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ट्रक से टक्कर के बाद मोटरसाइकिल में लगी आग, 3 जिंदा जले

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उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के कबरई कस्बे में शनिवार शाम हुए एक बड़े हादसे में मोटरसाइकिल और ट्रक की आमने-सामने टक्कर हो गई, जिसके बाद मोटरसाइकिल में आग लग गई। इस दुर्घटना में मोटरसाइकिल सवार एक मासूम बच्चे समेत तीन लोग जिंदा जल गए। सदर पुलिस क्षेत्राधिकारी (सीओ) जटाशंकर राव ने रविवार को कहा, “शनिवार शाम कबरई कस्बे के राजीव नगर निवासी अनिल प्रजापति (25) अपने चार साल के बेटे और दोस्त बिज्जू के साथ मोटरसाइकिल में सवार होकर बिना हेलमेट हमीरपुर जिले के रीवन गांव से अपने घर वापस लौट रहे थे।”

उन्होंने कहा, “कबरई कस्बे में ही उनकी मोटरसाइकिल अनियंत्रित होकर ताज क्रशर प्लांट के नजदीक सामने से आ रहे ट्रक में जा टकराई।”

राव ने कहा, “आमने-सामने हुई टक्कर के बाद मोटरसाइकिल की पेट्रोल टंकी फट गई, जिससे मोटरसाइकिल व ट्रक में आग लग गई और तीनों लोगों की मौके पर ही जलकर मौत हो गई।”

उन्होंने कहा कि पुलिसकर्मियों ने दमकल विभाग के साथ काफी मशक्कत के बाद ट्रक और मोटरसाइकिल में लगी आग पर काबू पाया। राव ने कहा, “जल चुके तीनों शवों को ट्रक के नीचे से बाहर निकालकर पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया है।”

सीओ ने बताया, “आंशिक रूप से जले ट्रक और पूर्णरूप से जली मोटरसाइकिल को कब्जे में ले लिया गया है और घटना की जांच शुरू कर दी गई है।”

पत्नी-पत्नी के बीच चल रही थी हंसी-ठिठोली, अचानक कमरे से आने लगी रोने की आवाजें, और फिर…

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 हरियाण के भिवानी जिले में मजाक-मजाक में एक महिला का सुहाग उजड़ गया। दरअसल, घर में पति-पत्नी के बीच हंसी ठिठोली चल रही थी। इसी बीच पति ने पत्नी ने पूछा कि अगर मैं साने रखी सल्फास की गोलियां निगल लूं तो तुम क्या करोगी। पत्नी ने बोली जब आप ही नहीं रहोगे तो मैं भी जी कर क्या करूंगी। तुरंत बाद पति ने सल्फास की गोलियां निगल लीं, यह देखते ही पत्नी ने भी पास पड़ी चूहे मारने की दवा पी ली। हालत बिगड़ने पर दोनों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां पति की मौत हो गई।

चार साल पहले हुई थी शादी

मामला भिवानी के गांव लोहानी का है। यहां रहने वाला जयदीप खेती किसानी करता था। चार साल पहले उसकी शादी सोनिया से हुई थी। तीन साल की बेटी है। सोनिया ने पुलिस पूछताछ में बताया कि बीते गुरुवार की रात करीब 10 बजे पति-पत्नी कमरे में हंसी-मजाक कर रहे थे। इसी दौरान जयदीप को बेड के पास रखी सल्फास की गोलियां दिखीं, उसने मजाक में कहा, मैं सल्फास खा लूं तो तुम क्या करोगी। मैंने कहा कि जब तुम ही नहीं रहोगे तो मैं जी कर क्या करूंगी। इतना कहते ही जयदीप ने शीशी में रखी सल्फास की कई गोलियां खा ली। इसके बाद मैंने भी चूहे मारने की दवा पी ली।

कमरे से आने लगी चिल्लाने की आवाजें

कुछ ही देर में दोनों की तबीयत बिगड़ने लगी। कमरे से पति-पत्नी की जोर-जोर से चिल्लाने की आवाजें आने लगी। घरवाले कमरे में पहुंचे तो दोनों को देख उनके भी होश उड़ गए। परिजनों ने उन्हें अस्पताल पहुंचाया, जहां से हालत गंभीर देखते हुए डॉक्टरों ने पीजीआई रोहतक रेफर कर दिया। इलाज के दौरान पति जयदीप की मौत हो गई, जबकि पत्नी सोनिया को बचा लिया गया।

हंसी-मजाक में उजड़ गया सुहाग

पुलिस का कहना है कि हंसी-मजाक के दौरान घटना घटित हुई है। पत्नी के बयान पर इत्फाकिया कार्रवाई अमल में लाई गई है। शव का पोस्टमार्टम करवाकर परिजनों को सौंप दिया गया है। परिजनों ने शव का अंतिम संस्कार कर दिया है।

Gopala Kidz ने किया ‘Gopala” का लॉन्च, पूरे देश से ‘SayNoToPlastic’ की अपील, देखें VIDEO

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 बच्चों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने और उन्हें नैतिक शिक्षा देने के लिए Gopala Kidz ने अपने कैरक्टर Gopala की लॉन्चिंग 2 अक्टूबर को कर दी है. 3D एनिमेशन वाली इस YouTube सीरीज में गीत-संगीत के जरिए बच्चों को सजग किया जाएगा.

इसमें क्लाइमेट चेंज जैसे मुद्दों को बहुत आसान तरीके से समझाते हुए बच्चों को शिक्षित किया जा रहा है. प्रदूषण को ख़त्म करने के लिए और पॉलीथीन का उपयोग रोकने के लिए भी Gopala की इस मुहिम को बच्चों ने पसंद किया है.

