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गर्मी में बहुत ज्यादा ठंडा पानी पीना सेहत के लिए सही है या नहीं? यहां जानें डॉक्टर्स की सलाह…

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गर्मी में बाहर से घर लौटते ही फ्रिज का बर्फ जैसा ठंडा पानी पीना ज्यादातर लोगों की आदत होती है. तेज धूप और पसीने के बाद ठंडा पानी तुरंत राहत जरूर देता है, लेकिन डॉक्टर्स का कहना है कि बहुत ज्यादा ठंडा पानी शरीर के लिए हमेशा फायदेमंद नहीं होता. खासकर जब शरीर तेज गर्मी से पहले ही गर्म हो चुका हो, तब अचानक बर्फ जैसा पानी पीना कई लोगों में असहजता और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा कर सकता है.

क्यों अचानक ठंडा पानी नहीं पीना चाहिए?

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के मुताबिक, जब हम धूप से आते हैं तो शरीर खुद को ठंडा करने की प्रक्रिया में लगा होता है. इस दौरान ब्लड सर्कुलेशन तेज होता है और शरीर का तापमान सामान्य करने की कोशिश चल रही होती है. ऐसे समय में अचानक बहुत ठंडा पानी पीने से शरीर को टेम्परेचर शॉक लग सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, इससे ब्लड वेसल्स अचानक सिकुड़ सकते हैं, जिससे सिरदर्द, चक्कर या असहज महसूस होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

क्या हो सकती है दिक्कत?

डॉक्टर्स बताते हैं कि ठंडा पानी मुंह और गले को तुरंत ठंडक पहुंचाता है, इसलिए लोग इसे राहत मानते हैं. लेकिन अंदरूनी तौर पर शरीर को धीरे-धीरे ठंडा होने की जरूरत होती है. बहुत ज्यादा ठंडा पानी डाइजेशन सिस्टम की गति को कुछ समय के लिए धीमा कर सकता है. मेडिकल एक्सपर्ट्स और पारंपरिक चिकित्सा एक्सपर्ट का कहना है कि इससे डाइजेस्टिव एंजाइम्स की गतिविधि कम हो सकती है और पेट को भोजन पचाने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ सकती है. कुछ लोगों में पेट फूलना, अपच और पेट दर्द जैसी शिकायतें भी देखी जाती हैं.

पसीना आने के तुरंत बाद चिल्ड पानी पीने से क्या होती है दिक्कत?

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पसीना आने के तुरंत बाद बर्फ जैसा पानी पीने से गले में जलन हो सकती है. इससे गले में खराश, बलगम बढ़ना, खांसी और गले में तकलीफ जैसी दिक्कतें हो सकती हैं. जिन लोगों को ठंडी चीजों से जल्दी परेशानी होती है, उनमें यह समस्या ज्यादा देखी जाती है.

आपको क्या करना चाहिए?

एक्सपर्ट के अनुसार, कुछ लोगों में बहुत ठंडा पानी ब्रेन फ्रीज यानी अचानक सिरदर्द भी ट्रिगर कर सकता है. ऐसा तब होता है जब ठंडा पानी मुंह और गले की संवेदनशील नसों पर अचानक असर डालता है. वहीं जिन लोगों को पहले से हार्ट की समस्या है, उनके लिए भी बर्फ जैसा ठंडा पानी सही नहीं माना जाता. एक्सपर्ट्स के मुताबिक, अचानक तापमान बदलने से वेगस नर्व प्रभावित हो सकती है, जिससे कुछ समय के लिए हार्ट रेट या ब्लड प्रेशर पर असर पड़ सकता है. डॉक्टर्स सलाह देते हैं कि धूप से आने के बाद तुरंत बहुत ठंडा पानी पीने के बजाय कुछ मिनट आराम करें और फिर सामान्य तापमान या हल्का ठंडा पानी धीरे-धीरे पिएं. मिट्टी के घड़े का पानी, नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी और ओआरएस जैसे विकल्प शरीर को बेहतर तरीके से हाइड्रेट करने में मदद करते हैं.

Bihar Vidhan Parishad Chunav: विधान परिषद की 9 सीटों पर चुनाव का ऐलान…

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11 जून तक उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकेंगे जबकि 18 जून को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक मतदान कराया जाएगा. 20 जून 2026 तक पूरी चुनाव प्रक्रिया समाप्त कर ली जाएगी.

बिहार विधान परिषद की 9 सीटों पर चुनाव और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की खाली हुई एक सीट पर उपचुनाव होगा. इसके लिए आज (मंगलवार) चुनाव आयोग की ओर से तारीखों का ऐलान कर दिया गया है. अधिसूचना एक जून 2026 को जारी होगी. नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 8 जून तय की गई है. 9 जून को नामांकन पत्रों की जांच की जाएगी.

चुनाव आयोग के अनुसार, 11 जून तक उम्मीदवार अपना नाम वापस ले सकेंगे जबकि 18 जून को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक मतदान कराया जाएगा. मतगणना 18 जून को शाम 5 बजे से शुरू होगी. 20 जून 2026 तक पूरी चुनाव प्रक्रिया समाप्त कर ली जाएगी.

जिन 10 सीट पर चुनाव उनमें से पांच जेडीयू के पास

बता दें कि 28 जून को विधान परिषद की 9 सीटें खाली हो रही हैं. जिन 10 सीटों पर चुनाव होना है, उनमें फिलहाल पांच सीटें जेडीयू के पास हैं. बीजेपी के पास 2 और आरजेडी के पास से दो सीटें हैं जबकि एक सीट कांग्रेस के पास है.

कौनकौन सी खाली हो रहीं 9 सीटें?

28 जून को बिहार में 9 नेताओं का कार्यकाल पूरा हो रहा है, जिसके चलते ये 9 सीटें खाली हो रही हैं. इनमें गुलाम गौस, कुमुद वर्मा, मो. फारुख, भगवान सिंह कुशवाहा, भीष्म साहनी, संजय मयूख, समीर कुमार सिंह, सम्राट चौधरी और सुनील कुमार सिंह का कार्याकल पूरा हो रहा है. दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा सांसद हो गए हैं तो उनकी सीट पर उपचुनाव होगा.

एनडीए को 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत मिली थी. विधानसभा के मौजूदा संख्याबल के आधार पर देखा जाए तो विधान परिषद की जिन सीटों पर चुनाव होना है उसके नतीजे काफी हद तक तय माने जा रहे हैं. अब देखने वाली बात होगी कि उम्मीदवारों को लेकर क्या तस्वीर बनती है.

पेट्रोल में 30 फीसदी तक मिलाया जाएगा एथेनॉल, जानिए क्या है सरकार का पूरा प्लान…

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इस पूरे बदलाव के लिए भारत की संस्था BIS ने इन नए फ्यूल मिक्स के लिए तकनीकी नियम और मानक तय कर दिए हैं. आइए इससे जुड़ी सारी डिटेल्स जान लेते हैं.

