BJP Annamalai Factor: तमिलनाडु में बीजेपी के लिए हालात सबसे कठिन हैं. अगर पार्टी ने दक्षिण के हर राज्य को उत्तर भारत की तर्ज पर जीतने की कोशिश जारी रखी, तो अन्नामलाई का जाना महज एक शुरुआत हो सकती है.
तमिलनाडु की राजनीति में कुछ दिनों पहले तक के अन्नामलाई बीजेपी के लिए किसी ‘रॉकस्टार’ से कम नहीं थे. पूर्व IPS अधिकारी, शानदार पर्सनैलिटी और DMK को खुली चुनौती देने वाली आक्रामक शैली ने उन्हें तमिलनाडु बीजेपी का अब तक का सबसे चर्चित चेहरा बना दिया था. पार्टी को उम्मीद थी कि उन्हीं के सहारे वह पहली बार सच्चे मायनों में तमिल धरती पर पैर पसार पाएगी. लेकिन अचानक आए के अन्नामलाई के इस्तीफे ने पूरा खेल पलट दिया.
आखिर तमिलनाडु समेत पूरे दक्षिण में बीजेपी की ताकत का इतिहास और मौजूदा हाल क्या है, अब आगे कौन तमिल चेहरा हो सकता है और यहां हिंदुत्व की राजनीति की राह इतनी पथरीली क्यों है…
अन्नामलाई का इस्तीफा बीजेपी की पूरी रणनीति पर सवालिया निशान
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि के अन्नामलाई का इस्तीफा आखिर बड़ी खबर क्यों है. मार्च 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी तमिलनाडु में अपना खाता तक नहीं खोल पाई थी, जबकि अन्नामलाई पूरे जोश के साथ चुनाव लड़ रहे थे. इस हार के बाद भी पार्टी नेतृत्व ने उन्हें बदलने की बजाय उन्हीं पर भरोसा जताया, लेकिन जून 2026 में अचानक उन्होंने पार्टी से ही इस्तीफा दे दिया. यह इस्तीफा बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव नितिन नबीन ने तुरंत स्वीकार कर लिया, जिससे यह साफ लगता है कि अन्नामलाई और आलाकमान के बीच कुछ दिनों से खींचतान चल रही थी.
द वीक की एक रिपोर्ट बताती है कि इस इस्तीफे के पीछे सिर्फ चुनावी हार नहीं, बल्कि पार्टी की कार्यशैली और केंद्रीय नेतृत्व से गहरे मतभेद थे. तमिलनाडु में बीजेपी को खड़ा करने का दावा करने वाला चेहरा अगर यह कहकर जा रहा है कि पार्टी की दिशा ही गलत है, तो यह सिर्फ एक नेता का जाना नहीं, बल्कि दक्षिण भारत में बीजेपी के पूरे प्रोजेक्ट के लिए एक बड़ा झटका है.
तमिलनाडु में बीजेपी की ताकत का इतिहास: कभी एक–दो सीट, कभी शून्य
यह पहली बार नहीं है कि बीजेपी ने तमिलनाडु में मेहनत की हो. पार्टी और उसकी पूर्ववर्ती जनसंघ 1960 के दशक से राज्य में मौजूद है, लेकिन असली सफलता मिली 1990 के दशक के अंत में.
1998 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने AIADMK के साथ गठबंधन करके 3 और और 1999 में 4 सीटें जीती थीं। यही बीजेपी का तमिलनाडु में अब तक का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है. इसके बाद AIADMK से गठबंधन टूटा और पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता गया. 2004 के बाद से लगातार कई चुनावों में बीजेपी का खाता तक नहीं खुला. 2014 की मोदी लहर भी तमिलनाडु की दहलीज नहीं लांघ पाई और पार्टी सिर्फ 2 फीसदी से कम वोटों पर सिमट गई.
विधानसभा में भी बीजेपी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा है. 2016 में पार्टी ने 234 सीटों पर चुनाव लड़ा और एक भी सीट नहीं जीत पाई. 2021 में थोड़ा सुधार हुआ और पार्टी ने 4 सीटें जीतीं, लेकिन इसके बावजूद उसका वोट शेयर महज 2.84 फीसदी ही रहा. यह आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु में बीजेपी की जमीनी पकड़ कितनी कमजोर है.
तमिलनाडु के अलावा पूरे दक्षिण में बीजेपी की स्थिति क्या?
