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बीएसएनएल: कभी थी नंबर वन और अब क्यों है डूबने की कगार पर?

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बीएसएनल (भारत संचार निगम लिमिटेड) के तत्कालीन सीएमडी अनुपम श्रीवास्तव बेहद परेशान थे.

लाखों करोड़ो रुपए के डूबे कर्ज के बोझ तले दबी बैंकिंग सेक्टर की चुनौतीपूण हालत, “बाहरी और आंतरिक चुनौतियों” के कारण नकदी की कमी से जूझ रही बीएसएनएल अपने 1.7 लाख कर्मचारियों की तनख़्वाहों के लिए धन जुटाने की कोशिश कर रही थी.

फ़रवरी में कर्मचारियों की तनख़्वाहों में 15 दिनों की देरी मीडिया में बड़ी-बड़ी सुर्खियां थीं.

अनुपम श्रीवास्तव को ये पता था कि अगर ये सुर्खियां लंबे समय तक चलीं तो बैंकों से कर्ज़ लेना और मुश्किल हो जाएगा.

जून में रिटायर हुए अनुपम श्रीवास्तव बताते हैं, “चुनौती थी कि पैसे कैसे इकट्ठा करें, एक अस्थायी कैश फ़्लो की स्थिति से कैसे निपटें.”

पैसों का इंतज़ाम करने के बाद मार्च में कंपनी ने अपने कर्मचारियों की तनख़्वाहें दीं.

अक्टूबर 2002 में बीएसएनएल मोबाइल सेवा के लॉंच होने के मात्र डेढ़ दो सालों में भारत की नंबर वन मोबाइल सेवा बनने वाली बीएसएनएल पर करीब 20 हज़ार करोड़ रुपए का कर्ज़ है.

अधिकारी याद दिलाते हैं कि ये बीएसएनएल ही थी जिसकी फ़्री इनकमिंग कॉल्स, फ़्री रोमिंग जैसी सुविधाओं से दामों में भारी गिरावट आई.

हालांकि बीएसएनल अधिकारी ये दावा करते नहीं थकते कि प्राइवेट टेलीकॉम ऑपरेटर्स के मुकाबले बीएसएनएल पर कर्ज़ “चिल्लर जैसा” है.

कुछ लोग कह रहे हैं कि बीएसएनएल को बंद कर दिया जाए. कुछ इसके निजीकरण पर ज़ोर दे रहे हैं.

पूर्व बीएसएनल अधिकारियों से बातचीत में ऐसी तस्वीर उभरती हैं जिससे लगता है कि बीएसएनएल की आंतरिक चुनौतियों और सरकार के कड़े शिकंजे और काम में कथित सरकारी दखलअंदाज़ी के कारण कंपनी आज ऐसी स्थिति में है.

कंपनी में करीब 1.7 लाख कर्मचारियों की औसत उम्र 55 वर्ष है, और एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक “इनमें से 80 प्रतिशत बीएसएनएल पर बोझ हैं, क्योंकि वो तकनीकी तौर पर अनपढ़ हैं जो नई तकनीक सीखना ही नहीं चाहते और इसका असर युवा कर्मचारियों के मनोबल पर पड़ता है.”

बीएसएनएल कर्मचारी यूनियन इन आरोपों से इनकार करता है.

जहां बीएसएनएल अपनी आमदनी का 70 प्रतिशत तन्ख़्वाहों पर खर्च करती है, निजी ऑपरेटर्स में ये आंकड़ा 3-5 प्रतिशत है.

एक अधिकारी के मुताबिक जहां निजी ऑपरेटर्स का आरपू ( ARPU) यानि हर ग्राहक से होनी वाली आमदनी करीब 60 रुपए है, बीएसएनएल में ये 30 रुपए है, क्योंकि बीएसएनएल के ज़्यादातर ग्राहक कम आमदनी वाले हैं.

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने राज्य सभा में बीएसएनएल के लिए आर्थिक पैकेज की बात कही तो है लेकिन कंपनी के भविष्य को लेकर अटकलें जारी हैं.

लेकिन बड़ा सवाल ये है कि आख़िर एक ज़माने की नंबर वन कंपनी बीएसनएल इस हाल में कैसे पहुंची?

बीएसएनएल का लॉंच

19 अक्टूबर 2002 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने लखनऊ से बीएसएनएल मोबाइल सेवा की शुरुआत की.

अगले दिन बीएसएनल ने जोधपुर में सेवा की शुरुआत की जहां अनुपम श्रीवास्तव बीएसएनएल के जनरल मैनेजर के पद पर थे.

अनुपम श्रीवास्तव बताते हैं, “जब हमें बीएसएनएल की सिम्स (सिम कार्ड) मिलती थीं तब हमें पुलिस, प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों को सुरक्षा देने के लिए बताना पड़ता था, क्योंकि अव्यवस्था का ख़तरा पैदा हो जाता था. वो दिन थे जब बीएसएनएल सिम्स के लिए तीन से चार किलोमीटर लंबी लाइनें लगती थीं.”

ये वो वक्त था जब निजी ऑपरेटरों ने बीएसएनएल के लॉंच के महीनों पहले मोबाइल सेवाएं शुरू कर दी थीं लेकिन बीएसएनएल की सेवाएं इतनी लोकप्रिय हुईं कि बीएसएनएल के ‘सेलवन’ ब्रांड की मांग ज़बरदस्त तरीके से बढ़ गई.

