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“नहीं मिल रहा घटी हुई GST का फायदा? WhatsApp पर कर पाएंगे शिकायत, समझें तरीका”

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22 सितंबर से देशभर में GST की नई दरें लागू हो गई हैं। इसके बाद फ्रिज, टीवी, प्रोजेक्टर और एयर कंडीशनर जैसे इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स पर 28% की जगह 18% GST लगेगा। हालांकि इंटरनेट पर लोग लगातार शिकायत कर रहे हैं, कि उन्हें कुछ जगहों पर अभी भी GST की पुरानी दर पर ही सामान खरीदने को मिल रहा है।

अगर आपके साथ भी कुछ ऐसा हुआ है या आप चाहते हैं कि आपको इस तरह की समस्या का सामना न करना पड़े, तो बता दें कि इसकी शिकायत WhatsApp के जरिए भी की जा सकती है। बता दें कि ऐसा करना बेहद आसान है और एक नंबर को अपनी फोन बुक में सेव करके आप इस सर्विस का इस्तेमाल कर पाएंगे। चलिए डिटेल में समझ लेते हैं कि आखिर आप किस तरह से WhatsApp के जरिए इस तरह की शिकायत दर्ज कर पाएंगे।

नोट कर लें नंबर WhatsApp के जरिए शिकायत करने के लिए जरूरी है कि आपके पास वह नंबर हो जिसके जरिए आप WhatsApp पर अपनी समस्या सरकारी विभाग तक पहुंचा पाएं।

दरअसल सरकार ने इसके लिए यह WhatsApp नंबर 8800001915 उपलब्ध कराया है, ताकि लोग GST की दरों में हुए बदलावों को कही लागू होता न पाएं तो शिकायत सरकार तक पहुंचा सकें। इसके अलावा आप 1915 के जरिए भी कॉल करके अपनी शिकायत दर्ज करवा सकते हैं। वही अगर आप पोर्टल पर शिकायत दर्ज करना टचाहें, तो आप INGRAM पर जा सकते हैं।

WhatsApp पर ऐसे होगी शिकायत अगर आप कहीं GST की नई दरों को लागू होता नहीं पाते, तो:

8800001915 पर Hi  लिख कर एक WhatsApp मैसेज करें। इसके बाद हिंदी या अंग्रेजी में से एक भाषा चुनें। इसके बाद Register Grievance को चुनें। इसके बाद अपने राज्य और शहर को चुनें। आप जिस प्रोडक्ट को लेकर शिकायत करना चाहते हैं, उसकी इंडस्ट्री को चुनें। इसके बाद प्रोडक्ट की कैटेगरी को चुनें जैस कि Electronics Products इंडस्ट्री के लिए TV कैटेगरी। इसके बाद प्रोडक्ट किस कंपनी का है यह चुनें। इसके बाद अपने प्रोडक्ट की कीमत को चुनें. आखिर में आपसे अपनी शिकायत लिख कर देने को कहा जाएगा। इसमें आप जिस भी समस्या का सामना कर रहे हैं, उसे अच्छे से मैसेज के रूप में लिख कर भेज दें।

इसके बाद आपसे जारी रखने या मैसेज को ए़डिट करने के बारे में पूछा जाएगा। अगर आप अपनी शिकायत में कुछ भी सुधारना चाहते हैं, तो Edit या फिर Continue को चुनें। इसके बाद आपसे शिकायत से संबंधित डॉक्युमेंट अपलोड करने के लिए कहा जाएगा। अगर आप कोई डॉक्युमेंट देना चाहें, तो हां या ना पर टैप करें। इसके बाद आपकी शिकायत रजिस्टर हो जाएगी और आपको आपकी शिकायत का नंबर भी दिया जाएगा। WhatsApp पर ही आप अपनी शिकायत का स्टेटस भी जान सकते हैं।

शिकायत का स्टेटस ऐसे जानें अपनी शिकायत का स्टेटस जानने का तरीका भी शिकायत करने जैसा ही है। इसके लिए भी आपको:

8800001915 पर Hi लिख कर एक  WhatsApp मैसेज करना होगा। भाषा चुनने के बाद आप से शिकायत के दर्ज करने या स्टेटस पता करने के बीच किसी एक को चुनने के लिए कहा जाएगा। यहां आप शिकायत का स्टेटस पता करें, इसे चुन लें। इसके बाद शिकायत करने पर मिले नंबर को दर्ज करके अपनी शिकायत का स्टेटस बेहद ही आसानी से पता कर लें।

छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद का सफाया: केंद्र की ताकत, राज्य की इच्छाशक्ति का तालमेल

