आगरा केथाना ताजगंज क्षेत्र के विभव नगर निवासी मोहम्मद हुसैन पेशे से इलैक्ट्रीशियन हैं। अपनी जिंदगी में रोजाना पांच वक्त की नमाज अदा करते हैं। वहीं दूसरी ओर पिछले कई साल से रोजाना धूप, गर्मी, बारिश, ठंड में भी वे विभव नगर पुलिस चौकी के पास हनुमान मंदिर की देखरेख करना नहीं छोड़ते हैं।
उनका मानना है कि जैसे उनका अकीदा है कि जिस तरह है वे हनुमानजी मंदिर का ख्याल रखते हैं उसी तरह बजरंगबली भी उनका ख्याल रखते हैं। यही कारण है कि पिछले पंद्रह सालों से रोजाना वे मंदिर में आते हैं और भगवान की खिदमत में लगे हैं। पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसारमोहम्मद हुसैन का कहना है कि पंद्रह साल पहले इस जगह सिर्फ एक मूर्ति रखी थी। तब से ही मोहम्मद हुसैन बजरंगबली की खिदमत में लग गए।
समय के साथ साथ बजरंगबली से उनका रिश्ता बहुत गहरा हो गया। धीरे-धीरे मंदिर भी अब पूरा बनकर तैयार हो गया है, मोहम्मद हुसैन खुद मेहनत करके मंदिर के निर्माण में शामिल रहे और अब भी मंदिर में लाइटिंग का काम खुद कर रहे हैं।
मोहम्मद हुसैन बजरंगबली की खिदमत के साथ खुदा की इबादत करना कभी नहीं भूले, जितनी शिद्दत से वो बजरंगबली की खिदमत करते है उतनी ही फिक्र से खुदा की इबादत करते है। मुहम्मद हुसैन पांच वक्त की नमाज़ पढ़कर खुदा के सामने सजदा कर देश और दुनिया में अमन चैन की दुआ मांगते है। उनका कहना है कि हिन्दू मुस्लिमों को एक साथ मिलजुलकर रहना चाहिए। जिस तरह वे खुदा की इबादत के साथ बजरंगबली की सेवा करते हैं। उसी तरह सभी को आपस में भाई चारे के साथ रहना चाहिए।
अगर आप घूमने-फिरने के शौकीन हैं तो आपको पता ही होगा कि भारत में घूमने-फिरने के लिए कई खूबसूरत जगह और ऐतिहासिक इमारतें मौजूद हैं। इतना ही नहीं इन जगहों पर घूमने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं। लेकिन आज हम आपको उन देशों के बारे में बताएंगे। जो कभी भारत का ही हिस्सा हुआ करते थे। लेकिन आज यह देश अलग हो चुके हैं। आज हम जिन देशों की बात कर रहे हैं। यह देश पूरी दुनिया में अपनी खूबसूरती के लिए बेहद मशहूर हैं और इन देशों की खूबसूरती देखने के लिए विदेश से लोग आते हैं तो चलिए अब आपको बताते हैं। उन देशों के बारे में जो कभी रह चुके हैं भारत का हिस्सा।
नेपाल
नेपाल के बारे में तो आप सभी ने सुना ही होगा। कि नेपाल कभी भी किसी भी देश का गुलाम नहीं हुआ। पर इसी के साथ आपको बता दें कि अगर प्राचीन इतिहास को उठाकर देखा जाए। तो कभी यह सुंदर देश भारत का ही हिस्सा हुआ करता था। और इस खूबसूरत देश में घूमने के लिए देश-विदेश से टूरिस्ट हर साल आते हैं।
भूटान
भूटान एक छोटा और बेहद खूबसूरत देश है। और इस देश को भी भारत का ही हिस्सा माना जाता था। दरअसल आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सन 1836 में अंग्रेजों ने यहां पर चर्चों का निर्माण किया और उसके बाद भूटान को एक अलग देश बना दिया। जिस वजह से भूटान भारत से अलग हो गया। और भूटान को एक अलग देश की पहचान मिली।
