया है.

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किंग कोठी के नाम से मशहूर नजरी बाग पैलेस 2.5 लाख वर्ग फीट तक फैला हुआ है.

मामले की जांच में पता चला कि आइरिस हॉस्पिटैलिटी ने इस महल की डील सुरेश कुमार और सी रविंद्र के साथ हुई थी. इस फ्रॉड के अंजाम देने के बाद दोनों ने इसी साल फरवरी में निहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर छोड़ दी थी. कंपनी की शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्जकर जांच शुरू कर दी है. जांच में पता चला है कि सुरेश कुमार और सी रविंद्र ने हैदराबाद रजिस्ट्रार के दफ्तर में फर्जी दस्तावेज जमाकर इस फ्रॉड को अंजाम दिया है. आरोपियों के खिलाफ धोखाधड़ी, जालसाजी और विश्‍वास के आपराधिक उल्‍लंघन के आरोपों के तहत एफआईआर दर्ज की गई है.

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हैदराबाद के आखिरी निजाम यहीं रहा करते थे. निजाम की 1967 में मौत हो गई थी.

किसका है यह महल
किंग कोठी के नाम से मशहूर नजरी बाग पैलेस 2.5 लाख वर्ग फीट तक फैला हुआ है. हैदराबाद के आखिरी निजाम यहीं रहा करते थे. बताया जाता है कि निजाम की 1967 में मौत हो गई थी. निजाम ने ये महल मशहूर आर्किटेक्ट कमाल खान से खरीदा था. बाद में इस महल का नाम किंग कोटी रख दिया गया.

262 साल पहले बंगाल में ऐसे हुई थी दुर्गा पूजा मनाने की शुरुआत

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हर साल नवरात्र के मौके पर भव्य दुर्गा पूजा की परंपरा रही है. नौ दिनों के दौरान मां की उपासना होती है. देश के कोने-कोने में पूरी भव्यता से मां दुर्गा और उनके नौ रूपों की अराधना होती है. पश्चिम बंगाल में सबसे भव्य तरीके से दुर्गा पूजा होती है. बंगाल के विभिन्न शहरों में होने वाली दुर्गा पूजा की रौनक देखती ही बनती है. बड़े-बड़े पंडाल और आकर्षक मूर्तियों के साथ शानदार तरीके से बंगाली समाज देवी दुर्गा की पूजा करता है.

बंगाल में सैकड़ों साल से दुर्गा पूजा हो रही है. कहा जाता है कि बंगाल से ही देश के दूसरे हिस्सों में दुर्गा पूजा आयोजित करने का चलन फैला. आज भी पश्चिम बंगाल जैसी दुर्गा पूजा कहीं नहीं होती. पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा आयोजित करने की शुरुआत को लेकर कई कहानियां हैं. पहली बार दुर्गा पूजा कैसे हुई, क्यों आयोजित की गई, इसको लेकर दिलचस्प किस्सा है.

प्लासी के युद्ध के बाद पहली बार दुर्गा पूजा का आयोजन

एक कहानी ये है कि पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का आयोजन 1757 के प्लासी के युद्ध के बाद शुरू हुआ. कहा जाता है कि प्लासी के युद्ध में अंग्रेजों की जीत पर भगवान को धन्यवाद देने के लिए पहली बार दुर्गा पूजा का आयोजन हुआ था. प्लासी के युद्ध में बंगाल के शासक नवाब सिराजुद्दौला की हार हुई थी.

बंगाल में मुर्शिदाबाद के दक्षिण में 22 मील दूर गंगा किनारे प्लासी नाम की जगह है. यहीं पर 23 जून 1757 को नवाब की सेना और अंग्रेजों के बीच युद्ध हुआ. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने रॉबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में युद्ध लड़ा और नवाब सिराजुद्दौला को शिकस्त दी. हालांकि युद्ध से पहले ही साजिश के जरिए रॉबर्ट क्लाइव ने नवाब के कुछ प्रमुख दरबारियों और शहर के अमीर सेठों को अपने साथ कर लिया था.

first durga puja celebration in west bengal and its link with 1757 battle of plassey
1757 का प्लासी का युद्ध

कहा जाता है कि युद्ध में जीत के बाद रॉबर्ट क्लाइव ईश्वर को धन्यवाद देना चाहता था. लेकिन युद्ध के दौरान नवाब सिराजुद्दौला ने इलाके के सारे चर्च को नेस्तानाबूद कर दिया था. उस वक्त अंग्रेजों के हिमायती राजा नव कृष्णदेव सामने आए. उन्होंने रॉबर्ट क्लाइव के सामने भव्य दुर्गा पूजा आयोजित करने का प्रस्ताव रखा. इस प्रस्ताव पर रॉबर्ट क्लाइव भी तैयार हो गया. उसी वर्ष पहली बार कोलकाता में भव्य दुर्गा पूजा का आयोजन हुआ.

