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Stock Market Holidays in March: पूरे 12 दिन BSE, NSE पर नहीं होगी ट्रेडिंग, जानें मार्च में कब-कब बंद रहेगा शेयर बाजार?

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भारतीय शेयर बाजार आमतौर पर शनिवार और रविवार को बंद रहता है ये बात तो सभी को पता है. अब निवेशक इस बात को लेकर कंफ्यूज हो रहे होंगे कि कल से शुरू हो रहे मार्च के महीने में शेयर बाजार किस-किस दिन बंद रहने वाला है.

आपको बता दें कि मार्च 2026 में स्टॉक मार्केट पूरे 12 दिनों के लिए बंद रहेगा. इसकी खबर शेयर बाजार निवेश से जुड़े हर इंसान को होनी चाहिए. इस पूरे महीने में वीकेंड की छुट्टियों के अलावा तीन ट्रेडिंग हॉलिडे भी है. यानी कि कुल मिलाकर महीने के 40 परसेंट समय तक स्टॉक मार्केट में कोई एक्टिविटी नहीं होगी.

मार्च के महीने में 3 ट्रेडिंग हॉलिडे

साल 2026 के मार्च के महीने में चार शनिवार और पांच रविवार है. इस तरह नौ दिन स्टॉक मार्केट बंद रहेगा. इन नौ दिनों की छुट्टियों के अलावा भी मार्च में तीन बड़े त्योहार है, जिसके चलते मार्केट में कोई ट्रेडिंग नहीं होगी. इस दौरान इक्विटी से लेकर कमोडिटी, डेरिवेटिव्स, करेंसी मार्केट सारे के सारे सेगमेंट्स बंद रहेंगे आइए जानते हैं ये ट्रेडिंग हॉलिडे कौन-कौन से हैं:-

3 मार्च को होली की छुट्टी रहेगी, जो भारत के बड़े त्योहारों में से एक है.

26 मार्च को राम नवमी की छुट्टी होगी.

31 मार्च को श्री महावीर जयंती की छुट्टी रहेगी.

इस तरह से बाजार 12 दिनों के लिए बंद रहेगा. अमूमन भारतीय शेयर बाजार में इतने दिनों की छुट्टियां नहीं होती हैं.

होलिका दहन के दिन बंद या खुला रहेगा बाजार?

मंगलवार, 3 मार्च 2026 को होली के दिन मार्केट में छुट्टी रहेगी. यह छुट्टी होलिका दहन के साथ ही है. 4 मार्च को स्टॉक मार्केट खुला रहेगा, जब देश के ज्यादातर हिस्सों में रंग खेले जा रहे होंगे. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज में 4 मार्च को नॉर्मल ट्रेडिंग फिर से शुरू होगी. मार्केट हमेशा की तरह सुबह 9:15 बजे खुलेगा और दोपहर 3:30 बजे तक खुला रहेगा.

8th Pay Commission: 50 परसेंट DA को बेसिक सैलरी में मिला दें, सरकारी कर्मचारियों की नई डिमांड आई सामने…

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वक्त जैसे-जैसे बीतता जा रहा है आठवें वेतन आयोग (8th Pay Commission) को लेकर भी नई-नई खबरें सामने आ रही हैं. अब एक और नया अपडेट सामने आया है, जो केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए काम की बात है.

दरअसल, सरकारी कर्मचारियों पर महंगाई का बोझ कम करने के लिए अब एक और बड़ी मांग उठी है.

फेडरेशन ऑफ नेशनल पोस्टल ऑर्गनाइजेशन्स (FNPO) ने 8th Pay Commission की चेयरपर्सन जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई को एक लेटर भेजा है. FNPO सरकार से 50 परसेंट महंगाई भत्ता (DA) को बेसिक सैलरी (Basic Pay) में मिलाने की मांग की है. इसने इसे 1 जनवरी, 2026 से ‘अंतरिम राहत’ के तौर पर लागू करने का सुझाव दिया है.

DA को बेसिक पे के साथ मर्ज करने के पीछे तर्क

भारत में डाक विभाग के कर्मचारियों के लिए बने संगठन FNPO का कहना है कि पिछले कुछ सालों में खाने-पीने की चीजों की कीमतें बढ़ी हैं. मेडिकल ट्रीटमेंट पर खर्च बढ़ा है. पेट्रोल-डीजल की कीमत में भी तेजी से बढ़ोतरी हुई है. कर्मचारियों और पेंशनर्स की जेबों पर इसका दबाव पड़ा है.

बताया गया कि पहले भी DA जब 50 परसेंट के आंकड़े को पार गया, तब , पे कमीशन ने महंगाई के असर को कम करने के लिए इसके एक हिस्से को बेसिक पे के साथ मर्ज करने की सलाह दी है.

FNPO ने यह भी बताया कि चूंकि HRA (हाउस रेंट अलाउंस), ट्रांसपोर्ट अलाउंस और ग्रेच्युटी जैसे बेनिफिट्स बेसिक पे पर निर्भर करते हैं, इसलिए DA को मर्ज करने से ये बेनिफिट्स भी बढ़ जाएंगे। इससे कर्मचारियों को लंबे समय में पैसे का फायदा होगा.

यह भी तर्क दिया गया कि 8वें पे कमीशन की आखिरी सिफारिशों की घोषणा और उन्हें लागू होने में काफी समय लग सकता है. तब तक कर्मचारियों को राहत देने के लिए यह अंतरिम कदम जरूरी है.

सैलरी स्ट्रक्चर में होगा बड़ा बदलाव

अगर सरकार कर्मचारियों की यह मांग मान लेती है, तो एक तो HRA में इजाफा होगा. जैसे-जैसे बेसिक पे बढ़ेगी, आपका हाउस रेंट अलाउंस भी बढ़ेगा. रिटायर होने वाले कर्मचारियों के लिए यह फायदेमंद साबित होगा क्योंकि पेंशन और ग्रेच्युटी की गिनती बदले हुए बेसिक पे के आधार पर कर दी जाएगी, जिससे पेमेंट बढ़कर मिलेगा. इसके साथ दूसरे सारे पे-लिंक्ड अलाउंस भी बढ़ेंगे.

