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भूकंप आने पर नदियों में क्यों नहीं आती सूनामी समुद्र में ही क्यों आती है, बड़े जलाशयों में क्यों तबाही

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रूस के सूदूर पूर्व प्रायद्वीप कमचटका में 8.8 तीव्रता का भूकंप आया, जो अब तक के सबसे शक्तिशाली भूकंपों में एक है. इसके बाद प्रशांत महासागर के तटों पर कई फीट ऊंची लहरें उठीं. और हजारों किलोमीटर दूर तक सूनामी आ गई. भूकंप आने पर समुद्रों में तो सूनामी आ जाती है लेकिन नदी में ये क्यों नहीं आती, उसकी क्या वजह है. क्या कभी किसी नदी के नीचे भूकंप आया तो फिर क्या हुआ.
सुनामी समुद्र के भीतर आए भूकंप, ज्वालामुखी विस्फोट, या भूस्खलन की वजह से समुद्र के तल के अचानक काफी ऊपर-नीचे होने से पैदा होती है. इससे समुद्र का बहुत बड़ा पानी का हिस्सा एक साथ हिल जाता है. विशाल लहरें बनती हैं, जो बहुत तेजी से आगे बढ़ती हैं. इनमें इतनी अपार ऊर्जा होती है कि ये लहरें जब तट से टकराती हैं तो बहुत ऊपर तक उठती हैं और बहुत तबाही लाती हैं.
रूस के कमचटका प्रायद्वीप में आए बड़े भूकंप के बाद सूनामी की लहरें जापान से लेकर अमेरिका तक फैल गईं. देखते ही देखते हर जगह अलर्ट हो गई. हर जगह तटों पर ऊंची लहरें उठी देखी गईं लेकिन अलर्ट होने के कारण काफी हद तक लोगों को वहां से निकाल लिया गया लिहाजा किसी की जान जाने की खबर तो नहीं है लेकिन तटीय इलाकों के इंफ्रास्ट्रक्चर को बहुत क्षति हुई.

अब सवाल यही है कि अपार पानी तो नदियों में भी होता है तो वहां भूकंप की स्थिति कभी सूनामी क्यों नहीं आती. नदियों की गहराई और आकार बहुत छोटा होता है. नदियां बहुत संकरी और उथली होती हैं, जबकि समुद्र गहरे और बहुत फैले हुए होते हैं. इसलिए भूकंप का प्रभाव अगर नदी के नीचे भी हो, तो वह इतनी बड़ी मात्रा में पानी को नहीं हिला सकता कि सुनामी जैसी विशाल लहर बने.

नदियां ज़्यादातर जमीन पर बहती हैं, समुद्र की तरह विशाल जलसमूह नहीं होतीं. सुनामी बनने के लिए ज़रूरी है कि बहुत बड़े क्षेत्र का पानी अचानक हिल जाए. नदियों में पानी सीमित मात्रा में होता है, इसलिए इतना विशाल दबाव उत्पन्न नहीं हो सकता.

अगर नदी के नीचे भूकंप आ जाए तो
भूकंप में समुद्रतल प्रभावित करता है लेकिन वो नदी के तल पर असर नहीं डाल पाता. समुद्र के तल में अगर कोई प्लेट खिसकती है तो उससे पानी ऊपर-नीचे होता है, जिससे अपार ऊर्जा पैदा होती है और उसका असर लहरों पर पड़ता है. लहरें तूफानी और तेज हो जाती हैं. इसमें इतनी ऊर्जा होती है कि इनके सामने जो भी आता है वो टिक नहीं पाता. लेकिन नदी के नीचे अगर भूकंप भी हो तो वो ज़मीन को बेशक हिला सकता है, मगर उसमें सुनामी जैसी लहर नहीं बनती.
नदी में भूकंप से ज़्यादा से ज़्यादा पानी अस्थायी रूप से गड़बड़ हो सकता है. जैसे कि कुछ जगह पानी उछल जाए, नदी का बहाव तेज़ हो जाए या किसी बांध में दरार आ जाए लेकिन यह स्थानीय स्तर पर होता है, वैश्विक स्तर की सुनामी नहीं बनती.RTFGVB

