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इस बच्चे की मासूम हंसी के पीछे छुपा है गहरा दर्द, चाहकर भी इसे अपने गले नहीं लगा सकते माता-पिता

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अमेरिका के कैलीफोर्निया में रहने वाले विक्टर और एंड्रियाना दुनिया के सबसे बदनसीब माता-पिता है जो अपने बच्चे को छू भी नहीं सकते. उनका बच्चा 5 महीने का है. लेकिन आज तक उन्होंने अपने बच्चे को नहीं छुआ है. इसके पीछे की वजह बहुत ही हैरान करने वाली है, जिसे सुनकर आप अपने आंसू नहीं रोक पाएंगे. बता दें कि इस बच्चे का जन्म 14 मई 2019 को कैलिफोर्निया में हुआ था.

बच्चे की मां ने बताया कि उन्होंने अपने बच्चे का नाम एड्रिन रखा है. लेकिन कुछ समय बाद उन्हें मालूम हुआ कि उनके साथ कुछ गड़बड़ है, क्योंकि वह बुरी तरह से कांप रहा था और रो रहा था. डॉक्टरों ने जब बच्चे का चेकअप किया तो उन्हें पता चला कि बच्चा एपीडरमोलिसिस बुल्लोसा नामक त्वचा रोग से पीड़ित है. यह बहुत लाइलाज और दुर्लभ बीमारी है, जो जानलेवा होती है.

मेट्रो यूके की खबर के मुताबिक, इस बीमारी की वजह से शरीर की त्वचा पर घाव हो जाते हैं, और त्वचा शरीर से अपने आप हट जाती है. इस बीमारी से पीड़ित मरीज को बहुत जलन होती है. खासतौर पर बीमारी से बच्चे के जन्म के पहले साल के दौरान ही उसकी मौत हो जाती है. बच्चे के पिता विक्टर ने बताया कि जब उनके बेटे का जन्म हुआ था, वह बहुत खुश थे. लेकिन जब उन्हें अपने बच्चे की बीमारी का पता चला तो वह हैरान रह गए.

उसकी त्वचा बिल्कुल किसी तितली की तरह है, जो छूते ही हट जाती है. जब उन्होंने अपने बच्चे की हालत देखी तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई. विक्टर ने बताया कि ऐसी हालत देखकर उन्हें बहुत दर्द होता है. हमारे लिए यह सब बिल्कुल आसान नहीं है. एड्रिन की वजह से ना तो हम सही से सो पाते हैं और ना ही कुछ खा पाते हैं. एड्रिन को एंटीबायोटिक्स दवाएं दी जा रही है और उसके इलाज पर हर महीने 10 से 11 लाख खर्च हो जाते हैं. अब उनके पास इतने पैसे भी नहीं बचे कि वह अपने बच्चे की बीमारी के इलाज का खर्चा उठा सकें. इसीलिए उन्होंने क्राउडफंडिंग शुरू की है.

मात्र 80 रुपये में आप भी बना सकते हैं यूरोप में अपना आशियाना, जानें कैसे है ये मुमकिन

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कई लोगों की चाहत होती हैं कि विदेशों में भी उनके घर हो जहां वे छुट्टियां मनाने जा सके आर परमानेंट शिफ्ट हो सकें। लेकिन विदेशों के घरों का महंगा होने के कारण यह इतना आसान नहीं होता हैं। लेकिन अब आपकी चाहत पूरी हो सकती हैं और आप यूरोप में अपना घर ले सकते हैं वो भी मात्र 80 रूपये में। इटली (Italy) के द्वीप सिसिली के ग्रामीण इलाके के एक गांव संबूका के अधिकारियों ने 2019 में लगातार कम होती आबादी की समस्या से निपटने के लिए एक खास योजना की घोषणा की। तो आइये जानते हैं इस पूरे मामले के बारे में।

उन्होंने तय किया कि गांव में खाली पड़े पुराने खस्ताहाल मकानों को मात्र एक यूरो (Yuro) यानि लगभग अस्सी रुपये में बेच दिया जाए। इस गांव की आबादी मात्र 5,800 है क्योंकि यहां के स्थानीय लोग या तो नजदीकी शहरों या फिर विदेशों (Foreign) में बसने चले गए हैं। इसलिए संबूका की नगर परिषद ने पुराने खाली पड़े मकान खरीद कर दुनिया भर के लोगों को यह मकान कम कीमत पर बेचने का फैसला किया है ताकि नए लोगों को यहां बसने के लिए आकर्षित किया जा सके। नतीजतन दुनिया के दूसरे इलाकों और समुदाय के लोगों को यहां आकर अपने सपनों का घर बसाने का अवसर मिला।

संबूका के महापौर (Mayor) लियोनार्डो सिकासियो कहते हैं, “पहले नगर परिषद ने कानूनी कार्यवाही पूरी करके यह मकान खरीदे। उसके बाद पहले 16 मकान नीलाम (Auction) किए गए। यह सभी मकान विदेशियों ने खरीदे। यह योजना सफल हुई। दुनिया भर से कई कलाकारों ने इसमें रुचि दिखाई और संबूका आकर बसने लगे।” संबूका के उप महापौर और आर्किटेक्ट ज्यूसेप कैसियोपो कहते हैं, “जिन लोगों ने ये मकान खरीदे हैं उनमें कई संगीत और नृत्य कलाकार हैं, पत्रकार और लेखक हैं और यह अच्छी अभिरुचि वाले लोग हैं। वो यहां के प्राकृतिक सौंदर्य को सराह सकते हैं।”