एक अंग्रेज को प्रसन्न करने के लिए हुई थी पहली बार दुर्गा पूजा

पूरे कोलकाता को शानदार तरीके से सजाया गया. कोलकाता के शोभा बाजार के पुरातन बाड़ी में दुर्गा पूजा का आयोजन हुआ. इसमें कृष्णनगर के महान चित्रकारों और मूर्तिकारों को बुलाया गया. भव्य मूर्तियों का निर्माण हुआ. वर्मा और श्रीलंका से नृत्यांगनाएं बुलवाई गईं. रॉबर्ट क्लाइव ने हाथी पर बैठकर समारोह का आनंद लिया. इस आयोजन को देखने के लिए दूर-दूर से चलकर लोग कोलकाता आए थे.

इस आयोजन के प्रमाण के तौर पर अंग्रेजों की एक पेटिंग मिलती है. जिसमें कोलकाता में हुई पहली दुर्गा पूजा को दर्शाया गया है. राजा नव कृष्णदेव के महल में भी एक पेंटिंग लगी थी. इसमें कोलकाता के दुर्गा पूजा आयोजन को चित्रित किया गया था. इसी पेंटिंग की बुनियाद पर पहली दुर्गा पूजा की कहानी कही जाती है.

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बंगाल में दुर्गा पूजा आयोजन की पुरानी पेंटिंग

1757 के दुर्गा पूजा आयोजन को देखकर बड़े अमीर जमींदार भी अचंभित हो गए. बाद के वर्षों में जब बंगाल में जमींदारी प्रथा लागू हुई तो इलाके के अमीर जमींदार अपना रौब रसूख दिखाने के लिए हर साल भव्य दुर्गा पूजा का आयोजन करने लगे. इस तरह की पूजा को देखने के लिए दूर-दूर के गांवों से लोग आते थे. धीरे-धीरे दुर्गा पूजा लोकप्रिय होकर सभी जगहों पर होने लगी.

दुर्गा पूजा के आयोजन को लेकर कई दूसरी कहानियां

पहली बार दुर्गा पूजा के आयोजन को लेकर कई दूसरी कहानियां भी हैं. कहा जाता है कि पहली बार नौवीं सदी में बंगाल के एक युवक ने इसकी शुरुआत की थी. बंगाल के रघुनंदन भट्टाचार्य नाम के एक विद्वान के पहली बार दुर्गा पूजा आयोजित करने का जिक्र भी मिलता है. एक दूसरी कहानी के मुताबिक बंगाल में पहली बार दुर्गा पूजा का आयोजन कुल्लक भट्ट नाम के पंडित के निर्देशन में ताहिरपुर के एक जमींदार नारायण ने करवाया था. यह समारोह पूरी तरह से पारिवारिक था. कहा जाता है कि बंगाल में पाल और सेनवंशियों ने दुर्गा पूजा को काफी बढ़ावा दिया.

बताया जाता है कि 1757 के बाद 1790 में राजाओं, सामंतों और जमींदारों ने पहली बार बंगाल के नदिया जनपद के गुप्ती पाढ़ा में सार्वजनिक दुर्गा पूजा का आयोजन किया था. इसके बाद दुर्गा पूजा सामान्य जनजीवन में भी लोकप्रिय होती गई और इसे भव्य तरीके से मनाने की परंपरा पड़ गई.

