भारत में पिछले कुछ सालों में जिस तरह से Gen Z ने सड़कों से लेकर सोशल मीडिाय तक अपनी आवाज बुलंद की है, उसने राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी है.
2027 में सात राज्यों उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं.
इन सातों राज्यों में Gen Z यानी 18 से 29 साल के युवा वोटर्स की संख्या इतनी ज्यादा है कि वे अकेले दम पर चुनावी नतीजों की दिशा बदल सकते हैं. चुनाव में राजनीतिक पार्टियों की असली परीक्षा GenZ की ताकत को समझना और अपनी रणनीतियां बदलना होगी.
Gen Z को लेकर पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स अक्सर कहते थे कि यह पीढ़ी चुनावों में या तो वोट डालती नहीं है या फिर फिर ज्यादा गंभीर नहीं होती. लेकिन 2019 के बाद से देश में जिस तरह के युवा आंदोलन देखने को मिले हैं, उन्होंने यह सोच बदल दी है.
नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों से लेकर किसान आंदोलन में युवाओं की भागीदारी ने चौंका दिया. अग्निपथ योजना के खिलाफ सड़कों पर उतरे युवा, NEET और JPSC में पेपर लीक मामलों में छात्रों के गुस्से ने साबित कर दिया कि वह अब चुप नहीं बैठेंगे.
दि प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में Gen Z का विरोध किस तरह विधानसभा चुनाव में खेल बिगाड़ सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक युवा अब सिर्फ जाति और धर्म के नाम पर वोट करने को तैयार नहीं हैं. वे सीधे सवाल पूछ रहे हैं कि पिछले पांच साल में उन्हें नौकरी मिली या नहीं, महंगाई कम हुई या नहीं और पेपर लीक रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए गए. यही वजह है कि अब हर पार्टी Gen Z को साधने के लिए अलग टीमें बना रही है और चुनाव प्रचार का पूरा तरीका बदल रही है.
भारत में 18 से 29 साल की उम्र के मतदाताओं की संख्या करीब 40 करोड़ है. यह कुल मतदाताओं का लगभग 30-32 फीसदी है. चुनाव आयोग के मुताबिक, 2024 के लोकसभा चुनाव में पहली बार वोट देने वाले 18-19 साल के युवाओं की तादाद 2.3 करोड़ से ज्यादा थी. 20-29 साल के मतदाताओं की संख्या लगभग 18 करोड़ थी.
सबसे अहम बात यह है कि 2024 के चुनाव में 18-29 आयु वर्ग का मतदान प्रतिशत 67.8 फीसदी रहा, जो 2019 के 63.2 फीसदी से काफी ज्यादा था. यानी युवा अब वोट डालने भी जा रहे हैं, सिर्फ सोशल मीडिया पर पोस्ट नहीं कर रहे.
अब अगर बात करें बेरोजगारी की तो आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2023-24 के मुताबिक 15-29 साल के युवाओं में बेरोजगारी दर 10.2 फीसदी है. शिक्षित युवाओं में यह 18.5 फीसदी तक पहुंच जाती है. CMIE के ताजा आंकड़े मई 2026 में कुल बेरोजगारी 5.5 फीसदी और शहरी बेरोजगारी 6.6 फीसदी दिखा रहे हैं. इन्हीं हालात ने Gen Z को सड़कों पर उतरने पर मजबूर किया.
अग्निपथ योजना के खिलाफ 2022 में बिहार, यूपी, हरियाणा में हिंसक प्रदर्शन हुए, 2023-24 में लगातार पेपर लीक के खिलाफ छात्र सड़कों पर रहे और 2025-26 में बेरोजगारी के खिलाफ कई राज्यों में युवा रैलियां निकलीं. इन आंदोलनों ने राजनीतिक दलों को संदेश दिया कि Gen Z को अब सिर्फ नारों से बहलाया नहीं जा सकता.
2027 के सातों राज्यों के पिछले विधानसभा चुनावों के नतीजे देखें तो पता चलता है कि कई जगहों पर जीत का अंतर बेहद कम था:
यह आंकड़े साफ बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में जहां 30 फीसदी से ज्यादा मतदाता 18-29 उम्र के हैं, वहां 2022 में कई सीटों पर जीत का अंतर 5,000 से भी कम वोटों का था. अगर Gen Z का एक बड़ा हिस्सा किसी एक मुद्दे पर एकजुट होकर वोट करता है तो 50-60 सीटों का समीकरण बदल सकता है.
मणिपुर में तो 35 फीसदी से ज्यादा मतदाता युवा हैं और पिछले डेढ़ साल की जातीय हिंसा के बाद उनकी नाराजगी बेहद गहरी है. हिमाचल और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में भी युवा मतदाताओं की संख्या 31-32 फीसदी है. पलायन और बेरोजगारी बड़े मुद्दे हैं.
