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वैज्ञानिकों ने दी चेतावनी- विलुप्त हो जाएगा ‘केला’

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भारत दुनिया में केला के प्रमुख उत्पादक देशों में शुमार है। लेकिन इस फल से जुड़ी एक दुखद सूचना है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, केला जल्द हमारे आपके पहुंच से दूर हो सकता है। ऐसा एक फंगस के कारण हो सकता है। यह फंगस केले की एक प्रजाति को पहले ही नष्ट कर चुका है और अब यह नई प्रजातियों की ओर बढ़ रहा है। इसका संक्रमण वर्तमान में अमेरिका में कहर मचा रहा है।

अमेरिका के कई प्रयासों के बावजूद यह वहां पर पहुंच गया है। दक्षिणी अमेरिकी देश कोलंबिया में इस फंगस के आने के बाद से सरकार ने राष्ट्रीय आपातकाल का ऐलान किया है। कोलंबिया के उत्तरपूर्वी प्रांत ला गुआजिरा में 180 हेक्टेयर की मिट्टी में फ्यूजेरियम टाइप-4 फंगस पाया गया था।

संयुक्त राष्ट्र की ओर से भी इस बारे में चेतावनी दी गई है। संयुक्त राष्ट्र की ओर से बताया गया है कि केलों में फैली इस बीमारी पर रसायनों का छिड़काव भी बेअसर साबित हो रहा है। कोई भी दवा प्रभावी नहीं साबित हो रही है।

यह टीआर-4 फंगस एक बार आने के बाद मिट्टी में करीब 30 वर्ष तक बना रह सकता है। हालांकि, शोधकर्ताओं को आशा है कि इस फंगस से शीघ्र ही निपटा जा सकेगा। टीआर-4 फंगस सबसे पहले मलेशिया और इंडोनेशिया में पाया गया था। इसके बाद यह जल्दी ही चीन में भी फैल गया।

हालांकि विशेषज्ञों की एक टीम इससे निपटने पर कार्य कर रही है। उनका कहा कि वह हरसंभव कोशिश करेंगे इस महत्वपूर्ण फल के अस्तित्व को बचाने के लिए।

क्या कारण है कि एक चींटी अपने वजन से 50 गुना अधिक भार उठा सकती है

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चींटी या पिपीलिका एक सामाजिक कीट है, जो फ़ोरमिसिडाए नामक जीववैज्ञानिक कुल में वर्गीकृत है। इस कुल की 12,000 से अधिक जातियों का वर्गीकरण किया जा चुका है और अनुमान है कि इसमें लगभग 10,000 और जातियाँ हैं। इनका विश्व के पर्यावरण में भारी प्रभाव है, जिसका पिपीलिकाशास्त्री गहरा अध्ययन करते हैं।
चींटी ऐसा अपने छोटे आकार के कारण कर पाती है। वजन उठाना सीधे तौर पर हमारी रिलेटिव स्ट्रेंथपर निर्भर करता है, जिसे हम बॉडी के सतह क्षेत्र (surface area) और आयतन (volume) का अनुपात लेकर निकालते हैं।
1- सतह क्षेत्र 2-D माप है इसलिए लंबाई के वर्ग के अनुसार मापा जाता है। और आयतन 3-D माप है इसलिए घन में मापा जाता है।2- जैसे-जैसे आकार बढ़ता है, द्रव्यमान सतह क्षेत्र की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ता है और अनुपात कम होता चला जाता है मतलब शरीर के अनुपात में स्ट्रेंथ कम हो जाती है। इसके अनुसार चींटी की रिलेटिव स्ट्रेंथ अन्य जीवों की तुलना में अधिक होती है और वो इतना भार उठा पाती है।
पर छोटे तो और भी जीव हैं फिर चींटी ही क्यूँ
चींटी के शरीर पर एक बाह्य आवरण होता है जिसे exoskeleton कहते हैं, ये काइटिन और स्क्लेरोटिन का बना होता है जो इसे लचीलापन और मजबूती प्रदान करते हैं। और दूसरी खास विशेषता है इसकी बनावट- इसकी गर्दन एक सॉफ्ट टिश्यू की बनी होती है जो इसके सिर और वक्ष को जोड़ती है।
चींटी भार हमेशा मुँह से उठाती है और इस लचीली गर्दन की मदद से उसे अपने वक्ष पर स्थानांतरित कर देती है, इसके बाद ये पूरा भर उसकी छः मजबूत टाँगों और शरीर पर समान रूप से पड़ता है और वो आसानी से उसे उठा ले जाती है।

‘जोमैटो गोल्ड’ से लॉगआउट हुए पुणे के 450 होटल

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जोमैटो गोल्ड नामक ऑनलाइन सर्विस देना महंगा साबित होने से पुणे के करीबन 450 होटलों ने शनिवार की शाम तक इस ऐप से लॉगआउट होने का फैसला किया है। इस योजना से अब तक 15 होटलों पर बन्द करने की नौबत आयी है। यह संख्या और बढ़ जाएगी, यह संभावना पुणे रेस्टोरंट एंड हॉटेलेयर्स असोसिएशन के अध्यक्ष गणेश शेट्टी ने एक विज्ञप्ति के जरिए जताई है।