कचौड़ी खाने को लेकर दो समुदाय में विवाद, इलाके में पुलिस के साथ PAC की तैनाती

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उत्तर प्रदेश के हाथरस में एक दुकान पर कचौड़ी खाने को लेकर शुरू हुआ विवाद देखते ही देखते काफी बड़ा हो गया. छोटी सी बात से यह देखते ही देखते दो समुदाय के लोगों के बीच मारपीट का सबब बन गया. इस दौरान दोनों पक्षों में जमकर लाठी-डंडे चले और पथराव भी हुआ. जिसमें दो लोग घायल हो गए, जिन्हें पुलिस ने इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया. तनाव की स्थिति को देखते हुए इलाके में भारी पुलिस बल की तैनाती की गई है.

मामला हाथरस जिले के थाना कोतवाली सिकंदराराऊ क्षेत्र के मोहल्ला लोट कुआ का है. शुक्रवार की शाम को नास्ते की दुकान पर कचौड़ी खाने को लेकर मोहल्ला नौ खेल थाना सिकंदराराऊ के युवकों और गांव फरीदाबाद थाना सिकंदराराऊ के युवकों के बीच विवाद हो गया.लेकिन आसपास मौजूद लोगों इसे शांत करा दिया

दो लोगों को गंभीर चोट
बाद में दोनों समुदाय के लोग फिर से आपस में लड़ गए और देखते ही देखते दोनों तरफ से लाठी डंडे चलने लगे. इसके बाद पथराव भी शुरू हो गया. इस कारण मोहल्ले में अफरा तफरी का माहौल पैदा हो गया. मारपीट और पथराव में दो लोगों को गंभीर रूप चोट आई है.

इलाके में पुलिस के साथ पीएसी की तैनाती
घटना की सुचना पाकर थाना पुलिस के साथ मौके पर पंहुचे पुलिस क्षेत्राधिकारी सिकंदराराऊ राजीव कुमार और एसडीएम सिकंदराराऊ विजय कुमार शर्मा ने मोहल्ले में झगड़ा कर रहे लोगों को खदेड़ा. पुलिस दोनों घायलों को उपचार के लिए सीएचसी सिकंदराराऊ ले गई. इलाके में तनाव को देखते हुए थाना पुलिस के साथ पीएसी बल को तैनात किया गया है.

राम जन्मभूमि विवाद: सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले अयोध्या जिला प्रशासन ने मांगी अतिरिक्त फोर्स

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रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवादकी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है. वहीं अयोध्या मामले में नवंबर महीने में फैसला आने की उम्मीद है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले अयोध्या जिला प्रशासन ने सरकार से अतिरिक्त फोर्स की मांग की है. बताया जा रहा है कि बाहर से आने वाले पुलिसबल को स्कूल, कॉलेज, धर्मशाला, मठ और मंदिरों में ठहराया जाएगा. जिसके लिए जिला प्रशासन के अधिकारी अभी से व्यवस्था करने में जुट गए हैं. पूरे अयोध्या में हाई अलर्ट है. इसी कड़ी में जगह-जगह चेकिंग की जा रही है.

इससे पहले मुस्लिम पक्ष अपने दिए उस बयान से पीछे हट गया कि अयोध्या के विवादित स्थल के बाहरी हिस्से में स्थित ‘राम चबूतरा’ ही भगवान राम का जन्मस्थल है. साथ ही उसने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की उस रिपोर्ट पर सवाल उठाए जिसमें संकेत दिया गया है कि यह ढांचा बाबरी मस्जिद से पहले स्थित था.

मुस्लिम पक्ष ने बताया उसके रुख में कोई बदलाव नहीं

मुस्लिम पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसके इस रुख में कोई बदलाव नहीं हुआ है कि इस बात के कोई साक्ष्य (सबूत) नहीं हैं कि 2.27 एकड़ का विवादित स्थल भगवान राम का जन्मस्थान था. उन्होंने यह भी कहा कि उनका सिर्फ यही आशय था कि मुस्लिम पक्ष ने फैजाबाद के जिला न्यायाधीश के 18 मई, 1886 के फैसले को चुनौती नहीं दी थी.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय पीठ ने कहा, ‘आपकी जो भी आपत्ति हो, भले ही वो कितनी भी मजबूत हो, उस पर हम विचार नहीं कर सकते.’ पीठ ने दीवानी प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों की चर्चा करते हुए यह बात कही. इन प्रावधानों के तहत स्वामित्व वाले मुकदमे के पक्षकार अदालत के आयुक्त की रिपोर्ट पर आपत्ति उठा सकते हैं.