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भारत के इन 3 राज्यों मे होता है सबसे ज्यादा आम का उत्पादन जानिए

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भारत में आम से लेकर सेब का काफी ज्यादा मात्रा में उत्पादन किया जाता है। आज हम आप लोगों को भारत के तीन ऐसे राज्यों के बारे में बताने जा रहे हैं जहां सबसे ज्यादा आम का उत्पादन किया जाता है।

1. कर्नाटक

कर्नाटक भारत का तीसरा ऐसा राज्य है जहां सबसे ज्यादा आम का उत्पादन किया जाता है कर्नाटक भारत का एक समृद्ध और अमीर राज्य है जहां पर आम के साथ-साथ और कई अन्य प्रकार के फलों का उत्पादन किया जाता है। कर्नाटक राज्य में हर साल 1778.75 मीट्रिक टन का आम का उत्पादन किया जाता है।

2. आन्ध्र प्रदेश

आन्ध्र प्रदेश भारत का दूसरा ऐसा राज्य है जहां पर सबसे ज्यादा आम का उत्पादन किया जाता है। आंध्र प्रदेश को भारत का एक समृद्ध राज्य माना जाता है जो आम के उत्पादन के मामले में बिहार देश का एक बड़ा राज्य है। बिहार में हर साल 3363.40 मीट्रिक टन आम का उत्पादन किया जाता है।

3. उत्तर प्रदेश

आम उत्पादन करने के मामले में उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा राज्य माना जाता है। जनसंख्या की दृष्टि से भी उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा राज्य माना जाता है। उत्तर प्रदेश भारत का एक अमीर और समृद्ध राज्य है। उत्तर प्रदेश में कई प्रकार के आम की किस्मों को उगाया जाता है। उत्तर प्रदेश में हर साल 3623.22 मीट्रिक आम का उत्पादन किया जाता है।

छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील में अंडा परोसे जाने को लेकर मचा है घमासान

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छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील के मेन्यू में अंडा को शामिल करने के बाद प्रदेश की सियासत में घमासान मचा है. कई वर्गों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है. साथ ही मेन्यू से अंडे को हटाने की मांग की जा रही है. वहीं दूसरी ओर एक वर्ग मेन्यू में अंडे को शामिल करने का समर्थन कर रहा है. इसको लेकर लेकर प्रदेश में सत्ता पक्ष और विपक्ष भी एक दूसरे के आमने सामने है.

छत्तीसगढ़ में पिछले दिनों कबीरधाम जिले में मध्याह्न भोजन में अंडा परोसने पर कबीरपंथ के लोग नाराज हो गये हैं. कबीरपंथ के लोग स्कूलों में बच्चों को अंडा दिए जाने के फैसले से नाराज हैं. कबीरपंथ के लोगों ने कबीरधाम जिले के अलग अलग इलाकों में धरना प्रदर्शन और नारेबाजी भी की. इसके बाद ये मामला राजधानी रायपुर तक भी पहुंचा.

सियासत गर्म
मध्याह्न भोजन में अंडा दिए जाने को लेकर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह का कहना है कि मेन्यू में अंडा को नियमित रूप से शामिल नहीं करना चाहिए. क्योंकि प्रदेश में कबीरपंथ से जुड़े लोग इसे नहीं खाते और वे उनकी भावना से जुड़ा मामला है, इसलिए वे विरोध कर रहे हैं. ऐसे में सरकार को इसे मेन्यू में शामिल करने से परहेज करना चाहिए. इसको लेकर बीजेपी ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ मोर्चा भी खोल दिया है. वहीं इस मामले को लेकर सत्ताधारी दल के प्रदेश अध्यक्ष मोहन मरकाम खुद राज्य सरकार के बचाव में उतर आये हैं. उनका कहना है कि मध्याह्न भोजन में अंडा के अलावा जो शाकाहारी हैं उनके लिए अलग से व्यवस्था की गई हैं. दूसरी ओर राज्य के मंत्री शिव कुमार डहरिया का कहना है कि जो मांग कबीर पंथी समुदाय से आयी हैं, उस पर विचार किया जायेगा.

