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घर खरीदने का बना रहे हैं प्लान, ये 5 बैंक दे रहें हैं सबसे सस्ता होम लोन

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होम लोन बड़ा वित्तीय फैसला होता है। अधिकांश लोग होम लोन 20 साल के लिए लेते हैं। ऐसे में ब्याज दर में मामूली कमी भी बड़ी बचत करा देता है। अगर आप होम लोन की तैयारी में है तो ब्याज दर की तुलना जरूर कर लें।

हम आपको 5 सबसे सस्ता होम लोन देने वाले बैंक का ब्योरा दे रहे हैं। आइए जानते हैं कि कौन-कौन बैंक सबसे सस्ता होम लोन दे रहे हैं।

बैंक के नामहोम लोन पर न्यूनतम ब्याज दरअधिकतम ब्याज दर
एचडीएफसी बैंक8.45%9.85%
इंडसइंड बैंक8.5%9.75%
इंडियन बैंक8.5%9.9%
पंजाब नेशनल बैंक8.6%9.45%
बैंक ऑफ बड़ौदा8.6%10.3%

होम लोन पर टैक्स छूट का भी लाभ

आयकर कानून के तहत होम लोन पर भुगतान किए गए ब्याज पर 2 लाख की सीमा तक आयकर छूट का लाभ मिलता है। वहीं, मूलधन में किए गए भुगतान पर आयकर की धारा 80सी के तहत 1.5 लाख रुपये की छूट मिलती है। जानकारों का कहना है कि किसी भी बैंक से होम लोन लेने से पहले मोलतोल करना बिल्कुल न भूलें। अगर आपका सिबिल स्कोर बेहतर है तो बैंक आपको सस्ता होम लोन दे सकता है। साथ ही वह प्रोसेसिंग फीस भी माफ कर देगा। इस तरह आप अच्छी बचत कर पाएंगे।

उत्तराखंड-हिमाचल में तबाही के बाद अब यूपी-बिहार में दिखेगा मॉनसून का रौद्र रूप! वेस्टर्न डिस्टर्बेंस से आफत का अलर्ट

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हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में मॉनसून तबाही बनकर बरस रहा है. बाढ़-बारिश के अलावा दरकते पहाड़ और चटकती चट्टानें लोगों को दहशत में डाल रही हैं, कई जगहों पर भूस्खलन ने रास्तों को बंद कर दिया है और कई जगह पर्यटक जहां-तहां फंसे हुए हैं.

एक तरफ जहां पहाड़ी राज्य मौसम की मार से कराह रहे हैं. तो वहीं, मैदानी राज्य पंजाब और हरियाणा में भी बादल कहर बनकर बरसे हैं. पंजाब में जो हालात हैं, ऐसे हालात शायद ही पहले कभी देखे गए हों, मोहाली और चंडीगढ़ में बाढ़ की तस्वीरें परेशान कर रही हैं. हरियाणा के भी कई इलाके पानी-पानी हैं. अब उत्तर प्रदेश और बिहार में मॉनसून का रौद्र रूप नजर आने वाला है.

इन राज्यों में दिखेगा मॉनसून का रौद्र रूप

मौसम विभाग के मुताबिक, पूर्वोत्तर राजस्थान और उससे सटे उत्तर पश्चिम मध्य प्रदेश क्षेत्र पर एक चक्रवाती परिसंचरण बना हुआ है, जो समुद्र तल से 5.8 किमी ऊपर तक फैला हुआ है. वहीं, पश्चिमी विक्षोभ एक ट्रफ के रूप में मौजूद है. इससे कई राज्यों में भारी बारिश की संभावना बन रही है.

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आईएमडी के मुताबिक, समुद्र तल पर मॉनसून ट्रफ रेखा अब जैसलमेर, सीकर, उरई से होकर सुल्तानपुर, पटना, मालदा और वहां से पूर्व की ओर अरुणाचल प्रदेश तक फैली हुई है. इसके असर से पूर्वोत्तर राजस्थान और पश्चिम मध्य प्रदेश के इलाकों से बढ़ते हुए उत्तर प्रदेश और बिहार में मध्यम से भारी बारिश के साथ कुछ स्थानों पर बहुत भारी बारिश हो सकती है. इससे माना जा रहा है कि यूपी और बिहार में अब मॉनसून का रोद्र रूप नजर आने वाला है. यूपी और बिहार के अलावा विदर्भ, झारखंड और ओडिशा में भी कुछ अच्छी बारिश हो सकती है.

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उत्तर प्रदेश में भारी बारिश का अलर्ट!

मौसम विभाग के पूर्वानुमान की बात करें तो उत्तर प्रदेश के लखनऊ में 15 जुलाई तक भारी बारिश का अलर्ट का है. आज और कल (12-13 जुलाई) लखनऊ में आमतौर पर आसमान में बादल छाए रहेंगे और एक या दो बार बारिश या गरज के साथ बौछारें पड़ेंगी. लेकिन 14 और 15 जुलाई को यहां भारी बारिश देखने को मिल सकती है. इसके बाद भी तादाद में कुछ कमी के साथ बारिश की गतिविधियां जारी रहेंगी. इस दौरान न्यूनतम तापमान 26-27 के बीच रहेगा और अधिकतम तापमान 33 से 34 के बीच दर्ज किया जाएगा. बता दें कि यूपी के कई इलाकों में 11 जुलाई से तेज बारिश का सिलसिला जारी है.