केरल: द्विध्रुवीय राजनीति में तीसरी शक्ति बनने की कोशिश
यहां राजनीति परंपरागत रूप से दो ध्रुवीय रही है यानी कांग्रेस की अगुवाई वाला UDF और वामदलों का LDF. बीजेपी इस द्विध्रुवीय राजनीति में तीसरी शक्ति बनने की कोशिश करती रही है लेकिन सफलता बहुत सीमित रही है. 140 सदस्यीय विधानसभा में 2016 के चुनाव में बीजेपी ने पहली बार एक सीट जीतकर अपना खाता खोला. 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन और बेहतर हुआ लेकिन सीटों के लिहाज से वह फिर शून्य पर रही. हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने केरल में पहली बार एक सीट जीतकर इतिहास रचा जब अभिनेता-राजनेता सुरेश गोपी त्रिशूर से जीते. लेकिन यह जीत व्यक्तिगत लोकप्रियता का नतीजा थी, संगठनात्मक ताकत का नहीं. केरल में बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य की जनसांख्यिकी है. यहां मुस्लिम और ईसाई समुदाय कुल आबादी का करीब 45 फीसदी हैं, जिनके बीच हिंदुत्व की राजनीति कोई खास जगह नहीं बना पाई.
कर्नाटक: दक्षिण का इकलौता राज्य जहां बीजेपी ने सरकार बनाई
दक्षिण भारत की पूरी तस्वीर में कर्नाटक एक अपवाद के तौर पर खड़ा है. यही इकलौता दक्षिण भारतीय राज्य है जहां बीजेपी ने कई बार अपने दम पर सरकार बनाई है. 2008 में बी.एस. येदियुरप्पा के नेतृत्व में पार्टी ने पहली बार कर्नाटक की सत्ता संभाली. इसके बाद 2018 और फिर 2019 में भी बीजेपी सत्ता में आई. कर्नाटक में बीजेपी की मजबूती का सबसे बड़ा आधार लिंगायत समुदाय रहा है, जो येदियुरप्पा का अपना समुदाय भी है. इसके अलावा तटीय कर्नाटक और मालनाड इलाके में पार्टी का संघ-समर्थित संगठनात्मक ढांचा काफी मजबूत है. हालांकि, 2023 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा और कांग्रेस ने बड़े बहुमत से सरकार बना ली. बीजेपी यहां लगातार एक बड़े क्षेत्रीय चेहरे की कमी से जूझती रही है और येदियुरप्पा के संन्यास के बाद तो यह संकट और गहरा गया है.
आंध्र प्रदेश: जहां गठबंधन के बिना चलना मुश्किल
आंध्र प्रदेश में बीजेपी की ताकत को समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि यह राज्य हमेशा से क्षेत्रीय दलों का गढ़ रहा है. 2014 में राज्य के बंटवारे के बाद से यहां की राजनीति चंद्रबाबू नायडू की TDP और जगन मोहन रेड्डी की YSR कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही है. बीजेपी को 2014 के चुनाव में TDP के साथ गठबंधन का फायदा मिला और उसने लोकसभा की 2 सीटें जीतीं. लेकिन 2018 में TDP से गठबंधन टूटने के बाद 2019 के चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और पार्टी एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई. 2024 के चुनाव में बीजेपी ने पवन कल्याण की जन सेना पार्टी और चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के साथ गठबंधन किया और इस बार उसे लोकसभा की 3 सीटों पर जीत मिली. लेकिन यह सफलता पूरी तरह गठबंधन पर निर्भर थी. आंध्र प्रदेश में बीजेपी का अपना स्वतंत्र जनाधार बेहद कमजोर है और पार्टी यहां ज्यादातर शहरी और व्यापारी वर्ग तक सीमित है.
तेलंगाना: बीजेपी के लिए उभरती संभावना लेकिन लंबा रास्ता
तेलंगाना दक्षिण भारत का वह राज्य है जहां बीजेपी ने पिछले कुछ सालों में सबसे तेज बढ़ोतरी दिखाई है, लेकिन यहां भी वह सत्ता के करीब नहीं पहुंच पाई. 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी महज एक सीट जीत पाई थी. लेकिन 2020 के हैदराबाद नगर निगम चुनाव में पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 48 सीटें जीतीं और AIMIM के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई. 2023 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 8 सीटें जीतीं और उसका वोट शेयर बढ़कर करीब 14 फीसदी हो गया. लेकिन इसके बावजूद पार्टी कांग्रेस और BRS जैसे दलों को कड़ी टक्कर देने की स्थिति में नहीं है. तेलंगाना में बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत शहरी और अर्ध-शहरी इलाके हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में उसकी पहुंच सीमित है. पार्टी यहां हिंदुत्व के एजेंडे के साथ-साथ तेलंगाना अस्मिता और विकास के मुद्दों को भी जोड़ने की कोशिश कर रही है, लेकिन अभी उसे एक मजबूत क्षेत्रीय चेहरे की कमी खल रही है. बंदी संजय कुमार और किशन रेड्डी जैसे नेताओं के बावजूद पार्टी अभी तक कोई ऐसा चेहरा नहीं खड़ा कर पाई है जो पूरे राज्य में केसीआर या रेवंत रेड्डी को टक्कर दे सके.
