आज हम आपको बताने वाले हैं। पल भर में शराब का नशा उतारने का घरेलू नुस्खा, अगर आपके आस पास कोई शराब का नशा करते हैं। और उसके कारण आपको परेशानियां झेलनी पड़ती है तो आज हम कुछ सबसे कारगर उपाय के बारे में बताने वाले हैं। तो आइए जानते हैं।
1. शहद
शहद में अनेक गुण मौजूद होते हैं। इसके अलावा इसमें एंटीसेप्टिक और एंटीबायोटिक गुण भी मौजूद होते हैं। शहद शराब के नशे को कम करने में काफी मददगार होता है। अगर किसी व्यक्ति को शराब का बहुत ज्यादा नशा हो गया है। तो उस व्यक्ति को एक गिलास पानी में दो चम्मच शहद घोलकर पिलाएं। ऐसा करने से कुछ ही समय में व्यक्ति के ऊपर इसका असर दिखने लगेगा।
2. नींबू
नींबू शराब का नशा उतारने में बहुत ही ज्यादा कारगर माना गया है। इस नुस्खे को बनाने के लिए आपको एक नींबू को निचोड़ कर एक कप पानी में डाल देना है। और उसे शराबी व्यक्ति को पिलाना है यह नशा उतारने का बहुत ही कारगर नुस्खा है।
3.घी
घी आप 24 ग्राम घी ले लीजिए। आपको शुद्ध देसी घी का इस्तेमाल ही करना है आप 24 ग्राम घी और थोड़ी सी मात्रा में शक्कर या मिश्री ले लीजिए। और इसे मिलाकर शराबी व्यक्ति को इसे पिलाएं। यह बहुत ही कारगर और बहुत ही तेजी से असर दिखा सकता है। अगर किसी व्यक्ति को शराब का नशा अधिक हो गया हो, तो सिर पर ठंडा पानी डालने से भी शराब का नशा कम किया जा सकता है।
गुजरात में हर साल कच्छ शहर में भव्य रण महोत्सव का आयोजन होता है. कच्छ का मुख्य आकर्षण है रण में फैला सफेद नमक का रेगिस्तान, लेकिन ये भारी बारिश के चलते समुद्र में तब्दील हो चुका है. पानी में डूबे रेगिस्तान में समुद्र की तरह लहरें उठ रही हैं. हर साल बारिश का पानी सूख जाने के बाद ये नमक का रण बन जाता है, लेकिन दूर-दूर तक यहां रिहाइशी क्षेत्र ना होने की वजह से ये समुद्र जैसा दिख रहा है.
पिछले साल जहां कच्छ में बारिश ही नहीं हुई थी, वहीं इस साल कच्छ में काफी अच्छी बारिश दर्ज की गई है. बॉर्डर एरिया होने की वजह से यहां हमेशा पीने के पानी की काफी दिक्कत होती है, लेकिन इस साल हुई भारी बारिश की वजह से कच्छ के लोगों ने राहत की सांस ली है.
सफेद रण जो कि पूरा नमक का इलाका है, यहां रणोत्सव की शुरुआत गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2004 में की थी. हर साल यहां एक टेंट सिटी बनाई जाती है और यहीं पर आने वाले पर्यटक चांदनी रात में कच्छ के इस सफेद रण का लुत्फ उठाते हैं.
बता दें कि भारत के अलावा अन्य देशों से भी बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं. अपने कैमरे में रण उत्सव की यादें समेटते ये पर्यटक भारत की कला और संस्कृति की कुछ झलक अपने साथ ले जाने हर साल यहां आते हैं. हर साल तीन महीने तक चलने वाले इस महोत्सव में पूरे विश्व से आए हुए पर्यटकों का जमावड़ा लगता है.