बिहार में फिर बाढ़ का खतरा!

बिहार की बात करें तो यहां मॉनसून में हर बार बाढ़ का कहर देखने को मिलता है. तेज बारिश के अलर्ट के साथ एक बार फिर बाढ़ की संभावना बनी हुई है. मौसम के पूर्वानुमान के मुताबिक, बिहार की राजधानी पटना में आज से 16 जुलाई तक भारी बारिश की संभावना है. 17 जुलाई से बारिश में कमी देखने को मिलेगी लेकिन ये सिलसिला जारी रहेगा. बिहार में हर साल मॉनसून में बाढ़ का कहर देखने को मिलता है. ऐसे में इस बार एक बार फिर यहां भारी बारिश के अलर्ट के चलते बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है.

कैसी हैं मौसमी गतिविधियां?

मौसम विभाग के मुताबिक, पूर्वोत्तर राजस्थान और उससे सटे उत्तर पश्चिम मध्य प्रदेश क्षेत्र पर एक चक्रवाती परिसंचरण के रूप में बना हुआ है, जो समुद्र तल से 5.8 किमी ऊपर तक फैला हुआ है. औसत समुद्र तल पर मॉनसून ट्रफ अब जैसलमेर, सीकर, उरई, सुल्तानपुर, पटना, मालदा से होकर गुजर रही है और वहां से पूर्व की ओर अरुणाचल प्रदेश तक रहेगी, ये औसत समुद्र तल से 0.9 किमी ऊपर तक फैली हुई है.

इसके अलावा पश्चिमी विक्षोभ एक गर्त के रूप में अब समुद्र तल से 3.1 और 9.5 किमी ऊपर के बीच देखा जा रहा है, जिसकी धुरी समुद्र तल से 5.8 किमी ऊपर है और अब लगभग 68° पूर्व देशांतर के साथ 28° उत्तर अक्षांश के उत्तर में चलती है. वहीं, एक चक्रवाती परिसंचरण दक्षिण हरियाणा और आस-पास के क्षेत्र में समुद्र तल से 1.5 किमी ऊपर स्थित है. इसके असर से पूर्वोत्तर राजस्थान से अरुणांचल प्रदेश तक बढ़ते हुए प्रभावित राज्यों में भारी बारिश देखने को मिल सकती है, जिसमें राजस्थान, मध्य प्रदेश के इलाके, यूपी, बिहार, सिक्किम और अरुणांचल प्रदेश के भारी से भारी बारिश का अंदेशा है.

अमित शाह से मुलाकात करेंगे अजित पवार-प्रफुल्ल पटेल, NCP को मिल सकते हैं 4 मंत्री पद

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महाराष्ट्र में अजित पवार के एकनाथ शिंदे सरकार में शामिल होने के 10 दिन बाद भी उन्हें और उनके समर्थकों को विभाग नहीं मिल पाए हैं. विभाग बंटवारे के मुद्दे पर बीजेपी, शिवसेना (शिंदे गुट) और एनसीपी (अजित पवार गुट) में मंथन का दौर जारी है.

मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस और अजित पावर में भी तीन दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन कोई हल निकलता नहीं दिख रही है. इसी बीच अब अजित पवार और प्रफुल्ल पटेल ने दिल्ली का रुख किया है. बताया जा रहा है कि वे यहां केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात करेंगे.

महाराष्ट्र में कैबिनेट विस्तार को लेकर जारी गतिरोध को खत्म करने के लिए एकनाथ शिंदे ने मंगलवार को देवेंद्र फडणवीस और अजित पवार के साथ अपने आवास पर बैठक की. सूत्रों के मुताबिक, सीएम एकनाथ शिंदे कैबिनेट विस्तार के बाद ही विभागों के बंटवारे की घोषणा पर अड़े हैं.

2 जुलाई को अजित पवार एनसीपी चीफ शरद पवार से बगावत कर शिंदे सरकार में शामिल हो गए. उन्हें सरकार में डिप्टी सीएम बनाया गया है. इसके अलावा उनके 8 विधायकों ने भी मंत्री पद की शपथ ली थी. हालांकि, अजित समेत किसी भी नेता को विभाग नहीं मिले हैं. ऐसे में अजित पवार अब अपनी पार्टी के नेताओं के लिए प्राथमिकता के आधार पर पोर्टफोलियो मांग रहे हैं.

NCP को मिल सकते हैं चार मंत्री पद

महाराष्ट्र में कुल 42 मंत्री पद हैं. इनमें से 14 अभी खाली हैं. सूत्रों के मुताबिक, अजित पवार को चार मंत्री पद दिए जा सकते हैं. जबकि बीजेपी और शिंदे गुट को 5-5 मंत्री पद मिलेंगे. हालांकि, बीजेपी विधानसभा मानसून सत्र के बाद विस्तार पर जोर देने को तैयार है. ऐसा इसलिए है क्योंकि जब से एनसीपी को राज्य मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, तब से बड़ी संख्या में शिवसेना और भाजपा के असंतुष्ट विधायकों की नजर मंत्री पद पर है.