Gopala Kidz का यह सुंदर कैरक्टर “Gopala” बच्चों से बातचीत करने के साथ ही उनको अपने आसपास साफ सफाई रखने की प्रेरणा देगा. Gopala Kidz ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्वच्छ भारत की सफाई मुहिम और सिंगल यूज़ प्लास्टिक के बारे में जागरूक करने के लिए एक गीत भी रचा है- “प्लास्टिक नहीं अपनाएंगे, भारत नया बनाएंगे”.

इस गीत पर Gopala एक कहानी के माध्यम से बच्चों को प्रेरणा देगा. यह प्यारी सी कहानी इस लिंक https://youtu.be/e9_BkMecE2s पर देखी जा सकती है. Gopala Kidz का लक्ष्य है कि वह कम से कम दस लाख बच्चों तक सफाई का संदेश पहुंचाएं और उनसे प्लास्टिक इस्तेमाल नहीं करने का संकल्प भी ले.

You Tube के अपने चैनल में कहानियां, अल्फाबेट, राइम, नर्सरी राइम और नैतिक शिक्षा देने वाली कहानियां व गीत को समाहित किया गया है. Gopala बच्चों को ईमानदारी, अनुशासन और अन्य नैतिक मूल्यों के बारे में कहानियों के ज़रिये बहुत आसान तरीके से बताएगा.
Gopala Kidz के बारे में
Gopala Kidz, मनोरंजन के तरीके से बच्चों तक सही सन्देश एवं सीख पहुंचाता है. इसका मुख्य उद्देश्य प्री नर्सरी के बच्चों तक स्वास्थ्य और पर्यावरण के संबंध में जागरूकता बढ़ाना है.

CRPF कांस्टेबल खुशबू चौहान का ये भाषण सुनकर हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जायेगा

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सीआरपीएफ कांस्टेबल खुशबू चौहान एक वीडियो इंटरनेट पर काफी वायरल हो रहा है। इस वीडियो में खुशबू आतंकियों, देश विरोधी नारे लगाने वालों और मानवाधिकारों की दुहाई देने वाले लोगों पर जमकर निशाना साधती दिख रही हैं।

यह वीडियो एक कार्यक्रम का है जहां CRPF कांस्टेबल खुशबू चौहान ने अपनी स्‍पीच में टुकड़े-टुकड़े गैंग पर भी जमकर हमला बोला। CRPF कांस्टेबल खुशबू चौहान के इस वीडियो को सोशल मीडिया पर बड़ी संख्‍या में लोग पसंद तथा शेयर कर रहे हैं।

आपको बता दें कि खुशबू चौहान का यह वीडियो 27 सितंबर का है, जब वह CRPF द्वारा दिल्‍ली में आयोजित एक डिबेट कॉम्‍पटीशन में बोल रही थीं।

CRPF कांस्टेबल खुशबू चौहान ने कहा, ‘उस देशद्रोही ने कहा था कि तुम एक अफजल को मारोगे तो हर घर से अफजल निकलेगा। तो मैं भारत की बेटी अपनी भारतीय सेना की ओर से आज यह ऐलान करती हूं कि उस घर में घुसकर मारेंगे, जिस घर से अफजल निकलेगा। वो कोख नहीं पलने देंगे जिस कोख से अफजल निकलेगा. उठो देश के वीर जवानों तुम सिंह बनकर दहाड़ दो, और एक तिरंगा उस कन्‍हैया के सीने में गाड़ दो।

उन्होंने मानवाधिकारों की दुहाई देने वालों को कहा, ‘जब पुलवामा में 44 जवान शहीद हुए, जब छत्‍तीसगढ़ में 76 जवान शहीद हुए तो कोई भी मानवाधिकार की दुहाई देने वाला हमारे पक्ष में नहीं आया, लेकिन जब जेएनयू में जब दे्शद्रोही द्वारा ‘भारत तेरे टूकड़े होंगे’ जैसे देशविरोधी नारे लगते हैं तो सभी मानवाधिकार प्रेमी वहां पहुंच जाते हैं।

उपवास में अन्न छोड़कर मिठाई, मेवा और कुट्टू की पूरी या पिज्जा खाने का क्या तुक है?

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गौतम बुद्ध के जीवन पर लिखी एक किताब में उनके कठिन उपवास का जिक्र किया गया है. बुद्ध ने संबोधि पाने के लिए सालों तक कुछ नहीं खाया. इस प्रक्रिया के तहत उन्होंने शुरू में अन्न कम किया, फिर कुछ दिन फल खाए और उसके बाद वे भी छोड़ दिए. ऐसा उपवास करने से उनके पैर बांस जैसे पतले हो गए, रीढ़ की हड्डी रस्सी की तरह दिखाई देने लगी, सीना ऐसा हो गया जैसे किसी मकान की अधूरी छत हो और आंखें ऐसी धंस गई जैसे कुएं में पत्थर खो जाता है. कुल मिलाकर वे एक चलता-फिरता कंकाल बन चुके थे. फिर भी उन्हें वह ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ जिसकी तलाश थी. यह आदर्श उदाहरण है जो बताता है कि सिर्फ खाना-पीना छोड़ देने से न भगवान मिलते हैं, न ज्ञान.

हालांकि यह बात भी उतनी ही सही है कि उपवास से शरीर को फायदा पहुंचता है. विज्ञान बताता है कि सप्ताह में एक दिन न खाने से जहां शरीर के अंगों को आराम मिलता है तो वहीं उसमें मौजूद टॉक्सिन्स भी बाहर निकल जाते हैं. लेकिन हम यहां पर शरीर को स्वस्थ रखने के उद्देश्य के बजाय धार्मिक कारणों से रखे जाने वाले उपवासों का जिक्र कर रहे हैं. नवरात्रि, जन्माष्टमी और दूसरे त्योहारों में दिनभर उपवास रखकर शाम को पूजन के बाद प्रसाद खाने की परंपरा रही है. यहां पर सवाल यह है कि उपवास में प्रसाद के नाम पर साधारण रोटी-सब्जी छोड़कर मिठाई, मेवे, कुट्टू के आटे की पूरियां या साबूदाने की खीर खाने का क्या तुक है?