जोमैटो गोल्ड ने अपने ग्राहकों की संख्या बढ़ाने के लिए काफी सहूलियत की योजना घोषित की है, जो होटल मालिकों के लिए महंगी साबित हो रही है। जोमैटो गोल्ड इस्तेमाल करने वाले होटलों में फूड्स और ड्रिंक्स (शराब) लेनेवाले ग्राहकों को पहले बिल में 50 फीसदी डिस्काउंट दिया जा रहा है। मगर ग्राहक एक होटल से भोजन और दूसरे होटल से ड्रिंक्स लेकर दोहरा लाभ उठा रहे हैं। इससे होटल मालिकों को यह योजना महंगी साबित हो रही है।

होटल मालिकों और चालकों ने इस बारे में जोमैटो गोल्ड के अधिकारियों से चर्चा की मगर उन्होंने उनकी दरकार को नजरअंदाज किया। इसके चलते पुणे के करीबन 450 होटलों ने इस ऑनलाइन सेवा से लॉगआउट कर दिया। जोमैटो द्वारा दी जा रही सहूलियतें होटल मालिकों के लिए महंगी साबित हो रही है। उनकी शर्तें और नियमों का पालन करना दिक्कतों से भरा है। असोसिएशन के अध्यक्ष गणेश शेट्टी के अनुसार देश में सर्वाधिक होटलिंग वाले शहरों में पुणे आगे है। अच्छी क्वालिटी और सर्विस के कारण हमारे होटलों में सालों से आनेवाले ग्राहक हैं। मगर जोमैटो द्वारा 50 फीसदी तक डिस्काउंट दिया जा रहा है जिससे लोग होटलों की ओर से मुंह फेर रहे हैं। नतीजन होटल व्यवसाय घाटे में आ गया है।

समस्याओं की कारगर दवा, गुड़ और जीरे का पानी..

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गुड़ और जीरा, दोनों ही स्वाद के साथ-साथ सेहत से जुड़े फायदों के लिए प्रयोग किए जाते हैं। इनके अलग-अलग लाभ तो आपने जरूर सुने होंगे और जीरे के पानी के लाभ भी जानें होंगे, लेकिन आज गुड़ और जीरे के पानी के लाभ भी जान लीजिए। आपको सिर्फ गुड़ और जीरे को पानी में एक साथ उबालना है और खाने से पहले यानि खाली पेट इसका उपयोग करना है…

शरीर में खून की कमी को पूरा करने के लिए गुड़ और जीरे का यह पानी काफी लाभप्रद है। अगर आपको खून की कमी या एनिमिया की समस्या हो, तो इसे जरूर पिएं।

पेट की समस्याओं जैसे कब्ज, गैस, पेट फूलना और पेट दर्द आदि के लिए गुड़ और जीरे का यह पानी काफी फायदेमंद साबित होगा। धीरे-धीरे आपकी यह समस्याएं खत्म हो जाएंगी।

शरीर की अंदरूनी सफाई करने के साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में गुड़ और जीरे का पानी लाभदायक होता है। यह शरीर से अवांछित तत्वों को निकालकर आंतरिक अंगों की सफाई करता है।

शरीर के विभिन्न अंगों में दर्द होने पर यह पानी कारगर उपाय है। यह शारीरिक दर्द में राहत दिलाने में मददगार साबित होता है और महिलाओं में मासिक धर्म के दौरान होने वाले दर्द में भी राहत देता है।

बुखार, सर्दी व सिरदर्द होने की स्थिित में भी गुड़ और जीरे का यह पानी बेहद फायदेमंद साबित होता है। बुखार आने पर इसका सेवन जल्द राहत दिलाने में सहायक है।

अब इस देश में भी चलेगा भारत का RuPay कार्ड! जानिए इसकी 5 खासियत के बारे में…

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देश के ज्यादातर बैंक अब आपको अमेरिकी कंपनी वीजा (Visa) और मास्टरकार्ड (Master Card) के अलावा भारत में बना RuPay कार्ड भी डेबिट और क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल का ऑप्शन देते है. RuPay कार्ड के जरिए ट्रांजेक्शन देश में तेजी से बढ़ रही है. अब इसके नाम एक और उपलब्धि जुड़ गई है. जी हां, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने भूटान (Bhutan) में RuPay कार्ड को लॉन्च किया है. इससे डिजिटल भुगतान, और व्यापार तथा पर्यटन में भारत के संबंध और बढेंगे.आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में कैशलेस इकोनॉमी को बढ़ावा देने के लिए RuPay कार्ड लॉन्च किया था.

आइए जानें रुपे कार्ड की खासियत के बारे में…

रुपे एक घरेलू प्लास्टिक कार्ड है जिसे नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) ने लांच किया है. इसका उद्देश्य यह है कि देश में पेमेंट सिस्टम का एकीकरण किया जा सके.

जैसे बड़े बैंक से लेकर देश के सभी प्रमुख बैंकों ने रुपे डेबिट कार्ड जारी किये हैं. खासतौर पर प्रधानमंत्री जन-धन योजना के तहत खोले गए सभी खातों के लिए रुपे कार्ड जारी किये गए हैं. 

(3) यह दूसरे कार्ड जैसा ही है और सभी भारतीय बैंक, एटीएम, पीओएस टर्मिनल या ई-कॉमर्स वेबसाइट पर आसानी से चलती हैं. (4) रुपे कार्ड भी हाई एंड टेक्नोलॉजी चिप इएमवी (यूरो पे, मास्टर कार्ड, वीजा) के साथ आते हैं. खास तौर पर ज्यादा ट्रांजेक्शन के लिए ये चिप काफी महत्वपूर्ण हैं. इसमें कार्डहोल्डर की जानकारी के लिए माइक्रो प्रोसेसर वाले सर्किट लगे होते हैं.

