छत्तीसगढ़ के कोरबा शहर से लगभग 70 किलोमीटर दूर एक खूबसूरत गांव है चिर्रा। आसपास जंगल और दूर-दूर तक फैली हरियाली यहां से गुजरने वाले राहगीर के मन में रच-बस जाती है। भरी दुपहरी में गांव के इमली और बरगद पेड़ के नीचे गांव के बच्चों की टोली खेलते-कूदते, मस्ती करतेे, तो कुछ कोसम और जामुन से लदे पेड़ पर फल तोड़ते नजर आते है। सुबह गांव के तालाब में मनभर नहा-धोकर ग्रामीण इस गर्मी की अपनी दोपहर चैन से काट पाते हैं। दोपहर में भी यहां राहत और सुकून से भरा वातावरण रहता है, इसके पीछे गांव की अपनी कहानी है।
आज से कुछ साल पहले चिर्रा गांव में पानी की विकराल समस्या थी। सिंचाई का साधन तो दूर, पीने और नहाने के पानी के लिये तरसना पड़ता था। यहां के किसान मानसून पर ही निर्भर थे। जब बारिश हुई तो खेतों पर सिंचाई होती थी नहीं तो अकाल की समस्या से जूझना पड़ता था। गर्मी की वजह से जहां गांव के कई बोर व हैंडपंप पानी देना छोड़ देते थे, वहीं कुछ कुएं पूरी तरह से सूख जाते थे।
ऐसे विपरीत हालातों में यहां के ग्रामीणों के हाथों बनाया बांधीमुड़ा तालाब अब पानी से लबालब रहता है। इसके पानी से ग्रामीणों की न सिर्फ निस्तारी की बड़ी समस्या दूर होती है, यह पास में ही बने रहे नरवा, गरूवा, घुरवा एवं बाड़ी विकास योजना अंतर्गत गौठान में गायों के पीने के पानी की समस्या को भी दूर करता है। यही नहीं आसपास के खेतों में खरीफ के अलावा रबी की फसल भी बांधीमुड़ा तालाब के दम पर होती है। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की पहल पर इसी तरह पूरे प्रदेश में नालों (नरवा) और तालाबों के संवर्धन और सरंक्षण का अभियान चलाया जा रहा हैं। बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है और छत्तीसगढ़ में तालाबों के संरक्षण की परम्परा सदियों पुरानी है। इस राह पर चलकर चर्रा जैसे अनेक गांव न केवल अपनी निस्तारी और पेयजल जैसे समस्याओं का सामना कर सकते हैं, बल्कि ग्रामीणों के साथ-साथ पशुओं के लिए भी सुकुन एवं राहत का वातावरण बना सकते हैं।
गांव के रमेश कुमार और कमलेश यादव पुराने दौर के समय को याद करते हुए बताते है कि गांव से दो किलोमीटर दूर देबारी नाला में पहाड़ों का पानी साल भर आता था। हालांकि गर्मी के मौसम में नाले में पानी का स्तर कम होने के साथ सूखने के कगार पर भी पहुंच जाता है। उस समय तक नाले के बहते पानी का संग्रहण नहीं होने से गांव वालों को गर्मी के समय पानी के लिये जूझना पड़ता था। ऐसे में गांव के किसान समय लाल, गिरीश राठिया, शिरोमणी मंझुवारश्याम लाल, धरम सिंह अशोक सहित अन्य कई ग्रामीणों ने जल संग्रहण को लेकर कदम आगे बढ़ाया। इस काम में गांव की महिलाओं का भी योगदान था। सबने मिलकर देबीरा नाला से नहरनुमा रास्ता तैयार किया। मिट्टी को काटकर गांव से कुछ दूर पर बड़े गड्ढे तालाब बनाये गये। समय के साथ धीरे-धीरे अब यह तालाब पानी से लबालब हो गया।
गांव के अजय चौहान ने बताया कि तालाब में पानी साल भर रहता है। गर्मी के मौसम में इस तालाब से 200 से अधिक ग्रामीण नहाना-धोना करते है। गांव के मवेशी भी इस तालाब में पानी पीने आते है। कमलेश ने बताया कि बांधीमुड़ा तालाब को इस तरह से तैयार किया गया है कि पानी लबालब होने पर एक किनारे से बाहर बह सके। वृद्धा रामायण बाई ने बताया कि तालाब बनाने की मुहिम में उसने भी अपना योगदान दिया था। यह तालाब अब गांव के लिए एक संसाधन बन चुका है। तालाब में पानी रहने से आसपास के जल का स्तर बना रहता है।
मंजिले उनकों मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है। पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है। कुछ ऐसे ही हौसलों और साहस की धनी दोनों पैर से दिव्यांग ललिता राठिया आज अपने गांव और जिले में किसी के पहचान की मोहताज नही है। महिला समूह का अध्यक्ष होने के साथ-साथ अपने ग्राम पंचायत के 34 अन्य महिला समूहों को सक्रिय रखने में उनकी बड़ी भूमिका है।
छत्तीसगढ़ के कोरबा विकासखंड़ के आदिवासी बाहुल्य ग्राम चिर्रा की जनसंख्या लगभग 17 सौ है। यहां निवास करने वाली ललिता बचपन से ही दोनों पैर से दिव्यांग है। गरीब परिवार में रहकर भी ललिता ने बारहवी तक पढ़ाई कर ली और टेलरिंग का काम सीखकर सिलाई मशीन के सहारे गांव की महिलाओं, लड़कियों के कपड़े सिलकर अपना खर्च भी निकाल लेती है। वह यहां की चंद्रमुखी स्व-सहायता महिला समूह की अध्यक्ष है। ललिता की लगन और मेहनत का ही परिणाम है कि गांव में अन्य महिला एवं स्व सहायता समूह को मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल की महत्वाकांक्षी योजना ‘नरवा, गरूवा, घुरवा एवं बाड़ी‘ विकास योजना में काम करने का मौका मिला है। इस योजना से गांव में आर्थिक विकास और आत्मनिर्भरता की नींव रखी जा सकती है। इस बात को ललिता भली भांति समझती है, इसलिए वह कहती भी है कि ‘मुख्यमंत्री ने इस योजना की शुरूवात करके गांव को समृद्धि की राह में जो कदम उठाया है वह काबिल ए तारीफ है।‘
वर्तमान में ललिता अन्य महिलाओं को इस योजना के प्रति प्रेरित कर रही है। वह महिलाओं और गांव वालों को बताती है कि गांव में बन रहे आदर्श गौठान और चारागाह से किस प्रकार आने वाला कल बेहतर होगा। उसने पशु सखी के रूप में प्रशिक्षण भी लिया है। गौठान में गांव में इधर-उधर घूमने वाले गायों को पानी तथा छांव की व्यवस्था मिलेगी। इनकें गोबर से जैविक खाद भी तैयार होगा। चारागाह में ज्वार तथा नेपियर घास भी लगाई गई है। इसे खाने पर गाय अधिक मात्रा में दूध देती है। इस योजना से अनेक लोगों को रोजगार मिलेगा और आमदनी भी बढ़ेगी।
