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अब हलाल मीट को लेकर मैकडॉनल्ड्स को बायकॉट करने का चल रहा अभियान

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जोमैटो को बाद अब रेस्टोरेंट चेन मैकडॉनल्ड्स का बायकॉट शुरू हो चुका है. मैकडॉनल्ड ने हाल ही में ट्विटर पर खुलासा किया कि देश में उसका हर रेस्टोरेंट हलाल सर्टिफाइड है. भारत के किसी भी मैकडॉनल्ड्स रेस्टोरेंट मैनेजर से हलाल सर्टिफिकेट मांगा जा सकता है. बस इसी बात पर लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया. ट्विटर पर #BoycottMcDonalds ट्रेंड करने लगा.

ये सारा मामला hibailyas नाम के ट्विटर हैंडल से एक सवाल पूछने पर शुरू हुआ. इस हैंडल से मैकडॉनल्ड्स को टैग करके पूछा गया कि क्या भारत में आपके रेस्टोरेंट हलाल सर्टिफाइड हैं? जवाब में मैकडॉनल्ड्स ने लिखा ‘हमारे रेस्टोरेंट्स में जो मीट इस्तेमाल होता है वो बेस्ट क्वालिटी का होता है और सरकार द्वारा अप्रूव किए गए सप्लायर्स से लिया जाता है. हमारे सभी रेस्टोरेंट हलाल सर्टिफाइड हैं. आप मैनेजर से हलाल सर्टिफिकेट मांग सकते हैं.’

मैकडॉनल्ड्स के ऐसा ट्वीट करते ही लोग उसका विरोध करके रिप्लाई देने लगे.

बता दें कि इसी तरह कुछ दिन पहले मुस्लिम डिलिवरी पर्सन और हलाल मीट को लेकर ऑनलाइन फूड सर्विस जोमैटो को भारी विरोध का सामना करना पड़ा था. हालांकि तब ज्यादातर लोगों ने जोमैटो के फैसले की तारीफ की थी.

छत्तीसगढ़ के 40 समाजों के प्रतिनिधियों ने ‘मुख्यमंत्री’ को दी जन्मदिन की बधाई…

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मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल को जन्मदिन की बधाई देने राज्य के 40 छत्तीसगढ़िया समाजों के प्रतिनिधि रायपुर पहुचें। उन्होंने मुख्यमंत्री निवास में श्री बघेल से मुलाकात कर उन्हें बधाई दी। संयुक्त प्रतिनिधिमंडल में सर्व आदिवासी समाज, सतनामी समाज, कुर्मी समाज, यादव समाज सहित विभिन्न समाजों के पदाधिकारी शामिल थे। मुख्यमंत्री ने बधाई देने आए सभी लोगों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि आज बड़ी संख्या में बड़े-बुजुर्ग, युवा और बच्चे उनसे मिलने आए। बड़ों ने अपना आशीर्वाद मुझे दिया। मुख्यमंत्री ने सभी लोगों के प्रति आभार प्रकट किया।

     इस अवसर पर विधायक श्री देवेन्द्र यादव, सर्व आदिवासी समाज के श्री नवल सिंह मांडवी, सतनामी समाज के श्री के.पी. खाण्डे, कुर्मी समाज के श्री अश्वनी चंद्राकर सहित अनेक जनप्रतिनिधि और पदाधिकारी तथा सदस्य उपस्थित थे।

देखें तस्वीरें कैसे, कार में घुसा 7 फीट का खतरनाक अजगर, डर के मारे लोगों के फूले हाथ-पांव

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यमुना पुल पर एक कार में सात फिट अजगर दिखने से पूरे इलाके में डर फैल गया. कार में बैठे लोगों ने जैसे ही अजगर को देखा, उनका डर के मारे हाथ-पैर फूल गया. उन्होंने सांप को देखते ही तुरंत दरवाजा खोलकर निकले. जैसे ही बाकी के लोगों को इस बात की जानकारी हुई, वे इधर-उधर डर के मारे भागने लगे. यह घटना प्रयागराज की है.

इसके बाद कार का जब बोनट खोला गया, तो देखा कि अगजर कार के बोनट में अजीब तरीके से फंसा हुआ है. स्थानीय लोगों ने बहुत ही मुश्किल से टायर के नीचे से अजगर को निकाला.