(5) रुपे कार्ड्स में ट्रांजेक्शन कॉस्ट कम होता है और इससे प्रोसेसिंग तेज होती हैं क्योंकि इसकी प्रोसेसिंग देश में ही होती है.

अब भूटान में चलेगा RuPay कार्ड

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय दौरे पर भूटान गए हैं. एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र के स्वागत के लिए भूटान के पीएम भी पहुंचे थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एयर पोर्ट पर गॉड ऑफ ऑनर दिया गया. भूटान में पीएम मोदी का यह दौरा बेहद अहम माना जा रहा है. अपनी यात्रा में पीएम नरेंद्र मोदी दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने को लेकर कई कार्यक्रमों में हिस्‍सा लेंगे. पीएम नरेंद्र मोदी अपनी यात्रा के दौरान भूटान में रुपे कार्ड भी लॉन्च किया है.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि मुझे बहुत खुशी है कि आज हमने भूटान में RuPay कार्ड को launch किया है. इससे डिजिटल भुगतान, और व्यापार तथा पर्यटन में हमारे संबंध और बढे़ंगे. हमारी साझा आध्यात्मिक विरासत और मजबूत people-to-people संबंध हमारे संबंधों की जान है.

4 साल में खड़ी की 1700 करोड़ की कंपनी, इस शख्स के बनाए प्रोडक्ट के दीवाने हुए लाखों लोग…

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“सोल्ड-आउट” ऐसा शब्द है जो हर बिजनेसमैन (Businessman) को सुनना बेहद पसंद आता है, क्योंकि हर कंपनी का मकसद अपने प्रोडक्ट को बेचकर पैसा कमाना है. अगर आपके प्रोडक्ट को पसंद किया जा रहा है तो और क्या चाहिए. बीरा91 (Bira91) के फाउंडर अंकुर जैन (Ankur Jain Founder Bira 91) एक ऐसे ही शख्स का नाम है, जिसे लोग क्रिएटिव सोच और चौंकाने वाले नतीजे के लिए जानते हैं. बीरा 91 का फर्स्ट प्रोडक्शन मध्य प्रदेश और नागपुर में शुरू हुआ. सिर्फ 4 साल में बीरा 91 भारत के 15 से अधिक शहरों में बिकने लगी. साल 2015 में शुरू हुई कंपनी की वैल्युएशन अब 24.6 करोड़ डॉलर यानी 1722 करोड़ रुपये हो गई है.

बिजनेस शुरू करने के बाद पिता ने बंद कर दिया था बात करना-

 बीरा 91 के फाउंडर अंकुर जैन बताते हैं कि जब उन्होंने यह ड्रिंक लॉन्च की थी तो उन्हें यकीन नहीं था कि लोग उनकी ड्रिंक को इतना पसंद करेंगे और उसकी डिमांड इतनी बढ़ जाएगी. यह कंपनी फरवरी 2015 में शुरू हुई थी. शराब इंडस्‍ट्री में एंट्री के कारण उनके पिताजी ने भी उनसे बात करनी बंद कर दी थी, लेकिन अपनी सफलता से उन्‍होंने अपने पिता और परिवार का विश्‍वास भी जीत लिया.

अंकुर जैन ने शिकागो से कंप्‍यूटर साइंस में ग्रेजुएशन किया है. उनके पिता बिजनेस में नहीं थे, लेकिन नई चीजें सीखने में उन्‍होंने देर नहीं की और काफी जल्‍दी भांप गए कि बीयर के सेक्‍टर में कमाई के काफी मौके हैं, क्‍योंकि बाजार में विकल्‍प की कमी है.

व्हाइट, बीरा ब्लॉन्ड, बीरा लाइट, बीरा स्ट्रॉन्ग, द इंडियन पेल एले और हाल में लॉन्च किए गए बूम क्लासिक और बूम स्ट्रॉन्ग सहित सात ब्रांड हैं. बूम स्ट्रॉन्ग में वॉल्यूम के लिहाज से 6-8 प्रतिशत अल्कोहल है और 650 एमएल का प्राइस 130 रुपये है.

कर्नाटक में तो यह ब्रांड किंगफिशर स्ट्रॉन्ग, यूबी एक्सपोर्ट स्ट्रॉन्ग, कार्ल्सबर्ग एलिफैंट और ट्यूबोर्ग स्ट्रॉन्ग को कड़ी टक्कर दे रहा है. बेंगलुरु में एक अल्कोहल-रिटेल आउटलेट के मैनेजर ने कहा, ‘बीरा बूम तेजी से बढ़ रहा है. इसका प्राइस यूबी एक्सपोर्ट स्ट्रॉन्ग के बराबर है.

नागपुर, इंदौर और आंध्र प्रदेश के कोवुर में कंपनी के पास कॉन्ट्रैक्ट पर चलने वाली तीन ब्रुअरीज हैं. मैसूर में एक और प्लांट अगले महीने चालू हो जाएगा. लॉन्च के बाद के 12 हफ्तों मे बीरा के 5 लाख केस बिके हैं. दिल्ली, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पॉन्डिचेरी और आंध्र प्रदेश में कंपनी की मौजूदगी बढ़ी है.

हालांकि यूबी ग्रुप जैसा लेवल हासिल करने में लंबा रास्ता तय करना होगा. यूबी ग्रुप के पास 31 ब्रुअरीज हैं. बीयर के मामले में दुनिया में नंबर वन कंपनी एबी इनबेव के पास भारत में 10 ब्रुअरीज हैं और कार्ल्सबर्ग इंडिया के पास आठ हैं.