क्या कर्नाटक के सियासी नाटक का छत्तीसगढ़ पर भी होगा असर?

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कर्नाटक में चल रहे का सियासी उठापटक का असर मध्य प्रदेश से लेकर राजस्थान में भी दिखेगा जा रहा है. वहीं छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस की ही सत्ता है. ऐसे में आने वाले में समय में सूबे के राजनीतिक समीकरण में कर्नाटक इफेक्ट देखा जाएगा या नहीं, ये सोचने और समझने वाली बात होगा. मालूम हो कि लोकसभा चुनाव के नतीजों में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिला था. उन्हीं नतीजों के साथ-साथ ये चर्चा भी शुरू हो गई थी कि अब राजस्थान, मध्य प्रदेश और कर्नाटक की सरकारों को अस्थिर करने की कोशिशें की जाएंगी.राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस और बीजेपी के बीच करीब-करीब कांटे की टक्कर थी. इसलिए यहां की सरकार बनाने-बिगाड़ने की गुंजाइश बीजेपी को दिखी. लेकिन छत्तीसगढ़ में बीजेपी के नेता मानते है कि यहां पर चुनी हुई सरकार है और हमे लोकतंत्र पर पूरा भरोसा है.

नेताओं ने कही ये बात वहीं दूसरी ओर बीजेपी के छत्तीसगढ़ विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक का कहना है कि कांग्रेस पार्टी में भगदड़ मची है. अगर समय रहते कांग्रेस में भगदड़ को रोका नहीं गया तो स्थिति ओर भयावाह हो सकती है. जानकारों का मानना है कि छत्तीसगढ़ बीजेपी के इस चाल से इसलिए अछूता है क्योंकि यहां कांग्रेस को दो-तिहाई से भी ज़्यादा बहुमत हासिल है. वहीं संसदीय कार्यमंत्री रविन्द्र चौबे का कहना है कि छत्तीसगढ़ में इस तरह की कल्पना भी करना बेमानी से कम नहीं है.

छत्तीसगढ़: आयुष्मान भारत योजना के तहत शासन और मरीजों से पैसे वसूलने का आरोप

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छत्तीसगढ़ में आयुष्मान भारत योजना में निजी अस्पतालों द्वारा बड़ा फर्जीवाड़ा किया जा रहा है. योजना के के तहत मरीज और शासन दोनों से पैसे वसूलने की लगातार शिकायत मिल रही थी. इस शिकायत पर नेशनल हेल्थ एजेंसी की जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई की अनुशंसा को अधिकारी लगातार नज़रअंदाज कर रहे है. इस फर्जीवाड़े की जांच समिति की सदस्य और

क्या अस्पतालों को बचाने की हो रही कोशिश? जांच समिति की सदस्य और समाजसेवी ममता ममता शर्मा का कहना है कि रायपुर के नारायणा अस्पताल, धमतरी के गुप्ता नर्सिंग होम और कोरबा जिले के कोरबा हॉस्पिटल में फर्जीवाड़े की शिकायत उन्होने की थी. इसके बाद रायपुर संभागायुक्त ने त्वरित कमेटी का गठन करते हुए ममता शर्मा को भी जांच में सहयोग के लिए रखने का आदेश किया था. जांच में रायपुर का नामी अस्पताल नारायणा मल्टी स्पेशलिटी हॉस्पिटल देवेंद्र नगर ,धमतरी का गुप्ता नर्सिंग होम और कोरबा हॉस्पिटल शामिल थे. ममता शर्मा का कहना है कि इनकी जांच रिपोर्ट में अस्पताल के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की गई है लेकिन प्रदेश सरकार के अधिकारी ही उन अस्पतालों को बचा रहे है.