संबूका की एक निवासी मारिसा मोंटलबानो कहती हैं, “विश्व भर के लोगों ने हमारे गांव और हमारी संस्कृति में रुचि दिखाई। अब तक 60 मकान बेचे जा चुके हैं।” यहां इतनी सस्ती कीमत पर मकान खरीदने की बस एक शर्त यह है कि नये खरीददार मकान की मरम्मत करवाने में पैसे लगाएं। मरम्मत करवाने में मकान के खरीदार के काफ़ी पैसे लग सकते हैं और उन्हें ये काम करवाने के लिए तीन वर्ष का समय दिया जाता है।

‘एक यूरो’ के मकान की इस योजना के चलते संबूका रातों रात दुनिया में मशहूर हो गया। योजना की शुरुआत के बाद से अब तक 40 मकान बाजार की सामान्य कीमतों पर बिक चुके हैं। संबूका में मकान खरीदने वालों में सिर्फ विदेशी ही नहीं बल्कि इटली के आप्रवासी भी शामिल हैं। इन्हीं में एक हैं ग्लोरिया ओरिजी जो पहले इटली के मिलान शहर में रहती थीं लेकिन फिर पेरिस जा कर बस गईं।

संबुका में मकान खरीदने के फैसले के बारे में वो कहती हैं, “मैं कई साल फ्रांस में रही मगर हमेशा ही मेरी इच्छा थी कि इटली में मेरा एक घर हो। संबूका के बारे में मुझे सबसे ज़्यादा अच्छी लगी यहां की खूबसूरती, यहां के लोगों की आत्मीयता जो और जगह कम देखने को मिलती है। यहां लोग खुले दिल के हैं और इसलिए मैने यहां मकान खरीदने का फैसला किया।”

‘लक्ष्मी बॉम्ब’ में कुछ ऐसे नजर आएंगे अक्षय कुमार, शेयर किया लुक

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अक्षय कुमार अपनी अगली फिल्म ‘लक्ष्मी बॉम्ब’ में एक महिला के किरदार में नजर आएंगे। गुरुवार को इस फिल्म में अक्षय के लुक की तस्वीर शेयर की गई है। अक्षय ने भी ट्वीट पर फिल्म में अपना लुक शेयर किया है। तस्‍वीर में अक्षय कुमार महिला के कपड़ों में मां दुर्गा की प्रतिमा के सामने खड़े नजर आ रहे हैं। यह फिल्म एक हॉरर कॉमेडी है।अक्षय ने कही ये बात
अक्षय कुमार ने कही ये बात

फिल्म में अपने लुक की तस्‍वीर को शेयर करते हुए अक्षय कुमार ने ट्विटर पर लिखा, ‘नवरात्रि का संबंध अपने भीतर की शक्ति और अपनी अपार क्षमताओं का उत्‍सव मनाना है। इस पवित्र मौके पर मैं लक्ष्‍मी के तौर पर अपना लुक शेयर कर रहा हूं. एक ऐसा किरदार जिसके लिए मैं उत्‍साहित भी हूं और नर्वस भी.. लेकिन जीवन वहां शुरू होता है जहां आपकी आरामदायक जिंदगी खत्‍म होती है.. है न.. ?’

साउथ की ‘कंचना’ का हिंदी रीमेक है फिल्म

लक्ष्मी बॉम्ब साउथ की फिल्‍म ‘कंचना’ की हिंदी रीमेक है। ये फिल्म साउथ में काफी पसंद की गई थी। लक्ष्मी बॉम्ब का निर्देशन ‘कंचना’ में एक्टिंग करने वाले और ‘कंचना 2’ को डायरेक्ट करने वाले राघव लॉरेंस कर रहे हैं। फिल्‍म में अक्षय के साथ एक्‍ट्रेस कियारा आडवाणी नजर आएंगी। यह फिल्‍म अगले साल जून में रिलीज होगी।

हाउसफुल 4 में दिखेंगे अक्षय

अक्षय कुमार की फिल्म हाउसफुल 4 का ट्रेलर हाल ही में रिलीज हुआ है। यह फिल्म इस साल 26 अक्टूबर को रिलीज होने जा रही है। हाउसफुल 4 में अक्षय कुमार के साथ बॉबी देओल, रितेश देशमुख, कृति सेनन, कृति खरबंदा और पूजा हेगड़े जैसे स्टार्स भी मुख्य भूमिकाओं में हैं।

भागलपुरी सिल्क उद्योग: मोदी जैकेट बनाने वाले बुनकर अब पापड़ बना रहे हैं

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“भागलपुरी सिल्क उद्योग को मज़बूत करने के लिए एनडीए सरकार पूरा प्रयास कर रही है. यहां पर जो मेगा क्लस्टर बना है उससे यहां के बुनकरों और व्यापारियों की बहुत मदद होने वाली है. यहां पर जो बुनकर बहने हैं, आपको पहले धागे सुलझाने में इतनी समस्या आती थी, पैरों में घुटनों में इतना दर्द होता था, अब जो नई बुनियाद रिलिंग मशीन दी जा रही है, उससे बुनकरों को इस कष्ट से मुक्ति मिलेगी.”

इसी साल अप्रैल में लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान भागलपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये बातें कही थीं.

सवाल ये कि इस दरम्यान बिहार के भागलपुर सिल्क का उद्योग कितना मज़बूत हुआ है. एनडीए सरकार को शासन में रहते लगभग छह साल हो गए.

बीबीसी की पड़ताल में भागलपुरी सिल्क उद्योग बुरी हालत में दिखा. सरकारी रिकॉर्ड्स में भी ये इतना कमज़ोर हो गया है कि मज़बूत बनाने की योजनाएं नाकाम साबित हो रही हैं.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ पिछले तीन दशकों के दौरान क़रीब एक लाख बुनकरों ने काम छोड़ा है.

