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जानिए क्या है ऐसी खासियत जिससे हुई दो अद्वितीय पिस्तौल की नीलामी 2 करोड़ रुपए

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पिस्तौल की लागत कितनी है? यह सवाल पूछे जाने पर कि क्या हर कोई सिर्फ अनुमान लगाने लगा है। क्योंकि किसी को भी पिस्तौल या हथियार की सही कीमत का पता नहीं होता है।

लेकिन अमेरिका के डलास में बेची गई दो पिस्तौल की कीमत 2 मिलियन डॉलर तक हो सकती है। आपने ऐसा क्यों कहा? इसलिए ये पिस्तौल आम नहीं हैं। उनकी एक विशेषता है। ये दोनों अलग-अलग पिस्तौल 3 मिलियन वर्ष पुराने उल्कापिंड से बने हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, मोनोनोलुस्टा पृथ्वी पर सबसे शुरुआती उल्कापिंडों में से एक है। इसलिए, इन पिस्तौल का एक अलग महत्व है। संयुक्त राज्य अमेरिका में हेरिटेज ऑक्शन हाउस द्वारा 7 जुलाई को पिस्तौल की नीलामी की जाएगी।Mioneolusta उल्कापिंड की खोज स्वीडन में 1959 में हुई थी।

इस उल्कापिंड का उपयोग करके पिस्तौल बनाए गए थे। नीलामी की तैयारी पूरी कर ली गई है और इन पिस्तौल की शुरुआती कीमत 2 करोड़ रुपये रखी गई है। नीलामी करने वाली एजेंसी के निदेशक क्रेग किसिक के अनुसार, इनमें से अधिकांश पिस्तौल उल्कापिंड से बने हैं।

पिस्तौल को विशेष रूप से वेबसाइट पर लिखा गया है और कहा जाता है कि इन पिस्तौल का निर्माण 1969 की प्रसिद्ध कोल्ट पिस्तौल के तत्वावधान में किया गया है।

प्रिंस ने खुद भेजे ये तोहफे जब भारतीय प्रवासी ने बनायीं दुबई शासक की खूबसूरत तस्वीर

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संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के दुबई में रह रहे भारतीय प्रवासी ने दुबई शासक की खुद से तस्वीर बनाकर उनके दिल में अपनी एक ख़ास जगह बना ली। बताया जा रहा है कि इस भारतीय कलाकार ने UAE नेताओं के खूबसूरत चित्र बनाने के लिए एक असामान्य माध्यम का इस्तेमाल किया है ,तो वहीँ UAE शेख ने ऐलान किया एक्सपो 2020 का लोगो के तौर पर इन तस्वीरों को इस्तेमाल किया जाएगा।

सूत्रों से मिली जानकारी में पता चला कि कलाकार ने अपने नायक शेख मोहम्मद के बहुत विस्तृत और जटिल चित्र बनाने के लिए चार आकारों के टिकटों का उपयोग किया, और अब UAE शेख ने उस भारतीय कलाकार को किसी दिन उपहार देने की उम्मीद जताई है। शेख मोहम्मद बिन राशिद अल मकतूम, UAE के उप-राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री और दुबई के शासक, और आगामी एक्सपो 2020 के कलाकार अशोक कुमार नाथभाई जादव ने एक्सपो 2020 के लोगो के स्टाम्प छापों का इस्तेमाल करके एक चित्र चित्रित किया है ।

एक भारतीय व्यवसायी और कलाकार, जो UAE में जन्मे और पले-बढ़े हैं, जिनका नाम अशोक है और 1989 से संयुक्त अरब अमीरात के निवासी हैं। अशोक ने बताया कि वे मूल रूप से गुजरात के हैं। उनके पिता ने यहां व्यवसाय करने के लिए परिवार सहित यहाँ आ गए। गल्फ इंडियन हाई स्कूल के एक पूर्व छात्र, अशोक की शादी अब मिताल अशोक कुमार से हुई है और उनके दो लड़के हैं जिनकी उम्र 16 और तीन साल है।

