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मनमोहन सिंह और सोनिया-प्रियंका गांधी से शेख हसीना ने दिल्ली में की मुलाकात…

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बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना चार दिन के दौरे पर भारत आई हुई हैं। शनिवार को उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। दोनों नेताओं ने कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए और कुछ परियोजनाओं का उद्घाटन किया। रविवार को हसीना ने कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह, कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा और आनंद शर्मा से मुलाकात की।

वित्त मंत्रालय 14 अक्टूबर से शुरू करेगा बजट 2020-21 तैयारी की प्रक्रिया…

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वित्त मंत्रालय 2020-21 के सालाना बजट की तैयारी प्रक्रिया 14 अक्टूबर से शुरू करेगा। मंत्रालय को अन्य बातों के अलावा आर्थिक वृद्धि में नरमी और राजस्व संग्रह में कमी के महत्वपूर्ण मसलों का समाधान करना है। यह नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार के दूसरे कार्यकाल और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का दूसरा बजट होगा।

वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग की बजट इकाई के बजट परिपत्र (2020-21) के अनुसार, ‘बजट पूर्व/संशोधित अनुमान को बैठकें 14 अक्टूबर 2019 से शुरू होगी…।’ व्यय सचिव की अन्य सचिवों और वित्तीय सलाहकारों के साथ चर्चा पूरी होने के बाद वित्त वर्ष 2020-21 के लिए बजट अनुमानों को अस्थायी तौर पर अंतिम रूप दिया जाएगा। बजट पूर्व बैठकें 14 अक्टूबर से शुरू होगी और नवंबर के पहले सप्ताह तक जारी रहेंगी।

वित्त वर्ष 2020-21 का बजट एक फरवरी को पेश किया जाएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार ने फरवरी के अंत में पेश होने वाले बजट की वर्षों से चले आ रही परंपरा को समाप्त किया है। तत्कालीन वित्त मंत्री अरूण जेटली ने पहली बार 2018-19 का बजट एक फरवरी 2017 को पेश किया था। इससे मंत्रालयों को बजट राशि वित्त वर्ष की शुरूआत से आबंटित की जाती है। इससे जहां एक तरफ सरकारी विभाग बेहतर तरीके से व्यय की योजना बना पाते हैं वहीं कंपनियों को व्यापार और कराधान योजना बनाने में मदद मिलती है।

बता दें कि पूर्व में जब बजट फरवरी के अंत में पेश किया जाता था तब तीन चरणों में संसद में बजट पारित होने की प्रक्रिया मई के मध्य में पूरी हो पाती थी। इससे राशि आबंटित होते-होते मानसून आ जाता। इससे सरकारी विभाग अगस्त के अंत या सितंबर से ही परियोजनाओं पर खर्च शुरू कर पाते।

महाराष्ट्र-हरियाणा विधानसभा चुनाव: कांग्रेस के लिए सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठा पाना आसान नहीं…

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महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए 21 अक्तूबर को मतदान होगा। दोनों ही राज्यों में देखा जाए तो पिछले विधानसभा चुनाव से समीकरण कुछ खास अलग नहीं है। साल 2014 में देश में लोकसभा चुनाव हुए थे और उसी साल इन दोनों राज्यों के विधानसभा चुनाव। इस बार भी वही स्थिति है। साल 2014 में भाजपा ने 282 सीटें जीती थी, जिसे 2019 में 303 में तब्दील किया और इस बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने में सफल हुई। भाजपा की अगुआई वाले एनडीए का प्रदर्शन महाराष्ट्र और हरियाणा में भी शानदार रहा। हरियाणा में कांग्रेस का सूपड़ा साफ करते हुए भाजपा ने सभी 10 सीटों पर कब्जा किया, जबकि महाराष्ट्र में एनडीए ने 48 में से 41 सीटों पर जीत दर्ज की। साल 2014 में भी हरियाणा और महाराष्ट्र में क्रमश: सात और 42 सीटों पर जीत मिली थी।

2019 लोकसभा चुनाव के परिणामों को देखते हुए भाजपानीत एनडीए दोनों ही राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए भी उत्साहित है। दोनों ही राज्यों में पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा ने सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाया था और कांग्रेस को हार मिली थी। अब सवाल है कि कांग्रेस और यूपीए के घटक दल इस बार कैसी तैयारी में हैं!