क्या है सरकार का पूरा प्लान?

भारत सरकार लगातार पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है. ऐसा इसलिए ताकि फ्यूल की लागत कम हो जाए, विदेशी तेल पर निर्भरता घटे और पर्यावरण को भी फायदा मिले. अभी तक भारत में ज्यादातर जगहों पर E20 पेट्रोल का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन अब सरकार ने इससे आगे बढ़ने की योजना तैयार कर ली है.

सरकार ने अब पेट्रोल के लिए नए स्टैंडर्ड तय कर दिए हैं जिनमें E22, E25, E27 और E30 जैसे फ्यूल शामिल हैं. इन नामों का मतलब बहुत सरल है कि पेट्रोल में कितने प्रतिशत एथेनॉल मिलाया गया है. उदाहरण के लिए E22 में 22% एथेनॉल और 78% पेट्रोल होगा, जबकि E30 में 30% एथेनॉल और 70% पेट्रोल होगा. यानी धीरे-धीरे पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ाई जाएगी.

भारत की इस संस्था ने तय किए मानक

इस पूरे बदलाव के लिए भारत की संस्था BIS (Bureau of Indian Standards) ने इन नए फ्यूल मिक्स के लिए तकनीकी नियम और मानक तय कर दिए हैं. इसका फायदा यह होगा कि आने वाले समय में तेल कंपनियों और कार कंपनियों को पहले से पता रहेगा कि किस तरह के ईंधन का इस्तेमाल बढ़ने वाला है और वे उसके हिसाब से तैयारी कर सकेंगी.

आपके लिए यह समझना जरूरी है कि अभी तुरंत E22 या E30 पेट्रोल बाजार में नहीं आ रहा है. फिलहाल देश में मुख्यतौर पर E20 पेट्रोल ही मौजूद है और नए लेवल केवल भविष्य की योजना यानी एक रोडमैप की तरह हैं. सरकार ने अभी सिर्फ दिशा तय की है कि आने वाले सालों में एथेनॉल की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाई जाएगी.

क्या हैं बड़े कारण?

इस कदम के पीछे कई बड़े कारण हैं. सबसे पहला कारण यह है कि भारत बहुत ज्यादा कच्चा तेल बाहर से खरीदता है, जिससे देश पर आर्थिक बोझ पड़ता है. एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ने से यह निर्भरता कम हो सकती है. दूसरा बड़ा कारण किसानों की आमदनी बढ़ाना है क्योंकि एथेनॉल गन्ना और मक्का जैसी फसलों से बनाया जाता है, जिससे कृषि क्षेत्र को सीधा फायदा मिलता है. इसके अलावा इसे पेट्रोल की तुलना में थोड़ा ज्यादा पर्यावरण के अनुकूल भी माना जाता है, जिससे प्रदूषण कम करने में मदद मिल सकती है.

इस बदलाव का असर गाड़ियों पर भी पड़ सकता है. पुरानी गाड़ियां सीमित एथेनॉल मिश्रण के हिसाब से बनी होती हैं, इसलिए ज्यादा एथेनॉल वाले फ्यूल से उनकी परफॉर्मेंस या माइलेज पर असर पड़ सकता है. ऐसे में आने वाले समय में कार कंपनियों को ऐसे इंजन बनाने होंगे जो ज्यादा एथेनॉल वाले पेट्रोल के साथ बेहतर तरीके से काम कर सकें.

इन राज्यों में 100 रुपए से कम में बिक रहा पेट्रोल. जानिए टैक्स….

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Low Petrol Price: अमेरिका-ईरान तनाव के बीच देश में पेट्रोल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और कई राज्यों में दाम 100 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच चुके है. जानिए कहा मिल रहा है सबसे सस्ता तेल.

अमेरिका ईरान के बीच जंग का असर पूरी दुनिया में देखा जा सकता है. इस जंग का सबसे ज्यादा असर सीएनजी, एलपीजी, पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ा है. देश में पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी गाड़ी की रफ्तार से भी तेज आगे बढ़ रही है. हाल यह है कि बीते 8 दिनों में तीसरी बार पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है.

गौरतलब है कि, 15 मई को पेट्रोल में तीन-तीन रुपये प्रति लीटर, 19 मई को 90 पैसे प्रति लीटर और 23 मई को पेट्रोल में 87 पैसे की बढ़ोतरी की गई थी. वर्तमान में ज्यादातर राज्यों में पेट्रोल 100 रूपये प्रति लीटर से ज्यादा पहुंच चुका है. बावजूद अरुणाचल प्रदेश और अंडमान एंड निकोबार में अभी भी पेट्रोल की कीमत 100 रुपये से कम है.

ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, सबसे ज्यादा पेट्रोल की कीमत आंध्र प्रदेश में दर्ज की गई है, जहां पेट्रोल 117.88 प्रति लीटर तक पहुंच गया है. बावजूद इसके उलट सबसे कम कीमत अरुणाचल प्रदेश में 97.70 प्रति लीटर और अंडमान एंड निकोबार में 88.66 प्रति लीटर दर्ज की गई है. कम टैक्स रेट की वजह से यहां लोगों को बाकी राज्यों के मुकाबले पेट्रोल दरों पर छूट है. जो देश में ईंधन कीमतों की असमानता पर रोशनी डालता है.

कीमतों में क्यों होता है फर्क ?

दरअसल, पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी की मुख्य वजह राज्यों की तरफ से लगाया जाने वाला टैक्स है. जिससे लॉजिस्टिक और डीलर कमीशन पर असर पड़ता है. डबल तरीके से टैक्स वसूले जाने के बाद पेट्रोल की कीमतों बढ़ोतरी होगी ही. ऐसे में यह सिलसिला आगे भी बना रहा तो देश में पेट्रोल और महंगा हो जाएगा.

राज्यों में 100 रुपये प्रति लीटर से ज्यादा दाम 

एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, जहां सबसे ज्यादा पेट्रोल दर बढ़ोतरी हुई है, वह राज्य आंध्र प्रदेश है. इसके साथ तेलंगाना, केरल, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में पेट्रोल के दाम 100 रूपये प्रति लीटर के भी पार हो चुकें है. साथ ही देश में ईंधन कीमतों की गैर बराबरी को दिखाता है.

एक्सपर्ट के अनुसार, फरवरी के आखिर से अब तक दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतों में 50 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है. इसकी वजह पश्चिम एशिया में तनाव और होर्मुज स्ट्रेट से सप्लाई पर बैन होने की आशंका है.

Karnataka Congress Crisis: कर्नाटक में सिद्दारमैया की जगह डीके शिवकुमार को सीएम बनाने की चर्चा…

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: कर्नाटक में सिद्दारमैया की जगह डीके शिवकुमार को सीएम बनाने की चर्चा जोरों पर है. इसको लेकर दिल्ली में कांग्रेस हाईकमान की अहम बैठक चल रही है. लेकिन, इस पूरे संकट में रणदीप सिंह सुरजेवाला की अग्नि परीक्षा दाव पर है. वह सिद्दारमैया और शिवकुमार दोनों गुटों के बीच संतुलन की बड़ी जिम्मेदारी उठा रहे हैं.

