शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट के मुखपत्र सामना में प्रकाशित संपादकीय के जरिए मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) और महाराष्ट्र की 29 नगरपालिकाओं के चुनाव नतीजों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं. संपादकीय में आरोप लगाया गया है कि इन चुनावों में बीजेपी ने धांधली, भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के दम पर जीत हासिल की.
सामना ने इसे महाराष्ट्र और मराठी मानूस के लिए चेतावनी बताया है.
सामना में लिखा गया कि ‘मुंबई समेत 26 नगरपालिका में बीजेपी की लहर आई और उस लहर पर सवार होकर ऐरे-गैरे किनारे लग गए. चूंकि ‘न विचार न भूमिका’ सूत्र है इसलिए अब किसी भी चुनाव का कोई मतलब नहीं रह गया है.
‘अफरा-तफरी और अराजकता में आए नतीजे’
सामना के मुताबिक, मुंबई समेत 29 नगरपालिकाओं के नतीजे भारी अफरा-तफरी और अराजकता के बीच घोषित किए गए. मतगणना में गड़बड़ियां देर रात तक जारी रहीं. संपादकीय में कहा गया कि पूरे देश की निगाहें महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई पर टिकी थीं, लेकिन चुनावी प्रक्रिया पारदर्शी नहीं दिखी.
संपादकीय में बीजेपी पर स्याही घोटाला, ईवीएम घोटाला, धन वितरण, बोगस और डबल मतदान जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं. सामना का दावा है कि इन सबके सहारे बीजेपी ने मुंबई पर कब्जा जमाने की कोशिश शुरू कर दी. पूरे नतीजे घोषित होने से पहले ही बीजेपी द्वारा शुरू किया गया जश्न भी ‘चुनावी घोटाले’ का हिस्सा बताया गया है.
सामना ने चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं. संपादकीय में कहा गया कि सैकड़ों मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सके, लेकिन आयोग अजगर की तरह पड़ा रहा. मतदान के 24 घंटे बीत जाने के बाद भी मतदान प्रतिशत की सही जानकारी नहीं दी जा सकी, जबकि उसी दौरान टीवी चैनलों पर बीजेपी के पक्ष में एग्जिट पोल दिखाए जाते रहे.
बीजेपी ऐप’ और आचार संहिता उल्लंघन
संपादकीय में आरोप है कि चुनाव अधिकारी खुलेआम मतदाताओं के नाम खोजने के लिए ‘बीजेपी ऐप’ का इस्तेमाल कर रहे थे. मतदान केंद्रों पर बैठकर अधिकारियों द्वारा बीजेपी की मदद किए जाने का दावा भी किया गया है.
सामना ने लिखा कि अगर इस तरह की शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं होती तो फिर चुनाव कराने का कोई मतलब नहीं, बल्कि विधायकों, सांसदों और नगरसेवकों को सीधे नियुक्त कर देना चाहिए.
‘मराठी मानुष को धक्का’
सामना ने आरोप लगाया कि बीजेपी का मकसद मराठी मानूस को धत्ता बताकर मुंबई में महापौर लाना था. इस सपने को पूरा करने की कोशिश ‘मिंधे’ यानी उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के जरिए की गई. संपादकीय में कहा गया कि यह बात महाराष्ट्र के इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज होगी.
संपादकीय में कहा गया कि बीजेपी ने 100 का आंकड़ा पार कर लिया, जबकि शिवसेना-मनसे ने कड़ी टक्कर दी. ठाणे में शिंदे गुट, छत्रपति संभाजीनगर, नासिक, पुणे, पिंपरी-चिंचवड़, जलगांव और धुले की नगरपालिकाओं पर बीजेपी का नियंत्रण बताया गया है.
कांग्रेस को भी घेरा
सामना में लिखा कि लातूर में कांग्रेस और वंचित सत्ता में आसीन हुए. मराठवाड़ा के परभणी में शिवसेना का विजयी ध्वज फहराना खुशी की बात है. कांग्रेस और वंचित ने इन चुनावों में शानदार प्रदर्शन किया, लेकिन मुंबई में वे 25 सीटों का आंकड़ा भी पार नहीं कर सके. कांग्रेस-वंचित गठबंधन को लातूर को छोड़कर कहीं अधिक सफलता नहीं मिली.
सामना ने डॉ. आंबेडकर के विचारों का जिक्र करते हुए कहा कि महाराष्ट्र अखंड और मुंबई मराठी मानूस के हाथ में रहनी चाहिए. प्रकाश आंबेडकर द्वारा अपनाए गए अलग रास्ते पर भी टिप्पणी की गई है. संपादकीय के मुताबिक, अकोला जैसे गढ़ में बीजेपी की पैठ चिंता बढ़ाने वाली है.
अमृतकाल’ पर कटाक्ष
बीजेपी के ‘अमृतकाल’ पर तंज कसते हुए सामना ने लिखा कि न अदालतों में न्याय मिल रहा है और न ही चुनावों में निष्पक्ष परिणाम. पैसे के दम पर पूरे चुनावी तंत्र पर कब्जा करने की नई परिभाषा गढ़ी जा रही है, जो लोकतंत्र के लिए खतरा है.
संपादकीय के अंत में कहा गया कि बेहद विपरीत परिस्थितियों में शिवसेना और मनसे ने संघर्ष किया और कठिन लड़ाई लड़ी. यह लड़ाई आगे भी जारी रहेगी. सामना ने दो टूक कहा कि मुंबई और मराठी अस्मिता की लड़ाई कभी नहीं रुकेगी.



