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CSIR UGC NET का एडमिट कार्ड हुआ जारी, इस डायरेक्ट लिंक से करें Hall Ticket बुक

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राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) ने CSIR UGC NET जुलाई 2025 परीक्षा के एडमिट कार्ड जारी कर दिए हैं. इस परीक्षा में शामिल होने वाले छात्र अब आधिकारिक वेबसाइट csirnet.nta.ac.in से अपने हॉल टिकट डाउनलोड कर सकते हैं. आपको बता दें कि सभी विषयों के लिए परीक्षा 28 जुलाई, 2025 को आयोजित की जाएगी.

बता दें कि CSIR UGC NET परीक्षा यह तय करने के लिए आयोजित की जाती है कि कौन जूनियर रिसर्च फेलोशिप (JRF) के लिए या भारतीय विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में विज्ञान विषयों में सहायक प्रोफेसर बनने के लिए योग्य है.

स्टूडेंट्स के लिए ये 12 websites हैं बहुत काम की, भाषा सीखने से लेकर नोट्स तक कर सकते हैं तैयार….

कैसे करें CSIR NET एडमिट कार्ड डाउनलोड
csirnet.nta.ac.in पर जाएं
अब आप “CSIR UGC NET July 2025 Admit Card” लिंक पर क्लिक करें
यहां अपना एप्लिकेशन नंबर, date of birth और Security pin की डिटेल भरिए.
अब आप डिटेल सबमिट करिए.
आपका एडमिट कार्ड स्क्रीन पर दिखाई देगा – इसे डाउनलोड करें और प्रिंट निकाल लीजिए.
सीएसआईआर नेट एडमिट कार्ड 2025 डाउनलोड करने का डायरेक्ट लिंक यहां है.. https://csirnet.ntaonline.in/admitcard/index

दृश्‍यम’ स्‍टाइल में पति का मर्डर कर शव टाइल्स के नीचे छिपाने वाली पत्नी पकड़ी गई, प्रेमी भी गिरफ्तार

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मुंबई से सटे पालघर जिले के नालासोपारा में एक महिला पर प्रेमी संग मिलकर फिल्‍म ‘दृश्‍यम’ के स्‍टाइल में अपने पति का मर्डर करने (Nalasopara Murder) का आरोप लगा था. आरोप के मुताबिक, उसने घर में पति के शव को गाड़कर ऊपर से टाइल्‍स बिछा दी थीं और खुद प्रेमी संग फरार हो गई थी. पुलिस ने आरोपी पत्नी कोमल देवी और उसके प्रेमी मोनू को मंगलवार रात गिरफ्तार कर लिया. हत्या के बाद से दोनों फरार चल रहे थे.

पति का मर्डर करने वाली पत्नी गिरफ्तार
पकड़े गए दोनों आरोपियों को बुधवार को वसई कोर्ट में पेश किया जाएगा. मृतक विजय के छोटे भाई अखिलेश ने दावा किया है कि कोमल देवी विजय का बच्चा भी अपने साथ ले गई थी. उसी बच्चे ने उसे बताया कि उसकी मां अपने प्रेमी मोनू संग पहले कलम बीच गई थी. वहां पर वह एक दिन रही इसके बाद वे पुणे के लिए निकल गए. दावा यह भी किया गया है पुणे में मोनू और कोमल एक किराये के घर में रह रहे थे.

पति की हत्या कर टाइल्स के नीचे दफनाया
बता दें कि मंबई से सटे नालासोपारा पूर्व के गडगापाड़ा इलाके में रहे वाले विजय चव्हाण पिछले 17 दिन पहले लापता हो गए थे. विजय के दोनों भाई उन्‍हें ढूंढने में जुटे हुए थे. चार दिन पहले विजय की पत्नी कोमल चव्हाण भी लापता हो गई थी. पुलिस के मुताबिक, पड़ोस में रहने वाला मोनू शर्मा भी लापता था. इस बीच खुलासा हुआ कि कोमल और मोनू के बीच प्रेम संबंध थे.

पैदा होते ही गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ इस बच्चे का नाम, महज 21 हफ्तों में हुआ जन्म,

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पिछले साल जुलाई में संयुक्त राज्य अमेरिका में केवल 21 सप्ताह के गर्भ के बाद जन्में नन्हे बच्चे ने आधिकारिक तौर पर दुनिया के सबसे समयपूर्व जन्मे बच्चे यानी वर्ल्ड मोस्ट प्रीमेच्य़ोर बेबी का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड (GWR) के अनुसार, नैश कीन (Nash Keen) का जन्म 5 जुलाई, 2024 को आयोवा सिटी, आयोवा में हुआ था. जन्म के समय उसका वजन केवल 10 औंस (10 ounces) था, और वह अपनी नियत तारीख से 133 दिन या लगभग 19 सप्ताह पहले पैदा हुआ था. इस महीने की शुरुआत में अपना जन्मदिन मनाने के बाद, उसे आधिकारिक तौर पर मोस्ट प्रीमेच्य़ोर बच्चे का GWR पुरस्कार मिला, जिसने संगठन के पिछले रिकॉर्ड धारक, 2020 में अलबामा में पैदा हुए बच्चे को केवल एक दिन से पीछे छोड़ दिया.

महीनों चला इलाज

GWR के अनुसार, प्यार से “नैश पोटैटो” कहे जाने वाले इस बच्चे ने जनवरी में अपने माता-पिता, मोली और रान्डेल कीन के साथ घर जाने की अनुमति मिलने से पहले, यूनिवर्सिटी ऑफ़ आयोवा हेल्थ केयर स्टीड फैमिली चिल्ड्रन हॉस्पिटल के नवजात गहन चिकित्सा इकाई में छह महीने बिताए.

नैश की मां, मोली ने कहा, “सच कहूं तो, यह अवास्तविक सा लगता है. एक साल पहले, हमें यकीन नहीं था कि उसका भविष्य कैसा होगा, और अब हमने उसका पहला जन्मदिन मनाया है.”