आप अभी तक हैं अनजान, सेक्स करने के इन तरीकों से, पढ़े पूरी ख़बर

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सेक्स के दौरान पार्टनर को खुश करने के लिए क्या करें, अपनी गर्लफ्रेंड को सेक्स के लिए कैसे तैयार करें, सेक्स के दौरान ये गलियाँ न करें.अभी तक आप ऐसी कई खबर पढ़ चुके होंगे। लेकिन आज हम आपके एक ऐसी खबरला रहे हैं जो अपने आप में ही कुछ हटकर है।

इस खबर में हम आपको सेक्स के कुछ ऐसे तरीके बताने जा रहे हैं जो न तो आपने कभी सुना होगा और जब सुना नहीं तो इस्तेमाल करने की बात ही दूर है। चलिए आपको सेक्स के इन तरीकों से रूबरू कराते हैं।

रेनबो किस: इसके नाम पर ना जाएं। रेनबो किस है जब कोई पुरुष महिला के साथ पीरियड में रिलेशन बनाता है।

पर्ल नेकलेस: आप यदि सोच रहे हैं कि इसमें आपको अपने पार्टनर को सेक्स के लिए तैयार करने के लिए नेकलेस गिफ्ट करना है, तो आप गलत हैं। वाकई में, इस तकनीक में पुरुष अपने स्‍पर्म से महिला के गर्दन के चारों और नेकलेस बनाता है।

श्रीम्पिंग: आप इसे एक अजीब तरीका कह सकते हैं- श्रीम्पिंग में पार्टनर आपकी पैरों की अंगुलियों को चूसता है और फिर आप भी ऐसा ही करती हैं। कुछ लोग ऐसा करना पसंद करते हैं जब कि अन्य लोगों को यह अजीब लग सकता है।

फेलचिंग: यदि आप सोचते हैं कि रेनबो किस बेकार सी चीज है तो ये तो और भी अजीब है। फेलचिंग का मतलब है महिला के एनल से ऑर्गेज्‍म तक पहुंचना.हे भगवान लोग क्या क्या करते हैं!

स्नो बॉलिंग: सेक्स के इस तरीके में महिला ओरल सेक्स करती है। जब पुरुष को ऑर्गेज्‍म होता है वो इसे एंजॉय करती है। अब इससे ज़्यादा बताने की शायद ज़रूरत नहीं है।

‘सरकार’ घोड़ों को हाई डोज इंजेक्शन देकर मार रही है जानें क्यों?

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छत्तीसगढ़ में घोड़ों की प्रजाति को हाई डोज इंजेक्शन देकर मारा जा रहा है. राजनांदगांव जिले में दो और दुर्ग में अब तक एक घोड़े को इंजेक्शन देकर मौत की नींद सुला दिया गया है. ऐसा कोई निजी संस्था या व्यक्ति द्वारा नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र द्वारा ही किया जा रहा है. इसके पीछे जनता की सुरक्षा व गंभीर बीमारी से बचाने का हवाला दिया जा रहा है.

दरअसल पिछले करीब डेढ़ महीने से छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के कुछ घोड़ों में ग्लैंडर्स की बीमारी पाई गई. जांच रिपोर्ट मे ग्लैंडर्स वायरस की पुष्टि होने के बाद राजनांदगांव के पशु धन विभाग द्वारा घोड़ी को मारने के लिए राज्य शासन को पत्र लिखा गया था. शासन से आदेश मिलने के बाद इस घोड़ी को इंजेक्शन का हैवी डोज देकर मार दिया गया.

राजनांदगांव में तीसरा मामला
घोड़ी में ग्लैंडर्स वायरस का राजनांदगांव में यह दूसरा मामला है. माह भर पहले ग्लैंडर्स वायरस से ग्रासित एक अन्य घोड़ी को सरकार की अनुमति के बाद मारा गया था. दो घोड़ियों के अलावा राजनांदगांव के एक घोड़े को दुर्ग जिले में इस वायरस के कारण मारा गया था.