सूत्रों ने यह भी संकेत दिया है कि अजित पवार वित्त, ऊर्जा, आवास और जल विभाग मांग रहे हैं. हालांकि, एकनाथ शिंदे किसी भी शिवसेना के मौजूदा मंत्री को हटाने या विभाग बदलने के पक्ष में नहीं हैं. सूत्रों ने बताया कि अटकलें यह भी हैं कि भाजपा वरिष्ठ मंत्रियों को हटा सकती है और उन्हें महत्वपूर्ण संगठनात्मक पद देने के पक्ष में नहीं है. ऐसे में पार्टी को असंतोष की उम्मीद है. ऐसे में बीजेपी आगामी चुनावों से पहले विस्तार में देरी के पक्ष में है.

एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में अपने पांव क्यों पसार रहा है NATO? क्या है रणनीति और भारत के लिए क्या हैं इसके मायने

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यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद ग्लोबल हालात बदले हैं. अब दुनिया के दिग्गज संगठनों की बैठक और उससे जुड़ी हलचलों पर रणनीतिकारों और टिप्पणीकारों की पैनी नजर रहती है. मंगलवार को लिथुआनिया में शुरू हुए नाटो (NATO) शिखर सम्मेलन भी कूटनीतिक विशेषज्ञों और स्ट्रैटेजिक एक्सपर्ट की निगाहों से बचा नहीं है.

इस सम्मेलन में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा रूस के खिलाफ यूक्रेन को नाटो द्वारा सैन्य समर्थन देना है. इसके अलावा यूक्रेन को नाटो की मेंबरशिप देने पर भी चर्चा हो रही है. लेकिन इससे इतर नाटो सम्मेलन के एक ऐसे मुद्दे ने विशेषज्ञों का ध्यान खींचा है जिसका हित भारत और एशिया-पैसिफिक से जुड़ा है.

इस बार के एशिया पैसिफिक सम्मेलन में विशेष रुप से आमंत्रित एशिया-प्रशांत के चार नेताओं की मौजूदगी चर्चा का विषय है. ये नेता हैं- ऑस्ट्रेलियाई प्रधान मंत्री एंथनी अल्बनीस, न्यूजीलैंड के प्रधान मंत्री क्रिस हिपकिंस, जापानी प्रधान मंत्री फुमियो किशिदा और दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति यूं सुक येओल.

ये लगातार दूसरी बार है कि ये चार नेता इस सम्मेलन में मौजूद हैं. पिछले साल मैड्रिड में भी इन चार नेताओं ने अपनी मौजूदगी से लोगों का ध्यान खींचा था. हालांकि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में नाटो का आउटरीच प्रयास अभी भी प्रारंभिक चरण में हैं, लेकिन नाटो की इन कोशिशों की दुनिया के कुछ नेताओं ने तीखी आलोचना की है. नाटो की इस कोशिश का चीन ने सबसे ज्यादा विरोध किया है और कहा है कि बीजिंग के अधिकारों के लिए खतरा पैदा करने वाली किसी भी कार्रवाई का कड़ा जवाब दिया जाएगा.

वहीं पूर्व ऑस्ट्रेलियाई प्रधान मंत्री पॉल कीटिंग ने एशिया पैसिफिक में पैर पसारने की नाटो की कोशिशों के लिए NATO के महासचिव स्टोलटेनबर्ग को “सर्वोच्च मूर्ख” कहा था. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन कथित तौर पर टोक्यो में प्रस्तावित नाटो कार्यालय खोलने के विरोध में हैं.

अभी नाटो का पूरा फोकस यूक्रेन पर है, बावजूद इसके इसका एशिया-पैसिफिक क्षेत्र में रूचि लेना कुछ सवाल खड़े करता है. ये प्रश्न ये है कि ये चार नेता यूरोपीय और उत्तरी अमेरिकी देशों के शिखर सम्मेलन में नियमित रूप से क्यों शामिल हो रहे हैं? बता दें कि ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान और दक्षिण कोरिया ये चारों देश एशिया प्रशांत के देश हैं.

सबसे पहले ये जानना जरूरी है कि एशिया पैसिफिक कहते किसे हैं. नाम के अनुसार ही हिंद महासागर (Indian Ocean) और प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के कुछ भागों को मिलाकर जो समुद्र का एक हिस्सा बनता है, उसे हिंद प्रशांत क्षेत्र (Indo-Pacific Area) कहते हैं. सबसे पहली बात यह है कि ये चारों देश यूक्रेन पर रूसी हमले का विरोध करने वाले प्रमुख देशों में शामिल रहे हैं. इसलिए नाटो में इनकी मौजूदगी जहां यूक्रेन पर चर्चा हो रही है, बेहद लाजिमी है.

बता दें कि नाटो ने पिछले साल अपने एक अहम रणनीतिक दस्तावेज में चीन की महात्वाकांक्षा को NATO देशों की सुरक्षा के लिए सबसे ज्यादा चुनौतीपुर्ण बताया था. इस दस्तावेज में चीन और रूस के बीच की बढ़ती नजदीकियों की भी चर्चा की गई थी जिसे नाटो कथित तौर पर अंतरराष्ट्रीय वर्ल्ड ऑर्डर के लिए खतरा मानता है.

यही वजह है कि नाटो इस क्षेत्र में अपनी साझेदारियां मजबूत कर रहा है और आवश्यकतानुसार नई दोस्ती बना भी रहा है. और ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान और दक्षिण कोरिया एशिया-पैसिफिक के ऐसे देश हैं जो नाटो के साथ अपने संबंधों को मजबूत करना चाहते हैं. इन चार देशों में जापान और ऑस्ट्रेलिया NATO के साथ अपने संबंधों को नई ऊंचाई तक ले जाने के लिए ज्यादा उत्सुक दिखते हैं. जापान की मीडिया के अनुसार इसके लिए इन दोनों देशों ने नाटो के साथ ITPP (Individually Tailored Partnership Program) का खाका तैयार किया है.