उन्होंने आगे कहा, “यह कई मायनों में भावनात्मक है: गर्व और थोड़ा दुःख भी कि उसका सफ़र कितना अलग रहा है. लेकिन सबसे बढ़कर, यह एक जीत जैसा लगता है. वह इतना आगे आ गया है, और यह मील का पत्थर सिर्फ़ एक साल का होना नहीं है, आशा और यहां तक पहुंचने के लिए उसने जो कुछ भी पार किया है, उसके बारे में है.”

चकोतरा फल से भी कम था वजन

अपने जन्म के समय, नैश का वज़न सिर्फ़ 285 ग्राम था यानी एक चकोतरा (Grapefruit) से भी कम और उसकी लंबाई सिर्फ़ 24 सेमी थी. मोली ने याद करते हुए कहा, “वह इतना छोटा था कि मैं उसे अपनी छाती पर भी मुश्किल से महसूस कर पाती थी.”

वह आगे बोलीं, “वह तारों और मॉनिटरों से ढका हुआ था, और मैं बहुत घबराई हुई थी… लेकिन जैसे ही उसे मेरी छाती पर रखा गया, मेरी सारी घबराहट गायब हो गई. मैंने उस स्किन टू स्किन कॉन्टैक्ट के लिए इतने लंबे समय से इंतज़ार किया था – ठीक-ठीक तीन हफ़्ते – और यह एक साथ शुद्ध राहत और प्यार जैसा महसूस हुआ,”

मां ने बताया कि नैश का दुनिया में जल्दी आना उसकी 20-हफ़्ते की प्रसवपूर्व जांच के बाद हुआ, जहां उसे पता चला कि उसका गर्भाशय पहले से ही 2 सेंटीमीटर फैल चुका था. कुछ दिनों बाद उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई.

लगभग छह महीने एनआईसीयू में देखभाल के बाद, नैश को जनवरी 2025 की शुरुआत में घर लौटने की इजाजत मिल गई. तब से, उसकी हालत लगातार बेहतर होती जा रही है, हालांकि उसे अभी भी कुछ अतिरिक्त सहायता की ज़रूरत है क्योंकि वह विकसित हो रहा है.

जस्टिस वर्मा केस के बहाने समझें महाभियोग की पूरी ABCD… आज तक क्‍यों नहीं हटाए जा सके कोई जज?

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मॉनसून सत्र का पहला हफ्ता काफी गहमागहमी भरा रहा. उपराष्‍ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्‍तीफे के पीछे चल रही चर्चाओं के बीच ‘महाभियोग’ के मुद्दे ने भी ध्‍यान खींचा. इसकी पृष्‍ठभूमि में जाएं तो पहुंचेंगे, 14 मार्च की तारीख पर, जिस दिन आई एक खबर ने देश को हिलाकर रख दिया. ये खबर थी, दिल्‍ली हाईकोर्ट के एक जज के आवास में आग लगने की खबर. लेकिन खबर बड़ी इसलिए नहीं थी कि जज के घर में आग लग गई, बल्कि इसलिए क्‍योंकि इस आगजनी के बाद कथित तौर पर भारी मात्रा में जले हुए नोट बरामद हुए थे. जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इन-हाउस कमिटी बनाई. कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ कैश छिपाने और न्यायिक मर्यादा के उल्लंघन की बात कही. जस्टिस वर्मा इनकार करते रहे.

खैर… सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बीआर गवई ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग के प्रस्‍ताव की सिफारिश कर दी. फिर संसद के मॉनसून सत्र से पहले हुई सर्वदलीय बैठक के बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने बताया कि महाभियोग प्रस्‍ताव के लिए पक्ष और विपक्ष के 100 से ज्‍यादा सांसदों ने नोटिस पर हस्‍ताक्षर किए हैं. दूसरी ओर राज्‍यसभा में 50 से ज्‍यादा सदस्‍यों के हस्‍ताक्षर वाले प्रस्‍ताव को तत्‍कालीन सभापति जगदीप धनखड़ (उपराष्‍ट्रपति) ने स्‍वीकार भी कर लिया. इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ भी उच्‍च सदन में महाभियोग प्रस्‍ताव लाया गया, जिसकी प्रक्रिया अभी चल ही रही है.

जस्टिस वर्मा को अक्‍टूबर 2021 में दिल्ली हाई कोर्ट में जज नियुक्त किया गया था और वे अप्रैल 2025 तक इस पद पर रहे. विवादों के बाद उनका वापस दिल्‍ली से इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर दिया गया, जहां से वे आए थे. इस बीच राज्‍यसभा में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्‍ताव स्‍वीकृत करने वाले जगदीप धनखड़ पद से इस्‍तीफा दे चुके हैं. महाभियोग प्रस्‍ताव एक जटिल और लंबी प्रक्रिया है.

इसपर आगे क्‍या होगा, पूरी प्रक्रिया क्‍या है, महाभियोग प्रस्‍ताव होने के बाद जस्टिस वर्मा पर क्‍या कार्रवाई हो सकती है, क्‍या उन्‍हें पदमुक्‍त कर दिया जाएगा? ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब आपको इस लेख में मिलेंगे. आपको ये जानकर आश्‍चर्य भी होगा कि आज तक किसी जज को महाभियोग के जरिये हटाया नहीं गया है. तो पहली बार महाभियोग कब लाया गया? देश के इतिहास में ऐसा कब-कब हुआ? क्‍या कार्रवाइयां हुईं? ये सारी जानकारी भी हम यहां देने जा रहे हैं.
महाभियोग जैसे जटिल विषय को विस्‍तार से जानने, समझने के लिए हमने संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ, राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकार में कार्य कर चुके एक जज, पटना हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे एक जानकार एडवोकेट और यूपीएससी की तैयारी कराने वाले एक चर्चित कोचिंग सेंटर में संविधान पढ़ाने वाले एक शिक्षक से बातचीत की है. तो चलिए शुरू करते हैं…

संविधान में ‘महाभियोग’ का प्रावधान
जैसा कि आप जानते हैं, भारतीय लोकतंत्र के तीन महत्‍वपूर्ण स्‍तंभ हैं- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका. इनमें न्यायपालिका का स्थान इसलिए विशेष है, क्‍योंकि ये न्‍याय सुनिश्चित करती है. और इसके लिए संसद और सरकार के फैसलों की समीक्षा भी करती है. तभी तो संविधान में इसे ‘स्‍वतंत्र और निष्‍पक्ष’ बनाए रखने के लिए जजों को विशेषाधिकार दिए गए हैं. खास तौर पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को.