कार के बोनट से अजगर को निकालने के बाद स्थानीय लोगों ने वन विभाग को फोन कर बुलाया. मौके पर पहुंची वन विभाग की टीम को स्थानीय लोगों ने अजगर को सौंप दिया. इस घटना में हैरान करने वाली बात ये है कि कार के मालिक को इस बात की खबर नहीं है कि कार में अजगर कैसे और कहां घुसा.

पीलिया जैसे रोगों से छुटकारा दिलाता है ये जूस

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अगर आपको भूख नहीं लगती हैं जिसकी वजह से शरीर को पूरा पोषण नहीं मिल पाता है जिससे कि स्वास्थ्य से सम्बंधित परेशानियां होती हैं। इसलिए करेले के जूस को हर रोज पीने से पाचन क्रिया सही रहती है जिससे भूख बढ़ती है।

-हर रोज एक गिलास करैले का जूस पीने से लीवर मजबूत होता है क्योंकि ये पीलिया जैसे रोगों से छुटकारा दिलवाता है। साथ ही ये लीवर से जहरीले पदार्थों को निकालता है और पोषण प्रदान करता है जिसे लीवर सही काम करता है और लीवर की बीमारियां दूर होती हैं|

-शुगर को नियंत्रित करने के लिए 3 दिन तक खाली पेट सुबह करैले का जूस लीजिए। मोमर्सिडीन और चैराटिन जैसे एंटी-हाइपर ग्लेसेमिक तत्वों की वजह से करेले का जूस ब्लड शुगर लेवल को मांसपेशियों में संचारित करने में मदद करता है| इसके बीजों में भी पॉलीपेप्टाइड-पी होता है जो कि इन्सुलिन को काम में लेकर डायबेटिक्स में शुगर लेवल को कम करता है।

खाने खाने के बाद चाय पीने से पाचन शक्ति पर पड़ता है विपरीत असर

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धूम्रपान करने वाले लोग हमेशा खाने के बाद सिगरेट पीते है। यह बहुत ही ज्यादा नुकसानदायक है। माना जाता है कि खाने के बाद पी गई एक सिगरेट 10 सिगरेट के बराबर शरीर को नुकसान पहुंचाती है। इसी के साथ कैंसर का खतरा भी बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।

खाने खाने के बाद चाय पीने से पाचन शक्ति पर असर पड़ता है और खाना आसानी से डाइजेस्ट नहीं हो पाता है। अगर आपको चाय पीनी भी है तो खाना खाने के कुछ घंटो बाद चाय पिएं तुरन्त ऐसा करना हानिकारक होता है।

अकसर यह कहा जाता है कि भोजन के बाद पाचन बहुत अच्छी तरह से हो जाए इसलिये टहलना अवश्य चाहिए। लेकिन ध्यान दे कि खाने के तुरंत बाद कभी टहलने नहीं निकले क्योंकि इससे खाना पचना तो दूर बल्कि हमारी सेहत पर खराब असर पड़ने लगता है।

नमक के पानी से नहाने से मांसपेशियों के दर्द में मिलता है आराम

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हर दिन की शुरूआत व्यक्ति नहा-धोकर ही करता है। यूं तो आप भी प्रतिदिन नहाते होंगे। लेकिन अगर आप नहाने के पानी में नमक डालते हैं तो इससे सेहत को कई तरह के लाभ प्राप्त होते हैं। तो चलिए जानते हैं नमक के पानी से नहाने के कुछ बेमिसाल फायदों के बारे में-

आज के समय में हर व्यक्ति को शरीर में कहीं न कहीं दर्द रहता ही है, लेकिन नमक के पानी से नहाने से मांसपेशियों के दर्द में आराम मिलता है।

शरीर में कैल्शियम की कमी को दूर करने के लिए सॉल्ट वॉटर बाथ की मदद ली जा सकती है। इससे हड्डियां व नाखून मजबूत होते हैं।

बुखार होने पर भी नमक वाले पानी से नहाना लाभदायक होता है। इसके लिए एक बाल्टी गुनगुने पानी में दो चम्मच नमक, 1 चम्मच नारियल का तेल मिलाकर इस पानी को नहाने में यूज करें।