तीन राज्यों में सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने में कामयाब रही थी कांग्रेस दिसंबर 2018 में राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हुए थे और इन राज्यों में कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाने में कामयाब रही थी। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में तो डेढ़ दशक से जमी भाजपा सरकार को कांग्रेस ने सत्ता से बेदखल कर दिया था। तीनों राज्यों में सरकार बना लेना कांग्रेस की बड़ी कामयाबी थी। गुजरात में भी इसने अपना प्रदर्शन सुधारा था।

अब हरियाणा और महाराष्ट्र की बात करें तो साल 2014 में विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने दोनों राज्यों में मुख्यमंत्री का चेहरा स्पष्ट नहीं किया था। सीएसडीएस और लोकनीति ने 2014 विधानसभा चुनाव के बाद जो सर्वे किया था, उसमें भी मनोहर लाल खट्टर और देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर उतने लोकप्रिय नहीं थे।

इस बार तो दोनों पहले से ही मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं। दोनों ही राज्यों में कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर का फायदा भी उठाना चाहती है, लेकिन सवाल वही है कि कांग्रेस के लिए यह कितना आसान हो पाएगा?

भाजपा को सत्ता से हटाना बहुत आसान नहीं! 2019 लोकसभा चुनाव में भाजपा, भारतीय राजनीति में बहुत बड़ी ताकत बनकर उभरी है। इस साल लिए गए फैसलों से उसने खुद को एक मजबूत शासन के तौर पर स्थापित भी किया है। ऐसे में उसे नजरअंदाज करना बहुत मुश्किल होगा।

भाजपा ने 2014 में यूपीए सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाया था। वहीं, दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी सत्ता विरोधी लहर देखने को मिली थी और आम आदमी पार्टी ने खुद को विकल्प के तौर पर पेश किया था। वहीं, साल 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा के विरोध में जदयू ने राजद और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाया तो उसे जीत हासिल हुई।

विपक्षी एकता पर्याप्त नहीं 2019 के लोकसभा नतीजों से इतना तो स्पष्ट है कि भाजपा को हराने के लिए केवल चुनाव पूर्व गठबंधन पर्याप्त नहीं है। लोकसभा चुनाव से पहले राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करने और सरकार बनाने में कामयाब रही कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शन नहीं दोहरा सकी। लोकसभा चुनाव 2019 में वह सफलता हासिल करने में असफल रही।

यह कहना सही नहीं होगा कि इन दोनों राज्यों में भाजपा की राजनीतिक सफलता केवल नरेंद्र मोदी के करिश्मे का एक कार्य है। हरियाणा और महाराष्ट्र में भाजपा ने मौजूदा सामाजिक समीकरणों को फिर से साधा है। इन समीकरणों के जरिए भाजपा ने अपने विरोधियों को चौंकाया है।

सर्वे के नतीजे देते हैं सबूत मुख्य रूप से जाटों और मराठों जैसे प्रमुख सामाजिक समूह को मजबूत करने की दिशा में विपक्ष को आगे बढ़ाने में रणनीति निहित है। दूसरी ओर इसने प्रमुख समुदायों और वर्गों के बीच भी अपनी पैठ बढ़ाई है, जो महसूस करते हैं कि भाजपा के अलावा मजबूत विकल्प मिल पाना उतना आसान नहीं।

इसे सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वे में यह बात स्पष्ट हुई है। भले ही विपक्ष ने प्रमुख सामाजिक समूहों के बीच अपने प्रदर्शन में सुधार किया हो, लेकिन भाजपा के पास उनके समर्थन का एक बड़ा हिस्सा है। महाराष्ट्र में भाजपा के पास शिवसेना जैसी सहयोगी पार्टी है, जिसके पास मराठों का मजबूत समर्थन है।

भाजपा के लिए भविष्य में भी यह बहुत अच्छे संकेत हैं कि समाज के विभिन्न वर्गों में इसकी पैठ और मजबूत होती चली जा रही है। वहीं, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। न केवल महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों में, बल्कि देश के अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस और विपक्षी दलों के लिए भाजपा को हरा पाना बड़ी चुनौती होगी।

PM मोदी की देखादेखी अंतरराष्ट्रीय ख्याति बढ़ाने चले इमरान खान, Pok को लेकर कर बैठे सबसे बड़ा कबूलनामा…

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इमरान खान ने ट्वीट कर पीओके के लोगों को संबोधित करते हुए लिखा है, ‘आजाद जम्मू-कश्मीर में कश्मीरियों के गुस्से को मैं समझता हूं. उन्हें सीमा पार के अपने साथियों की चिंता है, लेकिन किसी भी व्यक्ति का मानवीय सहायता के लिए LoC पार करना भारत के नैरेटिव को मजबूत करेगा.’