आखिर क्यों हिंदुत्व का रास्ता तमिलनाडु समेत पूरे दक्षिण भारत में इतना मुश्किल है?
यहीं पर पूरी कहानी का सबसे बुनियादी पहलू आता है. पहले बात तमिलनाडु की…
तमिलनाडु भारत का वो राज्य है जहां हिंदुत्व की राजनीति के सामने एक पूरी विचारधारात्मक दीवार खड़ी है- द्रविड़ आंदोलन की दीवार. 20वीं सदी की शुरुआत में पेरियार ई.वी. रामास्वामी के नेतृत्व में जो ‘आत्म-सम्मान आंदोलन’ शुरू हुआ, उसने धर्म, जाति और उत्तर भारतीय सांस्कृतिक वर्चस्व को एक साथ चुनौती दी. इस आंदोलन ने तमिल पहचान को हिंदू पहचान से इस कदर अलग कर दिया कि यहां का आम मतदाता मंदिर तो जाता है, लेकिन हिंदुत्व के राजनीतिक प्रोजेक्ट को संदेह से देखता है.
हिंदुत्व की जो धारणा उत्तर भारत में हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान के नारे पर चलती है, वह तमिल भाषा और संस्कृति के गर्व के आगे टिक नहीं पाती. द वायर की रिपोर्ट साफ कहती है कि बीजेपी भले ही बंगाल जैसे राज्यों को भेदने में कामयाब हो गई हो, लेकिन तमिलनाडु और केरल में उसे जो प्रतिरोध झेलना पड़ता है, वह महज राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक है. यहां की राजनीति में ‘उत्तर भारतीय थोपे जाने वाले मॉडल’ की जगह स्थानीय अस्मिता और सामाजिक न्याय का मुद्दा हमेशा हावी रहता है.
वहीं, दक्षिण भारत के ज्यादातर राज्यों में हिंदुत्व की राजनीति के सामने कई परतों वाली चुनौतियां हैं:
दक्षिण भारत में पिछड़ी जातियों, दलितों और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण और सामाजिक अधिकारों का आंदोलन बहुत मजबूत रहा है. बीजेपी का मुख्यधारा का हिंदुत्व एजेंडा अक्सर इसे कमजोर करने वाली ताकत के रूप में देखा जाता है.
दक्षिण भारत में हिंदी को लेकर एक स्वाभाविक प्रतिरोध रहा है. बीजेपी की हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान की राजनीति यहां उत्तर भारतीय सांस्कृतिक साम्राज्यवाद की तरह देखी जाती है.
तमिलनाडु में DMK-AIADMK, केरल में वामदल और कांग्रेस, आंध्र में TDP-YSR कांग्रेस और तेलंगाना में BRS-कांग्रेस जैसे दल इतने मजबूत हैं कि बीजेपी के लिए जगह बनाना बेहद कठिन हो जाता है.
ये सारी चुनौतियां मिलकर बीजेपी के लिए दक्षिण भारत को सबसे कठिन राजनीतिक भूभाग बनाती हैं.
पूरे दक्षिण में बीजेपी की असली कमजोरी क्या है?
पॉलिटिकल एक्सपर्ट अमिताभ तिवारी कहते हैं, ‘अगर पूरे दक्षिण भारत की तस्वीर को एक साथ जोड़कर देखें तो बीजेपी की सबसे बड़ी कमजोरी सिर्फ वैचारिक प्रतिरोध नहीं है, बल्कि संगठनात्मक कमजोरी और चेहरे की कमी है. उत्तर भारत में बीजेपी के पास नरेंद्र मोदी, योगी आदित्यनाथ, शिवराज सिंह चौहान जैसे कई बड़े क्षेत्रीय चेहरे हैं. लेकिन दक्षिण भारत में कर्नाटक को छोड़कर बाकी राज्यों में पार्टी के पास कोई ऐसा नेता नहीं है जो पूरे राज्य में पहचाना जाए और जिसकी स्वीकार्यता जातीय और सामाजिक सीमाओं को लांघ सके. दूसरी बड़ी कमजोरी है जमीनी संगठन की कमी. बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं का नेटवर्क खड़ा करने में बीजेपी दक्षिण भारत में लगातार पिछड़ी रही है.’
इसके अलावा स्थानीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़ने में नाकामी. बीजेपी का हिंदुत्व अक्सर एक उत्तर भारतीय राजनीतिक मॉडल की तरह दिखता है, जबकि दक्षिण भारत की अपनी समृद्ध आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं हैं. इनका राजनीतिक इस्तेमाल उसी भाषा और संदर्भ में होना चाहिए जो स्थानीय लोगों को अपना लगे.