सिर्फ नरवा, गरूवा, घुरवा एवं बाड़ी विकास योजना में ही ललिता का योगदान नहीं है। वह आसपास के दर्जनों गांव की लड़कियों को सिलाई का प्रशिक्षण दे चुकी है। इससे इन गांव की लड़कियों को स्व-रोजगार मिला है। दोनों पैर से निःशक्त होने की वजह से ललिता इलेक्ट्रॉनिक सिलाई मशाीन का उपयोग करती है। ललिता के सहयोग से गांव की सरिता राठिया, रजन्ती, तारा, देवना, अनिता, शशी आदि ने जहां सिलाई सीखी, ईरा बाई, प्रमिला बाई, महतरीन, रायमोती, साधमती, दिलासो बाई, गिरधन, अंजू साहू सहित अन्य महिलाएं लिखना पढ़ना सीख चुकी है। ललिता ने महिला सशक्तिकरण के साथ असाक्षर महिलाओं को साक्षर बनाने में भी अपना योगदान दिया हैं।
कृषि वैज्ञानिकों ने प्रदेश के किसानों को खरीफ मौसम में खेती-किसानी से संबंधी आवश्यक सलाह दी है। खरीफ मौसम में जिन किसान भाइयों को फसलों की बुआई करना हो, वे उन्नत किस्म के प्रमाणित बीजों की व्यवस्था मानसून आने के पहले कर लेवें। किसान आवश्यकता के अनुसार अपनी खेतों की जोताई कर खरीफ फसलों की बुआई के लिए तैयारी करें। खेत की साफ-सफाई एवं मेड़ों की मरम्मत आवश्यक रूप से इस समय करें। खुर्रा बोनी में पंक्ती बोआई को प्राथमिकता देवें तथा बारिश होने पर ही बुआई करें। कम वर्षा की स्थिति में, कम अवधि में तैयार होने वाली धान की किस्में जैसे- दंतेश्वरी, सम्लेश्वरी, चन्द्रहासिनी, एम.टी.यू.-1010, सहभागी, इंदिरा बारानी आदि की बुआई करें। रोपा धान के खेत की मिट्टी की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए किसान भाई हरी खाद वाली फसलें जैसे- ढेंचा, सनई आदि की बुआई करें। एक एकड़ में बुआई के लिए 20 से 25 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती हैं। खरीफ की अन्य फसलंे मक्का, ज्वार, सोयाबीन, उड़द, मुंग, मूंगफल्ली एवं अरहर की बोनी कतारों में बारिश होने पर ही करें। अरहर के साथ उड़द, मुंग, सोयाबीन तथा तिल की सहफसली खेती लाभदायक है। ध्यान रहे की सभी फसलों के बीज प्रमाणित व उन्नत किस्म के हो तथा बोने से पहले उचित बीजोपचार अवश्य करें।
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने आज जांजगीर-चांपा जिले के विकासखण्ड नवागढ़ के ग्राम अमोरा में बनाए गए आदर्श गोठान का भ्रमण कर कोटना, पानी की व्यवस्था, शेड, चारागाह आदि का निरीक्षण किया। उन्होंने गायों की पूजा की और चारा भी खिलाया तथा गोठान परिसर में पीपल, जामुन, आम के पौधे रोपे। मुख्यमंत्री ने गोठान में लगे पुराने बरगद पेड़ के नीचे गोठान समिति के सदस्य, गांव के जनप्रनिनिधि व ग्रामीणों से गोठान प्रबंधन के संबंध में चर्चा की।
सीएम बघेल ने कहा कि गांव की समृद्धि की पहचान गायों से है। मवेशियों के होने से ही फसल उत्पादन में वृद्धि संभव है। गोठान में गायों के रहने से खेत में लगी फसल सुरक्षित रहेगी। इसके लिए खेत को घेरने की आवश्यकता नहीं होगी। गोठान में पानी, चारा, छांव आदि की व्यवस्था होने से मवेशी गोठान की ओर आकर्षित होंगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि गोठान में चरवाहों की नियुक्ति की जाएगी। जिसके लिए मानदेय की व्यवस्था भी गोठान की आमदनी से होगी। गायों के गोबर से वर्मी कम्पोस्ट खाद तैयार किया जाएगा। जैविक खेती के लिए इस खाद की विशेष मांग है। इसे अब किलो के भाव से बेचकर अधिक आमदनी ली जा सकेगी। इसके लिए युवाओं को प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने गरूवा, घुरवा, नरवा और बाड़ी के बेहतर प्रबंधन के लिए ग्रामीणों से सुझाव भी लिये और ग्रामीण महिलाओं को स्व-सहायता समिति के माध्यम से कार्य करने के लिए प्रेरित किया।
दही लूट के प्रसंग से बताया दूध का महत्व
मुख्यमंत्री ने दूध के महत्व को बताते हुए कहा कि दूध हमारे शरीर के लिए लाभदायक है। शरीर को सुपोषित करता है। दूध बेचकर किसान अतिरिक्त लाभ प्राप्त कर सकते हैं। उन्होंने कृष्ण लीला में माखन चोरी के प्रसंग की चर्चा भी की। उन्होंने ग्रामीणों को बताया कि राज्य से बाहर ले जा रहे माखन, दूध को रोकने के लिए भगवान कृष्ण ने माखन लूट की योजना बनाई थी। भगवान कृष्ण अपने राज्य के बच्चों को माखन व दूध देना चाहते थे। माखन, दही व दूध के बाहर ले जाने से उनके राज्य के बच्चे वंचित हो रहे थे। उन्होंने इस प्रसंग के साथ शराब जैसे दुर्व्यसन से दूर रहने की भी सलाह ग्रामीणों को दी।
जैविक खाद से बनी रहेगी भूमि की उर्वरता
मुख्यमंत्री ने ग्रामीणों को जैविक खाद का महत्व बताया। खाद मवेशियों के गोबर से ही स्थानीय स्तर पर तैयार हो जाता है। इससे जमीन की उर्वरता बढ़ती है। फसल में बीमारी कम होने से दवाइयों का खर्च भी कम होता है। रसायनिक खाद की तुलना में जैविक खाद सस्ता है। रासायनिक खाद के उपयोग से जमीन की उर्वरता कम होती है और फसलों में बीमारी भी अधिक होती है।
चारादान के लिए किया प्रेरित
मुख्यमंत्री ने किसानों से कहा कि फसल अपशिष्ट पैरा को खेत में जलाकर नष्ट न करें। पैरा को गोठान में दान करे। इससे गोठान में चारा की व्यवस्था हो जाएगी। पैरा को खेत में जलाने से भूमि की उर्वरा कम होती है और पर्यावरण के लिए भी नुकसानदायक है। गोठान में मवेशियों के लिए चारा भी उगाया जाएगा। इसके लिए शासकीय भूमि का चिन्हांकन किया जा रहा है।
गोठान भ्रमण के दौरान स्कूल शिक्षा और जिले के प्रभारी मंत्री डॉ प्रेमसाय सिंह टेकाम, चन्द्रपुर विधायक रामकुमार यादव, नवागढ़ जनपद के अध्यक्ष पुष्पेन्द्र प्रताप सिंह, ग्राम पंचायत सरपंच एव गोठान समिति के अध्यक्ष रामकृष्ण कश्यप, कलेक्टर जनक प्रसाद पाठक, पूर्व विधायक मोती लाल देवांगन, चुन्नीलाल साहू, जिला पंचायत के पूर्व सदस्य दिनेश शर्मा सहित ग्रामीण बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
नेताओं को कुर्सी से बहुत प्यार होता है, लेकिन जब वही कुर्सियां उन पर बरसने लगे तो सोचिए क्या नजारा होता होगा और नेता जी क्या हाल होगा. कैमरे में कैद गई इन तस्वीरों से आप कुर्सी से प्यार और उसी से पिटाई दोनों ही देख और समझ सकते हैं. ये तस्वीरे महाराष्ट्र के अमरावती इलाके में लोकसभा चुनावों में मिली हार पर हुई समीक्षा बैठक की है.