ऐसे हुई शुरुआत- 2007 में न्‍यूयॉर्क से वापस भारत लौटे जैन के पास शराब के कारोबार का कोई अनुभव नहीं था, लेकिन 2015 में उन्‍होंने देश के युवाओं के टेस्‍ट, फ्लेवर और क्‍वालिटी का ख्‍याल रखते हुए एक ऐसा प्रोडक्‍ट पेश किया, जो महज दो साल में भारत का फेवरेट बीयर ब्रांड बन गया.

जिस समय बीरा लॉन्‍च की गई, उस समय किंगफिशर का बाजार में जलवा था. इसे देखते हुए जैन ने उम्‍दा इंटरनेशनल बीयर ब्रांडों की पैकेजिंग और क्‍वालिटी का ख्‍याल रखते हुए बीरा91 लॉन्‍च किया. यहीं से उनकी सफलता की गाड़ी आगे बढ़ी.

बीरा91 तुरंत हिट हो गई. 2015 में ही इसकी बिक्री बढ़कर 150,000 केस हो गई थी. 2016 में तो यह आंकड़ा 7 लाख को पार कर गया.

अंकुर जैन के अनुसार, बीरा 91 लाइट की 330 एमएल बोतल में महज 90 कैलॉरी है, जो एक ग्‍लास दूध या नारंगी के जूस से भी कम है. इस तरह से यह कैलॉरी के मामले में काफी लाइट और दूध से भी अधिक हेल्‍दी है.

बीरा 91 की बिक्री 2016-17 में 150 करोड़ रुपए पार गई. बीरा 91 में 91 भारत का कंट्री कोड है. कंपनी की मैन्‍युफैक्‍चरिंग यूनिट इंदौर और नागपुर में है.

कंज्यूमर भी स्ट्रॉन्ग बीयर पसंद कर रहे हैं, लिहाजा यह ब्रांड तेजी से बढ़ रहा है.’ स्ट्रॉन्ग बीयर कैटेगरी तेजी से बढ़ रही है. प्रीमियम और नॉन-प्रीमियम सेगमेंट्स में कई ब्रांड्स पेश किए जा रहे हैं.

लिहाजा जब शहरी युवाओं में पसंद किया जा रहा बीरा 91 जैसा ब्रांड बीरा 91 स्ट्रॉन्ग के बाद एक और स्ट्रॉन्ग बीयर लॉन्च करता है तो उम्मीद यही रहती है कि कंपनी प्रीमियम सेगमेंट पर फिर फोकस करेगी.

हालांकि जैन ने अलग रास्ता पकड़ा है और उन्होंने लैगर बीयर सेगमेंट में उतरने का फैसला किया है. जैन ने कहा, ‘हमारे पहले के प्रॉडक्ट्स काफी प्रीमियम हैं. कर्नाटक में हमारी 330 एमएल की बॉटल्स का दाम 90-100 रुपये और महाराष्ट्र में 130-140 रुपये है.

भारत का RuPay कार्ड अब इस देश में भी चलेगा ! जानिए इसकी 5 खासियत के बारे में…

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देश के ज्यादातर बैंक अब आपको अमेरिकी कंपनी वीजा (Visa) और मास्टरकार्ड (Master Card) के अलावा भारत में बना RuPay कार्ड भी डेबिट और क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल का ऑप्शन देते है. RuPay कार्ड के जरिए ट्रांजेक्शन देश में तेजी से बढ़ रही है. अब इसके नाम एक और उपलब्धि जुड़ गई है. जी हां, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने भूटान (Bhutan) में RuPay कार्ड को लॉन्च किया है. इससे डिजिटल भुगतान, और व्यापार तथा पर्यटन में भारत के संबंध और बढेंगे.आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में कैशलेस इकोनॉमी को बढ़ावा देने के लिए RuPay कार्ड लॉन्च किया था.

आइए जानें रुपे कार्ड की खासियत के बारे में…

रुपे एक घरेलू प्लास्टिक कार्ड है जिसे नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) ने लांच किया है. इसका उद्देश्य यह है कि देश में पेमेंट सिस्टम का एकीकरण किया जा सके.

जैसे बड़े बैंक से लेकर देश के सभी प्रमुख बैंकों ने रुपे डेबिट कार्ड जारी किये हैं. खासतौर पर प्रधानमंत्री जन-धन योजना के तहत खोले गए सभी खातों के लिए रुपे कार्ड जारी किये गए हैं. 

(3) यह दूसरे कार्ड जैसा ही है और सभी भारतीय बैंक, एटीएम, पीओएस टर्मिनल या ई-कॉमर्स वेबसाइट पर आसानी से चलती हैं. (4) रुपे कार्ड भी हाई एंड टेक्नोलॉजी चिप इएमवी (यूरो पे, मास्टर कार्ड, वीजा) के साथ आते हैं. खास तौर पर ज्यादा ट्रांजेक्शन के लिए ये चिप काफी महत्वपूर्ण हैं. इसमें कार्डहोल्डर की जानकारी के लिए माइक्रो प्रोसेसर वाले सर्किट लगे होते हैं.

(5) रुपे कार्ड्स में ट्रांजेक्शन कॉस्ट कम होता है और इससे प्रोसेसिंग तेज होती हैं क्योंकि इसकी प्रोसेसिंग देश में ही होती है.

