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पेट्रोल में 30 फीसदी तक मिलाया जाएगा एथेनॉल, जानिए क्या है सरकार का पूरा प्लान…

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इस पूरे बदलाव के लिए भारत की संस्था BIS ने इन नए फ्यूल मिक्स के लिए तकनीकी नियम और मानक तय कर दिए हैं. आइए इससे जुड़ी सारी डिटेल्स जान लेते हैं.

क्या है सरकार का पूरा प्लान?

भारत सरकार लगातार पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ाने की दिशा में काम कर रही है. ऐसा इसलिए ताकि फ्यूल की लागत कम हो जाए, विदेशी तेल पर निर्भरता घटे और पर्यावरण को भी फायदा मिले. अभी तक भारत में ज्यादातर जगहों पर E20 पेट्रोल का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन अब सरकार ने इससे आगे बढ़ने की योजना तैयार कर ली है.

सरकार ने अब पेट्रोल के लिए नए स्टैंडर्ड तय कर दिए हैं जिनमें E22, E25, E27 और E30 जैसे फ्यूल शामिल हैं. इन नामों का मतलब बहुत सरल है कि पेट्रोल में कितने प्रतिशत एथेनॉल मिलाया गया है. उदाहरण के लिए E22 में 22% एथेनॉल और 78% पेट्रोल होगा, जबकि E30 में 30% एथेनॉल और 70% पेट्रोल होगा. यानी धीरे-धीरे पेट्रोल में एथेनॉल की मात्रा बढ़ाई जाएगी.

भारत की इस संस्था ने तय किए मानक

इस पूरे बदलाव के लिए भारत की संस्था BIS (Bureau of Indian Standards) ने इन नए फ्यूल मिक्स के लिए तकनीकी नियम और मानक तय कर दिए हैं. इसका फायदा यह होगा कि आने वाले समय में तेल कंपनियों और कार कंपनियों को पहले से पता रहेगा कि किस तरह के ईंधन का इस्तेमाल बढ़ने वाला है और वे उसके हिसाब से तैयारी कर सकेंगी.

आपके लिए यह समझना जरूरी है कि अभी तुरंत E22 या E30 पेट्रोल बाजार में नहीं आ रहा है. फिलहाल देश में मुख्यतौर पर E20 पेट्रोल ही मौजूद है और नए लेवल केवल भविष्य की योजना यानी एक रोडमैप की तरह हैं. सरकार ने अभी सिर्फ दिशा तय की है कि आने वाले सालों में एथेनॉल की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाई जाएगी.

क्या हैं बड़े कारण?

इस कदम के पीछे कई बड़े कारण हैं. सबसे पहला कारण यह है कि भारत बहुत ज्यादा कच्चा तेल बाहर से खरीदता है, जिससे देश पर आर्थिक बोझ पड़ता है. एथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ने से यह निर्भरता कम हो सकती है. दूसरा बड़ा कारण किसानों की आमदनी बढ़ाना है क्योंकि एथेनॉल गन्ना और मक्का जैसी फसलों से बनाया जाता है, जिससे कृषि क्षेत्र को सीधा फायदा मिलता है. इसके अलावा इसे पेट्रोल की तुलना में थोड़ा ज्यादा पर्यावरण के अनुकूल भी माना जाता है, जिससे प्रदूषण कम करने में मदद मिल सकती है.

इस बदलाव का असर गाड़ियों पर भी पड़ सकता है. पुरानी गाड़ियां सीमित एथेनॉल मिश्रण के हिसाब से बनी होती हैं, इसलिए ज्यादा एथेनॉल वाले फ्यूल से उनकी परफॉर्मेंस या माइलेज पर असर पड़ सकता है. ऐसे में आने वाले समय में कार कंपनियों को ऐसे इंजन बनाने होंगे जो ज्यादा एथेनॉल वाले पेट्रोल के साथ बेहतर तरीके से काम कर सकें.