बैठक में बसपा के महाराष्ट्र प्रभारी की कार्यकर्ता ने जमकर पिटाई की, कपड़े भी फाड़ दिए. बहुजन समाज पार्टी के प्रदेश प्रभारी और महासचिव संदीप ताजणे की महाराष्ट्र के अमरावती मे स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ सर्किट हाऊस में आयोजित समीक्षा बैठक की.बैठक में कार्यकर्ता ने जमकर खबर ले ली.
तस्वीरों में दिख रहा है कि कैसे भरी बैठक में गुस्साए कार्यकर्ताओं ने वाशिम जिले के मूल निवासी ताजणे पर पैसे लेकर शेटिंग करने का खुल्लम-खुल्ला आरोप करते हुये पहले उनपर कुर्सिया फेंकी जो उनके चेहरे पर भी लगी. इतने से मन नहीं भरा तो जब वह बैठक छोड़कर जा रहा थे. उनपर टूट पड़े, पहले मारा और फिर कपड़े भी फाड़ दिए. इस पूरी समीक्षा बैठके के दौरान कार्यकर्ताओं का गुस्सा सांतवे आसमान पर था.
इसी बैठक में हिस्सा लेने इलाके के नगर सेवक चेतन पवार ने वहां पर मौजूद कार्यकर्ताओं को समझाने-बुझाने की अपने तरफ पूरी कोशिश, लेकिन जब लगा कि लोगों को समझाना मुश्किल और और ये अपने पर ही भारी पड़ने वाला है तो चेनत पवार अपने कुछ कार्यकर्ताओं के साथ मौके से निकलना ही सही समझा.
ये घटना रविवार यानि 17 जून की है. अब इस घटना के बाद हाईकमान को जो करना है कि वो तो वो करेगा, लेकिन इतना तो साबित हो ही गया कि अगर आप कार्रयकर्ताओं के गुस्से में आ गए तो फिर वो आपकी सारी नेतागिरी निकाल कर रख देंगे और चुनाव की तो समीक्षा होती रहेगा, लेकिन आप पर जो चोटे आएगी उसकी समीक्षा के लिए किसी डॉक्टर के पास जाना पड़ सकता हैं और डॉक्टर अपनी सुई- दवाई से आपके इलाज की समीक्ष जरूर से करेगा.
छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले की पुलिस ने एक बिस्किट कारखाने से 26 बाल मजदरों को मुक्त कराया है.
रायपुर जिले के पुलिस अधिकारियों ने बताया कि पुलिस, महिला एवं बाल विकास विभाग, श्रम विभाग, शिक्षा विभाग और सामाजिक संगठनों ने संयुक्त रूप से कार्रवाई कर आमासिविनी गांव में पारले-जी बिस्किट की उत्पादन इकाई से 26 बाल मजदूरों को मुक्त कराया गया. इन बच्चों को किशोर गृह भेज दिया गया है.
ये बच्चे छत्तीसगढ़ के अलावा पड़ोसी राज्यों झारखंड, उड़ीसा और मध्य प्रदेश के हैं. इनके परिजनों से भी संपर्क किया जा रहा है.
अधिकारियों ने बताया कि महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों की शिकायत पर कारखाने के मालिक के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया गया है.जांच जारी है.
उन्होंने बताया कि बच्चों की उम्र 13 से 17 वर्ष के हीच है. हालांकि उनकी उम्र के बारे में सही जानकारी उनके जन्म प्रमाण पत्र से ही मिल सकेगी.
जिले के बाल संरक्षण अधिकारी नवनीत स्वर्णकार ने बताया कि 12 जून को विश्व बाल श्रम विरोधी दिवस मनाया गया. इस दौरान रायपुर जिले के कलेक्टर के निर्देश पर विभिन्न स्थानों पर काम करने वाले बाल श्रमिकों को बचाने के लिए जिला कार्यबल का गठन किया गया था.
जिले में इस विषय पर जागरूकता फैलाने के लिए 10 जून से 15 जून तक अभियान चलाया गया. इस अभियान के दौरान छह दिनों में कारखानों और ढाबों समेत अन्य स्थानों पर काम करने वाले 51 बच्चों को मुक्त कराया गया.
सभी बच्चों को काउंसिलिंग के लिए बाल कल्याण समिति के सामने प्रस्तुत किया गया है.
बचपन बचाओ आंदोलन के राज्य समन्वयक संदीप कुमार राव ने बताया कि बच्चों से सुबह आठ बजे से रात आठ बजे तक काम कराया जाता था और इसके लिए उन्हें प्रतिमाह केवल पांच से सात हजार रुपये दिए जाते थे.
झारखंड चाइल्ड लाइन की टीम ने दस बाल श्रमिकों को मुक्त कराया
झारखंड के पाकुड़ चाइल्ड लाइन की टीम ने स्थानीय रेलवे स्टेशन परिसर से दस बाल मजदूरों को शनिवार को मुक्त कराया. इन बच्चों को दलाल दूसरे राज्यों में काम कराने के लिए ले जा रहे थे.
मुक्त कराए गए सभी बच्चे जिले के विभिन्न प्रखंडों के हैं जिनकी उम्र 12 से 16 वर्ष के बीच है.
बाल संरक्षण पदाधिकारी राजेश कुमार मंडल ने बताया कि मुक्त कराए गए सभी बच्चों को बाल कल्याण समिति के समक्ष ले जाया गया. बच्चों की काउंसलिंग के बाद उन्हें उनके परिजन को सौंप दिया गया.
उन्होंने बच्चों के परिजन से कहा कि वे इन बच्चों को कमाने के लिए भेजने की बजाय अपने-अपने प्रखंड कार्यालय ले जाकर बाल कल्याण के लिए सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी लेकर उनका भविष्य सुनिश्चित करें.
चाइल्ड लाइन की मोनिका सिंह ने बताया कि छुड़ाए गए बच्चों में से एक पाकुड़ प्रखंड का, हिरणपुर के चार और महेशपुर प्रखंड के पांच बच्चे शामिल हैं.