मान लीजिए अगर आपकी बेसिक सैलरी 20000 रुपये है और DA 50 परसेंट है, तो आपको 10000 DA मिलेगा. DA बेसिक पे में मर्ज होने से आपकी टोटल सैलरी 30000 हो जाएगी. यानी कि DA के तहत मिला 10000 रुपया आपकी बेसिक सैलरी से जुड़ जाएगा. बेसिक सैलरी बढ़ेगी, तो बाकी सारे अलाउंस भी अपने आप ही बढ़ जाएंगे. HRA के अलावा PF कंट्रीब्यूशन बढ़ेगा, रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली ग्रैच्युटी बढ़ेगी.

सोना महंगा हुआ तो बदला ट्रेंड, 18 कैरेट और चांदी की ज्वेलरी बन रही लोगों की पहली पसंद; जानिए इसकी वजह…

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देश में सोने-चांदी के दाम भले ऊपर-नीचे हो रहे हों, लेकिन ग्राहकों की पसंद में भी बदलाव देखने को मिल रहा है. ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक अब ज्वेलरी को सिर्फ सुरक्षित निवेश नहीं, बल्कि पर्सनल स्टाइल और पहचान का हिस्सा माना जा रहा है.

कीमतें बढ़ने के कारण लोग चांदी और 18 कैरेट जैसे कम कीमत वाले सोने की ओर रुख कर रहे हैं. डिजाइन में आधुनिक होने और बजट फ्रेंडली होना इन्हें लोगों की पसंद बना रहा है. आइए जानते हैं, इस बारे में….

महंगे सोने ने बदली ग्राहकों की पसंद

सोने की तेजी से बढ़ती कीमतों ने खरीदारों को नई सोच अपनाने पर मजबूर कर दिया है. बाजार जानकारों के अनुसार अब भारी-भरकम 22 कैरेट गहनों की जगह 18 कैरेट ज्वेलरी की मांग बढ़ रही है. इसकी बड़ी वजह दोनों के दाम में करीब 15 से 20 प्रतिशत तक का फर्क है.

जिससे बजट पर दबाव कम पड़ता है. साथ ही 18 कैरेट में हल्के और मॉडर्न डिजाइन मिलने लगे हैं. जिन्हें रोज ऑफिस या किसी फंक्शन में पहनना ज्यादा आसान और सुरक्षित माना जा रहा है. इसी कारण लोग अब 18 कैरेट गहनों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं.

सिल्वर और डायमंड ज्वेलरी बन रही लोगों की पसंद

एक समय ऐसा था जब, गहनों की बात होते ही सोना की बात दिमाग में आती थी. हालांकि, अब समय बदल रहा है. अब चांदी सिर्फ सस्ता ऑप्शन नहीं है, बल्कि नए डिजाइन और स्टर्लिंग सिल्वर लोगों की पसंद बनते जा रहे हैं.

साथ ही, अब लोग डायमंड ज्वेलरी भी खरीद रहे हैं. हालांकि, डायमंड की तरफ झुकाव अभी शुरुआती चरण में है. लेकिन चांदी अपनी जगह लोगों के घरों में बना रही है. जिससे सोने की मांग में बदलाव दिख सकता है.

निवेशकी की पसंद बनी चांदी

चांदी की बढ़ती कीमतों ने निवेशकों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा है. चांदी ने पिछले एक साल में निवेशकों को तगड़ा मुनाफा कमाने का अवसर दिया है. यहीं कारण है कि, चांदी अब निवेशकों के बीच काफी प्रसिद्ध हो रही हैं.

PM मोदी के कांग्रेस को राष्ट्रविरोधी बताने वाले बयान से नाराज अशोक गहलोत, बोले- ‘यह नैतिक पतन…

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा आज (28 फरवरी) अजमेर में कांग्रेस को ‘राष्ट्र विरोधी’ बताने वाले बयान पर सियासत गरमा गई है. इस बयान पर राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने तीखा पलटवार किया है.

गहलोत ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर नाराजगी जताई और कई सवाल उठाते हुए कहा कि अजमेर में प्रधानमंत्री का बयान उनकी राजनीतिक हताशा को दर्शाता है. आज अजमेर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कांग्रेस पार्टी को लेकर की गई टिप्पणियां उनकी राजनीतिक बेचैनी और हताशा का प्रतीक हैं.

साथ ही अशोक गहलोत ने कहा कि जिस विचारधारा का देश की आजादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं रहा, उसका आजादी के आंदोलन का नेतृत्व करने वाली कांग्रेस पार्टी पर देश को बांटने जैसे गंभीर आरोप लगाना न केवल हास्यास्पद है, बल्कि यह नैतिक पतन को भी दर्शाता है.

स्वयं को राष्ट्र से बड़ा समझने की भूल न करें मोदी- अशोक गहलोत

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आगे कहा कि पीएम मोदी को यह याद रखना चाहिए कि उनका विरोध करना देश का विरोध नहीं होता. स्वयं को राष्ट्र से बड़ा समझने की भूल न करें. यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आपने एक आधिकारिक सरकारी मंच का उपयोग केवल संकीर्ण राजनीतिक उद्देश्यों के लिए किया. जनता को आपसे उम्मीद थी कि आप मेरे पत्र में उठाए गए जनहित के मुद्दों पर अपनी बात रखेंगे. क्या आप नहीं चाहते कि पूरे देश की जनता को राजस्थान की तरह ‘राइट टू हेल्थ’ का अधिकार मिले. क्या आपको गिग वर्कर्स वेलफेयर एक्ट और शहरी रोजगार गारंटी जैसे ऐतिहासिक और क्रांतिकारी कानूनों में कोई रुचि नहीं है. बीजेपी सरकार ने ईआरसीपी का नाम तो बदल दिया, लेकिन जमीनी स्तर पर इस परियोजना पर कोई काम नहीं किया. राजस्थान की जनता सच्चाई भली-भांति जानती है.