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घने जंगलों की सघनता, जहां कभी गोलियों की गूंज और खून की नदियां बहा करती थीं, आज विकास की रोशनी बिखर रही हैं. छत्तीसगढ़ के जगदलपुर, सुकमा, दंतेवाड़ा, नारायणपुर और बीजापुर जैसे इलाकों से नक्सलवाद का काला साया धीरे-धीरे मिट रहा है. पिछले एक साल में 300 से अधिक नक्सलियों का सफाया, 1,100 से ज्यादा गिरफ्तारियां और 1,000 के करीब आत्मसमर्पण-ये आंकड़े न सिर्फ एक अभियान की सफलता की कहानी कहते हैं, बल्कि एक ऐसी क्रांति की गवाही देते हैं जो केंद्र की रणनीतिक ताकत और राज्य की अटल इच्छाशक्ति का अनोखा संगम है. लेकिन इस विजय के पीछे की कहानी में एक अनकही सच्चाई छिपी है-राज्य सरकार की भूमिका को मीडिया ने उतना ही महत्व दिया जितना जंगल की छांव में छिपे एक पत्ते को. केंद्र की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता, लेकिन प्रदेश की दृढ़ता ने ही इस सफाए को इतना बड़ा और निर्णायक बनाया है. इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

नक्सलवाद, जो 1967 के नक्सलबाड़ी आंदोलन से जन्मा था, छत्तीसगढ़ में बस्तर संभाग के छह जिलों को अपनी सबसे बड़ी चुनौती के रूप में जकड़ चुका था. 2000 में राज्य के गठन के बाद से यह ‘रेड कॉरिडोर’ का केंद्र बन गया. 2010 में नक्सली हिंसा के 47 प्रतिशत घटनाएं यहीं दर्ज की गईं. अबूझमाड़ के जंगलों में छिपे ये उग्रवादी न सिर्फ विकास को रोकते थे, बल्कि आदिवासी समुदायों को भी अपने जाल में फंसा लेते थे. लेकिन 2023 के अंत में भाजपा सरकार के सत्ता में आने के बाद सीन बदल गया. मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा के नेतृत्व में राज्य ने नक्सलियों के खिलाफ ‘ऑपरेशन कागर’ और ‘ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट’ जैसे अभियानों को नई गति दी. मई 2025 में कर्रेगुट्टा हिल्स में चले 21 दिवसीय ऑपरेशन में 31 नक्सलियों का सफाया हुआ, जो अब तक का सबसे बड़ा ऑपरेशन था.

केंद्र सरकार की भूमिका यहां नकारना असंभव है. गृह मंत्री अमित शाह ने 2019 से ही ‘नक्सल-मुक्त भारत’ का संकल्प लिया है. उन्होंने 11 समीक्षा बैठकें आयोजित कीं, जिसमें केंद्रीय सुरक्षा बलों की 60 बटालियनें छत्तीसगढ़ में तैनात की गईं. 2024 से 2025 के बीच 237 नक्सलियों को निष्प्रभावी किया गया, जिसमें केंद्रीय एजेंसियों की खुफिया जानकारी और हथियारों की आपूर्ति महत्वपूर्ण रही. शाह का बार-बार दौरा-रायपुर से बस्तर तक-ने न सिर्फ सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ाया, बल्कि विकास परियोजनाओं को भी गति दी. स्वच्छ भारत अभियान, आयुष्मान भारत योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत लाखों आदिवासियों को लाभ पहुंचा. मार्च 2026 तक नक्सलवाद उखाड़ फेंकने का लक्ष्य केंद्र की रणनीति का हिस्सा है, और छत्तीसगढ़ इसमें अग्रणी है. बिना केंद्रीय सहायता के राज्य अकेला यह लड़ाई नहीं लड़ सकता था.

फिर भी, इस सफलता का एक बड़ा हिस्सा राज्य की इच्छाशक्ति का है, जो मीडिया की सुर्खियों में कम ही उभरा है. भाजपा सरकार ने नक्सलियों को ‘हमारी सरकार’ कहने की पुरानी मानसिकता को तोड़ा. डीआरजी (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड) को पूर्ण स्वतंत्रता दी गई, जो स्थानीय आदिवासी युवाओं से बनी है. इन युवाओं ने जंगलों की हर गली-कूची को जाना-पहचाना. जनवरी 2024 से फरवरी 2025 तक 985 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जो राज्य की पुनर्वास नीति का कमाल है. उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा ने कहा, “यह आत्मसमर्पण सिर्फ हथियार डालने का नहीं, बल्कि विकास की मुख्यधारा में शामिल होने का संकेत है.” राज्य ने 1,214 डाकघर, 297 बैंक शाखाएं और 268 एटीएम खोले, जो नक्सल प्रभावित इलाकों में वित्तीय समावेशन लाए. बस्तर को नक्सल प्रभावित जिलों की सूची से हटा दिया गया-यह राज्य की दृढ़ता का प्रमाण है. लेकिन मीडिया में ये कहानियां केंद्र की चकाचौंध में दब गईं. एक स्थानीय पत्रकार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “केंद्र की बड़ी घोषणाएं तो सुर्खियां बनती हैं, लेकिन राज्य की जमीनी मेहनत को भुला दिया जाता है.”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मार्च 2025 में बिलासपुर रैली में कहा, “कांग्रेस की नीतियों ने दशकों तक नक्सलवाद को बढ़ावा दिया. पिछड़े इलाकों में विकास न होने से नक्सल फला-फूला.” पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यकाल में नक्सली ‘हमारी सरकार’ कहते थे, और शांति वार्ता की बातें होती थीं. सलवा जुडुम महेंद्र कर्मा जैसे आदिवासी नेता की महत्वाकांक्षी सोच थी. जिसे विवादास्पद बना कर नक्सल ईको सिस्टम और अर्बन नक्सल ने सफल नहीं होने दिया. बाद में नक्सलियों ने 2013 के दर्भा घाटी हमले में एक दर्जन से अधिक कांग्रेस नेताओं के साथ महेंद्र कर्मा की नृशंस हत्या की. कांग्रेस पर नक्सलियों को संरक्षण देने के आरोप भी लगे. पूर्व भाजपा मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार में नक्सली घुसपैठिए थे. मीडिया में नक्सलियों को ‘रोबिन हुड’ बनाने की प्रवृत्ति थी-उनके इंटरव्यू प्रसारित होते, और आंदोलनकारी गिरोह उनकी सहानुभूति दिखाते. लेकिन अब, जब सफाया हो रहा है, अर्बन नक्सल ईको सिस्टम चुप हैं.