मालूम हो कि काउंसलिंग के दौरान इन बच्चों के परिजन ने बताया कि उन्होंने मजबूरी में अपने बच्चों को कमाने के लिए न्यू जलपाईगुड़ी, कोलकाता आदि जगहों के लिए भेजा था.
प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के तहत बांटी जाने वाली कई सस्ती दवाओं के 25 बैच मानकों के अनुरूप नहीं पाई गई हैं. इनमें मधुमेह, दर्द निवारक और हाइपरटेंशन जैसी बीमारियों की कई दवाइयां शामिल हैं.
देश की 18 फार्मा कंपनियों की दवाओं के 25 बैच गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे हैं. इन कंपनियों में 17 निजी क्षेत्र और एक सार्वजनिक क्षेत्र की है.
ब्यूरो ऑफ फार्मा पीएसयू ऑफ इंडिया (बीपीपीआई) ने जांच में पाया है कि जनवरी 2018 से इन 18 फार्मा कंपनियों की दवाओं के 25 बैच की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं थी.
बीपीपीआई सरकार की सस्ती दवाओं की प्रमुख योजना पीएमबीजेपी का क्रियान्वयन करता है. बीपीपीआई और आईडीपीएल दोनों केंद्र सरकार के औषध विभाग के तहत आती हैं.
बीपीपीआई द्वारा फार्मास्युटिकल कंपनियों से सस्ती जेनेरिक दवा खरीदी जाती है. उसके बाद इसकी आपूर्ति प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि परियोजना (पीएमबीजेपी) के तहत आने वाले विभिन्न जन औषधि केंद्रों को दी जाती है.
बीपीपीआई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सचिन सिंह ने इस बारे में एक सवाल पर कहा, ‘जिन आपूर्तिकर्ताओं के उत्पाद गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई है.’
सिंह ने ऐसी कंपनियों की सूची भी दी, जिन्हें प्रतिबंधित किया गया है या काली सूची में डाला गया है. इस सूची के अनुसार, बीपीपीआई ने खराब गुणवत्ता की दवाओं की आपूर्ति के लिए 7 कंपनियों को 2 साल के लिए काली सूची में डाला है.
अमर उजाला में छपी खबर के अनुसार, बीपीपीआई की रिपोर्ट के मुताबिक जो बैच मानक के अनुरूप नहीं पाए गए हैं, उनमें एएमआर फार्मा इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की मधुमेह-रोधी वोगिलबोस और हाईपरटेंशन की टेलमीसार्टन दवाओं का एक बैच शामिल है.
इसके अलावा नवकेतन फार्मा की दर्द-निवारक निमोसुलाइड और नेस्टर फार्मा पैरासिटामॉल के भी बैच मानक के अनुरूप नहीं मिले.
हेनुकेम लैबोरेट्रीज की एंटीबायोटिक सिप्रोफ्लोक्सेसिन और ओस्मेड फॉर्मूलेशन की हाईपरटेंशन के लिए एनालैप्रिल दवा का बैच मानक के अनुरूप नहीं मिला. मॉडर्न लैबोरेट्रीज, रावियन लाइफ साइंस, मैक्स केम फार्मास्युटिकल्स और थियॉन फार्मा की दवाएं भी मानक के मुताबिक नहीं मिली हैं. एसिडिटी के लिए दी जाने वाली आईडीपीएल की पैंटोप्रैजोल का एक बैच भी मानक पर खरा नहीं उतरा.
इसके अलावा बायोजेनेटिक्स ड्रग्स, विंग्स बायोटेक, जेनिथ ड्रग्स और क्वालिटी फार्मास्युटिकल्स की दवाएं भी सही नहीं मिलीं.
बीपीपीआई ने इस साल फरवरी में प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के तहत कुल 4677 जन औषधि केंद्रों के लिए 146 फार्मा कंपनियों से करार किया है. बीपीपीआई के सीईओ सचिन सिंह ने बताया, इन कंपनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी. अमानक दवाओं के इस्तेमाल पर तुरंत रोक लगा दी गई है.
ओवरसीज हेल्थ केयर, हनुकेम लैबोरेट्रीज, लीजेन हेल्थकेयर, एएमआर फार्मा इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, जैकसन लैबोरेट्रीज, मस्कट हेल्थ सीरीज और टैरेस फार्मास्युटिकल्स को दो साल के लिए काली सूची में डाला गया है.
लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की लगातार दूसरी जीत ने विपक्ष को पसोपेश में डाल दिया है. भाजपा को तीन सौ से ज्यादा सीटें और अकेले ही राष्ट्रीय स्तर पर सैंतीस (37) प्रतिशत मतों की प्राप्ति ने अविश्वास की भावना को बढ़ाया है.
ऐसे में विपक्षी खेमे के कई लोग ईवीएम के साथ छेड़खानी का आरोप लगा रहे हैं. चुनाव परिणामों के प्रति यह रवैया एक बहुत बड़ी भूल है.
यह बात सही है कि यह चुनाव मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के पांच वर्षों की नासमझ नीतिगत पहलों के बाद हुए. इनमें नोटबंदी और जल्दबाजी में लागू की गई जीएसटी जैसी आत्महंता नीतियां भी थीं, जिन्होंने छोटे व्यापारियों, किसानों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को काफी कष्ट पहुंचाया.
हालिया प्रकाशित सरकारी आंकड़ों ने इसे प्रमाणित किया है कि बेरोजगारी दर अभी छह प्रतिशत से भी अधिक है, जो कि चार दशकों में सर्वाधिक है. नवंबर-दिसंबर, 2018 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार ने बिगड़ते आर्थिक हालात के कारण लोगों में व्याप्त असंतोष का संकेत दिया था.
लेकिन लोकसभा चुनाव परिणाम यह बताते हैं कि तात्कालिक आर्थिक स्थितियां परिणामों को निर्धारित करनेवाला एकमात्र कारक नहीं होतीं, लोग अपने निर्णय उपलब्ध विकल्पों के आधार पर तय करते हैं.
विपक्ष को पूरी विनम्रता के साथ यह स्वीकार करना चाहिए कि राष्ट्रीय स्तर पर वे सामूहिक रूप से एक बेहतर, सुसंगत और प्रेरणादायक विकल्प देने में असमर्थ रहे हैं.
न तो विपक्ष के पास कोई वैकल्पिक सामान्य कार्यक्रम था, न ही पारदर्शिता के साथ चयनित नेतृत्व वाला एक प्रभावशाली राष्ट्रीय स्तर का गठबंधन, जो भाजपा के अद्भुत प्रोपेगैंडा और सांगठनिक मशीनरी के सामने कोई विश्वसनीय चुनौती पेश करता.
सेकुलर दलों की ज्यादातर मेहनत भाजपानीत एनडीए के खिलाफ संगठित संघर्ष खड़ा करने की जगह आपस में लड़ने में ही बर्बाद हुई. एक संगठित विपक्ष जैसा मोर्चा मोदी राज की अतिवादिता के खिलाफ जन-संघर्षों और आंदोलनों के माध्यम से बनाया जा सकता था, जो लगभग नदारद रहा.