पेपर लीक जैसे मुद्दों पर राजनीति न करें सरकार- गहलोत

पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दे पर राजनीति करने के बजाय आपको राजस्थान के उस सख्त कानून की सराहना करनी चाहिए थी. जिसमें आजीवन कारावास, 10 करोड़ रुपये तक जुर्माना और दोषियों की संपत्ति जब्त करने जैसे कठोर प्रावधान शामिल हैं. यह कानून आज पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन चुका है. युवाओं को गुमराह करने की राजनीति करने के बजाय आपको केंद्र सरकार के स्तर पर ऐसा ही सख्त कानून लागू करने की बात करनी चाहिए थी.

जनता के सामने ‘डबल जीरो’ हुआ ‘डबल इंजन’ का नारा- गहलोत

यह भी चिंताजनक है कि बीजेपी सरकार अपने ही कार्यकाल में राजस्थान में हुए ओएमआर शीट घोटाले की जांच कराने का साहस तक नहीं जुटा पा रही है. बेहतर होता कि आप विधानसभा चुनावों के दौरान दी गई अपनी गारंटी पर खरे उतरते और आज मुख्यमंत्री को कांग्रेस सरकार की बंद की गई. जनकल्याणकारी योजनाओं को पुनः शुरू करने के निर्देश देते. क्योंकि अब राजस्थान में आपका खोखला ‘डबल इंजन’ का नारा जनता के सामने ‘डबल जीरो’ साबित हो रहा है.

‘हम कुछ हद तक कर रहे समझौता’, ईरान-इजरायल जंग के बीच सचिन पायलट ने केंद्र को घेरा…

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ईरान और इजरायल में युद्ध के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राजस्थान के पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट ने प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने पीएम मोदी की इजरायल यात्रा की टाइमिंग को लेकर सवाल खड़े किए हैं.

साथ ही भारत की विदेश नीति के साथ समझौता करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि विदेश नीति देश के हित को देखकर बनाई जाती है, यह व्यक्तिगत छवि बनाने का जरिया नहीं है.

कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने कहा, ”मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी की इजरायल यात्रा की टाइमिंग सही नहीं थी. उन्होंने जो भाषण दिया उससे कहीं न कहीं भारत की एक जो निष्पक्षता है उस पर संदेह हो जाता है. हमने हमेशा दो-राष्ट्र सिद्धांत का समर्थन किया है और इस बार हम कहीं न कहीं अपनी विदेश नीति से कुछ हद तक समझौता कर रहे हैं.”

विदेश नीति व्यक्ति आधारित हो गई- सचिन पायलट

उन्होंने आगे कहा, ”विदेश नीति राष्ट्र के हितों को देखकर बनाई जाती है, वो व्यक्तिगत छवि बनाने का माध्यम नहीं होता है. दुर्भाग्य से पिछले 11 साल से जो विदेश नीति बनी है वो व्यक्ति आधारित हो गई है. व्यक्तिगत रिश्तों को लेकर अगर विदेश नीति बनेगी तो इससे देश के हितों को नुकसान होगा.”

भारत का हित किसी पार्टी या नेता से ऊपर- सचिन पायलट

सचिन पायलट ने ये भी कहा, ”हमने हमेशा कहा है कि भारत का हित पहले है. भारत का हित किसी पार्टी या नेता से ऊपर है, उसका ध्यान सरकार को रखना पड़ेगा. सरकार ने अपनी इमेज बनाने के लिए, व्यक्तिगत संबंधों को बेहतर बनाने के लिए कई बार भारत की विदेश नीति के साथ समझौता किया है, मैं इसका कड़ा विरोध करता हूं.”

‘इजरायल ने हमें धोखा दिया, अगर PM के एयरक्राफ्ट को कुछ…’, ईरान पर हमले को लेकर भड़के ओवैसी, सरकार से की ये मांग…

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एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ प्रिवेंटिव मिसाइल हमला करने पर तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस की. उन्होंने कहा है कि अगर प्रधानमंत्री का एयरक्राफ्ट हवा में होता और ऐसा हमला होता तो कौन जिम्मेदार होता?

प्रधानमंत्री को देश को बताना चाहिए कि क्या नेतन्याहू ने उन्हें बताया था कि इजराइल ईरान पर हमला करने वाला है? अगर उन्होंने ऐसा किया था तो प्रधानमंत्री को तुरंत अपना दौरा खत्म करके देश लौट जाना चाहिए था. अगर इजरायल ने हमें यह नहीं बताया कि वह अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर हमला कर रहा है, तो इजरायल ने हमें धोखा दिया है.

इस हमले से भारत को क्या हासिल हो रहा?: ओवैसी

उन्होंने प्रधानमंत्री के दौरे का इस्तेमाल ईरान पर हमला करने और गाजा में फिलिस्तीनियों के खिलाफ किए गए नरसंहार को छिपाने के लिए किया है. इससे यह संदेश जाएगा कि भारत इजरायल के साथ है, ईरान के साथ नहीं. इस हमले से भारत को क्या हासिल हो रहा है?

80 साल की तटस्थ रहने की विरासत को क्या हुआ?: ओवैसी

10 मिलियन भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में रहते हैं. उन देशों के आम नागरिकों को इससे क्या संदेश जाएगा कि प्रधानमंत्री मोदी का दौरा खत्म होते ही इजरायल ने ईरान पर हमला कर दिया? बहरीन और कतर पर हमला हो गया, और सऊदी अरब पर भी हमला हो सकता है. हम हमेशा तटस्थ रहे हैं. देश के प्रधानमंत्री, भाजपा को समझना चाहिए कि इस मामले में हमारी 80 साल की तटस्थ रहने की विरासत का क्या हुआ? बहुत गलत संदेश गया है.