इन जजों पर कार्यपालिका का सीधा नियंत्रण नहीं होता. उनके वेतन और सेवा शर्तों में संसद भी कटौती नहीं कर सकती और यहां तक कि उन्हें कार्यकाल के दौरान आसानी से हटाया भी नहीं जा सकता. इनका वेतन भी कॉन्‍सॉलिडेटेड फंड से दिया जाता है, ताकि उन पर बाहरी दबाव न हो.

लेकिन यहां एक महत्‍वपूर्ण सवाल ये है कि जब हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के कोई जज पद की गरिमा का उल्‍लंघन करें या फिर गलत आचरण में लिप्‍त पाए जाएं तो उन्‍हें जवाबदेह कौन बनाएगा?
द फ्लेचर स्‍कूल ऑफ लॉ एंड डिप्‍लोमेसी, बोस्‍टन (अमेरिका) से इंटरनेशनल लॉ की पढ़ाई कर चुके संवैधानिक मामलों के जानकार कुमार आंजनेय शानू ने NDTV से बातचीत में बताया कि भारतीय संविधान में सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को पद से हटाना एक बेहद असाधारण स्थिति मानी जाती है. इसे आम तौर पर ‘महाभियोग’ (Impeachment) की प्रक्रिया के रूप में जाना जाता है. हालांकि संविधान में इस शब्‍द का जिक्र नहीं है. संविधान के अनुच्‍छेद 124(1) में सुप्रीम कोर्ट की संरचना और जजों की नियुक्ति का प्रावधान है, जबकि उन्‍हें हटाए जाने की एकमात्र प्रक्रिया, संविधान के अनुच्छेद 124(4) में दी गई है, जिसे न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 (Judges Enquiry Act 1968) के जरिए व्यावहारिक बनाया गया है. वहीं अनुच्‍छेद 218 ये कहता है कि हाईकोर्ट के जज के मामले में भी यही प्रक्रिया लागू होगी.

महाभियोग की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट, न्यायपालिका का सर्वोच्च शिखर है और फिर हाई कोर्ट. न्‍याय के इन मंदिरों में बैठे जजों को संविधान का संरक्षक माना जाता है. अगर इनमें से कोई जज संविधान से हटकर आचरण करे तो उन्‍हें जवाबदेह ठहराया जा सकता है. जैसा कि हमने ऊपर बताया संविधान में महाभियोग की प्रक्रिया के प्रावधान हैं. महत्‍वपूर्ण बात ये है कि महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने के केवल दो आधार हो सकते हैं. पहला- दुराचार (Misbehaviour) और दूसरा- अयोग्यता (Incapacity). यानी कि कोई ऐसा कार्य, जिससे न्‍यायमूर्ति पद की गरिमा धूमिल होती हो. देश में आज तक किसी भी सुप्रीम कोर्ट के जज को महाभियोग के जरिये बर्खास्त नहीं किया गया या फिर कोशिश तो हुई, पर ऐसा नहीं किया जा सका. आगे उसकी चर्चा करेंगे, पहले ये जान लेते हैं कि महाभियोग की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है.

1). पहला चरण: प्रस्ताव की शुरुआत
सबसे पहले, दुराचार के आरोपी या अक्षम जज के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन यानी लोकसभा या राज्यसभा में लाया जा सकता है. इसकी कुछ बुनियादी शर्तें हैं. जैसे कि यदि यदि प्रस्ताव लोकसभा में लाया जा रहा है, तो उसे कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए. वहीं, ये प्रस्ताव अगर राज्यसभा से शुरू होता है, तो कम से कम 50 सदस्‍यों का समर्थन जरूरी है. ये लिखित प्रस्‍ताव होता है, जिसमें जज के खिलाफ सामने आए आरोपों का स्‍पष्‍ट उल्‍लेख होता है. इसे लोकसभा में स्‍पीकर या फिर राज्‍यसभा में सभापति/चेयरमैन को सौंपा जाता है.

2). दूसरा चरण: प्रारंभिक जांच और निर्णय
राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकार से रिटायर्ड एक जज ने बातचीत के क्रम में बताया कि लिखित प्रस्‍ताव में उन आरोपों का आधार भी प्रस्‍तुत किया जाता है. महाभियोग के लिए प्रस्‍ताव आने के बाद ये पूरी प्रक्रिया स्पीकर या चेयरमैन के विवेक पर आ जाती है कि वे इसे स्‍वीकार करें या खारिज करें. निर्णय लेने से पहले उन्‍हें जरूरी लगे तोवे परामर्श ले सकते हैं, दस्तावेजों की जांच कर सकते हैं और ये मूल्यांकन कर सकते हैं कि आरोप प्रथम दृष्टया कितने कितने गंभीर और प्रमाणित हैं. ऐसा इसलिए भी जरूरी होता है, ताकि इस प्रक्रिया का राजनीतिक दुरुपयोग न हो.

3). तीसरा चरण: जांच समिति का गठन
अगर स्पीकर या चेयरमैन प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं, तो अगला कदम होता है एक तीन सदस्यीय जांच समिति (Inquiry Committee) का गठन. स्पीकर या सभापति, जहां प्रस्ताव दिया गया है, वो शिकायत की जांच के लिए तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन करते हैं. ये समिति ‘महाभियोग प्रक्रिया’ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो आरोपों की निष्पक्ष और विशेषज्ञता के साथ जांच के लिए होती है. इस समिति में तीन सदस्‍य होते हैं:-

एक सुप्रीम कोर्ट का जज (देश के चीफ जस्टिसको प्राथमिकता)
एक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस
एक प्रतिष्ठित कानूनविद (जो स्पीकर या चेयरमैन की राय में उपयुक्‍त हों)

4). चौथा चरण: समिति की जांच और रिपोर्ट
ये समिति जज के खिलाफ आरोपों की चार्जशीट तैयार करती है, और उन आरोपों की जांच शुरू करती है. आरोपों की एक प्रति संबंधित जज को भेजी जाती है ताकि उन्हें जवाब देने का उचित अवसर मिल सके. यदि आरोप मानसिक या शारीरिक अक्षमता से जुड़ा हो तो मेडिकल टेस्‍ट भी कराया जा सकता है.