चुनाव से पहले विपक्ष अगर कुछ देने की हालत में था, तो वह था त्रिशंकु लोकसभा, जिसे मतदाताओं ने स्पष्ट तौर पर नकार दिया. अब सभी सेकुलर दलों को गंभीरता से आत्मालोचन करना चाहिए और इस संदर्भ में सुधारवादी कदम उठाना चाहिए.
यह बात सीपीएम के नेतृत्ववाले वाम मोर्चे पर विशेष रूप से लागू होती है, जिसने आजादी के बाद अब तक का अपना सबसे खराब चुनावी प्रदर्शन किया है. इसके साथ ही पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे उसके अपने गढ़ों में भी उसे भारी नुकसान हुआ है.
बिखरा विपक्ष
कांग्रेस, सपा, बसपा, तृणमूल कांग्रेस, राजद, एनसीपी, जेडीएस जैसे सेकुलर विपक्षी दल गंभीर वैचारिक और राजनीतिक संकट का सामना कर रहे हैं.
सेकुलरिज्म, जिसका नेहरूवादी संदर्भों में यह अर्थ था कि राज्य के मामलों और राजनीति में धर्म का घालमेल नहीं करना चाहिए, अब नकारात्मक ढंग से परिवर्तित होकर राजनीतिक प्रक्रिया का अंग बन गया है. और लोग खुलेआम अपनी अवसरवादी राजनीतिक जरूरतों के लिए धार्मिक भावनाओं का दुरुपयोग कर रहे हैं.
‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ और ‘अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’ के बीच सेकुलर दलों के भटकाव ने यह दिखा दिया है कि उनमें सेकुलर मूल्यों के प्रति कोई भी गहरी प्रतिबद्धता नहीं है.
इस बीच मॉब लिंचिंग, गोरक्षा के नाम पर हो रही गुंडागर्दी, असम में एनआरसी और नागरिकता संशोधन बिल, अयोध्या विवाद, ट्रिपल तलाक और ऐसे ही कई अन्य मुद्दों पर संवैधानिक मूल्यों पर आधारित एक स्पष्ट और पारदर्शी कदम उठाने और नीति-निर्धारण में सेकुलर दलों की असमर्थता ने जनता के एक बड़े हिस्से के बीच सेकुलरिज्म की पूरी अवधारणा को धूमिल करने में आरएसएस-भाजपा की मदद ही की है.
इसी तरह सामाजिक न्याय की राजनीति के वाहकों ने डॉ आंबेडकर के जाति-व्यवस्था उन्मूलन के महान उद्देश्य को जातियों और उप-जातियों पर आधारित वोट-बैंक की कुरूप राजनीति में रूपांतरित कर दिया है.
आज भाजपा-एनडीए ने जाति-आधारित सोशल इंजीनियरिंग की कला में महारत हासिल कर ली है. हिंदी प्रदेश में अन्य पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जातियों की अप्रभावी जातियों के बीच पहुंच कर और उन्हें हिंदुत्व की बड़ी छतरी के नीचे समायोजित कर तथा अधिक प्रतिनिधित्व देकर सपा, बसपा, राजद जैसे विभिन्न दलों को इस खेल में पीछे छोड़ दिया है.
सामान्य श्रेणी में आर्थिक रूप से कमजोर तबके को आरक्षण देने के कानून ने भी भाजपा को अगड़ी जातियों के वोटों को संगठित करने में सहायता पहुंचाई. उत्तर-पूर्व समेत देशभर में जनजाति समुदायों के बीच आरएसएस की लंबे समय से चल रही गतिविधियों ने प्रगतिशील ताकतों को हाशिये पर धकेल दिया है.
सामाजिक न्याय की राजनीति की बड़ी विफलता अस्मितावादी विशिष्ट मांगों से आगे बढ़कर उस व्यापक परिवर्तनकामी और समन्वयकारी एजेंडे तक न पहुंच पाने में है, जो कि गंभीर वर्गीय शोषण के साथ जातिऔर लिंग आधारित शोषण की सदियों पुरानी दमनकारी संरचनाओं का विध्वंस कर उन्हें मिटा सकती है.
राजनीतिक उदारवाद और आर्थिक-नवउदारवाद का वैचारिक गठजोड़, जो कि उत्तर-उदारवादी भारत की मुख्यधारा के सभी दलों की सहमतिपूर्ण राजनीति-आर्थिक संरचना बन चुका है, अब अभिजात्यवाद, क्रोनी पूंजीवाद और परिवारवादी राजनीति से पहचाना जा रहा है.
यह सच्चाई सिर्फ भारत की नहीं है, बल्कि ऐसी ही प्रवृत्ति 2008-09 के वैश्विक आर्थिक संकटऔर महामंदी के बाद से पूरी दुनिया में दिखाई दे रही है.
अतिवादी-दक्षिणपंथी ताकतों का उद्भव और मुख्यधारा में सम्मिलन तथा ट्रंप (अमेरिका), फराज (इंग्लैंड), ले पेन (फ्रांस), बोल्सोनारो (ब्राजील), एर्डोआं (तुर्की), नेतन्याहू (इजरायल) आदि के द्वारा उसका महिमामंडन नवउदारवादी पूंजीवादी संकट की सीधी प्रतिक्रिया है, जिसने बेरोजगारी तथा आय और संपत्ति की असमानताओं को ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंचा दिया है.
वैश्विक स्तर पर इस संकट के प्रति वाम और/या उदारवादी खेमे की तुलना में दक्षिणपंथी प्रतिक्रियावादियों ने वित्त, बिग डेटा विश्लेषण और सोशल मीडिया से संचालित आक्रामक घृणावादी राजनीति, नस्लवाद, अप्रवासियों के खिलाफ उन्माद और इस्लामोफोबिया के साथ कहीं अधिक जोर-शोर से प्रतिक्रिया व्यक्त की है.
इस्लामिक दुनिया में अनुदार और रूढ़िवादी नेतृत्व के निरंतर दबदबे के साथ जिहादी आतंकवाद की बढ़त ने इस अतिदक्षिणपंथी उत्थान को अवसर प्रदान किया है. रूस और चीन का निरंकुश शासन अभी तक इस पतनशील प्रवृत्ति का समर्थक ही रहा है.
घृणा की राजनीति के इस विकास के साथ ऐसा प्रतीत हो रहा है कि हम गहरे वैश्विक टकरावों और युद्धों की ओर बढ़ रहे हैं, जिसके साथ हर देश के आमजन में असुरक्षा की भावना बड़े पैमाने पर बढ़ रही है और इसका परिणाम उनमें ऐसे ‘ताकतवर नेताओं’ की आकांक्षा के रूप में हो रहा है, जो कि ‘बाहरियों’ से उनकी रक्षा कर सकें.
यही वह वैश्विक परिवेश है जिसमें मोदी के नेतृत्व में आरएसएस-भाजपा हिंदुत्व के नाम पर उग्र और अंध राष्ट्रवाद तथा महाशक्ति बनने की आकांक्षा को बेच पा रही है. पाकिस्तानी शासन द्वारा समर्थित और उकसाए गए आतंकी हमलों ने, जैसे कि फरवरी, 2019 का पुलवामा हमला, भाजपा के आक्रामक रवैये को तर्कसंगत ठहराने और लोकप्रिय बनाने में सहयोग किया है.