अधिकारी गर्व से बताते हैं कि “लॉंच के कुछ महीनों के बाद ही बीएसएनल देश की नंबर वन मोबाइल सेवा बन गई”

सरकारी दखल

डिपार्टमेंट ऑफ़ टेलीकॉम (डीओटी) से बीएसएनएल का जन्म अक्टूबर 2000 में हुआ. इसमें भारत सरकार की 100 प्रतिशत हिस्सेदारी थी.

बीएसएनएल की डोर डीओटी के हाथों में है जो भारत सरकार के संचार मंत्रालय का हिस्सा है.

एमटीएनएल मुंबई और दिल्ली में ऑपरेट करती थी, जबकि बाकी देश में बीएसएनएल की मौजूदगी है.

साल 2000 में स्थापना के बाद बीएसएनएल के अधिकारी जल्द से जल्द मोबाइल सेवाएं शुरू करना चाहते थे ताकि वो निजी ऑपरेटरों को चुनौती दे सकें लेकिन वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक उन्हें ज़रूरी सरकारी सहमति नहीं मिल पा रही थी.

विमल वाखलू उस वक्त बीएसएनल में वरिष्ठ पद पर थे. वो बताते हैं, “हम काफ़ी निराश थे. हम एक रणनीति पर काम करना चाहते थे ताकि हम मुकाबले को पीछे छोड़ सकें.”

वो कहते हैं, “बीएसएनएल के बोर्ड ने प्रस्ताव पारित कर सेवाओं को शुरू करने का फ़ैसला किया.”

उस वक्त डॉक्टर डीपीएस सेठ बीएसएनएल के पहले प्रमुख थे. वो सरकार के साथ अपने रिश्तों पर बहुत बात नहीं करना चाहते लेकिन कहते हैं कि शुरुआत में फ़ैसले लेने में जो आज़ादी थी वो धीरे-धीरे कम होने लगी.

विमल वाखलू बताते हैं, “जब बीएसएनएल की सेवाओं की शुरुआत हुई, उस वक्त निजी ऑपरेटर 16 रुपए प्रति मिनट कॉल के अलावा 8 रुपए प्रति मिनट इनकमिंग के भी पैसे चार्ज करते थे. हमने इनकमिंग को मुफ़्त किया और आउटगोइंग कॉल्स की कीमत डेढ़ रुपए तक हो गई. इससे निजी ऑपरेटर हिल गए.”

बीएसएनएल कर्मचारी 2002-2005 के इस वक्त को बीएसएनएल का सुनहरा दौर बताते हैं जब हर कोई बीएसएनएल का सिम चाहता था और कंपनी के पास 35 हज़ार करोड़ तक का कैश रिज़र्व था, जान-पहचान वाले बीएसएनएल सिम के लिए मिन्नतें करते थे.

लाल फ़ीताशाही

बीएसएनएल कर्मचारी और अधिकारी 2006-12 के वक्त को आज की बीएसएनएल की स्थिति से सीधा जोड़ते हैं.

ये वो वक्त था जब मोबाइल सेगमेंट में जबरदस्त उछाल था लेकिन बीएसएनएल लाल फ़ीताशाही में फंसी थी.

मार्केट में अपनी क्षमता को बढ़ाने के लिए बीएसएनएल के लिए ज़रूरी था कि वो जल्द फ़ैसले ले, नए उपकरण खरीदे.

निजी कंपनियां जहां ऐसे फ़ैसले तुरंत ले लेती थीं, सरकारी कंपनी होने के कारण जहां बीएसएनएल के लिए टेंडर की प्रक्रिया पूरे होने में महीनों लग जाते थे.

एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने नाम ना लेने की शर्त पर बताया कि वो बीएसएनएल के विस्तार का छठा चरण था. उस वक्त भारत में करीब 22 करोड़ मोबाइल कनेक्शंस में बीएसएनएल का मार्केट शेयर 22 प्रतिशत था.

वो बताते हैं, “कंपनी ने 93 मिलियन लाइंस क्षमता बढ़ाने के लिए टेंडर निकाला लेकिन किसी न किसी कारण से उसमें महीनों लग गए. कभी भ्रष्टाचार के आरोप से देरी होती, कभी किसी और कारण से. नतीजा ये हुआ कि 2006-12 के बीच बीएसएनएल की क्षमता में जहां मामूली इज़ाफ़ा हुआ, कंपनी के मार्केट शेयर में गिरावट आई जबकि निजी ऑपरेटर्स आगे निकल गए.”

वो कहते हैं, “वो वक्त कंपनी के कर्मचारियों, अधिकारियों में बेचैनी का था. हम सोचते थे हम क्यों पीछे छूट रहे हैं. लोगों ने नेटवर्क कंजेशन और अन्य समस्याओं के कारण बीएसएनएल छोड़ निजी कंपनियों की ओर रुख किया.”

लोग बीएसएनएल की सेवा से बेहद नाराज़ थे.

उसी दौरान बीएसएनएल के पी अभिमन्यू अहमदाबाद गए. शाम को उनकी तबियत गड़बड़ाई तो उन्हें डॉक्टर के पास ले जाया गया.