अब भूटान में चलेगा RuPay कार्ड

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिवसीय दौरे पर भूटान गए हैं. एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र के स्वागत के लिए भूटान के पीएम भी पहुंचे थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एयर पोर्ट पर गॉड ऑफ ऑनर दिया गया. भूटान में पीएम मोदी का यह दौरा बेहद अहम माना जा रहा है. अपनी यात्रा में पीएम नरेंद्र मोदी दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने को लेकर कई कार्यक्रमों में हिस्‍सा लेंगे. पीएम नरेंद्र मोदी अपनी यात्रा के दौरान भूटान में रुपे कार्ड भी लॉन्च किया है.

प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि मुझे बहुत खुशी है कि आज हमने भूटान में RuPay कार्ड को launch किया है. इससे डिजिटल भुगतान, और व्यापार तथा पर्यटन में हमारे संबंध और बढे़ंगे. हमारी साझा आध्यात्मिक विरासत और मजबूत people-to-people संबंध हमारे संबंधों की जान है.

रिटर्न भरने में गड़बड़ी पर अब नहीं धमकाएगा IT डिपार्टमेंट,उठायेगा ये कदम…

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अगर इनकम टैक्स रिटर्न (Income Tax Return) फाइल करने में आपसे कोई चूक हो गई है, तो अब घबराने की जरूरत नहीं, क्योंकि इनकम टैक्स डिपार्टमेंट (Income Tax Department) आईटीआर (ITR) में गड़बड़ी होने पर अब पहले की तरह सख्ती नहीं बरतेगा और न ही ‘धमकी भरा’ नोटिस नहीं थमाएगा. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट (IT Department) टैक्सपेयर्स के साथ थोड़ा नरम रुख रखते हुए SMS या किसी और माध्यम से सूचित करेगा. 

सरकार ने IT डिपार्टमेंट को दिए ये आदेश

इनकम टैक्स डिपार्टमेंट अब ‘धमकभरी’ भाषा का इस्तेमाल किए बगैर टैक्स कलेक्शन बढ़ाने की कोशिश करेगा. सरकार ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को आदेश दिया है कि वह किसी भी टैक्सपेयर्स को परेशान नहीं करेगा. इनकम टैक्स के अधिकारियों से कहा गया है कि वे टैक्स वसूली के लिए लोगों को जागरूक करें और प्रोत्साहन के जरिए टैक्स वसूली की कोशिश करें.

सरकार ने कहा कि अगर कोई टैक्स जमा करने ड़बड़ी करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई तय नियमों के अनुसार की जाए. जो भी कार्रवाई की जाए, उसका ऑनलाइन रेकॉर्ड रहे ताकि अगर किसी मामले में कोई शिकायत मिले तो तुरंत उसकी जांच की जा सके.

शुक्रवार को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी टैक्स टेररिज्म पर भी सफाई दी थी. उन्होंने कहा था कि टैक्स टारगेट पूरा किया जाएगा, लेकिन उसके लिए अधिकारी किसी टैक्सपेयर को परेशान नहीं करेंगे. टैक्स टारगेट पहले से तय किया गया है. अधिकारियों को नियम के तहत कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं.

सरकारी बैंकों के कर्मचारियों के लिए बड़ी खुशखबरी, अगले महीने से बढ़ जाएगी सैलरी…

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सार्वजनिक क्षेत्र (PSU) के बैंकों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए अच्छी खबर है. सरकार ने कर्मचारियों को दिए जाने वाले महंगाई भत्ते (DA) में 3.6 फीसदी की बढ़ोतरी की है. यह बढ़ोतरी अगस्‍त-अक्‍टूबर क्‍वार्टर के लिए है. इंडियन बैंक्‍स एसोसिएशन ने इसका आदेश जारी किया है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अखिल भारतीय उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (AICPI) के आंकड़ों के मुताबिक इस साल जून में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 7212.98, अप्रैल में 7121.68 और मई यह बढ़कर 7167.33 था. इन आंकडों पर गौर करने के बाद सरकार ने डीएम में 3.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी करने का फैसला किया. 

सितंबर महीने में बढ़कर आएगी सैलरी 
इस आदेश के बाद अब कर्मचारियों की सितंबर महीने की सैलरी बढ़कर आएगी. बता दें कि हर छह महीने पर सरकार महंगाई भत्ते की समीक्षा करती है. मालूम हो कि 2016 में जब नए वेतन आयोग की सिफारिशें लागू हुई थीं, उस समय महंगाई भत्‍ता खत्‍म कर दिया गया था पर बाद में कर्मचारियों के भारी विरोध के बाद इसे फिर से लागू कर दिया गया.

वित्त मंत्रालय के बैंकिंग डिवीजन ने फैसला किया है कि सभी सरकारी और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (RRB) सुबह 9 बजे खुल जाएंगे. IBA ने 24 जून को ग्राहक सुविधा पर गठित उपसमिति की बैठक में बैंक शाखा खुलने के लिए तीन विकल्प दिए. पहला, सुबह नौ से दोपहर तीन बजे, दूसरा सुबह 10 से शाम चार बजे और तीसरा, सुबह 11 बजे से शाम 5 बजे तक. IBA ने बैंकों से कहा है कि 31 अगस्त तक जिला स्तरीय ग्राहक समन्वय समिति की बैठक कर समय तय कर लें और उसकी सूचना स्थानीय समाचार पत्र में भी दें.

क्या सरकारी मेडिकल कॉलेजों की सीटें भारत में ‘बेची’ जा रही हैं? जानिए

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राजस्थान के मेडिकल स्टूडेंट्स इस बात से बेहद नाराज़ हैं कि ओबीसी और एससी/एसटी कोटे की कट-ऑफ़ से भी कम नंबर पाने वाले कुछ छात्रों को इस वर्ष राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में दाख़िला दिया गया है.

