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छत्तीसगढ़ : कमल फूल की खेती वाले इन किसानों को दिवाली का बेसब्री से इंतजार

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दिवाली आते ही बाजार गुलजार होने लगता है। दिवाली को लेकर लोगों में एक अलग ही उत्साह देखने को मिलता है। इस पर्व में यदि सबसे ज्यादा किसी चीज की डिमांड होती है तो वह कमल का फूल। इसके बिना लक्ष्मी पूजा अधूरी मानी जाती है। फूल तैयार करने में किसानों को पूरे छह माह लगते हैं। इसके लिए वे दिन-रात कड़ी मेहनत कर फूल तैयार करते हैं, ताकि लोगों को आसानी से फूल मिल सके। किसान इस पर्व का पूरे साल भर इंतजार करते हैं, क्योंकि इसी से उनका घर चलता है और उनकी दिवाली मनती है। राजधानी के मठपारा स्थित कमल फूल की खेती कर रहे किसान भरत ढीमर बताते हैं कि सालभर दिवाली के त्योहार का बेसब्री से इंतजार करता है।

यह ऐसा पर्व है, जिसकी बदौलत गरीब किसानों के घरों में दीप जल पाते हैं। लोग जिस कीचड़ को देखकर अपना मुंह फेरते हैं, हम उसी कीचड़ से कमल का फूल खिलाते हैं। वे कहते हैं कि पूरे साल में दो बार इसकी खेती होती है, लेकिन दीपावली के समय ही उन्हें थोड़ा लाभ मिल पाता है। इसके चलते उनकी दिवाली मन पाती है।

शहर के बीचोबीच मठपारा के पास स्थित एक ऐसी जगह है, जहां सालों से कमल फूल की खेती की जा रही है। किसानों के मुताबिक यहां तकरीबन 50 एकड़ कृषि जमीन पर खेती होती थी, लेकिन नेशनल बस स्टैण्ड में 30 एकड़ कृषि भूमि शामिल हो गई। इसके चलते अब 20 एकड़ में खेती की जा रही है।

किसान विजय ढीमर बताते हैं कि उनका पूरा परिवार इसी खेती पर आधारित है। दिवाली उनके परिवार के लिए सबसे बड़ा पर्व है, क्योंकि इस पर्व में ही कमल की बिक्री होती है। जिससे परिवार का भरण पोषण हो पाता है।

कीटनाशक पर खर्च ज्यादा

किसान बताते हैं कि एक एकड़ में तकरीबन 10 हजार के दवाई लग जाते हैं। जितने की इनकम नहीं होती उससे ज्यादा के किटनाशक दवाइयों में रुपए खर्च लगता है। वहीं इसके लिए 10 से 12 बनिहार भी लगाने होते हैं उन्हें भी इसके लिए रोजगार देना होता है।

दादा किया करते थे खेती

किसान भरत बताते हैं कि तकरीबन 40 साल पहले दादा दाऊलाल ढीमर इसकी खेती करते थे। उसके बाद पिता मुकुंद ने लंबे समय तक इसकी बागडोर संभाले रखा था। अब 10 साल से वे इसकी खेती कर रहें हैं। वहीं एक और किसान विजय ढीमर तीसरी पीढ़ी का है जो इस परंपारगत खेती करते आ रहे हैं।

बारिश से फसल को नुकसान

कमल की खेती करने वाले किसान कुलेश ढीमर कहते हैं कि इस साल किसानों को काफी नुकसान हुआ है। देर से आए मानसुन ने किसानों की खेती को प्रभावित किया है। वे कहते हैं कि अभी भी बारिश हो रही है जिसके चलते फसल को काफी नुकसान हुआ है।

सफ़ेद बालों से हैं परेशान तो करें ये उपाय

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सभी यह चाहते है कि उसके बाल काले और चमकदार रहे। उम्र के साथ बालों का सफेद होना नेचुरल है लेकिन अगर बाल समय से पहले ही सफेद हो रहे हों तो बेशक ये तनाव की बात है। ऐसी स्थिति में लोग बालों को सफेद होने से बचाने के लिए क्या कुछ नहीं करते हैं लेकिन फायदा कुछ भी नहीं होता है। बालों के सफेद होने के बहुत से कारण हो सकते हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपके बाल जल्दी सफेद न हों तो ये घरेलू उपाय बहुत लाभकारी सिद्ध होंगे।

बालों में कुछ भी लगाने का फायदा तभी होगा जब आपका आहार भी अच्छा हो। कई बार पौष्टिक आहार की कमी के चलते भी बाल समय से पहले सफेद हो जाते हैं। इसलिए कोशिश करें कि अपनी डाइट में पौष्टिक आहार जरूर हो।

प्याज का रस भी है फायदेमंद

प्याज के कुछ टुकड़ों को अच्छी तरह मिक्सर में पीस लीजिए। इसके बाद उसे निचोड़कर, उसके रस से स्कैल्प पर मसाज कीजिए। हफ्ते में दो बार ऐसा करने से फायदा होगा।

तेल लगाना बहुत जरूरी

बालों में नियमित रूप से तेल लगाना बहुत जरूरी है। नारियल तेल और बादाम के तेल को मिलाकर लगाने से बहुत फायदा होता है।