इजरायल ने दुनिया से भारत को लेकर किया धोखा: ओवैसी

ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब प्रधानमंत्री और भाजपा को देना चाहिए. इजरायल ने प्रधानमंत्री मोदी के दौरे का इस्तेमाल हमला करने और दुनिया को यह बताने के लिए किया कि भारत उनके साथ है. यह धोखा है. हम प्रधानमंत्री और भाजपा से पूछते हैं कि क्या नेतन्याहू ने उन्हें यह बताया था? ईरान में जो 50,000 और इज़राइल में जो 10,000 भारतीय नागरिक हैं उन्हें वापस लाया जाए.

टी20 वर्ल्ड कप: ‘करो या मरो’ के मुकाबले में वेस्टइंडीज से भिड़ेगा भारत, दांव पर सेमीफाइनल का टिकट…

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टी20 वर्ल्ड कप 2026 में रविवार को ‘करो या मरो’ के मुकाबले में टीम इंडिया की भिड़ंत वेस्टइंडीज से होगी। कोलकाता के ईडन गार्डन्स मैदान पर सेमीफाइनल में पहुंचने के लिए भारत को हर हाल में कैरेबियाई टीम के खिलाफ जीत दर्ज करनी होगी।

टीम इंडिया ने सुपर-8 राउंड का आगाज साउथ अफ्रीका के खिलाफ हार के साथ किया था। प्रोटियाज टीम के खिलाफ मिली 76 रनों की बड़ी हार से भारतीय टीम के नेट रन रेट पर भी बुरा असर पड़ा था। हालांकि, जिम्बाब्वे के खिलाफ 26 फरवरी को खेले गए मुकाबले में सूर्या की सेना ने शानदार वापसी की थी। भारतीय टीम ने जिम्बाब्वे को एकतरफा अंदाज में 72 रनों से हराया था।

बल्लेबाजी में अभिषेक शर्मा बेहतरीन लय में दिखाई दिए थे और उन्होंने टूर्नामेंट में अपना पहला अर्धशतक जमाया था। वहीं, हार्दिक पांड्या और तिलक वर्मा ने भी ताबड़तोड़ बल्लेबाजी करते हुए बल्ले से अहम योगदान दिया था। भारतीय टीम की ओर से गेंदबाजी में अर्शदीप सिंह ने सिर्फ 24 रन देकर 3 विकेट निकाले थे, जबकि वरुण चक्रवर्ती और अक्षर पटेल ने भी दमदार प्रदर्शन किया था।

दूसरी ओर, सुपर-8 राउंड के पहले मैच में जिम्बाब्वे को 107 रनों से रौंदने के बाद वेस्टइंडीज को साउथ अफ्रीका के हाथों 9 विकेट की करारी हार झेलनी पड़ी थी। टीम के गेंदबाज 177 रनों के लक्ष्य का बचाव करने में नाकाम रहे थे। वहीं, कैरेबियाई टीम का टॉप ऑर्डर भी बुरी तरह से विफल रहा था। जेसन होल्डर ने 31 गेंदों में 49 रनों की दमदार पारी खेली थी, तो रोमारियो शेफर्ड ने 37 गेंदों में 52 रन बनाए थे।

टी20 में भारत और वेस्टइंडीज के बीच अब तक कुल 30 मुकाबले खेले गए हैं। इसमें से 19 मैच में भारतीय टीम ने जीत दर्ज की है। वहीं, वेस्टइंडीज ने 10 मैच जीते हैं। एक मुकाबला बेनतीजा रहा है।

कोलकाता के ईडन गार्डन्स मैदान की पिच बल्लेबाजी के लिए अनुकूल मानी जाती है। ग्राउंड पर बढ़िया बाउंस होने की वजह से गेंद बल्ले पर काफी अच्छे से आती है। हालांकि, शुरुआती ओवर्स के बाद स्पिन गेंदबाजों को भी पिच से मदद मिलती है। ईडन गार्डन्स में पहली पारी का औसतन स्कोर 161 रन रहा है। वहीं, दूसरी पारी में औसत स्कोर 139 रन है।

भारत और वेस्टइंडीज के बीच होने वाले अहम मुकाबले में बारिश होने की आशंका न के बराबर है। रविवार को यहां का न्यूनतम तापमान 22 डिग्री सेल्सियस, जबकि अधिकतम तापमान 33 डिग्री सेल्सियस रहने का अनुमान है। मौसम पूरी तरह से साफ रहेगा और दिन में धूप खिली रहेगी। यानी फैंस को पूरे 40 ओवरों का रोमांचक मुकाबला देखने को मिल सकता है।

रंगभरी एकादशी का अनोखा नजारा! 125 किलो के सोने-चांदी के रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकले बाबा श्याम…

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सीकर जिले में बाबा की मशहूर धार्मिक नगरी खाटूश्यामजी में, बाबा श्याम के सालाना फाल्गुनी लक्खी मेले के आठ दिन के लक्खी मेले के सातवें दिन, एकादशी के पावन मौके पर आस्था का एक अनोखा नजारा देखने को मिला।

शीश दान करने वाले बाबा श्याम नीले घोड़े पर सवार होकर नगर भ्रमण पर निकले।

रथ यात्रा बाबा श्याम मंदिर परिसर से शुरू हुई, जो मुख्य बाजार और शहर की मुख्य सड़कों से होते हुए वापस मंदिर परिसर में पहुंची। रथ यात्रा के दौरान भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी। पूरा खाटू धाम बाबा श्याम के जयकारों से गूंज उठा। भक्त रथ को छूने और उसका आशीर्वाद लेने के लिए बेताब थे, जिससे रास्ते में भक्ति और उत्साह की लहर दौड़ गई। फूलों की बारिश और भजनों की मधुर धुनों ने माहौल को भक्ति से भर दिया।