श्रीलंका
वीकेंड का समय हो और आप लोग औक समुंदर का मजा लेना चाहते है। तो श्रीलंका अच्छी जगह है। श्रीलंका में भी टूरिस्टों की भीड़ लगी रहती है। श्रीलंका की खूबसूरती की बात की जाए। तो यह देश प्रकृति की गोद में बसा हुआ है। लेकिन आपकी जानकारी के लिए यह भी बता दे कि कभी यह खूबसूरत देश भारत का ही हिस्सा हुआ करता था।
एंटीबायोटिक्स हमारे शरीर को बैक्टीरिया के हमलों से बचाते हैं। यह एक औषधि के रूप में भी काम करता है। लेकिन इसके कुछ दुष्प्रभाव भी हैं। यदि बहुत अधिक एंटीबायोटिक का उपयोग किया जाता है, तो शरीर अपने प्रतिरोध को विकसित करता है।
यानी कोई भी दवा शरीर में किसी भी प्रकार की बीमारी को प्रभावित नहीं करती है। भारत को लंबे समय से सुपरबग और ड्रग प्रतिरोधी टीबी फैलाने के लिए जाना जाता है, जिसे नई दिल्ली मेटल्स बीटा लैक्टोज I कहा जाता है, और अब यह जानवरों में एंटीबायोटिक प्रतिरोध के मामले में दुनिया में सबसे बड़ा हॉटस्पॉट है। भारत के अलावा, चीन, पाकिस्तान, वियतनाम, तुर्की, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देश भी जानवरों में एंटीबायोटिक प्रतिरोध का ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।
प्रिंसटन यूनिवर्सिटी और दिल्ली स्थित सेंटर फॉर डिसीज डायनेमिक्स, इकोनॉमिक्स एंड पॉलिसी ने इसके कारणों को दिखाने के लिए एक अध्ययन किया है। अध्ययन में पाया गया कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में पशुओं को प्रोटीन की बढ़ती मांग और उत्पादन बढ़ाने के लिए एंटीबायोटिक्स दिए गए।
ताकि वे अधिक स्वस्थ हो जाएं।
मई में, मुंबई में 12 विभिन्न पोल्ट्री दुकानों से अंडे एकत्र किए गए थे। जिसमें विशेषज्ञों ने एंटीबायोटिक प्रतिरोध पाया। अध्ययन ने बैक्टीरिया साल्मोनेला के नमूनों का परीक्षण किया, जो दुनिया भर में उपयोग किए जाने वाले अधिकांश एंटीबायोटिक दवाओं के प्रतिरोधी रहे हैं। इन एंटीबायोटिक्स में एमोक्सिसिलिन, एजिथ्रोमाइसिन, सिप्रोफ्लोक्सासिन, सीफ्रीएक्सोन,क्लोरैम्फेनिकॉल,एरिथ्रोमाइसिन, जेंटामाइसिन, लेवोफ्लॉक्सासिन, नाइट्रोफ्यूरॉक्सिन और टेट्रासाइक्लिन शामिल हैं।
अध्ययन के अनुसार, ऐसे देशों में मांस की मांग तेजी से बढ़ रही है और साथ ही पशु आहार में एंटीबायोटिक प्रतिरोध की समस्या भी बढ़ रही है। लेकिन इस ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। यह जानना अजीब होगा।
देश में हर घंटे में चार बलात्कार होते हैं। देश में आए दिन सामने आ रहे दुष्कर्म,मर्डर, गैंगरेप के मामलों ने लोगों को हिला के रख दिया है। महिलाओं और बच्चियों के साथ ही छोटे बच्चों के साथ भी कुकर्म के मामले सामने आ रहे है।