आंवला

अगर आपके बाल बहुत जल्दी सफेद होने लगे हैं तो आपके लिए आंवला और गुड़हल के फूलों का इस्तेमाल बहुत फायदेमंद रहेगा। आंवला, गुड़हल और तिल का पेस्ट बना लें। इसमें नारियल तेल की कुछ बूंदे मिलाकर स्कैल्प पर मसाज करने से फायदा होगा।

छत्तीसगढ़ : सुपेबेड़ा में 250 से अधिक किडनी मरीज, 14 साल में 68 मौतें पर ये बोले स्वास्थ्य मंत्री

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साल 2005 में ही सुपेबेड़ा में मौतों का सिलसिला शुरू हुई,जो जारी है। सितंबर 2019 में एक, अक्टूबर में दूसरी मौत हुई और आंकड़ा बढ़कर 68 जा पहुंचा हैं। भाजपा कार्यकाल में भी हंगामा मचा, कांग्रेस के कार्यालय में भी बबाल मचा हुआ है। राज्यपाल अनुसईया उइके ने जब से सुपेबेड़ा जाने की बात कही है तो मामला और गरमा गया है। बहरहाल मरीजों के मिलना का सिलसिला जारी है। अभी भी यहां पर 250 से अधिक मरीज हैं। राज्यपाल के दौरे के ठीक 24 घंटे पहले स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने विभागीय अफसरों, एम्स निदेशक, विशेषज्ञों के साथ संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस ली। जिसमें उन्होंने स्पष्ट कहा कि बीमारी है, जिसे पूरी गंभीरता से लिया जा रहा है।

कोई एक ठोक कारण नहीं है, न ही हम नतीजे तक पहुंच पाए हैं। कारण का पता लगाया जा रहा है। मरीजों के इलाज की संपूर्ण व्यवस्था है। मगर एक सवाल के जवाब में उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि साधन-संसाधनों की कमी है। तेल नदी से पानी लाने, शुद्धिकरण में वक्त लगेगा। कम से कम एक साल।

बतां दें कि सालभर पहले विपक्ष में बैठी कांग्रेस सुपेबेड़ा में मौतों को लेकर हमलावर थी। स्वास्थ्य मंत्री ने ये भी कहा कि वे केंद्र के संस्थानों की मदद ले रहे हैं लेकिन सीधे केंद्र सरकार से अभी कोई मदद नहीं ली गई है। वे कहते हैं कि अभी इमरजेंसी (आपातकाल) जैसी स्थिति नहीं है।

ये हो सकते हैं मौतों के प्रमुख तीन बड़े कारण-

पहला- पानी

सुपेबेड़ा में मौत की बड़ी वजहों में से एक है पानी। 2017 में आइसीएमआर जबलपुर और इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर की मिट्टी परीक्षण रिपोर्ट में इस बात का जिक्र था कि पानी में हेवी मेटल पाए गए हैं। क्रोमियम, कैडिमियम और भी। वहीं पीएचई की रिपोर्ट में पानी में फ्लोराइड, आरसेनिक की मात्रा ज्यादा मिली।

दूसरा- अनुवांशिक बीमारी

– विभाग की सचिव निहारिका बारीक, एम्स रायपुर के निदेशक डॉ. नितिन एम. नागरकर के मुताबिक किडनी की बीमारी अनुवांशिक होती है। यह जांच का विषय है कि आखिर कितने ऐसे परिवार हैं जिनमें हिस्ट्री इस बात को पुख्ता करती है कि पूर्व में मौतें किडनी फ्लोयर की वजह से हुईं।

तीसरा- ओडिशा की शराब

– स्वास्थ्य मंत्री ने इस बात को स्वीकार किया है कि ओडिशा से सटे इस क्षेत्र के नागरिक ओडिशा की शराब पीते हैं। जिसमें यूरिया पाया गया है। इस पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है। बतां दें कि ओडीसा के कुछ क्षेत्रों जो सुपेबेड़ा से सटे हैं, वहां भी किडनी की बीमारी से मौतें रिपोर्ट हैं।

तेल नदी का पानी लाया जाएगा, वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगेगा

सरकार किडनी की मौत के लिए फिलहाल पानी को जिम्मेदार मान रही। यही वजह है कि तेल नदी का पानी गांव तक लाने, उसमें वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाने की बात कही जा रही है। इसमें दो करोड़ का खर्च आएगा। लेकिन पानी पहुंचाने में सालभर तो लगेगा।

आज राज्यपाल का अहम दौरा, स्वास्थ्य मंत्री होंगे साथ

राज्यपाल अनुसुईया उइके रायपुर से मंगलवार को सुपेबेड़ा के लिए उड़ान भरेंगी। उनके साथ स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव,स्वास्थ्य सचिव निहारिका बारीक होंगी। राज्यपाल ने जब सुपेबेड़ा जाने की बात कही, यह भी कहा कि वे केंद्र को रिपोर्ट देंगी। इसके बाद से राज्य में राजनीति गरमाई हुई है।अब देखना यह अहम होगा कि राज्यपाल दौरे के बाद क्या कहती हैं? उनका दौरा अहम है।