राजनांदगांव के पशु धन विभाग के डॉ. तरुण रामटेके ने बताया कि शहर में घोड़ों में ग्लैंडर्स वायरस फैलने की शिकायत सामने आने के बाद घोड़े और घोड़ियों की जांच की गई. इस दौरान पठानपारा बसतंपुर निवासी सुल्तान खान और शेख रोशन की घोड़ी में भी ग्लैंडर्स वायरस पाजिटीव पाया गया. उसके बाद इस घोड़ी को मौत के घाट उतार दिया गया. शहर से दूर नवागांव हेजरी में डॉक्टर और विशेषज्ञयों की देखरेख में उनके शवों को दफनाया गया. 
डॉ. रामटेके ने बताया कि ग्लैंडर्स वायरस आस-पास के 15 से 20 किलोमीटर दूर तक लोगों को प्रभावित कर सकता है. इसलिए इस खतरनाक बिमारी से प्रभावित घोड़ों और घोड़ियों को इंसानों से दूर रखा जाता है. साथ ही अधिक प्रभाव होने पर शासन की अनुमति के बाद उन्हें मार दिया जाता है ताकि दूसरे लोंगों में ये खतरनाक वायरस फैल न सके.

महिला ने सड़क किनारे से खरीदी थी एक अंगूठी, 13 साल बाद हुआ कुछ ऐसा की एक ही झटके में बन गई करोड़पति

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कहते हैं ऊपर वाला जब देता है तो छप्पर फाड़ के देता है. इसी तरह कई बार इंसानों की किस्मत 1 पल में चमक जाती है. ऐसा ही कुछ एक महिला के साथ हुआ था जो अंगूठी में जड़े नग को एक आम क्रिस्टल समझ कर कई सालों तक पहनती रही. सड़क से ली हुई यह अंगूठी इसकी जिंदगी बदल देगी ऐसा उस महिला ने कभी सोचा भी नहीं था. आपको जानकर हैरानी होगी लेकिन रातो रात यह महिला करोड़पति बन गई.

लंदन में हुए इस मामले के बारे में बताया जा रहा है कि एक महिला ने बाजार से 13 साल पहले एक अंगूठी खरीदी. वो महिला इस अंगूठी को एक सामान्य अंगूठी समझकर 13 सालों तक अंगुली में पहनति रही. इस महिला ने जरा भी नहीं सोचा था कि यह अंगूठी उसकी जिंदगी बदल देंगी.

महिला ने यह अंगूठी मात्र 13 डॉलर में खरीदी थी. सामान्य खूबसूरती के लिए खरीदी गई अंगूठी में एक बेशकीमती हीरा लगा हुआ था. जब महिला को इस अंगूठी की कीमत के बारे में पता चला तो वो दंग रह गई.

13 डॉलर में खरीदी गई इस अंगूठी में लगे हीरे की कीमत करीब 46000 थी. महिला की अंगूठी पर लगा यह हीरा 26 से 27 कैरेट का था. इस हीरे की कीमत भारतीय मुद्रा में कीमत ₹2900000 है. महिला ने जिस हीरे को क्रिस्टल पत्थर समझ कर खरीदा था. आज उसी ने महिला की जिंदगी बदल दी.

इस अंगूठी की कीमत से अंजान यह महिला पिछले 13 सालों से इसे लगातार पहन रही थी. कई दिनों तक लगातार अंगूठी पहनने पर यह खराब हो गई थी, इसलिए महिला ज्वेलर्स की दुकान पर इसे ठीक कराने ले गई थी. ज्वेलर्स ने अंगूठी को देखकर महिला को बताया कि आपकी अंगूठी में यह जो क्रिस्टल जड़ा हुआ है, ये 19वीं शाताब्दी का डेड स्टोन है जिसकी अंतरराष्ट्रीय बाजार में लाखों रूपए की कीमत है.

महिला को पैसे की सख्त जरूरत थी इसलिए उसने तुरंत इस अंगूठी को बेचने का फैसला किया. आपको जानकर हैरानी होगी लेकिन आर्थिक तंगी से जूझ रही इस महिला की ये अंगूठी करोड़ों रुपए में बिकी. इस से यह महिला रातो रात करोड़पति बन गई.

एक इंटरव्यू में इस महिला ने बताया कि आपको जानकर हैरानी होगी लेकिन सड़क से खरीदी इस अंगूठी ने आज मुझे करोड़पति बना दिया है, इसलिए में सड़क से शॉपिंग हमेशा करुँगी. महिला ने कहा कि अब मेरे पास नया घर, नई कार है और जल्द ही में बिजनेस करने का सोच रही हूं.