न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया भी गठबंधन के साथ अपने समझौतों को अंतिम रूप देने के लिए काम कर रहे हैं.

ये चारों देश नाटो के साथ समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, अंतरिक्ष और एआई पर काम करेंगे.

भारत के लिए क्या है मायने?

भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का अहम खिलाड़ी है. भारत पूर्वी एशियाई देशों के साथ व्यापार, आर्थिक विकास तथा समुद्री सुरक्षा में भागीदारी के लिये इच्छुक है. महाशक्ति के तौर पर उभर रहा भारत इस क्षेत्र की अवसरों का इस्तेमाल करते हुए चीन विस्तारवाद का डटकर मुकाबला करना चाहता है और चीन के प्रभाव को काउंटर बैलेंस करने के लिए अमेरिका की मदद चाहता है. लेकिन भारत कतई नहीं चाहता है कि अमेरिका अपने एजेंडे को बढ़ाने के लिए नई दिल्ली का इस्तेमाल करे. इसलिए इस क्षेत्र में भारत को फूंक-फूंक कर और कूटनीतिक प्रभावों को तोल तोल कर अपने कदम आगे बढ़ाने पड़ रहे हैं.

भारत इस क्षेत्र में अपना प्रभुत्व कायम करने के साथ ही शांति, स्थिरता तथा मुक्त व्यापार को बढ़ावा देने का पक्षधर है. लेकिन इस क्षेत्र में चीन की मौजूदगी भारत के लिए चिंता की बात है. चीन स्ट्रिंग ऑफ पर्ल के जरिए भारत को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है.

ऐसी स्थिति में जब नाटो ने एशिया पैसिफिक के चार देशों को अपने शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया है तो भारत इस घटनाक्रम को सधी नजरों से देख रहा है. बता दें कि अमेरिका इस बात के संकेत देता रहा है कि NATO और भारत के बीच संबंध और भी प्रगाढ़ हो सकते हैं. इसी साल अप्रैल में NATO में अमेरिकी स्थायी प्रतिनिधि जूलियन स्मिथ ने कहा था कि अगर भारत सरकार मांग करती है तो नाटो का दरवाजा भारत के साथ अधिक जुड़ाव के लिए खुला है. लेकिन NATO के साथ भारत का किसी भी तरह का सुरक्षा सहयोग रूस के साथ भारत के संबंधों पर गहरा असर डाल सकता है.

देश के राज्यों की भांग की खेती को वैद्य करने की खुलकर मांग; क्या हैंं न‍ियम, वजह? जान‍िए

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भांग, गांजा और चरस और इससे होने वाले दुष्पर‍िणामों से हममें से ज्यादातर लोग वाक‍िफ ही होंगे, लेकिन कई देशों के बाद अब भारत के कुछ राज्यों में भी भांग की खेती को वैध करने की पुरजोर मांग की जा रही है.

कई देशों में इसे वैद्य घोष‍ित क‍िया जा चुका है. यहां सवाल उठता है कि आखिर भांग का पौधा दुनिया के ज्यादातर देशों में क्यों बैन है? और यदि इसके भारी नुकसान हैं तो इसे लीगल करने की मांग क्यों उठने लगी है. आइये विस्तार से समझते है.

भांग, गांजा और चरस, तीनों में क्या कनेक्शन?

भांग की खेती को लीगल करने की मांग क्यों?

भांग की खेती की हिमायत करने वाले हिमाचल प्रदेश में कुल्लू से कांग्रेस विधायक सुंदर सिंह ठाकुर का कहना है कि राज्य से भारी मात्रा में भांग की तस्करी की जाती है. यदि इसे वैध कर दिया जाता है तो कैंसर के जैसी कई बीमार‍ियों की मेडिसिन में इस्तेमाल क‍िया जा सकेगा. साथ में राज्य की आय भी बढ़ेगी. बता दें कि कोई पहला राज्य नहीं है जो इसे वैध करने की मांग कर रहा है.

भारत में कैनाबिस को कब बैन किया गया?

24 साल बाद राजीव गांधी की सरकार में NDPS Act, 1985 के तहत इसकी खेती को बैन कर दिया गया. चूंकि यह नैचुरली उगने वाला पौधा है और भारत में भारी मात्रा में भांग का इस्तेमाल भी किया जाता है, इसलिए भारत सरकार ने इसकी पत्तियों को कानून से बाहर रखा.

वैश्विक स्तर पर कैनाबिस को कब और क्यों बैन किया गया?

19वीं शताब्ती के शुरुआत से ही अलग-अलग देशों ने इसे बैन करना शुरू कर दिया था. 1900 से 1961 के बीच ब्रिटेन, अमेरिका, पोलैंड और जापान जैसे कई देशों ने कैनाबिस की खेती और इससे होने वाले उत्पाद पर बैन लगाया. लेकिन वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा एक्शन यूएन की स्थापना के बाद लिया गया.