क्या करें जब मौसमी बीमारियाँ सताएँ और बचना हो एंटीबायोटिक दवाओं के सेवन से भी

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 मौसम अब बदल रहा है ।सुभा और रात में हल्की सर्दी पड़ने लगी है और दिन में गर्मी । इस मौसम में बीमारियाँ सबसे तेज़ी से फैलती है । लोग बहुत ज्यादा बीमार पड़ते हैं । कई कई लोगों को तो मौसम से इतनी ज्यादा जल्दी प्रभाव पड़ता है की मौसम बदला नहीं की वो बीमार पड़ जाते हैं । यही ही समय होता है जब हमको खुद के प्रति बहुत सावधानी बरतने की जरूरत पड़ती है ।

लोग ध्यान नही रखते हैं और ठंडा पानी पीते ही रहते हैं । इसके साथ ही ओढ़ने पहनने का भी ध्यान नहीं रखते हैं । इसके कारण मौसमी बीमारियाँ बहुत तेज़ी से फेलती है । आज हम आपको इन बीमारियों से बचने का बहुत ही अच्छा और शानदार तरीका बताने जा रहे हैं । इन मौसमी बीमारियों को ठीक करने के लिए आपको एंटीबायोटिक दवाओ का सेवन करने की भी जरूरत नहीं होगी । आइए जानते हैं क्या किया जाये ऐसे में ।

तुलसी अधरक और काली मिर्च की चाय :- जब भी आपको खांसी जुकाम , बुखार और गले में इन्फेक्शन की परेशानी हो तो चाय में अधरक के साथ 7-8 तुलसी के पत्ते , काली मिर्च को पीस कर दाल दें और उसका सेवन करें । इन तीनों में ही एंटी बायोटिक और एंटी इनफ्लेमेटरी गुण पाये जाते है ।

लॉन्ग और शहद :- शहद में लॉन्ग को पीस कर उसको दिन में लगभग 3-4 बार सेवन करें इससे भी आपकी परेशानी का अंत हो जाएगा ।अधरक को हल्के घी में सेक कर आप उस पर सेंधा नमक दाल लें । और जब भी आपको गले में परेसनी हो या खांसी की परेशानी हो तो इसका सेवन करें आपको लाभ होगा ।

दूध में हल्दी मिला कर पीने के अलावा आप गरम पानी में हल्दी और नमक दाल कर गरारे करें इससे आपको बहुत लाभ होगा ।

छत्तीसगढ़ : महिला समूहों ने बदली पहचान, देशभर में ख्यात हुआ कांकेर का सीताफल

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मिट्टी कम उपजाऊ है, पानी की उपलब्धता भी कम है, लेकिन सीताफल के उत्पादन के लिए यहां एकदम अनुकूल है। बस इसी बात को ध्यान में रखकर कांकरे की महिलाओं ने सीताफल के बूते गरीबी को पछाड़ने के लिए कुछ वर्षों पहले ठानी। स्थानीय कृषि विभाग व प्रशासन से सहयोग मिला, जिसकी बदौलत आज कांकेर के लगभग 16 हजार परिवार का मुख्य व्यवसाय सीताफल बन गया है, जबकि कुछ वर्ष पहले प्रदेश का आदिवासी बहुल कांकेर जिला माओवाद प्रभावित बस्तर का एक हिस्सा माना जाता था।

अब इसकी पहचान बदल गई है, जो कि अब यह ऑर्गेनिक सीताफल के लिए जाना जाने लगा है। ये सब कर दिखाया है शीतल स्व सहायता समूह की महिलाओं ने, जो आज दो महीने में लगभग एक लाख रुपये तक की आय कर रही हैं, जबकि एक समय यही महिलाएं सिर्फ पांच हजार रुपये तक कमा रही थीं।

समूह से जुड़ीं कई महिलाएं

समूह की अध्यक्ष अहिल्या मंडावी ने बताया कि कांकेर जिला एक माओवादी इलाका है, जहां जंगलों में सीताफल के असंख्य पेड़ उगे हुए हैं, कुदरती तौर पर जंगलों में फलने वाले सीताफल की अब तक कोई पहचान नहीं थी। इसके कारण हम सभी महिलाएं सड़के के किनारे सीताफल कम दामो में बेचा करती थी।

इससे स्वयं को फायदा मिलने के बजाय कारोबारियों को अधिक फायदा होता था, क्योंकि वह अधिक दाम पर शहरों में सीता फल को बेचते थे। वहीं एक वर्कशॉप के दौरान कृषि विभाग के आत्मा योजना में जाना हुआ।

जहां पर सहायक तकनीकी प्रबंधक के माध्यम से सीताफल को तोड़ने, संग्रहण करने के साथ श्रेणीकरण के बारे में जानकारी दिया गया। बस यही से शुरू हुआ बेहतर प्रशिक्षण का दौर। जिसके बाद आज जिले में लगभग पांच हजार समूह तैयार हो गया है। जिससे कई महिलाएं जुड़ गई ।

8000 मीट्रिक टन की पैदावार

जिले में इस बर्ष लगभग 8000 मीट्रिक टन सीताफल उत्पादन होगा। जिसकी तैयारी में जिले के पांच हजार समूह की महिलाए जुट गई है। ज्ञात हो कि जिसे जिला प्रशासन और कृषि विभाग ने ‘कांकेर वैली फ्रेश’ के नाम से ब्रांड तैयार कर समूहों के माध्यम से सीताफल संग्रहण, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और वैल्यू एडिशन की योजना तैयार किया है। जिले के नरहरपुर, लिलवापहर, चारामा, अंतागढ़, कांकेर विकासखंडों में अधिक पैदावार होती है।