25% टैरिफ के बावजूद सेंसेक्स ने की शानदार रिकवरी, वक्त बदल दिया.. जज्बात पलट दिए

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शेयर बाजार ने गुरुवार को वह किया, जिसकी किसी को भी उम्मीद नहीं थी. शुरुआत तो गिरकर ही हुई थी, लेकिन दोपहर होते-होते सेंसेक्स ने अपना इंट्राडे के निचले स्तर से 900 अंकों की रिकवरी कर ली. बुधवार शाम को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर 25 फीसदी टैरिफ के ऐलान के बाद गुरुवार को भारतीय शेयर बाजार में दिन की शुरुआत काफी कमजोर रही थी. लेकिन दोपहर तक आई तेजी की वजह कुछ अच्छे संकेत माने जा रहे हैं, जैसे कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट, वैश्विक बाजारों से पॉजिटिव संकेत और भारत-अमेरिका के बीच ट्रेड डील को लेकर बातचीत जारी रहने की उम्मीदें.
मनीकंट्रोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, BSE सेंसेक्स दिन के शुरुआती कारोबार में करीब 786 अंक टूटकर 80,695 तक पहुंच गया था, लेकिन इसके बाद इसमें जबरदस्त उछाल आया और यह 650 अंक की तेजी के साथ 81,345 के स्तर पर जा पहुंचा. इसी तरह नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी भी 24,635 के निचले स्तर से पलटा और 24,800 के ऊपर कारोबार करने लगा.
5 कारणों से हुई शानदार रिकवरी
इस रिकवरी के पीछे सबसे बड़ी वजह यह रही कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भले ही भारत के सामानों पर 25% टैरिफ लगाने की बात कही हो, लेकिन साथ ही यह भी कहा कि भारत के साथ बातचीत जारी रहेगी. निवेशकों को उम्मीद है कि बुधवार वाला बयान केवल ज्यादा दबाव बनाने के लिए दिया गया है, और अंत में टैरिफ इतना ज्यादा नहीं लगाया जाएगा. अगली बातचीत अगस्त में होनी है, जिसे लेकर बाजार में उम्मीदें बनी हुई हैं.
दूसरी अहम बात यह रही कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें थोड़ी नीचे आईं. ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.19% गिरकर 73.10 डॉलर प्रति बैरल हो गई. भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए तेल सस्ता होने से महंगाई पर दबाव कम होता है और यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत माना जाता है.दूसरी अहम बात यह रही कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें थोड़ी नीचे आईं. ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.19% गिरकर 73.10 डॉलर प्रति बैरल हो गई. भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए तेल सस्ता होने से महंगाई पर दबाव कम होता है और यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत माना जाता है.दूसरी अहम बात यह रही कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें थोड़ी नीचे आईं. ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.19% गिरकर 73.10 डॉलर प्रति बैरल हो गई. भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए तेल सस्ता होने से महंगाई पर दबाव कम होता है और यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत माना जाता है.दूसरी अहम बात यह रही कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें थोड़ी नीचे आईं. ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.19% गिरकर 73.10 डॉलर प्रति बैरल हो गई. भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए तेल सस्ता होने से महंगाई पर दबाव कम होता है और यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत माना जाता है.दूसरी अहम बात यह रही कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें थोड़ी नीचे आईं. ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.19% गिरकर 73.10 डॉलर प्रति बैरल हो गई. भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए तेल सस्ता होने से महंगाई पर दबाव कम होता है और यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत माना जाता है.दूसरी अहम बात यह रही कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें थोड़ी नीचे आईं. ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.19% गिरकर 73.10 डॉलर प्रति बैरल हो गई. भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए तेल सस्ता होने से महंगाई पर दबाव कम होता है और यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत माना जाता है.दूसरी अहम बात यह रही कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें थोड़ी नीचे आईं. ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.19% गिरकर 73.10 डॉलर प्रति बैरल हो गई. भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए तेल सस्ता होने से महंगाई पर दबाव कम होता है और यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत माना जाता है.दूसरी 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दूसरी अहम बात यह रही कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें थोड़ी नीचे आईं. ब्रेंट क्रूड की कीमत 0.19% गिरकर 73.10 डॉलर प्रति बैरल हो गई. भारत एक बड़ा तेल आयातक देश है, इसलिए तेल सस्ता होने से महंगाई पर दबाव कम होता है और यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत माना जाता है.

तीसरा पॉजिटिव फैक्टर रहा दुनिया के अन्य बाजारों का अच्छा प्रदर्शन. जापान का निक्केई इंडेक्स करीब 1.5% बढ़ा, और अमेरिका के शेयर बाज़ारों से भी अच्छे संकेत मिले. इससे भारतीय निवेशकों में भी भरोसा लौटा.

रुपये में भी थोड़ी मजबूती देखने को मिली. शुरुआत में डॉलर के मुकाबले रुपया 89 पैसे गिर गया था, जो तीन सालों में सबसे तेज गिरावट थी, लेकिन बाद में 14 पैसे की रिकवरी के साथ यह 87.66 पर आ गया. माना जा रहा है कि इसमें रिजर्व बैंक की संभावित दखल का असर हो सकता है.
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैठक से संकेत मिले कि अमेरिका में ब्याज दरें घट सकती हैं. हालांकि फेड चेयरमैन ने सीधे कुछ नहीं कहा, लेकिन दो वरिष्ठ अधिकारियों ने ब्याज दर कम करने के पक्ष में राय दी. इससे दुनिया भर के बाजारों को यह उम्मीद मिली कि आने वाले महीनों में लोन सस्ते हो सकते हैं, जिससे निवेश को बढ़ावा मिलेगा.

या बच जाएगी 12000 एम्‍पलॉयीज की नौकरी? छंटनी के आड़े आ रहा सरकार का नियम, कर्मचारी संघ ने किया मुकदमा

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देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टाटा कंसल्‍टेंसी सर्विसेज (TCS) ने पहली बार छंटनी का ऐलान किया तो देशभर में हड़कंप मच गया. कंपनी ने ऐलान किया है कि वह चालू वित्‍तवर्ष में अपने 2 फीसदी कर्मचारियों की छंटनी करेगी, जिसका मतलब है कि करीब 12 हजार लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा. अब कर्नाटक राज्‍य आईटी कर्मचारी संघ (KITU) ने इस प्रस्‍तावित छंटनी का विरोध किया है और कहा है कि कंपनी ने राज्‍य के नियमों का उल्‍लंघन किया है. कर्मचारी संघ ने तो कंपनी के खिलाफ मुकदमा भी शुरू कर दिया है.
KITU ने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज की प्रस्तावित छंटनी के खिलाफ औद्योगिक विवाद दर्ज किया है. साथ ही श्रम विभाग से प्रबंधन के खिलाफ औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 और कर्नाटक सरकार द्वारा सेवा विवरण रिपोर्टिंग पर लगाए गए शर्तों के उल्लंघन के आरोप में कार्रवाई करने का आग्रह भी किया है. KITU के प्रतिनिधियों ने अतिरिक्त श्रम आयुक्त जी मंजुनाथ से मुलाकात की और कई कर्मचारी शिकायतों का हवाला देते हुए एक शिकायत सौंपी है. इसमें कहा गया है कि टीसीएस की प्रस्‍तावित छंटनी पूरी तरह नियमों के विरुद्ध है.