यह सच है कि अब नक्सलवाद का ग्रामीण चेहरा मिट रहा है, लेकिन इसका शहरी अवतार-‘अर्बन नक्सल’-आज भी एक बड़ी चुनौती है. नक्सली दस्तावेज, जैसे सीपीआई (माओइस्ट) के आंतरिक पत्र, साफ बताते हैं कि अब उनका उद्देश्य जंगलों से निकलकर शहरों और महानगरों में जहर फैलाना है. 1980 के दशक से उभरा यह ‘इंटेलेक्चुअल वॉर’ शिक्षा संस्थानों, मीडिया और राजनीति में घुस चुका है. इनकी विचारधारा से प्रभावित होकर जेएनयू, जादवपुर यूनिवर्सिटी जैसे केंद्रों से निकले युवा विभिन्न राजनीतिक दलों के आईटी सेल, बौद्धिक प्रकोष्ठों में जगह बना रहे हैं. विवेक अग्निहोत्री की किताब ‘अर्बन नक्सल्स’ इसे उजागर करती है-शहरी बुद्धिजीवी नक्सलियों को वैचारिक समर्थन देते हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने मार्च 2025 में कहा, “जंगल से नक्सलवाद गायब हो रहा, लेकिन शहरों में जड़ें जमा रहा है. कुछ राजनीतिक दलों में अर्बन नक्सल घुस चुके हैं.” हाल के वर्षों में भारत की राजनीति में अराजकता का स्वर-शाहीन बाग जैसे आंदोलनों से-इस संदेह को गहरा बनाता है. महाराष्ट्र सरकार ने ‘अर्बन नक्सल’ विरोधी बिल लाने की तैयारी की है.

पिछले कुछ सालों में राजनीति में आई अस्थिरता-विपक्षी दलों के आईटी सेल से निकलने वाली अफवाहें, सोशल मीडिया पर उकसावे-यह संकेत देती है कि अर्बन नक्सल अपनी जगह बना चुके हैं. एक खुफिया रिपोर्ट के अनुसार, 250 से अधिक संकाय सदस्य विश्वविद्यालयों में उग्रवादी विचारों का प्रचार कर रहे हैं. ये लोग कानूनी सहायता, फंडिंग और प्रचार से नक्सलियों को मजबूत करते हैं. छत्तीसगढ़ में सफलता के बावजूद, अगर शहरी मोर्चा न संभाला गया, तो जंगल की जीत व्यर्थ हो जाएगी. राज्य सरकार ने अब अर्बन नक्सल पर नजर रखने के लिए विशेष इकाई गठित की है.

इस सफर में आदिवासी समुदाय की भूमिका सराहनीय है. बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजनों से नक्सल प्रभावित युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ा गया. 1,143 युवाओं को बस्तरिया बटालियन में भर्ती किया गया. विकास परियोजनाएं-रेल, सड़क, बिजली – 33,700 करोड़ की लागत से शुरू हुईं. लेकिन एनजीओ कर्मी हिमांशु कुमार जैसे लोग सवाल उठाते हैं: क्या एन्काउंटरों में निर्दोष आदिवासी मारे जा रहे हैं? जनवरी 2025 में बीजापुर में एक छह माह की बच्ची की मौत ने विवाद खड़ा किया. सरकार का कहना है कि ये दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं हैं, लेकिन जांच जरूरी है. स्थानीय पुलिस, आदिवासी समाज और सेना को मिलकर संवेदनशीलता के साथ जंगल में ऑपरेशन को अंजाम देना होगा. जिससे निर्दोष शिकार ना हो और नक्सलियों के प्रोपगेंडा मशीनरी को अफ़वाह फैलाने का अवसर ना मिले.

