केंद्रीय जांच एजेंसी ED यानी प्रवर्तन निदेशालय के हैदराबाद जोनल ऑफिस ने मनी लॉन्ड्रिंग जांच के तहत पटियाला, चंडीगढ़ और पुणे में तलाशी अभियान चलाया। जांच के दौरान US नागरिकों को निशाना बनाकर ठगी और जबरन वसूली करने वाले संगठित फर्जी कॉल सेंटर नेटवर्क का खुलासा हुआ है।
इस मामले में ईडी की तफ्तीश में सामने आया है कि ये कॉल सेंटर कॉरपोरेट कंपनियों की तरह संचालित किए जा रहे थे। इनमें बाकायदा कंप्यूटर, हेडसेट, डायलर और VoIP सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा था। आरोप है कि नेटवर्क के मास्टरमाइंड गुजरात के अहमदाबाद से इन कॉल सेंटरों को रिमोट तरीके से नियंत्रित कर रहे थे।
पटियाला के दो कॉल सेंटरों में 194 कर्मचारी
ED के मुताबिक, पटियाला के अर्बन एस्टेट फेज-II में DM Web Solutions के नाम से चल रहे दो कॉल सेंटरों में कुल 194 लोग काम कर रहे थे। इन कॉल सेंटरों का संचालन और नियंत्रण अहमदाबाद के हर्षिल रावल और रवि रामी तथा उनके सहयोगियों के हाथ में था। वहीं, पुणे के हिंजवड़ी फेज-II स्थित Gera’s Imperial Complex में चल रहे कॉल सेंटर में 22 लोग काम कर रहे थे। इसे अहमदाबाद के विपुल कोटाडिया और उसके सहयोगियों द्वारा संचालित किए जाने की जानकारी सामने आई है।
नागालैंड, मिजोरम और मणिपुर से युवाओं की भर्ती
जांच में पता चला कि कॉल सेंटरों में काम करने वाले कई कर्मचारियों की पहचान स्थानीय नेटवर्क के जरिए की गई थी। इनमें बड़ी संख्या में नागालैंड, मिजोरम और मणिपुर जैसे पूर्वोत्तर राज्यों से आए लोग शामिल थे। ईडी के मुताबिक, इनमें से ज्यादातर कर्मचारी निम्न आय वर्ग और बेरोजगार पृष्ठभूमि से थे। उन्हें करीब 30 हजार से 50 हजार रुपये मासिक वेतन दिया जाता था। इसके अलावा पीड़ितों से सफलतापूर्वक रकम वसूलने पर इंसेंटिव भी दिया जाता था।
ऐसे चलता था US नागरिकों को ठगने का पूरा खेल
जांच में फर्जी कॉल सेंटर के काम करने का पूरा तरीका सामने आया है। सबसे पहले मास्टरमाइंड कथित तौर पर अमेरिकी नागरिकों का डेटा हासिल करते थे। इसके बाद सिस्टम के जरिए बड़े पैमाने पर स्पैम ई-मेल या कंप्यूटर पर पॉप-अप अलर्ट भेजे जाते थे। इन फर्जी अलर्ट में पीड़ितों को बताया जाता था कि उनके कंप्यूटर में वायरस है, बैंक अकाउंट खतरे में है या उनकी पहचान और कानूनी स्थिति से जुड़ी कोई गंभीर समस्या है। इसके साथ एक फर्जी टोल-फ्री हेल्पलाइन नंबर दिया जाता था। पीड़ित जब उस नंबर पर फोन करता था तो कॉल सेंटर में उसे अलग-अलग स्तर के कर्मचारियों के पास भेजा जाता था।
Opener से Banker और फिर Closer
इस फर्जीवाड़े को तीन चरणों में अंजाम दिया जाता था, उसे हम इस तरह से समझ सकते हैं:-
- पहला चरण:- Opener/Dialler.. शुरुआत में Opener पीड़ित से बात करता था। वह खुद को Amazon, Microsoft, PayPal जैसी कंपनियों के टेक्निकल सपोर्ट कर्मचारी के तौर पर पेश कर सकता था। उसका मकसद पीड़ित का भरोसा हासिल करना और उसकी चिंता का स्तर समझना होता था।