फाल्गुनी लक्खी मेले के कारण, देश-विदेश से लाखों भक्त बाबा श्याम के दर्शन करने आ रहे हैं। मंदिर प्रशासन और स्थानीय अधिकारियों ने यह पक्का करने के लिए कड़ी सुरक्षा और व्यवस्था की है कि भक्त आसानी से बाबा श्याम के दर्शन कर सकें। खाटू धाम में इन दिनों भक्ति, आस्था और खुशी का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है।

125 किलोग्राम चांदी से बना रथ

इस साल की रथ यात्रा का मुख्य आकर्षण बाबा का खास रथ है, जो लगभग 125 किलोग्राम शुद्ध चांदी से बना है। इस शाही रथ में बाबा श्याम का प्रिय “नीला घोड़ा” भी है।

इजरायल से लौटे पीएम नरेंद्र मोदी की पोटली में क्या क्या है, पश्चिम एशिया के लिए भारत की रणनीति क्या है?

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जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 25 फ़रवरी को इज़रायल की संसद केनेसेट में भाषण दिया, तो वे केवल एक प्रतीकात्मक ‘पहली बार’ दर्ज नहीं कर रहे थे. अमेरिका-ईरान में बढ़ते टकराव की पृष्ठभूमि में, उन्होंने दो दिनों के भीतर एक ऐसा टेक्नोलॉजी और सुरक्षा ढांचा सुदृढ़ किया, जो एक ओर इज़रायल के साथ दीर्घकालिक भागीदारी को संस्थागत बनाता है तो दूसरी ओर भारत को किसी औपचारिक ईरान-विरोधी सैन्य गुट से बाहर भी रखता है.

संबंधों को ‘शांति, नवाचार और समृद्धि हेतु विशेष रणनीतिक साझेदारी’का दर्जा मिलना इसका सबसे दृश्य संकेत है. असली प्रश्न यह है कि भारत को ठोस रूप से क्या मिला.

क्या ‘विकसित भारत 2047’में भागीदार बनेगा इजरायल

पहला, भारत ने प्रौद्योगिकी संबंधों की संरचना को एक स्तर ऊपर खिसका दिया है. नई ‘क्रिटिकल ऐंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज़’ (CET) पहल, जिसे दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर से संचालित किया जाएगा.यह सहयोग को बिखरे हुए मंत्रालयी चैनलों से उठाकर रणनीतिक तंत्र के केंद्र में ले आती है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), सेमीकंडक्टर, क्वांटम कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा, जैव-प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष और क्रिटिकल मिनरल्स को एक ही राजनीतिक रूप से सुपरवाइज़्ड ट्रैक में पिरोया जा रहा है. एआई पर विशेष एमओयू, भारत में स्थापित होने वाला भारत-इज़रायल साइबर सेंटर ऑफ एक्सीलेंस और साझा ‘होराइज़न-स्कैनिंग’ तंत्र, यह संकेत देते हैं कि भारत इज़रायल को महज़ एक हथियार-आपूर्तिकर्ता नहीं, बल्कि ‘विकसित भारत 2047’ की प्रौद्योगिकी आकांक्षाओं में एक संरचनात्मक भागीदार के रूप में देख रही है.

यह एक सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण पुनर्संतुलन है. दशकों तक भारत ने इज़रायली हार्डवेयर खरीदा और चुपचाप उसे सोवियत या पश्चिमी प्लेटफ़ॉर्मों में जोड़ा. अब लक्ष्य अलग है- इज़रायल की डीप-टेक लैब्स को भारतीय प्रतिभा, पूंजी और औद्योगिक पैमाने से इस तरह जोड़ना कि संयुक्त बौद्धिक संपदा पैदा हो, केवल आयातित ‘ब्लैक बॉक्स’ नहीं. इंडस्ट्रियल आरऐंडडी को बढ़ावा देने वाले I4F को मज़बूती देने और भारत-इज़रायल संयुक्त शोध योजनाओं के लिए अधिक वित्त आवंटित करने के निर्णय भी इसी दिशा की ओर इशारा करते हैं- विश्वविद्यालयों, स्टार्ट-अप्स और बड़ी कंपनियों के बीच संस्थागत सह-नवाचार की पाइपलाइनों की ओर.

भारत और इजरायल कृषि के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाएंगे

दूसरा, कृषि और जल – साझेदारी का ‘मिट्टी’ वाला सिरा – दिखावे से आगे बढ़कर प्रसार के चरण में प्रवेश कर चुका है. इंडो-इज़रायल एग्रीकल्चर प्रोजेक्ट के तहत देश भर में बने चालीस से अधिक ‘सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस’ पहले ही लाखों किसानों को उच्च उत्पादकता वाली बागवानी और जल-संचयन तकनीकों से परिचित करा चुके हैं. यरुशलम रोडमैप में इन केंद्रों की संख्या को सौ तक ले जाने की महत्वाकांक्षा, भारत-इज़रायल इनोवेशन सेंटर फ़ॉर एग्रीकल्चर और इज़रायल के वोल्कानी संस्थान में संयुक्त शोध-फेलोशिप के साथ मिलकर, तीन ठोस परिणामों की ओर इशारा करती है.