बीएसएनएल कर्मचारी यूनियन के महासचिव पी अभिमन्यू बताते हैं, “डॉक्टर ने मुझसे कहा, आप पहले मेरी मदद करिए, तब मैं आपकी मदद करूंगा. मेरे पास बीएसएनएल मोबाइल है. कॉल सुनने के लिए मुझे सड़क पर जाना पड़ता है, चिल्ला कर बात करनी पड़ती है. आप पहले मेरी समस्या का समाधान करिए.”

एक्सपर्ट बताते हैं कि इस दौर में मंत्रालय से भी सहमति आने में भी वक्त लग रहा था.

टेलीकॉम सेक्टर मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर सूर्या महादेवन के मुताबिक स्थिति इतनी बिगड़ी कि बाज़ार में एक सोच ऐसी भी थी कि मंत्रालय में कुछ लोग कथित तौर पर चाहते थे कि बीएसएनएल का मार्केट शेयर गिरे ताकि निजी ऑपरेटरों को फ़ायदा पहुंचे.

दयानिधि मारन साल 2004-07 संचार मंत्री रहे, जबकि उनके बाद ए राजा 2007-10 तक.

बीएसएनएल की खराब हालत पर ए. राजा से तो संपर्क नहीं हो पाया लेकिन संचार मंत्री रहे दयानिधि मारन कहते हैं, ” मेरे वक़्त में बीएसएनएल फलफूल रही थी. बीएसएनएल बोर्ड के पास कोई भी निर्णय लेने के पूरे अधिकार थे. वो बीएसएनएल सबसे बेहतरीन समय था और उसका विस्तार हो रहा थी. मेरे वक़्त एक भी टेंडर कैंसल नहीं हुआ. किसी के पास ये साबित करने के लिए एक भी कागज है क्या? मेरे वक्त एक निजी आपरेटर बीएसएनएल को टेकओवर करना चाहता था तो हमने उसपर जुर्माना लगाया.

मारन इन आरोपों का खंडन करते हैं कि सरकार निजी ऑपरेटरों के प्रभाव में काम कर रही थी.

दयानिधि मारन ने कहा, ‘मेरे वक़्त के दौरान बीएसएनएल एग्रेसिव थी और प्राइवेट आपरेटर भाग रहे थे.’

मारन पर चेन्नई में अपने घर पर बीएसएनएल लाइंस के ग़ैरक़ानूनी दुरुपयोग के आरोप भी लगे लेकिन दयानिधि मारन उन्हें ‘राजनीति से प्रेरित बताते हैं जहाँ उन्हें बदनाम करने कोशिश की गई.’

मामला अदालत में है.

साल 2010 का 3जी ऑक्शन

साल 2010 में 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी हुई जिसमें सरकारी कंपनी होने के कारण बीएसएनएल ने हिस्सा नहीं लिया.

बीएसएनएल को पूरे देश के लिए स्पेक्ट्रम तो मिले लेकिन जिस दाम पर निजी कंपनियों ने नीलामी में स्पेक्ट्रम खरीदे थे, बीएसएनएल से कहा गया कि वो भी वही दाम दे.

साथ ही बीएसएनएल को वायमैक्स तकनीक पर आधारित ब्रॉडबैंड वायरेलस ऐक्सेस (बीडब्ल्यूए) स्पेक्ट्र के लिए भी भारी रक़म देनी पड़ी.

इसका असर एमएटीएनएल और बीएसएनएल की आर्थिक स्थिति पर पड़ा.

एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक इस कारण बीएसएनएल ने इस नीलामी में 17,000 से 18,000 करोड़ खर्च किए जिससे उसका खज़ाना खाली हो गया जबकि एमटीएनएल को तो कर्ज़ लेना पड़ा जिसे चुकाने के लिए उसे 100 करोड़ रुपए महीना देना पड़ता था.

उम्मीद की किरण

पूर्व अधिकारियों के मुताबिक साल 2014 से 2017 बीएसएनएल के लिए थोड़ी उम्मीद का दौर था जब बीएसएनएल ने “ऑपरेटिंग प्रॉफिट्स” कमाए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से बीएसएनएल के “ऑपरेटिंग मुनाफ़े” का ज़िक्र किया.

बीएसएनएल के पूर्व प्रमुख अनुपम श्रीवास्तव के मुताबिक, “साल 2014-15 में बीएसएनएल का ऑपरेटिंग प्रॉफ़िट 67 करोड़ रुपए, साल 2015-16 में 2,000 करोड़ रुपए और साल 2016-17 में 2,500 करोड़ रुपए था. साथ ही 15 अगस्त 2016 को प्रधानमंत्री मोदी जब लाल किले की प्राचीर से बीएसएनएल की सफ़लता का उल्लेख किया तो वो बीएसएनएल के बेहतर दिनों के आगमन का संकेत था.”

इसके अलावा बीएसएनएल और एमटीएनएल ने बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम सरेंडर किया जिससे उसे सरकार से पैसे मिले और उसकी बिगड़ती आर्थिक स्थिति थोड़ी बेहतर हुई.