एक ऐसी महारानी की कहानी जो सेक्स के लिए रखती थी जवान सेवक

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इतिहास की किताबों में राजा- रानियों को लेकर तरह-तरह के कहानियां पढ़ने को मिलती है. लेकिन आज हम एक ऐसी महारानी के बारे में बताने की कोशिश करेंगे जो सेक्स के लिए जवान लड़कों को सेवक रखा करती थी.
कहा जाता है कि रूस की महारानी कैथरीन दी ग्रेट द्वितीय अपने पति से संबंध खत्म करने के बाद अपने महल में सैकड़ों गुलाम पाले थे. रानी के हर छोटे- बड़े काम के लिए कुंवारे जवान सेवक हमेशा तत्पर रहते थे. रानी ने अपने महल के हर कमरे में इन गुलामों को तरह- तरह के काम दे रखी थी. खास बात तो यह है कि रानी के महल में कोई सेविका नहीं रहती थी. रानी आपने निजी और अंतरंग कामकाज भी गुलामों से ही करवाना पसंद करती थी.

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि कैथरीन और उनके पति पीटर के बीच संबंध अच्छे नहीं थे. रानी की बायोग्राफी कैथरीन द ग्रेट लव सेक्स एंड पावर में इस बात का जिक्र है कि शादी के बाद 8 साल तक कोई संतान नहीं हुई और जनता के बीच पीटर की मर्दानगी को लेकर सवाल खड़े होने लगे. दोनों के बीच संबंध इस कदर कम दूर हुए की बेबस पीटर अपने महल में रंगीनियों में डूब गए और कैथरीन अपने सेनापति के साथ शारीरिक संबंध बनाने में रम गई.
इसी बीच कैथरीन ने अपने पहले बेटे को जन्म दिया. जिसका नाम पॉल था. अफवाहें उड़ी थीं सीटर नामर्द थे और यह बच्चा कैथरीन और सेनापति का था. हालांकि बाद में कैथरीन ने कई प्रेमी बदले और 3 और 4 बच्चों को जन्म दिया और हर बार पीटर की नामर्दी पर सवाल उठते रह गए.
पीटर और रानी कैथरीन के बीच कैथरिन के प्रेमियों को लेकर कई बार झगड़े हुए और यह झगड़े महल के बाहर भी सुनाई दी. लेकिन कैथरीन अपने प्रेमियों से दूरी बनाने में असमर्थ रही. इतना ही नहीं कैथरीन पूरी तरह से पीटर के किसी भी प्रभाव से आजाद हो चुकी थी.
म्यूजियम secrets.tv पर दिखाए गए. हरमिटेज स्टेटस सीक्रेट्स नामक एपिसोड में इस बात का उल्लेख है कि रानी ने महल के पास ही सेक्स सैलून भी बनवाया था.
रानी कैथरीन जवान लड़कों के साथ इस तरह खेलती थी सेक्स का खेल- 
रानी के अजीबोगरीब शौक थे. रानी अपने नौकरों के साथ शारीरिक संबंध बनाती थी. रानी के मौत के बाद शासक बने उसके बेटे पॉल प्रथम ने जब महल की छानबीन कराई तो रानी के महल के ठीक बराबर में एक छिपा हुआ सैलून मिला जहां संबंध से जुड़ी कई कलाकृतियां थी और कई ऐसी कुर्सियां सेक्स के लिए बनाई गयी थी.
कहा जाता है कि रानी अपनी संबंध इच्छा को पूरा करने के लिए बैचलर पार्टी किया करती थी. जहा राज्य के कई जवान लड़कों को पार्टी करने के लिए बुलाया जाता था और इस पार्टी में जवान लड़कों के साथ रानी सेक्स का प्रयोग किया करती थी. अपनी जन आकांक्षाओं को बनाए रखने के लिए हर संभव प्रयास किया करती थी. रानी ने इस पैलेस को पेटीट हरमिटेज का नाम दिया था.
रूस में स्टेट हरमिटेज म्यूजियम में रखी सैलून की संबंध आकृतियों वाली मसाज कुर्सियां इस बात की गवाह है कि अपने पति और प्रेमियों के बावजूद रानी कैथरीन में अजीबोगरीब संबंधा तृप्ति भी थी. जिसे पूरा करने के लिए वह इस्तेमाल किया करती थी.

