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जब बंगाल में राष्ट्रपति शासन के लिए अड़ गईं ममता बनर्जी, मुस्लिम वोटों

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बेशक, तब ममता बनर्जी वाजपेयी सरकार में कड़े मोलभाव के बाद शामिल हुई थीं. उन्हें रेल मंत्रालय दिया गया था लेकिन ममता का ध्यान ज्यादातर बंगाल की राजनीति में ही रमा रहता था क्योंकि राज्य में 2001 में विधानसभा चुनाव होने थे और वाम मोर्चे को सत्ता से दूर करने के लिए ममता पूरा जोर लगाना चाहती थीं.

ममता बार-बार वाजपेयी मंत्रिमंडल से इस्तीफे की धमकी दिया करती थीं. उन्होंने वाजपेयी मंत्रिमंडल से दो बार इस्तीफा दिया था. पहली बार सितंबर 2000 में, जब वाजपेयी सरकार ने पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ा दी थीं लेकिन गठबंधन धर्म निभाने के उस्ताद वाजपेयी के समझाने और यह आश्वासन देने पर कि इस बढ़ोतरी पर पुनर्विचार किया जाएगा, ममता मान गईं और उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया. आपको शायद आश्चर्य करें तब बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए ममता ने पूरी ताकत झोंक दी थी.

मंजीत ठाकुर अपनी किताब ‘बंगाल में भाजपा – वाम गढ़ में दक्षिणपंथ की विकास यात्रा’ में लिखते हैं कि ममता बनर्जी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने का काफी ज्यादा दबाव डाल रही थीं. एक वक्त ऐसा भी आया, जब पूर्वी मिदनापुर के पांसकुड़ा में हिंसक उपचुनावों के बाद एनडीए के संयोजक जॉर्ज फर्नांडीज को गठबंधन की ओर से एक प्रस्ताव पारित करके सरकार से अनुरोध करना पड़ा कि बंगाल में लोकतांत्रिक संस्थाओं को बचाने के लिए उचित कदम उठाया जाए. इसके बाद केंद्र सरकार ने इस संदर्भ में बंगाल की ज्योति बसु सरकार से जवाब भी मांगा था. इसके बाद एनडीए का एक प्रतिनिधिमंडल राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की जरूरत की जांच के लिए दौरे पर आया था लेकिन उसे महसूस हुआ कि इस कदम से गठबंधन को राजनैतिक रूप से नुकसान होगा और इससे ज्योति बसु शहीद का तमगा पा लेंगे.

बंगाल में भाजपा ने जमाए पैर

1999 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को सूबे में कुल 11.13 फीसद वोट हासिल हुए थे लेकिन यह आंकड़ा सिक्के का महज एक पहलू है. पश्चिम बंगाल में भाजपा का 1999 का लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन भी ऐसा ही है, जिसमें लोगों का ध्यान इस बात में अटककर रह जाता है कि पार्टी ने पहली बार दो सीटें जीतीं लेकिन दिलचस्प यह है कि कुल 13 सीटों में से भाजपा के दो उम्मीदवार जीते, एक उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे और बाकी के दो तीसरे स्थान पर.

भाजपा के लिए यह पैर जमाने वाला चुनाव साबित होना चाहिए था और इसने बेशक जमीनी स्तर पर पैर पसारने के लिए आतुर ममता बनर्जी की चिंताएं बढ़ा दीं. इसके साक्ष्य हमें बाद में जाकर मिलते हैं. हालांकि 1999 के आम चुनाव के दौरान ऐसी कई घटनाओं का ब्योरा मिलता है जिसमें ममता बनर्जी ने भाजपा के नेताओं के साथ रूखा व्यवहार किया. इनमें से एक तो भाजपा के वरिष्ठ नेता शाहनवाज हुसैन के साथ संयुक्त रैली के दौरान उनसे किया दुर्व्यवहार भी था. ऐसे में भाजपा का प्रदेश नेतृत्व ममता से नाराज था और केंद्रीय नेतृत्व से इसकी शिकायत भी की गई थी, पर केंद्रीय नेतृत्व ने इन शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया था.

ममता ने दूसरी बार दिया इस्तीफा

दिसंबर 2000 में पंजाब में एक रेल दुर्घटना हो गई थी, जिसमें 46 लोगों की मौत हो गई. ममता ने इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा दे दिया. हालांकि, वाजपेयी ने उनका इस्तीफा नामंजूर कर दिया था लेकिन उन्हीं दिनों तहलका प्रकरण हो गया और इस बार रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज के इस्तीफे की मांग करती हुई ममता बनर्जी ने मार्च 2001 में एक बार फिर से इस्तीफा दे दिया और वाजपेयी सरकार से समर्थन वापस लेकर एनडीए से बाहर निकल गईं.

कलकत्ता नगर निगम के चुनावों में तृणमूल कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया था और इससे ममता बनर्जी का आत्मविश्वास भी काफी बढ़ गया था. मीडिया को ममता की अगुआई वाले विपक्ष और कमजोर होते वाम मोर्चे से सत्ताविरोधी लहर का रुझान मिल गया. ममता की रैलियों में उमड़ी भीड़ ने इस नरैटिव को हवा दे दी लेकिन अब तक रायटर्स बिल्डिंग में ज्योति बसु की जगह कमान बुद्धदेव भट्टाचार्य के हाथों में आ चुकी थी.

मुसलमानों के छिटकने का डर

ममता के बार-बार केंद्र सरकार से इस्तीफे देने को राजनैतिक पंडित एनडीए से बाहर आने और पश्चिम बंगाल में भाजपा के साथ गठजोड़ तोड़ने की कवायद के रूप में देख रहे थे. इसकी दो वजहें थीं, पहला, भाजपा अगर तृणमूल कांग्रेस के साथ बनी रहती तो सूबे का मुसलमान ममता के पाले में पूरी तरह आने से हिचकता. दूसरा, तृणमूल कांग्रेस वैचारिक रूप से भाजपा-विरोधी गैर-वाम वोटों को अपने पक्ष में गोलबंद करना चाहती थीं. ममता ने बंगाल में नारा दिया – होए एईबार, नॅय नेबर.

उनकी इन कोशिशों को बुद्धदेव भट्टाचार्य ने एक अवसर के तौर पर भुनाने का फैसला कर लिया. इधर, चुनाव में अकेली मैदान में आई भाजपा और तृणमूल दोनों के लिए चुनाव अच्छे साबित नहीं हुए. ममता अतिआत्मविश्वास का शिकार होती दिखीं और सूबे की कुल 294 सीटों में उनकी पार्टी को महज 60 सीटें हासिल हुईं.

13 मई, 2001 को जब पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे टीवी पर आने लगे तो एक बात स्पष्ट हो गई थी, पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा भारी जीत की तरफ बढ़ रहा था. बंगाली मतदाताओं ने राष्ट्रीय चलन के उलट एक बार बुद्धो बाबू (बुद्धदेव भट्टाचार्य) के नेतृत्व को स्वीकार कर लिया था. नतीजतन, सूबे की 294 सीटों में से वाम मोर्चे ने 199 सीटों पर फतह हासिल की थी और उसका वोट-शेयर भी 49 फीसद तक पहुंच गया था.