इस बात की पड़ताल करने से पहले हम जरा व्रत और उपवास का फर्क समझ लेते हैं. आमतौर पर व्रत-उपवास दोनों साथ-साथ बोले जाने वाले शब्द बन गए हैं लेकिन असल में उपवास, व्रत का एक हिस्सा भर है. व्रत यानी कोई भी संकल्प जो आप अपनी बेहतरी या ईश्वर के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए करते हैं. यह रोज घूमने का व्रत भी हो सकता है, कभी झूठ न बोलने का, रोज पूजा कर जल चढ़ाने या सप्ताह में एक दिन खाना न खाने यानी उपवास करने का भी हो सकता है.

गांधीवादी विचारक और लेखक अव्यक्त बताते हैं कि हमारे ऋषि-मुनियों ने कभी-कभार उपवास करने के फायदे जान लिए थे. इन्हें आम जनता और सामान्य समझ के लोगों तक पहुंचाया जा सके इसलिए उपवास को उनकी श्रद्धा और ईश्वर प्राप्ति की इच्छा से जोड़ दिया गया. जाहिर है कि धीरे-धीरे उपवास भगवान तक पहुंचने का रास्ता समझा जाने लगा. पीछे-पीछे इस धारणा ने भी समाज में स्थान बनाया कि उपवास से तन-मन की शुद्धि होती है और जो कि सही भी है. उपवास में फलाहार का विचार कैसे शामिल हुआ होगा, इस पर अव्यक्त बताते हैं कि दिनभर भूखे रहना सब के वश की बात नहीं है. तो हो सकता है तब ऐसे लोगों को पुरोहितों ने बीच का रास्ता निकालते हुए आसानी से पचने वाला भोजन करने की सलाह दे दी होगी. फल-दूध-मेवे इस तरह के भोजन का सहज उपलब्ध विकल्प हैं.

यह सुझाव आयुर्वेद की दृष्टि से भी सही लगता है क्योंकि फल-दूध-मेवे सात्विक भोजन की श्रेणी में आते हैं. और दार्शनिक-अध्यात्मिक ग्रंथों के मुताबिक सात्विक भोजन से अध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है और ज्ञान, विचार, पवित्रता में वृद्धि होती है. ऐसे में ईश्वर में ध्यान लगाना आसान हो जाता है. इसके उलट अन्न तामसिक भोजन की श्रेणी में आता है और शरीर में तमस गुण जैसे नींद या आलस्य पैदा करता है, जो ईश्वर और ज्ञान प्राप्ति जैसे बड़े काम तो क्या दैनिक कामों में भी बाधा बनते हैं.

अन्न छोड़कर फल खाने की बात तो फिर भी समझ आती है लेकिन कुट्टू के आटे या सेंधा नमक खाने का तुक इससे साफ नहीं होता है. अव्यक्त के पिछले जवाब पर लौटें तो हम एक संभावना यह भी पाते हैं कि बिन खाए रह पाना तो सबके लिए मुश्किल है ही, सिर्फ फलों पर गुजारा कर पाना भी सबके लिए संभव नहीं है. इसलिए हो सकता है कि तत्कालीन पुरोहितों ने उपवास का कर्मकांड बचाने और साथ ही लोगों को अधिक और गरिष्ट भोजन से भी बचाने के लिए कुछ दुर्लभ खाद्य पदार्थ खाने की सलाह दे दी होगी. इस बात के तार उस प्रवृत्ति से भी जोड़े जा सकते हैं जिसमें कठिनतम व्रत पर जोर दिया जाता है. ऐसा करने के लिए दुर्लभ भोजन विकल्पों को खोजा गया होगा. जैसे नमक के बजाय सेंधा नमक या किसी व्रत विशेष में साधारण चावल के बजाय खुद से उगने वाले विशेष तरह के चावल. यहां दुर्लभ का एक मतलब वे खाद्य पदार्थ भी हैं जो रोजाना इस्तेमाल नहीं होते.

धीरे-धीरे पाककला विशेषज्ञों ने उपवास के समय प्रयोग आने वाले इन विशेष खाद्य पदार्थों पर प्रयोग किए होंगे. इन्हीं का नतीजा है कि अब हमें तमाम तरह के फलाहारी कटलेट, कचौरी और मिठाइयां उपवास के लिए उपलब्ध होती हैं. इसे बाजार ने भी भली तरह से भुनाया है. बाजार के जानकार यह अच्छे से जानते हैं कि लोग कितने भी आधुनिक हो गए हों, धर्म के मूल संदेश के बजाय अब भी प्रतीकों में ही उलझे हुए हैं. ऐसे में बाजार ने उनकी बढ़ी हुई क्रयशक्ति का फायदा उठाते हुए फलाहारी पिज्जा और बर्गर भी परोस दिए हैं, जो श्रद्धा और धंधा दोनों को साथ ही साधते हैं.

महाराष्ट्र चुनाव: शिवाजी, आंबेडकर, बाल ठाकरे के स्मारकों की राजनीति

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वर्तमान राजनीति हमेशा इतिहास मे झांकती है और भावनाओं को पुकारकर वोट हासिल करना चाहती है. महाराष्ट्र भी अपवाद नहीं है. महाराष्ट्र जब चुनाव का अखाड़ा बन चुका है, चुनावी राजनीति तीन स्मारकों के इर्द-गिर्द घूम रही है.

इन तीनों ऐतिहासिक व्यक्तित्वों का महाराष्ट्र के सामाजिक और राजनैतिक जीवन पर ऐसा प्रभाव है कि इनके स्मारक भी राजनीति का हिस्सा बन चुके है.

इनमें से कोई भी स्मारक पूरा नहीं हुआ है लेकिन उन पर राजनीति ख़त्म नहीं होती.