अगर आप भी अत्यधिक तनाव के कारण अनिद्रा की समस्या से जूझ रहे हैं तो नमक के पानी से नहाएं। इससे आप खुद को ज्यादा शांत, खुश और आराम महसूस करते हैं। यह एक शानदार स्ट्रेस बस्टर है। मानसिक रूप से शांत होने पर आपको नींद भी काफी अच्छी आती है।

जन्माष्टमी विशेष: भगवान कृष्ण के सबसे बड़े शुत्र, कंस से भी ज्यादा खतरनाक था बहरूपिया पौंड्रक

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कृष्ण जन्माष्टमी का पर्व हिंदू धर्म के लोगो के लिए बहुत ही खास माना जाता हैं वही कृष्ण जन्माष्टमी इस बार दो दिन पड़ रही हैं वही हिंदू धर्म पंचांग के मुताबिक जन्माष्टमी भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि यानी की आठवें दिन मनाई जाती हैं वही इस बार 23 और 24 अगस्त को जन्माष्टमी मनाई जा रही हैं वही आज हम आपको जन्माष्टमी के अवसर पर बताने जा रहे हैं कि भगवान कृष्ण के जीवन में उनके सबसे बड़े दुश्मन कौन थे।

भगवान श्रीकृष्ण की मां देवकी के भाई कंस भगवान श्रीकृष्ण के सबसे बड़े दुश्मन थे। कंस अपनी बहन के प्रति लगाव था। मगर जब भविष्यवाणी हुई कि देवकी के गर्भ से पैदा हुआ बालक ही कंस का वध करेगा तो उसने पहले सात बच्चों की हत्या कर दी। जब भगवान कृष्ण का जन्मा हुआ

तो पिता वासुदेव उन्हें दबे पांव मथुरा में यशोदा के यहां छोड़ आए। वही कंस को इसकी भनक तक नहीं लगी।

आगे चलकर भगवान श्रीकृष्ण ही कंस की मौत का कारण भी बने। वही कंस की मौत के बाद उनके ससुर जरासंध कृष्ण की जान के दुश्मन बन गए।

खुद को श्रीकृष्ण बताने वाले राजा पौंड्रक की कहानी भी बड़ी दिलचस्प हैं नकली सुदर्शन चक्र, शंख, तलवार, मोर मुकुट, कौस्तुभ मणि, पीले वस्त्र पहनकर खुद को कृष्ण कहता था। पौंड्रक की हर गलतियों के लिए लोग श्रीकृष्ण को जिम्मेदार ठहराने लगे थे। इस बीच पौंड्रक ने श्रीकृष्ण को युद्ध की चुनौती दे डाली। इसके बाद युद्ध हुआ और पौंड्रक का वध कर श्रीकृष्ण पुन द्वारिका चले गए।

सस्ती दवाओं वाली योजना सरकारी सिस्टम का शिकार बनी , तोड़ रही दम..

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लोगों को सस्ती और गुणवत्तापरक दवाइयां उपलब्ध कराने के लिए प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (पीएमबीजेपी) शुरू की गई, लेकिन कागज पर बेहद शानदार और कल्याणकारी दिखने वाली यह योजना सरकारी सिस्टम का शिकार होकर धीरे-धीरे दम तोड़ती दिख रही है. यूपीए राज में शुरू हुई इस योजना की किस्मत मोदी राज में भी नहीं बदली और लोगों को भी इससे कोई राहत नहीं मिली.

प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (पीएमबीजेपी) का मकसद था कि सस्ते दामों में लोगों तक गुणवत्तापरक दवाइयां पहुंचाई जाए, लेकिन आपूर्ति, एक्सपायर्ड दवाओं, स्टाफ, बजट की कमी और उस पर जीएसटी की मार से जूझते यह जन औषधि केंद्र लोगों तक दवाइयों को पहुंचाने के मकसद में अभी तक नाकाम साबित हुए हैं.

भारत सरकार ने 2008 में प्रधानमंत्री जन औषधि योजना शरू की थी और 2016 में इसका नाम बदलकर प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (पीएमबीजेपी) कर दिया गया. इसके तहत देशभर में 5,000 से ज्यादा जन औषधि केंद्र खोले गए, लेकिन इसकी दशा इस बात का गवाह है कि कैसे जनहितकारी नीतियां और व्यवस्थाएं बर्बाद हो जाती हैं या कर दी जाती हैं. इस बार तो इस संबंध में बजट में भी कटौती कर दी गई.