क्‍या है कर्नाटक सरकार का नियम
कर्नाटक राज्‍य के औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत 100 से अधिक कर्मचारियों को रोजगार देने वाली कंपनियों को किसी भी छंटनी या पुनर्गठन से पहले सरकार की पूर्व स्वीकृति प्राप्त करनी होती है. ऐसे कार्य केवल विशिष्ट कारणों और अधिनियम में स्पष्ट रूप से परिभाषित शर्तों के तहत ही किए जा सकते हैं. KITU ने दावा किया कि TCS प्रबंधन ने इन प्रावधानों का उल्लंघन किया है. संघ ने उल्लंघनों में शामिल अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही और प्रभावित कर्मचारियों के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए श्रम विभाग से तत्काल कार्रवाई की मांग की है.
श्रम विभाग ने शुरू किया मंथन
मामले से जुड़े सूत्रों का कहना है कि श्रम विभाग ने भी टीसीएस प्रबंधन के साथ प्रस्तावित छंटनी पर चर्चा करने के लिए एक बैठक की योजना बनाई है. हालांकि, इसकी तारीख अभी तय नहीं हुई है. राज्य के श्रम मंत्री ने निर्देश दिया है कि यह बैठक जल्द से जल्द होनी चाहिए. उधर, कर्मचारी संगठन ने स्थिति की गंभीरता पर जोर देते हुए आईटी क्षेत्र में श्रम कानूनों के सख्त पालन की मांग की है. उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर कार्रवाई नहीं की गई तो यह राज्य में कर्मचारियों के अधिकारों के लिए खतरनाक मिसाल बन सकता है.

क्‍या कह रहा टीसीएस का प्रबंधन
टीसीएस ने कहा है कि छंटनी उसकी भविष्य की तैयारियों की रणनीति का हिस्सा है, जिसमें तकनीक में निवेश, एआई का उपयोग, बाजार विस्तार और कर्मचारियों की संख्‍या का पुनर्गठन शामिल है. इस दिशा में कई स्‍तरों पर बदलाव चल रहा है. जाहिर है कि इस प्रक्रिया में उन कर्मचारियों को निकालना पड़ेगा, जिनकी तैनानी संभव नहीं हो सकती है. यही वजह है कि हमारे कुल कर्मचारी संख्‍या का करीब 2 फीसदी प्रभावित होगा.

25 फीसदी टैरिफ का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर, क्या ये अस्थायी है

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अमेरिका ने भारत के लिए टैरिफ बातचीत की समयसीमा 1 अगस्त तय की थी लेकिन उन्होंने उससे एक दिन पहले ही 25 फीसदी टैरिफ लगा दिया है. हालांकि अब तक तो भारत और अमेरिका के व्यापारिक रिश्ते मजबूत रहे हैं, जिसका सकारात्मक असर भारत की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा. अब अमेरिका के इस कदम के बाद भारत पर क्या असर पड़ने वाला है. क्या इससे भारतीय उद्योगों और अर्थव्यवस्था पर कोई असर पड़ने वाला है. हालांकि इस कदम के बाद कई देशों की अमेरिकी बाजार में चांदी होने वाली है.
ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पोस्ट में लिखा, “हालांकि भारत हमारा मित्र है, लेकिन हमने पिछले कुछ वर्षों में उनके साथ अपेक्षाकृत कम व्यापार किया है, क्योंकि उनके टैरिफ बहुत अधिक हैं, जो विश्व में सबसे अधिक हैं. उनके यहां किसी भी देश की तुलना में सबसे कठोर और अप्रिय गैर-मौद्रिक व्यापार बाधाएं हैं.”
कितना आयात – निर्यात
2024 में भारत ने अमेरिका को 87.4 अरब डॉलर का सामान निर्यात किया, जबकि अमेरिका से 41.8 अरब डॉलर का आयात किया, जिससे अमेरिका को 45.7 अरब डॉलर का व्यापार घाटा हुआ. भारत के प्रमुख निर्यात में दवाइयां, कपड़ा, रत्न-आभूषण, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्टील-एल्यूमीनियम शामिल हैं. भारत से अमेरिका को बड़े पैमाने पर निर्यात होता है, ये हमारे कुल निर्यात का लगभग 18% हिस्सा है.
आगे बढ़ने से पहले ये जान लेते हैं कि अमेरिका के टैरिफ संबंधी कदमों के बाद किस देश के सामान अमेरिकी बाजारों में सबसे सस्ते होंगे और उन्हें इसका सबसे ज्यादा फायदा होने जा रहा है तो किस देश के सामान महंगे हो जाएंगे.

कनाडा और मेक्सिको जैसे देशों की सबसे ज्यादा चांदी होगी. इन दोनों देशों से यूएस में आयातित USMCA‑compliant सामानों पर फिलहाल 0% टैक्स लागू है. जाहिर सी बात है इस वजह से उनके सामान अमेरिकी बाजार में सबसे सस्ते मिलेंगे तो उनकी मांग में बढोतरी हो जाएगी. यूरोपीय संघ (EU), जापान, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया के सामान भी अमेरिका में अपेक्षाकृत भारत से सस्ते मिलेंगे. क्योंकि इन देशों की अधिकांश वस्तुओं पर 15% की टैरिफ दर तय हुई है.
किन देशों के लिए अमेरिकी बाजार हुए मुश्किल
सबसे महंगे सामान जिस देशों के होने वाले हैं, उसमें ब्राजील, चीन और भारत जैसे देश शामिल हैं. ब्राज़ील से आयातित वस्तुओं पर अमेरिका ने 50% की भारी टैरिफ दर लागू की है. यह मौजूदा समय में सबसे अधिक दर है. कनाडा के वो सामान जो USMCA में शामिल नहीं हैं, उन पर 25–35% टैरिफ होगा लेकिन उसमें उसके बहुत कम ही सामान शामिल होंगे. चीन के सामान पर 30% टैरिफ है लेकिन इसे बहुत सी चीजों पर और ज्यादा भी रखा जा सकता है. इससे ये तो जाहिर है कि भारत के लिए अमेरिकी बाजार में मुश्किलें बढऩे वाली हैं.
भारत को कहां कहां असर
भारत से अमेरिका को सबसे ज्यादा कपड़े का निर्यात होता है. 2023-24 में 36 अरब डॉलर का कपड़ा निर्यात हुआ, जिसमें से 28% (करीब 10 अरब डॉलर) अमेरिका को गया. उच्च टैरिफ से भारतीय कपड़ों की कीमत बढ़ेगी, जिससे उनका बाजार वहां कम हो सकता है जाहिर सी बात है कि इससे उनके निर्यात के आर्डर पर असर पड़ेगा.
भारत से हीरा और रत्न उद्योग 9 अरब डॉलर से अधिक का निर्यात करता है. टैरिफ से इसकी मांग घट सकती है, क्योंकि अमेरिकी उपभोक्ता लागत बढ़ने पर अन्य स्रोतों की ओर रुख कर सकते हैं.
भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों की रफ्तार धीमी पड़ेगी क्योंकि 14 अरब डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात का सामना अब नए टैरिफ से होगा. भारतीय कंपनियों की वृद्धि धीमी पड़ सकती है. भारतीय स्टील और एल्यूमीनियम की मांग पर भी असर पड़ेगा, इसकी वहां काफी डिमांड भी रही है लेकिन अब तस्वीर बदल जाएगी.
सबसे राहत की बात ये है कि भारत का 12.2 अरब डॉलर के दवा निर्यात को टैरिफ से अलग रखा जाएगा तो ये क्षेत्र राहत ले सकता है. ये भारत के लिए सकारात्मक पहलू है.