दंगों, गाय के नाम पर भय कायम करना और मॉब लिंचिंग पर आधारित स्थानीय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण; कश्मीर घाटी में भारी दमन, एनआरसी जैसा शरणार्थी-विरोधी उपक्रम और विभाजनकारी नागरिकता संशोधन बिल, सभी ने बहुसंख्यक आख्यान को आगे बढ़ाने का कार्य किया है.
दुखद है कि दुनिया के अधिकांश हिस्सों की तरह, हिंदुस्तान में भी विपक्ष ने इस आक्रामक अति-दक्षिणपंथी तेवर के खिलाफ बहुत ही नरम रुख अपनाए रखा.
पुलवामा आतंकी हमले और बालाकोट हवाई हमले के मसले पर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का रवैया ध्यान देने लायक है, जहां आतंकियों के मारे जाने के बारे में साफ तौर पर झूठे और अतिरंजित दावों को बिना किसी चुनौती के ही प्रचारित होने दिया गया, साथ ही इस गंभीर सुरक्षात्मक चूक और परिवर्जनीय सैन्य क्षति के लिए जिम्मेदार सुरक्षा प्रशासन पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया गया.
गांधी की हत्या को जायज ठहरानेवाली आतंकी हमले की आरोपी भाजपा प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर की भोपाल में जीत, विपक्षी खेमे की कमजोरी का एक और उदाहरण है कि किस तरह वह आरएसएस-भाजपा की विचारधारा और राजनीति से लड़ने में असफल रही है.
आज की जरूरत है कि संवैधानिक मूल्यों के साथ जमीनी स्तर के प्रयास कर आम लोगों के विश्वास को फिर से जीता जाए.
वाम का पतन
माकपा के नेतृत्ववाले वाम दलों ने आरएसएस-भाजपा की आक्रामकता का सामना करने में खुद को भारत की सभी बड़ी राजनीतिक ताकतों में सबसे कम सक्षम साबित किया है. वाम का पतन दस साल पहले 2009 के लोकसभा चुनावों से आरंभ हो चुका था.
वर्ष 2015 में शीर्ष नेतृत्व में परिवर्तन के बावजूद इस पतनशीलता को पिछले दस वर्षों में रोकने में असफल रहने का परिणाम अब चुनावों में सबसे खराब प्रदर्शन के रूप में दिखाई दे रहा है, जहां माकपा और भाकपा का संयुक्त राष्ट्रीय वोट शेयर 2.3 प्रतिशत तक घट गया है. (सूची देखें)
लोकसभा में वामपंथी दलों की ताकत 2014 के 12 से घटकर इस बार पांच पर पहुंच गई है. इन पांच सीटों में माकपा और भाकपा ने दो-दो सीटें तमिलनाडु में द्रमुकनीत सेकुलर गठबंधन के घटक के रूप में जीते हैं.
केरल में माकपानीत एलडीएफ सिर्फ एक सीट जीत सकी, वहीं कांग्रेसनीत यूडीएफ ने 19 सीटें जीती हैं, फिर भी सबरीमाला विवाद के बावजूद वहां वाम ने जनाधार में भारी गिरावट नहीं देखी.
हालांकि 2018 में भाजपा से त्रिपुरा में चुनावों में मिली हार के बाद वाम मोर्चे के जनाधार में भारी कमी आई है और इस बार वाम मोर्चे के प्रत्याशी भाजपा और कांग्रेस के बाद तीसरे पायदान पर पहुंच गए हैं.
सबसे चिंताजनक है पश्चिम बंगाल में वाम की स्थिति, जहां 40 वाम मोर्चा प्रत्याशी तीसरे और चौथे पायदान पर पहुंच गए और एक को छोड़कर सबकी जमानत भी जब्त हो गई.
पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे का वोट शेयर 2014 के 31 प्रतिशत से घटकर 2016 में 26 प्रतिशत तक पहुंच गया था (कांग्रेस के साथ गठबंधन में रहते हुए) और 2019 में अब वह 7.5 प्रतिशत तक रह गया है. भाजपा का वोट शेयर 2014 के 17 प्रतिशत से 2016 में 10 प्रतिशत तक पहुंचा और फिर 2019 में वह 40 प्रतिशत से भी अधिक हो गया.
2014 में तृणमूल (टीएमसी) का वोट शेयर 40 प्रतिशत था, जो 2016 में 45 प्रतिशत और फिर 2019 में 43 प्रतिशत हो गया. कांग्रेस 2014 के 10 प्रतिशत और 2016 के 12 प्रतिशत से घटकर 2019 में पांच प्रतिशत पर आ गई है.
यह स्पष्ट है कि बंगाल में भाजपा का वोट शेयर जिस अभूतपूर्व ढंग से बढ़ा है, वह मुख्यतः वाम मोर्चे की कीमत पर हुआ है और पूरे राज्य में वाम के समर्थक और कार्यकर्ता बड़ी संख्या में भाजपा के पाले में चले गए हैं.
टीएमसी का भी एक हिस्सा भाजपा की तरफ हो गया है, जिसके कारण उसे दक्षिण बंगाल में नुकसान झेलना पड़ा, लेकिन वाम मोर्चा और कांग्रेस का एक और तबका, विशेषकर केंद्रीय और उत्तरी बंगाल में टीएमसी की ओर झुका है, जिसके कारण राज्य स्तर पर टीएमसी के मतों की कुल हिस्सेदारी में ज्यादा गिरावट नहीं आई है.
पिछले दो वर्षों में लगातार हो रहे सांप्रदायिक दंगों और मुख्यमंत्री की गैर-सेकुलर, लोकतंत्र विरोधी और गैर-जिम्मेदाराना राजनीति के कारण राज्य में बढ़ते सांप्रदायिक ध्रुवीकरण ने निश्चित रूप से भाजपा के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
लेकिन सबसे बड़े वामपंथी दल के रूप में माकपा और इसके नेतृत्व को वाम के इस पतन और अपनी ही कीमत पर भाजपा के उदय की लांछना का अधिकांश भार वहन करना चाहिए. बदकिस्मती से माकपा नेतृत्व अभी भी अपने जनाधार की गिरावट का ठीकरा पश्चिम बंगाल में टीएमसी सरकार और त्रिपुरा में भाजपा की सरकार के कठोर दमन के ऊपर फोड़ रहा है.
यहां इस प्रश्न को छोड़ दिया गया है कि क्यों वे 1970 के दशक में पश्चिम बंगाल में और 1980 के आखिरी वर्षों में त्रिपुरा में जिस तरह राज्य के दमन के विरुद्ध अपने कार्यकर्ताओं और काडरों के पक्ष में खड़े थे, वैसे अभी क्यों नहीं हो सके?