भारत में दस साल में सूख गईं 4500 नदियां

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हमारे देश में ”डग-डग रोटी, पग-पग नीर” की कहावत प्रचलित थी। यानी देश में पानी इतनी प्रचुर मात्रा में था कि देश के हर बाशिंदे की पानी से संबंधित सभी आवश्यकता पूरी जो जाती थी। जल संपदा से संपन्न होने के साथ ही भारत की नदियों का जल निर्मल और पवित्र भी था, जो विभिन्न प्रकार के रोगों का नाश करता था। गंगा के जल को तो अमृत का दर्जा दिया गया है, तो वहीं कृष्ण की यमुना, नर्मदा, सरस्वती का जल भी अर्मत समान था, लेकिन आबादी बढ़ने के साथ-साथ वनों की अंधाधुंध कटाई की गई। इंसानों के रहने के लिए कंक्रीट के जंगल खड़े किए गए। विज्ञान के विस्तार के साथ नए-नए संसाधनों का आविष्कार हुआ। इंसानों के शौक व जरूरतों को पूरा करने तथा बढ़ती आबादी को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए बड़े पैमाने पर उद्योग लगाए गए। इन उद्योगों का कचरा व केमिकल वेस्ट को सीधे नदियों में बहाया जाने लगा। प्लास्टिक के आविष्कार ने इसानों को प्लास्टिक का इस हद तक आदि बना दिया कि धरती के गर्भ से लेकर समुद्र की गहराई व ऊपरी सतह पर तक प्लास्टिक कचरे का अंबार लग गया है। जिससे भूजल जल प्रदूषित होकर नदियों और नदियों से समुद्र में मिल रहा है और अब यही प्लास्टिक इंसानों के शरीर के अंदर भी पहंच गया है। खेती में रसायनों के उपयोग से भोजन के साथ ही भूमि की सतह भी विषाक्त होती जा रही है। आधुनिकीकरण की इस दौड़ में लोगों के साथ ही सरकारों ने भी पर्यावरण को उपेक्षित रखा और इसका निरंतर दोहन करते चले गए। नतीजन देश की 4500 से ज्यादा नदियां सूख गई और जल से संबंधित देश में सभी कहावते केवल इतिहास बनकर रह गई हैं।

आजादी से पहले भारत में करीब सात लाख गांव हुआ करते थे। बंटवारे में पाकिस्तान के अलग देश बनने के बाद लगभग एक लाख गांव पाकिस्तान में शामिल हो गए। हर गांव में करीब पांच जल संरचनाएं हुआ करती थी, यानी आजाद भारत में 30 लाख जल संरचनाएं थीं, लेकिन अति उपयोग व लगातार दोहन और पर्यावरण चक्र बिगड़ने के कारण बीस लाख तालाब, कुएं, पोखर और झील आदि पूरी तरह सूख चुके हैं। दस साल पहले देश में लगभग 15 हजार नदियां हुआ करती थीं, लेकिन 30 प्रतिशत यानी लगभग 4500 नदियां पूरी तरह से सूख कर केवल बरसाती नदियां ही बनकर रह गई हैं। राजस्थान और हरियाणा में 20 प्रतिशत स्थानों का भूजल स्तर 40 मीटर या इससे अधिक नीचे चला गया है, जबकि गुजरात में 12 प्रतिशत, चंडीगढ़ में 22 प्रतिशत और मध्य प्रदेश में 4 प्रतिशत स्थानों का भूजल स्तर 40 मीटर या इससे अधिक चीने चला गया है।

अमेरिका 6 हजार मीटर क्यूब प्रति व्यक्ति वर्षा जल संग्रहित करता है, जबकि ऑस्ट्रेलिया 5 हजार, चीन 2500, स्पेन 1500 और भारत केवल 200 मीटर क्यूब प्रति व्यक्ति बारिश का पानी जमा करता है। देश की 16 करोड़ से अधिक आबादी की पहुंच साफ पानी से दूर है, जबकि इथोपिया 6.1 करोड, नाइजीरिया 5.9 करोड़, चीन 5.8 करोड़ और कांगो की 4.7 करोड़ जन संख्या की पहुंच साफ पानी से दूर है।