अंत में, छत्तीसगढ़ की यह जीत साबित करती है कि केंद्र की मजबूत रीढ़ के बिना यह सफलता हासिल नहीं होती, लेकिन राज्य की इच्छाशक्ति ने ही इसे उड़ान दी. मीडिया को अब इस संतुलन को उजागर करना चाहिए क्योंकि असली श्रेय तो जमीनी सिपाहियों और आदिवासी बहनों का है, जो जंगल की हर शाखा पर विकास की बीज बो रही हैं. मार्च 2026 नजदीक आ रहा है; नक्सल-मुक्त भारत का सपना साकार होने को है. लेकिन सतर्क रहना होगा क्योंकि जंगल शांत हो चुके हैं, शहर अभी जाग रहे हैं

सोना अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंचा, इन चार वजहों से बढ़ती जा रही कीमत

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भारत में सोने की कीमत हर द‍िन एक नई ऊंचाई देख रही है. अब सोना र‍िकॉर्ड स्‍तर पर पहुंच गया है. द‍िल्‍ली में 10 ग्राम 24K सोन की कीमत 1,17,475 रुपये दर्ज की गई है. भारत के बाकी के राज्‍यों और शहरों में भी यही रेट है. आपको याद होगा क‍ि कुछ साल पहले तक सोने की कीमत 30000 रुपये थी. तब आपने सोचा भी नहीं होगा क‍ि सोने का गहना खरीदना सपना बन जाएगा. तो सवाल ये है क‍ि आख‍िर सोने की कीमत क्‍यों बढ़ रही है ? इसके पीछे की क्‍या वजह है.
सोने की कीमतों में द‍िख रहा इजाफा, चार वजहों से है. आइए इसके पीछे के चार प्रमुख कारणों पर नजर डालते हैं.
1. भारत में त्योहारों के मौसम की मांग
नवरात्रि के त्योहार की शुरुआत ने आभूषण खरीदारी को बढ़ावा दिया है, जिसे भारतीय घरों में शुभ माना जाता है. मौसमी खरीदारी और आने वाले दिवाली और शादी के मौसम के लिए अग्रिम खरीदारी ने भौतिक मांग को मजबूत बनाए रखा है, भले ही कीमतें ऊंची हैं.

2. फेडरल रिजर्व की दर कटौती की उम्मीदें
वैश्विक निवेशक इस बात को लेकर आश्वस्त होते जा रहे हैं कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व आगामी बैठकों में ब्याज दरों में कटौती करेगा. कम दरें गैर-उपज वाले संपत्तियों जैसे सोने को रखने की अवसर लागत को कम करती हैं, जिससे यह मूल्य के भंडार के रूप में अधिक आकर्षक हो जाता है. व्यापारी अब इस सप्ताह के अंत में फेड चेयर जेरोम पॉवेल की टिप्पणियों का इंतजार कर रहे हैं.

3. अमेरिकी डॉलर की कमजोरी
एक कमजोर अमेरिकी डॉलर ने बुलियन की रैली को गति दी है, जिससे अन्य मुद्राओं को रखने वाले खरीदारों के लिए सोना अधिक सस्ता हो गया है और वैश्विक स्तर पर निवेश की मांग को बढ़ावा मिला है.
4. सुरक्षित निवेश की अपील
वैश्विक आर्थिक वृद्धि के बारे में अनिश्चितता, चल रहे भू-राजनीतिक तनाव और अस्थिर इक्विटी बाजार निवेशकों को सुरक्षित निवेश के रूप में सोने की ओर धकेल रहे हैं. मुद्रास्फीति और मुद्रा उतार-चढ़ाव के खिलाफ हेज के रूप में सोने की भूमिका फिर से ध्यान में है.

बाजारों ने इसके अनुसार प्रतिक्रिया दी. भारत में, ज्वैलर्स ने मजबूत फुटफॉल की रिपोर्ट दी क्योंकि खरीदारों ने आगे की कीमतों में वृद्धि से पहले खरीदारी करना चुना. हालांकि, विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अत्यधिक ऊंची कीमतें थोक खरीद को सीमित कर सकती हैं, विशेष रूप से मूल्य-संवेदनशील घरों में. वैश्विक स्तर पर, सोने के ईटीएफ और वायदा में निवेश प्रवाह मजबूत बना हुआ है, सट्टेबाज लंबी स्थिति बढ़ा रहे हैं. वैश्विक जोखिम भावना बुलियन में निरंतर प्रवाह का समर्थन कर रही है.

36 हथियार, 82 राउंड गोला-बारूद… मणिपुर में सेना को बड़ी कामयाबी, 9 कट्टर उग्रवादी गिरफ्तार

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मणिपुर के विभिन्न जिलों में संयुक्त अभियानों की एक सीरीज में सेना और अन्य सुरक्षा बलों ने नौ कट्टर उग्रवादियों को गिरफ्तार किया है और 36 हथियार, कुछ इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी), ड्रग्स और अन्य युद्ध संबंधी सामान बरामद किया है. अधिकारियों ने मंगलवार को यह जानकारी दी.
रक्षा प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल अमित शुक्ला ने बताया कि सेना और असम राइफल्स की टुकड़ियों ने मणिपुर पुलिस के साथ मिलकर सात जिलों, टेंग्नौपाल, थौबल, इंफाल पूर्व, तामेंगलोंग, चुराचांदपुर, कांगपोकपी और चंदेल, जो इंफाल घाटी और पहाड़ी क्षेत्रों में आते हैं, में कई सटीक, खुफिया जानकारी पर आधारित संयुक्त अभियान चलाए. पिछले कुछ दिनों में चलाए गए इन अभियानों में विभिन्न पहाड़ी और घाटी-आधारित उग्रवादी समूहों के नौ कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया और 36 हथियार, नशीले पदार्थ और अन्य युद्ध-संबंधी सामग्री बरामद की गई.
गिरफ्तार किए गए उग्रवादी सोशलिस्ट रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ कांगलीपाक (सोरेपा), रिवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट (आरपीएफ)/पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए), कांगलीपाक कम्युनिस्ट पार्टी (पीपुल्स वार ग्रुप) और यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट के सदस्य थे.