डॉ शेखावत बताते हैं कि UN Convention 1961 के तहत पौधे से तैयार की जाने वाली सभी ड्रग और उनकी खेती को बैन कर दिया गया. इस कन्वेंशन में 190 से अधिक देशों को सिग्नेटरी बनाया गया, जिसमें भारत भी शामिल था. जब भारत समेत कई देशों ने इसका विरोध किया तो उन देशों को कानून बनाने के लिए 25 साल का ग्रेस पीरियड दिया गया.

सेकंड वर्ल्ड वॉर के बढ़ी थी तेजी से मांग

दुनियाभर में इतने बड़े एक्शन का मुख्य कारण विश्व युद्ध को बताया जाता है. दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान दुनियाभर के सैनिक लड़ाई के दौरान मानसिक अवसाद, अपने घाव के दर्द और अपनी क्षमता को बनाए रखने के लिए पौधे से तैयार किए जाने वाले ड्रग जैसे हेरोइन, कोकेन, ब्राउन शुगर, मोर्फिन का इस्तेमाल करते थे, जिसमें कैनाबिस भी शामिल था. सैनिकों को इन ड्रग्स की लत लग गई. जिसका असर विश्वयुद्ध खत्म होने के बाद भी देखने को मिला. विश्व युद्ध में हिस्सा लेने वाले देशों में ड्रग की मांग और क्राइम रेट तेजी से बढ़ा. साथ ही नशा करने वाले लोगों में खतरनाक मनोवैज्ञानिक असर भी देखने को मिले.

अमेर‍िका को शुरू करना पड़ा था ‘वॉर ऑन ड्रग’ कैंपेन

विश्व युद्ध के दौरान हुए दुष्परिणामों के देखते हुए यूएन ने ड्रग पर एक्शन लिया. वहीं, बात करें अमेरिका की तो वियतनाम वॉर के बाद वहां की स्थिति और भी दयनीय हो गई थी. इसलिए अमेरिका ने 1970 में Control Substance Act के तहत कैनाबिस समेत कई ड्रग्स को बैन कर दिया. इसके अलावा राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने 1971 में ‘वॉर ऑन ड्रग’ कैंपेन शुरू क‍िया जो दुनियाभर में फैल गया.

कैनाबिस के डिक्रिमनलाइज करने से क्या फायदे?

वैज्ञानिक शोध कैनाबिस को लीगल करने की बजाय डिक्रिमनालाइज पर ज्यादा जोर दिया जाता रहा है. डॉ शेखावत ने कहा कि साइंटिफिक टेम्प्रामेंट में कैनाबिस को ‘डिक्रिमिनलाइज’ करने की सहमति को लेकर दो तथ्यपरक तर्क हैं. उन्होंने बताया कि 1971 में जब अमेरिका ने ‘वॉर ऑन ड्रग’ मुहिम चलाई तो तेजी से क्राइम रेट बढ़ने लगे. जेलों में कैदियों की संख्या भी तेजी से बढ़ी. जिसके बाद अमेरिका को अपनी लड़ाई को क्रिमिनल जस्टिस से मेडिकल की तरफ मोड़ना पड़ा. जिसके अच्छे परिणाम भी मिले. वहीं अमेरिका के कई राज्यों ने जब हाल के दशक में इसके नशे के लिए यूज को लीगल किया तो इसके भी बुरे परिणाम सामने आए हैं.

UNODC World Drug Report 2022 में कहा गया है कि अमेरिका में कैनाबिस के इस्तेमाल को लीगल करने से एक तरफ टैक्स रेवेन्यू में बढ़ोतरी देखने को मिली. वहीं दूसरी तरफ ड्रग के तौर पर इसका इस्तेमाल भी बढ़ा है. जिसमें मुख्य रूप से युवा शामिल हैं. इसके अलावा उनमें मनौवैज्ञानिक रोग, सुसाइड और हॉस्पिटलाइजेशन रेट भी बढ़े हैं. इसलिए उनका मानना है कि ‘डिक्रिमनलाइज’ सबसे बेहतर तरीका है. इससे हम कैनाबिस पौधे से होने वाले औषधिय फायदे को भुना सकेंगे. साथ ही युवाओं द्वारा इसका दुरुपयोग और उन्हें होने वाले नुकसान को रोकने में भी कामयाबी मिलेगी.

कैनाबिस को लेकर वैज्ञानिक और शोध क्या कहते हैं?

भारत में भी 3 बार बदले जा चुके हैं इससे जुड़े नियम

कैनाबिस को लेकर भारत ने नियमों में ढील दी है. भारत में तीन बार 1999, 2001 और 2014 में इससे जुड़े नियमों में बदलाव किए गए. इसके बावजूद भारत में अभी भी काफी कड़े कानून हैं.

Hampa Wellness के Co-founder रजनीश पुंज का कहना है कि कनाडा, अमेरिका जैसी दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने कैनाबिस के फल-फूल वाले हिस्से की निकालने और उसके इस्तेमाल की अनुमति दे दी है. लेकिन NDPS Act के तहत भारत में यह अभी भी बैन है. उनका मानना है कि यदि इस हिस्से के इस्तेमाल की अनुमति मिल जाती है तो हेम्प प्रोडक्ट्स के उत्पादन में बढ़ोतरी होगी. इससे प्रोडक्ट्स के दाम सस्ते हो जाएंगे और भारत निर्यात भी कर सकेगा.