ये तीन स्मारक हैं: छत्रपति शिवाजी महाराज का अरब सागर में बनने वाला स्मारक, बाबासाहब आंबेडकर का मुंबई के इंदु मिल में बनने वाला घोषित स्मारक और शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे का मुंबई के मेयर बंगले में बनने जा रहा स्मारक.

इस चुनाव पर भी इन स्मारकों का सियासी मुद्दा असर डालेगा.

दुनिया में सबसे बड़ी शिवाजी की स्टैच्यू

इसमें दो राय नहीं है कि छत्रपति शिवाजी महाराज महाराष्ट्र के इतिहास का सबसे बड़े किरदारों में से एक हैं. 16वीं शताब्दी में मराठा साम्राज्य की नींव रखने वाले शिवाजी को महाराष्ट्र में भगवान की तरह पूजा जाता है.

1960 में महाराष्ट्र राज्य बनने के बाद यहां की चुनावी राजनीति मे छत्रपति शिवाजी का उल्लेख हमेशा आता रहा है.

मुगल सल्तनत के ख़िलाफ़ युद्ध करने वाले सेनानी जैसी शिवाजी की ‘हिंदुत्व वाली’ छवि हमेशा शिवसेना-भाजपा जैसे राजनैतिक दलों को अच्छी लगी है.

वहीं ‘मराठा’ राजा की छवि कांग्रेस-एनसीपी जैसे दलों को राज्य की मराठा समुदाय को अपनी ओर खींचने के लिए मददगार साबित हुई है.

छत्रपति शिवाजी के जुड़े मुद्दों से महाराष्ट्र मे सरकारें बनी हैं और गिरी हैं.

ऐसे छत्रपति शिवाजी महाराज का ‘दुनिया की सबसे बड़ी’ मूर्ति पिछले कुछ वर्षों से राजनीति की केंद्र बनी हुई है.

बजट बढ़ता गया मगर स्मारक नहीं बना

1996 से चर्चा में आए इस छत्रपति शिवाजी के स्मारक का वादा सत्ता में आए हर दल की सरकार ने किया है लेकिन आज वह पूरा नहीं हो पाया है और विपक्षी दल हमेशा उसे मुद्दा बनाते आए हैं.

1996 में जब शिवसेना-भाजपा की सरकार महाराष्ट्र में थी तब तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी ने मुंबई में छत्रपति शिवाजी का स्मारक बनाने का ऐलान किया था और गोरेगांव में फ़िल्म सिटी के नज़दीक जगह देने का वादा भी किया था.

बाद में शिवसेना की सरकार चली गई लेकिन कांग्रेस के विलासराव देशमुख की सरकार ने भी 1999 में इस स्मारक को मंज़ूरी दे दी. तब 20 एकड़ ज़मीन पर बनने वाले इस स्मारक के लिए 70 करोड़ रुपये का ख़र्च अपेक्षित था.

हालंकि उसके बाद आए 2004 के चुनाव से पहले महाराष्ट्र की राजनीति बदल गई थी.

जेम्स लेन की विवादित किताब को लेकर छत्रपति शिवाजी फिर से महाराष्ट्र मे चर्चा की केंद्र मे आए थे और उस का राजनैतिक असर भी पड़ा. इसी दौरान उस समय मुख्यमंत्री बने सुशील कुमार शिंदे ने यह शिवाजी स्मारक मुंबई के अरब सागर में बनाने का ऐलान किया.

2009 में कांग्रेस ने इसे चुनावी मुद्दा भी बनाया. तब तक इस स्मारक का ख़र्च 700 करोड़ पहुंच चुका था.

अस्मिता की राजनीति

इसके बाद से ‘शिव स्मारक’ हमेशा चर्चा में बना रहा. कुछ संगठन पर्यावरण के मुद्दे पर अदालत चले गए तो कुछ संगठन समर्थन में रास्ते पर उतर आए. इस स्मारक को लेकर महाराष्ट्र की भावनाएं हमेशा हावी रहीं.

2014 तक कुछ भी नहीं हुआ तो शिवसेना और भाजपा ने शिव स्मारक को चुनावी मुद्दा बना लिया और अपनी सरकार आते ही उसे पूरा करने का वादा भी किया.

जब भाजपा की सरकार आ गई तो 2015 मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरब सागर में बनने वाले इस स्मारक का जलपूजन भी किया.

भाजपा सरकार ने इस स्मारक की छत्रपति शिवाजी महाराज की मूर्ति की ऊंचाई 192 मीटर से 212 मीटर करने का प्रस्ताव भी रखा. अब उसे दुनिया का सबसे बड़ा स्टैच्यू बनाने का दावा भी किया गया.

देवेंद्र फडणवीस सरकार ने इस स्मारक के लिए 3,644 करोड़ रुपये का फ़ंड मंज़ूर कर दिया. हालांकि जनवरी 2019 में ‘द कन्जर्वेशन एक्शन ट्रस्ट’ नाम का संगठन सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया. उसके बाद से स्मारक के काम को स्थगित कर दिया है.

हालांकि अब चुनाव की सरगर्मियों के बीच शिव स्मारक का मुद्दा फिर एक बार चुनाव में आ गया है.

स्मारक तो बना नहीं लेकिन चुनावी मौसम मे विपक्षी दल सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं. कांग्रेस और एनसीपी ने मिलकर अपने बयान में भाजपा-शिवसेना सरकार पर 1,000 करोड़ रुपये का घोटाला करने का आरोप लगाया है.

महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रवक्ता सचिन सावंत ने ट्वीट किया है, “शिव स्मारक के टेंडर की क़ीमत 2692.50 करोड़ रुपये थी लेकिन L&T कंपनी के टेंडर की क़ीमत 3826 करोड़ यानी 42 फ़ीसदी अधिक थी इसलिए री-टेंडरिंग होना ज़रूरी था लेकिन L&T ने बढ़ाई हुई कीमत कम करके सरकार का फ़ायदा किया है.”

