बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को 2025 के चुनाव के पहले राष्ट्रीय जनता दल से अलग कर दिया गया था. आरजेडी से बाहर निकाले जाने के बाद उन्होंने अपनी पार्टी जनशक्ति जनता दल का गठन किया और कई सीटों पर अपने प्रत्याशियों को चुनाव में उतारा.
तेज प्रताप यादव खुद भी महुआ विधानसभा सीट से चुनाव लड़े, लेकिन एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हुए.
प्रशांत किशोर और तेज प्रताप ने बीते मंगलवार की मुलाकात
अभी विधानसभा चुनाव में काफी वक्त है, लेकिन उससे पहले आगे की राजनीति के लिए वह विकल्प की तलाश में है और इसी कड़ी में कल मंगलवार (21 अप्रैल) को राजनीति रणनीतिकार कहे जाने वाले जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर और तेज प्रताप यादव मिले. प्रशांत किशोर से मिलने के बाद उन्होंने एक्स पर भी पोस्ट किया और लिखा कि प्रशांत किशोर जी से मुलाकात हुई, जहां हमने जनहित और भविष्य के राजनीति को लेकर गहन चर्चा की.
तेजप्रताप यादव ने अपने पोस्ट में लिखा कि यह मुलाकात केवल औपचारिक नहीं थी, बल्कि इसमें कई ऐसे मुद्दों पर विचार-विमर्श हुआ जो आने वाले समय में राजनीति की दिशा तय कर सकते हैं. उन्होंने लिखा कि इस संवाद को वे अपने राजनीतिक जीवन के एक महत्वपूर्ण अनुभव के रूप में देखते हैं, जहां सकारात्मक सोच और जनसेवा की भावना के साथ आगे बढ़ने का संकल्प और भी मजबूत हुआ.
क्या दोनों मिलकर बिहार की राजनीति में लाएंगे अलग मोड?
अब सवाल उठ रहा है कि तेज प्रताप और प्रशांत किशोर के मिलने का क्या मायने हैं और क्या दोनों मिलकर बिहार की राजनीति को अलग मोड पर ला सकते हैं? दोनों मिलकर एनडीए गठबंधन और महागठबंधन की वोट बैंक में सेंधमारी करने में कामयाब होंगे. राजनीतिक जानकार और वरिष्ठ पत्रकार संतोष कुमार ने कहा कि आगे की राजनीति के लिए दोनों ने मुलाकात की है. लेकिन 2025 के चुनाव में दोनों की पार्टी जीरो बटा जीरो रही है.
प्रशांत किशोर एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हुई .तो तेज प्रताप यादव भी खुद चुनाव हार गए. दोनों एक मजबूत गठबंधन की तलाश में है और आगे की राजनीति के लिए दोनों मिले हैं. परंतु यह इतना आसान नहीं है. संतोष कुमार ने कहा कि इस बात से कभी इनकार नहीं किया जा सकता कि बिहार में पूरी तरह जातिगत राजनीति होती है और जाति के आधार पर ही वोट बैंक बने हुए हैं. देश की सबसे बड़ी पार्टी कहे जाने वाली बीजेपी अकेले दम पर बिहार में पीछे रह जाती है. उसकी बड़ी वजह जातिगत राजनीति है और यहीं वजह है कि बिहार में बीजेपी को नीतीश कुमार को साथ रखना मजबूरी होती है.
बिहार में सभी पार्टियों का अपना जातिगत वोट बैंक
प्रशांत किशोर ने चुनाव से पहले 2 साल तक काफी मेहनत की और सभी वर्गों को जोड़कर चलने का काम किया. लेकिन चुनाव में क्या मिला यह सबने देखा. तेज प्रताप यादव ने भी नई पार्टी बनाई, लेकिन वह आरजेडी से निकले हैं. बिहार में हर पार्टी का जाती के आधार पर वोट बैंक है, चाहे चिराग पासवान हो, उपेंद्र कुशवाहा हो या जीतन राम मांझी हो. सभी का अपनी जाति का वोट बैंक है. तेज प्रताप यादव को आरजेडी के वोट बैंक से सेंधमारी करके अपने पाले में लाना होगा, जो इतना आसान नहीं है.
आरजेडी का एम वाई समीकरण मजबूत है और जिधर लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव रहेंगे वह वोट उधर ही रहेगा. इसलिए तेज प्रताप यादव के मजबूत जातिगत वोट बैंक नहीं है. प्रशांत किशोर के पास भी जातीय समीकरण के आधार पर वोट बैंक नहीं है. यही कारण है कि 2025 के चुनाव में वह फिसड्डी हो गए .
उन्होंने कहा कि दोनों मजबूत गठबंधन की तलाश में है. लेकिन इन लोगों को वैसे गठबंधन को अपने गठबंधन में जोड़ना होगा जो जातिगत वोट बैंक की पार्टी है. तभी इन लोग का नंबर बढ़ सकता है. अभी चुनाव में लंबा समय है इसलिए दोनों मिलकर जनाधार बनाने की कोशिश कर रहे हैं, परंतु बहुत ज्यादा सफल होने की उम्मीद नहीं दिख रही है.