हाल ही में बहुत ही चौकाने वाला खुलासा हुआ। विकीपीडिया पर एक पेज में यह बताया जा रहा है कि एक चीनी व्यक्ति 256 साल का हो जाने के बाद मरा था। बताया जा रहा है कि उस व्यक्ति ने जिंदा एवं स्वस्थ रहने का मंत्र सीख लिया था। हम बात कर रहे हैं ली चिंग के बारे में जिनका जन्म में 1677 या 1736 में हुआ था। उनकी पूरी जिंदगी ज्यादातर पहाड़ों पर बीती। चीनी सेना के जनरल युंग सेन के मुताबिक उनका जन्म 1677 में हुआ था।
जब ली चिंग 13 साल के थे तो वे अपने घर को छोड़कर चले गए और पहाड़ों पर रहने लगे। जब वह अपने घर वापस आए तो उनकी उम्र 51 साल हो गई। उन्होंने जनरल यू जॉन्ग की सेना में सलाहकार के तौर पर काम किया। जब वे 78 साल के हो गए तो सेना से रिटायर हो गए।
जब ली पूरे 100 साल के हो गए तो वहां के शाही राजघराने ने उनको शाही बधाई संदेश भेजा। इतना ही नहीं उनके 150वें और 200वें जन्मदिन पर भी बधाई संदेश भेजा गया। 1928 में उन बधाई संदेश को डीन वू चुंग चेन ने खोज लिया। वह मिनकू यूनीवर्सिटी में शिक्षा विभाग में थे। उनकी खोज चीन के दो अखबारों में प्रकाशित भी हुई थी। न्यूयॉर्क टाइम्स ने 1929 में इस खबर की पुष्टि कर दी। 1933 में ली इस दुनिया को हमेशा के लिए छोड़ कर चले गए। यदि रिकॉर्ड को सच माना जाए तो वह 200 से अधिक साल तक जिंदा रहे।
1908 में उनकी जिंदगी पर एक किताब भी लिखी गई जिसका नाम द सीक्रेट ऑफ ली ली क्वीनगिन इमोर्टेलिटी था। वह अपने समय के काफी जाने-माने आयुर्वेदिक डॉक्टर थे। उनको मार्शल आर्ट में महारथ हासिल थी। बताया जाता है कि ली ने स्वस्थ एवं जिंदा रहने का मंत्र सीख लिया था। उन्होंने अपने पूरे जीवन में 23 पत्नियों का अंतिम संस्कार किया। 6 मई 1933 को उनकी मृत्यु हो गई। 256 साल की उम्र पर उनका निधन हुआ।
आप सभी लोगों ने लैला-मजनू की प्रेम कहानी जरूर सुनी होगी। लेकिन आप लोग यह नहीं जानते होंगे कि असल में लैला-मजनू कैसे दिखते थे। दावा किया जाता है कि लैला-मजनू भारतीय इतिहास से संबंधित है। लैला-मजनू ने अपनी जिंदगी के आखिरी पल पाकिस्तान बॉर्डर से सिर्फ 2 किलोमीटर दूर राजस्थान की जमीन पर बिताए थे। लैला-मजनू की बनी हुई मजार काफी फेमस है जो श्रीगंगानगर जिले में है।
इस मजार को अनूपगढ़ तहसील के गांव बिंजौर में बनाया गया। यहां पर प्यार करने वाले लोग प्यार की मन्नतें मांगने के लिए आते हैं। लोग बताते हैं कि लैला-मजनू सिंध प्रांत के निवासी थे। उनकी मौत कैसे हुई उसकी जानकारी किसी को भी नहीं है। बताया जाता है कि जब लैला के भाई को पता चला कि उसका किसी से संबंध है तो भाई ने मजनू की हत्या करवा दी। इस बात की जानकारी जब लैला को हुई तो वह मजनू के शव के पास पहुंची और दुखी होकर आत्महत्या कर ली।
15 जून के दिन इस मजार पर हर वर्ष 2 दिनों का मेला लगता है। इस मेले में हिंदुस्तान एवं पाकिस्तान के प्रेमी एवं नव विवाहित जोड़े आते हैं एवं अपनी सफल शादीशुदा जिंदगी की कामना करते हैं।
मेले में सिर्फ हिंदू एवं मुस्लिम ही नहीं बल्कि सिख, ईसाई जैसे धर्मों के लोग भी आते हैं। इस मजार को प्रेम के सबसे बड़ी धर्म की मिसाल माना जाता है।
भारतीय सेना ने भी इन दोनों महान प्रेमियों को पूरा सम्मान दिया। भारत-पाकिस्तान बॉर्डर पर मौजूद एक पोस्ट को बीएसएफ की मजनू पोस्ट का नाम दिया गया है। इस मजार पर जाने के लिए कारगिल युद्ध से पहले पाकिस्तान पर खुला रास्ता था। लेकिन बाद में आतंकवादियों की वजह से उसको बंद कर दिया गया।