इन छात्रों का आरोप है कि “ये दाख़िले NEET के स्कोर को देखकर नहीं, बल्कि फ़ीस भरने की क्षमता के आधार पर हुए हैं. तो क्या सरकार सीटें बेचने लगी है?”

ये छात्र सबूत के तौर पर राजस्थान मेडिकल एजुकेशन विभाग से जारी MBBS स्टूडेंट्स की एक लिस्ट दिखाते हैं जिसमें ऐसे कई छात्रों के नाम हैं जिनका NEET स्कोर 50-55 परसेंटाइल से भी कम है.

ये वो स्टूडेंट हैं जिन्हें इस साल राज्य सरकार द्वारा लागू एनआरआई कोटे के तहत एडमिशन मिला है.

राजस्थान में एनआरआई कोटे की दो सौ से ज़्यादा सरकारी सीटें निर्धारित की गई हैं जिनके ख़िलाफ़ राज्यस्तर की ‘मेडिकल स्टूडेंट्स कॉर्डिनेशन कमेटी’ बीते तीन महीने से विरोध प्रदर्शन कर रही है.

राजस्थान के अजमेर, कोटा, उदयपुर, जयपुर और बीकानेर मेडिकल कॉलेज समेत प्रदेश के सभी 14 मेडिकल कॉलेज कैंपस पिछले दिनों सरकार विरोधी नारों से गूँजते दिखे और कुछ छात्र भूख हड़ताल पर भी रहे.

लेकिन राज्य सरकार ने एनआरआई कोटे से जुड़ी मेडिकल छात्रों की माँगों पर कोई विचार नहीं किया, इसलिए ये छात्र अब इस कोटे को ‘सरकार के पैसा कमाने की स्कीम’ कह रहे हैं.

NRI कोटा है क्या?

सरकारी आदेशों के अनुसार राजस्थान सरकार ने जून 2019 में शैक्षणिक सत्र 2014-15 के बाद बढ़ाई गई मेडिकल सीटों में से 15 प्रतिशत सीटें एनआरआई कोटे से भरने का फ़ैसला किया है.

राजस्थान सरकार के इस नये बंदोबस्त के अनुसार राज्य के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में कुल 212 सीटें एनआरआई कोटे के लिए रिज़र्व की गई हैं.

राजस्थान मेडिकल एजुकेशन विभाग के एडिश्नल डायरेक्टर सुरेश चंद ने बीबीसी को बताया कि “राजस्थान में 14 सरकारी मेडिकल कॉलेज हैं. इनमें से 6 कॉलेज सीधे तौर पर सरकार के अंतर्गत आते हैं. बाक़ी 8 कॉलेज सरकारी समितियों द्वारा संचालित हैं. राज्य की 212 एनआरआई सीटों को इन सभी 14 सरकारी कॉलेजों के बीच बाँटा गया है. इससे पहले एनआरआई कोटा सिर्फ़ राज्य के प्राइवेट कॉलेजों में ही ऑफ़र किया जाता था.”

मेडिकल एजुकेशन विभाग के मुताबिक़ ये कोटा एमबीबीएस और डेंटल कोर्स के अलावा आगे की पढ़ाई, यानी पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स के दाख़िलों पर भी लागू होगा.

सुरेश चंद ने कहा कि राज्य सरकार इस कोटे की मदद से विदेशी छात्रों को अपने यहाँ पढ़ने के लिए आमंत्रित करना चाहती है. साथ ही एक लक्ष्य यह भी है कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों के लिए कुछ अधिक पैसा जुटाया जा सके. यही वजह है कि एनआरआई कोटे के तहत आवेदन करने वाले छात्रों से सामान्य छात्रों की तुलना में ज़्यादा फ़ीस ली जा रही है.

लेकिन मेडिकल स्टूडेंट्स कॉर्डिनेशन कमेटी में शामिल सभी सरकारी कॉलेजों के प्रतिनिधि सरकार के इस तर्क से असहमत हैं.

वो सवाल उठाते हैं कि किसी अन्य स्टूडेंट से ज़्यादा पैसे लेकर, राज्य के एक ज़्यादा मैरिट वाले छात्र की सीट उससे छीन लेना कहाँ तक न्यायोचित है?डॉक्टरों ने मुँह पर ताले लगाकर भी प्रदर्शन किया. उनका कहना है कि सरकार में उनकी सुनने वाला कोई नहीं.

फ़ीस और विवाद

एनआरआई कोटे वाली सीट पर सालाना फ़ीस कितनी है? यह पढ़ने से पहले आप ये जान लें कि फ़ीस को लेकर भी राजस्थान के मेडिकल स्टूडेंट पिछले एक साल से सरकार की आलोचना कर रहे हैं.

उनका कहना है कि साल 2017 में हॉस्टल, ट्यूशन, अकादमिक और स्पोर्ट्स फ़ीस को मिलाकर एक छात्र को प्रति वर्ष 6,000 रुपये जमा करने होते थे. साल 2018 में इसे बढ़ाकर क़रीब 50,000 रुपये प्रति वर्ष कर दिया गया.

साथ ही सरकार ने यह नियम भी बना दिया कि मेडिकल स्टूडेंट्स की फ़ीस हर साल दस फ़ीसदी बढ़ाई जाएगी.