इस्लामाबाद: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की अंतरराष्ट्रीय ख्याति को देखते हुए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान (Imran khan) भी छवि सुधारने की कोशिश की, लेकिन वह अब तक का सबसे बड़ा कबूलनामा कर गए. इमरान ने अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकर कर लिया है कि Pok से लोग LoC क्रॉस कर कश्मीर में दाखिल होते हैं. भारत में सीमा पार घुसपैठ के आरोपों को नकारने वाले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान (Imran khan) ने अब खुद ही इसे अप्रत्यक्ष तौर पर स्वीकार किया है. इमरान खान (Imran khan) ने ट्वीट कर पीओके के लोगों को संबोधित करते हुए लिखा है, ‘आजाद जम्मू-कश्मीर में कश्मीरियों के गुस्से को मैं समझता हूं. उन्हें सीमा पार के अपने साथियों की चिंता है, लेकिन किसी भी व्यक्ति का मानवीय सहायता के लिए LoC पार करना भारत के नैरेटिव को मजबूत करेगा.’

अपने ट्वीट में इमरान खान (Imran khan) ने भले ही मानवीय सहायता के प्रोपेगेंडा की बात कही है, लेकिन इतिहास इस बात की तस्दीक करता है कि सीमा पार से मानवीय सहायता नहीं, बल्कि आतंकवादी घुसपैठ करते रहे हैं. साफ है कि इमरान ने माना है कि पाकिस्तान और पीओके से भारत में घुसपैठ होती रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छवि बचाने के लिए फिलहाल वह सतर्क हैं.

इमरान ने ट्विटर पर यह चेतावनी तब दी है जब एक दिन पहले आजादी समर्थक जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के कश्मीरियों के साथ एकजुटता दिखाने के आवाह्न पर पूरे पीओके क्षेत्र के हजारों निवासियों ने कारों और मोटरसाइकिलों से मुजफ्फराबाद तक रैली निकाली थी. जेकेएलएफ के एक प्रवक्ता ने डॉन न्यूज को बताया कि जुलूस में शामिल लोग शनिवार सुबह अपनी रैली चकोठी की ओर बढ़ाएंगे. उन्होंने कहा, ‘चकोठी से हम नियंत्रण रेखा पार कर श्रीनगर के लिए बढ़ेंगे.’ उन्होंने इच्छा जाहिर की कि प्रशासन और पुलिस उनके लिए अवरोध ना पैदा करे.

इमरान जिन्हें साथ लेकर चले, वही बन रहे राह के कांटे

क्रिकेटर से राजनेता बने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान (Imran khan) ने पाकिस्तान की प्रमुख विपक्षी पार्टियों पीपीपी और पीएमएल-नवाज को टक्कर देने के लिए जिस पाकिस्तानी सेना और चरमपंथी गुटों को साथ किया था, अब वही उनकी राह के कांटे बनने लगे हैं. सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा ने जहां उद्योगपतियों के साथ बैठक कर एक संकेत दिया, वहीं जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के प्रमुख फजलुर रहमान ने आजादी मार्च का एलान कर उनकी मुसीबतें बढ़ा दी हैं. संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर मुद्दे को जोर-शोर से उठा कर स्वदेश लौटे इमरान का जिस तरह देश में भव्य स्वागत हुआ था, वह 24 घंटे भी नहीं टिका और सब काफूर हो गया. देश की खस्ता अर्थव्यवस्था पर चारों तरफ से घिरे इमरान को अब कुछ सूझ नहीं रहा तो संयुक्त राष्ट्र से लौटने के बाद भी कश्मीर राग ही अलाप रहे हैं. वहीं सेना प्रमुख और चरमपंथी मौलाना फजलुर रहमान ने जमीनी हालात को समझते हुए अपनी योजनाओं को खुलासा कर दिया है.