ऑर्गेनिक सीताफल

सीताफल का उत्पादन छत्तीसगढ़ के अन्य जिलों में भी होता है, लेकिन कांकेर जिले का यह सीताफल प्रसिद्घ है। इंदिरा गांधी कृषि विवि के कृषि वैज्ञानिक डॉ. जीवन लाल नाग ने बताया कि यहां प्राकृतिक रूप से उत्पादित सीताफल के 3 लाख 19 हजार पौधे हैं। जिससे प्रतिवर्ष अक्टूबर से नवम्बर तक 6 हजार टन सीताफल का उत्पादन होता है।

यहां के सीताफल के पौधों में किसी भी प्रकार की रासायनिक खाद या कीटनाशक का प्रयोग नहीं किया जाता है। यह पूरी तरह जैविक होता है। इसलिए यह ऑर्गेनिक सीताफल स्वादिष्ट होने के साथ पौष्टिक भी होता है।

महिला से रेप के लिए 15 साल पहले दोषी करार व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट ने किया बरी

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एक महिला से दुष्कर्म के लिए निचली अदालत द्वारा एक व्यक्ति को दोषी करार दिए जाने के 15 साल बाद उच्चतम न्यायालय ने उसे यह कहते हुए बरी कर दिया कि ‘पीड़िता’ भरोसेमंद गवाह नहीं है क्योंकि बार-बार वह अपना रुख बदलती रही।

उच्चतम न्यायालय ने आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के साथ ही निचली अदालत के फैसलों को खारिज कर दिया जिसमें व्यक्ति को दोषी ठहराया गया था । वर्ष 2011 में उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के सितंबर 2004 के फैसले को बरकरार रखा जिसमें उसे दोषी ठहराते हुए 10 साल की सजा दी गयी थी।

न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति सूर्यकांत की पीठ ने कहा कि निचली अदालत ने एक तरह से पुलिस द्वारा दर्ज किए गए बयानों पर भरोसा करते हुए व्यक्ति को दोषी करार दिया और अदालत के सामने दिए गए बयानों को पूरी तरह नजरअंदाज किया गया। पीठ ने कहा कि अदालत में शपथ पर बयान दिया जाता है जो कि दोषसिद्धि का आधार होता है।

पीठ ने व्यक्ति को बरी करते हुए कहा कि निस्संदेह यह सच है कि दुष्कर्म के मामले में दोषसिद्धि मामला दर्ज करने वाले की एकमात्र गवाही पर आधारित हो सकता है। लेकिन वहां एक चेतावनी है कि बयान में भरोसा जगना चाहिए । यह ऐसा मामला है जहां समय-समय पर पीड़िता का सुर और उसका रुख बदलता रहा।

छत्तीसगढ़ : जोगी पर FIR के खिलाफ पेश याचिका में सुनवाई बढ़ी

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हाई कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के खिलाफ जाति मामले में सिविल लाइन थाने में दर्ज एफआइआर के खिलाफ पेश याचिका में सुनवाई आगे बढ़ा दी गई है। कोर्ट ने मामले को सुनवाई के लिए आठ नवंबर को रखने का आदेश दिया है। उच्च स्तरीय जाति छानबीन समिति की रिपोर्ट आने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के खिलाफ कलेक्टर बिलासपुर के निर्देश पर तहसीलदार ने सिविल लाइन थाने में फर्जीवाड़ा कर जाति प्रमाण पत्र बनवाने की रिपोर्ट दर्ज कराई है।

इसके खिलाफ अजीत जोगी ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की है। याचिका में दर्ज एफआइआर को रद करने की मांग की गई है। सोमवार को याचिका को सुनवाई के लिए कोर्ट में रखा गया। कोर्ट ने याचिका को सुनवाई के लिए आठ नवंबर को रखने का आदेश दिया है। उल्लेखनीय है कि पूर्व में कोर्ट ने एफआइआर पर रोक लगाने पेश आवेदन को खारिज किया है।

पूर्व सीएम डॉ.रमन सिंह के प्रमुख सचिव की पत्नी के खिलाफ जांच पर रोक

हाई कोर्ट ने पूर्व सीएम डॉ.रमन सिंह के प्रमुख्ा सचिव रहे अमन सिंह की नृत्यांगना पत्नी को लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग में संविदा नियुक्ति दिए जाने की जांच पर रोक लगाई है। पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के प्रमुख सचिव रहे अमन सिंह की पत्नी यास्मीन सिंह को 2005 लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अंतर्गत संचार एवं क्षमता इकाई में संचालक प्रचार-प्रसार एवं क्षमता वर्धन के पद में संविदा नियुक्ति दी गई।

इन्हें प्रतिमाह 35 हजार रुपये मानदेय दिया जा रहा था। बाद में गोपनीय तरीके से उन्हें दिसंबर 2018 तक उनकी संविदा नियुक्ति बढ़ाई गई। इसके साथ मानदेय राशि 35 हजार से बढ़ाकर एक लाख रुपये कर दी गई थी। मामले में कांग्रेस नेता विकास तिवारी ने शिकायत की। इसमें कहा गया कि यास्मीन सिंह कथक नृत्यांगना हैं। उन्हें सरकारी कार्य का कोई भी अनुभव नहीं है। उन्होंने ज्यादा समय देश-विदेश में नृत्य प्रस्तुत की है।