क्या आईटी को लगेगा झटका
भारत का आईटी क्षेत्र अमेरिकी बाजार पर निर्भर है, बेशक इस पर टैरिफ का असर सीधे सीधे तो नहीं होगा लेकिन टैरिफ का असर जब अमेरिकी उपभोक्ता की जेब पर पड़ने लगेगा, वहां भी चीजें महंगी हो जाएंगी तो इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव आईटी सेक्टर पर पड़ेगा ही.
जीडीपी पर क्या असर पड़ेगा
विशेषज्ञों का अनुमान है कि 25% टैरिफ से भारत की जीडीपी में 0.19% की कमी आ सकती है, जो प्रति परिवार औसतन 2396 रुपये की वार्षिक हानि के बराबर है. हालांकि ये प्रभाव सीमित है, क्योंकि भारत की वैश्विक निर्यात में हिस्सेदारी केवल 2.4% है.
क्या भारत के विदेशी मुद्रा पर असर पडे़गा
बिल्कुल पड़ेगा. टैरिफ के बाद रुपये में कमजोरी देखी गई, जो 85.69 के स्तर तक पहुंच गया. निर्यात में कमी से विदेशी मुद्रा भंडार पर असर पड़ सकता है.
क्या भारत की अर्थव्यवस्था पर असर होगा?
नहीं, भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुत असर नहीं पड़ने वाला. भारत की अर्थव्यवस्था 3.73 ट्रिलियन डॉलर की है और यह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. 2023 में इसकी विकास दर 6.3% थी, जो वैश्विक औसत 2.9% से कहीं अधिक है. भारत की घरेलू मांग मजबूत है, जो अर्थव्यवस्था को 6.5-7.5% की विकास दर पर बनाए रखेगी, लिहाजा उस पर टैरिफ का प्रभाव सीमित होगा.
क्या ये टैरिफ अस्थायी होगा, इसमें करेक्शन हो सकता है
भारत और अमेरिका के बीच 25 अगस्त 2025 को व्यापार वार्ता का अगला दौर होने वाला है. भारत 10% से कम टैरिफ की मांग कर रहा है. अमेरिका अपने कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए भारतीय बाजार में रियायत चाहता है. एक व्यापक समझौता टैरिफ को कम कर सकता है और दोनों देशों के लिए फायदेमंद होगा. भारतीय अधिकारी आशावादी हैं कि सितंबर या अक्टूबर तक एक समझौता हो सकता है, जो टैरिफ को अस्थायी बनाए रख सकता है।
क्या भारत अब नए बाजारों की तलाश करेगा
बिल्कुल भारत को ये करना ही होगा. भारत को यूरोपीय संघ, जापान, और आसियान देशों जैसे वैकल्पिक बाजारों पर ध्यान देना चाहिए. इन क्षेत्रों में भारत के निर्यात को बढ़ाने से अमेरिकी टैरिफ का प्रभाव कम हो सकता है.
क्या इसका असर अमेरिका पर भी होगा
अमेरिकी कंपनियां भी कई कच्चे माल और कंपोनेंट्स का आयात करती हैं. उन पर भी टैरिफ लगने से मैन्युफैक्चरिंग की लागत बढ़ेगी. इससे अमेरिकी उत्पाद भी महंगे होंगे और निर्यात कम हो सकता है. बैंक ऑफ अमेरिका और जेपी मोर्गन जैसे वित्तीय संस्थानों ने चेताया है कि यदि टैरिफ लंबे समय तक रहे तो GDP ग्रोथ घट सकती है. खपत गिर सकती है, जिससे खुदरा और सेवा सेक्टर प्रभावित होंगे. छोटे बिज़नेस पर दबाव बढ़ेगा जो विदेशी सप्लाई चैन पर निर्भर हैं.

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GSLV-F16 की पीठ पर होकर सवार, अंतरिक्ष में पहुंच गया ‘निसार’

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ISRO और NASA ने मिलकर एक ऐतिहासिक मिशन लॉन्च किया है. इस मिशन का नाम है- GSLV-F16/NISAR. मिशन को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन स्पेस सेंटर से शाम 5:40 बजे GSLV-F16 रॉकेट के जरिए लॉन्च किया गया. NISAR को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित कर दिया गया. NISAR धरती की निगरानी का सबसे ताकतवर सिस्टम बनने जा रहा है. ISRO और NASA ने NISAR पर करीब 1.5 बिलियन डॉलर खर्च किए हैं. यह भारतीय एजेंसी का अभी तक का सबसे महंगा मिशन है. NISAR के नाम दुनिया का सबसे महंगा ‘अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट’ होने का रिकॉर्ड भी है.
NISAR (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar) धरती को स्कैन करने वाला अब तक का सबसे एडवांस सैटेलाइट है. इसमें NASA का L-band रडार और ISRO का S-band रडार लगाया गया है. ये दोनों रडार मिलकर दिन-रात, बारिश-धूप में हर मौसम में बहुत हाई-क्वालिटी तस्वीरें भेज पाएंगे. इसका मकसद है – जमीन धंसने, ग्लेशियर के पिघलने, जंगलों के बदलते हालात और समुद्री किनारों पर हो रहे बदलावों पर नजर रखना.
ये ISRO का 102वां मिशन है और पहली बार कोई GSLV रॉकेट किसी रडार-आधारित Earth Observation Satellite को लॉन्च करेगा.