उधर पूर्व बीएसएनएल अधिकारी विमल वाखलू आपरेटिंग मुनाफ़े की बात करना किसी मज़ाक की तरह है क्योंकि इस आंकड़े पर पहुंचते वक्त उपकरणों के डेप्रिसिएशन या अवमूल्यन (घटती कीमत) को ध्यान में नहीं रखा गया.

अनुपम श्रीवास्तव इससे सहमत नहीं और कहते हैं कि ऑपरेटिंग मुनाफ़ा निकालते वक्त डेप्रिसिएशन के बारे में सोचा गया था. उनके मुताबिक बीएसएनएल की अकाउंटिंग प्रक्रिया आला दर्जे की है.

जियो का आगमन

बाज़ार में रिलायंस जियो का आना एक गेम चेंजर था जिससे बाज़ार की सभी टेलिकॉम कंपनियों पर भी असर पड़ा.

जहां बीएसएनएल का एक वर्ग अपनी हालत के लिए जियो को ज़िम्मेदार ठहराता है, एक दूसरे वर्ग इससे सहमत नहीं.

बीएसएनएल कर्मचारी यूनियन के पी अभिमन्यू बीएसएनएल की आथिक स्थिति के लिए जियो की प्राइसिंग स्ट्रैटजी और नीतिकर्तांओं पर कंपनी के कथित प्रभाव को ज़िम्मेदार ठहराते हैं जिस कारण एअरसेल, टाटा टेलिसर्विसेज़, रिलायंस इन्फ़ोकॉम, टेलिनॉर जैसी मध्यम या छोटी टेलिकॉम कंपनियां बंद हो गईं.

उधर पूर्व बीएसएनएल अधिकारी विमल वाखलू के मुताबिक “बीएसएनएल और एमटीएनएल को जियो से कोई चुनौती नहीं मिली. जब जियो ने अपने सेवाएं शुरू की, उनकी हालत पहले ही खराब थी. कई लोग जियो को बहाने के तौर पर इस्तेमाल करते हैं.”

एक पूर्व बीएसएनएल अधिकारी के मुताबिक जियो ने अपनी सेवाएं शुरू करने के लिए बड़ी रक़म लगाई है तो किसने दूसरी कंपनियों को इतने बड़े निवेश से रोका है.

4जी स्पेक्ट्रम नीलामी

आश्चर्य की बात कि जब दुनिया 5जी स्पेक्ट्रम की ओर बढ़ रही है, बीएसएनएल के पास 4जी स्पेक्ट्रम नहीं है.

अधिकारियों के मुताबिक जब 2016 में 4जी स्पेक्ट्रम की नीलामी हुई तो फिर बीएसएनएल को बाहर रखा गया.

एक अधिकारी के मुताबिक बीएसएनएल मैनेजमेंट ने इस बारे में सरकार का ध्यान खींचने के लिए 17 पत्र लिखे लेकिन चीज़ें नहीं बदलीं.

अधिकारी के मुताबिक, “फ़ाइल दफ़्तर में घूमती रहीं. फ़ाइल आगे क्यों नहीं बढ़ी इसके बहुत से कारण हो सकते हैं.”

दयानिधि मारन के मुताबिक कि बीएसएनएल की हालत ख़राब होने का कारण है कि उसे 4G स्पेक्ट्रम नहीं दिया गया. सरकार नहीं चाहती कि बीएसएनएल निजी आपरेटर्स के साथ मुक़ाबला करे. सरकार उसका गला घोटना चाहती है.

ये कहानी लिखते वक्त उस वक्त के टेलीकॉम मंत्री रहे मनोज सिन्हा से संपर्क नहीं हो सका. अगर उनसे बात हो पाई तो हम इसे अपडेट करेंगे.

एक सोच है कि बीएसएनएल को अब सीधा 5जी के बारे में सोचना चाहिए लेकिन अधिकारी के मुताबिक 5जी का रास्ता 4जी से होकर ही जाता है ताकि सिस्टम के नेटवर्क और उपकरणों को 5जी के लिए तैयार किया जा सके.

बीएसएनएल का भविष्य

एक पूर्व अधिकारी नाम ना लेने की शर्त पर बताते हैं बीएसएनएल में काम करने की स्वतंत्रता नहीं और वो खुद को बंधा महसूस करते हैं, जैसे और बीएसएनएल के विस्तार को लेकर होने वाले खर्च के प्रस्ताव सरकार के पास लंबे समय तक बिना किसी फ़ैसले के लटके रहते हैं.

इसलिए ज़रूरत है काम के तरीके को सुधारने की.

बीएसएनएल के पहले प्रमुख डॉक्टर डीपीएस सेठ से लेकर आज के अधिकारी मानते हैं बीएसएनएल को सरकारी मदद की ज़रूरत है, कम से कम कुछ महीनों की.

बीएसएनएल अधिकारियों के मुताबिक बीएसएनएल के पास देश के अलग अलग जगहों पर ज़मीन है जिसकी बाज़ार में कीमत एक लाख करोड़ के आसपास है, 20,000 करोड़ रुपए के टॉवर्स हैं और 64,000 करोड़ रुपए के ऑप्टिकल फाइबर्स हैं जिनकी लंबाई करीब आठ लाख किलोमीटर है. और ज़रूरत पड़ने पर इससे पैसा बनाया जा सकता है.