तो क्या अन्नामलाई के बाद तमिलनाडु बीजेपी बिना चेहरे के हो गई है और दक्षिण की रणनीति क्या होगी?
अन्नामलाई के जाने के बाद बीजेपी के सामने तमिलनाडु में चेहरे का संकट गहरा गया है. पिछले कुछ सालों में अन्नामलाई ने जिस तरह राज्य भर में खुद को अकेले दम पर प्रोजेक्ट किया, वैसा कोई दूसरा नेता फिलहाल नजर नहीं आता. हालांकि, कुछ नामों की चर्चा जरूर है. डॉ. तमिलिसाई सुंदरराजन, जो तेलंगाना की राज्यपाल रह चुकी हैं और तमिलनाडु बीजेपी की पूर्व अध्यक्ष भी रहीं, एक अनुभवी और आक्रामक चेहरा हैं. दूसरा नाम एच. राजा का है, जो हिंदुत्व के मुखर चेहरे हैं, लेकिन विवादों के चलते उनको मौका मिलना मुश्किल है. तीसरी संभावना है पार्टी किसी पूरी तरह नए और युवा चेहरे पर दांव लगाए. लेकिन सच तो यह है कि अन्नामलाई जैसा ‘पैन-तमिल’ चेहरा फिलहाल पार्टी के पास नहीं है.
अमिताभ तिवारी का कहना है कि बीजेपी को अब अपनी पूरी दक्षिण भारत रणनीति पर नए सिरे से सोचना होगा. सबसे पहली जरूरत हर राज्य के लिए अलग-अलग रणनीति बनाने की है. कर्नाटक में जो फॉर्मूला काम कर गया, जरूरी नहीं कि वह तमिलनाडु या केरल में भी काम करे. तमिलनाडु में पार्टी को एक ऐसा चेहरा चाहिए जो पार्टी के राष्ट्रीय एजेंडे और स्थानीय द्रविड़ अस्मिता के बीच पुल बन सके, न कि दोनों को टकराए. केरल में बीजेपी को अल्पसंख्यक समुदायों के साथ संवाद का रास्ता खोलना होगा और सिर्फ हिंदुत्व के बजाय विकास और सुशासन के मुद्दों पर जोर देना होगा.
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में फिलहाल गठबंधन की राजनीति ही पार्टी के लिए आगे बढ़ने का रास्ता है. सबसे जरूरी बात, पार्टी को दक्षिण भारत में हिंदुत्व को एक आक्रामक उत्तर भारतीय राजनीतिक मॉडल की तरह नहीं, बल्कि स्थानीय मंदिर संस्कृति, संत परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत के साथ जोड़कर पेश करना होगा. तभी वह ‘दिल्ली का एजेंडा’ होने के आरोप से बच सकेगी.
तो क्या पूरे दक्षिण में बीजेपी का सफर पंक्चर है या हवा भरी जा सकती है?
पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई कहते हैं, ‘अन्नामलाई के इस्तीफे ने तमिलनाडु में बीजेपी की रफ्तार पर तो ब्रेक लगाया ही है, लेकिन पूरे दक्षिण भारत की तस्वीर को देखें तो यह कहना कि सफर पूरी तरह पंक्चर हो गया है, जल्दबाजी होगी. कर्नाटक में बीजेपी अब भी सत्ता के करीब है और कभी भी वापसी कर सकती है. तेलंगाना में पार्टी का ग्राफ लगातार ऊपर जा रहा है. केरल में पहली बार लोकसभा सीट जीतना एक बड़ी सेंध है. आंध्र प्रदेश में गठबंधन के जरिए पार्टी सत्ता का स्वाद चख रही है. लेकिन तमिलनाडु में बीजेपी के लिए हालात सबसे कठिन हैं.’
रशीद किदवई आगे कहते हैं कि बीजेपी अगर लंबी सांस लेकर, सही चेहरों और स्थानीय संस्कृति के प्रति सम्मान के साथ मेहनत करे, तो दक्षिण भारत में उसकी राह आसान हो सकती है. लेकिन अगर पार्टी ने दक्षिण के हर राज्य को उत्तर भारत की तर्ज पर जीतने की कोशिश जारी रखी, तो अन्नामलाई का जाना महज एक शुरुआत हो सकती है. फिलहाल, दक्षिण भारत में बीजेपी के लिए सबसे बड़ी लड़ाई विचारधारा की नहीं, बल्कि विश्वास और स्थानीय स्वीकार्यता की है. इसे जीतने में अभी बहुत लंबा रास्ता तय करना बाकी है.