ऐसे में अब सुरक्षा के दावों कि पोल खुलती नजर आ रही है। हालांकि प्रशासन भी इन्हें रोकने कि कोशिश करता है लेकिन अपराधी ऐसे मामलों को अंजाम दे ही देते है। हाल ही में ऐसा मामला सामने आय़ा है जिसके बारे में जानकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार ये मामला मध्य प्रदेश से सामने आया है। हैरान कर देने वाली बात है कि यहां पर एक युवक की मौत उस समय हुई जब वो एक महिला को अपनी हवस का शिकार बना रहा था। इस मामले में बताया जा रहा है कि गीता नाम की महिला घर के काम से बाहर गई हुई थी।
उसी समय रास्ते में उसको युवक ने जबरदस्ती पास ही के खाली जगह पर ले गया।
जहां पर उसने पहले तो महिला के साथ मारपीट की। जिसके बाद उसका वीडियो बनाया। जिसके बाद उसको ब्लैक मैल करके अपनी हवस का शिकार बना लिया।
लेकिन जब वो महिला के साथ संबंध बना रहा था तो वहां पर एक जहरिला सांप छिपा हुआ था। लेकिन उस समय दोनो में से किसी की भी नजर उस पर नहीं गई। जैसे ही अपनी धुन में मस्त हुआ तो पीछे से आकर सांप ने काट लिया। जिसके बाद युवक की मौके पर ही मौत हो गई।
जरा सोचिए, कैसा हो अगर आपको पहले से ही पता चल जाये कि सामने वाला आपके बारे में क्या सोच रहा है या उसके दिमाग में क्या राज छिपा है? इससे कई सारी मुश्किलें हल हो सकती है। क्या ब्रेन को पढ़ा जा सकता है?
इस पर देश- दुनिया में लम्बे समय से बहस चल रही है लेकिन अब दावा किया जा रहा है कि ऐसा मुमकिन है। इसके लिए ख़ास तरह का हेलमेट बनाया गया है जो ये बताने में सक्षम है कि कोई भी व्यक्ति क्या सोच रहा है। तो आइये जानते है इस बारे में विस्तार से:-
हरकोर्ट बटलर प्राविधिक विश्वविद्यालय (एचबीटीयू) व त्यागराजर इंजीनियरिंग कॉलेज मदुरै के प्रोफेसरों ने एक साथ मिलकर ऐसा हेलमेट तैयार किया है जो ये बताने में सक्षम है कि कोई भी व्यक्ति क्या सोच रहा है।
ब्रेन कम्प्यूटर इंटरफेस तकनीक पर काम करने वाला यह हेलमेट दिमाग से मिलने वाले किसी भी निर्देश को पढऩे में सक्षम हैं।
एचबीटीयू के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के विभागाध्यक्ष प्रो. यदुवीर सिंह के मुताबिक इस तकनीक को साल भर शोध के बाद ईजाद किया गया है।
इस हेलमेट में 32 इलेक्ट्रोड लगे हैं जो दिमाग के सिग्नल पढ़ते हैं और ब्रेन कम्प्यूटर इंटरनफेस के जरिए कम्प्यूटर तक भेजते हैं। खुशी, गम, संवेदना, खाने-पीने की इच्छा व किसी खास समय, व्यक्ति और चीज के बारे सोच की तरंगे इन्हीं इलेक्ट्रोड के जरिए पकड़ में आती हैं।
कॉग्नेटिव साइंस विषय पर जापान में हुई अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का हिस्सा बनकर आए एचबीटीयू मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. जितेंद्र भास्कर ने बताया कि दिमाग सिग्नल के आधार पर काम करता है।
इन्हें इलेक्ट्रोएन्सेफलोग्राम (ईईजी) सिग्नल कहते हैं। यह एक तरह का हल्का करंट होता है जिसे पढ़कर हेलमेट यह संकेत देता है कि व्यक्ति की सोच क्या है। इस सिग्नल व करंट का कंप्यूटर पर विश्लेषण किया जा सकता है।