बुनकर सेवा केंद्र भागलपुर, बरारी से मिली जानकारी के अनुसार इस वक़्त भागलपुर मेगा हैंडलूम क्लस्टर के अंतर्गत केवल 3,449 बुनकर काम कर रहे हैं और 3,333 लूम ही चालू हालत में हैं.

धीरे-धीरे काम मिलना बंद हो गया…

एक समय था जब भागलपुर देश के 48 फीसदी सिल्क परिधानों की आपूर्ति करता था. कारण कि यहां के लगभग हर निम्न मध्य वर्गीय परिवार में लूम चलता था.

आज हालात ये हैं कि भागलपुर म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन के अंतर्गत केवल एक घर में हैंडलूम चल रहा है.

भागलपुर नाथनगर विधानसभा क्षेत्र के जगदीशपुर प्रखंड के पुरैनी गांव के मुश्ताक़ अंसारी कहते हैं, “90 के दशक तक हमारे गांव और इधर आस-पास के गांव के लगभग हर घर में हैंडलूम चलता था. लेकिन अब इक्के-दुक्के घर ही बचे रह गए हैं. धीरे-धीरे काम मिलना बंद हो गया. पेट पर आफ़त आ गई. तो लोग काम की तलाश में बाहर जाने लगे. जो बचे रह गए वो खेती और दिहाड़ी मज़दूरी करने लगे.”

मुश्ताक़ आगे कहते हैं, “अब कोई नौजवान आपको लूम चलाते नहीं मिलेगा. जबकि इधर हम बुनकर समुदाय के लोग ही सबके अधिक हैं और ये हमारा ख़ानदानी काम है. लेकिन हम अपने बच्चों को अपनी तरह नहीं बनाना चाहते. जो हूनर और कला हासिल किए होकर भी बेरोज़गार हों.”

पापड़ बनाने का रोज़गार

मुश्ताक़ ने अपना हैंडलूम उखाड़ कर 2004-05 में ही घर के छज्जे पर रख दिया है. हमारे पहुँचने पर उसकी दीमक लगी लकड़ियां उतारकर दिखाने लगते हैं.

हमनें पूछा क्या इधर कोई ऐसा घर नहीं जहां अभी भी हैंडलूम चलता हो. तलाश में निकले तो कुछ ही घर छोड़कर हमें तेहारत हसन अपने घर के बाहर मिल गए.

मुश्ताक़ को पता था कि तेहारत के घर में बहुत हाल तक लूम चलता था.

उनकी बनाई साड़ियों की फिनिशिंग का काम बहुत सुंदर होता था. इसलिए मांग विदेशों तक से आती थी.

लेकिन तेहारत के जवाब ने हमें विस्मय में डाल दिया.

वे कहते हैं, “अब ताना (हैंडलूम) नहीं चलाता. सबकु़छ बांध-समेट कर रख दिया है. केरल में पापड़ बनाने का काम करता हूं. अभी घर पर आया था, फिर जाना है.”

धागा सुलझाने का काम

तेहारत से बातचीत में पता चला कि पापड़ बनाने के लिए प्रतिदिन उनको 350-400 रुपये मिल जाते हैं.

लेकिन पापड़ बनाने में और क़रीने की कारीगरी वाली साड़ियां बनाने में फ़र्क़ है. ये कला बहुत कम ही लोगों के पास बची रह गई है.

हमारी बात पर तेहारत पलटकर कहते हैं, “भैया, हुनर रखने से क्या होगा जब परिवार नहीं चला सकें. बीबी, बाल-बच्चा सब है. पापड़ बनाने का ही सही, रोज़ काम तो मिल जाता है. यहां तो भूखे रहने की नौबत आ जाती है.”

तेहारत अपने घर से कुछ ही दूरी पर स्थित वजाहत हसन के घर लेकर जाते हैं. मिट्टी के घर के बंगले में दो हैंडलूम चालू थे.

75 साल की उम्र में वजाहत अब भी रोज़ बेटे के साथ हैंडलूम चलाते हैं. पत्नी धागा सुलझाने का काम करती हैं.

जीएसटी के बाद

वजाहत हसन के बेटे कहते हैं, “हम चार भाई हैं. सबको यह काम करने आता है. लेकिन काम है कहां? अब सबलोग बाहर रहते हैं. अब्बी-अम्मी बुजुर्ग हो चले हैं. कोई तो उनके पास रहना चाहिए. बस इसलिए हम यहां हैं. हमलोगों को काम मिले या नहीं, लेकिन ख़ाली नहीं बैठते. ख़ुद से धागा ख़रीद कर चलाते रहते हैं. जब ऑर्डर मिलता है तो माल बिक ही जाता है. इसलिए अब कपड़ा तैयार करते हैं ज्यादा, साड़ियों का काम बहुत कम हो गया है.”

वजाहत 10 साल की उम्र के थे तभी से ताना (हैंडलूम) चला रहे हैं.

वे कहते हैं, “पहले सस्ती का दौर था लेकिन फिर भी इतना काम मिल जाता था कि पैसे की कोई दिक्क़त नहीं होती थी. अब महंगाई का दौर है. 10 साल पहले तक 800 रुपये का मिलने वाला धागा अब जीएसटी के बाद 4400-4500 रुपये का मिल रहा है. अगर कोई आदमी दो से तीन दिन लगाकर एक साड़ी तैयार करता है तो उसे 500-600 रुपये बचेंगे. रोज़ के हिसाब से 200 रुपया अधिक से अधिक होगा. आप बताइए, इस महंगी के ज़माने में 150- 200 रुपये में घर परिवार कैसे चलेगा? वो भी काम मिले तब.”