काम के अधिकार को खत्म करने का प्रयास

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पिछले दिनों संसद में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए हमारे कृषि व ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र तोमर ने कहा कि सरकार मनरेगा को हमेशा के लिए चलाने के पक्ष में नहीं है. उनके अनुसार यह गरीबों के लिए एक योजना है. उनकी सरकार देश से गरीबी ही हटा देगी इसलिए मनरेगा लम्बे समय तक नहीं चलाया जाएगा. यह बहुत ही गंभीर व चिंताजनक संकेत है जो हमारे संसद में दिया गया है, वो भी उस समय जब देश अभूतपूर्व बेरोजगारी व कृषि संकट से गुजर रहा है. देश की आबादी का बड़ा हिस्सा कुपोषण का शिकार है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस)-4 की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015-16 में देश में 38.4% बच्चे छोटे कद के थे, 35.8% बच्चे कम वजन के और 53% महिलाओं में खून की कमी थी. इस कुपोषण का मुख्य कारण है काम का आभाव. ऐसे समय में संसद में मनरेगा पर गंभीर चर्चा (जिसमें मनरेगा के लिये कम बजट पर वाजिब चिंता जताई गई थी) में हिस्सा लेते हुए माननीय मंत्री जी का बयान ग्रामीण जनमानस में गंभीर चिंता पैदा करता है.

वर्तमान सरकार का रवैया, मनरेगा को लेकर जगजाहिर है. यह बात इस वजह से और भी सोचनीय है क्योंकि इस समझ के कारण इस कानून के क्रियान्वन करने की मूल अवधारणा व परिपेक्ष ही कमजोर हो जाता है. इससे पहले हमारे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी ने संसद में एक हल्का बयान दिया था. 12 मार्च 2015 को बजट सत्र में उन्होंने कहा था, “क्या आपको लगता है कि मैं इस योजना का अंत कर दूंगा. मेरी राजनीतिक बुद्धि मुझे ऐसा करने की अनुमति नहीं देती है. यह 60 वर्षों में गरीबी से निपटने में आपकी (कांग्रेस) विफलता का एक जीवित स्मारक है. मैं इस योजना को गीत नाच और ढोल नगाड़ों के साथ जारी रखूंगा”.

मनरेगा, जिससे ग्रामीण भारत में करोड़ो परिवारों का जीवन चलता है, के बारे में प्रधान मंत्री की ऐसी समझ जनता में निराशा और चिंता बढ़ाती है. यह ग्रामीण भारत के विकास के रस्ते के सन्दर्भ में भी सरकार की कमजोर समझ की परिचायक है.

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण अधिनियम एक कानून है न कि योजना

मनरेगा को वर्तमान सरकार समझने में मूल रूप से ही गलत रही है. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण अधिनियम एक कानून है जिसे भारत की संसद द्वारा बनाया गया है. इसके पीछे जनता के एक लम्बे संघर्ष और अपार आशाओं की गाथा है. यह कोई कार्यक्रम, योजना अथवा अभियान नहीं है जैसा हमारे नेताओं के वक्तव्यों से झलकता है. कोई कार्यक्रम, योजना अथवा अभियान कभी भी बंद किये जा सकते हैं परन्तु संसद की ओर से पारित कानून आने जाने वाली सरकारों व उनके नेताओं की इच्छा पर निर्भर नहीं करते. मनरेगा के तहत किसी भी चुनी हुई सरकार की बाध्यता है कि वह ग्रामीण नागरिकों को काम उपलब्ध करवाए.

ऐसा न होने पर कोई भी ग्रामीण नागरिक अदालत के दरवाजे पर दस्तक दे सकता है. काम देने में असफल रहने पर सरकार को कानूनी मजबूरी के चलते बेरोजगारी भत्ता देना होगा वो भी तय समय सीमा में. काम के अधिकार के साथ-साथ मनरेगा का दूसरा मुख्य लक्ष्य है ग्रामीण क्षेत्र में आधारभूत संरचना बनाना, कृषि भूमि का विकास, जल संरक्षण. कल्पना की गई थी कि पंचायत के लोग ग्राम सभा के माध्यम से अपनी पंचायत में होने वाले कामों की योजना बनाएंगे. यह काम उसी पंचायत के लोगों द्वारा किये जायेंगे. परन्तु वर्तमान समय में यह दोनों महत्वपूर्ण पक्ष, काम का अधिकार और ग्रामीण क्षेत्र का योजनाबद्ध विकास, मनरेगा के क्रियान्यवन से गायब है और इसे केवल अन्य किसी कल्याणकारी योजनाओं की तरह समझा व लागू किया जा रहा है.