- दूसरा चरण- Banker: इसके बाद Banker की भूमिका आती थी। वह कथित तौर पर पीड़ित के बैंक अकाउंट, उपलब्ध रकम और चल-अचल संपत्तियों के बारे में जानकारी हासिल करता था, ताकि पैसे वसूलने का तरीका तय किया जा सके।
- तीसरा चरण- Closer:- इसके बाद कॉल Closer को ट्रांसफर की जाती थी। Closer पीड़ित पर दबाव बनाने के लिए खुद को अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजेंसी, बैंक के फ्रॉड डिविजन या किसी सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर पेश करता था। पीड़ित को तत्काल भुगतान नहीं करने पर कानूनी या आर्थिक नुकसान की धमकी दी जाती थी।
Gift Card, कैश और गोल्ड के जरिए वसूली
ED की जांच में सामने आया कि पीड़ितों से रकम हासिल करने के लिए पारंपरिक बैंकिंग चैनल के बजाय अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया जाता था। पीड़ितों को Apple और Google Play जैसे गिफ्ट कार्ड खरीदने, कैश भेजने या सोना खरीदने के लिए मजबूर किया जाता था। कुछ मामलों में अमेरिका में मौजूद कूरियर के जरिए पीड़ितों से कैश या गोल्ड कलेक्ट करने की व्यवस्था भी की जाती थी। इसके बाद रकम को क्रिप्टोकरेंसी, हवाला और अन्य माध्यमों के जरिए भारत सहित दूसरे देशों में ट्रांसफर कर कथित तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग की जाती थी।
Cloud के जरिए रिमोट कंट्रोल
ED के अनुसार, पटियाला और पुणे के कॉल सेंटरों में लगे कंप्यूटरों को मास्टरमाइंड Cloud के जरिए रिमोट तरीके से नियंत्रित करते थे। टारगेट का नाम और संपर्क विवरण भी कर्मचारियों को ऑनलाइन उपलब्ध कराया जाता था। कॉल-ब्लास्ट की शुरुआती प्रक्रिया भी मास्टरमाइंड द्वारा नियंत्रित सिस्टम और IT सपोर्ट टीम के जरिए संचालित की जाती थी। इसके बाद Opener, Banker और Closer की पूरी प्रक्रिया के जरिए पीड़ित से रकम वसूलने का काम होता था।
गुजरात के अहमदाबाद से होता था रकम का प्रोसेसिंग और लेयरिंग
जांच में सामने आया कि कथित तौर पर हर्षिल रावल और रवि रामी पीड़ितों से हासिल रकम के आगे के ट्रांसफर और प्रोसेसिंग की व्यवस्था करते थे। ED के मुताबिक, अपराध से हासिल रकम को विभिन्न माध्यमों से भारतीय मुद्रा में बदला जाता था। इसके बाद इस पैसे का इस्तेमाल चल-अचल संपत्तियां खरीदने में किया जाता था या रकम को क्रिप्टो/बिटकॉइन के रूप में रखा जाता था। कुछ रकम देश के बाहर भी रखे जाने की जानकारी जांच में सामने आई है।
Digital Evidence से सामने आई पूरी चेन
ED की तलाशी के दौरान बड़ी मात्रा में डिजिटल साक्ष्य बरामद हुए हैं। इन साक्ष्यों से कथित तौर पर हवाला ऑपरेटरों, अंगड़िया फर्मों और अमेरिका में पीड़ितों से वसूली गई रकम के कलेक्शन में शामिल लोगों की भूमिका सामने आई है। जांच एजेंसी के मुताबिक, डिजिटल एविडेंस से भारत के अलग-अलग हिस्सों में संचालित फर्जी कॉल सेंटरों के बीच एक संगठित नेटवर्क की जानकारी मिली है।