डॉ. जितेंद्र भास्कर ने बताया कि एक ऐसी मशीन पर काम चल रहा है जो मनुष्य की सोच के आधार पर काम कर सके। जापान में हुई कार्यशाला में ऐसी मशीन पर अध्ययन भी किया है।
जैसे जैसे आधुनिक कम्प्यूटरों की ताकत बढ़ रही है और हम अपने दिमाग की कुशलता को और गहराई से समझ रहे हैं, वैसे ही हम काल्पनिक विज्ञान की कई बातों को सच कर रहे हैं।
ब्रेन कंप्यूटर इंटरफ़ेस इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसमें दिमाग और किसी बाहरी उपकरण के बीच सीधा संचार मार्ग बैठाया जाता है। दिमाग के असाधारण प्लास्टिसिटी प्रयोग के कारण, शरीर से मेल खाने के बाद प्रत्यारोपित कृत्रिम अंगों से आते हुए सिग्नल दिमाग के द्वारा नियंत्रित हो सकते हैं।
इस क्षेत्र में हो रहा यह विकास सदी के महत्वपूर्ण तकनिकी उपलब्धियों में से एक है जो दिव्यांग लोगों के लिए काफ़ी उपयोगी साबित हो रहा है।
टीसीई मदुरई के सीनियर प्रोफेसर और वैज्ञानिक डॉ. आर हेलेन ने बताया कि दिमाग और कंप्यूटर में इंटरफ़ेस यानी तालमेल बैठाने के लिए एक इलक्ट्रोड की आवश्यकता होती है। एक प्रकार का उपकरण इलेक्ट्रोएन्सफैलोग्राफ खोपड़ी पर संलग्न कर दी जाती है।
इलेक्ट्रोड दिमाग के सिग्नल को समझ पाते हैं। उच्च संकल्प का सिग्नल पाने के लिए वैज्ञानिक इलेक्ट्रोड को दिमाग के अंदरूनी हिस्से में या खोपड़ी के नीचे लगा देते हैं। इससे विद्युत् सिग्नल का सीधा प्रतिग्रह होता है और जहाँ सिग्नल जागृत हो रहा है, उस जगह पर इलेक्ट्रोड लगा दिया जाता है।
इलेक्ट्रोड न्यूरॉन के बीच हो रहे वोल्टेज अंतर को मापित करता रहता है। सिग्नल फिर प्रवर्धित और फि़ल्टर होता है और फिर एक कंप्यूटर प्रोग्राम के द्वारा जांचा जाता है।
मरीजों पर भी यह तकनीक कारगर डॉ. आर हेलेन ने बताया कि मरीजों की बीमारी का सही और सटीक आकलन के लिए ईसीजी, ईजी सहित अन्य मेडिकल रिपोर्ट के एनालिसिस प्रक्रिया को बेहतर बनाने पर काम चल रहा है।
उन्होंने बताया कि आप दिमाग में जो सोचेंगे, वही आपका कंप्यूटर या रोबोट काम करेगा। इसके लिए एल्गोरिदम पर काम किया जा रहा है। उन्होंने बायोमेडिकल सिग्नल प्रोसेसिंग एंड इमेज प्रोसेसिंग के बारे में भी बताया। कहा कि इस दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग के अध्यक्ष प्रो. कृष्णराज, प्रो. राजीव गुप्ता, डॉ. रजनी बिष्ट आदि मौजूद रहे।
देशभर में नवरात्र का त्योहार आज से शुरू हो चुका है। उत्तर और पूर्वी भारत में नवरात्र नौ दिनों के लिए होता है लेकिन पश्चिम बंगाल में नवरात्र के नौवे दिन दुर्गा पूजा की जाती है। सष्टी, सप्तमी, अष्मी, नवमी ये तीन दिन खास तौर पर मां दुर्गा की विशेष पूजा होती और फिर दसवीं के दिन मां दुर्गा का विसर्जन किया जाता है।