मनरेगा के कुछ सुखद अनुभव

मनरेगा की सफलता के कुछ पहलू हम आर्थिक तथा कृषि संकटग्रस्त पिछले कुछ वर्षों में देख चुके हैं, जब ग्रामीण भारत में जनता की अजीविका के मुख्य साधन के रूप में मनरेगा उभरा है. अध्ययन यह बताते हैं कि भारत में जहां सही तरीके से इस कानून को लागू किया गया वहां गरीबी उन्मूलन तथा मजदूरी के दाम में बढ़ोत्तरी के लिए मनरेगा ने निर्णायक भूमिका निभाई है. त्रिपुरा इसका एक बेहतरीन उदाहरण है जहां मनरेगा को प्रभावशाली ढंग से लागू किया गया है. जिसके चलते गरीबी को कम करने और लोगो के जीवन स्तर को सुधारने में बेहतरीन परिणाम दिखे हैं.

वर्ष 2004-2005 में त्रिपुरा में 45.5% जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे थी, जो वर्ष 2009-10 में कम होकर 19.8% रह गई. राज्य सरकार के अन्य प्रयासों के साथ मनरेगा की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है. यह इस कानून की संभावनाओं और क्षमताओं का परिचायक है. ऐसा ही एक उदाहरण नेशनल काउंसिल फॉर एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) की रिपोर्ट से मिलता है जिसके अनुसार, 2004-05 के बाद से गरीबी में आई कमी के लिए कम से कम 25% जिम्मेदारी मनरेगा की है.

यह तब है जब एक परिवार को प्रतिवर्ष केवल 100 दिन का रोजगार मिलता है न की परिवार के प्रत्येक सदस्य को. समाज के समावेशी विकास में भी मनरेगा का महत्वपूर्ण योगदान है क्योंकि इसमें काम करने वालो में सामाजिक और आर्थिक तौर से वंचित समुदायों के मज़दूरों की भागीदारी ज्यादा है. वर्ष 2012 में अनुसूचित जाति का प्रतिशत कुल आबादी में 17.82 था परन्तु उनकी मनरेगा के काम में भागीदारी 22.02 प्रतिशत थी. इसी तरह अनुसूचित जनजाति के लोगो की भागीदारी मनरेगा के काम में 18.25 प्रतिशत थी जो उन की कुल आबादी में हिस्सेदारी 10.63 प्रतिशत से कहीं ज्यादा है. महिलाओं की भागीदारी भी मनरेगा में उत्साहवर्धक हैं. इससे स्पष्ट होता है कि समाज में हाशिये पर धकेले गए लोगों की अजीविका सुनिश्चित करने के लिए मनरेगा बहुत महत्वपूर्ण है. इसलिए आवश्यकता है इससे मजबूत करने की.

वर्तमान समय में मनरेगा की अधिक जरूरत

वर्तमान में हमारा देश एक विशेष दौर से गुजर रहा है जब ग्रामीण भारत विशेष तौर पर दो प्रमुख चुनौतियों का सामना कर रहा है. कृषि संकट और बेरोजगारी. यह दोनों एक दूसरे को प्रभावित करते हैं. कृषि संकट के चलते ज्यादा से ज्यादा किसान काश्तकारी से दूर होते जा रहे हैं और ग्रामीण मजदूरों की लम्बी कतार में जुड़ते जा रहे है. ऐसे समय में औद्योगिक विकास भी वांछित रोजगार उत्पन्न करने में अक्षम है. परिणाम स्वरूप एनएसएसओ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में बेरोजगारी की दर 45 वर्षों की उच्चतम दर 6.4 प्रतिशत पर पहुंच गई है. यह एक विस्फोटक स्थिति है जो एक गहरे आर्थिक संकट की तरफ इशारा कर रही है. मनरेगा के तहत प्रत्येक परिवार के लिए 100 दिन का रोजगार ना केवल उस परिवार के लिए राहत है बल्कि लोगों की क्रय शक्ति बढ़ने से यह देश की आर्थिकी में भी ऊर्जा भरने का काम करता है.