लोगों में जानकारी के अभाव से जन औषधि केंद्रों तक दवा के खरीदार नहीं पहुंच रहे हैं, भूले-भटके कुछ लोग पहुंच भी जाते हैं तो दवाइयों की आपूर्ति न होने पर ज्यादातर खाली हाथ ही लौट जाते हैं. कुछेक स्टोर बंद हो चुके हैं तो कुछेक बंदी के कगार पर हैं. आजीविका के प्राथमिक स्रोत की तरह शुरू करने वाले इन केंद्रों के मालिकों का मोहभंग होने लगा है. कई केंद्र मालिकों ने आपूर्ति की समस्या से निपटने के लिए अब ब्रांडेड दवाइयां बेचनी शुरू कर दी है.

दवाओं की आपूर्ति में कमी

सस्ती दवाइयां मिलने की उम्मीद लिए जन औषधि केंद्र पहुंचने वाले मरीज यह देखकर निराश हो उठते हैं कि प्रिस्क्रिप्शन की सारी दवाइयां नहीं मिलतीं हैं. मजबूरी में उन्हें ब्रांडेड दवाइयां लेनी पड़ती हैं. झांसी जिले के 41 साल के गुड्डू पाल पिछले तीन साल से मधुमेह की दवाइयां ले रहे हैं. उन्हें हर महीने करीब 900 रुपये खर्च करने पड़ते हैं. गुड्डू बताते हैं, ‘छह महीने पहले इस केंद्र के बारे में पता चला तो डॉक्टर से इसके बारे में पूछा. डॉक्टर ने साफ-साफ कुछ कहने की बजाए यह कहकर मन में संशय का बीज डाल दिया कि आप चाहें तो जन औषधि केंद्र से दवाइयां ले सकते हैं लेकिन असर कितना होगा, इसकी गारंटी मैं नहीं ले सकता.’

हिम्मत बांधकर उन्होंने दूसरे डॉक्टर से पूछा तो उसने जन औषधि केंद्र से दवाइयां लेने की सलाह दी. गुड्डू ने दवाइयां लेनी शुरू कर दीं. एक महीने की दवाई मई में ली तो 900 रुपये की दवाइयां वे महज 423 रु. में लेकर आ गए. लेकिन उसके बाद तीन महीने तक चक्कर लगाने के बाद भी उन्हें प्रिस्क्राइब तीनों दवाइयां (टेंडिया एम, साईबलेक्स एम 60 एक्स आर और रोसडे-10) एक साथ नहीं मिलीं. केंद्र मालिक ने बताया कि उनके पास दो दवाइयां पिछले कुछ समय से नहीं आ रहीं.

इसी तरह उन्नाव जिले की 63 वर्षीया सुनीता देवी को हाई ब्लड प्रेशर के लिए ताउम्र एटेनोलोल ऐंड ऐमलोडिपिन सॉल्ट की एक गोली रोजाना खानी है. डॉक्टर की लिखी बहुराष्ट्रीय कंपनी की ब्रांडेड दवा की 10 गोली का पत्ता करीब 60 रुपये में मिलता है, जन औषधि केंद्र में इसी सॉल्ट की 100 जेनरिक गोलियां 50 रुपये में मिलती हैं. लेकिन उनकी खुशी थोड़े दिन में काफूर हो गई. जन औषधि केंद्र में दवाई की आपूर्ति न हो पाने से सुनीता फिर महंगी दवा खरीदने के लिए मजबूर हैं.

केंद्र मालिकों और डीलरों की सप्लाई कम होने की शिकायत पर ब्यूरो ऑफ फर्मा पीएसयूएस ऑफ इंडिया (बीपीपीआई) के सीईओ सचिन कुमार सिंह कहते हैं, ‘एक जुलाई तक हमारे पास 782 स्टोर मालिकों और डीलरों ने दवाइयों की मांग की सूची भेजी. इसमें से 367 को ही पास किया गया. बाकी को रोक रखा है. देखने में लगेगा लगभग 50 फीसदी मांग पूरी नहीं हुई. लेकिन इसकी वजह है इन लोगों का बकाया ज्यादा हो जाना. क्रेडिट लिमिट का दुगने से ज्यादा बकाया होने पर आपूर्ति रोक दी जाती है.’

