आज शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है. ये पर्व हर साल चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन मनाया जाता है. इस दिन विधि-विधान से माता शीतला की पूजा की जाती है.
उनको बासी भोजन का भोग लगाया जाता है. चूंकि माता का भोग सप्तमी तिथि को ही तैयार कर लिया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन माता की पूजा करने से संक्रामक बिमारियों से मुक्ति मिलती है.
सनातन धर्म में बताया गया है कि हर देवी-देवताओं की अपनी अलग-अलग सवारियां हैं. कोई देवी शेर पर सवार होती हैं, तो कोई उल्लू या हाथी पर. इसी तरह माता शीतला गधे पर सवार होती हैं. गधा आमतौर पर मेहनती और सीधा-सादा जानवर माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि माता शीतला गधे पर ही क्यों सवार होती हैं? अगर नहीं तो आइए जानते हैं कि गधा माता की सवारी कैसे बन गया?
स्कंद पुराण के अनुसार…
सनातन धर्म में माता शीतला को बीमारियों को दूर करने वाली देवी माना गया है. विशेषकर चेचक और अन्य त्वचा के रोगों से बचने के लिए उनकी पूजा की जाती है. स्कंद पुराण के अनुसार, माता शीतला की सवारी गधा है. माता अपने हाथों में कलश, सूप और झाड़ू धारण करती हैं. इसके साथ ही वो नीम के पत्तों की माला भी धारण करती हैं.लोगों के मन में ये सवाल आता है कि माता ने गधे को ही क्यों अपनी सवारी के लिए चुना?
शीतला माता की सवारी गधा ही क्यों?
दरअसल, गधा एक बहुत ही मेहनती और सनहशील जानवर है. गधे की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी जबरदस्त मानी जाती है. यानी जल्दी उसको कोई बीमारी नहीं होती. माता शीतला भी बीमारियों को दूर करती हैं. यही कारण है माता ने अपनी सवारी के लिए गधे को चुना. गधा हमें सिखाता है कि धैर्य और सहनशीलता से हर परेशानी से पार पाया जा सकता है.