काम मिलना क्यों बंद हुआ?

वजाहत कहते हैं, “हैंडलूम को मारने वाला पावरलूम है. 1985-90 तक हमारे पास बहुत काम था. यहां भागलपुर में जेजे एक्सपोर्टर, जेनियथ एक्सपोर्टर जैसे दर्जनों बड़े एक्सपोर्टर थे. यहां से ज्यादा डिमांड विदेशों से ही आती थी. तब हमारे काम के पैसे भी ठीक मिलते थे. लेकिन तभी मशीनों का दौर आया. उसमें चीन का असर सबसे अधिक रहा. वे हमारे देश से ही कोकून और यार्न ख़रीदकर कम क़ीमत में सप्लाई देने लगे. अब तो यहां भी पावरलूम बनाने पर ज़ोर है. हमारा हाथ का काम है, उसकी क़ीमत अधिक है. उनका मशीन का है इसलिए दाम कम है. लेकिन वे हमारे जैसा काम नहीं कर पाएंगे. हमारी फर्निशिंग ओर फिनिशिंग अलग तरह की है.”

ये सब बताते हुए वजाहत हसन अपनी बनाई साड़ियाँ, चादर और स्टोल दिखाने लगे. उनकी क़ीमत और कारीगरी के बारे में बताने लगे.

टेक्सटाइल डिपार्टमेंट का सर्वे

ऐसा नहीं कि बुनकरी के काम में केवल मुसलमान समुदाय के लोग ही हैं. हिंदू समुदाय की तांती/ततवा जाति के लोग भी ये काम करते हैं.

भागलपुर के फतेहपुर प्रखंड के अंगारी गांव में भी पहले हर घर में ताना (हैंडलूम) था.

यहां मुख्य रूप से तांती जाती के लोग ही रहते हैं. लेकिन अब किसी के घर में लूम नहीं चल रहा है. हम जिस भी घर में जाते लोग अपने हैंडलूम के अस्थि पंजर दिखाने लगते.

मुकेश्वर तांती के घर हैंडलूम गड़ा तो दिख रहा था पर उसका ढांचा सही सलामत नहीं था.

वे बताते हैं कि टेक्सटाइल डिपार्टमेंट से लोग सर्वे करने आते रहते हैं. उन्होंने इसीलिए अपना ताना गड़ा छोड़ दिया है ताकि उन्हें यह मालूम रहे कि इस घर में हैंडलूम भी चलता है.

ताड़ के पत्तों के छत वाले फूस और बांस से घेरकर बने घर को देखकर हमें भी पहली दफ़ा यक़ीन नहीं हुआ था.

भागलपुर मेगा क्लस्टर योजना

मुकेश्वर की पत्नी मनिया देवी गांधीजी के चरख़े जैसे एक मटमैले चरख़े को लेकर दिखाने आती हैं.

कहती हैं, “यही चरख़ा चलाकर जीवन बिता दिए. ये ताना चलाते थे. मैं धागा लपेटती (सुलझाती) थी. बाल-बच्चा सब बाहर चला गया. जो रहता है वो भी अलग रहता है. उनको पालने-पोसने में घर नहीं बना पाए.”

भागलपुर मेगा क्लस्टर योजना वाले प्रोजेक्ट के तहत बुनकरों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, क्या इन योजनाओं में से किसी का लाभ नहीं मिल पाया उन्हें?

मुकेश्वर तांती अपना बुनकर कार्ड दिखाते हुए कहते हैं, “इसको बनवाने में 200 रुपया दिए. लेकिन इसका कोई फ़ायदा नहीं मिल सका.”

भागलपुर मेगा कल्स्टर प्रोजेक्ट के अंतर्गत 5084 हैंडलूमों और 20,000 बुनकरों पर 17.15 करोड़ रुपए ख़र्च होने हैं.

बुनकरों को लोन देने, उनके लिए व्यापार को सुगम बनाने तथा और भी तमाम वित्तीय सहायताओं से संबंधित क़रीब दर्जन भर योजनाएं चल रही हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने महिला बुनकरों को रीलिंग मशीन देने की बात कही थी. क्या इनमें से किसी भी योजना का लाभ उन्हें नहीं मिल पाया?

मनिया देवी कहती हैं, “अगर मिला होता तो वो क्यों छुपाते. सबकुछ तो दिखा ही दिया. इधर-उधर खेती-बाड़ी में मज़दूरी करके पेट चला लेते हैं. जबतक देह चल रहा है तबतक.”केंद्र के प्रभारी रामकृष्ण

बुनकर सेवा केंद्र

भागलपुर मेगा क्लस्टर के अंतर्गत हैंडलूम के काम से जुड़ी सारी ज़िम्मेदारी बुनकर सेवा केंद्र भागलपुर की है.

अंग्रेजों के समय की खंडहर हो रही एक इमारत में चल रहे बुनकर सेवा केंद्र में डिजायन, रंगाई, प्रिंटिंग, बुनाई की ट्रेनिंग होती है.

बिहार का यह इकलौता बुनकर सेवा केंद्र है. भारत में ऐसे 28 केंद्र हैं. 1974 से अबतक पिछले 45 सालों से लगातार हस्तकरघा क्षेत्र के विस्तार और तकनीकी सुधार पर काम कर रहा है. भागलपुर मेगा क्लस्टर के अंतर्गत आने वाले सभी बुनकरों की ज़िम्मेदारी इसी केंद्र की है.