कर्नाटक कांग्रेस एक बार फिर सत्ता से ज्यादा अंदरूनी सियासत को लेकर चर्चा में है. राज्य में मुख्यमंत्री बदलने की अटकलों के बीच पार्टी नेतृत्व पर दबाव बढ़ता जा रहा है. चर्चा है कि कांग्रेस हाईकमान अब सिद्दारमैया की जगह डीके शिवकुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने की तैयारी कर रहा है. इसी मुद्दे पर दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व के साथ अहम बैठक चल रही है, जिसमें दोनों दिग्गज नेता मौजूद हैं. लेकिन इस पूरी कवायद के केंद्र में एक और चेहरा है. वो हैं रणदीप सिंह सुरजेवावला.

कर्नाटक कांग्रेस के प्रभारी के तौर पर सुरजेवाला पिछले कई महीनों से सिद्दारमैया और डीके शिवकुमार गुट के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं. अब जबकि नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा तेज है, उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सत्ता परिवर्तन हो भी जाए तो पार्टी टूटे नहीं और सरकार स्थिर बनी रहे.

दरअसल, 2023 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद ही मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान सामने आ गई थी. सिद्दारमैया और डीके शिवकुमार दोनों ही मुख्यमंत्री बनना चाहते थे. आखिरकार हाईकमान ने समझौते का रास्ता निकाला और सिद्दारमैया को मुख्यमंत्री, जबकि डीके शिवकुमार को डिप्टी सीएम बनाया गया. उसी समय यह चर्चा भी चली थी कि ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला लागू हो सकता है, हालांकि पार्टी ने कभी आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की.

अब सरकार के कार्यकाल का आधा से अधिक समय पूरा हो गया है तो एक बार फिर सत्ता परिवर्तन की चर्चा ने जोर पकड़ लिया है. डीके शिवकुमार समर्थक खुलकर यह दावा कर रहे हैं कि अब वादा निभाने का समय आ गया है. दूसरी तरफ सिद्दारमैया खेमे का मानना है कि उनकी लोकप्रियता और प्रशासनिक पकड़ अभी भी कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा आधार है. ऐसे में उन्हें हटाना राजनीतिक जोखिम साबित हो सकता है.

यहीं से रणदीप सुरजेवाला की असली परीक्षा शुरू होती है. अगर वह दोनों गुटों को संतुष्ट रखते हुए नेतृत्व परिवर्तन कराने में सफल हो जाते हैं, तो यह उनकी बड़ी राजनीतिक उपलब्धि मानी जाएगी. इससे यह संदेश भी जाएगा कि कांग्रेस हाईकमान अब भी राज्यों में संगठन और सत्ता दोनों पर नियंत्रण बनाए रखने में सक्षम है.

लेकिन अगर मामला बिगड़ता है, तो इसके दूरगामी असर हो सकते हैं. सिद्दारमैया केवल एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि कर्नाटक में कांग्रेस का सबसे बड़ा जनाधार रखने वाले नेता माने जाते हैं. विशेष रूप से ओबीसी, अल्पसंख्यक और ग्रामीण वोट बैंक पर उनकी मजबूत पकड़ है. अगर उन्हें अपमानजनक तरीके से हटाया गया या उनकी सहमति के बिना फैसला लिया गया, तो पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ सकता है.

दूसरी तरफ डीके शिवकुमार भी कांग्रेस के लिए बेहद अहम हैं. संगठन को मजबूत करने, संसाधन जुटाने और चुनावी रणनीति तैयार करने में उनकी भूमिका निर्णायक रही है. कांग्रेस की 2023 की जीत में उनकी मेहनत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. ऐसे में अगर उन्हें फिर इंतजार करने को कहा गया, तो उनके समर्थकों में नाराजगी बढ़ना तय माना जा रहा है. कांग्रेस की सबसे बड़ी चिंता यह है कि कहीं यह नेतृत्व परिवर्तन राजस्थान जैसी स्थिति न पैदा कर दे, जहां सत्ता और संगठन की लड़ाई लंबे समय तक पार्टी को नुकसान पहुंचाती रही. पार्टी हाईकमान इस बार कोई खुला टकराव नहीं चाहता. इसलिए सुरजेवाला लगातार दोनों नेताओं से संवाद बनाए हुए हैं.

असल चुनौती केवल मुख्यमंत्री बदलने की नहीं, बल्कि सत्ता संतुलन बनाए रखने की है. कांग्रेस जानती है कि कर्नाटक फिलहाल दक्षिण भारत में उसका सबसे मजबूत राज्य है. अगर यहां भी गुटबाजी खुलकर सामने आई, तो इसका असर सिर्फ राज्य तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी पार्टी की छवि प्रभावित होगी. इसलिए दिल्ली में चल रही बैठकों को केवल नेतृत्व परिवर्तन की कवायद के तौर पर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे कांग्रेस की राजनीतिक प्रबंधन क्षमता की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है. आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि रणदीप सुरजेवाला इस संकट को सुलझाने में सफल होते हैं या फिर कर्नाटक कांग्रेस एक नए शक्ति संघर्ष की ओर बढ़ती है.

अमित शाह ने ब‍िछाया चक्रव्यूह, महारथी भी तय, अब एक-एक घुसपैठिया….

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बंगाल जीतने के बाद सरकार अब घुसपैठ‍ियों को बाहर न‍िकालने के ल‍िए चक्रव्‍यूह रच चुकी है. गृहमंत्री अमित शाह ने खुद इसका ऐलान क‍िया. उन्‍होंने बताया क‍ि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ज‍िस हाई पावर कमेटी का ऐलान क‍िया था, उसका गठन कर द‍िया गया है. अब एक्‍शन तेज होगा.

जो लोग भारत की सीमाओं में चोरी-छिपे घुसकर, यहां का राशन खाकर और फर्जी कागज बनवाकर इस देश की डेमोग्राफी बदलने का सपना देख रहे थे, उनकी उल्टी गिनती अब शुरू हो चुकी है. मोदी सरकार ने देश के भीतर छिपे इस साइलेंट टाइम बम को डिफ्यूज करने के लिए अब तक का सबसे बड़ा और कड़ा चक्रव्यूह रच दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 15 अगस्त को लाल किले से जिस महा-मिशन का संकल्प लिया था, आज गृह मंत्री अमित शाह ने उस पर मुहर लगाते हुए ‘हाई-लेवल कमेटी ऑन डेमोग्राफिक चेंज’ के गठन का एलान कर दिया है. खुद गृहमंत्री अमित शाह ने इसका ऐलान क‍िया. साफ है क‍ि हिंदुस्तान की छाती पर अवैध रूप से पल रहे एक-एक घुसपैठिए को चुन-चुनकर चिह्नित किया जाएगा और देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों को सीधा रास्ता दिखाया जाएगा.