अगर वे राज्य के दमन के खिलाफ खड़े थे, तो पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा की जनता ने उनको समर्थन देना क्यों बंद कर दिया? असल में यह एक झूठा आधार है क्योंकि बंगाल में भाजपा और त्रिपुरा में कांग्रेस की बढ़ोत्तरी अगर हुई भी है, तो उन्हीं परिस्थितियों का सामना करते हुए ऐसा हुआ है, जैसा कि माकपा के नेतृत्व में वाम मोर्चा ने कभी किया था.
माकपा नेतृत्व के राज्य द्वारा दमन के इस शोरगुल के पीछे लगातार मुंह फेर लेने की प्रवृत्ति और दंभी रवैया है. चुनावों में मिली हार के बाद गंभीर आत्मालोचन और सुधार करने की बजाय इसे लोगों द्वारा की गई भूल कहकर समझाया जाता है.
जनता के आदेश के प्रति यह तिरस्कार भाव ही वाम के पतन का मूल कारण है. नेतृत्व बहुत सहजता से अपनी गलतियों और असफलताओं की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर देता है.
माकपा के नेतृत्व में वाम दल आज एक अनुपयोगी विचारधारात्मक संरचना, एक विकृत राजनीतिक समझ और एक निष्क्रिय संगठन के बीच फंस चुके हैं, जो उन्हें विनाश की ओर ले जा रहा है. व्यापक तौर पर किए गए विचारधारात्मक, राजनीतिक और संगठनात्मक आमूल परिवर्तन के बिना वाम की वापसी असंभव है.
वाम दलों को अपने कार्यक्रम में सोवियत संघ और चीन के कम्युनिस्ट पार्टी की बीसवीं सदी की रूढ़िवादिता को छोड़ना होगा और नए वाम के लोकतांत्रिक समाजवादी कार्यक्रम को बिना किसी झिझक के अपनाना होगा, जो लैटिन अमेरिका से यूरोप और अमेरिका तक में नवउदारवादी पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष करते हुए उभरा है.
राजनीतिक तौर पर वाम को इस वर्षों पुराने विवाद पर समय व्यर्थ करना बंद करना होगा कि उन्हें कांग्रेस के साथ जाना चाहिए या नहीं.
यह विवाद अब एक मजाक में बदल चुका है, खासकर 2016 में पश्चिम बंगाल की हार के बाद, जहां कांग्रेस ने सबसे बड़े विरोधी दल के रूप में वाम मोर्चे को स्थानांतरित कर दिया और 2019 में जहां वाम मोर्चा के समर्थन ने बंगाल में किसी पारस्परिक आदान-प्रदान के बिना ही दो सीटों पर कांग्रेस की जीत सुनिश्चित कर दी.
ऐसे सिद्धांतहीन और अपारदर्शी गठबंधन वाम की समस्याओं का कोई हल नहीं निकाल सकते. असल में वाम को ‘लोकतांत्रिक केंद्रवाद’ के अपने सिद्धांत को त्याग देने के बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए, जो बस एक असफल और बूढ़े नेतृत्व को ही आगे बढ़ाता है और समय के अनुरूप पुनर्गठन को रोक देता है.
वाम को लोकप्रिय मंचों और व्यापक चुनावी मोर्चों के प्रति एक खुला रुख अपनाना पड़ेगा ताकि युवा उत्साह, नए विचारों और नेतृत्व को यहआकर्षित कर सके. पश्चिम बंगाल में, जहां वाम ने लगभग तीन दशक तक शासन किया, उसके पतन का मुख्य कारण उसके सरकार की कई असफलताओं और गलतियों में है.
कृषि, औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन, भूमि अधिग्रहण, भूमि उपयोग, संसाधनों का संचय और वितरण, सहकारी संगठनों आदि के संदर्भ में वाम सरकारों की नीतियों और कार्यक्रमों के पूरे ढांचे को ही बदलने की जरूरत है.
संवहनीय विकास, विकेंद्रीकृत लोकतंत्र, शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही, लैंगिक और सामाजिक न्याय, अल्पसंख्यकों, दलितों और आदिवासियों के अधिकार, पर्यावरण की सुरक्षा को लेकर भी अतीत के अनुभवों के आलोक में वाम को गंभीर पुनर्विचार करने की जरूरत है.
वामपंथ के कार्यक्रम के बारे में ऐसी पुनर्कल्पना के बिना चुनावी रणनीति के बारे में खोखले वाद-विवाद कोई भी दिशा नहीं दे पाएंगे. वाम के पतन का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव आजीविका के मुद्दों पर गंभीर संघर्षों और आंदोलनों की अनुपस्थिति के रूप में देखा जा सकता है, जो आरएसएस-भाजपा के वर्ग-जाति गणित को उलट सकता है.
राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चे कायम करने के प्रयास ने सिर्फ छिटपुट और मुख्यतः सांकेतिक लामबंदियां दिखाई हैं. राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में जरूर कुछ अपवाद रहे हैं, लेकिन किसान संघर्षों के सीमित प्रभाव को विधानसभा चुनाव के रुझान को लोकसभा चुनाव में पलट जाने में देखा जा सकता है.
विश्वविद्यालय परिसरों में छात्रों और शिक्षकों ने गंभीर प्रतिरोधी आंदोलन खड़े किए हैं, लेकिन अभी तक वे रक्षात्मक लड़ाइयां ही रहीं हैं, जिनका स्तर और प्रभाव सीमित रहा है. मोदी राज में अधिकतर क्षेत्रों में जो व्यापक परिवर्तन हुए हैं, उनकी पृष्ठभूमि में सिर्फ किसान और छात्र आंदोलनों से कुछ नहीं होगा.
बेगूसराय में भाकपा प्रत्याशी कन्हैया कुमार का प्रचार भी भाजपा को हरा नहीं सका. इसका एक कारण राजद द्वारा सेकुलर मतों का विभाजन रहा. हालांकि इस अभियान ने रचनात्मक रणनीतियों को जन्म दिया और विभिन्न दायरों से लोगों को शामिल कर सका, विशेषकर इसने जातियों और समुदायों के बंधनों से ऊपर उठकर युवाओं को जोड़ा.
यह इसलिए संभव हो सका क्योंकि कन्हैया कुमार ने वाम राजनीति को नई शब्दावली में पेश किया, जो अतीत के बोझ से मुक्त और एक ऐसे नए चेहरे से युक्त थी, जो एक लोकतांत्रिक आंदोलन से उभरा था. यह उम्मीद की एक किरण दिखाती है.
जमीनी आंदोलनों का पुनर्गठन
वाम के पास मोदी राज के खिलाफ फिर से जनांदोलनों को खड़ा करने के सिवा कोई विकल्प नहीं है. इस बार उसे नई संकल्पशक्ति को दिखाना होगा और अतीत की भूलों से बचना होगा.
आंदोलनात्मक उपक्रमों की व्यापक विचारधारात्मक संरचना पूरी ईमानदारी से सेकुलर होनी चाहिए यानी राजनीति का धर्म से कोई घालमेल न हो और संवैधानिक मूल्यों, संघवाद, मानव अधिकारों तथा लोकतांत्रिक समाजवाद की रक्षा की जानी चाहिए.