सात राज्यों में Gen Z मूड क्या कहता है?
हर राज्य में Gen Z के सामने अलग-अलग समस्याएं हैं और इसीलिए हर जगह राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है:
- उत्तर प्रदेश: 403 सीटों पर 2022 में बीजेपी ने 273 सीटें जीती थीं, लेकिन वोट शेयर 41.3 फीसदी था, जबकि सपा को 111 सीटों के साथ 36.8 फीसदी वोट मिले थे. पिछले पांच सालों में यूपी में पेपर लीक के दर्जनों मामले सामने आए. इसमें यूपी पुलिस कांस्टेबल भर्ती 2024 का पेपर लीक, UPTET और TET में गड़बड़ी और रोजगार मेलों में नौकरी न मिलना जैसे मामले शामिल हैं. इसके चलते Gen Z की नाराजगी सीधे सरकार के खिलाफ रही है.
- गुजरात: 2022 में बीजेपी ने रिकॉर्ड 156 सीटें जीती थीं और वोट शेयर 52.5 फीसदी था. राज्य में बेरोजगारी दर भले ही राष्ट्रीय औसत से कम है, लेकिन शिक्षित युवाओं में निराशा है. 2024 में हुई भर्ती परीक्षाओं में देरी और पेपर लीक की खबरों ने Gen Z का ध्यान खींचा.
- पंजाब: 2022 में आम आदमी पार्टी ने 117 में से 92 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी. इसके बावजूद पिछले चार सालों में नशे की समस्या और कम हुई, न ही युवाओं को बड़े पैमाने पर रोजगार मिला. पंजाब का Gen Z कनाडा-ऑस्ट्रेलिया जाने को मजबूर है और जो रह गए हैं वे नशे की गिरफ्त में हैं. यह नाराजगी आप सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है. कांग्रेस और अकाली दल इसी मुद्दे को भुनाने की कोशिश करेंगे.
- उत्तराखंड: 2022 में बीजेपी ने 70 सीटों में से 47 सीटें जीती थीं. कांग्रेस को 19 सीटें मिली थीं. राज्य का सबसे बड़ा मुद्दा पहाड़ों से पलायन और बेरोजगारी है. PLFS के आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड में 15-29 आयु वर्ग की बेरोजगारी दर 17.8 फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा है. Gen Z सरकार से पूछ रहा है कि जब नौकरियां नहीं हैं तो हम पहाड़ में क्यों रुकें?
- हिमाचल प्रदेश: 68 सीटों पर 2022 में कांग्रेस ने 40 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी और बीजेपी को 25 सीटें मिली थीं. यहां हर चुनाव में सत्ता बदलने की परंपरा रही है, लेकिन इस बार Gen Z की भूमिका ज्यादा अहम होगी. राज्य में बेरोजगारी 15 फीसदी से ऊपर है और सरकारी नौकरियों की भर्ती प्रक्रिया धीमी है. कांग्रेस सरकार के खिलाफ युवा नाराजगी बीजेपी के लिए मौका बन सकती है.
- गोवा: राज्य में 40 सीटें हैं और 2022 में बीजेपी ने 20 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर सरकार बनाई थी. कांग्रेस को 11 और आप को 2 सीटें मिलीं. गोवा के Gen Z के लिए पर्यटन पर आधारित अर्थव्यवस्था में रोजगार की कमी और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट से पर्यावरण को खतरा बड़े मुद्दे हैं. यहां 25.5 फीसदी मतदाता युवा हैं और 75 फीसदी तक मतदान करते हैं, इसलिए थोड़ी सी भी नाराजगी बड़ा उलटफेर कर सकती है.
- मणिपुर: 60 सीटों वाले राज्य में 2022 में बीजेपी ने 32 सीटें जीती थीं, लेकिन पिछले डेढ़ साल से राज्य जातीय हिंसा से जूझ रहा है. यहां के Gen Z ने अपने घर, पढ़ाई और नौकरियां सब कुछ खोया है. 35 फीसदी से ज्यादा मतदाता युवा हैं और उनका गुस्सा सीधे सत्ता पक्ष के खिलाफ है. 2027 का चुनाव मणिपुर के युवाओं के लिए अस्तित्व का सवाल बन चुका है.