जेनरिक पर हावी ब्रांडेड

दिल्ली के न्यू अशोक नगर स्थित कालीबाड़ी में मौजूद जन औषधि स्टोर के मालिक जय राम सिंह कहते हैं, ‘मेरे स्टोर में ही नहीं, दिल्ली के हर स्टोर में आपको ब्रांडेड दवाइयां मिलेंगी. दरअसल ब्रांडेड दवाइयों में हमें 40-80 फीसदी तक मार्जिन मिलता है.’ मार्जिन का ज्यादा होना तो ब्रांडेड दवाइयों के स्टोर में मौजूद होने की वजह है ही, साथ में जेनरिक दवाइयों की समय पर आपूर्ति न होना भी बड़ी वजह है. ज्यादातर केंद्र मालिक ब्रांडेड दवाइयां रखने की बात खुलकर स्वीकारते हैं.’

कम मुनाफा, जीएसटी, इंसेंटिव की चिक-चिक

जन औषधि स्टोर का प्रचार सरकार ने स्व-रोजगार के विश्वसनीय साधन के रूप में किया था. लेकिन जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले के जन औषधि स्टोर मालिक एसपी शर्मा सरकार के दावे का खंडन करते हैं, ‘महज 20 फीसदी ट्रेड मार्जिन (मुनाफा प्रति दवाई) और उस पर भी जीएसटी की कैंची. कई लोगों ने ये केंद्र जीविका चलाने के उद्देश्य से खोले थे. 3-4 स्टोर तो मेरे जानने में बंद हो गए हैं.’ एसपी शर्मा केंद्र खोलने के लिए मिलने वाले इंसेंटिव पर भी सवाल उठाते हैं, ‘करीब तीन साल पहले मैंने स्टोर खोला था, अब तक महज 30,000 रु. इंसेंटिव ही मुझे मिला है.’

दरअसल, स्टोर खोलने के लिए सरकार 2,50,000 रुपये की मदद देती है, लेकिन यह मदद एकमुश्त नहीं, जन औषधियों की हर महीने की खरीद पर 15 फीसद रिबेट के रूप में मिलती है. एसपी शर्मा बताते हैं, ‘अब तक मैं 10,00,000 रुपये की दवाइयां खरीद चुका हूं लेकिन खरीद के मुकाबले इंसेंटिव एक-तिहाई ही मिला.’ सचिन कुमार सिंह कहते हैं, ‘केंद्र मालिकों का मार्च तक का बकाया इंसेंटिव चुकाया जा चुका है.’

जीएसटी का दर्द

इसी तरह उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के एक केंद्र मालिक ने नाम न बताने की शर्त पर कम मुनाफे पर भारी जीएसटी की व्यथा को उदाहरण देकर समझाया, ‘एक रीकैप स्टोर मालिक डीलर से 90 रुपये में खरीदता है. उस पर एमआरपी 120 रुपये छपा है. तो, इस पर 30 रुपये मुनाफा तो ठीक है, लेकिन 18 फीसदी के जीएसटी के चलते 21.50 रुपये और कम हो जाते हैं. बचे सिर्फ 8.50 रुपये. जीएसटी का दर्द और बड़ा तब हो जाता है जब 5 रुपये की टैबलेट की स्ट्रिप पर 12 फीसदी का जीएसटी लग जाता है. आप सोचिए क्या बचेगा?’

इसके अलावा एक्सपायरी दवाइयां भी बड़ी मुसीबत हैं. वेयरहाउस से दवाइयां मंगाने पर पहले वे दवाइयां दी जाती हैं, जिनकी एक्सपायरी तिथि करीब होती है. दो फीसदी एक्सपायरी दवाइयां लौटाने का प्रावधान है. लेकिन उन्हें हरियाणा के गुरुग्राम के वेयरहाउस पर भेजने में 1,000 रुपये के करीब कुरियर का ही खर्च आ जाता है. कर्नाटक में मांड्या स्थित जन औषधि केंद्र के मालिक सिद्घराजू के केंद्र में 4,00,000 रुपये की दवाइयां तो तमिलनाडु के एम. चंद्रशेखर के पास 1,50,000 रुपये से ज्यादा की एक्सपायरी दवाइयां बेकार पड़ी हैं.