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जांच समिति को पूरी स्वतंत्रता होती है कि वो अपनी प्रक्रिया खुद तय करे, वो चाहे तो गवाह बुला सकती है, दस्तावेज मांग सकती है, और क्रॉस-एग्जामिनेशन कर सकती है. कई मामलों में समिति एक वकील को नियुक्त करती है जो आरोप तय करते हैं और जज के खिलाफ बहस करते हैं. उदाहरण के तौर पर जस्टिस वी रामास्वामी के खिलाफ समिति गठित हुई थी तब जानी-मानी सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह अभियोजन पक्ष की भूमिका में थीं. वहीं कपिल सिब्‍बल बचाव पक्ष में थे.

5). पांचवा चरण: संसद में बहस और वोटिंग
जब जांच पूरी हो जाती है, तो समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करती है और उसे उसी सदन में सौंप देती है जहां से महाभियोग प्रस्ताव इनिशिएट किया गया था. रिपोर्ट में समिति यह सिफारिश करती है कि आरोप सिद्ध हुए या नहीं हुए. समिति ने अगर आरोपों को झूठा या असत्यापित पाया, तो प्रस्ताव वहीं समाप्त हो जाता है. लेकिन अगर आरोपों को सही पाया गया, जज को गलत पाया गया तो संसद में इस पर वोटिंग होती है.

महाभियोग का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा में पारित किया जाना जरूरी होता है. वो भी एक ही सत्र में. इसके लिए दोहरी शर्त होती है.

सदन की कुल सदस्यता का बहुमत
सदन में मौजूद और मतदान कर रहे सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत
‘दो-तिहाई बहुमत’ की अनिवार्यता बेहद जरूर है, जो ये दिखाता है कि दोषी पाए गए जज को हटाने के निर्णय में बड़े हिस्‍से की सहमति है. यदि प्रस्ताव को पहले सदन में सफलतापूर्वक बहुमत मिला तो इसे फिर दूसरे सदन में विचार और मतदान के लिए भेजा जाता है. दूसरे सदन में भी दो-तिहाई बहुमत या उससे ज्‍यादा समर्थन के बाद जज को हटाया जाना तय हो जाता है.

6). छठा चरण: राष्ट्रपति का आदेश
यदि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में प्रस्ताव पास हो जाता है, तो अब संसद ‘राष्ट्रपति को एक संकल्प’ भेजती है, जिसमें दोषी पाए गए जज को हटाने की सिफारिश होती है. राष्ट्रपति तब जज को हटाने का आदेश (order)जारी करते हैं. ये महाभियोग प्रक्रिया का अंतिम चरण होता है. राष्ट्रपति की ओर से ये आदेश जारी करना काफी हद तक औपचारिक ही होता है. यानी जिनके आदेश से जज की नियुक्ति हुई थी, उन्‍हीं के आदेश से उसे हटाया भी जा सकता है.

एक और बेहद महत्‍वपूर्ण बात ये है कि महाभियोग की प्रक्रिया के दौरान अगर जज स्‍वेच्‍छा से इस्‍तीफा दे देते हैं, तो प्रक्रिया वहीं रुक जाएगी और इस तरह वे कार्रवाई से बच जाएंगे. साल 2011 में कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के मामले में यही हुआ था. राज्यसभा में ऐतिहासिक तौर पर प्रस्ताव पारित हुआ था, मगर वोटिंग से पहले ही उन्‍होंने त्यागपत्र दे दिया और कार्रवाई से बच गए.

भारतीय इतिहास में कई उदाहरण, लेकिन…
भारत के इतिहास में अब तक किसी भी जज को महाभियोग के जरिए बर्खास्त नहीं किया गया है. लेकिन ऐसी कोशिशें जरूर हुई है. इनमें सबसे चर्चित मामला था, जस्टिस वी रामास्वामी केस, जो कि महाभियोग का पहला उदाहरण है. देश में किसी जज के खिलाफ महाभियोग बेहद दुर्लभ घटना है.

सबसे चर्चित: जस्टिस वी रामास्वामी मामला (1991-1993)
जस्टिस वी रामास्वामी का मामला देश के न्यायिक इतिहास में सबसे पहला उदाहरण है. राजधानी दिल्‍ली के एक बड़े कोचिंग संस्‍थान में संविधान और लॉ से जुड़े विषय पढ़ाने वाले एक शिक्षक और टिप्‍पणीकार ने एनडीटीवी से बातचीत में इस केस के बारे में विस्‍तार से बात की. उन्‍होंने कहा, ‘ये पहली बार था, जब सुप्रीम कोर्ट के जज के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू की गई थी.’ अक्टूबर 1989 में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत होने के कई महीनों बाद उनके लिए परेशानियां शुरू हुईं. उनके खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए गए, जो कि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनके कार्यकाल से संबंधित थे. एक इंटरनल ऑडिट और महालेखाकार (CAG) की जांच से सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का खुलासा हुआ था.

तत्कालीन CJI सब्यसाची मुखर्जी ने ऑडिट रिपोर्ट का हवाला देते हुए 20 जुलाई, 1990 को एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए जस्टिस रामास्वामी को, जांच लंबित रहने तक ‘न्यायिक कार्यों के निर्वहन पर रोक’ की सलाह दी. जस्टिस रामास्वामी छुट्टी पर चले गए. महाभियोग प्रक्रिया औपचारिक रूप से 13 मार्च, 1991 को शुरू हुई, जब स्पीकर रबी राय ने नौवीं लोकसभा के भंग होने से ठीक एक दिन पहले 108 संसद सदस्यों के हस्ताक्षरित प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया.

उन्‍होंने बताया, ‘ सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीबी सावंत की अध्‍यक्षता में तीन सदस्‍यीय जांच समिति बनी, जिसमें जस्टिस पीडी देसाई (बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश) और कानूनविद् के तौर पर जस्टिस ओ चिनप्पा रेड्डी (सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज) शामिल थे. समिति ने अपनी जांच पूरी की और 1993 में रिपोर्ट दी. जस्टिस रामास्वामी सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और फिजूलखर्ची के दोषी पाए गए.