बरामद हथियारों में चार सेल्फ-लोडिंग राइफलें (एसएलआर), चार इंसास राइफलें, दो .303 राइफलें, एक एआर-15/एम-16 राइफल, कई बोल्ट-एक्शन राइफलें, कई 9 मिमी पिस्तौल, एक स्कोप, 82 राउंड गोला-बारूद, 25 मैगजीन और तीन मोबाइल फोन शामिल हैं. रक्षा प्रवक्ता ने कहा कि सुरक्षा बलों के ये समन्वित प्रयास मणिपुर में शांति और सुरक्षा बनाए रखने के लिए उनकी अटूट प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं.

मणिपुर के एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि म्यांमार की सीमा से लगे तेंग्नौपाल जिले के अंतर्गत सीता-तेंग्नौपाल मार्ग पर सोमवार रात सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए एक अभियान के दौरान, एक चीनी केनबो बाइक से 600 पैकेट बरामद किए गए, जिनमें 1,20,000 अत्यधिक नशीली मेथैम्फेटामाइन की गोलियां थीं, जिनका वजन 13 किलोग्राम था और जिनकी कीमत 39 करोड़ रुपए से अधिक है. इस बाइक को एक अज्ञात सवार ने सुरक्षा बलों को देखकर छोड़ दिया था.
तस्करी का सामान और दोपहिया बाइक जब्त कर ली गई है, और सवार की पहचान और गिरफ्तारी के लिए जांच जारी है. पुलिस अधिकारियों को संदेह है कि ये ड्रग्स म्यांमार से तस्करी करके लाए गए थे, जिसकी मणिपुर के साथ 398 किलोमीटर लंबी बिना बाड़ वाली सीमा है. अधिकारी ने बताया कि सुरक्षा बल पहाड़ी और इंफाल घाटी के जिलों के सीमांत और संवेदनशील इलाकों में तलाशी अभियान और क्षेत्र में दबदबा बनाए हुए हैं.

दिल्ली में होगी 30 देशों के सेना प्रमुखों की जमघट, चीन-पाकिस्तान को न्योता नहीं, UN से है खास जुड़ाव

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भारतीय सेना अक्टूबर के मिड में संयुक्त राष्ट्र (UN) में टुकड़ी भेजने वाले देशों के सेना प्रमुखों की विशेष बैठक (UNTCC Army Chiefs’ Conclave) की मेजबानी करने जा रही है. इस बैठक में 30 से ज्यादा देशों को आमंत्रित किया गया है.
विशेष रूप से इस कार्यक्रम का फोकस ग्लोबल साउथ देशों पर होगा. इसमें केवल आधिकारिक बैठकें ही नहीं, बल्कि द्विपक्षीय (Bilateral) बैठकें भी आयोजित की जाएंगी. सूत्रों के अनुसार, इस बैठक में चीन और पाकिस्तान को आमंत्रित नहीं किया गया है.
भारतीय सेना के अनुसार, इस प्रकार की बैठक का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा देना और UN मिशनों में अनुभव साझा करना है.

बेंगलुरु में ट्रैफिक का हाल खराब, सीएम सिद्धारमैया ने अजीम प्रेमजी से उधार मांगी विप्रो की सड़क

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भारत के आईटी हब के रूप में मशहूर बेंगलुरु टैफिक जाम के लिए भी कुख्यात है. कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया इस जाम से मुक्ति दिलाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं. उन्होंने इसके लिए अब दिग्गज आईटी कंपनी विप्रो के संस्थापक अजीम प्रेमजी से एक खास अनुरोध किया है. उन्होंने ट्रैफिक जाम को कम करने के लिए विप्रो के कैंपस से कुछ गाड़ियों को गुजरने की इजाजत देने की गुजारिश की है.
सीएम सिद्धारमैया ने अजीम प्रेमजी को यह पत्र 19 सितंबर को लिखा था, जिसमें उन्होंने कहा कि ट्रैफिक एक्सपर्ट्स के शुरुआती आकलन के मुताबिक इस कदम से आउटर रिंग रोड (ORR) पर ट्रैफिक का दबाव लगभग 30% तक घट सकता है, खासकर ऑफिस के व्यस्त समय के दौरान.
विप्रो कैंपस से गाड़ियों के गुजरने की गुजारिश
सिद्दारमैया ने लिखा कि पीक ऑवर के दौरान भारी ट्रैफिक जाम से लोगों की आवाजाही प्रभावित हो रही है. उन्होंने कहा कि विप्रो का सहयोग इस दिशा में अहम साबित होगा और इससे बेंगलुरु को ज्यादा सुगम और रहने योग्य बनाने में मदद मिलेगी. उन्होंने कंपनी से सरकारी अधिकारियों के साथ मिलकर जल्द एक साझा समाधान निकालने का आग्रह किया.