चिंताजनक स्थिति

उपरोक्त समझ के विपरीत वर्तमान सरकार मनरेगा का सकारात्मक उपयोग करने में विफल रही है. वहीं ठीक इसके विपरीत सरकार के प्रयास मनरेगा को कमजोर करने के ही रहे हैं. पिछले पांच वर्षों में तमाम दावों के बावजूद मनरेगा के लिए बजट की कमी लगातार बनी रही है. इस वर्ष भी (2019-2020) के बजट में केवल 60,000 करोड़ रुपये मनरेगा के लिए आवंटित किये गए है जो पिछले वर्ष से 1084 करोड़ रुपये कम है. लम्बे समय से मनरेगा के लिए बजट इसके आस पास ही चल रहा है जिसके चलते प्रतिवर्ष 20-30% देनदारियां राज्यों पर बकाया रह जाती हैं, जो अगले वर्षों के खाते में जुड़ती जाती है. परन्तु इसके लिए अतिरिक्त बजट का कोई प्रावधान नहीं होता है. प्रत्येक आवेदक परिवार को 100 दिन प्रतिवर्ष रोजगार उपलब्ध करवाने में भी बजट की कमी एक महत्वपूर्ण बाधक बनी हुई है.

वर्ष 2017 -2018 में औसतन रोजगार 45 दिन प्रति परिवार मिला था. अब ना केवल कम दिन रोजगार मिल रहा है अपितु बहुत बड़ी संख्या में आवेदक काम से महरूम भी रह रहे हैं. वर्ष 2017-2018 में ही कुल 8.4 करोड़ परिवारों ने काम के लिए आवेदन किया था जिसमें से 7.2 करोड़ परिवारों को ही काम मिल पाया और कुल आवेदकों के 15% (1.2 करोड़) परिवारों को एक भी दिन रोजगार नहीं मिला और न ही बेरोजगारी भत्ता. उपरोक्त स्थिति दर्शाती है कि वर्तमान सरकार मनरेगा को उसकी मूल अवधारणा के विपरीत अनमने ढंग से लागू कर रही है. एक कदम आगे जाकर इस जनपक्षीय कानून को खत्म करने की कोशिश कर रही है और तोमर जी का बयान इसी और इशारा करता है. भारत की मेहनतकश जनता जिसने अपार संघर्षो और बलिदानों से काम के अधिकार, जी हां काम करने के कानूनी हक को हासिल किया है, इसे कतई सहन नहीं करेगी. यह बात भी सच है कि मनरेगा को सुचारू तरीके से लागू करने के लिए कई कठिनाईयां हैं, तकनीकी दिक्कते हैं, ठेकेदारों का प्रधानों के साथ गठजोड़ है, भ्रष्टाचार है परन्तु जनता की भागीदारी, दबाव व राजनीतिक इच्छाशक्ति की बदौलत इन सबसे लड़ा जा सकता है.

वर्तमान में लगभग 38% ग्रामीण जनता गरीब है (यह आधिकारिक आंकड़े है और असल आंकड़ा इससे कहीं ज्यादा है) वर्ष 2011 की मतगणना के अनुसार भारत में 75% गरीब लोग ग्रामीण भारत में है. बेरोजगारी और कम उत्पादकता इस ग्रामीण भारत में गरीबी का मुख्य कारण है. ग्रामीण गरीब के लिए कृषि संकट के समय में काम ढूंढना मुश्किल हो गया है. कृषि के तहत जमीन में लगातार कमी हो रही है. ऊपर से पिछले कुछ वर्षों से देश का एक बड़ा हिस्सा सूखे की चपेट में है. ऐसी स्थिति में रोजगार के नए अवसर पैदा करने में मनरेगा की बहुत बड़ी भूमिका है. इस काम के जरिए भूमि सुधार और जल संरक्षण के माध्यम से कृषि उपज बढ़ाई जा सकती है और संकट में चल रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सही पटरी पर लाया जा सकता है. बस जरूरत है सरकार के सही दृष्टिकोण और जनता के सतत दवाब की.