महाभियोग प्रस्ताव पर 10 मई, 1993 को लोकसभा में बहस के लिए लाया गया. दो दिनों तक 16 घंटे तक बहस चली. प्रस्ताव पेश करने वाले सोमनाथ चटर्जी ने जस्टिस के कथित प्रयासों की आलोचना की. वहीं दूसरी ओर जस्टिस रामास्वामी के वकील के रूप में कपिल सिब्बल ने सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के सभी 11 आरोपों का खंडन किया. दावा किया कि उनके मुवक्किल ‘भ्रष्ट’ नहीं थे.
11 मई, 1993 को वो निर्णायक क्षण आया, जब प्रस्ताव पर मतदान हुआ. सदन में मौजूद 401 सदस्यों में से 196 सदस्यों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, जबकि 205 सदस्य अनुपस्थित रहे. इस तरह दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया. बताया जाता है कि सत्तारूढ़ कांग्रेस और उसके सहयोगी पार्टियों के सांसद ‘ऊपर से मिले निर्देश’ के चलते मतदान से अनुपस्थित रहे. ऐसे में जस्टिस रामास्वामी कार्रवाई से बचे रहे. वे अपने पद पर बने रहे और फरवरी 1994 में सेवानिवृत्त हुए.

बैंकों, सरकार,जमीन माफियाओं मिली भगत से भारत की सरकारी जमीन सफाई से बेचीं जा रही हैं जनता अंजान, सरकारी ऑनलाइन भूइयां SITE में भी फर्जी नाम चढ़ा दिए गए

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छत्तीसगढ़ में ज़मीन घोटाला सामने आया है, जिसमें सरकारी ज़मीनों का अवैध सौदा कर करोड़ों रुपये का नुकसान किया गया है.एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि एक गांव में 190 एकड़ ज़मीन की गड़बड़ी हुई है. आनन-फानन में जांच शुरू कर दी गई है. रायपुर, दुर्ग, कोरबा और कोरिया जैसे ज़िलों से जुड़े लोगों के तार इस गड़बड़झाले से जुड़े पाए गए हैं. इस घोटाले में बैंकों पर भी फर्जी दस्तावेजों के आधार पर लोन देने के आरोप लगे हैं. शासकीय ज़मीन पर निजी व्यक्तियों को 82 लाख रुपये का कर्ज दिया गया. अब बैंक प्रबंधन ने भी जांच शुरू कर दी है. राज्य में सरकारी ज़मीन को फर्जी तरीके से निजी करने का खेल चल रहा है, जिससे राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं.

191 एकड़ सरकारी ज़मीन को बता दिया निजी जमीन
ऑनलाइन सिस्टम से गड़बड़ी की गई है. , हैं. सवाल उठता है कि पटवारी और तहसीलदार की किस आईडी को हैक कर यह गड़बड़ी की गई? बैंकों ने लोन देने से पहले गंभीरता से जांच क्यों नहीं की? राज्य में हजारों एकड़ शासकीय भूमि का अवैध कारोबार चल रहा है और शासकीय ज़मीनों पर लोन दिलाने वाला गिरोह सक्रिय है. पड़ताल में सबसे बड़ी गड़बड़ी दुर्ग जिले के अछोटी गांव में सामने आई है. यहां 52 फर्जी खसरे बनाए गए, जिनमें कथित तौर पर 191 एकड़ सरकारी ज़मीन को निजी बता दिया गया. जिनके नाम सामने आए उनमें दीनूराम यादव, एसराम, शियाकांत वर्मा, हरिशचंद्र निषाद और सुरेंद्र कुमार शामिल हैं.

दलाल सक्रिय, कौन बेच रहा, किसे बेच रहे कुछ नहीं पता
दीनूराम के नाम बनी ऋण पुस्तिका पर दुर्ग तहसीलदार की मोहर और साइन हैं, जबकि अछोटी गांव अहिवारा तहसील में आता है. ग्राम कोटवार नंदलाल चौहान ने बताया कि यहां दलाल लोग सक्रिय हैं, किसे बेच रहे हैं, किसे नहीं, पता नहीं चलता. जब पटवारी इस्तहार जारी करता है, तब जाकर ही कुछ पता चलता है. दीनूराम और अन्य जिनके नाम सामने आए हैं, उनका रिकॉर्ड में कोई जिक्र नहीं है. सरकारी ज़मीन, फर्जी खसरा और फिर फर्जी लोन बुक — ये पूरा खेल सामने आया है. 25 जून 2025 को दीनूराम को ₹46 लाख का लोन मिला और 2 जुलाई 2025 को एसराम को ₹36 लाख का लोन मिला. वो भी कथित तौर पर बड़े सरकारी बैंक से. ना कोई वेरिफिकेशन, ना फील्ड इंस्पेक्शन — सीधे करोड़ों का लोन पास कर दिया गया. NDTV के सवालों का बैंक ने कोई जवाब नहीं दिया.

100 करोड़ का घोटाला
अछोटी गांव से सटे मेन रोड में जिस 191 एकड़ ज़मीन का कथित घोटाला हुआ, अकेले उसकी कीमत 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा बताई जा रही है. लेकिन मामला सिर्फ अछोटी का नहीं है. कोरबा में 250 एकड़ से ज़्यादा सरकारी ज़मीन पर इसी तरह का खेल हुआ है, जहां कलेक्टर के आदेश पर मामला दर्ज हुआ है. कोरिया में अवैध बिक्री की जांच जारी है. रायपुर में ऐसे ही मामले में पटवारी को निलंबित किया गया है. भिलाई में गरीबों के लिए आरक्षित EWS ज़मीन को निजी बताकर बेचने की साजिश का आरोप है. नगर निगम भिलाई के एमआईसी सदस्य आदित्य सिंह ने बताया कि राधिका नगर में मैत्री विहार सोसायटी की EWS ज़मीन पर भू-माफियाओं ने कहीं और के खसरे की बची हुई ज़मीन लाकर बैठा दी, फिर छोटे भूखंड बनाकर उसकी प्लॉटिंग की और बेचने का काम शुरू कर दिया.