राजनीतिक दलों की रणनीति में पांच बड़े बदलाव
पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई के मुताबिक, Gen Z के इन आंदोलनों और आंकड़ों को देखते हुए सभी प्रमुख पार्टियों ने अपनी चुनावी रणनीति में बड़े बदलाव किए हैं:
- डिजिटल कैंपेन: बीजेपी ने 2024 लोकसभा चुनाव के बाद अपनी IT सेल का बजट तीन गुना कर दिया और हर राज्य में सोशल मीडिया वॉर रूम बनाए हैं. कांग्रेस ने ‘यूथ कांग्रेस’ को पूरी तरह डिजिटल कर दिया है और इंस्टाग्राम रील्स के जरिए राहुल गांधी के भाषणों को Gen Z फ्रेंडली बनाकर परोस रही है. आम आदमी पार्टी ने तो अपने सारे चुनावी कैंपेन व्हाट्सएप चैनल्स और यूट्यूब शॉर्ट्स पर शिफ्ट कर दिए हैं. पार्टियां अब बड़े-बड़े पोस्टर-बैनर से ज्यादा पैसा इनफ्लुएंसर मार्केटिंग पर खर्च कर रही हैं.
- घोषणापत्रों का बदलेगा चेहरा: अब तक के चुनावी घोषणापत्रों में जाति, धर्म और मुफ्त की योजनाओं का जिक्र होता था. 2027 के लिए हर पार्टी रोजगार सृजन, स्टार्टअप इकोसिस्टम, डिजिटल स्किल ट्रेनिंग और मानसिक स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को केंद्र में रखेगी. यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘नई युवा नीति’ को लेकर उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की और अधिकारियों को निर्देश दिए कि 16 से 35 वर्ष के युवाओं की राय लेकर उनकी जरूरतों के अनुरूप नीति तैयार की जाए.
- युवाओं को तरजीह: मीडिया रिपोर्ट्स में चर्चा है कि 2027 के चुनावों में बीजेपी हर राज्य में कम से कम 30 फीसदी टिकट 40 साल से कम उम्र के लोगों को देगी. कांग्रेस ने भी यूपी और गुजरात में अपने 25-30 साल के नेताओं पर फोकस करना शुरू कर दिया है. आप भी पंजाब में घोषणा कर सकती है कि 35 साल से कम उम्मीदवारों को मौका दिया जा सकता है.
- आंदोलनों पर सरकारों का रुख: पहले जहां युवा आंदोलनों को दबाने के लिए पुलिस बल का इस्तेमाल होता था, वहीं अब सरकारें पहले ही बातचीत का रास्ता चुन रही हैं. पेपर लीक मामलों में यूपी और गुजरात सरकारों ने तुरंत सख्त कानून बनाए और जांच एजेंसियों को मामला सौंपा. NEET पेपर लीक में सरकार ने स्पेशल टीम बनाई और जांच एजेंसियों को जिम्मेदारी सौंपी. मध्य प्रदेश में भी Gen Z की मांगें मान ली गईं. यह सब चुनाव से पहले Gen Z की नाराजगी कम करने की कोशिश का हिस्सा है.
- काम का हिसाब: Gen Z वोटर पार्टी के नारों से ज्यादा उसके काम पर ध्यान देता है, इसलिए बीजेपी हो या कांग्रेस हर पार्टी अब अपना रिपोर्ट कार्ड तैयार कर रही है और सोशल मीडिया पर प्रमोट कर रही है. बीजेपी यूपी में एक्सप्रेसवे और एयरपोर्ट की तस्वीरें दिखाकर विकास का दावा कर रही है, तो सपा पुरानी सरकार की भर्तियों के आंकड़े याद दिला रही है.
तो क्या 2027 में Gen Z इतिहास रचेगा?
चुनाव आयोग के मुताबिक, 2027 के इन सातों राज्यों में कुल मिलाकर करीब 23 करोड़ मतदाता होंगे. इसमें करीब 22% Gen Z वोटर्स होने का अनुमान है. यह संख्या इतनी बड़ी है कि अगर युवा पूरी तरह एकजुट होकर किसी एक मुद्दे पर वोट करें तो सत्ता परिवर्तन तय है.
रशीद किदवई मानते हैं, ‘Gen Z एक जैसा वोट नहीं करता, यानी शहरी और ग्रामीण युवाओं की समस्याएं अलग हैं, लड़के और लड़कियों की प्राथमिकताएं अलग हैं और शिक्षित-अशिक्षित का फर्क भी मायने रखता है. इसके बावजूद बेरोजगारी, पेपर लीक और महंगाई जैसे मुद्दों पर Gen Z की एक आम सहमति बनती दिख रही है.’
2024 के लोकसभा चुनाव में युवा मतदान प्रतिशत 65 फीसदी तक पहुंचा और 2027 में अगर यह आंकड़ा 70-72 फीसदी को छू लेता है तो यह भारतीय चुनावी इतिहास का नया रिकॉर्ड होगा. पार्टियों ने अपनी तरफ से पूरी तैयारी कर ली है. असली सवाल यह है कि क्या Gen Z 2027 के बूथ तक अपना गुस्सा और अपनी उम्मीदें लेकर पहुंचेगा? इसका जवाब सिर्फ चुनाव नतीजे ही देंगे, लेकिन इतना तय है कि यह पीढ़ी अब किसी भी सरकार को चैन से नहीं बैठने देगी.