गृहमंत्री अमित शाह ने बताया क‍ि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से जिस हाई-लेवल कमेटी ऑन डेमोग्राफिक चेंज की घोषणा की थी, सरकार ने अब उस हाई-पावर कमेटी का आधिकारिक गठन कर लिया है. यह कमेटी सिर्फ कागजी कार्रवाई के लिए नहीं बनी है, बल्कि इसका सीधा मकसद देश की सीमाओं में सेंध लगाकर घुसे अवैध प्रवासियों की पहचान करना, डेमोग्राफी में आ रहे असामान्य और अप्राकृतिक बदलावों को रोकना और भारत की संप्रभुता की रक्षा करना है.

अमित शाह ने स्पष्ट शब्दों में कहा, डेमोग्राफिक चेंज हमारी संप्रभुता के साथ ही राष्ट्रीय सुरक्षा, कानून व्यवस्था, सामाजिक संरचना में गंभीर बदलाव और जनजातीय समाज के संरक्षण से जुड़ी एक गंभीर समस्या है. यह कमिटी, अवैध प्रवास और अन्य असामान्य कारणों से पूरे भारत में हो रहे डेमोग्राफिक चेंज का व्यापक मूल्यांकन करेगी. सरकार ने साफ कर दिया है कि किसी भी देश की सामाजिक और धार्मिक संरचना को विदेशी घुसपैठियों के दम पर बदलने की इजाजत नहीं दी जा सकती. चाहे वो असम के आदिवासी इलाके हों, झारखंड का संथाल परगना हो या फिर देश के अन्य हिस्से…जहां-जहां भी असामान्य रूप से आबादी का संतुलन बिगड़ा है, वहां अब सरकार का हंटर चलने वाला है.

दिल्‍ली कैबिनेट ने राशन योजना के नियमों में बड़ा बदलाव…

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दिल्‍ली कैबिनेट ने राशन योजना के नियमों में बड़ा बदलाव करते हुए एलिजिबिल्‍टी के लिए सालाना आय की सीमा 1 लाख से बढ़ाकर 2.5 लाख रुपये कर दी है. इससे देश के लाखों मध्यमवर्गीय परिवारों को सीधा लाभ मिलेगा. इसके अलावा, राशन वितरण में होने वाले भ्रष्टाचार और धांधली को रोकने के लिए केवल डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल अनिवार्य किया गया है, जो सीधे लाभार्थियों के खातों में भेजी जाएगी.

दिल्‍ली कैबिनेट की बैठक में आज राशन वितरण प्रणाली को लेकर एक बड़ा और बेहद अहम फैसला लिया गया है, जिसने राजधानी के मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग को बड़ी राहत दी है. सरकार ने राशन कार्ड के लिए जरूरी सालाना आय की सीमा को सीधे 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 2.5 लाख रुपये कर दिया है. दिल्‍ली सरकार का मानना है कि पहले तय की गई 1 लाख रुपये की मूल आय की सीमा बहुत कम थी, जिससे कई जरूरतमंद परिवार इस योजना के दायरे से बाहर हो गए थे. मत्रभ्‍ मंजिंदर सिंह सिरसा ने सरकार के इस कदम की सराहना करते हुए कहा कि इस फैसले से दिल्‍ली के लाखों परिवारों को सीधा फायदा मिलेगा. इसके साथ ही, राशन वितरण में पारदर्शिता लाने और हर तरह की धांधली को जड़ से खत्म करने के लिए सरकार ने अब राशन के लेन-देन में केवल डिजिटल करेंसी के इस्तेमाल को अनिवार्य कर दिया है.

रेखा गुप्‍ता कैबिनेट फैसले की 5 मुख्य बातें
• आय की सीमा में भारी बढ़ोतरी: राशन कार्ड के लिए एलिजिबिल्‍टी की वार्षिक आय सीमा को 1 लाख रुपये से बढ़ाकर अब 2.5 लाख रुपये कर दिया गया है.
• लाखों नए परिवारों को लाभ: इस फैसले के बाद मध्यम वर्ग और निम्न-मध्यम वर्ग के लाखों नए लाभार्थी इस सरकारी राशन योजना के दायरे में आ जाएंगे.
• डिजिटल करेंसी से सीधा भुगतान: राशन योजना में भ्रष्टाचार और लीकेज को रोकने के लिए अब केवल डिजिटल करेंसी का ही इस्तेमाल किया जाएगा.
• सीधे बैंक खाते में ट्रांसफर: डिजिटल करेंसी लाभार्थियों के बैंक खातों में सीधे ट्रांसफर की जाएगी, जिसका इस्तेमाल वे सिर्फ राशन खरीदने के लिए कर सकेंगे.
• बिचौलियों और धांधली पर लगाम: इस तकनीक-आधारित व्यवस्था से कोटेदारों की मनमानी, राशन की कालाबाजारी और फर्जी लाभार्थियों की धांधली पूरी तरह बंद हो जाएगी.

क्यों खास है यह फैसला और क्या होगा इसका असर?

सरकार का यह फैसला दोहरे मोर्चे पर काम करने वाला है—पहला सामाजिक कल्याण का विस्तार और दूसरा तकनीक के जरिए पूरी व्यवस्था का शुद्धीकरण.

अब तक 1 लाख रुपये की सालाना आय की सीमा बेहद व्यावहारिक नहीं रह गई थी क्योंकि महंगाई के इस दौर में इतनी आय वाला परिवार भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करता है. आय की सीमा को ढाई लाख करने से समाज के एक बहुत बड़े कामकाजी वर्ग (जैसे सुरक्षाकर्मी, ऑटो चालक, छोटे दुकानदार) को मुफ्त या किफायती राशन की सुरक्षा मिल सकेगी.

दूसरा और सबसे क्रांतिकारी कदम है डिजिटल करेंसी (e-RUPI या सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी – CBDC) का अनिवार्य इस्तेमाल. अभी तक कई जगहों पर शिकायतें आती थीं कि कोटेदार राशन डकार जाते हैं या लाभार्थियों को बाजार में बेचने पर मजबूर करते हैं. अब जब सरकार सीधे खाते में राशन की डिजिटल करेंसी भेजेगी, तो लाभार्थी उसका इस्तेमाल केवल राशन की दुकान पर ही कर पाएगा. इससे कैश की हेराफेरी खत्म होगी और राशन वितरण प्रणाली 100% पारदर्शी हो जाएगी.

सवाल-जवाब
सरकार को राशन के लिए आय की सीमा 1 लाख से बढ़ाकर ढाई लाख रुपये क्यों करनी पड़ी?

सरकार के अनुसार, पहले तय की गई 1 लाख रुपये की मूल आय सीमा बहुत कम थी. वर्तमान आर्थिक स्थितियों और महंगाई को देखते हुए बुनियादी आय को कम आका गया था, जिससे कई वास्तविक जरूरतमंद राशन के लाभ से वंचित रह जाते थे. अब ढाई लाख की सीमा होने से लाखों छूटे हुए परिवारों को सुरक्षा कवच मिलेगा.