बारिश के मौसम में अक्सर अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग अलर्ट जारी किए जाते हैं। ये अलर्ट अलग-अलग रंगों के नाम से होते हैं। जैसे – रेड अलर्ट, ऑरेंज अलर्ट, ग्रीन अलर्ट या येलो अलर्ट। आपने खबरों में भी कई बार इसका जिक्र सुना होगा। मौसम विभाग (IMD – India Meteorological Department) ने बुधवार को मुंबई में भी बारिश को लेकर रेड अलर्ट जारी किया है।
लेकिन क्या आप इसका मतलब जानते हैं? बारिश को लेकर इन अलग-अलग रंगों के अलर्ट के क्या मायने हैं? ये किस स्थिति को दर्शाते हैं? ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए? इन सवालों के जवाब हम आपको आगे बता रहे हैं।
रेड अलर्टयह काफी भारी बारिश की चेतावनी देता है। यानी जिस जगह के लिए ये अलर्ट जारी किया गया है, वहां काफी भारी बारिश की आशंका है। 24 घंटे में 200 मिमी तक बारिश। मुंबई में अगर यह अलर्ट जारी किया गया है तो वहां के प्राधिकरणों जैसे – मुंबई पुलिस, नगर निगम (BMC), फायर ब्रिगेड, नेशनल डिजास्टर रेस्पॉन्स फोर्स (NDRF), रेलवे व अन्य को तुरंत जरूरी कदम उठाने होंगे। आने वाली भारी बारिश से बचाव के लिए तैयार रहना होगा।
ग्रीन अलर्टमौसम विभाग द्वारा अगर ग्रीन अलर्ट दिया जाता है, तो इसका मतलब है कि किसी तरह के एक्शन लिए जाने की जरूरत नहीं है। बारिश के पूर्वानुमान के तहत ग्रीन अलर्ट हल्की या मध्यम बारिश के लिए जारी किया जाता है।
येलो अलर्टअगर मौसम विभाग येलो अलर्ट जारी करता है तो इसका मतलब है कि संबंधित अधिकारियों को हालातों पर नजर रखनी होगी। उन्हें बारिश की स्थिति और शहर के हालात के बारे में समय-समय पर पूरी जानकारी रखनी होगी।
ऑरेंज अलर्टमौसम विभाग द्वारा ऑरेंज अलर्ट जारी किए जाने का अर्था है ‘अलर्ट’। यानी संबंधित अधिकारियों को जरूरी कदम उठाने के लिए तैयार रहना होगा। यह पूर्वानुमान भारी बारिश के लिए जारी किया जाता है। इसका मतलब होता है कि हालात किसी भी वक्त बिगड़ भी सकते हैं। इसके लिए संबंधित विभाग पूरी तरह तैयार और अलर्ट रहें। ताकि जरूरत पड़ने पर बिना देर किए जरूरी कदम उठाए जा सकें। कितनी बारिश हो तो उसे भारी बारिश माना जाएगा
मौसम विभाग के अनुसार, अगर 15.6 मिमी से लेकर 64.4 मिली (mm) बारिश हो तो उसे मध्यम (moderate) कहा जाता है।
अगर बारिश 64.5 मिमी से लेकर 115.5 मिमी तक हो, तो उसे भारी (heavy) कहा जाता है।
वहीं, अगर 115.6 मिमी से लेकर 204.4 मिमी के बीच बारिश होती है, तो उसे काफी भारी (very heavy) बारिश कहा जाता है।
अगर किसी क्षेत्र में 204.5 मिमी से भी ज्यादा बारिश की आशंका होती है तो उसे अत्यंत भारी (extremely heavy) बारिश कहते हैं। ऐसी स्थिति में रेड अलर्ट जारी किया जाता है।
मध्य प्रदेश में संघ प्रचारक पर पुलिस कार्रवाई एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार कटनी जिले के एनकेजे थाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के नगर प्रचारक गोविंद ठाकुर को कपड़े उतारकर जूतों से पीटने का मामला सामने आया है। आरोप है कि थाना प्रभारी अनिल काकड़े ने संघ प्रचारक की पिटाई की।
पहले दोनों के बीच बहस हुई थी