इमरान खान (Imran khan) ने 25 अप्रैल, 1996 को औपचारिक रूप से अपनी राजनीतिक पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) की स्थापना की थी. उनकी पार्टी ने विशेष रूप से पाकिस्तान के युवाओं के बीच लोकप्रियता हासिल की और पार्टी 2013 के चुनाव में खैबर पख्तूनख्वा में एक प्रांतीय सरकार बनाने में सफल रही. पीटीआई जुलाई 2018 में केंद्रीय सत्ता में आई और 17 अगस्त, 2018 को इमरान पाकिस्तान के 22वें प्रधानमंत्री चुने गए.

इमरान ने देश की सत्ता तो हासिल कर ली, मगर वह युवाओं व देशवासियों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सके. उनके प्रधानमंत्री बनने के एक साल के अंदर ही पाकिस्तान में गरीबी व बेरोजगारी अपने चरम स्तर पर पहुंच गई. यही वजह है कि अब आम आदमी उनसे जमीनी हकीकत से जुड़े मुद्दों पर सवाल पूछने लगा है. इमरान हालांकि भारत विरोधी बयानों और कश्मीर राग अलापते हुए जनता का ध्यान बंटाने में लगे हुए हैं.

जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (जेयूआई-एफ) के प्रमुख फजलुर रहमान ने शनिवार को अपने ‘आजादी’ मार्च को सरकार के खिलाफ ‘जंग’ करार दिया. उन्होंने कहा कि यह तबतक समाप्त नहीं होगा, जबतक इस सरकार का पतन नहीं हो जाता.

इन राज्यों में घुसपैठियों को रोकने के लिए मोदी सरकार उठाएगी ऐसा कदम, अमित शाह ने किया वादा…

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गृह मंत्री अमित शाह ने आइजोल में मिजोरम के मुख्यमंत्री ज़ोरमथांगा, गैर-सरकारी संगठनों और नागरिक संगठनों के साथ अलग-अलग बैठक कीं और आश्वासन दिया कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक में एक स्पेशल क्लॉज शामिल किया जाएगा ताकि नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश के साथ-साथ उनका राज्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आकर बसे और भारतीय नागरिकता पाने वाले लोगों से प्रभावित न हो।

इन तीनों राज्यों यानी मिजोरम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में इनर लाइन परमिट व्यवस्था काम करती है। इन राज्यों में इस व्यवस्था को और अधिक मजबूत करने की जरूरत है। शाह ने भी इस पर जोर दिया और कहा कि ऐसा इसलिए करना जरूरी है ताकि नागरिकता (संशोधन) विधेयक का राज्य पर विपरीत प्रभाव न पड़े। मिजोरम के मुख्यमंत्री ने शाह से अपनी बैठक खत्म होने के बाद कहा, गृह मंत्री ने फैसला किया है कि प्रस्तावित विधेयक में एक विशेष उपधारा या क्लॉज जोड़ा जाएगा, जिसमें मिजोरम के लिए विशेष प्रावधान होंगे। गृह मंत्रालय चाहता है कि विधेयक को संसद में पेश करने से पहले हम उस विशेष उपधारा या क्लॉज को प्रस्तुत करें। यह स्पेशल क्लॉज राज्यों में इनर लाइन परमिट यानी आईएलपी को मजबूत बनाने में मदद करेगा।

मिजो एनजीओ कॉर्डिनेशन कमिटी के चेयरमैन ने कहा, हमें आश्वासन दिया गया है कि नागरिकता (संशोधन) विधेयक के साथ-साथ आईएलपी भी होगा और यह हमें बाहरी घुसपैठियों के खिलाफ सुरक्षा देगा। यह नॉर्थ-ईस्ट राज्यों के साथ-साथ उन राज्यों में भी लागू होगा जहां आईएलपी सक्रिय है। बता दें कि आईएलपी यानी इनर लाइन परमिट भारत सरकार द्वारा दिया गया एक ट्रैवल डॉक्युमेंट या दस्तावेज है। यह एक तरह से भारत का अपना आंतरिक वीजा होता है, जिसका नियम ब्रिटिश सरकार ने बनाया। इस दस्तावेज की जरूरत प्रतिबंधित क्षेत्रों की यात्रा के दौरान पड़ती है। फिलहाल यह व्यवस्था मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में ही लागू है। इन तीनों राज्यों से बाहर रहने वाले लोगों को संरक्षित क्षेत्रों में प्रवेश करने की अनुमति लेना अनिवार्य है।