वहीं डॉ शेखावत की राय में कैनाबिस के मनौवैज्ञानिक असर को देखते हुए पूरी पौधे को लीगल करना किसी भी देश के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. इसलिए अमेरिका की तरह कैनाबिस के सिर्फ उन्हीं केमिकल या कंपाउंड को लीगल किया जाए, जिसे लेकर जानवरों पर शोध हो चुके हैं और उनसे सर्टिफाइड ड्रग बनाए जा चुके हो.

कैनाबिस के खतरनाक प्रभाव

डॉ. शेखावत ने आगे बताया कि THC (गांजा, चरस) की लत (Consumption) से सामाजिक, पारिवारिक, प्रोफेशनल और वित्तीय चीजों में उतना आनंद नहीं आता, जिससे इसका नशा करना वाला इंसान इन सभी चीजों से दूर हो जाता है. इसके कारण Bipolar Disorder, Anxiety, Schizophrenia और Psychosis आदि जैसी कई खतरनाक मनौवैज्ञानिक बीमारियां हो सकती हैं.

इसके अलावा उस इंसान में खुदकुशी करने के भी आसार बढ़ जाते हैं. वहीं, दिल से जुड़ी कई बीमारियों का भी खतरा बढ़ जाता है. हालांकि डॉ शेखावत ने यह भी कहा कि इसका असर किस इंसान पर कब, कितना और कैसे होगा यह उसके जेनेटिक पर निर्भर करता है.

भारत में क‍िन राज्यों में भांग की खेती को वैध करने की मांग

ओडिशा, कर्नाटक, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में छोटे स्तर में भांग की खेती जारी है. वहीं हिमाचल प्रदेश और तमिलनाडु इसे लीगल करने की मांग जोर पकड़ रही है.

7 अप्रैल को हिमाचल प्रदेश के बजट सेशन के आखिरी दिन कई विधायकों ने भांग की खेती को वैध करने को लेकर मांग उठाई. जिसके बाद सीएम ठाकुर सुखविंदर सिंह ने इसके मद्देनजर एक सर्वदलीय कमेटी की घोषणा की. ऐसे में उम्मीद जताई जा रही है कि राज्य सरकार जल्द ही NDPS Act में संशोधन कर भांग की खेती को लीगल करने के लिए पॉलिसी ला सकती है.

कैनाबिस को लेकर विदेशों में क्या हो रहा है?

कनाडा, पुर्तगाल, जर्मनी, उरुग्वे समेत अमेरिका के दर्जनभर से अधिक राज्यों, यूरोपियन यूनियन समेत लगभग 30 देशों को कैनाबिस की खेती और इसके मेडिसिन और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए वैध कर दिया गया है. अमेरिका का मैरीलैंड स्टेट इस लीस्ट में जुड़ने वाला सबसे नया स्टेट है. इसने 1 जुलाई से कैनाबिस के रिक्रिएशनल इस्तेमाल और बिक्री को कानूनी वैद्यता दे दी है. वहीं कनाडा, ब्राजील, ऑस्ट्रेलिया, ताइपे और अमेरिका समेत अन्य कई देशों में कैनाबिस के रिक्रिएशनल इस्तेमाल को वैद्य करने को लेकर लोग प्रदर्शन कर रहे हैं.

कैनाबिस का कौन-सा हिस्सा भारत में बैन है?

आपको बता दें कि भांग जो कैनाबिस की पत्तियों से तैयार किया जाता है कभी-भी भारत में अवैध नहीं था. NDPS Act, 1985 के अनुसार, इसके पत्तियों को औषधियों और बीजों के न्यूट्रिशनल इस्तेमाल की अनुमति है. जबकि कैनाबिस के फल और फूल वाला हिस्सा अवैध है, जिससे गांजा और चरस तैयार किया जाता है. 1970 के दशक में इसकी शुरुआत हुई थी.

कैनाबिस को लेकर दुनियाभर में इतना विवाद क्यों है?

डॉ. शेखावत बताते हैं कि CBD को लेकर कोई विवाद नहीं है. सारे विवाद की जड़ THC है. कैनाबिस पौधे के फल-फूल वाले में हिस्से में 2-10% तक की मात्रा में THC पाई जा सकती है. इस कंपाउंड में Abuse Potential है यानी किसी भी कीमत पर बार-बार लेने की लत लग सकती है. साइंस की दुनिया में इसे ही लेकर सबसे ज्यादा शोध होते हैं. इसी केमिकल कंपाउंड के कारण इसकी खेती को इससे जुड़े उत्पादों को बैन किया जाता है.

Disclaimer
कैनाबिस का इस्तेमाल खतरनाक परिणाम ला सकता है. ऐसे में कैनाबिस पर शोध कर रहे शोधकर्ताओं और डॉक्टर्स की राय बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है. हम क‍िसी भी तरह के नशे या इससे जुड़ी चीजों के सेवन का समर्थन नहीं करते हैं.