इस पर भाजपा के मंत्री चंद्रकात पाटील ने जवाबी ट्वीट किया, “शिव स्मारक का वादा पूरा न कर पाने वाली कांग्रेस-एनसीपी का भाजपा सरकार के काम में दोष निकालना नामुमकिन है.”

छत्रपति शिवाजी और शिव स्मारक महाराष्ट्र में भावनात्मक मुद्दा है. वर्षों से राजनीति पर असर डालता यह मुद्दा इस बार फिर से चुनावी मैदान में आ चुका है.

अब गुजरात के छत्रपति शिवाजी की यह प्रतिमा सरदार पटेल के ‘स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी’ से भी ऊंची और दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति होगी, ऐसा कहकर अस्मिता की राजनीति की जा रही है.

‘इंदु मिल’ का डॉक्टर आंबेडकर स्मारक

जितना भावनात्मक और अहम शिवस्मारक का मुद्दा है उतना ही अहम और पुराना है मुंबई के डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर के स्मारक का मुद्दा. यह प्रस्तावित स्मारक पिछले कई चुनावों से मुद्दा बनता आ रहा है और इस बार का चुनाव भी अपवाद नहीं है.

डॉक्टर आंबेडकर से जुड़े मुद्दे देश की राजनीति पर, ख़ासकर दलित वोटों पर सीधा असर डालते हैं. आंबेडकर के शहर और राज्य यानी मुंबई और महाराष्ट्र में इस स्मारक का मुद्दा सालों से राजनीति पर प्रभाव डालता आ रहा है.

जिस स्मारक की बात होती आ रही है वह मुंबई के दादर इलाके के ‘इंदु मिल’ में प्रस्तावित स्मारक है.

जहां डॉक्टर आंबेडकर के महा परिनिर्वाण के बाद उनकी अंतिम क्रिया हुई, उसी ‘चैत्यभूमि’ के नजद़ीक मिल में यह स्मारक बननेवाला है.

दलित वोटों पर इस मुद्दे का प्रभाव है इसलिये हर सरकार यह स्मारक पूरा करने का बीड़ा उठाती है. फिर भी यह आज तक पूरा नहीं हो पाया है.

1986 से इस स्मारक की मांग उठती रही है लेकिन मुद्दे ने तूल तब पकड़ा जब 2000 में जब सुशील कुमार शिंदे मुख्यमंत्री थे, तब हुए चुनाव मे कांग्रेस ने इंदु मिल के स्मारक को घोषणापत्र में शामिल किया.

दलित वोटों का मसला

कांग्रेस की सरकार वापस सत्ता मे आ गई मगर इंदु मिल के स्मारक की घोषणा क़ागज पर ही रह गई.

2009 के चुनाव में मुद्दा फिर से गरमाया और वादे किए गए. चुनाव के बाद इस स्मारक की मांग पर आंदोलन भी छेड़ा गया. 2011 में आनंद राज आंबेडकर 26 दिनों के लिए इंदु मिल में घुस गए.

बाद में सरकार ने संसद में भी इस स्मारक का ऐलान किया क्योंकि इंदु मिल की जगह केंद्रीय वस्त्रोद्योग मंत्रालय की ज़िम्मेदारी थी.

2014 के चुनाव में भाजपा ने भी यह मुद्दा चुनाव के दौरान उठाया और उनकी सरकार आने के बाद इंदु मिल की जगह स्मारक के लिए दे दी गई.

2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भूमि पूजन भी किया. स्मारक का डिजाइन भी बनवाया गया और एमएमआरडीए से काम भी आगे ले जाने के लिए कहा गया. इन सबके बावजूद स्मारक का काम अभी भी पूरा नहीं हुआ है.

सरकार का दावा है की वह 2020 तक डॉक्टर आंबेडकर स्मारक का काम पूरा कर देगी. फ़िलहाल भावनाओं से भरा यह मुद्दा चुनाव के घोषणापत्र में फिर से शामिल कर दिया गया है.

106 मीटर ऊंचा स्टैच्यू इस स्मारक का आकर्षण होगा जिसके लिए सरकार ने 763 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं.

बाल ठाकरे का स्मारक

2012 में शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे का निधन होने के बाद ही उनके स्मारक का मुद्दा शिवसेना ने उठाया है.

ख़ासकर ठाकरे को लेकर मुंबई मे शिवसेना के कार्यकर्ताओं और मतदाताओं में जो भावना है, वह हमेशा से शिवसेना का सियासी कार्ड रहा है. इसीलिए जहां ठाकरे की सभाएं और कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी उस मुंबई के दादर इलाके के शिवाजी पार्क मे ही उनका स्मारक हो, ऐसी मांग शिवसेना की रही है.

जब कांग्रेस की सरकार थी तब और बाद में 2014 में भाजपा-शिवसेना की सरकार आने के बाद भी यह मांग शिवसेना के कार्यकर्ताओं के लिए अहम मुद्दा रहा. 2012 में ठाकरे के बाद जो भी चुनाव हुए हैं उसमें मुंबई में इस स्मारक के मुद्दे का असर देखने को मिला है.

यह स्मारक किस जगह पर हो, इस पर विवाद होने का बाद भाजपा की सरकार ने शिवाजी पार्क के मुंबई के मेयर बंगले को इस स्मारक मे तब्दील करने की अनुमति दे दी.

सरकार अब ‘एमएमआरडीए’ की तरफ़ से क़रीब 100 करोड़ रुपये में इस स्मारक का निर्माण करेगी. इससे पहले शिवाजी पार्क में, जहां ठाकरे का अंतिम संस्कार हुआ, वहां एक छोटे स्मारक का निर्माण पहले से हुआ है.

स्मारक और भावनाओं की राजनीति

क्या इन स्मारकों का चुनावी सियासत पर असर पड़ता है?