पीएचई में उनके अवकाश व उपस्थिति के संबंध में कोई रिकॉर्ड नहीं है। राज्य शासन ने शिकायत पर यास्मीन सिंह के खिलाफ जांच प्रारंभ की है। इसके खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की है। इसमें कहा गया कि उन्हें सरकार ने संविदा नियुक्ति दी थी।

नृत्यांगना होने के कारण उन्हें आमंत्रण दिया जाता था। इसके लिए मानदेय का भुगतान किया गया है। इसमें किसी भी प्रकार की गड़बड़ी नहीं है। जस्टिस गौतम भादुड़ी ने सुनवाई के बाद याचिकाकर्ता यास्मीन सिंह के खिलाफ चल रही जांच पर रोक लगा दी है।

रफाल की आलोचना करते वक्त इन बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है

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फ्रांस में आठ अक्टूबर को हुए एक हस्तांतरण समारोह के साथ पहला रफ़ाल युद्धक विमान भारत को मिल चुका है, भले ही वह अभी भारत नहीं पहुंचा है. भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने उस पर ‘ओम’ लिख कर और नारियल-फूल चढ़ा कर जो ‘शस्त्रपूजा’ की, उसकी भारत के विपक्षी नेताओं और मीडिया ने भी खूब खिल्लियां उड़ायीं. पिछले लोकसभा चुनावों से पहले विपक्ष और मीडिया रफ़ाल विमान के सौदे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भ्रष्ट और चोर कह रहे थे. इस बात पर उस समय किसी का ध्यान नहीं था कि रफ़ाल के देश फ्रांस को भारत की इस घरेलू चख-चख से कहीं ठेस तो नहीं पहुंच रही होगी!

ठेस इसलिए, क्योंकि फ्रांस से भारत का जुड़ाव सिर्फ रफ़ाल सौदे तक ही सीमित नहीं है. फ्रांस यूरोपीय संघ का एकमात्र ऐसा देश है, जो एक लंबे समय से भारत की प्रतिरक्षा तैयारियों में उदारतापूर्वक हाथ बंटा रहा है. पहले रफ़ाल विमान के हस्तांतरण के समारोह में फ्रांस की रक्षामंत्री मदाम फ्लोरेंस पार्ली ने कहा कि उनका देश भारत के साथ न केवल व्यावहारिक और तकनीकी दृष्टि से सहयोग करेगा, बल्कि जब बात 36 रफ़ाल विमानों को समय पर देने की हो तो वह इस पर भी पूरा ध्यान देगा कि उनका डिज़ाइन भारतीय वायुसेना के विशिष्ट मानदंडों के अनुसार ही बने.

इससे भी महत्वपूर्ण है फ़्रांस की रक्षामंत्री मदाम फ्लोरेंस पार्ली का यह संदेश कि उनका देश भारत की सैन्यशक्ति को मज़बूती देने के लिए प्रतिबद्ध है. रक्षामंत्री राजनाथ सिंह जब फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों से मिले, तो उन्होंने भी एक बहुत ही स्पष्ट और ज़ोरदार अंदाज़ में टिप्पणी करते हुए कहा कि फ्रांस की राज्यसत्ता उग्र इस्लामी आतंकवाद से लड़ने के लिए वह सब कुछ करेगी, जो वह कर सकती है. हम इसे फ्रांसीसी दृढ़संकल्प की घोषणा भी मान सकते है.

यही नहीं. कुछ ही दिन पहले फ्रांस की सरकार ने वहां रहने वाले पाकिस्तानियों द्वारा आयोजित एक ऐसा भारत-विरोधी प्रदर्शन नहीं होने दिया, जिसमें वे पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के तथाकथित ‘राष्ट्रपति’ सहित कई अन्य लोगों को भी आमंत्रित करना चाहते थे. प्रेक्षक मानते हैं कि नरेंद्र मोदी की सरकार आने के बाद से भारत और फ्रांस के बीच वास्तव में अपने ढंग का एक नया और काफ़ी चौंकाने वाला गंठबंधन बन रहा है.

इस गठबंधन के प्रमाण के तौर पर प्रेक्षक गिनाते हैं कि फ्रासं और भारत के बीच 11 अरब डॉलर का पारस्परिक व्यापार पहले से ही है. रफ़ाल-सौदा अकेले ही क़रीब 30 अरब डॉलर के बराबर है. इसके अतिरिक्त भारत को मिले फ्रांस के 49 मिराज युद्धक विमानों के अद्यतीकरण (अपग्रेडेशन) का भी तीन अरब डॉलर का एक अनुबंध है. मिराज विमानों का अद्यतीकरण भारत के लिए प्रतिरक्षा की दृष्टि से ही नहीं, तकनीकी दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण है. 80 के दशक में ख़रीदे गये इन विमानों को आधुनिक बनाने का काम भारत में ‘एचएएल’ के कारख़ानों में किया जा रहा है. इसके लिए आवश्यक तकनीकी ज्ञान एवं साधन भारत को पहले ही मिल चुके हैं.

भारत फ्रांसीसी डिज़ाइन वाली छह स्कॉर्पीन पनडुब्बियां भी बना रहा है. उनके निर्माण के लिए आवश्यक तकनीकी ज्ञान भी उसे हस्तांतरित कर दिया गया है. इस समय मुंबई के मज़गांव डॉक में तीसरी स्कॉर्पीन पनडुब्बी बन रही है. पहली पनडुब्बी भारतीय नौसेना को मिल चुकी है. दूसरी भी बनकर तैयार है. इस समय उसकी अंतिम परीक्षाएं हो रही हैं.

भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि यूरोपीय संघ से ब्रिटेन का तलाक हो जाने के बाद फ्रांस उसका एक बेहतर विकल्प बन सकता है. भारत के निवेशक अब तक ब्रिटेन को ही यूरोप में जाने का प्रवेश द्वार मानते रहे हैं. किंतु ब्रेग्ज़िट के बाद ब्रिटेन यूरोप का प्रवेश द्वार नहीं रह जायेगा. उसे सबसे पहले अपने यहां उन अव्यवस्थाओं एवं अराजकताओं से निपटने पड़ेगा, जिनका न तो वहां की जनता को और न ही सरकार को कोई यथार्थ आभास है.

तब इस बात की संभावना भी बढ़ जायेगी कि भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (फ्री ट्रेड एग्रीमेंन्ट) की लंबे समय से जो अनमनी वार्ताएं हो रहीं हैं, फ्रांस के सहयोग से उनमें नयी जान पड़ जाये. इन वार्ताओं में गतिरोध का एक बड़ा कारण जर्मनी है. वह चाहता है कि भारत उसके उत्पादों के लिए, विशेषकर उसकी कारों और खाद्य पदार्थों के आयात के लिए, अपने बाज़ार पूरी तरह खोल दे. लेकिन वह अपना श्रम बाज़ार भारतीयों के लिए नहीं खोलना चाहता. प्रेक्षकों का मानना है कि यूरोपीय संघ की सबसे बड़ी अर्थव्यस्था होने का दंभ जर्मनी को भारत के प्रति वैसा नरम रुख अपनाने नहीं देता, जैसे रुख का संकेत फ्रांस की माक्रों सरकार दे रही है.

भारत में इस तथ्य को भी नोट किया जाना चाहिये कि अनुच्छेद 370 के निष्प्रभावी होने के बाद, फ्रांस के विपरीत, ब्रिटेन ने पाकिस्तान समर्थकों के भारत विरोधी उग्र प्रदर्शन अपने यहां होने दिये. वहां भारतीय उच्चाय़ोग के भवन पर पथराव हुआ और खिड़कियों के कांच तोड़ दिये गये. यहा तक कि भारतीय तिरंगे को फाड़ दिया गया.

यही नहीं, ब्रिटेन की विपक्षी लेबर पार्टी के प्रमुख जेरेमी कॉर्बिन सहित कई लोगों ने कश्मीर के मसले पर भारत की प्रत्यक्ष या परोक्ष आलोचना भी की. लंदन में पाकिस्तानियों के ही नहीं, ख़ालिस्तानियों के भी भारत विरोधी प्रदर्शन होते रहते हैं. जैसे यह सब पर्याप्त न हो, कैम्ब्रिज के ड्यूक और उनकी पत्नी को चार दिनों की शाही यात्रा पर पाकिस्तान भेजा जा रहा है, यह जानते हुए कि पाकिस्तान इसका भरपूर प्रचारात्मक लाभ उठायेगा. कई बार ऐसा लगता है, मानो ब्रिटेन आज भी पाकिस्तान के समर्थन की उसी नीति पर चल रहा है, जिस पर चलते हुए सात दशक पूर्व उसने भारत का विभाजन कर पाकिस्तान बनाया था.

दूसरी ओर फ्रांस ने भारत को मिलने जा रहे 36 में से पहला रफ़ाल सौंपे जाने के समारोह के वक्त अपने यहां कोई भारत विरोधी प्रदर्शन नहीं होने दिया. ऐसा करके उसने यही संदेश दिया है कि वह भारत के साथ दूरगामी घनिष्ठ संबंध चाहता है. इसका एक प्रबल प्रमाण फ्रांस ने 2018 में भी दिया था.

हिंद महासागर में चीन की बढ़ती हुई सक्रियता का उत्तर देने के लिए मोदी सरकार इस इलाके के विभिन्न देशों में नौसैनिक अड्डे बनाने या ऐसे समझौते करने में लगी हुई है जरूरत पड़ने पर जिनके उपयोग की सुविधा उसे मिल जाये. जनवरी 2018 में भारत और फ्रांस के बीच नौसैनिक सहयोग के एक ऐसे ही समझौते को अंतिम रूप दिया गया.

इस समझौते में कहा गया है कि भारतीय नौसेना, अफ्रीका के पास लाल सागर पर बसे जिबूती में फ्रांस के मुख्य नौसैनिक अड्डे तथा दक्षिणी हिंद महासागर के रेउन्यों द्वीप समूह जैसे फ्रांसीसी नौसैनिक अड्डों का उपयोग कर सकती है. फ्रांस ही यूरोप का एकमात्र ऐसा देश है, जिसके हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में कुल चार नौसैनिक अड्डे हैं. उसके पास अबू धाबी में भी एक नौसैनिक सुविधा है. समझा जाता है कि भारत को उसके इस्तेमाल की भी अनुमति मिल जायेगी.