केंद्र के प्रभारी रामकृष्ण से हमने सारे सवाल किए. वे अपनी योजनाओं के लिस्ट दिखाने लगे. उस जैकेट के कपड़े को भी बड़े गर्व से दिखाते हैं जिसे नरेंद्र मोदी पहनते हैं. रामकृष्ण ने बताया, “ऐसे कपड़े केवल भागलपुर में ही बनते हैं.”बुनकर सेवा केंद्र

केवल ट्रेनिंग से क्या होगा?

हमने कहा कि बुनकरों को इनका लाभ नहीं मिल पा रहा है लेकिन जवाब में वे कहते हैं, “हम अपने स्तर से हर एक प्रयास कर रहे हैं. बुनकरों को पकड़-पकड़ कर ट्रेनिंग के लिए ले आते हैं. उन्हें स्टाइपेंड भी देते हैं कि इसी लालच में कम से कम से कम आएं.”

लेकिन केवल ट्रेनिंग से क्या होगा? बुनकरों को काम मिले तब तो! और हर योजना का लाभ पाने के लिए तो पहले दलाल को पैसा देना पड़ जा रहा है.

रामकृष्ण इसपर कहते हैं, “हम ऐसा नहीं करते. इसमें दोष इम्प्लीमेंटिंग एजेंसी का है. देश भर में लगने वाले हाट-बाज़ारों तक हम बुनकरों को ले जाते हैं. उन्हें एक्सपोजर भी देते हैं.”

भागलपुर हैंडलूम मेगा क्लस्टर के अंतर्गत 20,000 लूम स्थापित कराने का उद्देश्य है. इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत सस्ते दर पर बुनकरों को लोन दिया जाना है.

छह साल में कितने बुनकरों को इसका लाभ मिल पाया?

रामकृष्ण कहते हैं, “अभी तक तो नहीं मिल पाया है. मगर हमलोगों ने कई आवेदन पाए हैं. उन्हें स्वीकृति के लिए संबंधित बैंक को भेजा गया है.”

क्या इतिहास तो नहीं बन जाएगा

इस तरह बुनकर सेवा केंद्र से मिली जानकारी के अनुसार मोदी सरकार के कार्यकाल में एक भी नया हैंडलूम स्थापित नहीं हो पाया है. उल्टे तेज़ी से बुनकर ये काम छोड़ रहे हैं.

क्या इतिहास तो नहीं बन जाएगा भागलपुर का हथकरघा उद्योग?

ये सवाल इसलिए क्योंकि पुरैनी गांव के बुनकरों ने बताया था कि वे अपनी आने वाली पीढ़ी को इस काम में नहीं आने देना चाहते.

रामकृष्ण कहते हैं, “भागलपुरी सिल्क उद्योग कभी मरेगा नहीं. क्योंकि जो यहां बनता है वो कहीं नहीं बनता. बाज़ार हमारे वश में नहीं है. हम और आप उसके वश में हैं. हमने और आपने जो पहना है वो पावरलूम है. बाज़ार हमलोगों से ही बनता है.”

लेकिन बुनकर रहेंगे तब तो उद्योग चलेगा? और जिस काम से पेट नहीं पल पाता हो, उसे क्योंकर कोई करेगा?

बजाहत कहते हैं, “बुनकर कार्ड तो बना ही है, हमारा सारा रिकार्ड डिपार्टमेन्ट पास है. अब हमारे लिए एक खुली मंडी बना दी जाए. हम अपना सामान बनाएंगे. और ख़ुद बेच लेंगे. किसी पर काम के लिए आश्रित नहीं रहना पड़ेगा. हमें पता है कि बाज़ार में हमारी क्या क़ीमत है.”

आर्टिकल-370 हटाने के बाद घरेलू से ज्यादा विदेशी टूरिस्ट क्यों पहुंच रहे हैं कश्मीर ? जानिए

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अगर आपको कोई कहे कि आर्टिकल-370 हटाने के बाद कुछ विदेशी टूरिस्ट्स ने कश्मीर को ही अपना पहला डेस्टिनेशन चुना है तो आपको हैरानी होगी। लेकिन, ये बात सही है कि अभी जब घरेलू पर्यटक भी श्रीनगर या कश्मीर की यात्रा करने से बचना चाह रहे हैं, विदेशी सैलानी मजे में डल लेक की हाउस बोट से घाटी की सुंदर नजारों का लुत्फ उठा रहे हैं। ये बात सुनकर चौंकना स्वाभाविक है। लेकिन, जब दुनियाभर में मीडिया का एक वर्ग कश्मीर की अलग तस्वीर दिखाने की कोशिशों में जुटा है, तब ऐसी क्या वजह है कि विदेशी सैलानी अभी कश्मीर घूमना सबसे अच्छा मौका मान रहे हैं। लेकिन, जितनी ये खबर चौंकाने वाली है, उससे भी ज्यादा इसके पीछे की वजह आपको हैरान कर देगी।

ये तथ्य जो आपको चौंका देंगे

एक रिपोर्ट के मुताबिक 5 अगस्त के फैसले के बाद से 30 सितंबर के बीच 928 विदेशी सैलानी श्रीनगर इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतर चुके हैं। इनमें ड्यूटी पर श्रीनगर आने वाले पत्रकारों की गिनती शामिल नहीं की गई है। हालांकि, अगर इसकी तुलना इन्हीं दिनों में पिछले साल आए विदेशी सैलानियों की संख्या से की जाए तो ये काफी कम है। मसलन पिछले साल ये आंकड़ा 9,589 का था। जाहिर है कि विदेशी टूरिस्ट की संख्या में कमी तो आई है, लेकिन मौजूदा हालात में पिछले साल की तुलना में अभी के समय अगर करीब 10 फीसदी विदेशी पर्यटक भी श्रीनगर पहुंचे हैं तो यह बहुत ही बड़ी बात है। सबसे बड़ी बात ये है कि जब 5 और 6 अगस्त को जम्मू-कश्मीर के विशेषाधिकार खत्म करने को लेकर संसद में बहस चल रही थी उन दो दिनों में भी क्रमश: 24 और 9 विदेशी पर्यटक श्रीनगर पहुंचे थे। जबकि, उन दिनों में सैलानियों को तो छोड़िए कोई घरेलू यात्री भी श्रीनगर नहीं पहुंचा था।

