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सुनवाई पूरी होने के बाद तीन महीने के अंदर सुनाना होगा फैसला’, मुकदमों में देरी पर SC का हाईकोर्ट्स को निर्देश…

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सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट्स को निर्देश दिया है कि जमानत का आदेश अगले दिन देने का प्रयास किया जाए. आदेश की जानकारी उसी दिन जेल अधिकारियों को दी जानी चाहिए.

देशभर की हाईकोर्ट्स में मुकदमों के फैसले सुनाए जाने में देरी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने दिशा-निर्देश जारी किए हैं. शुक्रवार (29 मई, 2026) को कोर्ट ने कहा कि किसी भी मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद तीन महीनों के अंदर फैसला सुना दिया जाना चाहिए और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामले में यह समयसीमा और भी ज्यादा कम है.

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने हाईकोर्ट में सुनवाई पूरी होने के बाद आदेश सुनाए जाने में होने वाली देरी के समाधान के लिए कुछ दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं.

  • सुरक्षित रखा गया फैसला तीन महीने के भीतर सुनाया जाए.
  • जमानत का आदेश अगले दिन देने का प्रयास किया जाए. आदेश की जानकारी उसी दिन जेल अधिकारियों को दी जानी चाहिए.
  • विचाराधीन कैदियों को उसी दिन या अगले दिन रिहा किया जाना चाहिए.
  • फैसले का मुख्य हिस्सा अदालत में सुनाया जाए. कारण बताते हुए विस्तृत आदेश सात दिनों के भीतर अपलोड किया जाए.
  • फैसला सुरक्षित रखे जाने की तारीख हाईकोर्ट की वेबसाइट पर दिखनी चाहिए.
  • अगर कोई बेंच इन दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करती, तो मामला दूसरी बेंच को सौंपा जाएगा.
  • अगर 30 दिनों के भीतर फैसले के कारण अपलोड नहीं किए जाते, तो भी मामला नई बेंच को सौंपा जा सकता है.

कोर्ट ने हाईकोर्ट्स के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया हैं कि वह इन दिशा-निर्देशों को अपनी हाईकोर्ट्स के चीफ जस्टिस के सामने रखें. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि ये दिशा-निर्देश किसी विशेष जज या अदालत के लिए नहीं हैं. सुप्रीम कोर्ट उस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें एक हाईकोर्ट की ओर से फैसला सुनाने में देरी की शिकायत की गई थी.

शिकायत में कहा गया था कि दिसंबर, 2025 को झारखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था, लेकिन अभी तक कोर्ट की वेबसाइट पर उसे अपलोड नहीं किया गया है और न ही शिकायतकर्ता के वकील को आदेश जारी किया गया.

सुप्रीम कोर्ट ने पहले सुनवाई के दौरान सख्त लहजे में कहा था कि फैसला सुनाने में देरी जैसी प्रैक्टिस बंद होनी चाहिए, साथ ही इस समस्या से निपटने के लिए गाइडलाइंस जारी करने के लिए भी कहा था. कोर्ट ने कहा था कि न्याय की कीमत पर ऐसी देरी जारी रखने की इजाजत नहीं दे सकते हैं.