राजस्थान में यदि तालाबों की बात की जाए तो शहरी इलाकों में 772 तालाब और बावड़ियों में से 443 में पानी है, जबकि 329 सूख चुके हैं या इन पर अतिक्रमण है। पेजयल और सिंचाई के उपयोग में आने वाली राजस्थान की 11 प्रमुख नदियों में ज्यादातर बरसाती हैं, लेकिन जल संरचनाओं की जितनी उपेक्षा उत्तर प्रदेश में हुई शायद ही कहीं हुई होगी। उत्तर प्रदेश के 1 लाख 77 हजार कुओं में से पिछले पांच सालों में 77 हजार कुएं सूख चुके हैं। 24 हजार 354 तालाब व पोखरों में से 23 हजार 309 में ही पानी है, तो वहीं 24 में से 12 झीलें बीते पांच सालों में पूरी तरह सूख चुकी हैं। बिहार की स्थिति में इससे इतर नहीं है। बिहार में 4.5 लाख हैंडपंपों में पानी आना बंद हो गया है, यानी ये भूजल गिरने से सूख गए हैं। 8386 में से 1876 पंचायतों में भूजल स्तर कम हो गया है। बीते 20 वर्षों में सरकारी और निजी तालाबों की संख्या राज्य में 2.5 लाख से घटकर 98 हजार 401 रह गई है। 150 छोटी-बड़ी नदियों में से 48 सूख चुकी हैं। देश के अन्य राज्यों की स्थिति भी इससे इतर नहीं है और उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, कनार्टक, तमिलनाडु, दिल्ली, हैदराबाद, महाराष्ट्र सहित देश के अन्य राज्य भी पानी के भीषण संकट से जूझ रहे हैं। जिसका मुख्य कारण वर्षा जल का संरक्षण न करना और कृषि में पानी का अति उपयोग करना आदि हैं।

भारत में सबसे ज्यादा पानी का उपयोग खेती के लिए किया जाता है। उपलब्ध पानी का लगभग 76 प्रतिशत हिस्सा देश में सिचांई के उपयोग में लाया जाता है, जबकि उद्योगों में 7 प्रतिशत, घरों में 11 प्रतिशत और अन्य कार्यों में 6 प्रतिश पानी का उपयोग किया जाता है, लेकिन इस समस्या को दूर करने के लिए भारत में अभी तक वर्षा जल संरक्षण करने की परंपरा विकसित नहीं हुई है। दरअसल भारत में हर साल 4 हजार घन मीटर बारिश होती है। जिसमें से हम केवल 17 प्रतिशत यानी 700 अरब घनमीटर का ही उपयोग करते हैं और 2131 अरब घन मीटर वर्षा जल का वाष्पीकरण हो जाता है, लेकिन वर्षा जल संरक्षण की ओर देश की सरकारों ने भी ध्यान नहीं दिया, जिस कारण वर्षा जल संरक्षण में भारत अन्य देशों से पिछड़ रहा है। यदि आंकड़ों पर नजर डाले तो अमेरिका 6 हजार मीटर क्यूब प्रति व्यक्ति वर्षा जल संग्रहित करता है, जबकि ऑस्ट्रेलिया 5 हजार, चीन 2500, स्पेन 1500 और भारत केवल 200 मीटर क्यूब प्रति व्यक्ति बारिश का पानी जमा करता है। देश की 16 करोड़ से अधिक आबादी की पहुंच साफ पानी से दूर है, जबकि इथोपिया 6.1 करोड, नाइजीरिया 5.9 करोड़, चीन 5.8 करोड़ और कांगो की 4.7 करोड़ जन संख्या की पहुंच साफ पानी से दूर है। विकराल होती इस समस्या के कारण भारत सरकार ने बीते वर्ष 343.3 करोड़ रुपये खर्च किए थे, जबकि इस वित्त वर्ष 398.9 करोड़ रुपये खर्च किए जाने, जो कि वर्ष 2010 में केवल 62.3 करोड़ ही था, लेकिन हाल ही में नीति आयोग ने भी एक रिपोर्ट में कहा कि 2030 तक 40 प्रतिशत लोगों की पहुंच पीने के पानी तक खत्म हो जाएगी। जिससे करोड़ों रुपया खर्च करने के बाद भी इस बात की गारंटी नहीं दी सकती की देश की जनता को साफ पानी उपलब्ध होगा।