अनुपम श्रीवास्तव कहते हैं, “भारत जैसे देश में एक पब्लिक सेक्टर ऑपरेटर की ज़रूरत है ताकि बाज़ार में एक सरकारी संस्था की उपस्थिति और संतुलन रहे.”

उधर प्रोफ़ेसर सूर्य महादेवन बीएसएनएल के निजीकरण के पक्ष में हैं.

वो कहते हैं, बीएसएनएल को आप जितना लंबा चलाएंगे, उसे उतना घाटा होगा. बीएसएनएल में कोई जवाबदेही नहीं है. न किसी को अच्छे काम के लिए ईनाम मिलता है न बुरे काम के लिए सज़ा. बहुत सी हमारी सरकारी संस्थाएं तभी काम करती हैं जब उन्हें बचाकर रखा जाए, उन्हें प्रतियोगिता से बाहर रखा जाए, और उनके सामने कोई चुनौती न हो.”

दयानिधि मारन कहते हैं कि वो निजीकरण के पक्ष में नहीं हैं लेकिन बीएसएनएल को ऐसा माहौल दिया जाना चाहिए ताकि वो निजी कंपनियों के साथ मुक़ाबला कर सके.

उधर बीएसएनएल मैनेजमेंट के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि कंपनी को बचाने के लिए “सर्वाइवल प्लान” पर सरकार काम कर रही है और इससे ज्यादा वो कुछ नहीं कह सकते.

लोकसभा चुनाव में हार के बाद राहुल का पहला अमेठी दौरा आज

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी 10 जुलाई को एक दिन के दौरे पर उत्तर प्रदेश के अमेठी जाएंगे. लोकसभा चुनाव में अमेठी सीट पर हारने के बाद राहुल पहली बार वहां जा रहे हैं. बता दें कि इस चुनाव में उन्हें बीजेपी की स्मृति ईरानी से हार का सामना करना पड़ा. न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, अमेठी दौरे पर राहुल अपनी हार की समीक्षा करेंगे.

राहुल ने 10 जुलाई की सुबह ट्वीट कर कहा, ”10 मिलियन ट्विटर फोलोअर्स- आप सभी को शुक्रिया. मैं इसे अमेठी में सेलिब्रेट करूंगा, जहां आज मैं कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों से मिलूंगा.”

अमेठी पहुंचकर राहुल वहां के सभी पांचों विधानसभा क्षेत्र सलोन, अमेठी, गौरीगंज, जगदीशपुर और तिलोई के कांग्रेस प्रभारियों के साथ बैठक करेंगे. इसके साथ ही वह पार्टी की न्याय पंचायत, ब्लॉक और बूथ स्तरीय इकाइयों के अध्यक्षों, हर ब्लाक से 15-15 वरिष्ठ कांग्रेस के नेताओं के साथ भी बैठक करेंगे.

इन बैठकों के दौरान राहुल लोकसभा चुनाव में अमेठी से अपनी हार की वजहों का पता लगाने की कोशिश करेंगे. जिला कांग्रेस के प्रवक्ता अनिल सिंह ने पीटीआई को बताया कि राहुल कुछ गांवों का भी दौरा करेंगे. राहुल के इस दौरे की तैयारी की कमान कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के राजनीतिक मामलों के प्रभारी जुबैर खान के जिम्मे है.

बता दें कि राहुल हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में अमेठी के साथ-साथ केरल की वायनाड सीट से भी चुनावी मैदान में उतरे थे. इन दोनों सीटों में से राहुल को वायनाड पर ही जीत हासिल हुई. मगर पीढ़ियों से गांधी-नेहरू परिवार के गढ़ रहे अमेठी में उन्हें स्मृति ईरानी से 50 हजार से ज्यादा वोटों से हार का सामना करना पड़ा.लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल ने हाल ही में पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने का औपचारिक ऐलान किया था.

राहुल ने इस्तीफे का ऐलान करते हुए कहा था,”कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर 2019 के चुनाव की हार की जिम्मेदारी मेरी है. हमारी पार्टी के भविष्य की तरक्की के लिए जवाबदेही होना महत्वपूर्ण है. इसी वजह से मैंने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया है.”

Spa सेंटर में थाईलैंड की लड़कियों से करवाया जा रहा था ऐसा गंदा काम, पुलिस के भी उड़े होश

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नोएडा के स्पा सेंटरों पर हुई छापेमारी में पकड़ी गईं 25 युवतियों में से 8 थाईलैंड की हैं। वे टूरिस्ट वीजा पर भारत आईं और यहां नोएडा के स्पा सेंटरों में जिस्मफरोशी के धंधे में लग गईं। इसके लिए स्पा सेंटर मालिक उन्हें वेतन के बजाय प्रत्येक ग्राहक के हिसाब से तय कमीशन देते थे। सूत्रों के अनुसार विदेशी महिलाओं की दिल्ली-एनसीआर के स्पा सेंटरों में बहुत डिमांड है। इस धंधे में लगे लोग थाईलैंड के पटाया शहर समेत अन्य हिस्सों में रहने वाली युवतियों को बड़ा लालच देकर 6- 6 महीने के टूरिस्ट वीजा पर भारत में बुलाते हैं। उसके बाद उन्हें दिल्ली- एनसीआर के स्पा सेंटरों में काम पर लगा दिया जाता है। वीजा की अवधि पूरी होने से पहले ये युवतियां अपने देश वापस लौट जाती हैं और उसके कुछ समय बाद फिर से वापस आ जाती हैं।