क्या-क्या स्टडी करेगा NISAR?
ISRO के मुताबिक, NISAR सैटेलाइट से जो डेटा मिलेगा, उससे कई बड़े बदलावों की जानकारी मिलेगी, जैसे:
-भूकंप, भूस्खलन और ग्लेशियर पिघलने से जुड़ी जमीन की मूवमेंट
-जंगलों की कटाई-बढ़ोतरी और जैव विविधता पर असर
-समुद्री स्तर बढ़ना और तटों पर होने वाले बदलाव
-हिमालय, अंटार्कटिका और ध्रुवीय इलाकों में बर्फ की हालत
-पहाड़ों का खिसकना, जंगलों में मौसम के साथ बदलाव
-खेती और फसलों की सेहत पर निगरानी
ये सारी जानकारियां वैज्ञानिकों को क्लाइमेट चेंज को समझने, प्राकृतिक आपदाओं की भविष्यवाणी करने और नेचुरल रिसोर्स को मैनेज करने में मदद करेंगी.
कितने साल में बना NISAR
NISAR मिशन को तैयार करने में ISRO और NASA को 8 से 10 साल का वक्त लगा. दोनों एजेंसियों ने मिलकर रडार तकनीक को डिजाइन किया और इसकी टेस्टिंग की. लॉन्च के बाद इसके सभी सिस्टम की जांच की जाएगी, फिर ये पूरी तरह से काम करना शुरू करेगा.
क्यों खास है NISAR
NISAR में दो रडार लगे हैं:
L-band SAR (NASA का) – जो घने जंगलों और जमीन के अंदर तक झांक सकता है. इससे मिट्टी की नमी, जंगलों और ग्लेशियर की स्टडी होती है.
S-band SAR (ISRO का) – जो खेतों, शहरों और समुद्री इलाकों की बारीकी से निगरानी कर सकता है.
इस डुअल रडार सिस्टम की मदद से NISAR हर मौसम में, दिन-रात लगातार डेटा भेज सकेगा. इससे वैज्ञानिक जल्दी-जल्दी आने वाले बदलावों को पकड़ सकेंगे – जैसे भूकंप आने से पहले जमीन का मूवमेंट, बाढ़ के खतरे या जंगलों में हो रहे नुकसान.
GSLV-F16 रॉकेट – तीन स्टेज वाला ताकतवर लॉन्च व्हीकल
इस मिशन को GSLV-F16 रॉकेट से भेजा जाएगा. ये तीन स्टेज वाला रॉकेट है:
पहला स्टेज – सॉलिड फ्यूल से चलता है और शुरुआत में जोरदार थ्रस्ट देता है.
दूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
NISAR हर 6 दिन में पूरी धरती को हाई-रेजोल्यूशन में स्कैन करेगा. पहले ISRO के सैटेलाइट भारत पर ज्यादा फोकस करते थे, लेकिन NISAR का डेटा पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, सरकारें और इंडस्ट्री इस्तेमाल कर सकेंगी.
कैसे होगा इसके डेटा का इस्तेमाल
क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारीदूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
NISAR हर 6 दिन में पूरी धरती को हाई-रेजोल्यूशन में स्कैन करेगा. पहले ISRO के सैटेलाइट भारत पर ज्यादा फोकस करते थे, लेकिन NISAR का डेटा पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, सरकारें और इंडस्ट्री इस्तेमाल कर सकेंगी.
कैसे होगा इसके डेटा का इस्तेमाल
क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारीदूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
NISAR हर 6 दिन में पूरी धरती को हाई-रेजोल्यूशन में स्कैन करेगा. पहले ISRO के सैटेलाइट भारत पर ज्यादा फोकस करते थे, लेकिन NISAR का डेटा पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, सरकारें और इंडस्ट्री इस्तेमाल कर सकेंगी.
कैसे होगा इसके डेटा का इस्तेमाल
क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारीदूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
NISAR हर 6 दिन में पूरी धरती को हाई-रेजोल्यूशन में स्कैन करेगा. पहले ISRO के सैटेलाइट भारत पर ज्यादा फोकस करते थे, लेकिन NISAR का डेटा पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, सरकारें और इंडस्ट्री इस्तेमाल कर सकेंगी.
कैसे होगा इसके डेटा का इस्तेमाल
क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारीदूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
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तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
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पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
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तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
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ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
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ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
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ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
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ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
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क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारीदूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
NISAR हर 6 दिन में पूरी धरती को हाई-रेजोल्यूशन में स्कैन करेगा. पहले ISRO के सैटेलाइट भारत पर ज्यादा फोकस करते थे, लेकिन NISAR का डेटा पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, सरकारें और इंडस्ट्री इस्तेमाल कर सकेंगी.
कैसे होगा इसके डेटा का इस्तेमाल
क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारीदूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
NISAR हर 6 दिन में पूरी धरती को हाई-रेजोल्यूशन में स्कैन करेगा. पहले ISRO के सैटेलाइट भारत पर ज्यादा फोकस करते थे, लेकिन NISAR का डेटा पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, सरकारें और इंडस्ट्री इस्तेमाल कर सकेंगी.
कैसे होगा इसके डेटा का इस्तेमाल
क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारीदूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
NISAR हर 6 दिन में पूरी धरती को हाई-रेजोल्यूशन में स्कैन करेगा. पहले ISRO के सैटेलाइट भारत पर ज्यादा फोकस करते थे, लेकिन NISAR का डेटा पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, सरकारें और इंडस्ट्री इस्तेमाल कर सकेंगी.
कैसे होगा इसके डेटा का इस्तेमाल
क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारीदूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
NISAR हर 6 दिन में पूरी धरती को हाई-रेजोल्यूशन में स्कैन करेगा. पहले ISRO के सैटेलाइट भारत पर ज्यादा फोकस करते थे, लेकिन NISAR का डेटा पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, सरकारें और इंडस्ट्री इस्तेमाल कर सकेंगी.
कैसे होगा इसके डेटा का इस्तेमाल
क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारीदूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
NISAR हर 6 दिन में पूरी धरती को हाई-रेजोल्यूशन में स्कैन करेगा. पहले ISRO के सैटेलाइट भारत पर ज्यादा फोकस करते थे, लेकिन NISAR का डेटा पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, सरकारें और इंडस्ट्री इस्तेमाल कर सकेंगी.
कैसे होगा इसके डेटा का इस्तेमाल
क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारीदूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
NISAR हर 6 दिन में पूरी धरती को हाई-रेजोल्यूशन में स्कैन करेगा. पहले ISRO के सैटेलाइट भारत पर ज्यादा फोकस करते थे, लेकिन NISAR का डेटा पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, सरकारें और इंडस्ट्री इस्तेमाल कर सकेंगी.
कैसे होगा इसके डेटा का इस्तेमाल
क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारीदूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
NISAR हर 6 दिन में पूरी धरती को हाई-रेजोल्यूशन में स्कैन करेगा. पहले ISRO के सैटेलाइट भारत पर ज्यादा फोकस करते थे, लेकिन NISAR का डेटा पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, सरकारें और इंडस्ट्री इस्तेमाल कर सकेंगी.
कैसे होगा इसके डेटा का इस्तेमाल
क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारीदूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
NISAR हर 6 दिन में पूरी धरती को हाई-रेजोल्यूशन में स्कैन करेगा. पहले ISRO के सैटेलाइट भारत पर ज्यादा फोकस करते थे, लेकिन NISAR का डेटा पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, सरकारें और इंडस्ट्री इस्तेमाल कर सकेंगी.
कैसे होगा इसके डेटा का इस्तेमाल
क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारीदूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
NISAR हर 6 दिन में पूरी धरती को हाई-रेजोल्यूशन में स्कैन करेगा. पहले ISRO के सैटेलाइट भारत पर ज्यादा फोकस करते थे, लेकिन NISAR का डेटा पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, सरकारें और इंडस्ट्री इस्तेमाल कर सकेंगी.
कैसे होगा इसके डेटा का इस्तेमाल
क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारीदूसरा स्टेज – लिक्विड फ्यूल से चलता है जो रॉकेट को ऊपर तक पहुंचाता है.
तीसरा स्टेज (Cryogenic) – लिक्विड हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से चलता है. ये इंडिया में बना एडवांस इंजन है जो बहुत ठंडे तापमान पर काम करता है.
ये रॉकेट NISAR को 740 किलोमीटर ऊपर पोलर ऑर्बिट में 19 मिनट के अंदर पहुंचा देगा.
पूरी दुनिया को मिलेगा फायदा
NISAR हर 6 दिन में पूरी धरती को हाई-रेजोल्यूशन में स्कैन करेगा. पहले ISRO के सैटेलाइट भारत पर ज्यादा फोकस करते थे, लेकिन NISAR का डेटा पूरी दुनिया के वैज्ञानिक, सरकारें और इंडस्ट्री इस्तेमाल कर सकेंगी.
कैसे होगा इसके डेटा का इस्तेमाल
क्लाइमेट चेंज – बर्फ के पिघलने, जंगलों के कटने और कार्बन स्टोरेज की स्टडी
प्राकृतिक आपदा – भूस्खलन, भूकंप और ज्वालामुखी के खतरे की पहचान
शहरी प्लानिंग – जमीन धंसने और इन्फ्रास्ट्रक्चर की निगरानी
खेती और फूड सिक्योरिटी – फसलों की हालत और मिट्टी की नमी की जानकारी