यह प्रस्ताव ऐसे समय सामने आया है, जब कई लोग आउटर रिंग रोड पर जाम की समस्या को लेकर लगातार ही चिंता जता रहे हैं. यह सड़क आईटी कंपनियों के हब को जोड़ने वाला अहम कॉरिडोर है. हाल ही में लॉजिस्टिक्स टेक कंपनी ब्लैकबक के सह-संस्थापक ने सड़कों की खराब स्थिति का हवाला देते हुए बेलंदूर स्थित दफ्तर खाली करने की घोषणा की थी.

ब्लैकबक के सीईओ राजेश याबाजी ने सोशल मीडिया पर लिखा था कि आउटर रिंग रोड गड्ढों और धूल से भरी सड़कों के लिए बदनाम है और इसे सुधारने की कोई गंभीर कोशिश नजर नहीं आती. उन्होंने कहा था कि आने वाले पांच साल तक हालात बेहतर होने की उम्मीद नहीं है.
याबाजी के इस पोस्ट के बाद बेंगलुरु की बिगड़ती स्थिति पर जमकर बहस छिड़ गई. केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी ने राज्य सरकार पर अयोग्यता और भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए शहर को ‘गड्ढों की राजधानी’ बताया. उन्होंने कहा कि उद्योगों का विश्वास टूट रहा है और वे पड़ोसी राज्यों की ओर रुख कर रहे हैं.
कर्नाटक सरकार पर बढ़ते दबाव के बीच डिप्टी सीएम और बेंगलुरु विकास मंत्री डीके शिवकुमार ने कहा कि ठेकेदारों को नवंबर तक गड्ढे भरने की अंतिम समय सीमा दी गई है. उन्होंने पूरे शहर में सड़क मरम्मत और निर्माण के लिए 1,100 करोड़ रुपये के फंड की घोषणा भी की. शिवकुमार ने कहा, ‘हमारा लक्ष्य स्वच्छ बेंगलुरु और सुगम यातायात है, इसके लिए गड्ढों को जल्द से जल्द ठीक किया जाएगा.’

राहुल गांधी ने लगाए आरोप तो एक्शन में आया चुनाव आयोग, अब कोई नहीं कर पाएगा वोटर लिस्ट के साथ खेल

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चुनाव आयोग (EC) ने अपनी वेबसाइट और ऐप पर नया ‘ई-साइन’ फीचर शुरू कर दिया है. इसके तहत अब वोटर रजिस्ट्रेशन, नाम हटाने या सुधार के लिए आवेदन करने वालों को अपनी पहचान आधार से लिंक मोबाइल नंबर के जरिये सत्यापित करनी होगी.
यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब हाल ही में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कर्नाटक की आलंद विधानसभा सीट पर ऑनलाइन वोटर डिलीशन फॉर्म्स के कथित दुरुपयोग का मुद्दा उठाया था. राहुल ने इसे ‘चुनावी धोखाधड़ी’ करार दिया था.
अब तक कैसे जुड़ता हटता था वोटर लिस्ट में नाम
पहले आवेदक चुनाव की वेबसाइट या ऐप पर अपने EPIC (वोटर आईडी) नंबर से मोबाइल जोड़कर फॉर्म सबमिट कर सकते थे. उस समय यह जांच नहीं होती थी कि ये डिटेल असल में उसी आवेदक की हैं या नहीं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अब नए वोटर का नाम जोड़ने के लिए Form 6, नाम हटाने के लिए Form 7 और सुधार के लिए Form 8 भरते समय आवेदक को ई-साइन प्रक्रिया पूरी करनी होगी. फॉर्म भरने के बाद आवेदक को CDAC के पोर्टल पर भेजा जाएगा. यहां आधार नंबर डालकर आधार से जुड़े मोबाइल नंबर पर OTP आएगा. OTP डालकर सहमति देने के बाद ही आवेदन आगे बढ़ेगा और ECINet पोर्टल पर सबमिट किया जा सकेगा.

चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि इस नई प्रक्रिया से आलंद जैसी घटनाओं के दोबारा होने की संभावना काफी कम हो जाएगी.
राहुल गांधी के आरोप पर EC का जवाब
याद दिला दें कि राहुल गांधी ने 18 सितंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दावा किया था कि आलंद विधानसभा क्षेत्र में ऑनलाइन सबमिशन के जरिए करीब 6,000 मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश की गई. इसमें वास्तविक मतदाताओं की पहचान का गलत इस्तेमाल किया गया था और OTP प्राप्त करने के लिए ऐसे मोबाइल नंबर लगाए गए जो उन वोटर्स के नहीं थे.
हालांकि, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया था कि ‘कोई भी शख्स सीधे ऑनलाइन वोटर डिलीट नहीं कर सकता. हर डिलीशन से पहले प्रभावित व्यक्ति को सुनवाई का मौका देना जरूरी है.’ आयोग ने बताया था कि आलंद मामले में 6,018 नामों पर डिलीशन के लिए आवेदन आए थे, जिनमें से सिर्फ 24 सही पाए गए. बाकी 5,994 मतदाता अब भी वहीं रह रहे थे. इस मामले में फरवरी 2023 में FIR दर्ज की गई थी.
ECINet क्या है?
इस साल लॉन्च हुआ ECINet पोर्टल चुनाव आयोग के लगभग 40 पुराने ऐप्स और वेबसाइट्स को जोड़कर बनाया गया है. इसमें पहले शुरू किया गया ERONet (2018) भी शामिल है, जो चुनाव पंजीकरण अधिकारियों (EROs) के लिए बनाया गया था. ECINet के जरिए मतदाता ऑनलाइन फॉर्म भर सकते हैं और संबंधित बूथ लेवल अधिकारी (BLO) व ERO उसकी जांच कर सकते हैं.
नए ई-साइन फीचर के साथ अब चुनाव आयोग मतदाता सूची में पारदर्शिता और सुरक्षा को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठा चुका है.