प्राप्त जानकारी के अनुसार, आरएसएस के नगर प्रचार गोविंद ठाकुर तिलक कॉलेज के पास साइकिल से घूम रहे थे और कुछ छात्रों से बात कर रहे थे। इस दौरान एनकेजे के थाना प्रभारी अनिल काकड़े कुछ पुलिसकर्मियों के साथ गश्त लगा रहे थे। गोविंद ठाकुर और थाना प्रभारी अनिल काकड़े के बीच किसी मुद्दे पर बहस शुरू हो गई। नौबत नोकझोंक तक पहुंच गई। उसके बाद थाना प्रभारी काकड़े गोविंद ठाकुर को थाने ले गए। शिकायत सामने आई है कि थाने के भीतर थाना प्रभारी अनिल काकड़ ने संघ प्रचारक को कपड़े उतारकर जूतों से पीटा।
महापौर और विधायक के धरने के बाद मिला जांच का आश्वासन
जैसे ही बीजेपी कार्यकर्ताओं को इस बात की जानकारी मिली वो धरना देने थाने पहुंच गए। कार्यकर्ताओं के साथ विधायक संदीप जायसवाल और महापौर शांशक श्रीवास्तव भी धरने पर बैठ गए। बताया गया है कि एसपी कटनी ने थाना प्रभारी अनिल काकड़े को भी लाइन हाजिर कर दिया गया है। मामले की जांच उच्च अधिकारियों की निगरानी में कराए जाने की भी बात कही गई है।
जिम्बॉब्वे के पूर्व राष्ट्रपति रॉबर्ट मुगाबे (Former Zimbabwe president Robert Mugabe) का सिंगापुर के एक अस्पताल में निधन हो गया. 95 साल के रॉबर्ट मुगाबे पिछले कई दिनों से बीमार चल रहे थे. रॉबर्ट मुगाबे 1980 से 1987 तक प्रधानमंत्री और 1987 से 2017 तक राष्ट्रपति रहे थे. यानी रॉबर्ट मुगाबे ने 37 साल तक जिम्बॉब्वे का नेतृत्व किया था. लेकिन उनके कार्यकाल में जिम्बॉब्वे ने सबसे बुरा समय देखा है. पिछले साल तक वहां, 24 घंटे में खाने-पीने समेत कई बुनियादी जरूरतों वाली चीजों के दाम (Hyper Inflation) डबल हो जाते थे. इस देश के लोग बैग में नोट भरकर दूध, सब्जी खरीदने जाते थे. अगर घर की पूरी शॉपिंग करनी है तो ट्रॉली में पैसे भरकर ले जाने पड़ते थे.
कुछ समय पहले जिम्बॉब्वे की सड़कों पर ट्रॉली में नोट भरकर खड़े लोग आसानी से दिख जाते थे. दरअसल, यहां महंगाई काफी ज्यादा बढ़ गई थी. इस वजह से लोगों को छोटे से सामान के लिए भी काफी ज्यादा पैसे देने पड़ते थे. वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, जिम्बॉब्वे में इतिहास की दूसरी सबसे ज्यादा महंगाई दर होती थी.हर 24 घंटे में चीजों की कीमतें डबल हो जाती थीं.
आपको बता दें कि जिम्बॉब्वे की सालाना मुद्रास्फीति दर जून महीने में 175 प्रतिशत पर पहुंच गई है. इससे जिम्बॉब्वे में दस साल पहले की तरह अति मुद्रास्फीति की आशंका पैदा हो गई है. उस समय उसकी पूरी अर्थव्यवस्था ढह गई थी और बचत समाप्त हो गई थी.
>> अर्थशास्त्री बताते हैं कि जिम्बॉब्वे की सरकार के पास अच्छी पॉलिसीज की कमी रही. उस समय वहां की सरकार ने बिना किसी प्लानिंग के बस नोट छापने शुरू कर दिए, जिसकी वजह से लोगों के पास काफी पैसे आ गए.
>> सरकार ने अगर ज्यादा नोट छापने की जगह अनाज उगाने के लिए किसानों को सही ट्रेनिंग दी होती, तो शायद इस देश में इतनी महंगाई नहीं होती. यहां लोगों के पास पैसे तो आ गए, लेकिन खाने-पीने की चीजें कम होने के कारण काफी महंगे हो गए.
गरीब भी बन गए करोड़पति!- जिम्बॉब्वे में जिन लोगों को गरीब कहा जाता था, उनके पास भी करोड़ों रुपए हुआ करते थे. लेकिन उसका कोई फायदा नहीं था, क्योंकि उन पैसों की वैल्यू यहां काफी कम थी. उस समय के आंकड़ों पर नजर डालें तो एक हजार लाख करोड़ जिम्बॉब्वे डॉलर की कीमत महज 5 अमेरिकी डॉलर रह गई थी. इससे वहां की करेंसी और महंगाई की हालत का पता लगता है.
आखिर ऐसा क्या हुआ- जब इस देश के लोगों के पास पैसों की कमी होने लगी थी, तो यहां की सरकार ने अंधाधुंध नोट छापने शुरू कर दिए थे.