इस दौरान कई रिती रिवाजों का भी पालन किया जाता है जिसके पीछे की कहानी शायद किसी को मालूम नहीं है। इन्हीं रीति रिवाजों में से एक रिवाज ये है कि मां दुर्गा की मूर्ति बनाने के लिए जिस मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है वो मिट्टी वेश्यालय से लाई जाती है। चौंक गए ना, जी हां समाज की उन्हीं बदनाम गलियों से मिट्टी लाकर मां दुर्गा की मूर्ति बनाई जाती है।
मान्याताओं के अनुसार दुर्गा माता की मूर्ति बनाने के लिए चार चीजों की आवश्यक्ता होती है। पहली गंगा तट से लाई हुई मिट्टी, दूसरा गौमूत्र, तीसरा गोबर और चौथा वेश्यालय की मिट्टी या फिर किसी ऐसी जगह की मिट्टी जहां जाना मना हो। इन चारों चीजों से बनी मूर्ति ही पूर्ण मानी जाती है। कहा जाता है कि इनमें से कोई एक चीज भी कम हुई तो मूर्ति पूरी नहीं बनेगी। ये रिवाज आज से नहीं बल्कि सालों से चला आ रहा है।
वेश्यालय से मिट्टी लाने का रिवाज भी बहुत अनोखा है। मान्यता है कि मंदिर का पुजारी वैश्यालय के बाहर जाकर वेश्याओं से अपने आंगन की मिट्टी मांगता है। जबतक उसे मिट्टी नहीं मिलती वो वापस घर नहीं लौटता है। वेश्या अगर मिट्टी देने से मना भी कर देती है तो भी वह झोली फैलाकर मिट्टी मांगता रहता है।
हालांकि वक्त के साथ-साथ इस प्रथा में बदलाव भी आया है। अब कई जगहों पर पुजारी की जगह मूर्तिकार वेश्यालय जाकर मिट्टी मांगते हैं। मां दुर्गा की पवित्र मूर्ति के लिए वेश्लायक के आंगन की मिट्टी लाने के पीछे कई मान्यताएं है।
1. पहली मान्यता ये है कि जब कोई व्यक्ति वेश्लायल जाता है तो वह अपनी पवित्रता उसी के द्वार पर छोड़ जाता है। इसलिए वेश्यालय के आंगन की मिट्टी को सबसे पवित्र माना जाता है।
2. दूसरी मान्यता ये है कि महिषासुर ने मां दुर्गा के सम्मान के साथ खिलवाड़ करने की कोशिश की थी। उसने मां दुर्गा की गरिमा को ठेस पहुंचाने की कोशिश की और उसी वजह से मां ने उसका वध किया।
3. तीसरी मान्यताओं के मुताबिक वेश्याओं को उनके बुरे कर्म से मुक्ति दिलवाने के लिए उनके घर से लाई मिट्टी का उपयोग मां की मूर्ति में किया जाता है। इस तरह उनके कर्म शुद्ध करने का प्रयास किया जाता है।
साइबेरिया में वैज्ञानिकों ने एक अद्भुत खोज की है। उन्हें एक प्राचीन काल का कंगन मिला है, जो 40 हजार साल पुराना बताया जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अब तक खोजे गए गहनों में सबसे पुराना है, जिसे देखकर वो भी हैरान हैं।
यह कंगन साइबेरिया में स्थित डेनिसोवा गुफा में मिला था, जहां से एक लाख 25 हजार साल पहले विलुप्त हुए जानवरों (जैसे मैमथ) की हड्डियों भी मिली थीं। इस गुफा का नाम डेनिसोवन लोगों के नाम पर रखा गया है, जो मानव की एक रहस्यमयी प्रजाति के तौर पर जाने जाते हैं। यह आनुवंशिक रूप से होमो सैपियन्स और निएंडरथल प्रजाति के मानव दोनों से अलग थे।