पहला, इज़रायली ज्ञान अब केवल प्रायोगिक परियोजनाओं में नहीं, बल्कि राज्य-स्तरीय कृषि विस्तार तंत्र में स्थायी रूप से समाहित किया जा रहा है. दूसरा, एजेंडा साधारण ड्रिप-इरिगेशन से आगे बढ़कर प्रिसीज़न एग्रीकल्चर, कंट्रोल्ड-एनवायरनमेंट फ़ार्मिंग, डीसैलिनेशन-आधारित सिंचाई और एक्वाकल्चर तक फैल गया है. ऐसे क्षेत्र जिनकी ज़रूरत भारत को भूजल संकट और खाद्य-सुरक्षा की दोहरी चुनौती के बीच विशेष रूप से है. तीसरा, भारत स्वयं को इज़रायली एग्री-टेक के लिए प्राथमिक ‘ग्लोबल साउथ’ टेस्ट-बेड के रूप में स्थापित कर रहा है; भारतीय परिस्थितियों में निखरी तकनीक को दोनों देश मिलकर अफ्रीका और एशिया के बाज़ारों में ले जा सकते हैं. किसान-हित पर राजनीतिक वैधता टिका चुकी सरकार के लिए यह सीधे-सीधे राजनीतिक और आर्थिक पूंजी का निवेश है.

इजरायल से कब तक हथियार खरीदेगा भारत

तीसरा, रक्षा सहयोग में लंबे समय से प्रतीक्षित बदलाव – ख़रीदार-विक्रेता संबंध से क्षमता-आधारित साझेदारी की ओर – औपचारिक रूप लेता दिख रहा है. भारत सालों से इज़रायल का सबसे बड़ा हथियार-ग्राहक रहा है, लेकिन नवंबर 2025 का रक्षा-सहयोग एमओयू,जिसे अब इस यात्रा के जरिए सक्रिय रूप दिया गया है, संवाद की भाषा को बदलने की क्षमता रखता है. जिन नए पैकेजों पर विचार चल रहा है, उन्हें स्पष्ट रूप से ‘मेक इन इंडिया’ फ्रेम में रखा गया है, जहां को-प्रोडक्शन, लाइसेंस प्राप्त निर्माण और संयुक्त आरऐंडडी अपवाद नहीं, बल्कि डिफ़ॉल्ट विकल्प के रूप में सामने हैं.

यह इसलिए निर्णायक है कि युद्ध की प्रकृति ही बदल चुकी है. आयरन डोम जैसे वायु-रक्षा तंत्र अब केवल इंटरसेप्टर नहीं, बल्कि एक एआई-संचालित सेंसर-शूटर वेब के नोड हैं. भारत की उभरती ‘मिशन सुदर्शन चक्र’ अवधारणा – बहु-स्तरीय एकीकृत वायु-और-मिसाइल रक्षा ढांचा, केवल तैयार इज़रायली सिस्टम ख़रीद कर नहीं बन सकता. इसके लिए एल्गोरिद्म, बैटल-मैनेजमेंट सॉफ़्टवेयर और परीक्षण-प्रोटोकॉल तक पहुंच ज़रूरी है. यदि इजरायल इन क्षेत्रों में गहरी तकनीकी साझेदारी और निर्देशित-ऊर्जा और काउंटर-ड्रोन प्रणालियों के संयुक्त विकास की दिशा में आगे बढ़ने को तैयार है, तो यह किसी एक प्लेटफ़ॉर्म की डील से कहीं ज़्यादा महत्व रखता है. बातचीत कठिन होगी, पर राजनीतिक स्तर पर दरवाज़ा अब खुल चुका है.

भारत अब इजरायल से केवल हथियार भर नहीं खरिदेगा बल्कि वह उसका सह निर्माता और उसके विकास में भी भागीदार बनेगा.

क्या पीएम मोदी के दौरे के बाद दोनों देशों में बढ़ेगा व्यापार

चौथा, साझेदारी का आर्थिक और वित्तीय ढांचा अंततः उसकी रणनीतिक गहराई के अनुरूप बनने लगा है. रक्षा-रहित द्विपक्षीय व्यापार सालों से 6-8 अरब डॉलर के बीच ठहरा हुआ था, जबकि इज़रायली प्रौद्योगिकी और भारतीय बाज़ार के बीच स्पष्ट पूरकता मौजूद है. मोदी की यात्रा से ठीक पहले एफटीए वार्ताओं का नया दौर शुरू करना और वार्ताकारों को शीघ्र ‘अर्ली हार्वेस्ट’ की राजनीतिक हरी झंडी देना, यह स्वीकारोक्ति है कि इस कमी को अब और नहीं खींचा जा सकता. उच्च-तकनीकी इनपुट्स पर शुल्क घटाने, बौद्धिक संपदा के नियम स्पष्ट करने और सेवाओं के व्यापार को सरल बनाने वाला एक व्यापक एफटीए ही ‘स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ के लेबल को विश्वसनीय आर्थिक आधार देगा.

फ़िनटेक एजेण्डा इस ढांचे में एक नई परत जोड़ता है. एनपीसीआई इंटरनेशनल और इज़रायल की MASAV के बीच भारत के यूनिफ़ाइड पेमेंट्स इंटरफ़ेस (UPI) और इज़रायली फ़ास्ट पेमेंट सिस्टम को जोड़ने की सहमति कोई सामान्य तकनीकी समझौता नहीं, बल्कि भारत की डिजिटल पब्लिक इंफ़्रास्ट्रक्चर-मॉडल का एक उन्नत अर्थव्यवस्था में निर्यात है. यदि यह जुड़ाव साकार होता है, तो दोनों देशों के बीच वास्तविक समय में कम लागत वाले खुदरा लेन-देन संभव होंगे और भविष्य के इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) के वित्तीय आयाम को भी आधार मिल सकता है. यह कठोर अवसंरचना के नीचे बिछाई जा रही मुलायम कनेक्टिविटी है.