मई 2019 में गोवा के पास भारतीय और फ्रांसीसी नैसैना ने अपना 17वां साझा युद्धाभ्यास किया, जिसे दोनों देशों की नौसेनाओं का अब तक का सबसे बड़ा युद्धाभ्यास बताया जाता है. मई के अंत में एक ऐसा ही युद्धाभ्यास जिबुती के फ्रांसीसी नौसैनिक अड्डे की देखरेख में भी हुआ. भारत और फ्रांस के बीच नौसैनिक अभ्यासों की परंपरा 1983 में शुरू हुई थी. 1998 में भारत द्वारा दूसरी बार परमाणु परीक्षणों के बाद उस पर लगे प्रतिबंधों को उठाने में भी फ्रांस की प्रमुख भूमका रही है.

जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यस्था का धनी ज़रूर है. पर उसके पास न तो फ्रांस जैसा उच्च स्तर का रक्षा-उद्योग है और न ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट. फ्रांस के पास ये दोनों विशेषताएं हैं. वह सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता का भी प्रबल समर्थक है.

जर्मनी की चांसलर अंगेला मेर्कल पहले ही कह चुकी हैं कि वे 2021 तक ही चांसलर रहेंगी. उसके बाद चुनाव नहीं लड़ेंगी. उनके बाद कौन चांसलर बनेगा, कोई नहीं जानता. जबकि फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों का कार्यकाल मई 2022 तक चलेगा. फ्रांस के पिछले राष्ट्रपतियों की अपेक्षा भारत के प्रति उनका कुछ अधिक ही लगाव है. ब्रिटेन से भारत फिलहाल कोई आशा नहीं कर सकता. वह ब्रेग्ज़िट के बाद अगले कई वर्षों तक अपने आप को ही पटरी पर लाने में व्यस्त रहेगा. यही कारण है कि भारत की नरेंद्र मोदी सरकार फ्रांस के साथ संबंधों के विस्तार को खासा तवज्जो दे रही है.

छत्तीसगढ़ : बिलासपुर में हुई स्मार्ट सिटी के तहत पहली भर्ती, मिला लाखों का पैकेज

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शहर में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत निगम लाखों के पैकेज पर छह कर्मचारियों की भर्ती कर रहा है। निगम में अभ्यर्थियों का साक्षात्कार लिया गया है। जल्द ही इनकी नियुक्ति आदेश जारी हो जाएगा। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में यह पहली भर्ती है।

केंद्र सरकार ने स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में शहर का नाम शामिल किया है। जबसे इसका काम शुरू हुआ है तब से निगम के इंजीनियर और कर्मचारी ही पूरा काम देख रहे हैं। अब केंद्र सरकार की अनुमति मिलने के बाद इस प्रोजेक्ट में छह लोगों की भर्ती भारी भरकम पैकेज में हो रही है।

इनमें ज्यादातर का वेतन एक लाख रुपये से अधिक है। सीईओ का वेतन प्रतिमाह एक लाख 69 हजार रुपये है। इसी तरह अन्य पदों पर भी लाखों का पैकेज है। निगम ने चीफ आपरेटिंग ऑफिसर, जीएम फाइनेंस,डिप्टी मैनेजर फाइनेंस,जीएम आइटी,आइटी एक्जक्यूटिव,असिस्टेंट एक्जक्यूटिव टू सीईओ के पदों पर भर्ती हो रही है।

साक्षात्कार होने के बाद जल्द ही इनकी भर्ती आदेश जारी होने की बात कही जा रही है। कुल छह पदों के लिए 22 उम्मीदवार पहुंचे थे। निगम ने भर्ती नियम कड़े करते हुए सभी पदों पर 10 साल से अधिक वरिष्ठता होना अनिवार्य कर दिया था। इसके कारण रिक्त पदों पर कम लोग साक्षात्कार दिलाने आए। उम्मीद की जा रही है कि नई भर्ती होने के बाद स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के काम में तेजी आएगी। साक्षात्कार निगम अधिकारियों ने लिए हैं।

स्मार्ट सिटी में चल रहे काम

शहर में स्मार्ट सिटी योजना के तहत मिट्टी तेल लाइन, व्यापार विहार में सड़क निर्माण का काम किया जा रहा है। दोनों काम अधूरे हैं। इसी तरह फ्री वाई-फाई के लिए 10 जगहों में सिस्टम लगाए गए हैं। इसके अलावा बाकी काम के लिए केवल प्लानिंग हो रही है। काम अभी तक शुरू नहीं हुआ है।

प्रमुख सचिव ने जताई थी नाराजगी

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट में निगम का रैंक लगातार घट रहा है। इसके पीछे कारण नए प्रोजेक्ट चालू नहीं होना, भर्तियां नहीं होना है। इसे देखते नगरीय प्रशासन विभाग की प्रमुख सचिव ने निगम अधिकारियों को जमकर फटकार लगाई थी। इसके बाद नई भर्ती की प्रक्रिया तेज की गई।

स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत छह अनुभवी अधिकारियों की भर्ती कर रहे हैं। उनका साक्षात्कार हो चुका है। जल्द ही उन्हें नियुक्ति आदेश जारी कर दिया जाएगा।

पीके पंचायती, प्रभारी स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट, नगर निगम

1982 में हुई पहली मुलाकात और भारतीय राजनीति में ऐसे जोड़ी नंबर 1 बन गए मोदी-शाह

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इसमें कोई शक नहीं है कि भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे प्रभावशाली लोगों में हैं. गृहमंत्री अमित शाह के साथ उनकी जोड़ी भी उतनी ही प्रभावशाली है. शाह और मोदी के बीच इस तालमेल को जानने के लिए उनके रिश्ते को समझना होगा, जो करीब चार दशक पुराना है. से पहली बार 1982 में संघ की शाखा में मिले. उस वक्त अमित शाह सिर्फ 17 साल के थे और नरेंद्र मोदी संघ के प्रचारक के रूप में काम कर रहे थे.