एनडीटीवी की रिपोर्ट में क्या पता चला
तफ्तीश में कई संदिग्धों का पता चला, जिन्होंने कैमरे पर बात करने से इंकार कर दिया. लेकिन जो जानकारी हाथ लगी उसके मुताबिक कई ज़िलों में ज़मीन माफिया सिंडिकेट बन गया है. राजस्व अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध है. लोन पर 10% तक कमीशन की डील के आरोप हैं. आरोप है कि पटवारी की ID हैक कर फर्जी खसरे बनाए गए. सिंडिकेट का नेटवर्क रायपुर, दुर्ग, कोरबा, कोरिया और जांजगीर-चांपा तक फैला है. फर्जी ID, फर्जी खसरे, फर्जी लोन बुक — सबका रेट तय है. राजस्व विभाग, बैंक और दलालों की मिलीभगत हो रही है.

संभागायुक्त दुर्ग एसएन राठौर ने NDTV को बताया कि हमारा पहला उद्देश्य है कि जो ज़मीनें गड़बड़ी कर निजी लोगों के नाम दर्ज कर ली गई हैं, उन्हें वापस शासकीय खाते में डलवाया जाए. जांच की जा रही है और जांच में जो भी दोषी होंगे, उन पर कार्रवाई की जाएगी. छत्तीसगढ़ में बीते कुछ सालों से एक के बाद एक कई घोटाले सामने आ रहे हैं. राज्य में कई अफसर और नेता केंद्रीय एजेंसियों के रडार पर हैं. ऐसे में यह नया ज़मीन घोटाला सामने आया है. सवाल यह है कि क्या इसमें निष्पक्ष जांच होगी या यह भी सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह जाएगा?

झालावाड़ हादसे पर राजकुमार रोत ने बीजेपी को घेरा, बोले, ‘एक तरफ मासूमों की लाशें, दूसरी तरफ VIP सड़क निर्माण’

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झालावाड़ में सरकारी स्कूल की छत गिरने से सात मासूम बच्चों की मौत ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. इस बीच जिला चिकित्सालय परिसर के बाहर सड़क निर्माण की तैयारियों पर बाप पार्टी सांसद राजकुमार रोत ने भाजपा सरकार पर निशाना साधा है. उन्होंने एक्स पर दो वीडियो पोस्ट कर राज्य सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े किए हैं.

सांसद राजकुमार रोत ने एक्स पर किया पोस्ट
उन्होंने लिखा है कि, ‘वीडियो में दो दृश्य साफ दिखाई दे रहे हैं, एक तरफ एम्बुलेंस मासूमों की लाशें लेकर अस्पताल की ओर दौड़ रही हैं, तो दूसरी ओर सड़क पर डामर बिछाया जा रहा है. रोलर मशीनें घूम रही हैं और अस्पताल की दीवारों की पुताई की जा रही है. क्या सरकार अस्पतालों की हालत सुधारने के लिए मासूमों की मौत का इंतज़ार करती है. अस्पताल की दीवारें अचानक साफ की जा रही हैं, पंखे ठीक किए जा रहे हैं, डॉक्टरों की कुर्सियों से धूल झाड़ी जा रही है.’

पीड़ित परिवारों के लिए बड़ी मुआवजा राशि की मांग की
बाप पार्टी सांसद ने राज्य सरकार से पीड़ित परिवारों के लिए बड़ी मुआवजा राशि की मांग की है. उन्होंने लिखा कि, ‘मृत बच्चों के परिजनों को 1-1 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता दी जाए. परिजनों को 10-10 बीघा जमीन दी जाए. घायलों को 50-50 लाख रुपये और 5-5 बीघा जमीन का मुआवजा दिया जाए.’

बाज नहीं आ रहा पाकिस्‍तान,तब पहलगाम अब पुंछ में टीआरएफ ने की नापाक हरकत

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लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा वैश्विक आतंकी संगठन द रजिस्टेंस फ्रंट (TRF) लगातार हमले कर रहा है. पहले पहलगाम में पर्यटकों पर हमला और अब पुंछ में लाइन ऑफ कंट्रोल के पास लैंड माइन ब्लास्ट, टीआरएफ अपनी नापाक हरकतों से बाज नहीं आ रहा है. अमेरिका ने पिछले दिनों टीआरएफ को विदेशी आतंकी संगठनों की लिस्‍ट में डाल दिया था. इसके बाद ऐसा लगा था कि टीआरएफ की नापाक हरकतों पर लगाम लगेगी, लेकिन ऐसा होता दिखाई नहीं दे रही है. जम्मू-कश्मीर के पुंछ में लाइन ऑफ कंट्रोल के पास शुक्रवार को एक लैंड माइन ब्लास्ट हुआ था. इसमें सेना के एक जवान की मौत हो गई थी और तीन घायल हो गए थे. इस धमाके की जिम्मेदारी टीआरएफ ने ली है.

क्‍या है द रजिस्टेंस फ्रंट?
द रजिस्टेंस फ्रंट (TRF) एक आतंकवादी संगठन है, जो जम्मू-कश्मीर में सक्रिय है. यह आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा है. इसके खिलाफ भारतीय सुरक्षा बल लगातार कार्रवाई कर रहे है. भारत सरकार ने इस संगठन को काफी पहले आतंकवादी घोषित कर दिया है. यह संगठन हाल के वर्षों में घाटी में कई आतंकवादी हमलों के लिए जिम्मेदार रहा है. टीआरएफ का मकसद कश्मीर में भारतीय शासन को समाप्त करना और इस्लामी राज्य की स्थापना करना है. हाल के वर्षों में जम्मू-कश्मीर में कई आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया है, जिनमें सुरक्षा बलों और नागरिकों पर हमले शामिल हैं.

TRF का समर्थक पाकिस्‍तान
पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार ने पिछले दिनों कहा था कि हमने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के बयान में टीआरएफ के उल्लेख का विरोध किया था. मुझे दुनिया भर से फ़ोन आए, लेकिन पाकिस्तान ने इसे नहीं माना. इशाक डार ने कहा कि हम टीआरएफ को अवैध नहीं मानते हैं. उन्होंने यहां तक कह दिया कि हमें सबूत दिखाइये कि टीआरएफ ने ही कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमला किया. टीआरएफ की जिम्मेदारी साबित कीजिए. हम इस आरोप को स्वीकार नहीं करेंगे, जबकि पहलगाम में पर्यटकों पर हुए हमले के बाद टीआरएफ ने खुल इसकी जिम्‍मेदारी ली थी. इसके बावजूद बड़ी बेशर्मी से पाकिस्‍तान टीआरएफ के समर्थन में खड़ा नजर आया.