दरअसल, देश को पानी के संकट से पार पाने के लिए जन भागीदारी की आवश्यकता है। किसी और को दोष देने के लिए बजाए देश के प्रत्येक नागरिक को पर्यावरण के प्रति अपने कर्तव्य का समझना होगा। जीवन-शैली में बदलाव लाकर पानी की खपत को कम करना होगा। ज्यादा से ज्यादा वर्षा जल को संग्रहित करने की पंरपरा को विकसित करना होगा। सरकार को चाहिए कि भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए देश में करोड़ों रुपया विभिन्न योजनाओं में व्यय करने के बजाए देशभर में लाखों की संख्या में रिचार्ज कुए बनाए जाए। देश में तालाबों की संस्कृति को विकसित किया जाए। पहाड़ी इलाकों के साथ ही मैदानी इलाकों में वृहद स्तर पर मिश्रित पौधों का रोपण किया जाए। साथ ही इन पौधों का पूरी तरह से संरक्षण भी किया जाए। इसके लिए देश के प्रत्येक नागरिक को भी अपने स्तर पर पहल करनी होगी, और प्लास्टिक जैसी अन्य सभी वस्तुओं का बहिष्कार करना होगा, जो पर्यावरण के लिए नुकसानदायक हैं, क्योंकि इन सभी वस्तुओं से जल प्रदूषित होता है और हम कितने भी प्रयास करके जल का संरक्षण भले ही कर लें, लेकिन यदि उसे स्वच्छ नहीं रख पाएंगे तो हमारे किसी भी प्रयास का कोई औचित्य नहीं रहेगा। जिससे स्वच्छ जल केवल इतिहास बनकर रह जाएगा

ऐहतियात : ऋषिकेश का 90 साल पुराना ‘लक्ष्मण झूला’ बंद

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ब्रिटिश काल में गंगा नदी के ऊपर निर्मित करीब 450 फिट लंबे और 5 फिट चौड़े स्पॉन वाले लक्ष्मणझूला पुल पर शासन ने शुक्रवार से आवाजाही पर रोक लगा दी है। 90 साल पहले बने पुल की जीर्ण-शीर्ण हालत के चलते यह निर्णय लिया है। ताकी संभावित दुर्घटना में जानमाल का नुकसान न हो। लक्ष्मणझूला, तपोवन क्षेत्र में आवागमन का एकमात्र साधन झूला पुल बंद होने से हजारों लोगों की लाइफ लाइन थम गई है।

तपोवन से लक्ष्मणझूला गंगा पार जाने और लक्ष्मणझूला से तपोवन आने के लिए स्थानीय लोगों सहित पर्यटकों की आवाजाही के लिए सुगम लक्ष्मणझूला पुल को शासन ने शुक्रवार को रिटायर कर दिया है। यानी कि अब इस पुल से न कोई जा सकेगा और न ही आ सकेगा। लक्ष्मणझूला पुल पर आवागमन बंद होने से स्थानीय व्यापार पर असर पड़ेगा। हालांकि शुक्रवार को पहले दिन बंद का असर नजर नहीं आया। सामान्य दिनों की तरह लोग पुल से आवाजाही करते दिखाई दिए। मामले में अपर मुख्य सचिव ने पीडब्ल्यूडी नरेंद्रनगर डिवीजन को पत्र जारी कर लक्ष्मणझूला पुल पर शुक्रवार से लगी रोक का कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया है। ताकी दुर्घटना होने पर जान माल का नुकसान न हो।