भारत और अमेरिका की साझेदारी से बना ये मिशन ना सिर्फ साइंस को नई दिशा देगा, बल्कि दुनिया को प्राकृतिक आपदाओं और क्लाइमेट चेंज से लड़ने में भी तैयार करेगा.I]K,

रीलबाजी की सनक, सामने नदी, चट्टान पर चढ़कर लड़कों ने किया खतरनाक स्टंट

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छत्तीसगढ़ के कई हिस्सों में मूसलधार बारिश हो रही है. इसकी वजह से कई नदियां उफान पर हैं. बांधों से भारी मात्रा में पानी छोड़ा जा रहा है. इस बीच खैरागढ़ जिले से एक खतरनाक और चौंकाने वाला वीडियो सामने आया है. वायरल हो रहे इस वीडियो में 5 युवक तेज बहाव वाले प्रधानपाठ बैराज की एक चट्टान पर खतरनाक तरीके से खड़े होकर स्टंट करते नजर आ रहे है. ये सभी युवक मोबाइल कैमरों के सामने फोटो और वीडियो बनाते नजर आए. अब उनका ये वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है.
वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि डैम से पानी का बहाव बेहद तेज है. चट्टानें फिसलन भरी है. पानी ठीक उनके नीचे उफनता हुआ बह रहा है. एक भी गलत कदम उन्हें सीधे मौत की ओर ले जा सकता था, लेकिन युवकों पर इसका कोई असर नहीं दिखाई देता.