एसपी देहात विनीत जायसवाल के अनुसार छापेमारी में पकड़ी गई 25 महिलाओं में थाईलैंड की 8, दिल्ली की 5, यूपी की 4, मणिपुर की 3, नागालैंड, मिजोरम, राजस्थान, बिहार और पश्चिम बंगाल की 1-1 लड़कियां शामिल थीं। पकड़े गए 10 पुरुष हापुड़, गाजियाबाद, दिल्ली और नोएडा के निकले। सभी के खिलाफ थाना सेक्टर 20 में अनैतिक देह व्यापार अधिनियम के तहत 3 केस दर्ज किए गए हैं। इनमें से दो मामलों की जांच सीओ दादरी अवनीश कुमार और एक मामले की जांच सीओ- 3 (ग्रेनो) राजीव कुमार सिंह करेंगे।

एक अधिकारी के मुताबिक इन सेंटरों में 15 सौ- 2 हजार रुपये में सामान्य स्पा की सुविधा दी जाती है। स्पा के दौरान वहां काम करने वाली युवतियां ग्राहकों को एक्सट्रा इंज्वॉयमेंट का ऑफर देती थीं। राजी होने पर 3 से 5 हजार रुपये लेकर वे जिस्मफरोशी करती थीं। एसएसपी वैभव कृष्ण के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का स्पा हो रहा है तो उस कमरे का लॉक अंदर से बंद नहीं होना चाहिए, लेकिन सेक्टर 18 के सभी 14 स्पा सेंटरों के गेट छापेमारी के दौरान अंदर से बंद मिले। सेंटर में ऐसी आपत्तिजनक वस्तुएं भी मिलीं, जिससे साफ था कि यहां पर स्पा की आड़ में देह व्यापार जैसी गतिविधियां की जा रही थीं।

विदेशी महिलाओं के पकड़े जाने का मामला आते ही खुफिया विभाग के अधिकारी भी दिन भर सक्रिय रहे। एलआईयू के तीन अफसर विदेशी महिलाओं की डिटेल लेने के लिए थाना सेक्टर 20 पहुंचे, लेकिन महिलाओं ने पासपोर्ट और वीजा के बारे में जानकारी होने से इंकार कर दिया। अब विभाग की ओर से थाईलैंड उच्चायोग को पत्र भेजकर इन महिलाओं के बारे में जानकारी मांगी जाएगी। उधर, रविवार रात से थाना सेक्टर-20 के एक कमरे में बंद रही महिलाओं में कई ने सोमवार को पुलिस की ओर से मंगवाया गया खाना नहीं खाया। शाम को बस से सभी आरोपितों को सूरजपुर जिला न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया।

Paytm यूजर्स को बड़ा झटका, आज से इतना महंगा हो गया ट्रांजेक्शन चार्ज

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जुलाई माह की शुरूआत में ही पेटीएम यूजर्स को बड़ा झटका लगा है। आज यानी 1 जुलाई इसका इस्तेमाल महंगा हो गया है। आज पेटीएम मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) शुरू हो गई है। बैंक और कार्ड कंपनियां डिजिटल ट्रांजैक्शंस के लिए MDR लेते हैं। माना जा रहा है कि पेटीएम अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए ये कदम उठा रही है।

इतना महंगा हुआ ट्रांजेक्शन

अब क्रेडिट कार्ड्स के जरिए पेमेंट्स करने पर 1 फीसदी, डेबिट कार्ड्स पर 0.9 फीसदी तथा नेट बैंकिंग और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस के जरिए ट्रांजैक्शंस करने पर 12 से 15 रुपये तक का चार्ज लगेगा। ये नए चार्ज डिजिटल पेमेंट्स के हर मोड पर लागू होंगे यानी वॉलेट टॉप अप से लेकर यूटिलिटी बिल या स्कूल फीस पेमेंट तथा सिनेमा टिकट खरीदने तक पर।

ये है चार्ज बढ़ाने की वजह

पेटीएम की ओर से कहा गया है वो केवल बैंक और कार्ड कंपनियों द्वारा चार्ज किए जाने वाले एमडीआर का बोझ ही ग्राहकों पर डाल रही है। इसके अलावा पेटीएम कोई कन्वीनिएंस फीस नहीं ले रही।

अमेरिका में ब्रिटिश राजदूत से नहीं रखेंगे कोई नाता : ट्रंप

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को घोषणा की कि वह देश में ब्रिटेन के राजदूत से अब आगे किसी तरह का संपर्क नहीं रखेंगे। ट्रंप का यह बयान कूटनीतिक ई-मेलों के लीक होने के बाद आया है जिसमें राजदूत ने ट्रंप को ”अकुशल” बताया है।

ट्रंप ने राजदूत किम डारोक के बारे में ट्वीट किया, ‘मैं राजदूत को नहीं जानता लेकिन अमेरिका में उन्हें कोई पसंद नहीं करता या उनके बारे में किसी के अच्छे विचार नहीं हैं।’ वहीं ब्रिटेन इस घटना के बाद से रिश्तों में आई दूरी को पाटने की कोशिश में लगा हुआ है।