अब बात एनआरआई कोटे वाली सीटों की. एडिश्नल डायरेक्टर सुरेश चंद के मुताबिक़ इन सीटों पर दाख़िला लेने वाले छात्रों को हर वर्ष तक़रीबन 14 से 15 लाख रुपये फ़ीस जमा करनी होगी.राजस्थान मेडिकल एजुकेशन विभाग का 26 जून 2019 का आदेश

लेकिन फ़ीस की यह रकम सूबे के प्राइवेट कॉलेजों की एनआरआई सीटों की फ़ीस की तुलना में काफ़ी कम है.

मेडिकल स्टूडेंट इस बात पर ज़ोर देते हुए कहते हैं कि ये वाक़ई एक बढ़िया सौदा है क्योंकि प्राइवेट कॉलेज की तुलना में किसी एनआरआई कोटे वाले छात्र को अब कम पैसे ख़र्च करके सरकारी कॉलेज की डिग्री मिल सकेगी.

पर डॉक्टर नितेश भास्कर इस स्थिति पर अलग तरह से सवाल करते हैं. वो कहते हैं, “अधिक फ़ीस के नाम पर प्रतिभाशाली छात्रों की 15 प्रतिशत सीटें सरकार कैसे छीन सकती है?”

डॉक्टर नितेश ‘मेडिकल स्टूडेंट्स कॉर्डिनेशन कमेटी’ में अजमेर मेडिकल कॉलेज के प्रतिनिधि हैं.

उनके अनुसार, “सरकार ने पहले सभी छात्रों की फ़ीस बढ़ाई. फिर फ़ीस के नाम पर तैयार किए गए एनआरआई कोटे के तहत 15 प्रतिशत सीटें हड़प लीं. ये वो सरकारी सीटें हैं जो एनईईटी की परीक्षा में बेस्ट रैंक हासिल करने वाले छात्रों के बीच बाँटी जाती थीं.”

“कौन नहीं जानता कि देश में मेडिकल कोर्स की सरकारी सीटें सिर्फ़ 30 हज़ार हैं और देश में मेडिकल की सबसे बड़ी परीक्षा, NEET-2019 में पास हुए सभी 8 लाख छात्र इन सीटों को पाने का सपना रखते हैं. लेकिन सरकारी सीटों पर सिर्फ़ वे जा पाते थे जिनका स्कोर बढ़िया हो. चाहें उनके माता-पिता के पास पैसे हों या नहीं. लेकिन सरकार ने इस पैमाने को बदल दिया है.”

डॉक्टर नितेश ने कहा, “हमारे राज्य में किसी भी साधारण कोचिंग सेंटर में मेडिकल की तैयारी करने का रेट डेढ़ लाख रुपये है. ग़रीब परिवार भी ये सोचकर बच्चे की कोचिंग पर पैसा ख़र्च कर देते थे कि एक बार सरकारी कॉलेज में दाख़िला हो जायेगा तो डॉक्टरी कर लेगा. लेकिन 15 प्रतिशत सीटें एनआरआई के लिए ब्लॉक होने से प्रतिस्पर्धा तेज़ी से बढ़ेगी या ग़रीब परिवार ये ख़्वाब देखना ही छोड़ देंगे.”

कितनी सीटें भरीं?

मेडिकल स्टूडेंट्स की इसी स्टेट कमेटी में डॉक्टर धर्मेंद्र कुमार भांभू बीकानेर मेडिकल कॉलेज के प्रतिनिधि हैं. धर्मेंद्र बीकानेर के सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज की स्टूडेंट यूनियन के निर्वाचित अध्यक्ष भी हैं.

उनका कहना है कि एनआरआई कोटे की वजह से बहुत सारे छात्रों के लिए NEET की रैंक का कोई मतलब नहीं रह गया है.

धर्मेंद्र ने कहा, “हम दो महीने से इसके ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट कर रहे हैं. कॉलेज प्रशासन कहता है कि ये सरकार के स्तर का मुद्दा है, उनके हाथ में कुछ नहीं है. मंत्री इस बारे में बात नहीं करते. जिन पेरेंट्स के पास 70-80 लाख रुपये नहीं हैं, उनके बच्चों की सीट महज़ कुछ नंबरों से छूट रही है. भले ही NEET में उनके 95 परसेंटाइल नंबर आए हैं.”

वो कहते हैं, “सब सुविधाओं में जीने वाले उन लोगों के लिए जिनके पास बहुत सारा पैसा है, कोटा निर्धारित करने का क्या मतलब है? फिर कई बच्चों की NEET रैंक बहुत ख़राब है. लेकिन ज़्यादा फ़ीस लेकर उन्हें सरकारी सीट पर दाख़िला दिया जा रहा है क्योंकि एनआरआई कोटे की व्यवस्था है. क्या इसका मतलब ये हुआ कि अगर आप एनआरआई कोटे का सर्टिफ़िकेट बनवाने में सफल हो जाते हैं, तो NEET में न्यूनतम नंबर होने पर भी आप सरकारी सीट के बारे में सोच सकते हैं?”

राजस्थान के मेडिकल एजुकेशन विभाग ने बीबीसी से इस बात की पुष्टि की है कि सूबे की 212 एनआरआई सीटों में से अधिकांश सीटें (200 से ज़्यादा) आवंटित की जा चुकी हैं.

विभाग के अनुसार इनमें वो छात्र भी हैं जिनका NEET स्कोर 50 परसेंटाइल से कम है. यानी ओबीसी और एससी-एसटी श्रेणी के कट-ऑफ़ स्कोर से कम.