डेनिसोवन्स कई मायनों में अद्वितीय थे, जो लगभग 10 लाख साल पहले अन्य मानवीय पूर्वजों से दूर हो गए थे। हाल ही में वैज्ञानिकों को एक डेनिसोवन महिला की उंगली की हड्डी और दांत मिले थे, जिससे यह पता चलता है कि उनमें और निएंडरथल या आधुनिक मनुष्यों में कोई रूपात्मक समानता नहीं थी।
हालांकि हजारों साल बाद और विलुप्त होने से पहले डेनिसोवन्स एक अवधि के लिए आधुनिक मनुष्यों और निएंडरथल के साथ रहे थे। उनके मिले अवशेषों के आनुवांशिक अध्ययन से इस बात की पुष्टि होती है। इसके अलावा कंकाल के अवशेषों से यह भी पता चलता है कि डेनिसोवन्स शायद आधुनिक मनुष्यों की तुलना में कहीं अधिक मजबूत और शक्तिशाली थे और हमारे से अधिक आदिम और पुरातन प्रकार के मनुष्य माने जाते थे।
कंगन की खोज से पता चलता है कि इसे बनाने में शामिल कौशल अपने समय से कम से कम 30,000 साल पहले के तकनीक के स्तर को दर्शाता है। अब तक वैज्ञानिकों का मानना था कि इस तरह के कौशल केवल नवपाषाण काल में मनुष्यों के बीच विकसित हुए थे, जो लगभग 10,000 ईसा पूर्व में शुरू हुआ था।
जांच में पता चला है कि यह कंगन क्लोराइट नाम के पत्थर से बना है। यह बहुत ही नाजुक है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे कंगन शायद किसी विशेष व्यक्ति के लिए और विशेष अवसरों पर पहनने के लिए बनाए जाते थे, जैसे कि डेनिसोवन राजकुमारी के लिए।
वैज्ञानिक इस कंगन की चमक देखकर हैरान हैं, क्योंकि तेज धूप में यह सूरज की किरणें पड़ते ही चमकने लगता है और रात में आग की रोशनी में यह हरे रंग की रोशनी बिखेरता है। वैज्ञानिकों को यहां से संगमरमर से बनी एक अंगूठी भी मिली है, लेकिन उन्होंने इसके बारे में अभी तक कोई खुलासा नहीं किया है।
अर्जेंटीना के ग्रेटर ब्यूनस आयर्स के इलाके बैरियो ला फ्लेचा में सोमवार को मछुआरों के एक समूह को 10 हजार साल पुराने जानवर का एक बुलेट प्रूफ सुरक्षा कवच मिला है। यह ग्लाइप्टोडॉन्ट ( दक्षिणी अमेरिका में पाए जाने वाले चौपाए, जिनके शरीर पर मजबूत खोल जैसा सुरक्षा कवच होता था) प्रजाति के जानवर का है। इस प्रजाति के जानवरों का आखिरी समय 10 हजार साल पहले तक माना जाता है। इनकी लंबाई 11 फीट और वजन करीब 2 टन हो सकता था। इमानोल ओजेदा ने बताया कि आर्मडिलो शेल इतने सालों से रेत में दबा हुआ था।
ग्लाइप्टोडॉन्ट्स आज के आर्मडिलो के पूर्वज हैं
अर्जेंटीना के बर्नार्डिनो रिवाडाविया प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय के वैज्ञानिक एलेजांद्रो क्रामार्ज के मुताबिक इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह शेल एक ग्लाइप्टोडॉन्ट की तरह दिखता है। 2016 में प्रकाशित जीव विज्ञान शोध के अनुसार, ग्लाइपोडॉन नाम की प्रजाति दक्षिण अमेरिका में 350 लाख साल पहले अस्तित्व में आई थी। इन चौपाओं के शरीर के चारों ओर हडि्डयों से निर्मित बुलेट प्रूफ जैसा मजबूत सुरक्षा कवच होता था।