ट्रंप ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री थरेसा मे और उनके ‘प्रतिनिधियों’ पर निशाना साधते हुए एक के बाद एक कई ट्वीट किए। उन्होंने कहा, ‘अब हम उनसे (राजदूत से) कोई संबंध नहीं रखेंगे।’ साथ ही ट्रंप ने प्रधानमंत्री पद से मे की रवानगी का भी स्वागत किया।

मोदी सरकार ने बढ़ा दिया प्रिंट मीडिया का संकट, ड्यूटी हटाने की हो रही मांग

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इंडियन न्यूज़ पेपर सोसाइटी (आईएनएस) ने सरकार से अनुरोध किया है कि न्यूज़ प्रिंट पर लग रही 10 फीसदी कस्टम ड्यूटी को ख़त्म कर दिया जाये. आईएनएस का कहना है कि अख़बार पहले ही विज्ञापनों के कारण संकट से गुजर रहे हैं. संस्था का यह बयान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा अपने पहले बजट में कस्टम ड्यूटी बढ़ाने के बाद सामने आया है. आईएनएस का कहना है कि उद्योग को जिन बाधाओं का सामना करना पड़ता है, उसे बताने की आवश्यकता नहीं है.

अखबारों और पत्रिकाओं के प्रकाशक पहले से ही कम राजस्व, उच्च लागत और डिजिटल के बढ़ने के कारण गंभीर वित्तीय दबाव में हैं. कई छोटे और मध्यम समाचार पत्र बंद होने की कगार पर हैं. भारत में अखबारी कागज की कुल खपत 2.5 मिलियन टन प्रति वर्ष आंकी गई है और घरेलू उद्योग की क्षमता केवल 1 मिलियन टन है. बिना घरेलू और हल्के वजन के लेपित कागज के कोई घरेलू निर्माता नहीं हैं.

फिक्की-ईवाई मीडिया और मनोरंजन उद्योग की रिपोर्ट 2019 के अनुसार, प्रिंट सेगमेंट 2018 में स्थिर रहा, जो केवल 0.7% से बढ़कर 30,550 करोड़ तक पहुंच गया. दूसरी ओर डिजिटल समाचार उपभोक्ताओं में 26% की वृद्धि देखी गई. 2017 में जब 222 मिलियन लोगों ने ऑनलाइन खबरों का रुख किया. 2017 में पेजव्यू 59% बढ़ गए और औसत समय 2018 में प्रति दिन लगभग 100% से 8 मिनट तक बढ़ गया.

रिपोर्ट के अनुसार अखबारों के विज्ञापन में 1% की कमी हुई जबकि पत्रिका के विज्ञापन में 10% की गिरावट आई, क्योंकि विज्ञापन की मात्रा कम हुई है. भारत में प्रिंट सर्कुलेशन राजस्व 2018 में 1.2% की वृद्धि के साथ 8,830 करोड़ तक पहुंच गया और प्रिंट सेगमेंट के कुल राजस्व का 29% के रूप में सर्कुलेशन राजस्व का योगदान दिया. ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन के 2017 के आंकड़ों के अनुसार जनवरी से जून 2018 के बीच अखबारों का प्रचलन लगभग 2% बढ़ा.

शराब छोड़ने से शरीरिक ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य भी रहता है बेहतर- शोध

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अगर आपको लगता है कि कम मात्रा में शराब पीने से आपको ज्यादा नुकसान नहीं होगा, तो आपको फिर से सोचने की जरूरत है. शोधकर्ताओं ने पाया है कि शराब छोड़ने से पूरी तरह से मानसिक स्वास्थ्य में सुधार हो सकता है. खासकर महिलाओं के लिए यह अधिक कारगर है. शराब का औसत सेवन पुरुषों के लिए सप्ताह में 14 पैग जबकि महिलाओं के लिए सप्ताह में 7 पैग निर्धारित किया गया है.

अध्ययन में पाया गया है कि जिन पुरुष और महिलाओं ने जीवनभर शराब से दूरी बनाए रखी, उनका मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहा. सीएमएजे पत्रिका में प्रकाशित खबर के अनुसार, जो महिलाएं औसत शराब पीती थी या शराब पीना छोड़ देती थी, उनमें मानसिक तौर पर सकारात्मक बदलाव देखने को मिले. फिलहाल यह अध्ययन चीन व अमेरिका के नागरिकों पर हुआ है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह शोध भारतीय नागरिकों पर भी किया जा सकता है.

गुरुग्राम के नारायणा सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के परामर्श चिकित्सक गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी नवीन कुमार के मुताबिक, एक महीने के लिए भी शराब छोड़ना पेट और शरीर की रस प्रक्रिया (मेटाबॉलिक) सिस्टम को दुरुस्त करने में मदद कर सकता है और इसके लक्षणों को खत्म कर सकता है. उन्होंने कहा कि यह दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ को भी बढ़ावा देता है.