शांति और सुरक्षा का भरोसा

अब सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब घरेलू सैलानी भी फिलहाल कश्मीर घूमने की योजना नहीं बनाना चाहते तो लगभग एक हजार विदेशियों को किन बातों ने कश्मीर की ओर आकर्षित किया है? टीओआई के मुताबिक इन सैलानियों में से कई का मानना है कि उन्हें लगता है कि अब कश्मीर सीधे केंद्र सरकार के शासन के दायरे में है, इसलिए पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षा का अहसास होता है। ज्यादातर विदेशी टूरिस्ट का तो यहां तक कहना है कि कश्मीर यात्रा को लेकर लोगों के मन में बेवजह का भय बना हुआ है। स्कॉटलैंड निवासी 51 साल के स्टीवेन बैलनटाइन कहते हैं, ‘दूसरे देशों की मीडिया रिपोर्ट अलग कहानी कहती है……लेकिन, स्थानीय लोग और जवान दोनों हमारा गर्मजोशी से स्वागत करते हैं।’ ‘स्विट्जरलैंड’ नाम के एक हाउस बोट में ठहरे जर्मनी से आए बारबरा स्टैरस का कहना है कि, ‘कश्मीरी कभी भी किसी टूरिस्ट को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। यह उनकी आजीविका है। कश्मीर आने का यह सबसे अच्छा समय है, क्योंकि घरेलू सैलानियों की ज्यादा भीड़ भी नहीं है और पाबंदियों की वजह से हिंसा में बहुत ही कमी आ गई है। ‘

घरेलू सैलानियों की भीड़ नहीं

5 अगस्त से 30 सितंबर के बीच श्रीनगर एयरपोर्ट पर केवल 4,167 घरेलू यात्री ही पहुंचे। जबकि, अगर पिछले साल की बात करें तो तब इसी दौरान करीब 1.45 लाख लोग देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रीनगर आए थे। यानि, घरेलू सैलानियों की संख्या भी बहुत हो गई है। इसलिए, विदेशी पर्यटक इस मौके का फायदा उठाना चाहते हैं और वे कोलाहल से दूर कश्मीर की वादियों में वक्त बिता लेना चाहते हैं। स्टीवन बैलेनटाइन अपना गिटार लेकर गुनगुनाते हैं, ‘आप चर्च में जा सकते हैं, एक आसन पर विराजमान हो सकते हैं, वह इंसान जो इंसान नहीं है, आपके ठीक बगल में बैठ सकता है।’ डल झील में उनके गाने के ये बोल माहौल को और भी खुशनुमा बनाते हैं।

सस्ते होटल और हाउस बोट

जाहिर है कि घरेलू और विदेशी पर्यटकों की कमी होने से इन विदेशियों को डिमांड कम और सप्लाई ज्यादा वाली स्थिति का भी भरपूर फायदा मिल रहा है। मसलन, भीड़-भाड़ के समय में जिस हाउस बोट का एक रात का किराया 10,000 रुपये होता था, अभी वह 2,500 रुपये में भी उपलब्ध है। यही नहीं दिल्ली और मुंबई से हवाई जहाज की एक तरफ का टिकट भी 1,800 से 2,500 रुपये में मिल जा रहा है। कश्मीर की घाटियों में लंबे समय तक ठहरने की चाहत रखने वाले एक विदेशी पर्यटक को और क्या चाहिए?

24 साल के लड़के ने की 81 साल की महिला से शादी,जानिए क्यों

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 जो लोग देश की सेवा करना चाहते हैं, वे सेना में शामिल होने की पहल करते हैं। देश की सेना में शामिल होने वाले लोग एक तरह से देश की सेवा करते हैं। लेकिन सेना में भर्ती नहीं होने के लिए अपनी दादी से शादी करने वाले एक 24 वर्षीय व्यक्ति की वर्तमान में चर्चा चल रही है।

यह घटना यूक्रेन की है। यहां, विन्नित्सा शहर में रहने वाले अलेक्जेंडर कोंडराटुक ने सेना में भर्ती नहीं होने के लिए अपनी 81 वर्षीय दादी से शादी की है। यूक्रेन में, 18 से 26 वर्ष की आयु के युवाओं को सेना में सेवा देने की आवश्यकता है।

इस उम्र के प्रत्येक युवा को सेना में एक वर्ष की सेवा की आवश्यकता होती है। लेकिन सिकंदर ऐसा नहीं चाहता था। इसलिए उन्होंने अपनी दादी से शादी की।

पूरा मामला सामने आने के बाद से सिकंदर को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन उसने जो किया है वह वही है जो कानून की आवश्यकता है।

2017 में, लड़के को एक पत्र मिला जिसमें उसने सेना में शामिल होने के लिए कहा। लेकिन रिपोर्टों के अनुसार, सेना को छूट केवल तभी दी जा सकती है जब उसके पास एक तलाकशुदा व्यक्ति की देखभाल करने की जिम्मेदारी हो। आयोवा में, सिकंदर ने अपने चचेरे भाई, दादी की उम्र में से एक को शादी का प्रस्ताव दिया