पीडब्ल्यूडी नरेंद्रनगर डिवीजन सहायक अभियंता श्यामलाल गोयल ने बताया कि अपर मुख्य सचिव ओमप्रकाश का पत्र मिला है। जिसमें डिजाइन ट्रैक स्ट्रक्चरल कंसल्टेंट के ऑबजर्वेशन में प्राप्त रिपोर्ट के आधार पर लक्ष्मणझूला पुल की हालत को देखते हुए 12 जुलाई से आवाजाही पर रोक लगाने का निर्देश हैं। उल्लेख है कि किसी भी प्रकार की जनहानि एवं दुर्घटना को दृष्टिगत रखते हुए लक्ष्मणझूला पुल पर आवागमन बंद कर इसका कड़ाई से पालन करने को निर्देशित किया है। मामले में पुलिस प्रशासन का सहयोग लिया जाएगा।

जीप चलाने योग्य पुल

1. 06 फीट है पुल की चौड़ाई। यूपी का पहला सस्पेंशन ब्रिज था जो जीप चलाने योग्य था। बाद में चार पहिया वाहनों का परिचालन रोक दिया गया। 450 फीट है पुल की लंबाई, यह बिना किसी सस्पेंसन तकनीक ब्रिज है जिसमें कोई पाया नहीं है। 1930 में 11 अप्रैल को लक्ष्मण झूल जनता के लिए खोला गया था। 1927 से 1929 के बीच लक्ष्मण झूला पुल का निर्माण उत्तर प्रदेश ( तब यूनाइटेड प्रोविंस) पीडब्लूडी विभाग ने कराया था। 1924 में पुराना लक्ष्मण झूला पुल बाढ़ में तबाह हो गया था। पुराना पुल 284 फीट लंबा था, जो वर्तमान पुल से थोड़ा नीचे था।

2. कई फिल्मों की शूटिंग हुई इस पुल पर ‘गंगा की सौगंध, ‘संन्यासी’ फिल्मों की शूटिंग हुई। टीवी धारावाहिक ‘सीआईडी’ की शूटिंग भी यहां हुई है।

3. पुल के साथ धार्मिक आस्था बताया जाता है कि लक्ष्मण ने इसी स्थान पर जूट की रस्सियों से नदी पार की थी। बाद में इसी जगह झूला पुल बना।

4. शिवानंद झूला पर दबाव पुल बंद होने से परेशानी बढ़ सकती है क्योंकि लक्ष्मण झूला से दो किलोमीटर पहले दूसरा झूला पुल शिवानंद झूला (राम झूला)है। अब इस पर दबाव बढ़ेगा।

90 डिग्री मुड़ गई इस लड़की की गर्दन, जानिए !

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क्या कोई इंसान अपनी गर्दन को 90 डिग्री तक घुमा सकता है नहीं ना, लेकिन आज हम आपको एक ऐसी लडकी के बारे में बताने जा रहे हैं जो कि अपनी गर्दन को करीब 90 डिग्री तक घुमा सकती है । जानकारी के अनुसार बताया जा रहा है कि, पाकिस्तान के सिंध में रहने वाली 11 साल की लड़की की गर्दन रहस्यमयी तरीके से 90 डिग्री के कोण पर मुड़ गई है । जिसको सही करने के लिए वो लडकी सर्जरी का इंतजार कर रही है ।

इस लडकी का नाम अफशीन कुंभार है जिसको मांसपेशियों की बीमारी है, जिसकी वजह से उनकी गर्दन गंभीर रूप से मुड़ी हुई है, जिसे चिकित्सकीय भाषा में टॉर्टिकोलिस कहा जाता है। आपको बता दें कि, यह समस्या पहली बार तब सामने आई थी, जब वह सिर्फ आठ महीने की थी और बाहर खेलते समय उसकी गर्दन में चोट लग गई । अपने सिर को सीधा रखने में असमर्थ अफशीन लगातार दर्द में जी रही है । उसे खाने, शौचालय का उपयोग करने और यहां तक ​​कि चलने तक के लिए संघर्ष करना पड़ता है ।

भूटान और बांग्लादेश के बीच सेतु बना भारत, पानी के रास्ते दोनों देशों को जोड़ा

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बांग्लादेश और भूटान के बीच व्यापार को आसान बनाने के लिए भारत अब सेतु का काम कर रहा है. भारत और बांग्लादेश को जोड़ने के लिए भारत ने अब ब्रह्मपुत्र नदी में एक रास्ता खोला है. नदी के रास्ते अब बांग्लादेश और भूटान के बीच सामान का आवागमन आसान हो जाएगा.

