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GDP Data: 10 साल पुराना नियम खत्म! कल से बदल जाएगा देश की कमाई का पूरा हिसाब…

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भारत सरकार देश की आर्थिक तरक्की को मापने का पूरा तरीका बदलने जा रही है. आगामी 27 फरवरी को सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के नए आंकड़े जारी होंगे. इसमें सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब जीडीपी की गणना के लिए आधार वर्ष 2011-12 की जगह 2022-23 होगा.

यह बदलाव हमारी अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर पेश करने के लिए किया जा रहा है. इस नए तरीके से आम आदमी के जीवन और देश की विकास दर का अधिक सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा. पुराने फॉर्मूले में महामारी के बाद आए बदलावों और तेजी से बढ़ते डिजिटल बाजार की सही झलक नहीं मिल रही थी. हाल ही में खुदरा महंगाई (CPI) का आधार वर्ष भी बदलकर 2024 किया गया है. अब इसी तर्ज पर जीडीपी के आंकड़े अपडेट हो रहे हैं.

क्यों बदलना पड़ा जीडीपी मापने का पैमाना?

सांख्यिकी मंत्रालय के सचिव सौरभ गर्ग के मुताबिक, जीएसटी लागू होने और कोविड महामारी के कारण इस संशोधन में देरी हुई. इसके अलावा, नवंबर 2025 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने भारत के राष्ट्रीय खाता आंकड़ों की कार्यप्रणाली में कमियां निकालते हुए इसे ‘C’ रेटिंग दी थी. इन सब कारणों ने सरकार को डेटा प्रणाली में सुधार करने के लिए प्रेरित किया है.

अब सरकार का लक्ष्य हर पांच साल में इस आधार वर्ष को अपडेट करना है. अर्थव्यवस्था में डिजिटल सेवाओं, रिन्यूएबल एनर्जी और नए तरह के निवेश का दायरा काफी बढ़ गया है. नई प्रणाली में घरेलू खपत सर्वेक्षण, श्रम बल सर्वेक्षण और जीएसटी जैसे आधुनिक प्रशासनिक डेटा का इस्तेमाल होगा. इससे अनौपचारिक क्षेत्र और गिग इकॉनमी से जुड़े कामगारों की मेहनत भी जीडीपी में साफ नजर आएगी.

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को कैसे मिलेगा नया रूप?

इस बदलाव का सबसे अहम हिस्साडबल डिफ्लेशनतकनीक को अपनाना है. इसके जरिए निर्माण क्षेत्र में कच्चे माल और तैयार उत्पाद की कीमतों के बीच के अंतर को ज्यादा बारीकी से मापा जाएगा. पुराने सिस्टम में इन दोनों के बीच के उतारचढ़ाव से आंकड़ों में जो विसंगति आती थी, वह अब दूर हो जाएगी. इससे विनिर्माण क्षेत्र की वास्तविक वृद्धि का सही पता चलेगा.

इसके साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले गिग वर्कर्स का योगदान भी अब अर्थव्यवस्था में प्रमुखता से दर्ज होगा. असंगठित क्षेत्र को मापने के लिए वाहन पंजीकरण, ईंधन खपत और जीएसटी के उच्चआवृत्ति वाले डेटा का सहारा लिया जा रहा है. इसके अलावा तिमाही आंकड़ों को वार्षिक आंकड़ों से मिलाने के लिएप्रोपोर्शनल डेंटननामक एक नया तरीका भी अपनाया जाएगा.

आम आदमी की जेब पर क्या होगा असर?

अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस बदलाव के बाद भारत की विकास दर पहले से अधिक तेज दिख सकती है. ईवाई इंडिया के मुख्य नीति सलाहकार डीके श्रीवास्तव के अनुसार, नई प्रणाली में सेवा क्षेत्र का वजन बढ़ेगा. चूंकि कृषि के मुकाबले सेवा क्षेत्र तेजी से बढ़ता है, इसलिए बुनियादी अर्थव्यवस्था समान रहने पर भी औसत वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर ऊंची नजर सकती है.

इक्रा की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर का कहना है कि नए जीडीपी डेटा से अर्थव्यवस्था के आकार और पिछली तिमाहियों की विकास दर का दोबारा आकलन होगा. यह आंकड़े रिजर्व बैंक के लिए बहुत महत्वपूर्ण होंगे क्योंकि इन्हीं के आधार पर ब्याज दरों और महंगाई से जुड़ी भविष्य की मौद्रिक नीतियां तय की जाएंगी. इससे देश की आर्थिक नीतियों और ऋण दरों पर सीधा असर पड़ेगा.