खैरागढ़ का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल
स्थानीय लोगों के मुताबिक यह वीडियो खैरागढ़ जिले के प्रधानपाठ बैराज का है. हैरानी की बात यह है कि वहां न तो कोई सुरक्षा गार्ड तैनात है और न ही युवकों को रोकने वाला कोई जिम्मेदार अधिकारी मौजूद दिखा. प्रधानपाठ बैराज की स्थिति खुद ही सवालों के घेरे में है. सालों से इसका एक गेट टूटा हुआ पड़ा है, जिससे वाटर फ्लो पर कंट्रोल नहीं हो पाता. वहीं, निर्माण के दौरान बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लग चुके हैं. विभागीय अधिकारियों की लापरवाही का आलम यह है कि नियमित निगरानी तक नहीं की जाती.
यह पूरी घटना प्रशासनिक लापरवाही और सोशल मीडिया की सनक का खतरनाक मिलाजुला उदाहरण है. न सिर्फ युवाओं ने अपनी जान जोखिम में डाली, बल्कि यह भी दिखा दिया कि सुरक्षा इंतजाम सिर्फ नाम मात्र के हैं. वायरल वीडियो को गंभीरता से लेते हुए प्रशासन को फौरन कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि इस तरह की घटनाएं भविष्य में न दोहराई जाएं. बारिश की तबाही तो कुदरती है, लेकिन लापरवाही से होने वाली मौतें पूरी तरह टाली जा सकती हैं, अगर समय रहते चेत लिया जाए तो.€

रीलबाजी की सनक, सामने नदी, चट्टान पर चढ़कर लड़कों ने किया खतरनाक स्टंट

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छत्तीसगढ़ के कई हिस्सों में मूसलधार बारिश हो रही है. इसकी वजह से कई नदियां उफान पर हैं. बांधों से भारी मात्रा में पानी छोड़ा जा रहा है. इस बीच खैरागढ़ जिले से एक खतरनाक और चौंकाने वाला वीडियो सामने आया है. वायरल हो रहे इस वीडियो में 5 युवक तेज बहाव वाले प्रधानपाठ बैराज की एक चट्टान पर खतरनाक तरीके से खड़े होकर स्टंट करते नजर आ रहे है. ये सभी युवक मोबाइल कैमरों के सामने फोटो और वीडियो बनाते नजर आए. अब उनका ये वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है.
वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि डैम से पानी का बहाव बेहद तेज है. चट्टानें फिसलन भरी है. पानी ठीक उनके नीचे उफनता हुआ बह रहा है. एक भी गलत कदम उन्हें सीधे मौत की ओर ले जा सकता था, लेकिन युवकों पर इसका कोई असर नहीं दिखाई देता.

खैरागढ़ का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल
स्थानीय लोगों के मुताबिक यह वीडियो खैरागढ़ जिले के प्रधानपाठ बैराज का है. हैरानी की बात यह है कि वहां न तो कोई सुरक्षा गार्ड तैनात है और न ही युवकों को रोकने वाला कोई जिम्मेदार अधिकारी मौजूद दिखा. प्रधानपाठ बैराज की स्थिति खुद ही सवालों के घेरे में है. सालों से इसका एक गेट टूटा हुआ पड़ा है, जिससे वाटर फ्लो पर कंट्रोल नहीं हो पाता. वहीं, निर्माण के दौरान बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लग चुके हैं. विभागीय अधिकारियों की लापरवाही का आलम यह है कि नियमित निगरानी तक नहीं की जाती.
यह पूरी घटना प्रशासनिक लापरवाही और सोशल मीडिया की सनक का खतरनाक मिलाजुला उदाहरण है. न सिर्फ युवाओं ने अपनी जान जोखिम में डाली, बल्कि यह भी दिखा दिया कि सुरक्षा इंतजाम सिर्फ नाम मात्र के हैं. वायरल वीडियो को गंभीरता से लेते हुए प्रशासन को फौरन कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि इस तरह की घटनाएं भविष्य में न दोहराई जाएं. बारिश की तबाही तो कुदरती है, लेकिन लापरवाही से होने वाली मौतें पूरी तरह टाली जा सकती हैं, अगर समय रहते चेत लिया जाए तो.€

छत्तीसगढ़ का एक लाख छिद्रों वाला शिवलिंग? पाताल तक जाता है भक्तों का चढ़ाया जल

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छत्तीसगढ़ की काशी कहे जाने वाले लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर में सावन मास की श्रद्धा का सैलाब उमड़ रहा है. खरौद में स्थित यह प्राचीन शिवधाम अपनी रहस्यमयी शिवलिंग और रामायणकालीन कथा के कारण भक्तों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है. कहा जाता है कि भगवान राम और लक्ष्मण ने खर और दूषण के वध के बाद ब्रह्म हत्या दोष से मुक्ति पाने महादेव की स्थापना की थी

रायपुर से महज 136 किमी दूर जांजगीर-चांपा जिले के खरौद में स्थित यह मंदिर रामायणकालीन कथा से जुड़ा है. मान्यता है कि भगवान राम और लक्ष्मण ने खर-दूषण वध के बाद इसी स्थान पर शिवलिंग की स्थापना कर ब्रह्म हत्या दोष का निवारण किया था. महाशिवरात्रि और सावन में यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है.
इस शिवलिंग में एक लाख छोटे-छोटे छिद्र हैं, जिससे यह ‘लक्षलिंग’ या ‘लखेश्वर’ कहलाता है. कहा जाता है कि इसमें एक छेद ऐसा भी है, जो पाताल लोक तक जाता है. भक्तों का विश्वास है कि इसमें अर्पित जल पाताल में समा जाता है, जबकि एक छेद हमेशा जल से भरा रहता है, जिसे ‘अक्षय कुण्ड’ कहा जाता है.
मंदिर में मनोकामना पूर्ण करने की मान्यता पर श्रद्धालु सफेद कपड़े के थैले में भरकर एक लाख चावल अर्पित करते हैं. इसे ‘लक्ष्य’ या ‘लख चावल’ कहा जाता है. यह परंपरा आज भी जीवित है और सावन में भक्त विशेष रूप से यह भेंट चढ़ाते हैं.
वन गमन परिपथ में इस मंदिर का विशेष स्थान है. सावन के हर सोमवार और महाशिवरात्रि पर यहां विशाल मेला और जलाभिषेक के लिए भक्तों का जनसैलाब उमड़ता है. साथ ही श्रृंगार भी भव्य रूप से किया जाता है.