वहीं समिति ने शनिवार को गृह मंत्री अमित शाह की यात्रा के दौरान नागरिकता (संशोधन) विधेयक के खिलाफ अपने नियोजित विरोध-प्रदर्शन को कैंसल कर दिया क्योंकि शाह बाद में उनसे मिलने और उनकी शिकायतों को सुनने के लिए तैयार हो गए। समिति ने गृह मंत्री को सीएबी के विरोध में एक ज्ञापन सौंपा।बता दें कि नागरिकता संशोधन विधेयक को 19 जुलाई 2016 को लोकसभा में पेश किया गया था, लेकिन इसे रद्द कर दिया गया। अगर अब यह विधेयक पास हो जाता है तो अफगानिस्तान और बांग्लादेश और पाकिस्तान के सभी गैरकानूनी प्रवासी हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई भारतीय नागरिकता के योग्य हो जाएंगे।

शीर्ष 10 में से सात कंपनियों के इस हफ्ते डूबे एक लाख करोड़ रुपये…

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शेयर बाजार में इस हफ्ते सूचीबद्ध 10 में से सात कंपनियों के एक लाख करोड़ डूब गए। इनमें सबसे ज्यादा नुकसान एचडीएफसी बैंक और रिलायंस इंडस्ट्रीज को उठाना पड़ा। इस नुकसान का असर कंपनियों के बाजार पूंजीकरण पर भी देखने को मिला। हालांकि तीन कंपनियों के बाजार पूंजीकरण में इजाफा देखने को मिला।

एचडीएफसी बैंक को हुआ 30 हजार करोड़ का नुकसाननिजी क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक एचडीएफसी को शुक्रवार को समाप्त हुए कारोबारी हफ्ते में 30 हजार करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा। बैंक का मार्केट कैप 30,198.62 करोड़ रुपये घटकर 6,50,446.47 करोड़ रुपये रह गया। वहीं निजी क्षेत्र के दूसरे सबसे बड़े बैंक आईसीआईसीआई का एम-कैप 22,866.93 करोड़ रुपये घटकर 2,67,265.32 करोड़ रुपये रह गया। कोटक महिंद्रा बैंक का एम-कैप 15,624.6 करोड़ रुपये घटकर के 2,98,413 करोड़ रुपये रह गया।

HUL को हुआ इतने करोड़ का नुकसान

देश की सबसे बड़ी एफएमसीजी कंपनी हिंदुस्तान यूनिलीवर का एम-कैप 14,287.76 करोड़ रुपये घटकर के 4,20,774.52 करोड़ रुपये हो गया। वहीं हाउसिंग फाइनेंस कंपनी एचडीएफसी 10,178.84 करोड़ रुपये घटकर के 3,41349.33 करोड़ रुपये रह गया। एक और हाउसिंग फाइनेंस कंपनी बजाज फाइनेंस के एम-कैप में 9,437.91 करोड़ रुपये की कमी देखने को मिली। यह 2,26,309.33 करोड़ रुपये रह गया।

रिलायंस इंडस्ट्रीज को हुआ 824 करोड़ रुपये का नुकसान

मुकेश अंबानी के स्वामित्व वाली रिलायंस इंडस्ट्रीज को भी इस दौरान 824.08 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। वहीं टीसीएस, आईटीसी और इंफोसिस का एम-कैप बढ़ गया है। टीसीएस का मार्केट कैप 7,79,989.45 करोड़ रुपये रहा, इंफोसिस का एम-कैप 4,681.59 करोड़ रुपये की बढ़त के साथ 3,40,704.24 करोड़ रुपये हो गया। आईटीसी को 5,344.62 करोड़ का लाभ हुआ और इसका एम-कैप 3,161069096 करोड़ रुपये हो गया।

हालांकि पूरे हफ्ते में पहले पायदान रिलायंस इंडस्ट्रीज काबिज रहा। टीसीएस, एचडीएफसी बैंक, एचयूएल, एचडीएफसी, इंफोसिस, आईटीसी, कोटक महिंद्रा बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और बजाज फाइनेंस टॉप 10 में क्रमवार अपनी स्थिति को बनाए रहे।