>> इसी का नतीजा था कि लोगों के पास काफी पैसे इकट्ठे हो गए थे. लेकिन फिर महंगाई इतनी बढ़ गई कि लोगों को जरूरत का सामान खरीदने के लिए सूटकेस में पैसे भरकर देने पड़ते थे.
>> साल 1980 से लेकर अप्रैल 2009 तक जिम्बाब्वे की करेंसी जिम्बॉबवियन डॉलर थी. उससे पहले यहां की करेंसी रोडेशियन डॉलर थी. फिलहाल इस देश में कई देशों की करेंसी का इस्तेमाल होता है, जैसे साउथ अफ्रीका का रैंड, जापानी येन, चाइनीज युआन, ऑस्ट्रेलियाई और अमेरिकी डॉलर.
>>आर्थिक मंदी (1999-2008) ने इसे और गहरा कर दिया. इस दौरान यहां महंगाई इस स्तर तक पहुंच गई थी कि एक हफ्ते का बस का किराया भी करीब 100 ट्रिलियन डॉलर तक था. सरकार को साल 2009 में हाइपर इनफ्लेशन को नियंत्रित करने के लिए अपनी मुद्रा को छोड़कर अमेरिकी ‘डॉलर’ और दक्षिण अफ्रीकी ‘रैंड’ को आधिकारिक मुद्रा के तौर पर अपनाना पड़ा.
जमशेदपुर के बारीडीह के रहने वाले डीडी सिंह दो मुख्यमंत्रियों को पढ़ा चुके हैं. झारखंड के वर्तमान सीएम रघुवर दास और पूर्व सीएम व केन्द्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा उनके छात्र रह चुके हैं. दोनों मुख्यमंत्रियों ने जमशेदपुर के भालुबासा स्थित सरकारी हरिजन स्कूल से अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी की. इस दौरान डीडी सिंह वहां के शिक्षक थे.
छात्र के तौर पर ऐसे थे रघुवर दास और अर्जुन मुंडा
बातचीत में छात्र के तौर पर रघुवर दास और अर्जुन मुंडा को याद करते हुए डीडी सिंह ने कहा कि ये हमारे लिए गर्व की बात है कि हमने दो मुख्यमंत्रियों को पढ़ाया. दोनों मेधावी छात्र थे. दोनों पढ़ने-लिखने के साथ-साथ अनुशासन का भी ख्याल रखते थे. इन्हीं गुणों के आधार पर दोनों सीएम की कुर्सी तक पहुंचे.
डीडी सिंह ने कहा कि उन्होंने हरिजन स्कूल भालूबासा में शिक्षक के रूप में 27 वर्ष सेवा दी. मुख्यमंत्री रघुवर दास का घर भी इसी इलाके में था. इसलिए उन्हें करीब से जानने का मौका मिला. रघुवर दास पहले से ही सामाजिक कामों में जुड़े रहे.
एक वाकया को याद करते हुए डीडी सिंह ने कहा कि एक बार स्कूल में छेड़खानी को लेकर उनसे शिकायत की थी, तो दूसरे दिन से शरारती तत्वों का स्कूल के पास मंडरना बंद हो गया. उनमें नेतृत्व की क्षमता पहले से ही थी. इसी के बदौलत वे सीएम बने. मेरी कामना है कि वे दूबारा मुख्यमंत्री बने और झारखंड विकास के अपने सपने को पूरा करें.
हैदराबाद. देश में बढ़ते पेट्रोल-डीजल के दाम सबसे बड़ी परेशानी हैं जिससे रोजमर्रा चलने वाले आम लोग जूझ रहे हैं. पिछले कई सालों से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बड़ा इजाफा हुआ. इससे बचने के लिए लोगों ने सीएनजी फ्यूल का इस्तेमाल भी शुरू किया लेकिन यह देश की सीमित हिस्सों में ही मौजूद है. ऐसे में तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के 45 वर्षीय मेकैनिकल इंजीनियर सतीश कुमार पुरानी बेकार प्लास्टिक रिसायकल कर उसे फ्यूल में तब्दील किया है. प्रोफेसर ने बताया कि तीन प्रक्रिया में होने वाले इस पूरे प्रोसेस को प्लास्टिक पायरोलिसिस कहा जाता है.