छत्तीसगढ़ युवा कांग्रेस : मोदी सरनेम पर राहुल गांधी के खिलाफ फैसले का विरोध प्रदर्शन- युवा कांग्रेस की ‘जन सत्याग्रह पदयात्रा’

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हाईलाइट्स :

  • छत्तीसगढ़ युवा कांग्रेस का विरोध प्रदर्शन शुरू।
  • मोदी सरनेम मामले में राहुल गाँधी के फैसले के खिलाफ प्रदर्शन।
  • रोजाना 10 किलोमीटर की होगी प्रदर्शन पदयात्रा।
  • हर नागरिक हो सकता है इसमें शामिल।

Yuva Congress Jan Satyaagrah Padyaatra: मोदी सरनेम को लेकर पूरे देश में बबाल मचा हुआ है। इस मामले में राहुल गांधी के खिलाफ हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है जिस पर दोनों प्रमुख पार्टियों ने जमकर प्रक्रियाएं दी है। इस कड़ी में मंगलवार को छत्तीसगढ़ युवा कांग्रेस ने पदयात्रा शुरू की है। इस यात्रा को जन सत्याग्रह पदयात्रा नाम दिया गया है। ये प्रदर्शन राजधानी रायपुर में किया जा रहा है।

इस यात्रा में रोजाना चलेंगे 10 KM:

युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव लोकेश वशिष्ट (Youth Congress National Secretary Lokesh Vashisht) ने तेलीबांधा थाना से पदयात्रा की शुरुआत की। बताया जा रहा है कि, युवा कांग्रेस की इस जन सत्याग्रह पदयात्रा के दौरान युवा कांग्रेसी रोजाना 10 किलोमीटर पैदल यात्रा करेंगे। इस यात्रा का समापन माना बस्ती में होगा। कांग्रेसी नेता लोकेश वशिष्ट ने बताया है कि, गुजरात में मोदी सरनेम को लेकर राहुल गांधी के ऊपर जिस तरह से निर्णय आया है, उसके खिलाफ आज युवा कांग्रेस सड़क की लड़ाई लड़ रहा हैं।

उन्होंने कहा कि हम किसी प्रकार की भीड़ के साथ प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं। जहां-जहां से यह यात्रा गुजरेगी वहां अगर किसी को इस विरोध का समर्थन करने के लिए आगे आना है तो उसका हम स्वागत करेंगे। नहीं तो हम जितने है उतने ही इस विरोध प्रदर्शन को जारी रखेंगे। इस यात्रा में किसी को जबरदस्ती या पैसे देकर भीड़ इकट्ठी नहीं की जाएगी। पूरे देश में हमारे नेता राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस प्रदर्शन कर रही है, छत्तीसगढ़ में युवा कांग्रेस लगातार केन्द्र की मोदी सरकार का विरोध करेंगी।

Chhattisgarh Weather Update : छत्तीसगढ़ में तेज हवाओं के साथ बारिश के आसार, मौसम विभाग ने जारी की चेतावनी

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छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ दिनों में कम बारिश हुई है। लेकिन मौसम विभाग ने भविष्यवाणी की है कि राज्य में आने वाले दिनों में अच्छी बारिश हो सकती है।

Chhattisgarh Weather Update

Chhattisgarh Weather Update: उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में भारी बारिश हो रही है। पहाड़ी राज्य तो बारिश के कारण तबाही झेल रहे हैं। देश की राजधानी दिल्ली में बाढ़ का खतरा मंडरा रहा है। यमुना का जलस्तर बढ़ने से निचले इलकों में पारी घुस गया है। इस बीच छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ दिनों में कम बारिश हुई है। लेकिन मौसम विभाग ने भविष्यवाणी की है कि राज्य में आने वाले दिनों में अच्छी बारिश हो सकती है।

छत्तीसगढ़ मौसम विभाग ने संभावना जताते हुए कहा है कि, 12 जुलाई को छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में मध्यम से हल्की बारिश होगी। इसके साथ ही गरज-चमक के साथ छींटे पड़ने की संभावना है। मौसम विभाग ने कहा कि, मानसून द्रोणिका जैसलमेर, सीकर, उरई, सुल्तानपुर, पटना, मालदा और उसके बाद पूर्व की ओर अरुणाचल प्रदेश तक 0।9 किमी ऊंचाई तक विस्तारित है। आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ में अच्छी बारिश होगी। मौसम में विभाग कहा कि, प्रदेश में हल्की से मध्यम बारिश होने की संभावना है। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में गरज-चमक के साथ हल्की बारिश की संभावना है।

मौसम विभाग चेतावनी जारी की है और कहा कि छत्तीसगढ़ में एक-दो स्थानों पर गरज चमक के साथ वज्रपात होने की संभावना है। इसके साथ ही आने वाले दो दिनों में छत्तीसगढ़ के कई इलाकों में अच्छी बारिश होगी।

मणिपुर में हिंसा के बीच मिली 2 करोड़ की ड्रग्स, सोप केस में छुपाकर हो रही थी तस्करी; 4 लोग हिरासत में।

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मणिपुर में दो महीने से चल रही हिंसा के बीच अब ड्रग तस्करी का भंडाफोड़ हुआ है। अगरतला सेक्टर असम राइफल्स की श्रीकोना बटालियन ने करीब 2 करोड़ के हिरोइन के साथ 4 लोगों को हिरासत में लिया है। एक अफसर ने बताया, तस्करों को नार्को-आतंकवाद के खिलाफ चल रहे अभियान के तहत कछार जिले के लखीपुर सब-डिविजन से पकड़ा।

बेंगलुरु : 17-18 जुलाई को कांग्रेस की मेजबानी में विपक्षी दलों की दूसरी बैठक शामिल होंगी 8 नई विपक्षी पार्टियां

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बेंगलुरु: कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में 17-18 जुलाई को कांग्रेस की मेजबानी में विपक्षी दलों की दूसरी बैठक होने वाली है। इस बैठक में कम से कम 24 सियासी दलों के बड़े नेताओं के हिस्सा लेने की संभावना है।