और उसे ऐसा करने के लिए राजी किया। जब वह 22 साल की थीं और दादी 79 साल की थीं, तब उन्होंने शादी कर ली। जब इस मामले की जांच की, तो यह स्पष्ट हो गया कि वे वास्तव में शादीशुदा थे।

इस जगह पर जाने के लिए आज भी ब्रिटिश सरकार लेती है भारत से कर,जानिए

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भारत को अंग्रेजों द्वारा गुलामी से मुक्त किए 72 साल हो चुके हैं। लेकिन आजाद भारत में आज कुछ स्थानों पर ब्रिटिश शासन। आज भी यहां ब्रिटिश शासन की भावना है। हमारे देश में एक रेलवे ट्रैक है जिस पर ब्रिटिश सरकार का शासन है।

इस ट्रैक का उपयोग करने के लिए ब्रिटिश सरकार भारत से कर लेती है। भारतीय रेलवे की एक निजी कंपनी हर साल इस ट्रैक के लिए 10 करोड़ 20 लाख रुपये का भुगतान करती है। ब्रिटेन का यह ट्रैक एक यात्री ट्रेन है जिसे सकतला एक्सप्रेस कहा जाता है। जो अमरावती से मुर्तजापुर तक की 189 किमी की यात्रा 6,7 घंटे में पूरी करता है।

यह ट्रेन 17 छोटे, बड़े स्टेशनों जैसे अचलपुर, यवतमाल से होकर जाती है। लगभग 100 साल पुरानी इस ट्रे में 5 डिब्बे हैं। 70 वर्षों तक इस ट्रेन ने एक भाप इंजन का संचालन किया।

लेकिन 15 अप्रैल, 1994 को डीजल इंजन को बदल दिया गया। ट्रेन मैनचेस्टर सिटी के एक कारखाने में स्थित थी। इसे वर्ष 1921 में बनाया गया था।

अंग्रेजों के जमाने की विरासत यहां के संकेत जितनी पुरानी है। 7 कोच वाली इस पैसेंजर ट्रेन में रोजाना 1000 से ज्यादा लोग सफर करते हैं। ट्रैक की निगरानी और सुरक्षा आज भी एक ब्रिटिश कंपनी द्वारा की जाती है, और भारत सरकार उन्हें काम के लिए भुगतान करती है। पिछले 60 वर्षों से इसकी मरम्मत भी नहीं की गई है।

इस ट्रैक पर JDM सीरीज डीजल लोकोमोटिव इंजन की गति अभी भी 20 किमी प्रति घंटा रखी गई है। आज भी, भारत सरकार इस रेल मार्ग के लिए ब्रिटिश कंपनी को 1 मिलियन से अधिक रॉयल्टी का भुगतान करती है।

जान जोखिम में डाल महिला चिड़ियाघर में शेर के बाड़े में पहुंची, जू प्रशासन ने कहा ये

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एक महिला सुरक्षा पार कर गई और शेर के सामने कूद गई। इतना ही नहीं, महिला शेर को छेड़ने की कोशिश करने लगी। यह घटना न्यूयॉर्क के ब्रोंक्स चिड़ियाघर में हुई थी। सोशल मीडिया पर वीडियो दिखाते हैं कि महिला शेर के सामने खड़ी है और अपने हाथ हिलाकर शेर को नाच रही है।

हालाँकि शेर इस बीच शांत दिखाई देता है। यह घटना शनिवार की है। चिड़ियाघर के अधिकारियों ने कहा है कि वे घटना को गंभीरता से लेंगे। सेफ्टी बैरियर ब्रेकर के खिलाफ उनकी जीरो टॉलरेंस की नीति है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वीडियो में देखा गया शेर एक अफ्रीकी प्रजाति का है। उस घटना में, एक महिला या शेर के जीवन को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया गया।

सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने महिला की दुश्मनी की निंदा की क्योंकि एक यूजर ने लिखा कि मुझे लगता है कि उसे सीधे जेल ले जाना चाहिए। एक अन्य यूजर ने लिखा कि शेर जानता था कि महिला अजीब हरकत कर रही है।न्यूयॉर्क पुलिस डिटेक्टिव सोफिया मेसन ने बताया कि किसी ने 911 पर फोन नहीं किया।

किसी की गिरफ्तारी नहीं की गई है।

उन्हें इस बारे में मंगलवार को सूचित किया गया। उनके पास इस बारे में कोई और जानकारी नहीं है। चिड़ियाघर प्रशासन ने कहा कि विजिटर्स, कर्मचारियों और जानवरों को सुरक्षित रखने के लिए नियम बनाए गए हैं। इन नियमों का उल्लंघन करने पर हमारी जीरो टॉलरेंस की नीति है।

मिसेज धोनी की ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर हो रही है वायरल, आप भी नहीं कर पाओगे पहचान

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एमएस धोनी और साक्षी सिंह की लव स्टोरी के बारे में तो आप सभी जानते ही हैं। अपनी निजी लाइफ में धोनी जितने शर्मीले मिजाज वाले इंसान हैं तो साक्षी मौज-मस्ती करने वाली कूल वाइफ हैं। इस बात का अंदाज साक्षी के इंस्टाग्राम पोस्ट से लगाया जा सकता है। सोशल मीडिया पर हमेशा एक्टिव रहने वाली साक्षी हर रोज कुछ न कुछ शेयर कर सुर्खियों में रहती हैं। कल भी साक्षी ने एक फोटो शेयर की है। दिलचस्‍प बात यह है कि शेयर करने के 3 घंटे के भीतर ही इस तस्‍वीर को 1 लाख से अध‍िक यूजर्स ने लाइक कर दिया है।