ग्लाइप्टोडॉन्ट्स आज के आर्मडिलो के पूर्वज हैं। यह जानवर पौधों के अलावा सड़ता हुआ शव और कीड़े-मकोड़े भी खा लेता था। चूंकि यह हजारों साल पहले विलुप्त हो गए हैं, इसलिए इनके सुरक्षा कवच इलाके में पाए जाते हैं।
ऋतिक रोशन का दीवाना तो सारा देश है, पर क्या आप जानते हैं कि ऋतिक किस एक्टर के दीवाने हैं? आज हम इसी विषय पर बात करने वाले हैं। हाल ही में ऋतिक ने ‘पिंकविला’ को एक इंटरव्यू दिया जिसमें उन्होनें काफी राज़ों से पर्दा उठाया। ऋतिक ने बताया कि ‘सुपर 30’ करने के बाद वह बहुत आलसी हो गए थे।
परंतु वह एक फुर्तीले इंसान हैं और उन्हें ज़्यादा देर ऐसी हालत में रहना पसंद नहीं है। इसीलिए उन्होनें एक्शन फिल्म ‘वॉर’ करने का फैसला किया। क्योंकि यह फिल्म उन्हें फिर से फॉर्म में ला सकती थी। परंतु ऋतिक ने निर्देशक सिद्धार्थ और प्रोड्यूसर आदित्य चोपड़ा के सामने एक मांग रख डाली। ऋतिक की मांग थी कि वह ये फिल्म तभी करेंगे जब उनके साथ टाइगर श्रॉफ को फिल्म में कास्ट किया जाएगा।
उनकी इच्छा पूरी हुई और ऋतिक को टाइगर का साथ मिल गया। टाइगर की तारीफ करते हुए ऋतिक ने कहा-‘वो मुझे बहुत प्रेरणा देता है, मुझे टाइगर की बराबरी करने के लिए अपना पूरा दम लगाना पड़ा पर फिर भी मैं उससे पीछे रह गया, वह सच में कमाल का लड़का है। टाइगर आने वाले 50 सालों तक यहीं है, उसे कोई हाथ नहीं लगा सकता’।
दरअसल टाइगर भी बचपन से ऋतिक के फैन रहे हैं और अब ऋतिक टाइगर के फैन बन गए हैं, वह एक दूसरे को प्रेरणा दे रहे हैं जो काफी अच्छी बात है। बता दें कि टाइगर और ऋतिक की फिल्म वॉर में बहुत खतरनाक एक्शन सीन्स हैं जो 7 अलग-अलग देशों के 15 शहरों में फिल्माए गए हैं, एक सीन ‘आर्कटिक सर्किल’ में दुनिया की सबसे बड़ी ‘कार्गो आइस ब्रेकर शिप’ में फिल्माया गया है।
पूर्व प्रधानमंत्री और भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी की गिनती देश के दिग्गज राजनेताओं के साथ ही एक बेहतरीन वक्ता और शानदार कवि रूप में होती है। सभी जानते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी किसी से शादी नहीं की।
लेकिन उनके जीवन से जुड़ी एक बात के बारे में शायद ही आप जानते हो। वो बात ये है कि एक जमाने में वह एक महिला के प्यार में पड़ गए थे। वह महिला और वाजपयी दोनों एक दूसरे से विवाह करना चाहते थे, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता।
एक किताब ‘अटल बिहारी वाजपेयी: ए मैन ऑफ आल सीजंस’ के अनुसार पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी राजकुमारी कौल नाम की एक महिला को बहुत ही पसंद करते थे।
वाजपेयी और राजकुमारी कौल आपस में विवाह भी करना चाहते थे, लेकिन कौल के परिजनों को ये रिश्ता मंजूर नहीं होने के कारण अटल बिहारी वाजपेयी का सपना पूरा नहीं हो सका। राजकुमारी कौल का विवाह होने के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने कभी विवाह नहीं किया।