इसके जवाब में वरिष्ठ पत्रकार मधु कांबले कहते हैं, “चुनाव के दौरान इन स्मारकों का मुद्दा चर्चा में आ जाना, इससे यही स्पष्ट होता है की राजनैतिक दलों को स्मारकों के पिछे से राजनीति ही करनी है. नहीं तो ये मुद्दे क्यों आते? इन मुद्दों का ज़िक्र चुनावी घोषणापत्र में होने का कोई अन्य कारण भला क्या हो सकता है? इन महापुरुषों से जुड़ी भावनाओं का फ़ायदा उठाकर वोट हासिल करना, यही एकमात्र मक़सद है.”

महाराष्ट्र की राजनीति पर क़रीब से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार हेमंत देसाई कहते हैं कि स्मारकों के लिए जो भावनाएं हैं, उनसे पूरी राजनीति नहीं बदल सकती लेकिन ये वोट जुटाने के लिए ज़रूर असरदार है.

देसाई के मुताबिक़, “शिवस्मारक हो या बाबासाहब आंबेडकर का स्मारक, 2014 से भाजपा यह बता रही है कि पिछली कांग्रेस सरकार ने कुछ नहीं किया. ऐसा कहकर छत्रपति शिवाजी और आंबेडकर पर भाजपा अपनी दावेदारी बढ़ा रही है. गुजरात में सरदार पटेल का स्टैच्यू बनाकर कर भाजपा यही कह रही है कि राष्ट्रीय एकीकरण की ज़िम्मेदारी वही निभा रही है.”

देसाई का मानना है कि बाल ठाकरे के स्मारक को लेकर शिवसेना भी भावनाओं की राजनीति करती आ रही है.

सिर्फ़ यही तीन स्मारक नहीं, पिछले कुछ वर्षों में अन्य ऐतिहासिक व्यक्तियों के स्मारक भी राजनीतिक विवादों में रहे हैं और उन्हे लेकर ध्रुवीकरण की राजनीति हुई है.

छत्रपति शिवाजी की रियासत के प्रबंधक रहे दादाजी कोंडदेव की प्रतिमा हो या फिर कई ऐतिहासिक नाटक लिखने वाले नाटककार राम गणेश गडकरी का पुणे का स्मारक, इन्हें लेकर आंदोलन हुए. राजनैतिक दलों ने एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए.

अब चुनाव लौटकर आए हैं और स्मारकों ने चुनावी घोषणाओं में फिर से जगह हासिल कर ली है.

ये हैं 3 लाख से सस्ती 3 कारें, जानें खरीदने पर कितनी आएगी किस्त

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देश में फेस्टिव सीजन में ज्यादातर लोग कार खरीदना चाहते हैं। लेकिन अपने बजट को लेकर ठीक से फैसला नहीं कर पाते हैं। ऐसे में जरूरी है कि कार खरीदने से पहले अपने बजट को ठीक समझ लें। इसके बाद कार खरीदने का फैसला करें। क्योंकि जैसे ही वह बाजार में जाएंगे, कार डीलर आपको हर कार की ऐसी खूबियां समझाएगा, कि सही फैसला नहीं कर पाएंगे। अंत में अपने बजट से महंगी कार खरीद लेंगे और फिर कर्ज के भारी बोझ से परेशान रहेंगे। ऐसी दिक्कत उन्हें कम होती है जो 10 लाख या 15 लाख की कार खरीदने की सोच रहे होते हैं। क्योंकि इनके बजट में अगर 1 लाख रुपये या 2 लाख रुपये घट या बढ़ जाए तो इनको फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन जो लोग 3 लाख रुपये से 5 लाख रुपये तक की कार खरीदने की सोच रहे हैं, उनको अगर अचानक 50 हजार रुपये भी ज्यादा देने की जरूरत पड़े तो दिक्कत हो सकती है। ऐसे में आइये जानते हैं कि 3 लाख रुपये तक की कार कौन कौन सी हैं, और उनको खरीदने के लिए कितना तक लोन लिया जा सकता है। और इस कार लोन की किस्त कितने रुपये आएगी और इसे कितने दिनों तक पटाना पड़ेगा।

सबसे पहले जानें 3 लाख रुपये तक की 3 कारों के बारे में

सबसे पहले जानते हैं कि आजकल किस कंपनी की कारें 3 लाख रुपये तक में आ रही हैं। इस जानकारी के साथ कि इनका माइलेज यानी प्रति लीटर पेट्रोल से कितने किलोमीटर चलती हैं।

आइये जानें पहली कार कौन सी …रेनॉल्ट की डैटसन रेडी-गो

रेनॉल्ट ने डैटसन रेडी-गो नाम से एक और छोटी कार बाजार में उतारी है। यह कार 3 लाख रुपये में खरीदी जा सकती है। इस कार की शुरुआती कीमत 2.80 लाख रुपये है। इस कार में 0.8 लीटर का पेट्रोल इंजन लगाया गया है। यह 54 पीएस का पॉवर पैदा करता है। 0.8 लीटर इंजन वाली डैटसन रेडी-गो का माइलेज 22.7 किलोमीटर प्रति लीटर है। इसमें ईबीडी के अलावा एबीएस, ड्राइवर साइड एयरबैग, स्पीड वॉर्निंग सिस्टम, रियर पार्किंग सेंसर्स और सीट बेल्ट रिमाइंडर जैसे फीचर्स इसके सभी वेरियंट में दिए गए हैं।