पुंछ में LoC के निकट बारूदी सुरंग विस्फोट
जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में शुक्रवार को एलओसी के निकट बारूदी सुरंग विस्फोट में एक सैन्यकर्मी की मौत हो गई और दो अन्य घायल हो गये. अधिकारियों ने बताया कि कृष्णा घाटी के क्षेत्र में गश्त के दौरान एक बारूदी सुरंग में विस्फोट हुआ, जिसमें एक अग्निवीर जवान की मौत हो गई और दो अन्य घायल हो गये. अधिकारियों ने बताया कि घायलों में से एक जेसीओ है, जिसे सैन्य अस्पताल में भर्ती कराया गया है और उसकी हालत स्थिर है. इस हमले की जिम्‍मेदारी टीआरएफ ने ली है.

क्या लैंड माइन ब्लास्ट को भारत ‘एक्ट ऑफ वार’ मानेगा
पहलगाम हमले के बाद भारत ने पाकिस्‍तान में पल रहे आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर चलाया था. भारत टीआरएफ को लश्‍कर का प्रॉक्‍सी मानता है. लश्‍कर का समर्थन पाकिस्‍तान करता है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सेना ने पाकिस्‍तान के कई सैन्‍य हवाई अड्डों को नुकसान पहुंचाया था, जिसके बाद पाक घुटनों पर आ गया और सीजफायर की गुहार लगाने लगा था. सीजफायर के बाद भारत ने साफ-साफ कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर अभी खत्‍म नहीं हुआ है. अगर पाकिस्‍तान में पल रहे आतंकियों की ओर से कोई नापाक हरकत की गई, तो ऑपरेशन सिंदूर फिर एक्टिव हो जाएगा. भारत के खिलाफ पहलगाम जैसी कोई भी घटना को ‘एक्‍ट ऑफ वार’ माना जाएगा. अब सवाल उठता है कि क्या लैंड माइन ब्लास्ट को भारत ‘एक्ट ऑफ वार’ मानेगा? 8520/

झालावाड़ स्कूल हादसा की जिम्मेदारी किसकी और कहां हुई चूक? जानें सबकुछ

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झालावाड़ में स्कूली इमारत ढहने के दर्दनाक हादसे के बाद प्रदेशभर में रोष है. प्रारंभिक जांच के आधार पर कार्यवाहक प्रिंसिपल सहित 5 अधिकारियों को निलंबित कर दिया है. लेकिन विपक्ष शिक्षा मंत्री मदन दिलावर के इस्तीफे की मांग कर रहा है. दरअसल यह हादसा सिर्फ एक स्कूल इमारत के ढहने का नहीं बल्कि सिस्टम की विफलता का प्रतीक है. इस त्रासदी के लिए 5 प्रमुख चेहरों को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराए जा रहा. जिनकी लापरवाही और चूक ने मासूमों की जान ले ली.

शिक्षा मंत्री मदन दिलावर

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शिक्षा मंत्री के तौर पर मदन दिलावर की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की नीतिगत देखरेख और प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना है. जर्जर स्कूली इमारतों का मुद्दा लंबे समय से उठ रहा था. लेकिन उनपर ध्यान देने या ठोस कार्यवाही करने में मंत्री उदासीन रहे. उनकी निगरानी में कमी के कारण ही ऐसे महत्वपूर्ण विषयों पर त्वरित निर्णय नहीं लिए गए और जमीनी स्तर पर निर्देशों का पालन सुनिश्चित नहीं हो पाया. हालांकि मदन दिलावर ने अपनी ज़िम्मेदारी मानते हुए सिस्टम को ठीक करने की बात कही है.

प्राथमिक शिक्षा निदेशालय के निदेशक सीताराम जाट

निर्देशों की अनदेखी और जवाबदेही की कमी

प्राथमिक शिक्षा निदेशालय के निदेशक होने के नाते सीताराम जाट की जिम्मेदारी सरकारी स्कूल की जर्जर इमारतों की पहचान, मरम्मत या उन्हें गिराने ठीक करने के संबंध में स्पष्ट निर्देश जारी करना और उनके पालन को सुनिश्चित करना है. यह आरोप है कि निदेशालय ने इस संबंध में पर्याप्त सक्रियता नहीं दिखाई और न ही फील्ड अधिकारियों से नियमित रिपोर्ट मांगी अगर निर्देश जारी भी हुए तो उनका प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित नहीं किया गया. जिससे यह प्रतीत होता है कि जवाबदेही तय करने में भी उनकी चूक हुई है.

झालावाड़ जिला कलेक्टर- अजय सिंह राठौड़


ज़िले में सुरक्षा मानकों की अनदेखी

ज़िले के मुखिया होने के नाते झालावाड़ जिला कलेक्टर की ज़िम्मेदारी है कि वे जिले के सभी सरकारी भवनों, विशेषकर स्कूलों की सुरक्षा सुनिश्चित करें. इसमें समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट करवाना, जर्जर इमारतों की पहचान करना और उनके सुधार या स्थानांतरण के लिए आवश्यक कदम उठाना शामिल है. हादसे वाली स्कूल की इमारत की जर्जर स्थिति की जानकारी होने के बावजूद, यदि उन्होंने त्वरित और निर्णायक कार्रवाई नहीं की, तो यह उनकी प्रशासनिक लापरवाही का स्पष्ट प्रमाण है.

मुख्य जिला शिक्षा अधिकारी राम सिंह मीणा

सीधी फील्ड स्तरीय लापरवाही

इनकी भूमिका ज़िले के स्कूलों की दिन-प्रतिदिन की गतिविधियों और उनके रखरखाव की सीधी निगरानी करने की है. जर्जर इमारतों के बारे में जानकारी होने और उन्हें प्राथमिकता के आधार पर ठीक करवाने या बच्चों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने की जिम्मेदारी थी. यदि उन्हें स्कूल की खराब हालत की जानकारी थी और उन्होंने आवश्यक कार्रवाई के लिए उच्च अधिकारियों को सूचित नहीं किया या उनके निर्देशों का पालन नहीं किया, तो यह सीधी फील्ड स्तरीय लापरवाही है.