नवीन ने आईएएनएस को बताया, “एक स्वस्थ मस्तिष्क और जिगर के लिए शराब से परहेज अनिवार्य है. एक मजबूत प्रतिरक्षा प्रणाली और दिल के लिए भी शराब से दूरी बनानी जरूरी है. खासकर महिलाओं पर शराब का प्रभाव अधिक हानिकारक है.”

नोएडा के जेपी अस्पताल में वरिष्ठ परामर्श चिकित्सक मृणमय कुमार दास ने आईएएनएस को बताया, “शराब हमारे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के लिए हानिकारक है और हमारी मनोदशा में उतार-चढ़ाव ला सकती है. शराब हमारे मस्तिष्क में सेरोटोनिन के स्तर को कम करती है. इसके नियमित सेवन से मस्तिष्क का रसायन विज्ञान बदल जाता है जिससे मस्तिष्क स्वास्थ्य में गिरावट आती है.”

चुनाव के बाद राहुल गांधी पहली बार 10 जुलाई को आ रहे हैं अमेठी

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अमेठी लोकसभा सीट से चुनाव हारने के बाद राहुल गांधी 10 जुलाई को पहली बार अमेठी दौरे पर आ रहे हैं।  राहुल यहां कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करेंगे। बता दें कि राहुल गांधी 15 वर्षों में पहली बार अमेठी के सांसद नहीं हैं और अब वह कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर भी नहीं हैं।  राहुल गांधी लगातार तीन बार अमेठी से सांसद रह चुके हैं। अमेठी को कांग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता है। इसके बावजूद इस बार के लोकसभा चुनाव में स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को हरा दिया। स्मृति ईरानी ने राहुल को 55 हजार वोटों से हराकर कांग्रेस के सबसे मजबूत किले को ध्वस्त कर दिया। उधर लखनऊ में सेवादल की अहम बैठक के दौरान नेताओं ने संगठन को मजबूत बनाने पर जोर दिया। साथ ही एक बार फिर राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जाने की सिफारिश भी की।  

राहुल गांधी को नशेड़ी बताने वाले सुब्रमण्यम स्वामी पर छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने दर्ज कराई रिपोर्ट

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भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी को कांग्रेस सांसद राहुल गांधी को नशेड़ी बताना महंगा पड़ गया.

कांग्रेसियों का कहना है कि सुब्रमण्यम स्वामी को कोई अधिकार नहीं है कि वह राहुल गांधी का अपमान करें और उनके खिलाफ ऐसी बयानबाजी करें. राहुल गांधी पर बयानबाजी को लेकर छत्तीसगढ़ कांग्रेस के महासचिव पीएल पुनिया ने स्वामी के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कराई है.

बता दें सुब्रमण्यम स्वामी ने हाल ही में राहुल गांधी के खिलाफ बयानबाजी करते हुए उन्हें ‘नशेड़ी’ कहा था, जिसे लेकर कांग्रेसी काफी गुस्से में हैं.

दुनिया में सबसे तेज है इस भारतीय लड़की का दिमाग, कंप्यूटर भी है पीछे

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आज भारतीय दुनिया के हर क्षेत्र में अपना और अपने देश का नाम रौशन कर रहे हैं। लेकिन भारतीय मूल की एक लड़की ने तो ऐसा कर दिखाया जिसके बारे में कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा। अपने दिमागी कमाल के दम पर दुनिया को चौंकाने वाली यह भारतीय मूल की 11 वर्षीय अनुष्‍का दीक्ष‍ित है। अनुष्का का आईक्यू 162 अंक है जो स्टीफन हॉकिंस और अल्बर्ट आइंस्टाइन से भी ज्यादा है।

महज 40 मिनट में पूरा पीरियोडिक टेबल याद करने वाली अनुष्का ने Mensa IQ Test में सर्वाध‍िक अंक हासिल किए हैं। उसने यह टेस्ट 162 अंक के पास किया जो बेहद कठिन है। ऐसे में तकनीकी आधार पर उसका आईक्‍यू अल्‍बर्ट आइंस्टाइन और स्‍टीफन हॉकिंग से भी तेज माना गया है।

अनुष्का महज 6 महीने की उम्र में ही बालने लग गई थी तथा इसमें उसका जीनियस स्‍कोर 140 है, स्‍टीफन हॉकिंग का स्‍कोर 160 रहा है। बचपन से बहुत इंटेलिजेंट रही यह लड़की टीवी पर विज्ञापन देख-सुन उसे दोहराने लगी थी। इसने एग्‍जाम में 28 सवालों का जवाब महज 4 मिनट में देकर सबको चौंका दिया था। अनुष्का की मां आरती के मुताबिक उनकी बेटी ने 1 साल की उम्र में ही दुनिया के देशों और उनकी राजधानियों के नाम याद कर लिए थे। पिछले दिनों ही उसका Mensa IQ Test हुआ जिसमें सबसे अधिक अंकों के साथ पास हुई।

आईक्यू टेस्ट में अनुष्का सबसे छोटी उम्र की प्रतिभागी थी। जबकि यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्‍ट लंदन में आयोजित हुए टेस्‍ट में 30 साल से 60 साल की उम्र लोग भी शामिल थे। उनके पिता नीरज प्रवर्तन अध‍िकारी हैं। अनुष्‍का बता का सपना है कि वो बड़ी होकर डॉक्‍टर बनना चाहेगी।