2024 के लोकसभा चुनावों के पहले बीजेपी के खिलाफ बन रहे मोर्चे के समर्थन में 8 नई पार्टियां आगे आई हैं। सूत्रों ने बताया कि बिहार की राजधानी पटना में हुई विपक्षी दलों की पहली बैठक के बाद बेंगलुरू में हो रही दूसरी बैठक में कम से कम 24 पार्टियां हिस्सा लेंगी।

बीजेपी के 2 पुराने साथी अब विपक्ष के साथ
जिन नई राजनीतिक पार्टियों के इस बैठक में हिस्सा लेने की बात कही जा रही है उनमें एमडीएमके, केडीएमके, वीसीके, आरएसपी, ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, केरल कांग्रेस (जोसेफ) और केरल कांग्रेस (मणि) शामिल हैं। बताया जा रहा है कि कांग्रेस नेता सोनिया गांधी भी इस बार की बैठक में हिस्सा लेंगी। यहां गौर करने वाली बात यह है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में केडीएमके और एमडीएमके ने बीजेपी के साथ मिलकर ताल ठोकी थी। वहीं, IUML अभी यूपीए का हिस्सा है लेकिन उसने पिछली बैठक में भाग नहीं लिया था।

खरगे ने विपक्ष के कई बड़े नेताओं को भेजा है न्योता
कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य मल्लिकार्जुन खरगे ने इस बैठक में शामिल होने के लिए विपक्ष के कई बड़े नेताओं को न्योता भेजा है। खरगे ने एक पत्र में पटना में हुई बैठक का जिक्र करते हुए उसे एक बड़ी कामयाबी बताया और कहा कि हमने वहां कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की थी और अगले आम चुनावों को साथ मिलकर लड़ने पर सहमति जताई थी। खरगे ने पत्र में यह भी लिखा कि हमने इस बात पर भी सहमति जताई थी कि जुलाई में होने वाली अगली बैठक में भी मिलेंगे।

खरगे ने पत्र में लिखा, आपसे मिलने के लिए उत्सुक हूं
खरगे ने अपने पत्र में लिखा है कि मेरा मानना है कि इस मोमेंटम को बनाए रखने की जरूरत है। उन्होंने लिखा, ‘हमें देश से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए साथ मिलकर काम करने की जरूरत है। इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि 17 जुलाई को शाम 6 बजे होने वाली मीटिंग और रात्रिभोज के लिए बेंगलुरु आने का कष्ट करें। यह मीटिंग 18 जुलाई 2023 को सुबह 11 बजे के बाद फिर शुरू होगी। मैं बेंगलुरू में आपसे मुलाकात के लिए उत्सुक हूं।’ माना जा रहा है कि इस बैठक में विपक्ष के लगभग वे सभी बड़े नेता शामिल होंगे जो पटना गए थे।

लोकसभा में BJP के आसपास भी नहीं है कोई विपक्षी दल
विपक्षी दलों की इस कवायद के बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि 24 पार्टियों का यह कुनबा लोकसभा में कितना असरदार है। लोकसभा की मौजूदा स्थिति की बात करें तो बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के पास 330 सीटें हैं। सिर्फ बीजेपी की बात करें तो लोकसभा में अकेले इसके 301 सदस्य हैं। वहीं, यूपीए में शामिल दलों के पास 110 सीटें हैं जिनमें 49 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है। अन्य दलों की बात करें तो उनके कब्जे में 97 सीटें हैं और विभिन्न कारणों से 6 संसदयी क्षेत्रों का लोकसभा में कोई प्रतिनिधि नहीं है।

8 में से 6 पार्टियों के पास लोकसभा में एक भी सीट नहीं
जाहिर-सी बात है कि मौजूदा लोकसभा में बीजेपी बाकी की पार्टियों से काफी आगे है और उसको टक्कर देने के लिए विपक्ष को बहुत ही ज्यादा मेहनत करनी होगी। मजे की बात है कि जिन 8 नई पार्टियों ने विपक्ष की बैठक में शामिल होने की हामी भरी है उनमें से सिर्फ IUML (3) और केरल कांग्रेस (मणि) (1) का ही लोकसभा में कोई प्रतिनिधि है। बाकी किसी भी पार्टी का लोकसभा में एक सदस्य तक नहीं है। ऐसे में समझा जा सकता है कि ये 8 नई पार्टियां सिर्फ बीजेपी के विरोध में खड़े विपक्षी दलों की संख्या बढ़ाने के अलावा कितनी कारगर हैं।

‘पठान’ के बाद ‘जवान’ में होगी ‘टाइगर’ की मुलाकात? सलमान ने कहा Pathan jawan…

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शाहरुख खान की फिल्म जवान का हाल ही में प्रीव्यू रिलीज हुआ है। फैंस इस प्रीव्यू को काफी पसंद कर रहे हैं। वहीं फैंस अब इस फिल्म का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। फैंस शाहरुख खान को फिल्म ‘पठान’ में देखने के बाद फिर से देखना के लिए बेकरार हैं।

हाल ही में सलमान खान ने शाहरुख खान की आने वाली फिल्म जवान के प्रीव्यू पर प्रतिक्रिया दी है और साथ ही इस प्रीव्यू को सोशल मीडिया पर शेयर किया है।