इजरायल में भारत ने क्या सावधानी बरती

यह सब ऐसे समय में हुआ है जब क्षेत्रीय परिदृश्य बेहद विस्फोटक बना हुआ है. अमेरिका ने ईरान के विरुद्ध संभावित सैन्य कार्रवाई की चेतावनियों के बीच खाड़ी क्षेत्र में अपने हवाई और नौसैनिक संसाधनों की तैनाती बढ़ा दी है. ग़ज़ा में मानवीय क्षति को लेकर इज़रायल अंतरराष्ट्रीय आलोचना के अभूतपूर्व दबाव में है, तो ईरान मिसाइल और प्रॉक्सी क्षमताओं पर दांव दोगुना कर रहा है.भारत इन सबके बीच अपनी बहुस्तरीय उपस्थितियों- खाड़ी से ऊर्जा आयात, ईरान के चाबहार बंदरगाह में सीमित लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सेदारी, पश्चिम एशिया में विशाल प्रवासी समुदाय और तकनीक-सुरक्षा के स्रोत के रूप में इज़रायल पर दीर्घकालिक दांव के साथ खड़ा है.

इजरायल में मोदी ने यह कठिन संतुलन सोच-समझ कर साधने की कोशिश की. उनके केनेसेट भाषण में आतंकवाद के प्रश्न पर इज़रायल के साथ बिना शर्त एकजुटता दिखी; उन्होंने सात अक्तूबर के हमले को भारत के भीतर हुए बड़े आतंकी हमलों से जोड़ा और अमेरिका-समर्थित ग़ज़ा शांति रूपरेखा के प्रति समर्थन जताया. लेकिन वे प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की उस प्रस्तावित ‘हेक्सागन ऑफ अलायंसेज़’ के खुले अनुमोदन से सावधानीपूर्वक बचे रहे, जिसका लक्ष्य तथाकथित ‘कट्टर शिया और सुन्नी धुरों’ का मुकाबला करना है. इसके बजाय उन्होंने I2U2 और IMEC जैसे ढांचों को उभार कर पेश किया- ऐसे मिनी-लेटरल मंच, जिनमें भारत इज़रायल, अमेरिका, यूएई और यूरोपीय भागीदारों के साथ अवसंरचना और नवाचार पर काम कर सकता है, लेकिन किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन में नहीं बंधता.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह इजरायल दौरा कृषि क्षेत्र के लिए भी उपयोगी साबित होने वाल है.

यह व्यापक पश्चिम एशिया नीति-दृष्टि के अनुरूप है, जिसमें भारत किसी भी संधि-आधारित गुट में शामिल हुए बिना, कार्यात्मक सहयोग के घने और परस्पर-आच्छादित जाल में अपनी जगह बनाना चाहता है, जहां उसके आर्थिक और सुरक्षा हित आगे बढ़ें. व्यावहारिक स्तर पर इसका अर्थ तीन समानांतर कदम हैं- इज़रायल के साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी संबंधों की गहराई बढ़ाना; अमेरिका के दबाव के बावजूद तेहरान के साथ ऊर्जा और संपर्क-परियोजनाओं पर संवाद बनाए रखना और खाड़ी देशों के साथ रिश्तों को केवल तेल-खरीद तक सीमित न रखकर दीर्घकालिक निवेश और प्रवासी हितों पर टिकाना.

भारत और फिलस्तीन का सवाल

आलोचक उचित रूप से पूछते हैं कि ग़ज़ा से आती भयावह तस्वीरों के बीच इस यात्रा का समय क्या भारत की नैतिक साख को चोट नहीं पहुंचा, खासकर फ़िलस्तीन के सवाल पर. इस चिंता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. लेकिन उतना ही सच यह भी है कि केवल बयानबाज़ी से भरी फ़िलिस्तीन-समर्थक भाषा और दूर से संचालित इज़रायल नीति का पुराना दौर अपनी उपयोगिता खो चुका था. एक उभरती शक्ति अपने उच्च-प्रौद्योगिकी, रक्षा और जल-सुरक्षा हितों को अनिश्चित आपूर्तिकर्ताओं के सहारे नहीं छोड़ सकती, जबकि मंचों पर आदर्शवाद का प्रदर्शन करती रहे.भारत ने साफ़-साफ़ तय कर लिया है कि इज़रायल के साथ ‘बहुत क़रीबी’ दिखने की क़ीमत, उसकी नवाचार-परिसंरचना में जल्दी और गहराई से समाहित होने के लाभ से कम है.

इस यात्रा के लाभ इसलिए ठोस भी हैं और सशर्त भी. ठोस, इस मायने में कि एआई, साइबर, कृषि, फ़िनटेक, शिक्षा और रक्षा पर हस्ताक्षरित ढांचे नौकरशाही और निजी क्षेत्र को स्पष्ट संकेत देते हैं. सशर्त, क्योंकि अब सारा दारोमदार क्रियान्वयन पर है – क्या एफटीए वार्ताएं घरेलू संरक्षणवादी दबावों को पार कर सकेंगी, क्या इज़रायली कंपनियां तकनीक-हस्तांतरण पर अपने प्रतिबंध ढीले करने को तैयार होंगी, क्या भारत डेटा और आईपी-प्रणालियों को इतना भरोसेमंद बना सकेगा कि उच्च-तकनीकी निवेश सहज हों और क्या IMEC अगली क्षेत्रीय उथल-पुथल को झेल पाएगा.