साक्षी ने जो तस्‍वीर शेयर की है, वह उनके स्‍कूल के दिनों की है। ‘गोल्‍डन डेज!’ कैप्‍शन के साथ शेयर की गई इस फोटो में स्‍कूल यूनिफॉर्म में साक्षी के साथ उनकी तीन और दोस्‍त नजर आ रही हैं। बता दें कि साक्षी ने देहरादून के वेल्‍हम गर्ल्‍स स्‍कूल से पढ़ाई की है। इसके बाद उन्‍होंने औरंगाबाद से होटल मैनेजमेंट की डिग्री ली।

मजेदार बात यह है कि साक्षी की इस पुरानी तस्‍वीर को उनके फैंस ना सिर्फ लाइक कर रहे हैं, बल्‍क‍ि आपस में चर्चा भी कर रहे हैं कि चारों लड़कियों में से साक्षी कौन है? वैसे तो आपने भी अब तक अंदाजा लगा ही लिया होगा, लेकिन फिर भी बता देते हैं कि वह एकदम दाईं ओर खड़ी हैं।


एमएस धोनी और साक्षी सिंह की लव स्टोरी के बारे में तो आप सभी जानते ही हैं। अपनी निजी लाइफ में धोनी जितने शर्मीले मिजाज वाले इंसान हैं तो साक्षी मौज-मस्ती करने वाली कूल वाइफ हैं। इस बात का अंदाज साक्षी के इंस्टाग्राम पोस्ट से लगाया जा सकता है। सोशल मीडिया पर हमेशा एक्टिव रहने वाली साक्षी हर रोज कुछ न कुछ शेयर कर सुर्खियों में रहती हैं। कल भी साक्षी ने एक फोटो शेयर की है। दिलचस्‍प बात यह है कि शेयर करने के 3 घंटे के भीतर ही इस तस्‍वीर को 1 लाख से अध‍िक यूजर्स ने लाइक कर दिया है।

साक्षी ने जो तस्‍वीर शेयर की है, वह उनके स्‍कूल के दिनों की है। ‘गोल्‍डन डेज!’ कैप्‍शन के साथ शेयर की गई इस फोटो में स्‍कूल यूनिफॉर्म में साक्षी के साथ उनकी तीन और दोस्‍त नजर आ रही हैं। बता दें कि साक्षी ने देहरादून के वेल्‍हम गर्ल्‍स स्‍कूल से पढ़ाई की है। इसके बाद उन्‍होंने औरंगाबाद से होटल मैनेजमेंट की डिग्री ली।

मजेदार बात यह है कि साक्षी की इस पुरानी तस्‍वीर को उनके फैंस ना सिर्फ लाइक कर रहे हैं, बल्‍क‍ि आपस में चर्चा भी कर रहे हैं कि चारों लड़कियों में से साक्षी कौन है? वैसे तो आपने भी अब तक अंदाजा लगा ही लिया होगा, लेकिन फिर भी बता देते हैं कि वह एकदम दाईं ओर खड़ी हैं।

शादी की ड्रेस पहनकर ही हर काम करती है ये महिला, भारत से जुड़ी है इसके पीछे की वजह

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आमतौर पर लड़कियां शादी वाली ड्रेस बस शादी के दिन ही पहनती हैं और उसके बाद वो रखा ही रह जाता है। लेकिन ऑस्ट्रेलिया के एडिलेड शहर में रहने वाली एक महिला ठीक इसके उलट काम करती है। वह शादी की ड्रेस हर रोज पहनती है। चाहे कोई भी काम हो, जैसे मछली पकड़ना, जिम जाना या स्टेडियम में बैठकर फुटबॉल मैच देखना, ये सभी काम वो शादी की ड्रेस पहनकर ही करती है।

महिला का नाम टैमी हॉल है और वो एक पर्यावरणविद् हैं। दरअसल, 43 वर्षीय टैमी के हर रोज शादी की ड्रेस पहनने के पीछे की वजह भारत से जुड़ी हुई है, जिसके बारे में उन्होंने खुद खुलासा किया है। इस वजह के बारे में आप जानेंगे तो आप भी महिला की तारीफ करने लगेंगे।

टैमी ने बताया कि साल 2016 में वह भारत घूमने के लिए आई थीं। यहां आकर उन्हें महसूस हुआ कि वह नए कपड़ों पर या जूते-चप्पलों पर बहुत अधिक खर्च करती हैं। कुछ दिनों के बाद वह भारत लौट गईं, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने मन बनाया कि वह फालतू की चीजों पर अब और खर्च नहीं करेंगी।

इसी बीच साल 2018 में टैमी की शादी तय हो गई। वह अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दिन पर सबसे खूबसूरत और आकर्षक दिखना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने करीब 86 हजार की शादी की ड्रेस खरीदी। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह भी सोचा कि सिर्फ एक दिन के लिए और एक ड्रेस पर इतना खर्च करना सही नहीं था, इसलिए उन्होंने ड्रेस के पूरे पैसे वसूल करने की सोची और उसे हर रोज इस्तेमाल होने वाले कपड़ों की तरह पहनने लगीं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, टैमी बताती हैं कि जब भी वह शादी की ड्रेस पहनकर कहीं बाहर जाती हैं, तो लोग उन्हें कुछ अलग ही निगाहों से देखते हैं। हालांकि उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि उन्हें शादी की ड्रेस हर रोज पहनना अच्छा लगता है। वह बताती हैं कि अगली छुट्टियों में वह शादी की ड्रेस पहनकर ही अपने पति के साथ कहीं भी जाएंगी।