राशन वितरण में डिजिटल करेंसी कैसे काम करेगी और लाभार्थियों को इससे क्या फायदा होगा?

सरकार लाभार्थियों के बैंक खातों में सीधे राशन के मूल्य के बराबर डिजिटल करेंसी ट्रांसफर करेगी. यह करेंसी डायरेक्ट अकाउंट में जाएगी, जिससे लाभार्थी राशन की अधिकृत दुकान पर जाकर भुगतान कर सकेंगे. इससे लाभार्थियों को अपनी जेब से नकद खर्च नहीं करना पड़ेगा और वे बिना किसी कटौती के पूरा राशन ले सकेंगे.

इस नई व्यवस्था से राशन वितरण में होने वाली धांधली पर कैसे लगाम लगेगी?

डिजिटल करेंसी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह ‘पर्पज-स्पेसिफिक’ (विशेष उद्देश्य के लिए) होती है. यानी राशन के लिए मिली डिजिटल करेंसी का इस्तेमाल किसी अन्य काम या सामान को खरीदने में नहीं किया जा सकता. इससे राशन की कालाबाजारी, कोटेदारों द्वारा फर्जी अंगूठा लगवाना और बिचौलियों का कमीशन पूरी तरह बंद हो जाएगा.

TMC Political Crisis : भाजपा के ‘ग्रीन सिग्नल’ के इंतजार में 20 से ज्यादा सांसद!

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टीएमसी के भीतर एक बहुत बड़ा राजनीतिक विस्फोट होने की आहट सुनाई दे रहा है. बंगाल की सत्ता हाथ से जाने के बाद ममता बनर्जी की ‘महा-मुश्किल’ का दौर शुरू हो चुका है.

टीएमसी को जल्द ही बड़ा झटका लग सकता है. विधानसभा चुनाव में भाजपा से परास्त हुईं ममता के अच्छे दिन कभी लौट भी पाएंगे, इसमें संदेह का बीजारोपण हो गया है. सत्ता की हनक गई, समर्थक साथ छोड़ रहे, पार्षद भाग रहे और अब सांसदों-विधायकों के भागने की सुगबुगाहट शुरू हो गई है. कौन है टीएमसी सांसद काकोली घोष, जिसने ममता की नींद उड़ा रखी है.

बंगाल में बदलाव हो गया. अब बदलाव के दायरे का विस्तार हो रहा है. बंगाल में 206 सीटों के साथ भाजपा ने सरकार बना ली. ममता बनर्जी की टीएमसी 80 पर ही अटक गई. ममता अब भी मानने को तैयार नहीं कि उनकी हार स्वाभाविक है. यह 15 साल से जनता के भीतर पनप रहे असंतोष और आक्रोश की स्वाभाविक परिणति है. पर, ममता टीएमसी की हार को भाजपा और चुनाव आयोग की साजिश मानती हैं. वे अपनी हार पर रोज ही विलाप के अंदाज में दोनों को खरी-खोटी सुनाती हैं. अब तो हालत यह हो गई है कि टीएमसी के उनके साथी भी भरोसेमंद नहीं रहे. नगर निकायों के पार्षद थोक में इस्तीफा दे रहे हैं. टीएमसी के ज्यादातर सांसद और विधायक भाजपा के संपर्क में हैं. पार्टी की बैठकों-कार्यक्रमों में उनकी गैरहाजिरी इसका संकेत है. ममता को भी अब लगने लगा है कि उनके लोग जान-बूझ कर दूरी बना रहे हैं. तभी तो उन्हें कहना पड़ रहा है कि जिन्हें जाना है, वे चले जाएं. बचे-खुचे लोगों से वे टीएमसी को पुनर्जीवित कर लेंगी.

पार्षदों के थोक में इस्तीफे

विधानसभा चुनावों में हार के बाद नगरपालिकाओं में टीएमसी पार्षदों के सामूहिक इस्तीफे का सिलसिला शुरू हो गया है. आधा दर्जन से अधिक नगरपालिकाओं में थोक के भाव टीएमसी पार्षदों के इस्तीफे हुए हैं. यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा. फालता सीट पर आए नतीजे के बाद डायमंड हार्बर में भी पार्षदों के इस्तीफे का दौर शुरू हो गया है. पार्षदों के इस्तीफे की शुरुआत उत्तर 24 परगना जिले के भाटपाड़ा से हुई थी. कुल 35 में 30 पार्षदों ने एक साथ इस्तीफे सौंप दिए. इसी तरह हालीशहर के 23 पार्षदों में 16 ने एक साथ इस्तीफा दे दिया. उत्तर बैरकपुर, गारुलिया और डायमंड हार्बर में इस्तीफों का सिलसिला जारी है. कई और नगरपालिकाओं और निगमों में भी टीएमसी पार्षदों ने इस्तीफे दिए हैं. कोलकाता नगर निगम में भी टीएमसी के पार्षद पाला बदलने को बेताब दिखते हैं.

बैठकों व कार्यक्रमों से दूरी

ममता बनर्जी ने विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से अब तक जितनी बैठकें की हैं, उनमें पार्टी के सभी विधायक नहीं शामिल हुए. शामिल न होने की कोई वजह बताना भी विधायकों ने मुनासिब नहीं समझा. चूंकि बैठकें टीएमसी चीफ ममता ने बुलाई थीं, इसलिए सबकी उपस्थिति जरूरी थी. खासकर तब, जब पार्टी के सामने अस्तित्व का खतरा पैदा हो गया है. टीएमसी के सांसद भी ममता से दूरी बनाने लगे हैं. चुनाव परिणाम आने के बाद ममता की बुलाई पहली ही बैठक से 10-12 नवनिर्वाचित विधायक नदारद रहे. विरोध प्रदर्शनों में सभी विधायकों की भागीदारी ममता बनर्जी सुनिश्चित नहीं कर पाईं.