स्टाफ की कमी का खामियाजा

बीपीपीआई के मुताबिक, देशभर में 5,395 जन औषधि स्टोर के ऊपर महज 30 मार्केटिंग अफसर (एमओ) हैं यानी औसतन 180 स्टोर के ऊपर एक एमओ. बीपीपीआई के एक अधिकारी कहते हैं, ‘हम स्टाफ की मांग लगातार कर रहे हैं. हमने लिखित में एक प्रस्ताव भी बनाया है, जिसके मुताबिक कम से कम 100 स्टोर के ऊपर एक एमओ की नियुक्ति की अनुमति मांगी है.’

गुवाहाटी में मेडिकल ऑफिसर (एमओ) कुलदीप बताते हैं, ‘पूरे पूर्वोत्तर में करीब 200 स्टोर हैं. एक अकेले एमओ के लिए हर स्टोर में पहुंचना संभव नहीं.’ उत्तर प्रदेश के एक एमओ ने नाम न बताने की शर्त पर बताया, ‘प्रदेश में 800 से ज्यादा स्टोर पर सिर्फ दो एमओ हैं. एमओ का वेतन भी महज 20,000 रुपये के करीब है. नीचे की रैंक वालों का वेतन इससे भी कम है.’

डॉक्टर हैं कि मानते नहीं!

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने अप्रैल 2017 में डॉक्टरों को हिदायत दी कि वे मरीजों को लिखे जाने वाले प्रिस्क्रिप्शन में जेनरिक दवाओं का नाम लिखें. मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) ने 2016 में इस बाबत डॉक्टरों के लिए एक सर्कुलर भी जारी किया था. लेकिन एमसीआई के सर्कुलर पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने उस वक्त भी ऐतराज जताया था.

कुछेक डॉक्टरों ने तो प्रिस्क्रिप्शन में एक नोट के साथ ‘जेनरिक’ नाम लिखना शुरू किया. मुंबई के एक पीडियाट्रिक सर्जन राजेश नथानी का 2017 में लिखा यह नोट देखें, ‘मैं दवाइयों की गुणवत्ता की गारंटी नहीं ले सकता. कंपनी भारतीय हो या बहुराष्ट्रीय लेकिन कोशिश यह होनी चाहिए कि कंपनी जानी-मानी हो.’

जन औषधि जागरूकता अभियान ‘स्वस्थ भारत’ चलाने वाले आशुतोष कुमार सिंह कहते हैं, ‘फर्मास्यूटिकल कंपनियों और डॉक्टरों का एक मजबूत गठजोड़ है. ऐसे में सैकड़ों गुना मुनाफा कमाने वाली कंपनियां भला क्यों चाहेंगी कि जन औषधि का बाजार बढ़े. अगर ब्रांडेड दवाइयों के कारोबार पर सख्ती की जाए तो दवाइयों के दाम कम हो जाएंगे.’

2012 में केंद्र सरकार ने संसद में माना था कि जेनरिक दवाइयों के ब्रान्ड बनने की प्रक्रिया में दवा कंपनियां दवा का दाम 1,100 से 1,500 फीसदी बढ़ा देती हैं. लेकिन इस मुनाफे को कम करने के लिए कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया. उलटे यूपीए सरकार ने ‘ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर-2013’ में दवाइयों की कीमत तय करने के फॉर्मूले को बाजार आधारित कर दिया. मौजूदा एनडीए सरकार ने भी इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया.

‘दिक्कतें हैं, दुरुस्त की जाएंगी”

जन औषधि के मुद्दे पर केंद्रीय रसायन और उर्वरक राज्यमंत्री मनसुख मांडविया ने कहा कि सभी केंद्रों में ऐसा नहीं है. कुछ केंद्रों में आपूर्ति रोकने की वजह उनकी बकाया राशि का तय सीमा से ज्यादा होना है. इससे निपटने के लिए ही एक अक्टूबर से ‘कैश ऐंड कैरी’ मॉडल लागू करने की योजना बनाई जा रही है. उन्होंने आगे कहा कि हम केंद्रों की बिक्री और उनकी क्षमताओं का मूल्यांकन कर रहे हैं. व्यापारिक दृष्टि से इस उद्यम को मजबूत बनाने के लिए जरूरत पड़ी तो हम ट्रेड मार्जिन बढ़ाने समेत सभी जरूरी कदम उठाएंगे.