गौरतलब है कि प्लास्टिक पिघला कर तेल बनाने वाले प्रोफेसर सतीश कुमार ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय के साथ पंजीकृत हाइड्रोक्सी प्राइवेट लिमिटेड के नाम की एक कंपनी की शुरुआत की है. प्रोफेसर सतीश कुमार अपनी इस गजब खोज को लेकर कहते हैं कि इस प्रक्रिया से प्लास्टिक को डीजल, विमानन ईंधन और पेट्रोल में बदलने के लिए रिसायकल करने में मदद मिलती है. खास बात है कि करीब 500 किलोग्राम गैर-पुनर्नवीनीकरण प्लास्टिक 400 लीटर ईंधन का उत्पादन कर सकता है.
प्रोफेसर आगे कहते हैं कि यह एक सरल प्रक्रिया है जिसमें पानी की आवश्यकता नहीं होती है, साथ ही पानी का व्यर्थ बहना भी बच जाता है. साथ ही यह प्रोसेस हवा को प्रदूषित नहीं करता है क्योंकि प्रक्रिया एक वैक्यूम में होती है.
प्रोफेसर सतीश कुमार के अनुसार, यह पूरी प्रक्रिया निर्वात से होती है जिससे वायु प्रदुषण भी नहीं होता. साल 2016 से लेकर अब तक सतीश कुमार 50 टन प्लास्टिक को पेट्रोल में बदल चुके हैं. रिसायकल प्रक्रिया के लिए उस प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जाता है जो किसी भी तरह के इस्तेमाल में नहीं लाया जा सकता है.
सतीश कुमार ने बताया कि वे हर रोज 200 किलो प्लास्टिक से 200 लीटर पेट्रोल बनाते हैं. जिसके बाद स्थानीय व्पापारियों को 40 से 50 रुपए प्रति लीटर की दर पर बेचते हैं. हालांकि, ये पेट्रोल वाहनों की सेहत के लिए कितना बेहतर है इसका टेस्ट होना बाकी है. पीवीसी और पीईटी को छोड़कर हर तरह की प्लास्टिक इस प्रक्रिया में इस्तेमाल में लाया जा सकता है.
हमारा भारत देश एक देश है जहां पर कोई भी नेता बिना सुरक्षा के नहीं घूमता है। जब भी कोई नेता घूमता है तो उसके साथ पूरा काफिला चलता है। भारत में प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और मुख्यमंत्रियों के लिए काफी कड़ी सुरक्षा का इंतजाम किया गया है। परिंदा भी बिना इजाजत के पर नहीं मार सकता। लेकिन इस पोस्ट में हम आपको एक ऐसे देश के बारे में बताने जा रहे हैं जहां पर राष्ट्रपति बिना सुरक्षा के ही घूमता है और इस देश में सिर्फ 33 लोग रहते हैं।
हम बात कर रहे हैं अमेरिका के नेवाडा में स्थिति मोलोसिया की। मोलोसिया की करंसी भी है। इस देश के अपने कायदे कानून और परंपरा है। केविन बॉघ एवं उनके फ्रेंड के दिमाग में 1977 में एक विचार आया। उन्होंने अलग देश बनाने की ठान ली। इसके बाद केविन बॉघ ने मोलोसिया की स्थापना कर दी। तब से ही केविन बॉघ इस देश के प्रेसिडेंट है। वे खुद को तानाशाह घोषित कर चुके हैं। उनकी पत्नी देश की पहली महिला का दर्जा रखती हैं। मोलोसिया में जितने भी लोग रहते हैं वह ज्यादातर केविन बॉघ के रिश्तेदार हैं। लेकिन इस देश को दुनिया की किसी भी सरकार से मान्यता नहीं दी गई है।
यह बहुत ही छोटा देश है जिसमें स्टोर, लाइब्रेरी, श्मशान घाट जैसी तमाम सुविधाएं उपलब्ध है। बहुत से देश के लोग यहां पर हॉलीडे का आनंद लेने आते हैं। हालांकि देश में एंट्री लेने के लिए उनको अपने पासपोर्ट पर स्टैंप लगवाना पड़ता है।
जिस दोस्त ने इस देश की स्थापना की सोची थी, उसने कुछ समय बाद अपने विचार को त्याग दिया। हालांकि केविन केविन बॉघ ने यह ठान ली और आगे चलकर नया देश बनाया। इस देश का प्रेसिडेंट बिना किसी सिक्योरिटी के घूमता है। जब भी कोई टूरिस्ट यहां आता है तो केविन बॉघ उसकी ट्रिप में टूरिस्ट को देश की बिल्डिंग दिखाते हैं। केविन बॉघ बहुत ही मिलनसार तानाशाह है।