कार्यवाहक स्कूल प्रिंसिपल – मीना गर्ग
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बच्चों की सुरक्षा के प्रति उदासीनता

स्कूल प्रिंसिपल की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी स्कूल परिसर में बच्चों और कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है. ग्रामीणों की शिकायत और खुद की मॉनिटरिंग के चलते कार्यवाहक प्रिंसिपल को इमारत की जर्जर स्थिति के बारे में जानकारी थी इसके बाद भी बच्चों को उस खतरनाक इमारत में पढ़ने की अनुमति दी तो यह उनकी ओर से बच्चों की सुरक्षा के प्रति घोर उदासीनता को दर्शाता है. यह उनकी कर्तव्यनिष्ठता में बड़ी चूक है, जिसके लिए वे सीधे तौर पर जवाबदेह हैं. सरकार ने चार शिक्षकों के साथ उनको भी निलंबित कर दिया है.

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ये केवल हादसा नहीं है बल्कि एक पूरी व्यवस्था की विफलता है. जहां लापरवाही की परतों ने एक दर्दनाक त्रासदी को जन्म दिया है. अब देखना यह है कि सरकार इस मामले में क्या ठोस कदम उठाती है

स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण हेतु मुख्यमंत्री की दूरदर्शी पहल

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मुख्यमंत्री साय ने आज जशपुर जिले के ग्राम बगिया स्थित कैम्प कार्यालय परिसर से अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त एम्बुलेंस को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह एम्बुलेंस बैंक ऑफ इंडिया द्वारा कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) निधि से प्रदत्त है, जिसमें बेसिक लाइफ सपोर्ट सिस्टम सहित अन्य उन्नत सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं।
यह एम्बुलेंस मुख्य रूप से मनोरा क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने हेतु रखी जाएगी, जिसकी सेवाएँ आवश्यकता अनुसार पूरे जिले में ली जा सकेंगी। इससे आपातकालीन परिस्थितियों में त्वरित चिकित्सा परिवहन सेवा सुनिश्चित हो सकेगी, जिससे खासकर ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में गंभीर रूप से बीमार एवं दुर्घटनाग्रस्त मरीजों को समय पर स्वास्थ्य सहायता मिल सकेगी।
मुख्यमंत्री साय ने इस अवसर पर कहा कि राज्य सरकार हर व्यक्ति तक गुणवत्तापूर्ण और त्वरित स्वास्थ्य सेवा पहुँचाने के लिए कृतसंकल्पित है। उनकी पहल पर विशेष रूप से ग्रामीण एवं दूरवर्ती क्षेत्रों में स्वास्थ्य अधोसंरचना को सुदृढ़ करने के लिए अनेक योजनाएँ प्रारंभ की गई हैं। उन्होंने बताया कि कुनकुरी में मेडिकल कॉलेज और 50 बिस्तर वाला मातृ एवं शिशु अस्पताल, जशपुर में प्राकृतिक चिकित्सा एवं फिजियोथेरेपी केंद्र, शासकीय नर्सिंग कॉलेज तथा शासकीय फिजियोथेरेपी कॉलेज की स्थापना का कार्य प्रगति में है।
इस अवसर पर सरगुजा विकास प्राधिकरण की उपाध्यक्ष श्रीमती गोमती साय, जशपुर विधायक श्रीमती रायमुनी भगत, जिला पंचायत अध्यक्ष श्री सालिक साय, जिला पंचायत उपाध्यक्ष शौर्य प्रताप सिंह जूदेव, नगर पालिका अध्यक्ष अरविंद भगत, नगर पालिका उपाध्यक्ष श्री यश प्रताप सिंह जूदेव, कलेक्टर रोहित व्यास, सहित अनेक जनप्रतिनिधिगण, प्रशासनिक अधिकारी, और गणमान्य नागरिक उपस्थित थे।

DAP और खाद की कालाबाजारी किसानों की बर्बाद कर रही फसल, कलेक्ट्रेट पहुंच पर सौंपा ज्ञापन

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धमतरी जिले के कलेक्ट्रेट कार्यालय में शुक्रवार को किसान यूनियन बड़ी संख्या में अपनी मांगों को लेकर पहुंचे. किसानों को कहना है कि वो डीएपी और यूरिया खाद की कमी के चलते कलेक्टर से मिलने आए हैं और अपनी मांगों का ज्ञापन भी सौंपेंगे. किसानों ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए बताया कि धान की बोनी के बाद खाद की जरूरत है, लेकिन सोसाइटी और राइस मिलों में खाद नहीं मिल रहा है. इससे खेती पर असर पड़ रहा है.

किसानों ने कहा कि खुले बाजार में महंगे दामों पर खाद खरीदने को किसान मजबूर हैं. काला बाजारी करने वाले 12 सौ रुपये की डीएपी 19 सौ रुपये और 272 रुपये वाली यूरिया 450 रुपये में बेच रहे हैं. किसान इन्हीं दामों पर खरीदने को मजबूर हैं.

किसानों ने कहा कि उनकी प्रमुख मांग है कि जैविक खेती करने वालों को प्रति एकड़ 10 हजार रुपये अनुदान देने के साथ ही बिजली की दरों में वृद्धि पर रोक लगाई जाए. साथ ही कृषि मोटर पंप में स्मार्ट मीटर नहीं लगाया जाए. वहीं, किसानों ने मंडी संशोधन बिल को किसान विरोधी बताया है. पहले मंडी नियमों का उल्लंघन पर 6 महीने की सजा थी, अब सिर्फ 5000 रुपेय का जुर्माना लगेगा.

यह बिल व्यापारियों को फायदा पहुंचाने के लिए लाया गया है. सरकार इसे तुरंत वापस ले. वहीं, छत्तीसगढ़ में लगातार अवैध रूप से शराबी की बिक्री हो रही है.

इस मामले पर अपर कलेक्टर बीआर मरकाम ने कहा कि किसानों ने मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा है. इसे आगे प्रेषित कर दिया जाएगा.