अभिषेक के नेतृत्व पर प्रश्न

इतना ही नहीं, अब तो ममता बनर्जी और उनके भतीजे सांसद अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व पर भी सांसद-विधायक खुल कर सवाल उठाने लगे हैं. टीएमसी के सामने 2021 के बाद यह दूसरा बड़ा संकट है. कालीघाट में हुई समीक्षा बैठकों में कुणाल घोष, रितुव्रत बनर्जी जैसे वरिष्ठ विधायकों ने ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के फैसलों पर सीधे सवाल उठाए. विधायकों का मानना है कि बंद कमरों में रणनीति बनाने से पार्टी फिर से मजबूत नहीं होगी. इसके लिए कार्यकर्ताओं को सड़क पर उतरना होगा. बागी नेताओं का आरोप है कि बंद कमरे में आलाकमान द्वारा लिए गए फैसले जबरदस्ती नेताओं पर थोपे गए, जिससे जमीनी स्तर के नेताओं और पार्षदों ने पार्टी से दूरी बनाना शुरू कर दिया है

MP काकोली के तल्ख तेवर

टीएमसी के संकट को इससे भी समझा जा सकता है. ममता ने 4 बार की सांसद काकोली घोष दस्तीदार से लोकसभा में मुख्य सचेतक का पद छीन कर कल्याण बनर्जी को दे दिया. इससे काकोली की नाराज हुईं. ममता का यह फैसला उन्हें पार्टी के भीतर अपना अपमान लगा. भाजपा ने उनकी नाराजगी को भुना लिया. केंद्र सरकार ने काकोली को केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) की ‘Y’ श्रेणी की सशस्त्र सुरक्षा मुहैया कराई है. इंटेलिजेंस ब्यूरो की थ्रेट असेसमेंट रिपोर्ट के आधार पर उन्हें यह सुरक्षा दी गई है. सांसद काकोली घोष दस्तीदार ने अब टीएमसी के लिए राजनीतिक रणनीति बनाने वाली आई-पैक (I-PAC) के खिलाफ आवाज बुलंद करते हुए जिला अध्यक्ष पद से इस्तीफा भी दे दिया है. काकोली की नाराजगी सामान्य बात इसलिए नहीं है कि यह सांसदों में भगदड़ का संकेत हो सकता है. उनकी तरह और भी कई सांसद हैं, जो पार्टी नेतृत्व से नाराज हैं.

सांसदविधायक साथ छोड़ेंगे?

टीएमसी के एक सांसद की बातों पर भरोसा करें तो आने वाले कुछ दिनों में ममता बनर्जी को जोर का झटका लगने वाला है. लोकसभा में टीएमसी के अभी 29 सांसद हैं. लोकसभा में सर्वाधक सांसदों वाली विपक्ष की यह दूसरी पार्टी है. पर, अब यह स्थिति बदलने वाली है. भाजपा से ग्रीन सिग्नल मिला तो झटके में 20-25 लोग पाला बदल सकते हैं. कल्याण बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और अन्य एक-दो सांसदों को छोड़ कर बाकी को साथ लेने के लिए भाजपा तैयार है. चर्चा है कि अगले ही महीने भाजपा इसे मूर्त रूप दे सकती है. लोकसभा में अभी भाजपा के 240 सांसद हैं. बहुमत का आंकड़ा 272 का है. अगर टीएमसी के सांसद टूट कर भाजपा के साथ जाते हैं तो भाजपा सांसदों की लोकसभा में संख्या बहमत के आंकड़े के करीब हो सकती है. अभी केंद्र में भाजपा के ही नेतृत्व में सरकार है, लेकिन अकेले बहुमत न रहने के कारण उसे एनडीए के साथी दलों के सहारे सरकार बनानी पड़ी है.

Mayawati : उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और इसकी प्रमुख मायावती चर्चा का विषय…

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) और इसकी प्रमुख मायावती चर्चा का विषय बनी हुई हैं. चर्चा है कि मायावती आगामी यूपी चुनाव 2027 में कुछ बड़ा करने जा रही हैं. इसी बीच यह भी चर्चा है कि क्या बीएसपी 2027 के यूपी चुनाव में गठबंधन करके उतरेंगी. हालांकि वह गठबंधन किसके साथ और कब होगा यह केवल अनुमानों में है. करीब 12 साल से राजनीतिक रूप से शांत हो चुकीं मायावती और बीएसपी को लेकर इस तरह की चर्चाएं क्यों शुरू हुई, आइए इसे समझने की कोशिश करते हैं.

बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) प्रमुख ने मायावती ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है. अगले साल की शुरुआत में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बीएसपी सुप्रीमो ने 24 मई को अपनी पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ गहन समीक्षा बैठक की, जिसके बाद से लखनऊ से लेकर दिल्ली तक में चर्चाओं का बाजार गरम हो चला है. इस बैठक के बाद मायावती ने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कीं, बल्कि उन्होंने सोशल मीडिया पेज एक्स से दो पेज की प्रेस विज्ञप्ति जारी करके छोड़ दीं. मायावती के प्रेस के सामने नहीं आने के बाद लोगों के मन में कई और सवाल उठने लगे हैं.

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की चार बार मुख्यमंत्री रहीं मायावती 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से बिलकुल खामोश हो गई हैं. 2007 से 2012 तक पूर्ण बहुमत की सरकार चलाने के बाद ना केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में बीएसपी का जनाधार लगातार गिर रहा है. पार्टी के लगातार खराब प्रदर्शन के बाद भी मायावती किसी भी चुनाव में खास सक्रिय नहीं दिखती हैं. अब 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले मायावती के ऐक्टिव होने से अनुमानों का बाजार गरमाने लगा है. मायावती की ओर से जारी दो पन्ने के प्रेस नोट में दो तीन बातें गौर करने लायक है, जिसको लेकर चर्चाएं शुरू होना लाजिमी है.

  1. बीएसपी की गहन समीक्षा बैठक के बाद जारी प्रेस नोट में कहीं भी खुलकर नहीं कहा गया है कि पार्टी आगामी यूपी चुनाव में अकेले दम पर लड़ेगी. आमतौर पर देखा गया है कि बीएसपी प्रमुख मायावती हमेशा इस बात को लेकर क्लियर रहती हैं कि उन्हें गठबंधन में चुनाव लड़ना है या अकेले. 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों को याद करें तो मायावती ने करीब एक साल पहले ही स्पष्ट रूप से बता दिया था कि उनकी पार्टी अकेले ही राज्य के सभी 403 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी. इस बार ऐसी स्पष्टता नहीं दिखने के चलते चर्चा शुरू हो चुकी है कि क्या बीएसपी किसी पार्टी के साथ गठबंधन में रहकर आगामी यूपी चुनाव लड़ेगी.
  2. यह चर्चा इसलिए और भी ज्यादा जोर पकड़ रही है क्योंकि पिछले दिनों जब राहुल गांधी जब अमेठी और रायबरेली में जनसभाएं कर रहे थे उसी दौरान कांग्रेस के दो दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम और तनुज पूनिया अचानक लखनऊ के मॉल रोड स्थित मायावती से मिलने उनके घर पहुंचे थे. हालांकि मायावती ने दोनों कांग्रेसी नेताओं को मिलने का वक्त नहीं दिया, जिसके बाद इन्होंने कहा कि वह पार्टी की तरफ से नहीं बल्कि व्यक्तिगत तौर पर बहनजी का हालचाल जानने पहुंचे थे. दूसरी तरफ फजीहत के बाद कांग्रेस ने इन दोनों नेताओं से लिखित में ऐसा करने की वजह पूछ ली है. यहां गौर करने वाली बात यह है कि आमतौर पर ऐसी घटनाओं पर मायावती स्पष्टता के साथ मीडिया के सामने आकर कहती रहीं कि फलां पार्टी उनसे रिश्ते जोड़ने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन वह ऐसा नहीं करेंगी. इस बार मायावती के घर पहुंचे दोनों कांग्रेसी नेताओं की घटना पर बीएसपी या मायावती की तरफ से अब तक कोई बयान नहीं आया है.
  3. गहन समीक्षा बैठक के प्रेस नोट में एक बात और करने वाली है कि इसमें किसी भी पार्टी का नाम नहीं लिया गया है. इसमें मायावती की तरफ से या तो सत्तापक्ष या विपक्ष शब्द कहकर संबोधित किया गया है. ऐसे में ये कयास लगाया जाना जरूरी हो जाता है कि जो मायावती मीडिया के सामने साफगोई से किसी भी राजनीति दल का नाम लेकर हमला करती रही हैं, उन्होंने इस बार ऐसा क्यों किया है.