‘पीएम मोदी को तिरंगा फहराने से रोको, 11 करोड़ का इनाम दूंगा…’ सिखों को भड़का रहा था आतंकी पन्नू, NIA ने लिया एक्शन

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राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने खालिस्तानी आतंकवादी और प्रतिबंधित संगठन सिख फॉर जस्टिस (SFJ) के संस्थापक गुरपतवंत सिंह पन्नू के खिलाफ नया मामला दर्ज किया है. पन्नू पर आरोप है कि उसने इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लाल किले पर तिरंगा फहराने से रोकने के लिए 11 करोड़ रुपये का इनाम घोषित किया था.
यह एफआईआर 19 अगस्त को गृह मंत्रालय के निर्देश पर दर्ज की गई है. इसमें पन्नू पर भारत की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा को नुकसान पहुंचाने और सिख समुदाय में भारत के खिलाफ असंतोष फैलाने के आरोप लगाए गए हैं.
लाहौर प्रेस क्लब से ऐलान
एनआईए की एफआईआर के अनुसार, 10 अगस्त को पाकिस्तान के लाहौर प्रेस क्लब में आयोजित एक ‘मीट द प्रेस’ कार्यक्रम के दौरान पन्नू ने वाशिंगटन से वीडियो संदेश के जरिये यह ऐलान किया. उसने कहा कि जो ‘सिख सैनिक’ प्रधानमंत्री मोदी को तिरंगा फहराने से रोकेंगे, उन्हें 11 करोड़ रुपये का इनाम दिया जाएगा.

एनआईए ने यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धाराओं के तहत दर्ज किया है. एफआईआर में पन्नू और अन्य अज्ञात व्यक्तियों के नाम शामिल किए गए हैं.

एफआईआर के मुताबिक, इस कार्यक्रम के दौरान पन्नू ने नए खालिस्तान का नक्शा भी जारी किया, जिसमें पंजाब, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश को शामिल किया गया है. साथ ही उसने दावा किया कि एसएफजे ने ‘शहीद जत्था’ नामक इकाई बनाई है, जो भारत के खिलाफ लड़ाई लड़ेगी.
पन्नू के खिलाफ 7वीं FIR
पन्नू के खिलाफ एनआईए की यह सातवीं एफआईआर है. केंद्र सरकार ने 10 जुलाई 2019 को सिख फॉर जस्टिस को UAPA के तहत प्रतिबंधित कर दिया था. इसके बाद 1 जुलाई 2020 को पन्नू को भी आतंकवादी घोषित कर दिया गया था.
गृह मंत्रालय ने अपने आदेश में कहा कि ‘अपराध की गंभीरता, इसके राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव और बड़ी साजिश का पर्दाफाश करने की आवश्यकता को देखते हुए इस मामले की जांच NIA से कराई जानी चाहिए.’

भारत में हर साल 70 हजार बच्चों को कैंसर, कितने हो पाते हैं ठीक? एम्स ने दिए आंकड़े

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कैंसर इतनी खतरनाक बीमारी है कि इसका नाम सुनते ही मन में डर पैदा हो जाता है. वहीं जब यह बीमारी बच्चों में निकल आए तो उनके पूरे जीवन को लेकर चिंता पैदा हो जाती है. सिर्फ भारत की बात करें तो यहां हर साल करीब 70 हजार नए बच्चे कैंसर की चपेट में आते हैं. इनमें से कुछ बच्चे सही समय पर बीमारी की पहचान के बाद इलाज पा जाते हैं, जबकि कुछ बच्चों को इलाज मिलने में देरी से उनकी जिंदगी खतरे में पड़ जाती है. हालांकि एम्स नई दिल्ली के पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी विभाग ने बच्चों में कैंसर के इलाज को लेकर बड़ी जानकारी दी है.
एम्स के पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी विभाग की प्रोफेसर, डॉ.रचना सेठ ने बताया कि करीब दस साल पहले कैंसर से पीड़ित बच्चों में से 50 फीसदी से भी कम को बचा पाना संभव हो पाता था लेकिन आज हर चार में से तीन बच्चे ठीक हो रहे हैं. यानि 75 फीसदी बच्चों को कैंसर के बाद इलाज से बचाया जा सकता है. यह आंकड़ा बताता है कि आज भारत में कैंसर के इलाज ने कितनी तरक्की कर ली है.
जबकि कुछ अन्य प्रकार के कैंसर में यह प्रगति और भी ज्यादा है. इस बारे में डॉ. आदित्य कुमार गुप्ता ने बताया कि हर प्रकार के कैंसर की रिकवरी दर अलग-अलग होती है जैसे एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया, इसमें पहले सिर्फ़ 30 फीसदी बच्चों को ही बचाना संभव होता था लेकिन आज की तारीख में इस कैंसर से पीड़ित 88 फीसदी बच्चों को बचाना संभव है.यह कैंसर के इलाज में बड़ी कामयाबी है.