देखिये भारतीय इतिहास की 6 अनदेखी तस्वीरें

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क्या आपने इन तस्वीरों को पहले देखा है? ये पिछले दिनों की श्वेत-श्याम तस्वीरें हैं जो आजकल के जीवन में बहुत कम देखने को मिलती हैं।

मुझे उम्मीद है कि आप उन सभी को देखना पसंद करेंगे।

क्या आपने नाथूराम गोडसे की तस्वीर देखी है इससे पहले किसी भी जगह पर? यह महात्मा गांधी की हत्या से ठीक पहले लिया गया स्नैप था।

मदर टेरेसा की असली तस्वीर जो आज के जीवन में बहुत कम पाई जाती है। मुझे उम्मीद है कि आप उसे इस असली फोटो में देखकर खुश होंगे।

इस लेख को दूसरों के साथ साझा करें और उन्हें भी इन तस्वीरों के बारे में बताएं।

मुर्गी के आहार के चलते मक्के का आयात बढ़ा, भारत में बढ़ रहा है मांसाहारी भोजन का चलन…

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भारत में मांसाहारियों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है. यही वजह है कि भारत मुर्गों के लिए आहार बड़े पैमाने पर आयात कर रहा है.

देश के सबसे बड़ी मुर्गी पालन कंपनी सुगुना फूड्स प्राइवेट लिमिटेड के जनरल मैनेजर जैसन जॉन ने कहा, “एशिया के दूसरे सबसे बड़े मक्का उत्पादक से नवंबर में दस लाख टन मक्का खरीदे जाने का अनुमान है. ज्यादातर आयात म्यांमार और युक्रेन से होने का अनुमान है.”

कम्पाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीएलएफएमए) के अनुसार भारत की बढ़ती आबादी, लोगों की बढ़ती हुई बचत और बदलते खान-पान की वजह से मांसाहारी भोजन का चलन बढ़ रहा है.

पिछले साल की तुलना में मार्च को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष के अनुसार प्रति व्यक्ति आय में 10 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है.

अमेरिकी कृषि मंत्रालय के मुताबिक इस वर्ष चिकन की मांग 5 फीसदी के साथ लगभग 51 लाख टन बढ़ने का अनुमान है.

भारत में मक्का के आयात की एक दूसरी वजह यह भी है कि पिछले वर्ष कई राज्यों में कम बारिश होने की वजह से इसके पैदावार पर असर पड़ा था.

सीएलएफएमए ने कहा है, “2018-19 में मक्का की मांग (2 करोड़ टन) की तुलना में उत्पादन करीब 1.8 करोड़ टन -1.9 करोड़ टन का था. जो सरकार के उत्पादन के अनुमान से काफी कम था. सरकार का अनुमान था कि उत्पादन 2.78 करोड़ का होगा.”

अमेरिकी कृषि मंत्रालय के अनुसार भारत जो पिछले साल से पहले तक शुद्ध निर्यातक था. जबकि इस वर्ष सिर्फ 5 लाख टन ही बिक्री होने का अनुमान है. जो 2017-18 में निर्यात किए गए 11 लाख टन की तुलना में काफी कम है.

सिंगापुर में राबोबैंक के वरिष्ठ अनाज विश्लेषक ऑस्कर जाकरा ने कहा, “मेरे हिसाब से भविष्य में भारत मक्का का कम से कम निर्यातक हो जाएगा. अगर कॉर्न की खपत की तुलना में घरेलू उत्पादन में गिरावट बढ़ती रही तो भारत शुद्ध आयातक बन सकता है.”

अमेरिकी कृषि मंत्रालय यूएसडीए के अनुसार भारत में मक्का के उत्पादन में हुई तेजी से गिरावट का असर मक्का की स्थानीय कीमत पर भी पड़ा है. पिछले साल की तुलना में जुलाई के महीने में इसके दाम में 52 फीसदी का इजाफा हुआ है.

अधिक मात्रा में निर्यात होने से जून के महीने में मक्का की कीमत बीते पांच सालों में सबसे ज्यादा हो गई थी.

29 जुलाई को शिकागो में मक्का की अनुमानित कीमत 1.2 फीसदी बढ़त के साथ प्रति बुशेल (एक बुशेल 56 पाउंड = 25.40 किलोग्राम) 295.57 रुपये हो गई थी.

स्थानीय कीमत में बढ़ोत्तरी होने की वजह से भारतीय आनाज उत्पादक मक्का की जगह पर गेंहू खरीद रहे हैं. हालांकि यह आमतौर पर मक्का से महंगा होता है.