मायावती के लिए 2027 में गठबंधन करना क्यों है जरूरी?

मौजूदा समय में मायावती की पार्टी के केवल एक विधायक हैं. बीएसपी लोकसभा, राज्यसभा, यूपी विधान परिषद में शून्य पर है. 2014 के लोकसभा में बीएसपी का खाता नहीं खुला. 2019 में बीएसपी ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया जिसके चलते उनके 10 सांसद जीते. 2024 में फिर अकेले लड़ी तो एक बार फिर से पार्टी का रिजल्ट शून्य ही रहा. इसी यूपी में विधानसभा चुनावों की बात करें तो 2012 में जब मायावती सत्ता से बाहर गईं तो उनके 80 विधायक जीते थे. 2017 के चुनाव में जब बीजेपी 325 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ यूपी की सत्ता पर काबिज हुई तब बीएसपी के केवल 19 विधायक जीते. 2022 के विधानसभा चुनाव में बीएसपी यूपी में केवल एक विधायकों तक सिमट गई.

वोट हासिल करने के मामले में भी बीएसपी का प्रदर्शन लगातार गिरता रहा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी को उत्तर प्रदेश में लगभग 19.6% और देश स्तर पर लगभग 4.2% वोट मिले. 2019 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी को यूपी में लगभग 19.3% वोट मिले. वहीं राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 3.6% वोट मिले. 2024 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी का वोट प्रतिशत काफी घटा और यूपी में लगभग 9.3% और पूरे देश में लगभग 2.07% रहा. जहां तक यूपी विधानसभा चुनावों की बात है तो 2017 में 22.23% और 2022 में केवल 12.88% पर सिमट गया. यानी मायावती की पार्टी लगातार रसातल में जाती रही.

बीएसपी के राष्ट्रीय पार्टी के तमगे पर खतरा

फिलहाल बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) देश की राष्ट्रीय पार्टी है. लेकिन चुनाव दर चुनाव उसके घटते जनाधार के चलते वह राष्ट्रीय पार्टी बनने रहने के किसी भी नियम को फॉलो नहीं कर पा रही है.

  • राष्ट्रीय पार्टी के लिए कम से कम 4 राज्यों में एक ‘राज्य स्तरीय दल’ (State Party) के रूप में मान्यता.
  • अगर किसी पार्टी ने लोकसभा के आम चुनाव में कुल सीटों की कम से कम 2% सीटें (वर्तमान में 543 में से 11 सीटें) जीती हों. ये 11 सीटें किसी एक राज्य से नहीं, बल्कि कम से कम 3 अलग-अलग राज्यों से जीतकर आनी चाहिए.
  • अगर किसी पार्टी को लोकसभा चुनाव या राज्यों के विधानसभा चुनाव में 4 या उससे अधिक राज्यों में कुल वैध मतों का न्यूनतम 6% वोट मिला हो.
  • इसके साथ-साथ पार्टी को किसी भी राज्य या राज्यों से लोकसभा की कम से कम 4 सीटों पर जीत दर्ज करनी जरूरी है.

बहुजन समाज पार्टी राष्ट्रीय पार्टी का तमगा बरकार रखने के किसी भी नियम शर्त का पालन नहीं कर पा रही है. ऐसे में 2017 का यूपी विधानसभा चुनाव मायावती के लिए करो या मरो वाली स्थिति हो गई है. ऐसे में राजनीति के जानकार मानते हैं कि मायावती अपनी पार्टी का प्रदर्शन सुधारने के लिए पूरी संभावना है कि वह किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन कर सकती हैं. प्रेस नोट में अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा का ना होना इस अनुमान को और भी ज्यादा बल देता है. हालांकि इसकी औपचारिक घोषणा कब और कहां होगी ये तो वक्त ही बताएगा.

बीएसपी पर बी टीम होने के लगते रहे आरोप

पिछले चार चुनावों में बीएसपी और मायावती का जिस तरह का रवैया रहा उसे देखकर उनपर कभी बीजेपी की बी टीम तो कभी इंडिया गठबंधन की बी टीम होने के आरोप लगते रहे. 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में जिस तरह से मायावती ने अपने घोषित उम्मीदवार ऐन मौके पर बदले और उसके बाद वहां के जातीय समीकरण के हिसाब से प्रत्याशी दिए उससे यही आरोप लगे कि वह पूरे चुनाव में समाजवादी पार्टी को नुकसान और बीजेपी को फायदा पहुंचाने का काम कर रही हैं. ठीक उसी तरह 2024 के लोकसभा चुनाव में मायावती ने कई सीटों के जातीय समीकरण को देखते हुए इस तरह से उम्मीदवार उतारे जिससे कुछ जगहों पर बीजेपी को तो ज्यादातर जगहों पर इंडिया गठबंधन को फायदा होता हुआ दिखा. इसी तरह जब उनके भतीजे और बीएसपी में उत्तराधिकारी माने जा रहे आकाश आनंद ने अग्रेसिव तरीके से चुनावी रैलियों में बोलना शुरू किया तो मायावती ने खुद उन्हें पद से हटाकर शांत कर दिया. यानी मायावती को जिस जुझारूपन और जनता के मुद्दों पर लड़ाके के तरह राजनीति के लिए जाना जाता रहा, वह बिल्कुल सरेंडर मूड में दिखीं. ऐसे में इस बार यूपी चुनाव से पहले मायावती ने जिस तरह की सक्रियता दिखाने की कोशिश की हैं, उसको लेकर अनुमानों का दौर शुरू होना लाजिमी है.

साल 2015 पड़ा था सबसे घातक नौतपा, सड़कें सूनी, अस्पताल भरे, इस बार क्या होगा….

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आमतौर पर मई के आखिर में जब सूर्य कर्क रेखा में आता है तो भारत में नौ दिनों के लिए जबरदस्त गर्मी और लू का प्रकोप बढ़ जाता है. इसका समय हर साल 25 मई से 2 जून के बीच होता है. वर्ष 2015 के नौतपा को उसकी घातक प्रवृत्ति के लिए जाना जाता है. जिसमें काफी लोग मारे गए थे.