मारुति ऑल्टो

देश की पहली सस्ती कर बाजार में उतारने का रिकॉर्ड मारुित के नाम ही है। मारुति ने मारुति-800 नाम से देश की सबसे सस्ती और अच्छी कार को बाजार में उतारा था। यह कार आज भी लाखों लोगों के पास है। लेकिन जहां तक 3 लाख रुपये से कम की बात है तो मारुति की ऑल्टो इस रेंज में उपलब्ध है। मारुति ऑल्टो की शुरुआती कीमत 2.89 लाख रुपये है। इस कार का माइलेज 22.5 किलोमीटर प्रति लीटर तक है। आल्टो कार में 796 सीसी का इंजन लगाया गया है। ईबीडी के साथ एबीएस, ड्राइवर साइड एयरबैग, स्पीड अलर्ट सिस्टम, रिवर्स पार्किंग सेंसर्स और सीट बेल्ट रिमाइंडर जैसे फीचर्स इसके स्टैंडर्ड वेरियंट में दिए गए हैं।

रेनॉल्ट की क्विड भी 3 लाख रुपये से कम में उपलब्ध

रेनॉल्ट की एक और कार क्विड भी 3 लाख रुपये से कम में उपलब्ध है। रेनॉल्ट ने क्विड का नया मॉडल भी हाल ही में जारी किया है। इसकी शुरुआती कीमत 2.83 लाख रुपये है। इस नई क्विड में 799 सीसी का पेट्रोल इंजन लगाया गया है। जहां तक माइलेज की बात है, तो इस नए मॉडल का माइलेज 25.17 किलोमीटर का है। इस नई क्विड के सभी वेरियंट में ड्राइवर साइड एयरबैग, ईबीडी के साथ एबीएस, सीट बेल्ट रिमाइंडर, स्पीड अलर्ट सिस्टम और रिवर्स पार्किंग सेंसर्स जैसे फीचर्स दिए गए हैं।

कितनी देनी होगी किस्त

कार लोन की किस्त दो बातों पर निर्भर करती है। पहला कितने रुपये का लोन लिया है, और दूसरा कितने समय के लिए। इन कारों की कीमत 3 लाख रुपये तक है। ऐसे में अधिकतम आप 2.50 लाख रुपये तक का लोन ले सकते हैं। ऐसे में आइये अब जानते हैं कि इस 2.50 लाख रुपये के लोन पर 3 से 7 साल के लिए कितनी किस्त आएगी। यहां पर याद रखना चाहिए कार लोन जितने ज्यादा दिनों के लिए लिया जाएगा, किस्ता उतनी ही ज्यादा कम होगी। यहां पर हम भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के कार लोन के हिसाब से किस्तों की गणना कर रहे हैं। इस वक्त एसबीआई का कार लोन 8.70 फीसदी पर मिल रहा है। इलाहाबाद बैंक के पूर्व मैनेजर एके सिंह के अनुसार समझदारी इसी में है कि कम से कम लोन लिया जाए और इसे कम से कम समय के लिए लिया जाए। ऐसा करने से आपको सबसे कम ब्याज देना होगा। जितना कम आपको ब्याज देना होगा वह आपकी बचत ही होगी।
आइये अब जानते हैं कि 3 साल के लिए लोन लेने पर कितनी देनी होगी किस्त …

जानिए 3 साल के कार लोन की किस्त

अगर एसबीआई से 3 साल के कार लोन लिया जाता है तो आपकी किस्त 7915.07 रुपये महीना आएगी। यह कार लोन 3 साल में खत्म हो जाएगा और आप 2.50 लाख रुपये के लोन के बदले कुल मिलाकर 34942.52 रुपये बैंक को ब्याज के रूप में देने होंगे।

जानिए 4 साल के कार लोन की किस्त

अगर एसबीआई से 4 साल के कार लोन लिया जाता है तो आपकी किस्त 6185.71 रुपये महीना आएगी। यह कार लोन 4 साल में खत्म हो जाएगा और आप 2.50 लाख रुपये के लोन के बदले कुल मिलाकर 46914.08 रुपये बैंक को ब्याज के रूप में देने होंगे।

जानिए 5 साल के कार लोन की किस्त

अगर एसबीआई से 5 साल के कार लोन लिया जाता है तो आपकी किस्त 5153.26 रुपये महीना आएगी। यह कार लोन 5 साल में खत्म हो जाएगा और आप 2.50 लाख रुपये के लोन के बदले कुल मिलाकर 59195.6 रुपये बैंक को ब्याज के रूप में देने होंगे।

जानिए 6 साल के कार लोन की किस्त

अगर एसबीआई से 6 साल के कार लोन लिया जाता है तो आपकी किस्त 4469.25 रुपये महीना आएगी। यह कार लोन 6 साल में खत्म हो जाएगा और आप 2.50 लाख रुपये के लोन के बदले कुल मिलाकर 71786 रुपये बैंक को ब्याज के रूप में देने होंगे।

जानिए 7 साल के कार लोन की किस्त

अगर एसबीआई से 7 साल के कार लोन लिया जाता है तो आपकी किस्त 3984.31 रुपये महीना आएगी। यह कार लोन 7 साल में खत्म हो जाएगा और आप 2.50 लाख रुपये के लोन के बदले कुल मिलाकर 84682.04 रुपये बैंक को ब्याज के रूप में देने होंगे।

टूटी पटरी से गुजर गयी सीमांचल एक्सप्रेस, बचा हादसा..आधा घंटा बंद रहा रेल मार्ग

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 बरौनी-कटिहार रेलखंड पर खगडिया जंक्शन और मानसी जंक्शन के बीच रविवार को तड़के एक बड़ा हादसा टल गया। परमानंदपुर के पास पटरी टूटी थी और उसी टूटी पटरी पर से सीमांचल एक्सप्रेस अपनी तेज रफ्तार में गुजर गई।