वहीं बच्चों के आंखों में कैंसर यानि रेटिनोब्लास्टोमा में करीब 90 फीसदी बच्चों को ठीक किया जा सकता है. बता दें कि एम्स में हर साल 450 से 500 नए कैंसर के बच्चे आते हैं. इनमें सबसे कॉमन कैंसर हैं, ल्यूकेमिया यानि ब्लड कैंसर, लिम्फोमा, रेटिनोब्लास्टोमा, ब्रेन ट्यूमर और हड्डियों का कैंसर.

सबसे ज्यादा होते हैं ल्यूकेमिया और लिम्फोमा
प्रो. सेठ ने बताया कि बच्चों में सबसे ज्यादा मामले ल्यूकेमिया और लिम्फोमा के आते हैं, ये दोनों मिलाकर करीब एक-तिहाई मामलों में होते हैं, जबकि रेटिनोब्लास्टोमा करीब एक-चौथाई में होता है.इसके बाद ब्रेन और बोन कैंसर के मामले आते हैं.
जेनेटिक होता है कैंसर
डॉ. सेठ ने कहा कि बहुत सारे मामलों में कैंसर का कारण आनुवंशिक (जीन से जुड़ा) होता है लेकिन कैंसर के ज्यादातर मामलों का स्पष्ट कारण अब भी पता नहीं चल पाया है. यहां तक कि इलाज होने के बाद करीब 15 फीसदी मामलों में बीमारी दोबारा लौट आती है और इसके लिए और भी ज्यादा क्रिटिकल इलाज की जरूरत होती है.
इन दो राज्यों से आते हैं बच्चे
डॉ. सेठ ने बताया कि एम्स नई दिल्ली में ज्यादातर कैंसर के बच्चे उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य से इलाज कराने के लिए आते हैं. इससे यह पता चलता है कि देशभर में बच्चों में कैंसर के इलाज की सुविधा समान रूप से उपलब्ध नहीं है.
हालांकि बीमारी की जल्दी पहचान होने और इलाज मिलने से इसकी रिकवरी दर बढ़ जाती है.आजकल कैंसर की आधुनिक दवाएं और मजबूत सहायक सेवाएं भी मौजूद हैं जो कैंसर के इलाज में कारगर साबित हो रही हैं.I]K,

“केंद्र ने चीन सीमा के पास हाइड्रो प्रोजेक्ट को दी ग्रीन मंजूरी, समझें क्या हैं मायने”

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केंद्र ने चीन सीमा के पास हाइड्रो प्रोजेक्ट को दी ग्रीन मंजूरी, समझें क्या हैं मायने

चीन की तरफ से तिब्बत में यारलुंग सांग्पो नदी पर दुनिया का सबसे बड़ा बांध बनाया जा रहा है। इस बांध को भारत के लिए बड़ी चिंता की वजह बताया जा रहा है। इस बीच केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की एक विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने चीन की सीमा से लगे अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले में रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र में स्थित 2,220 मेगावाट की ओजू जलविद्युत परियोजना को मंजूरी दे दी है।

यह भारत की सबसे बड़ी नदी-प्रवाह जलविद्युत परियोजनाओं में से एक है। इस परियोजना पर लगभग 25,000 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसके पूरा होने में कम से कम पांच साल लगने की संभावना है।

अरुणाचल की तीसरी सबसे बड़ी परियोजना  यह अरुणाचल प्रदेश में ही स्थित 3,087 मेगावाट की एटालिन और 2,880 मेगावाट की दिबांग परियोजनाओं के बाद पर्यावरणीय मंज़ूरी पाने वाली भारत की तीसरी सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजना है। ओजू, सुबनसिरी नदी पर प्रस्तावित बांधों की श्रृंखला में सबसे बड़ा है और लगभग 20 वर्षों से निर्माणाधीन है। इसमें 100 मीटर ऊँचा कंक्रीट का गुरुत्व बांध, 14 किलोमीटर से अधिक लंबी हेडरेस सुरंग और एक भूमिगत बिजलीघर परिसर शामिल है।

रियल टाइम अर्ली वॉर्निंग सिस्टम विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति ने इस महीने की शुरुआत में परियोजना को अपनी मंज़ूरी देते हुए, डेवलपर को बाढ़ के अनुमानों के डिज़ाइन में ‘हिमनद झील के फटने से होने वाली बाढ़’ के परिदृश्यों को शामिल करने, एक वास्तविक समय पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने और सामुदायिक तैयारी अभ्यास करने का निर्देश दिया है। समिति ने पाँच वर्षों के बाद कमीशनिंग के बाद पर्यावरणीय प्रभाव अध्ययन का भी आदेश दिया है।