कहा जाता है कि सरसंघचालक बालासाहब देवड़ा ने जब मोदी से पहली बार भाजपा में शामिल होने को कहा था. तब शाह ही वो पहले व्यक्ति थे, जिससे मोदी ने अपने मन की बात साझा की. शाह ने भी मोदी को राजनीति की तरफ कदम बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया.

2014 के चुनाव के दौरान ये साफ हो चुका था कि अमित शाह का मोदी के राजनीतिक सफर में क्या स्थान है. जमीनी स्तर पर क्या स्थिति है, इस बात का जायजा लेने के लिए मोदी भी शाह पर ही निर्भर थे. अमित शाह भी इस जिम्मेदारी के एहसास से वाकिफ थे. मोदी और पार्टी की जीत पक्की करने के लिए उन्होंने वो सब किया, जो जरूरी था. उम्मीदवारों के नाम से लेकर अपना दल जैसी छोटी क्षेत्रीय पार्टी के साथ हाथ मिलाया. उस वक्त कोई सोच भी नहीं सकता था कि अमित शाह के इस दांव का क्या असर होगा.

ये अमित शाह का ही करिश्मा था कि टिकट को लेकर पार्टी में उठ रही विरोध की आवाजों को भी उन्होंने पार्टी के लिए प्रचार करने के लिए तैयार कर दिया था. उनका हर दांव सही बैठा और नरेंद्र मोदी ने वाराणसी ही नहीं, बल्कि पूरे देश में जीत का डंका बजवा दिया. 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को उम्मीद से ज्यादा, बड़ी और अभूतपूर्व जीत हासिल हुई.

भाजपा की जीत के बाद नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्री पद की शपथ लेना तय था. प्रधानमंत्री बनते ही मोदी ने भी अपने भरोसेमंद मित्र अमित शाह को भाजपा के अध्यक्ष पद पर बैठा दिया. शाह को चुनावी बिसात का बेताज बादशाह समझा जाता है. मोदी के गुजरात में बतौर मुख्यमंत्री 12 साल के कार्यकाल में अमित शाह के पास सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण पद रहे. कहा तो यहां तक जाता है कि शाह की इसी कार्य-कुशलता को देखते हुए भाजपा के उस वक्त के अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने उन्हें उत्तर प्रदेश में चुनाव के लिए पार्टी की जमीन तैयार करने का काम सौंपा था.

अमित शाह अपनी बात के पक्के और अडिग हैं, वो जो चाहते हैं वही करते हैं. लेकिन, उनके हर कदम की जानकारी नरेंद्र मोदी को होती है. भले ही अमित शाह के पास असीम ताकत आ गई हो, लेकिन फिर भी वो मोदी को विश्वास में लिए बिना कोई कदम नहीं उठाते. मोदी भी शाह की कद्र करना जानते हैं.

शाह को जमीनी स्तर पर काम करते हुए लहर का रुख बदलना बखूबी आता है. राजनाथ सिंह ने भी अमित शाह की इस खूबी को देख और समझ लिया था. अमित शाह को दिल्ली भेज दिया गया और वो गुजरात की राजनीति छोड़ अब संगठन को मजबूत करने में जुट गए. मोदी निचले स्तर पर संगठन को मजबूत करने का महत्व समझते थे और इसलिए बड़ी सावधानी से अमित शाह को ये जिम्मेदारी सौंप दी गई. विरोधियों को मैदान में कैसे धूल चटानी है, यह गुरुमंत्र शाह ने मोदी से गुजरात राजनीति में आने के बाद ही सीखा.

जिस वक्त नरेंद्र मोदी को गुजरात में संगठन की जिम्मेदारी दी गई थी, उस वक्त अमित शाह ने खुद अपने हाथों से राज्य में मौजूद भाजपा के सारे कार्यकर्तओं को रजिस्टर करने का मुश्किल काम अपने हाथों में लिया. उसे सफलता से पूरा भी किया.

कांग्रेस का दबदबा गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों, खेल और बैंक संगठनों में खासा था. मोदी और शाह की जोड़ी ने मिलकर पहले ग्रामीण क्षेत्र में कांग्रेस की साख पर हमला किया. हर चुने हुए प्रधान के सामने टक्कर लेने के लिए उसी के जितना ताकतवर और रसूखदार दूसरा व्यक्ति होता ही था, जो चुनाव में हार जाता था. मोदी और शाह ने ऐसे ही हारे हुए उम्मीदवारों को अपने साथ जोड़ा और थोड़े ही समय में करीब 8 हजार प्रधान के खिलाफ लड़ने वाले लोग उनके साथ जुड़ गए. यही तरकीब खेल और बैंकों में भी पैंठ जमाने की लिए अपनाई गई. गुजरात में मोदी से सीखे यही गुर अमित शाह ने उत्तर प्रदेश को जीतने के लिए लगाए और इसमें सफल भी रहे.