कम इंसेंटिव मिलने की शिकायत पर केंद्रीय मंत्री ने कहा कि ऐसा नहीं है. पिछले वित्त वर्ष 2018-2019 में मार्च तक 19.50 करोड़ रुपये इंसेंटिव की रकम जारी की जा चुकी है. उनका कहना है कि देश में केंद्रों की संख्या बढ़ाकर 10,000 करने की योजना है. हर जिले में केंद्र होगा. जन औषधि की मौजूदा बास्केट में दवाइयों और सर्जिकल आइटम्स की संख्या बढ़ाकर 2,300 की जाएगी.

अभिनेत्री ईशा क़ोप्पिक़र : चुनाव नहीं लड़ूंगी लेकिन महाराष्ट्र में BJP के लिए प्रचार करूंगी…

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बड़े पर्दे से लंबे अरसे से ग़ायब चल रही अभिनेत्री ईशा क़ोप्पिक़र (Isha Koppikar) पर्दे के पीछे काफ़ी एक्टिव हैं. पिछले कुछ महीने पहले ईशा ने बीजेपी (BJP) ज्वाइन कर राजनीति में क़दम रखा. इतना ही नहीं इन दिनों वह ब्रांड एंडोर्समेंट से जुड़े इवेंट्स में भी स्पॉट की जा रही हैं. हाल ही में ईशा सिन-सिटी के क्लोदिंग ब्रांड को लांच‌ करने पहुंची थीं. यहां न्यूज़ 18 हिंदी से एक्सक्लूसिव बातचीत में ईशा क़ोप्पिक़र ने अपने राजनीतिक और फ़िल्मी करियर पर खुलकर बातचीत की. 

ईशा कहती हैं कि मेरी बेटी छोटी थी इसलिए मैं फ़िल्मों से दूर हो गयी थी. लेकिन अब जल्द ही पर्दे पर वापसी करूंगी. हालांकि भले ही पर्दे से मैं दूर रही लेकिन बहुत से काम कर रही थी. मैं परिवार के साथ साथ बिज़नेस संभाल रही थी. फिर पिछले कुछ महीने पहले राजनीति भी ज्वाइन की. अब बीजेपी के लिए काम कर रही हूं.

अभी दिखाया था ट्रेलर, अब दिखेगी पूरी पिक्चर

राजनीति पर बात करती हुई ईशा कहती हैं कि पार्टी का काम अच्छा चल रहा है. आपने पांच साल पहले सिर्फ़ ट्रेलर देखा था, लेकिन अब फ़िल्म शुरू हो चुकी है. हमने आर्टिकल 370 से देख लिया है कि क्या हो सकता है और अब दुनिया के नक़्शे पर भारत का नाम रोशन हो रहा है. मुझे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नेतृत्व बहुत पसंद है. क्योंकि वह महिलाओं को आगे बढ़ाने में बहुत विश्वास रखते है. बहुत सारी महिलाओं से जुड़ी योजनाएं भी नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में आई हैं.

 महाराष्ट्र में आने वाले चुनाव पर ईशा कहती हैं, ‘मैं अपनी पार्टी के लिए आने वाले चुनाव में प्रचार करूंगी. लेकिन अभी मेरा चुनाव लड़ने का इरादा नहीं है. मैंने अभी-अभी राजनीति में क़दम रखा है. अभी तो राजनीति में मेरा जन्म हुआ है. मुझे राजनीति समझने के लिए बहुत ग्राउंड वर्क करना है. लेकिन चुनाव के दौरान अपनी पार्टी के लिए महाराष्ट्र में प्रचार करूंगी.

पाकिस्तान द्वारा ट्विटर पर प्रियंका चोपड़ा की ट्रोलिंग और सिंगर मीका सिंह की कराची परफ़ॉरमेंस के सवाल पर ईशा अपनी बात रखते हुए कहती हैं कि मेरे देश के ख़िलाफ़ जो भी बात करता है वह मेरे लिए ग़द्दार है और मैं प्रियंका की ट्रोलिंग करने वालों की कड़ी निंदा करती हूं. रही बात मीका की परफ़ॉरमेंस की तो उन्हें ख़ुद सोचना चाहिए कि जो लोग यहां से जा रहे हैं उन्हें ख़ुद सोचना चाहिए कि वे ‌क्‍यों जा रहे हैं. यह ग़लत है क्योंकि जब हम पाकिस्तान के टैलेंट को यहां बैन कर रहे हैं तो भारतीय कलाकारों को समझदारी से काम लेना चाहिए.