बताया गया कि 120/26 से 28 किलोमीटर परमानंदपुर गांव के पास डाउन रेल लाइन की पटरी टूटी हुई थी। जबतक इसका पता चला टूटी पटरी पर से ही 12488 डाउन आनंदविहार-जोगबनी सीमांचल एक्सप्रेस ट्रेन गुजर गई। पटरी में दरार के बारे में पता चलते ही परमानंदपुर गेटमैन ने तुरंत ही खगड़िया स्टेशन को इसकी सूचना दी। गेटमैन की सूचना के बाद 12506 डाउन नार्थ ईस्ट एक्सप्रेस, 19305 इंदौर-गुवाहाटी एक्सप्रेस और 15484 डाउन दिल्ली-अलीपुरद्वार महानन्दा एक्सप्रेस को खगड़िया रेलवे स्टेशन पर रोक दिया गया। टूटी पटरी के ज्वाइंट को दुरुस्त करने के बाद लगभग आधे घंटे के बाद परिचालन बहाल कर दिया गया। हालांकि रेलवे ने यहां से धीमी गति से ट्रेन चलाने के निर्देश दिये हैं। इधर, खगड़िया जंक्शन के स्टेशन अधीक्षक प्रवीण कुमार ने बताया कि कोई ट्रेन प्रभावित नहीं हुई है। फिलहाल ट्रेनों को 30 किलोमीटर की गति की चेतावनी के साथ चलाई जा रही है।

New Traffic Fines: जब दरोगा ने खुद काटा अपनी बाइक का चालान, जानें क्या है पूरा मामला

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उत्तर प्रदेश के रायबरेली में महराजगंज कोतवाली के एक दरोगा को बिना हेल्मेट एक ग्रामीण की बाइक का चालान करना महंगा पड़ गया। लोग विरोध करने लगे। कुछ लोगों ने मौके पर दरोगा से कहा कि-आप भी तो हेलमेट नहीं लगाए हैं, अपना भी चालान कीजिए। फिर क्या था, मौके पर भारी भीड़ जुट गई। ग्रामीण अड़ गए जब तक दरोगा अपना चालान नहीं काटेगा, तब तक जाने नहीं देंगे। मजबूरी में दरोगा को अपनी ही चालान बुक से खुद की बाइक का चालान करना पड़ा।

झुंझलाहट में दरोगा ने ग्रामीणों को देख लेने की धमकी दी और चलते बने। इस धमकी का वीडियो भी कुछ देर में वायरल हो गया। जिससे कोतवाल का भी पारा चढ़ गया और वह अपने दरोगा का बचाव करने लगे। हुआ यूं कि महराजगंज कोतवाली में तैनात दरोगा अशोक कुमार शुक्रवार को कैंड़ावा गांव गए थे। वहां उन्होंने देखा कि एक बाइक पर तीन लोग सवार हैं।

बाइक चला रहा युवक हेल्मेट भी नहीं लगाए है। दरोगा ने बाइक को पगडंडी वाले संकरे रास्ते पर रोका और चालान कर दिया। इसकी भनक लगते ही ग्रामीणों की भीड़ इकठ्ठा हो गई।

ग्रामीणों ने तर्क दिया कि युवक खेत के पास बाइक चला रहा था, सड़क पर नहीं। दरोगा नहीं माने तो ग्रामीण अड़ गए कि-आपको भी अपना चालान करना पड़ेगा.क्योंकि हेल्मेट नहीं लगा हैं। उधर, इस मामले में कोतवाल लालचंद्र सरोज ने पहले तो अनभिज्ञता जाहिर की, बाद में कहा कि अधिकारियों से बात करके कार्रवाई होगी।

क्या कहतें है सीओ

महराजगंज क्षेत्राधिकारी विनीत कुमार सिंह का कहना है कि मामले में दोनों पक्षों को समझा दिया गया है, मामले की जांच कराई जा रही हैै। अगर दरोगा दोषी पाया गया तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि इस मामले में कुछ ग्रामीणों के खिलाफ शांति व्यवस्था की धारा में कार्रवाई की गई है।

VIDEO: समुद्र के बीच आसमान में दिखी रहस्यमयी रोशनी, लोगों ने बताया ‘उड़न तश्तरी’

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एलियन दुनिया के लिए आज भी रहस्य बने हुए हैं. एलियन और उड़न तश्तरी दिखाई देने की खबरें समय-समय पर दुनिया भर से आती रहती हैं, लेकिन अभी तक कोई दावे के साथ ये नहीं कह सकता कि एलियन दिखने में कैसे होते हैं. इन्हीं सब के बीच अमेरिका के उत्तर कैरोलिना में समुद्र के ऊपर कुछ ऐसी चमकती हुई चीज दिखाई दी है, जो दिखने में ये उड़न तश्तरी जैसी लगती है. सोशल मीडिया पर आसमान में दिखाई देने वाली इन 14-15 रोशनी को लेकर खूब बातें हो रही हैं.

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो को विलियम गाय नाम के एक शख्स ने पोस्ट किया है. इस वीडियो को देखने के दौरान सुना जा सकता है कि विलियम कह रहे हैं कि आसामान में अंधेरा छा रहा है. इसके बाद वह कहते हैं कि इधर कुछ अगल रोशनी दिखाई दे रही है. आखिर ये रोशनी है क्या? वो कहते हैं कि क्या कोई बता सकता है कि वो आसमान में क्या है? विलयम कहते हैं कि, हम समुद्र के बीच एक नाव पर हैं. यहां आसपास कुछ भी मौजूद नहीं है. न ही कोई जमीन का टुकड़ा और न ही कुछ और.



वीडियो में नाव पर सवार लोग कह रहे हैं कि इस तरह की घटना केवल टीवी पर ही देखने को मिलती है. उत्तर कैरोलिना के तट पर फिल्माया गया ये वीडियो 28 सितंबर को यूट्यूब पर डाला गया है. इस वीडियो को अब तक दो लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं. वीडियो में देखने से लग रहा है कई उड़न तश्तरी एक साथ जमीन की ओर आ रही हैं. वीडियो में दिखाई दे रही इस रोशनी को देखने के बाद एलियन और उड़न तश्तरी को लेकर बार फिर बातें शुरू हो गई हैं.