मेडिकल एजुकेशन विभाग के एडिश्नल डायरेक्टर सुरेश चंद ने बताया कि सरकार ने जो मौजूदा व्यवस्था बनाई है, उसके अनुसार एनआरआई कोटे की सभी 212 सीटें अगर नहीं भर पाती हैं, तो उन्हें कॉलेज की मैनेजमेंट सीटों में बदल दिया जाएगा. ऐसी स्थिति में सोसायटी से संचालित सरकारी मेडिकल कॉलेज यह तय कर सकेंगे कि वो छात्रों से कितनी फ़ीस लेंगे.

ख़राब पॉलिसी?

कमेटी में शामिल उदयपुर, जयपुर, बीकानेर, झालावाड़ और जोधपुर के जिन मेडिकल स्टूडेंट्स से हमारी बात हुई, उनका मानना है कि एनआरआई कोटे की शर्तें इतनी ढीली हैं कि उनकी वजह से सिस्टम में धांधली बढ़ सकती है.

मेडिकल स्टूडेंट्स के इस दावे को समझने के लिए हमने राजस्थान मेडिकल एजुकेशन विभाग की वेबसाइट पर मौजूद सरकारी आदेश को पढ़ा जिसमें लिखा है कि एनआरआई कोटे के तहत किसे एनआरआई माना जायेगा:

  • ऐसे छात्र जिनके माता या पिता में से कोई एक या दोनों एनआरआई हों और विदेश में रहते हों.
  • ऐसे छात्र जिनके भाई या बहन विदेश में रहते हों और उन्हें स्पॉन्सर करने को तैयार हों.
  • अगर चाचा-चाची, मामा-मामी, दादा-दादी, नाना-नानी या फिर आवेदक के माता-पिता का कोई भी फ़र्स्ट डिग्री रिश्तेदार छात्र को स्पॉन्सर करने के लिए तैयार हो जाता है, तो उसे भी एनआरआई कोटे के तहत दाख़िला मिलेगा.
  • पर्सन्स ऑफ़ इंडियन ऑरिजन (PIOs) और ओवरसीज़ सिटिज़न ऑफ़ इंडिया (OCIs) भी एनआरआई कोटे के तहत एडमिशन लेने के योग्य हैं.

एनआरआई कोटे के तहत सरकारी मेडिकल सीट हासिल करने की पात्रता का दायरा क्या वाक़ई बहुत बड़ा नहीं है? यह सवाल जब हमने राजस्थान के मेडिकल एजुकेशन मंत्री रघु शर्मा को भेजा तो उन्होंने दस दिन तक लगातार हमें समय दिया और फिर इस विषय पर बात नहीं की.

अन्य राज्यों की स्थिति कैसी?

अपनी पड़ताल में हमने पाया कि राजस्थान अकेला ऐसा राज्य नहीं है जहाँ सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई कोटे का प्रबंध किया गया है.

राज्यों के मेडिकल एजुकेशन विभाग के अनुसार गुजरात के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में 181, हिमाचल प्रदेश में 22, हरियाणा में 20 और पंजाब में 45 सीटें एनआरआई कोटे के लिए निर्धारित की गई हैं.

इन राज्यों में भी एनआरआई कोटे से एमबीबीएस करने की सालाना फ़ीस 13 लाख से 19 लाख रुपये के बीच है.

गुजरात के मेडिकल एजुकेशन विभाग ने ये दावा किया कि उनके यहाँ एनआरआई कोटे के तहत सिर्फ़ उन स्टूडेंट्स को दाख़िला दिया जाता है जिनके माता-पिता या फिर वो ख़ुद एनआरआई हों.

इन पाँच राज्यों के अलावा बीबीसी ने मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश के मेडिकल एजुकेशन विभाग से भी बात की जिन्होंने दावा किया कि उनके राज्य में फ़िलहाल सिर्फ़ प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों में ही एनआरआई कोटे की व्यवस्था है.

पर सरकारी मेडिकल कॉलेजों में एनआरआई कोटे के तहत छात्रों के एडमिशन से क्या प्रभाव हो सकते हैं? इसपर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित डॉक्टर केके अग्रवाल ने बीबीसी से बातचीत में एक अन्य नज़रिया पेश किया.डॉक्टर केके अग्रवाल

डॉक्टर अग्रवाल ने कहा, “अगर यह मान भी लिया जाए कि इस कोटे के तहत एनआरआई छात्र मेडिकल की पढ़ाई करने भारत आएंगे तो इसकी क्या गारंटी होगी कि पढ़ाई पूरी करने के बाद वो भारत में ही अपनी सेवाएं देंगे. ये बात सही है कि वो बहुत अधिक फ़ीस दे रहे हैं. लेकिन एमबीबीएस की डिग्री के लिए जो क़ीमत विदेशी होने के नाते वो देने वाले हैं, वो उनकी मुद्रा में बहुत कम होगी. यानी सस्ते में एक सरकारी डिग्री.”

“और अगर वो पढ़ाई पूरी करने के बाद वापस लौट गये, तो भारत में डॉक्टरों की जो कमी है, वो वैसी की वैसी बनी रहेगी. ऐसी स्थिति में बढ़ी हुई सरकारी मेडिकल सीटों पर एनआरआई कोटा लागू करने का क्या फ़ायदा?”

डॉक्टर केके अग्रवाल ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकार अगर पैसा कमाने के लिए यह सब कर रही है तो वो ग़लत है.

उन्होंने कहा, “बेहतर स्थिति यह होती कि सरकार बढ़ी हुई सीटों को भारत के ही छात्रों के लिए रखती. मौजूदा स्थिति में मैं राजस्थान के प्रदर्शनकारी डॉक्टरों के साथ हूँ.”