किडनी खराब होने से पहले शरीर देता है ये 4 संकेत, किडनी की पथरी को गला देती हैं 2 चीजें

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किडनी शरीर का मुख्य अंग है इसके खराब होने पर आपका जीवन नर्क बन सकता है। किडनी का काम शरीर गंदगी हटाना, खून साफ करना, तरल पदार्थ बैलेंस करना, खून से मिनरल्स हटाना, खाने की चीजों से अपशिष्ट हटाना, रेड ब्लड सेल्स बनाने वाले हार्मोन बनाना, हड्डियों के स्वास्थ्य को बढ़ावा देना और ब्लड प्रेशर कंट्रोल करना है।

किडनी में किसी तरह की गड़बड़ी होने पर जहरीले पदार्थ शरीर से बाहर नहीं निकल पाते और इसका सीधा असर दूसरे अंगों पर पड़ता है जिससे आपको कई गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।

खराब जीवनशैली और खानपान की वजह से आज अधिकतर लोग किडनी स्टोन की समस्या से पीड़ित हैं। हैरानी की बात यह है कि आजकल युवाओं को भी यह समस्या तेजी से अपनी गिरफ्त में ले रही है।

आजकल लोगों में क्रॉनिक किडनी डिजीज यानी गुर्दे खराब होने की समस्या तेजी से बढ़ रही है। अगर वक्त रहते हमें किडनी की परेशानी का मालूम हो जाए, तो इसका समय पर इलाज कराया जा सकता है। हम आपको इसके लक्षण बता रहे हैं जिन्हें आप समय पर पहचानकर इस बीमारी का इलाज करवा सकते हैं।

किडनी खराब होने से पहले ये 3 संकेत देता है शरीर

1) अगर किडनी ठीक से काम नहीं कर रही हो तो व्यक्ति को गर्मी के मौसम में भी ठंड लग सकती है। शरीर हमेशा ठंडा रह सकता है, नींद ज्यादा आ सकती है और प्यास भी बहुत लग सकती है।

2) किडनी के काम न करने के कारण शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं की कमी हो जाती है, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की कमी होने के कारण सांस लेने में तकलाफ होने लगती है।

3) वैसे तो यह लक्षण कई तरह से बीमारियों के लक्षण होते हैं लेकिन किडनी के खराब होने पर शरीर में विषाक्त पदार्थों के जम जाने के कारण शरीर के त्वचा के ऊपर रैशेज और खुजली निकलने लगती है।

4) जब किडनी खराब होने लगती है, तो पीड़ित को पेशाब में कमी महसूस हो सकती है। यानि अगर आपको लग रहा है कि आप जितना पानी पी रहे हैं और उतना पेशाब नहीं आ रहा है, तो सतर्क हो जाएं। इसका सीधा संबंध आपकी किडनी की कार्यक्षमता से हो सकता है।

किडनी और पेशाब की नली की पथरी को बाहर निकाल सकती हैं ये 2 चीजें

कैल्शियम युक्त आहार- शरीर में कैल्शियम की मात्रा कम होने से ऑक्सलेट का स्तर बढ़ जाता है, जिससे किडनी स्टोन की समस्या हो सकती है। ऐसे में आप अपनी उम्र के हिसाब से कैल्शियम को अपनी डाइट में ज़रूर शामिल करें। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 50 साल से अधिक आयु के लोगों को रोज़ाना 1,000 मिली कैल्शियम की ज़रूरत होती है और इसे अवशोषित करने के लिए 800-1,000 आईयू विटामिन डी की आवश्यकता होती है।

खून पानी पियें- ज्यादा पानी पीने से शरीर हाईड्रेट रहता है और इससे स्टोन भी यूरीन के रास्ते बाहर निकल जाता है। इसलिए, रोज़ाना कम से कम 8-10 गिलास पानी पीएँ। इसके अलावा आप नींबू और संतरे का रस भी पी सकते हैं। इसमें सिट्रिक एसिड होता है, जो स्टोन बनने से रोकता है। किडनी स्टोन से पीड़ित मरीज़ अपने सुबह की शुरुआत चाय या कॉफ़ी से न करें, क्योंकि इससे स्टोन का साइज़ बढ़ सकता है।