भारतीय संदर्भों में मार्क्सवाद को आंबेडकर, गांधी, टैगोर, पेरियार और ऐसे ही अन्य प्रगतिशील भारतीय विचारकों के विचारों से समन्वित करने की आवश्यकता है.
वाम दलों और प्रगतिशील संगठनों के राष्ट्रीय स्तर के मंचों, जो लुटियन्स दिल्ली तक ही सीमित रह जाते हैं, को तैयार करने के बजाय राज्य स्तर के आंदोलनात्मक मोर्चों के निर्माण पर जोर दिया जाना चाहिए, जो आजीविका के मुद्दों और श्रमजीवी लोगों के सामाजिक-आर्थिक अधिकारों पर आधारित हों.
ऐसे राज्य-आधारित आंदोलन राष्ट्रीय स्तर के प्रगतिशील विकल्प का निर्माण कर सकते हैं, लेकिन यह तभी होगा जब वे राज्य स्तर पर काफी गति हासिल कर चुके हों और उन्हें व्यापक जन समर्थन अर्जित हो चुका हो.
इन आंदोलनात्मक मंचों से निकले चुनावी मोर्चे निस्संदेह अधिक प्रामाणिक होंगे. वर्तमान वाम और सेकुलर दल अवश्य ही ऐसे सामान्य मंचों के हिस्से हो सकते हैं, लेकिन उसके साथ-साथ जमीनी स्तर पर कार्यरत नई ताकतों को इसमें शामिल करने और नेतृत्व में नए चेहरों को प्रमुखता देने से कतई मुंह नहीं मोड़ा जा सकता.
एक ताकतवर स्थानीय संदर्भ के साथ जमीन से चुनावी संगठन का निर्माण करना और आंदोलन खड़े करना आज की आवश्यकता है.
‘हिन्दी-हिंदू-हिंदुस्तान’ के नारे के साथ लोकप्रिय बनाए गए आरएसएस-भाजपा के ‘एक राष्ट्र-एक जन-एक संस्कृति’ की संरचना को आज चुनौती देने की जरूरत है, जिससे विभिन्न भारतीय राष्ट्रीयताओं की अलग-अलग भाषिक और सांस्कृतिक अस्मिताओं का समर्थन कर हासिल किया जा सकता है. इन राष्ट्रीयताओं की अनेकता में एकता ही व्यापक भारतीय राष्ट्रीयता को परिभाषित करती है.
सूचना के अधिकार (आरटीआई) से खुलासा हुआ है कि सियासी दलों को चंदा देने के लिए एक मार्च 2018 से शुरू की गई योजना के 10 चरणों के दौरान कुल 5,851.41 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड खरीदे गए.
चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से करीब 76 प्रतिशत बॉन्ड, इनकी बिक्री के आखिरी तीन चरणों में खरीदे गए, जब लोकसभा चुनावों की सरगर्मियां चरम पर थीं.
मध्यप्रदेश के नीमच निवासी सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़ ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) से दो आरटीआई अर्जियों के जरिए मिले आंकड़ों के हवाले से रविवार को यह जानकारी साझा की.
उन्होंने बताया कि उनकी एक आरटीआई अर्जी से पता चला कि गुमनाम चंदादाताओं ने सार्वजनिक क्षेत्र के इस सबसे बड़े बैंक की विभिन्न अधिकृत शाखाओं के जरिए एक मार्च 2018 से 24 जनवरी 2019 के बीच शुरूआती सात चरणों में कुल 1,407.09 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड खरीदे.
गौड़ ने जब एक मार्च से 10 मई 2019 तक आठवें, नौवें और दसवें चरणों में चुनावी बॉन्ड की बिक्री को लेकर एसबीआई के सामने एक और आरटीआई अर्जी दायर की, तो इसके जवाब में सूचना दी गई कि आखिरी के इन तीनों चरणों में कुल 4,444.32 करोड़ रुपये के चुनावी बॉन्ड खरीदे गए.
गौरतलब है कि सरकार ने देश भर में एसबीआई की विभिन्न अधिकृत शाखाओं के जरिए अलग-अलग अवधि के कुल 10 चरणों में एक मार्च 2018 से 10 मई 2019 तक चुनावी बॉन्ड बेचने का कार्यक्रम तय किया था. ये बॉन्ड एक हजार रुपये, दस हजार रुपये, एक लाख रुपये, दस लाख रुपये और एक करोड़ रुपये के मूल्य वर्गों में बिक्री के लिए जारी किए गए थे.
निर्वाचन आयोग द्वारा लोकसभा चुनावों की 10 मार्च को घोषणा किए जाते ही देश भर में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई थी. इन चुनावों का सात चरणों का मतदान 11 अप्रैल से शुरू होकर 19 मई को खत्म हुआ, जबकि वोटों की गिनती 23 मई को की गई थी.
केंद्र सरकार ने चुनावी बॉन्ड बिक्री के दसवें चरण के लिए हालांकि पूर्व में छह मई से 15 मई 2019 की अवधि की घोषणा की थी. लेकिन बाद में इस मियाद में पांच दिन की कटौती कर इसे छह मई से 10 मई 2019 कर दिया गया था.
केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2018 में अधिसूचित चुनावी बॉन्ड योजना को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गई है.
कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों के अपने घोषणा पत्र में कहा था कि वह सत्ता में आने पर निर्वाचन प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए चुनावी बॉन्ड योजना खत्म करेगी और इसके स्थान पर एक राष्ट्रीय चुनाव कोष स्थापित करेगी.
मिर्जापुर. यहां एक रिटायर इंस्पेक्टर दिलावर हुसैन सिद्दीकी ने अपने बेटी की मौत के बाद उसकी लाश को एक माह तक घर में छिपाए रखा. सिद्दीकी को उम्मीद थी कि उनकी बेटी जिन्नत सिद्दीकी (30) एक न एक दिन जिंदा हो जाएगी. लाश की बदबू से जब पूरा मोहल्ला परेशान हो गया तब मामले की परतें खुलीं. ये घटना कटरा कोतवाली के हथिया फाटक इलाके की है. इलाके में रिटायर इंस्पेक्टर दिलावर सिद्दीकी अपनी पत्नी और लड़की के साथ रहते थे. 20 दिन पहले इस घर से बदबू आने की जानकारी स्थानीय लोगों ने पुलिस को दी.
लेकिन पुलिस बैरंग वापस लौट गई. आज फिर घर से तेज बदबू की शिकायत स्थानीय लोगों ने कटरा कोतवाली पुलिस को दी, जिसके बाद मौके पर कटरा कोतवाल मनोज सिंह दल बल के साथ पहुंचे. पुलिस के आने पर जिन्नत के भाइयों ने स्वीकार किया कि घर में उनकी बहन की लाश है. ये लाश कमरे के फर्श पर पड़ी थी और कई अंग पूरी तरह से गल चुके थे, सिर्फ हड्डियों ही बची हुई थी. रिटायर इंस्पेक्टर और उनकी पत्नी दोनों अर्धविक्षिप्त हैं जबकि लड़की भी विक्षिप्त थी.