माना जाता है कि खर और दूषण का वध करने के कारण इस स्थान का नाम ‘खरौद’ पड़ा. यह स्थल रायपुर से 136 किमी और शिवरीनारायण से मात्र 3 किमी की दूरी पर स्थित है. लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत में भी अमूल्य स्थान रखता है.

छत्तीसगढ़ का एक लाख छिद्रों वाला शिवलिंग? पाताल तक जाता है भक्तों का चढ़ाया जल

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छत्तीसगढ़ की काशी कहे जाने वाले लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर में सावन मास की श्रद्धा का सैलाब उमड़ रहा है. खरौद में स्थित यह प्राचीन शिवधाम अपनी रहस्यमयी शिवलिंग और रामायणकालीन कथा के कारण भक्तों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है. कहा जाता है कि भगवान राम और लक्ष्मण ने खर और दूषण के वध के बाद ब्रह्म हत्या दोष से मुक्ति पाने महादेव की स्थापना की थी

रायपुर से महज 136 किमी दूर जांजगीर-चांपा जिले के खरौद में स्थित यह मंदिर रामायणकालीन कथा से जुड़ा है. मान्यता है कि भगवान राम और लक्ष्मण ने खर-दूषण वध के बाद इसी स्थान पर शिवलिंग की स्थापना कर ब्रह्म हत्या दोष का निवारण किया था. महाशिवरात्रि और सावन में यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है.
इस शिवलिंग में एक लाख छोटे-छोटे छिद्र हैं, जिससे यह ‘लक्षलिंग’ या ‘लखेश्वर’ कहलाता है. कहा जाता है कि इसमें एक छेद ऐसा भी है, जो पाताल लोक तक जाता है. भक्तों का विश्वास है कि इसमें अर्पित जल पाताल में समा जाता है, जबकि एक छेद हमेशा जल से भरा रहता है, जिसे ‘अक्षय कुण्ड’ कहा जाता है.
मंदिर में मनोकामना पूर्ण करने की मान्यता पर श्रद्धालु सफेद कपड़े के थैले में भरकर एक लाख चावल अर्पित करते हैं. इसे ‘लक्ष्य’ या ‘लख चावल’ कहा जाता है. यह परंपरा आज भी जीवित है और सावन में भक्त विशेष रूप से यह भेंट चढ़ाते हैं.
वन गमन परिपथ में इस मंदिर का विशेष स्थान है. सावन के हर सोमवार और महाशिवरात्रि पर यहां विशाल मेला और जलाभिषेक के लिए भक्तों का जनसैलाब उमड़ता है. साथ ही श्रृंगार भी भव्य रूप से किया जाता है.

माना जाता है कि खर और दूषण का वध करने के कारण इस स्थान का नाम ‘खरौद’ पड़ा. यह स्थल रायपुर से 136 किमी और शिवरीनारायण से मात्र 3 किमी की दूरी पर स्थित है. लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत में भी अमूल्य स्थान रखता है.

CGPSC-2021 भर्ती विवाद: CBI जांच में रहे बेदाग, 60 दिन में मिलेगी नियुक्ति, बिलासपुर हाईकोर्ट ने कहा- चार्जशीट में नाम नहीं तो…..

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सीजीपीएससी 2021 भर्ती विवाद में हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने साफ कहा है कि जिन चयनित अभ्यर्थियों के खिलाफ CBI जांच में कोई तथ्य सामने नहीं आए हैं और जिनका नाम चार्जशीट में शामिल नहीं हैं,
उन्हें 10 मई 2024 की वैधता अवधि के भीतर यानी 60 दिन के भीतर नियुक्ति पत्र दिए जाएं. कोर्ट ने ये भी कहा कि सिर्फ कुछ अभ्यर्थियों पर आरोप हैं, इसलिए पूरी चयन सूची को गलत मानकर सभी की नियुक्ति रोकना अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है.
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियुक्तियां CBI जांच और भविष्य में सामने आने वाले तथ्यों के अधीन रहेंगी. अगर बाद में कोई गड़बड़ी सामने आती है तो सरकार सेवा समाप्त कर सकती है.
जानें क्या है पूरा मामला
दरअसल, 26 नवंबर 2021 को सीजी पीएससी ने 171 पदों के लिए विज्ञापन जारी किया था. इनमें डिप्टी कलेक्टर, डीएसपी, लेखाधिकारी, जेल अधीक्षक और नायब तहसीलदार समेत 20 सेवाओं में भर्ती होनी थी. 11 मई 2023 को परीक्षा परिणाम घोषित हुए, लेकिन तभी सामने आए धांधली के आरोप. आरोप लगे कि पीएससी के अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों के रिश्तेदारों का चयन हुआ. मामला हाईकोर्ट पहुंचा और राज्य सरकार ने जांच सीबीआई को सौंप दी. CBI जांच शुरू होते ही नियुक्ति आदेश रोक दिए गए. इससे कई ऐसे अभ्यर्थी भी नियुक्ति से वंचित हो गए, जिन पर कोई आरोप नहीं था. इन अभ्यर्थियों ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी.
दलील दी गई कि हम योग्यता से चयनित हुए हैं और हमारे खिलाफ कोई FIR भी नहीं है. राज्य सरकार ने कोर्ट में तर्क दिया कि चयन प्रक्रिया में अनियमितता की आशंका है, लेकिन कोर्ट ने दो टूक कहा कि बेदाग अभ्यर्थियों के भविष्य से नहीं खेला जा सकता. वहीं PSC ने भी कहा कि हमारा काम सिर्फ चयन सूची जारी करना था, नियुक्ति सरकार की जिम्मेदारी है. PSC भर्ती विवाद पर यह फैसला ना केवल निर्दोष युवाओं के लिए राहत लेकर आया है बल्कि यह भी स्पष्ट कर गया है कि न्याय की बुनियाद पर ही नियुक्तियों का आधार टिका होना चाहिए.