ट्रक ने श्रद्धालुओं से भरे वाहन को मारी टक्कर, दो की मौत पंद्रह घायल…

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मध्यप्रदेश के मुरैना जिले के माता बसइया थाना क्षेत्र में श्रद्धालुओं से भरे एक वाहन को ट्रक ने टक्कर मार दी जिससे उसमे सवार एक बालिका सहित दो लोगों की घटना स्थल पर मौत हो गयी और पंद्रह अन्य घायल हो गए, जिनमें दो को गंभीर हालत में ग्वालियर ले जाया गया है।

पुलिस सूत्रों के अनुसार श्योपुर जिले के गसवानी थाना क्षेत्र के वीरमपुर गांव के अदिवासी परिवार कल रात जिले में स्थित प्राचीन माता बसइया मन्दिर पर एक लोडिंग वाहन से दर्शन के लिए जा रहा था। तभी अम्बाह-मुरैना मार्ग पर ग्राम जिंगनी के समीम सामने से आ रहे एक ट्रक ने लोडिंग वाहन में टक्कर मार दी, जिससे उसमे सवार संजना (16) सहित वाहन चालक की मौके पर ही मौत हो गयी और दो महिलाओं सहित पन्द्रह श्रद्दालु घायल हो गये।

इनमें गंभीर रुप से दो घायलों को उपचार के लिए मुरैना ज़िला अस्पताल के चिकित्सकों ने ग्वालियर रेफर कर दिया है। शेष घायलों का उपचार जिला चिकित्सालय में किया जा रहा है।

दिल्ली में दो हफ्ते के बाद 74 रुपये लीटर से कम हुआ पेट्रोल, डीजल के दाम भी घटे…

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 पेट्रोल (Petrol) और डीजल ( Diesel) के दाम में गिरावट का सिलसिला रविवार को लगातार चौथे दिन जारी रहा. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (Delhi) में करीब दो सप्ताह बाद पेट्रोल 74 रुपये लीटर से कम दाम पर मिलने लगा है.

दिल्ली में पेट्रोल का दाम 73.89 रुपये और डीजल का 67.03 रुपये लीटर हो गया है. तेल विपणन कंपनियों ने देश के चार प्रमुख महानगरों में पेट्रोल और डीजल के दाम में रविवार को 12-16 पैसे लीटर की कटौती की.

लगातार चार दिनों की कटौती के बाद दिल्ली में पेट्रोल 72 पैसे लीटर सस्ता हो गया है और डीजल का भाव भी 46 पैसे प्रति लीटर घट गया है.

इंडियन ऑयल (Indian Oil) की वेबसाइट के अनुसार, दिल्ली, कोलकता, मुंबई और चेन्नई में पेट्रोल के दाम घटकर क्रमश: 73.89 रुपये, 76.53 रुपये, 79.50 रुपये और 76.74 रुपये प्रति लीटर हो गए हैं. चारों महानगरों में डीजल के दाम भी घटकर क्रमश: 67.03 रुपये, 69.39 रुपये, 70.27 रुपये और 71.81 रुपये प्रति लीटर हो गए हैं.

पेट्रोल के दाम में रविवार को दिल्ली और मुंबई में 15 पैसे, कोलकाता में 14 पैसे और चेन्नई में 16 पैसे प्रति लीटर की कटौती की गई. वहीं, डीजल के दाम दिल्ली, कोलकाता और मुंबई में 12 पैसे जबकि चेन्नई में 13 पैसे प्रति लीटर घट गए हैं.

दिवंगत अभिनेता विनोद खन्ना खलनायक से नायक बने…

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बॉलीवुड की दुनिया में बतौर खलनायक अपने अभिनय करियर की शुरूआत करने वाले नायक के रूप में बुलंदियों के शिखर पर पहुंचने वाले सदाबहार अभिनेता विनोद खन्ना का आज जन्मदिन है। विनोद खन्ना ने अपनी मेहनत के बल पर बॉलीवुड में अमिट पहचान बनाई है। विनोद खन्ना का जन्म पाकिस्तान के पेशावर में हुआ था। उन्होंने अपने स्नातक की पढ़ाई मुंबई से की है। एक पार्टी के दौरान विनोद खन्ना की मुलाकात दिग्गज अभिनेता सुनील दत्त से हुई। जो अपनी नई फिल्म मन का मीत के लिए नए चेहरे की तलाश कर रहे थे।

