जब से महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे ने मुंबई बीएमसी में अपना मेयर बनवाने के लिए भाजपा पर प्रेशर बनाया है, कई तरह की बातें कही जा रही हैं. पहले खबर आई कि शिंदे को किनारे करने के लिए उद्धव ठाकरे ने भाजपा को अलग तरह से समर्थन देने का मूड बना लिया है.
वह सदन में अपने पार्षदों को अनुपस्थित रख देंगे. कुछ देर बाद शाम होते-होते महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने आशंका जताई कि राज्य में मध्यावधि चुनाव हो सकते हैं. इसके बाद अटकलें लगाई जानें लगी हैं कि क्या एकनाथ शिंदे भाजपा का साथ छोड़ने वाले हैं और अगर ऐसा हुआ तो क्या मध्यावधि चुनाव की नौबत आ सकती है?
इन अटकलों की वजह सपकाल का बयान है. असल में हाल में महाराष्ट्र में नगर निगम के चुनाव हुए हैं. बीएमसी ही नहीं, कई नगर निगमों में चौंकाने वाले समीकरण देखने को मिले हैं. कल्याण-डोंबिवली नगर निगम में खबर है कि उद्धव ठाकरे गुट के तीन पार्षदों को शिंदे की शिवसेना ने अपनी तरफ कर लिया है. यूं समझिए मेयर पद पाने के लिए पूरे राज्य के नगर निगमों में जोड़-तोड़ हो रही है. शिंदे के साथ मुश्किल यह है कि बीएमसी चुनाव में उनकी पार्टी के प्रदर्शन से भाजपा खुश नहीं है, इधर उनकी जोड़तोड़ से उद्धव भी खफा हो गए हैं. ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये किसी नए समीकरण का संकेत हैं?
सपकाल ने क्या कहा?
बीएमसी चुनाव के बाद मेयर को लेकर फंसे पेच के बीच हर्षवर्धन सपकाल ने कहा कि भाजपा-शिवसेना सत्ता के लिए साथ आए लोग हैं. दोनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा था और जनता ने बहुमत दिया है. इतने दिनों में तो फैसला कर लेना चाहिए था कि मेयर कौन बनेगा. मुझे लगता है कि दोनों दलों में मेयर को लेकर खींचतान जारी है इसीलिए अभी तक मेयर को लेकर कोई निर्णय नहीं हो पाया है. आगे उन्होंने कह दिया कि मिड-टर्म पोल भी विधानसभा के हो सकते हैं. होटल पॉलिटिक्स का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इस समय दबाव जीते हुए जनप्रतिनिधियों पर है और वोटरों पर भी.
नंबर गेम क्या कहता है?
महाराष्ट्र में 288 सीटों के लिए नवंबर 2024 में विधानसभा चुनाव कराए गए थे. बहुमत का आंकड़ा 145 था और भाजपा ने सबसे ज्यादा 132 सीटें जीतीं. शिंदे की शिवसेना को 57 और अजीत पवार की एनसीपी को 41 सीटें मिलीं. उद्धव की शिवसेना 20, कांग्रेस 16 और शरद पवार की एनसीपी केवल 10 सीटें निकाल सकी. फिलहाल महाराष्ट्र में तीन दलों की गठबंधन सरकार चल रही है. हालांकि भाजपा को बहुमत के लिए बहुत कम नंबर की जरूरत है. उसके लिए शिंदे का साथ मजबूरी नहीं है. अगर शिंदे जाते भी हैं तो अजीत पवार के सपोर्ट से आराम से सरकार चलती रहेगी.
असल में शिंदे को भाजपा की जरूरत है
असल में शिंदे की स्थिति इस समय ऐसी है कि उनके राजनीतिक अस्तित्व के लिए भाजपा का साथ अनिवार्यता है. मुंबई में मेयर की डिमांड से इतर देखिए तो उद्धव ठाकरे की पार्टी के प्रदर्शन से साफ है कि मुंबई में अब भी ठाकरे परिवार का दबदबा है. जिस मराठी वोटरों को अपनी तरफ करने के लिए भाजपा ने मुंबई में शिंदे सेना के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था उसका बहुत कम फायदा हुआ है. वैसे भी, बीएमसी में सबसे बड़ी पार्टी बनने के साथ ज्यादातर नगर निगमों में भगवा परचम लहराकर भाजपा ने महाराष्ट्र में खुद को नंबर एक पार्टी बना लिया है. यह शहरी निकाय चुनाव के नतीजों से साफ हो गया है. ऐसे में शिंदे का कोई मूव फडणवीस सरकार को खतरा नहीं पहुंचाने वाला बल्कि अपनी राजनीति को असरदार बनाए रखने के लिए उनका फिर से नरम पड़ना तय है. खबर है कि वह अपने पार्षदों को होटल से बाहर बुला लिए हैं.
वैसे, भी शिंदे मंझे हुए राजनीतिज्ञ हैं. अभी विधानसभा चुनाव 2029 में हैं. शहरी निकायों में वह अपनी पार्टी का प्रभाव देख ही चुके हैं, ऐसे में वह सत्ता से दूर जाने जैसा खतरनाक कदम उठाने के बारे में सोचेंगे भी नहीं.



