Right to Cooling: काफी ज्यादा गर्मी अब सिर्फ एक मौसमी परेशानी नहीं रही. यह एक वैश्विक असमानता का संकट बनती जा रही है. भारत से लेकर यूरोप और मिडिल ईस्ट रिकॉर्ड तोड़ तापमान उन लोगों के बीच बढ़ती खाई को दिखा रहा है जो खुद को जानलेवा गर्मी से बचा सकते हैं और जो नहीं बचा सकते. जिस तरफ अमीर परिवार एयर कंडीशन्ड घरों और दफ्तर में आराम करते हैं वहीं लाखों मजदूर, झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले और बेघर नागरिक बिना किसी बुनियादी कूलिंग सुविधा के झुलसा देने वाले तापमान को झेलने को मजबूर है. इसी बीच आइए जानते हैं कि क्या है राइट टू कूलिंग.
राइट टू कूलिंग उस बढ़ती मांग को दर्शा रहा है कि हर व्यक्ति को खतरनाक लू से न्यूनतम सुरक्षा मिलनी चाहिए. इसमें पंखे, साफ पीने का पानी, छाया, हवादार जगह और कूलिंग शेल्टर शामिल हैं.
काफी ज्यादा गर्मी लोगों पर इस आधार पर काफी अलग-अलग तरह से असर डालती है कि वह कहां और कैसे रहते हैं. अमीर लोग ऐसे घरों में रहते हैं जो गर्मी रोधी होते हैं और उनमें एयर कंडीशनर लगे होते हैं. वहीं गरीब समुदाय तंग, टिन की छतों वाली बस्ती या फिर खराब हवादार कमरों में रहने को मजबूर हैं.
रोजाना मजदूरी करने वाले मजदूर, किसान और रिक्शा खींचने वाले लोग लंबे समय तक सीधे सूरज की रोशनी के संपर्क में रहते हैं. दफ्तरों में काम करने वालों के उलट जो घरों के अंदर रह सकते हैं या फिर घर से काम कर सकते हैं इन मजदूरों को पानी की कमी, लू, थकान और लंबे समय तक चलने वाले किडनी से जुड़ी बीमारियों का कहीं ज्यादा खतरा होता है.
भारत में कई विशेषज्ञों का ऐसा मानना है कि कूलिंग का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़ा है. यह जीवन और गरिमा के अधिकार की गारंटी देता है. वे तर्क देते हैं कि सरकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे नागरिकों को जानलेवा गर्मी की स्थिति से बचाएं.
लोग सरकारों से शहरों में सार्वजनिक कूलिंग केंद्र बनाने का आग्रह कर रहे हैं. यहां बेघर लोग, मजदूर और राहगीर कुछ समय के लिए गर्मी से राहत पा सकते हैं. गर्मी से ज्यादा प्रभावित इलाकों में रियायती बिजली, कूल रूफ हाउसिंग टेक्नोलॉजी, पीने के पानी के पॉइंट और शहरों में ज्यादा हरियाली की भी मांग की जा रही है.
काफी ज्यादा तापमान न सिर्फ स्वास्थ्य से जुड़ी आपात स्थितियों को पैदा कर रहा है बल्कि इसमें मजदूरों के काम करने की क्षमता और रोजाना की कमाई में भी कमी देखने को मिल रही है.



