Home छत्तीसगढ़ Health Tips: छत्तीसगढ़ की ब्रेन बूस्टर घास, किसानों की फायदे वाली फसल…

Health Tips: छत्तीसगढ़ की ब्रेन बूस्टर घास, किसानों की फायदे वाली फसल…

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Chhattisgarh Brain Booster Herb: छत्तीसगढ़ की आदिवासी स्वास्थ्य परंपरा में मण्डूकपर्णी और ब्राम्ही को बुद्धिवर्धक औषधि माना जाता है. नदी – नालों के किनारे उगने वाले ये पौधे बच्चों और बुजुर्गों की स्मरण शक्ति बढ़ाने में उपयोगी हैं.

चार महीने की खेती से किसानों को लंबे समय तक उत्पादन और आय मिल रही है.

छत्तीसगढ़ की आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा में औषधीय पौधों का विशेष महत्व रहा है. इन्हीं परंपरागत ज्ञान और अनुभवों के आधार पर आज भी कई ऐसे पौधे हैं, जो आधुनिक जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं के समाधान में कारगर साबित हो रहे हैं. छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि के कंसल्टेंट अमित कुमार गुप्ता ने बताया कि मण्डूकपर्णी और ब्राम्ही दोनों ही ऐसे औषधीय पौधे हैं, जिन्हें प्राचीन काल से बुद्धिवर्धक यानी स्मरण शक्ति बढ़ाने वाला माना जाता है.

अमित कुमार गुप्ता के अनुसार, मण्डूकपर्णी और ब्राम्ही दोनों ही घास प्रजाति के पौधे हैं. ये अधिकतर दलदली क्षेत्रों में या वहां पाए जाते हैं, जहां वर्षभर नमी और पानी उपलब्ध रहता है. छत्तीसगढ़ के जंगलों में ये पौधे आमतौर पर नदी किनारे, जंगली नालों के आसपास और नम भूमि में प्राकृतिक रूप से उगते हैं. पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में इन दोनों पौधों के पत्तों का उपयोग अधिक किया जाता है, लेकिन पंचांग पद्धति से सेवन करने पर इसके लाभ और भी बढ़ जाते हैं.

बच्चों और अधिक उम्र के लोगों के लिए यह बेहद लाभकारी

उन्होंने बताया कि पंचांग का अर्थ है पौधे के सभी हिस्सों—पत्ते, फूल, तना और जड़, इन सभी हिस्सों को अच्छी तरह साफ कर, धोकर इनकी चटनी बनाई जाती है. इस चटनी को धनिया पत्ती और टमाटर के साथ मिलाकर नियमित रूप से खाने से स्मरण शक्ति में वृद्धि होती है. खासकर 10 वर्ष से कम उम्र के बच्चों और अधिक उम्र के लोगों के लिए यह बेहद लाभकारी मानी जाती है. इससे एकाग्रता बढ़ती है और दिमागी थकान में भी कमी आती है.

इसके अलावा मण्डूकपर्णी और ब्राम्ही से टॉनिक भी तैयार किए जाते हैं, जिनका उपयोग मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए किया जाता है. वर्तमान समय में छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि बोर्ड इन दोनों पौधों की खेती को बढ़ावा दे रहा है. इसका उद्देश्य न सिर्फ पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित करना है, बल्कि किसानों के लिए आय का एक नया और स्थायी स्रोत तैयार करना भी है.

तीन से चार साल तक लगातार उत्पादन

अमित कुमार गुप्ता ने बताया कि इन पौधों की खेती लगभग चार महीने की होती है. एक बार पौधा लगाने के चार महीने बाद इसकी कटाई की जाती है, इसके बाद यह अपने आप दोबारा बढ़ने लगता है. सही देखभाल के साथ यह तीन से चार साल तक लगातार उत्पादन देता है. खासतौर पर ब्राम्ही की खेती में यदि खेत को पहले ऑर्गेनिक बना लिया जाए, तो उत्पादन और गुणवत्ता दोनों बेहतर होती हैं.

उन्होंने कहा कि यह खेती किसानों के लिए लाभकारी साबित हो सकती है, क्योंकि कम लागत में लंबे समय तक उत्पादन मिलता है. विभाग की ओर से तकनीकी मार्गदर्शन और अन्य आवश्यक सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है. इस तरह मण्डूकपर्णी और ब्राम्ही न केवल बच्चों और बुजुर्गों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हैं, बल्कि किसानों के लिए भी एक बेहतर आजीविका का साधन बनते जा रहे हैं.