सीएलएफएमए के अनुसार इस साल 3 लाख टन से लेकर 4 लाख टन गेहूं की खरीदारी की गई है.

सरकार के संचालन वाली भारतीय धातु और खनिज व्यापार निगम (एमएमटीसी) की वेबसाइट पर उपलब्ध नोटिस के अनुसार एमएमटीसी भी अगस्त से अक्तूबर तक शिपमेंट के लिए विदेशी आपूर्तिकर्ताओं की ओर से प्रस्ताव की उम्मीद कर रहा है.

खत्म हो जाएंगे मुट्ठी भर मटर खाने से ये दो घातक रोग

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आज के इस आर्टिकल में आप पढ़ेंगे मटर खाने से होने वाले फायदे। हरि मटर को सब सब्जी के लिए इस्तेमाल करते है और यह होती भी स्वादिस्ट है। यह जितना स्वादिस्ट है उससे भी अधिक यह आपकी सेहत के लिए लाभदायक होती हैं। हमेशा मुट्ठी भर मटर खाने से खत्म हो जाएंगे ये दो रोग।

कोलेस्ट्रोल के नियंत्रण में सहायक

हरे मटर से आप कोलेस्ट्रोल को नियंत्रित रख सकते है यह बहुत फायदेमंद है। आप हमेशा हरे मटर का सेवन किया कीजिये क्योंकि यह आपके शरीर में कोलेस्‍ट्रॉल को कभी भी बढ़ने नहीं देगा। इसमे आपके शरीर से ट्राइग्लिसराइड्स स्‍तर को कम करने का भी गुण होता है व हरे मटर के सेवन से खून में कोलेस्‍ट्रॉल नियंत्रित होता है। हरे मटर खाने से आपके शरीर से कई प्रकार की बीमारियां कम होती है।

कैंसर में फायदेमंद

आपको बता दें कि हरे मटर पेट के कैंसर के लिए एक प्रकार की असरदार औषिधि के रूप में साबित हुई है। यदि हरे मटर का रोजाना सेवन किया जाए तो इससे आपके पेट में होने वाले कैंसर का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। क्योंकि इसमें काउमेस्ट्रोल भी पाया जाता हैं जो कैंसर जैसे भयानक रोग से लड़ने में सहायक होता है।

ओडिशा रसगुल्ले को मिला GI टैग, जानें क्या है इसकी खासियत

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ओडिशा ने सोमवार को अपने ‘रसगुल्ले’ के लिए बहुप्रतीक्षित भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग हासिल किया.

सूत्रों ने बताया कि भौगोलिक संकेत रजिस्ट्रार, चेन्नई ने वस्तु भौगोलिक संकेत (पंजीकरण एवं संरक्षण), कानून 1999 के तहत इस मिठाई को ‘ओडिशा रसगुल्ला’ के तौर पर दर्ज करने का प्रमाणपत्र जारी किया. यह प्रमाणपत्र 22 फरवरी 2028 तक वैध रहेगा.

जीआई टैग किसी वस्तु के किसी खास क्षेत्र या इलाके में विशेष होने की मान्यता देता है.

साल 2015 से, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के बीच रसगुल्ले की शुरुआत को लेकर जंग चल रही है. बंगाल को 2017 में उसके ‘रसगुल्ले’ के लिए जीआई टैग प्राप्त हुआ था.

इसके अगले साल, ओडिशा लघु उद्योग निगम लिमिटेड (ओएसआईसी) ने रसगुल्ला कारोबारियों के समूह उत्कल मिष्ठान व्यावसायी समिति के साथ मिलकर ‘ओडिशा रसगुल्ले’ को जीआई टैग देने के लिए आवेदन किया था.इस घटनाक्रम का स्वागत करते हुए, विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रदीप्त नाइक ने कहा कि राज्य को यह टैग बहुत पहले ही मिल जाना चाहिए था.

बीजेपी नेता ने कहा- 

बीजेपी नेता ने कहा, ‘इसे मिलने में राज्य सरकार की लापरवाही के कारण देरी हुई.’

‘रसगुल्ला’ भगवान जगन्नाथ के लिए निभाई जाने वाली राज्य की सदियों पुरानी परंपराओं का हिस्सा रहा है और इसका जिक्र 15वीं सदी के उड़िया काव्य ‘दांडी रामायण’ में भी मौजूद है.