कहा जाता है कि उस साल देश में सबसे घातक नौतपा पड़ा था. हाहाकार मच गया था. दोपहर में सड़कें सूनी. अस्पताल भर गए. पानी और बिजली की किल्लत. आमतौर पर माना जाता है कि जिस साल नौतपा जितना जबरदस्त होता है, मानसून उतना बेहतर आता है, वैसा भी नहीं हुआ. इस साल का नौतपा भी भीषण लू के साथ शुरू हुआ है.

वास्तव में नौतपा के दौरान सबसे ज्यादा तपिश कर्क रेखा और उसके आस-पास के क्षेत्रों यानी मुख्य रूप से भारत और उपमहाद्वीप के इलाकों में होती है.

मई 2015 के आखिरी हफ्ते में नौतपा के दौरान पूरे उत्तर और मध्य भारत सहित दक्षिण भारत के कुछ हिस्से विशेषकर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना भयंकर लू की चपेट में थे. देश के कई हिस्सों में पारा 47°C से 48°C को पार कर गया. ये भारत के इतिहास का सबसे दर्दनाक ग्रीष्म कहर बन गया. भीषण लू चल रही थी. जिससे देश भर में लगभग 2,500 से अधिक लोगों की जान चली गई. अस्पतालों में हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के मरीजों की बाढ़ आ गई.

आमतौर पर नौतपा 25 मई से शुरू होता है. सूर्य की किरणें सीधे तीव्रता से पृथ्वी की ओर आती हैं. वर्ष 2015 में इसी दौरान दक्षिण और मध्य भारत में तापमान 45-48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया.

– हैदराबाद में तापमान 47°C से ऊपर गया
– तेलंगाना के खम्मम में 48°C दर्ज किया गया
– इलाहाबाद में 47.7°C तक तापमान पहुंचा
– दिल्ली में 46°C के आसपास गर्मी रही।

नासा ने बाद में अपनी रिपोर्ट में लिखा कि मई 2015 में भारत के कई हिस्सों में तापमान सामान्य से 5.5°C तक अधिक था, जो असामान्य स्थिति थी.

जीवन मुश्किल हो गया

उस समय के अखबारों और टीवी रिपोर्टों में जो तस्वीरें आईं, वे बेहद चिंताजनक थीं. दोपहर में सड़कें खाली हो जाती थीं. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के कई शहरों में दोपहर के समय बाजार करीब बंद जैसे दिखते थे. लोग सुबह जल्दी और शाम को ही बाहर निकलते थे. हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और बेहोशी के मामलों की बाढ़ आ गई थी. सरकारी अस्पतालों में अतिरिक्त बेड लगाने पड़े.

नासा और अन्य रिपोर्टों के अनुसार सबसे अधिक मौतें निर्माण मजदूरों, रिक्शा चालकों, खेतिहर मजदूरों, बुजुर्गों और बेघरों की हुईं. दिनभर खुले आसमान के नीचे काम करना जानलेवा हो गया.

बिजली और पानी पर दबाव

कई शहरों में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई. कूलर, पंखे और एयर-कंडीशनर लगातार चल रहे थे. कुछ इलाकों में पानी की कमी की खबरें भी आईं.

मौतों का आंकड़ा

भारत में 2,500 से अधिक लोगों की मौत हुई. सबसे ज्यादा मौतें आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में हुईं. अकेले आंध्र प्रदेश में 1,700 से अधिक और तेलंगाना में लगभग 600 मौतें दर्ज की गईं. उस समय अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने इसे दुनिया की सबसे घातक हीटवेव घटनाओं में एक बताया. अखबारों ने लिखा,

– दोपहर में शहर भूतिया लग रहे हैं
– सड़कों पर लोग गिरकर बेहोश हो रहे हैं
– श्मशानों और कब्रिस्तानों में भीड़ बढ़ गई है
– अस्पतालों में ORS और ड्रिप की मांग बढ़ी

24-25 मई 2015 की रिपोर्टों में बताया गया कि कई जिलों में लोग 47°C तापमान में अचानक गिरकर मर रहे हैं. प्रशासन लोगों को दोपहर में घरों से न निकलने की सलाह दे रहा था.

क्या उस साल मानसून अच्छा रहा

ये माना जाता रहा है कि जिस तरह नौतपा जितना जबरस्त होता है. उस साल मानसून अच्छा होता है लेकिन भयंकर गर्मी के बावजूद 2015 का मानसून अच्छा नहीं माना जाता.

भारत में 2015 का दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से लगभग 14% कम रहा. ये लगातार दूसरा कमजोर मानसून वर्ष था. 2014 भी कमजोर रहा. जून में अंत तक मानसून आने से दक्षिण भारत को गर्मी से राहत मिली. हालांकि पूरे सीजन में बारिश की कमी बनी रही. कई राज्यों में सूखे जैसी स्थितियां बनीं.

क्या 2015 का नौतपा सबसे गर्म था?

रिकॉर्ड के हिसाब से “सबसे गर्म” कहना तो कठिन है लेकिन सबसे घातक नौतपा का साल तो ये जरूर था. मौतों की संख्या, गर्मी की अवधि, प्रभावित आबादी और सामाजिक असर को देखें तो 2015 का नौतपा भारत के इतिहास के सबसे कठिन और त्रासद नौतपों में एक था.

इस बार क्या होगा

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के ताजा अनुमानों और अलर्ट के मुताबिक, इस साल का नौतपा दो बिल्कुल अलग-अलग मौसम प्रणालियों का मिलाजुला रूप रह सकता है.

नौतपा की शुरुआत भीषण और रिकॉर्ड तोड़ हीटवेव के साथ हुई है लेकिन कुछ ही दिनों में धूल भरी आंधी और बारिश से आंशिक राहत मिलने की भी उम्मीद है. मैदानी इलाकों में तापमान 44°C से 47°C के बीच बना हुआ है. यूपी और राजस्थान के हॉटस्पॉट इलाकों में तापमान 48°सेंटीग्रेड के स्तर को भी छू चुका है.

मौसम विभाग के अनुसार, पाकिस्तान और राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों से आने वाली बेहद शुष्क पश्चिमी हवाएं मैदानी राज्यों में सीधी धूप के साथ मिलकर हवा को भट्टी की तरह तपा रही हैं. हालांकि उत्तर भारत में एक स्थानीय चक्रवाती हवाओं का क्षेत्र सक्रिय हो रहा है, जिसके कारण देश के करीब 20 राज्यों में मौसम बदलेगा.

दिल्ली-NCR, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा में 26 और 27 मई को आसमान में बादल छाने और 50 किमी/घंटे की रफ्तार से धूल भरी आंधी चलने का अनुमान है.

मौसम विभाग ने 29 मई को उत्तर भारत के कई हिस्सों में तेज आंधी के साथ भारी बारिश की चेतावनी जारी की है. इससे तापमान में 2 से 3 डिग्री की गिरावट आ सकती है, जो तपते हुए नौतपा के बीच कुछ समय के लिए राहत देगी. हालांकि उमस बढ़ सकती है.