इसके बाद भी अगर समग्र रूप से देखें तो इजरायल ने भारत की पश्चिम एशिया रणनीति में एक शांत लेकिन गहरा पुनर्संयोजन आगे बढ़ाया है. इसने एक ऐतिहासिक रूप से गोपनीय सुरक्षा-संबंध को एक व्यापक-स्पेक्ट्रम साझेदारी में बदला है, ठीक उस समय जब क्षेत्र सबसे अनिश्चित दौर में प्रवेश कर रहा है. भारत ने प्रौद्योगिकी, कृषि, रक्षा और कनेक्टिविटी पर अपना लाभांश बढ़ाया है, बिना यह छूट खोए कि वह ईरान और अरब जगत के साथ अपने संबंध अपनी शर्तों पर गढ़े.यह एक आशावादी निष्कर्ष है, पर नासमझ नहीं. रणनीतिक साझेदारियां भावनाओं पर नहीं, विकल्पों पर टिकती हैं. मोदी की इज़रायल यात्रा ने कठिन होते क्षेत्रीय वातावरण में भारत के विकल्पों का दायरा बढ़ाया है. अब असली परीक्षा इस बात की है कि इजरायल में बने ढांचों को कारखानों, प्रयोगशालाओं, स्टार्ट-अप्स और सह-उत्पादित प्रणालियों में कितनी तेज़ी से बदला जा सकेगा. क्या एक दशक बाद भारतीय किसान, कोडर, सैनिक और नाविक यह कह सकेंगे कि सिलिकॉन से मिट्टी तक फैली यह साझेदारी उनके जीवन को मापने लायक रूप से बदल चुकी है.

टीम प्लेयर बनो, वरना रिजर्व में बैठा देंगे. बरनाला रैली से राहुल गांधी ने कांग्रेस नेताओं को चेताया…

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बरनाला में ‘कांग्रेस मजदूर महारैली’ को संबोधित करते हुए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के सांसद राहुल गांधी ने पार्टी में गुटबाजी को लेकर नेताओं को चेताया. उन्होंने कहा कि मैं पंजाब कांग्रेस पार्टी नेताओं की पूरी टीम, जो मंच पर बैठी है, सबको मैसेज देना चाहता हूं कि काम टीम वर्क से होता है.

एक प्लेयर गेम नहीं जीत सकता है. हमारे पास यहां पूरी टीम बैठी है.

राहुल गांधी ने कहा कि मैं मैसेज देना चाहता हूं कि टीम प्लेयर बनो, वरना रिजर्व में बैठा देंगे. राहुल गांधी ने कहा कि कोई अगर टीम के साथ काम नहीं करेगा और टीम प्लेयर नहीं बनेगा तो उसे मैं और हमारे अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सीधा कर देंगे. ये मैसेज सभी के लिए है.

राहुल ने अमेरिका से ट्रेड डील पर उठाए सवाल

राहुल गांधी ने कहा कि केंद्र सरकार ने हिंदुस्तान के एग्रीकल्चर सेक्टर का दरवाजा अमेरिका के लिए खोल दिया है. इस फैसले के बाद अमेरिका का सामान, भारत आएगा और हमारे किसान तबाह हो जाएंगे. पीएम मोदी यह काम नहीं करना चाहते थे. चार महीने तक डील रुकी हुई थी, क्योंकि हिंदुस्तान का कोई भी प्रधानमंत्री किसी दूसरे देश के लिए एग्रीकल्चर सेक्टर को नहीं खोल सकता. मगर सवाल है- नरेंद्र मोदी ने जो काम चार महीने तक नहीं किया, उसे उन्होंने 15 मिनट में क्यों कर दिया?

अमेरिका को चीन से लड़ना है तो उसे हिन्दुस्तान के डाटा की जरुरत है। बिना हिन्दुस्तान के डाटा के अमेरिका चीन से नहीं लड़ सकता।

क्योंकि चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा डाटा है और फिर भारत के पास है। दुनिया AI की बात करती है लेकिन बिना डाटा के AI का कोई मतलब नहीं है और डाटा भारत…

उन्होंने कहा कि अमेरिका को चीन से लड़ना है तो उसे हिन्दुस्तान के डाटा की जरुरत है. बिना हिन्दुस्तान के डाटा के अमेरिका चीन से नहीं लड़ सकता, क्योंकि चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा डाटा है और फिर भारत के पास है. दुनिया AI की बात करती है लेकिन बिना डाटा के AI का कोई मतलब नहीं है और डाटा भारत के पास है. पिछली सदी तेल की थी, सउदी अरब, अमेरिका, रूस, ईरान के पास तेल था लेकिन 21वीं सदी डाटा की है, लेकिन US-भारत की ट्रेड डील में नरेंद्र मोदी ने पूरा डाटा अमेरिका के हवाले कर दिया है. अब हिन्दुस्तान का डाटा अमेरिका कहीं भी रख सकता है.

देश में ‘तूफान’ आने वाला है

उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी ने अमेरिका से कहा है कि आप जिससे तेल खरीदने को कहेंगे, उससे ही हम तेल खरीदेंगे. हिंदुस्तान का कोई भी प्रधानमंत्री ऐसा काम नहीं करता. मैं आपको लिखकर दे सकता हूं कि नरेंद्र मोदी भी यह काम नहीं करते. इसलिए मेरा सवाल है: आखिर उस दिन ऐसा क्या हुआ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश का सारा डेटा अमेरिका को सौंप दिया. हमारे देश और किसानों का डेथ वारंट साइन कर दिया.

देश में ‘तूफान’ आने वाला है क्योंकि

⦁ अमेरिका का अखरोट, बादाम, सेब, दाल, कपास, सोयाबिन भारत आएगा

⦁ नरेंद्र मोदी ने देश का सारा का सारा डेटा ट्रंप को सौंप दिया

नरेंद्र मोदी ने ट्रंप को गारंटी दी है कि हिंदुस्तान हर साल 9 लाख करोड़ रुपए के अमेरिकन प्रोडक्ट खरीदेगा…

राहुल गांधी ने कहा कि देश में ‘तूफान’ आने वाला है क्योंकि अमेरिका का अखरोट, बादाम, सेब, दाल, कपास, सोयाबिन भारत आएगा. पीएम मोदी ने देश का सारा का सारा डेटा ट्रंप को सौंप दिया. पीएम मोदी ने ट्रंप को गारंटी दी है कि हिंदुस्तान हर साल 9 लाख करोड़ रुपए के अमेरिकन प्रोडक्ट खरीदेगा.