शुक्रवार को ऐसी पहली शिप असम के धुबरी रिवरपोर्ट से बांग्लादेश के नारायणगंज के लिए रवाना हुई. बताया जाता है कि शिप में भूटान से आया 70 ट्रकों के बराबर क्रश्ड स्टोन भरा हुआ है. शिप को हरी झंडी दिखाते हुए शिपिंग मंत्री मनसुख लाल मंडाविया ने कहा कि ऐसा पहली बार हो रहा है जब भारत ने वॉटरवे के रास्ते दो देशों को आपस में जोड़ने की पहल की गई है.

भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण (आईडब्ल्यूएआई) के चेयरमैन प्रवीर पांडेय ने बताया कि भूटान से आने वाले सामान को पहले फुएंतशिलिंग से असम के धुबरी जेटी तक लाया गया था, जहां से उसे भारत के रास्ते बांग्लादेश भेजा गया है. शुक्रवार को रवाना हुई शिप बांग्लादेश के लिए नारायणपुर तक 600 किमी की दूरी करीब 6 दिनों में पूरी करेगी. 

अभी ट्रकों के जरिए होता था व्यापार
बताया जाता है कि बांग्लादेश देश के लिए बिल्डिंग के निर्माण से जुड़ी सामग्री भूटान से मंगाता है. सड़क मार्ग से आने में उसे काफी समय लग जाता था. ट्रकों के जरिए आने वाले माल को बांग्लादेश की सीमा पर रोक दिया जाता था और फिर उसे बांग्लादेश के ट्रकों पर भरा जाता था. वॉटरवे के जरिए भूटान से भेजा जाने वाला सामान अब छह दिन में बांग्लादेश में पहुंच जाएगा.

कारण जानकर आपका भी दिमाग हो जाएगा पागल, आखिर क्यों इस शख्स ने की है जहरीले सांप से शादी

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अकसर हम लोग पुनर्जन्म के बारे में सुनते हैं लेकिन हम उन सब बातों पर विश्वास नहीं करते हैं क्योंकि हमने ऐसा मामला अपनी आंखों से नहीं देखा है । लेकिन आज हम आपको आज जिस आदमी की कहानी बता रहे हैं उसे सुनने के बाद तो आप भी पुनर्जन्म पर विश्वास करने लगेंगे । जिस आदमी के बारे में हम आपको बता रहे हैं वो एक सांप के साथ रहता है इतना ही नहीं ये शख्स उसके साथ ही सब काम करता है ।

जिसने भी इसके बारे में सुना वो हैरान रह गया लेकिन तस्वीरें इस आदमी और सांप की दोस्ती की गवाह हैं । ये आदमी सिंगापूर का रहने वाला है जिसने कोबरा सांप से शादी की है और ये कोबरा कोई छोटा-मोटा नहीं बल्कि 10 फुट लम्बा है । आपको बता दें इस कोबरा को आदमी पूरे समय अपने साथ ही रखता है । इतना ही नहीं बल्कि जहां भी वो आदमी जाता है तो भी कोबरा को अपने साथ लेकर जाता है । उसका खाना-पीना, टीवी देखना, घूमने जाना हर काम में इस भयानक कोबरा सांप के साथ ही होता है ।

तो हम आपको इस बारे में भी बता ही देते है. दरअसल इस आदमी की एक गर्लफ्रेंड थी और दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार भी करते थे मगर करीब 5 साल पहले उसकी गर्लफ्रेंड मर गई और जिसके बाद आदमी की जिंदगी में कोबरा की एंट्री हुई । तब से ही ये कोबरा आदमी के बहुत करीब है क्योंकि इस शख्स का मानना है कि उसकी गर्लफ्रेंड कोबरा सांप की शक्ल में दौबारा जन्म लेकर आई है ।