उन्होंने इसी दौरान विनोद खन्ना को अपनी फिल्म में बतौर सहनायक के किरदार के लिए आॅफर दिया, विनोद खन्ना ने उनके इस आफर को स्वीकार किया। हालांकि घर पर विनोद खन्ना को इसके लिए अपने पिता से काफी डांट सुननी पड़ी थी। उन्होंने जब अपने पिता से फिल्म में काम करने को लेकर बात की तो वो काफी गुस्सा हुए। उन्होंने बंदूक तान दी और कहा कि, यदि तुम फिल्मों में गए तो तुम्हें गोली मार दूंगा। हालांकि बाद में उनकी मां के समझाने पर उनके पिता ने इजाजत दे दी। लेकिन उन्होंने कहा कि, अगर तुम इस काम में सफल नहीं होते तो तुम्हे घर के व्यवसाय में ही हाथ बंटाना होगा।

साल 1968 में विनोद खन्ना की पहली फिल्म मन का मीत रिलीज हुई है। ये फिल्म टिकट खिड़की पर हिट साबित हुई। इसके बाद उन्हें आन मिलो सजना, मेरा गांव मेरा देश, सच्चा झूठा जैसी फिल्मों में खलनायक की भूमिका निभाने का मौका मिला। ये फिल्में काफी सफल हुई लेकिन इसका फायदा उन्हें नहीं मिला।

इसके बाद उनको सफलता गुलजार की फिल्म मेरे अपने से मिली। छात्र राजनीति पर आधारित इस फिल्म में मीना कुमारी ने भी अहम भूमिका निभाई थी। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में काम किया। जिसमें अचानक, इम्तिहान, अमर अकबर ऐंथोनी जैसी कई फिल्मों में काम किया और उन्होंने खुइ को बॉलीवुड में बेहतरीन अभिनेता के रूप में स्थापित किया। आपको बता दें कि अपनी जवानी के दिनों में विनोद खन्ना सबसे हैंडसम अभिनेता थे।

मृत्युप्रमाण पत्र बनवाने बेटे की लाश को कंधे पर लेकर घंटों घूमता रहा एक बेबस बाप…

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लखीमपुर खीरी में इंसानियत को तार-तार करने वाला मामला सामने आया है। यहां के जिला अस्पताल में एक पिता बच्चे का शव कंधे पर लेकर जिला अस्पताल में घंटों भटकता रहा। वह मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए दौड़ता रहा लेकिन अस्पताल स्टाफ ने उसे इस काउंटर से उस काउंटर पर दौड़ाता रहा।

घंटो बाद अस्पताल के लोगों ने मृत्यु प्रमाणपत्र बनाया। अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारियों ने मामले में अनभिज्ञता जताई है।

मीडिया रिपोर्ट्सके अनुसार नीमगांव थाना क्षेत्र के ग्राम रमुआपुर निवासी दिनेशचंद ने अपने चार वर्ष के बेटे दिव्यांशु को जिला अस्पताल में बुखार के चलते भर्ती कराया गया था। जहां इलाज दौरान ही बुधवार को उसकी मौत हो गयी। बच्चे की मौत के बाद पिता समेत पूरे परिवार पर गमो का पहाड़ टूट पड़ा।

बेटे की मौत के बाद अस्पताल कर्मियों ने उसे बताया कि बच्चे का मृत्यु प्रमाणपत्र बनवाना होगा। इसपर दिनेशचंद परेशान हो गया। बेटे की मौत के सदमे ने उसे पहले ही तोड़ दिया था। मृत्युप्रमाण बनवाने के लिए वह पूरे अस्पताल में बेटे के शव को कंधे पर लेकर इस आफिस से उस आफिस दौड़ता रहा।

लेकिन इसके बावजूद भी उसका मृत्युप्रमाण पत्र नहीं बन सका। घंटो बाद जब मामले की चर्चा फैलने लगी तब अस्पताल प्रशासन ने आनन-फानन में मृत्युप्रमाण पत्र जारी कर दिया।

सीएमएस डॉ. आरके वर्मा का कहना है उन्हें इस तरह के किसी मामले की कोई जानकारी नहीं है। आमतौर पर कि मरीज की मौत के बाद उसका मृत्युप्रमाण पत्र तुरंत जारी हो जाता है। ऐसी कोई परेशानी नहीं होती।