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“हरतालिका तीज 2026: व्रत की परंपरा और पूजा विधि”

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रतालिका तीज 2026: हरतालिका तीज का व्रत भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण तप माना जाता है। यह त्यौहार भाद्रपद की शुक्ल तीज को मनाया जाता है, जो आमतौर पर अगस्त या सितंबर में आता है। इसे गौरी तृतीया व्रत भी कहा जाता है और यह प्रकृति के प्रति समर्पण का एक बड़ा पर्व है। आज इस तप पर्व का आयोजन किया जा रहा है।

व्रत की परंपरा

हरतालिका तीज, हरियाली तीज और करवा चौथ की तरह, सुहागिनों का व्रत है। इस दिन महिलाएं अपने पतियों की लंबी उम्र के लिए व्रत करती हैं और भगवान शिव तथा माता पार्वती से आशीर्वाद मांगती हैं। यह व्रत निराहार और निर्जला होता है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए सबसे पहले यह व्रत किया था, इसलिए कुंवारी कन्याएं भी इसे रख सकती हैं।

हरतालिका तीज का इतिहास; सहेलियों ने जब हर लिया गौरी को

माता गौरी ने शिव जी को पति रूप में पाने के लिए कठिन तप किया था। इस दौरान उनकी सहेलियों ने उन्हें अगवा कर लिया था, जिससे इस व्रत का नाम हरतालिका पड़ा। ‘हरत’ का अर्थ है अगवा करना और ‘आलिका’ का अर्थ है सहेली।

व्रत से जुड़ी मान्यताएं” व्रत से जुड़ी कई मान्यताएं

हरतालिका व्रत से जुड़ी मान्यताएं हैं, जैसे जो महिलाएं इस व्रत में सोती हैं, वे अगले जन्म में अजगर बनती हैं। जो दूध पीती हैं, वे सर्पिणी बनती हैं, और जो व्रत नहीं करतीं, वे विधवा बनती हैं।

हरतालिका तीज के नियम; हरतालिका तीज नियम

यह व्रत निर्जला होता है, अर्थात पूरे दिन और रात जल ग्रहण नहीं किया जाता। इसे कुंवारी कन्याएं और सौभाग्यवती महिलाएं करती हैं। इस व्रत को एक बार प्रारंभ करने के बाद छोड़ा नहीं जा सकता। हर साल इसे पूरे नियमों के साथ मनाया जाता है।

पूजन विधि; हरतालिका तीज पूजन विधि

हरतालिका पूजन प्रदोष काल में किया जाता है। पूजा के लिए शिव, पार्वती और गणेश जी की प्रतिमा बालू या काली मिट्टी से बनाई जाती है। पूजा के दौरान कलश का पूजन किया जाता है और फिर गणेश जी, शिव जी और माता गौरी की पूजा की जाती है।

पूजन सामग्री” पूजन सामग्री

पूजा के लिए विशेष प्रकार के फूल, काली मिट्टी, केले के पत्ते, फल, फूल, और सुहाग का सामान जैसे चूड़ी, बिछिया, काजल, बिंदी आदि की आवश्यकता होती है।

हरतालिका तीज की कथा” हरतालिका तीज व्रत कथा

शिव जी ने माता पार्वती को इस व्रत का महत्व समझाया। पार्वती जी ने भगवान शिव को वर के रूप में पाने के लिए कठोर तप किया। उनकी तपस्या से प्रभावित होकर भगवान विष्णु ने पार्वती जी का हाथ विवाह के लिए मांगा। इस प्रकार पार्वती जी को शिव जी से पुनः सुहाग प्राप्त हुआ।