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“अगले महीने आ सकता है ला नीना. भारत में पड़ेगी कड़ाके की ठंड, पहाड़ों पर होगी भारी बर्फबारी, IMD ने दी चेतावनी”

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भारत के कई राज्यों में इस बार औसत से ज्यादा बारिश दर्ज की जा रही है. मौसम विभाग की ओर से सितंबर महीने में भी औसत से ज्यादा बारिश होने की चेतावनी दी गई थी, जिसका असर सितंबर की शुरुआत में देखने को भी मिला.

कई राज्यों में बारिश आफत बनकर बरसी. अब मौसम विज्ञानियों ने चेतावनी दी है कि इस साल के आखिर में ला नीना की स्थिति फिर से लौट सकती है, जिससे भारत में सामान्य से ज्यादा सर्दियां पड़ सकती हैं. यानी इस साल भारत में काड़के की ठंड पड़ सकती है.

अमेरिका के जलवायु पूर्वानुमान केंद्र ने कहा कि अक्टूबर-दिसंबर में ला नीना आने की 71 प्रतिशत संभावना है. इस साल की शुरुआत में थोड़े समय के लिए आए ला नीना की तरह, इसके फरवरी 2026 तक खत्म होने की संभावना है. ला नीना, प्रशांत महासागर में समुद्र के पानी के ठंडा होने की स्थिति है, जिसकी वजह से उत्तरी भारत में सामान्य से ज्यादा सर्दियां होती हैं.

मानसून के दौरान बनी रहेगी तटस्थ स्थिति ला नीना, एल नीनोसदर्न ऑसिलेशन (ENSO) का ठंडा रूप है. इसमें प्रशांत महासागर का पानी ठंडा हो जाता है और इसका असर दुनिया के मौसम पर पड़ता है. भारत में इसे ज्यादा ठंडी सर्दियों से जोड़कर देखा जाता है. भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अभी प्रशांत महासागर में न तो एल नीनो है और न ही ला नीना है. IMD के पूर्वानुमानों के मुताबिक मानसून के दौरान यही तटस्थ स्थिति बनी रहेगी.

ला नीना बनने की 50प्रतिशत संभावना हालांकि, आईएमडी ने मानसून के बाद के महीनों में ला नीना के उभरने की संभावना का अनुमान लगाया है. आईएमडी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस साल अक्टूबर दिसंबर के बीच ला नीना बनने की 50प्रतिशत से ज्यादा संभावना है. भारत में ला नीना आमतौर पर ज्यादा ठंडी सर्दियों से जुड़ा होता है. ऐसे में इस साल भारत में कड़ाके की सर्दी पड़ सकती है. जलवायु परिवर्तन की वजह से गर्मी का असर कुछ हद तक इसे कम कर सकता है, लेकिन ला नीना वाले सालों में सर्दियां सामान्य से ज्यादा ठंडी होती हैं. इसलिए यह साल सबसे गर्म सालों में नहीं गिना जाएगा. क्योंकि मानसून की बारिश ने पहले ही तापमान को कम किया हुआ है.

स्काइमेट वेदर के अध्यक्ष जीपी शर्मा ने कहा कि प्रशांत महासागर पहले से ही सामान्य से ठंडा है, लेकिन अभी ला नीना की सीमा तक नहीं पहुंचा है. अगर समुद्र की सतह का तापमान 0.5°C से नीचे चला जाए और यह लगातार तीन तिमाहियों तक बना रहे. तभी इसे ला नीना माना जाएगा. ऐसी ही स्थिति 2024 के आखिर में भी बनी थी. जब नवंबर से जनवरी तक थोड़े समय के लिए ला नीना जैसी स्थिति आई थी और फिर दोबारा तटस्थ ( न एल नीनो और न ला नीना) हो गई थी.

पहाड़ी राज्यों में हो सकती है भारी बर्फबारी जीपी शर्मा ने बताया कि प्रशांत महासागर में जारी ठंडक वैश्विक मौसम को प्रभावित कर सकती है. अगर ला नीना आता है तो अमेरिका पहले से ही सूखी सर्दियों (ड्राई विंटर) के लिए अलर्ट पर है. जबकि भारत में इसका असर खासतौर पर उत्तर भारत और हिमालयी इलाकों में पड़ेगा. ये कड़ाके की ठंड और पहाड़ी राज्यों में भारी बर्फबारी ला सकता है.

भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER), मोहाली और ब्राज़ील के राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान की एक स्टडी में पता चला कि 2024 में ला नीना ने उत्तर भारत में तेज शीत लहरें लाने में अहम भूमिका निभाई. स्टडी के अनुसार, ला नीना के समय निचले स्तर की हवाओं में बदलाव ठंडी हवा को ऊपरी इलाकों से भारत की ओर लाता है. इसी कारण शीत लहरें और उनकी अवधि, एल नीनो और सामान्य सालों की तुलना में, ला नीना वाले सालों में ज्यादा होती हैं.

 

“पूर्णिया के सहारे सीमांचल को साधने का प्लान, समझें पीएम मोदी के आज के बिहार के दौरे के मायने?”

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विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बिहार का सियासी माहौल गरमाया हुआ है. राजनीतिक पार्टियां मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए हर संभव कोशिश में जुटी हुई हैं. जहां एक ओर एनडीए फिर से सत्ता पर काबिज होने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है, वहीं दूसरी ओर महागठबंधन चुनावी अखाड़े में जमकर पसीना बहा रहा है.

इस बीच सियासी दलों का सबसे ज्यादा फोकस सूबे के सीमांचल इलाके पर दिखाई दे रहा है. इसी इलाके में आज यानी 15 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दौरा कर रहे हैं, जहां आमजन को कई सौगातें देने वाले हैं.

पीएम मोदी पूर्णिया में 36,000 करोड़ रुपए की विकास परियोजनाओं का ऐलान करने वाले हैं, जिसमें पूर्णिया हवाई अड्डे के नए टर्मिनल भवन का उद्घाटन, राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की भी शुरुआत समेत अन्य विकास कार्य शामिल हैं. वह बिहार में इस साल सातवीं बार पहुंच रहे हैं, जहां उन्होंने सीमांचल पर फोकस किया है. ये वही इलाका है, जो तेजी से राजनीतिक रणक्षेत्र के रूप में उभरा है. यहां प्रशांत किशोर की जन सुराज और असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम के मैदान में उतरने से मुकाबला और भी जटिल हो गया है. आइए जानते हैं कि सीमांचल में किस तरह से सियासी समीकरण बदल रहे हैं और मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना बढ़ने से सियासी लड़ाई दिलचस्प हुई है…

महागठबंधन ने दिया एकजुटता का मैसेज सीमांचल में एनडीए ने विकास पर अपना दांव लगाया है. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में कटिहार का दौरा किया था, जहां उन्होंने किसानों को सहायता का आश्वासन दिया और मखाना बोर्ड के गठन की घोषणा की थी. अब पीएम मोदी का दौरा है. साथ ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी दौरा कर चुके हैं. वहीं, विपक्षी मोर्चे पर कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने अपनी वोटर अधिकार यात्रा के जरिए समर्थन जुटाने की कोशिश की है. ये यात्रा सीमांचल के 8 विधानसभा क्षेत्रों से होकर गुजरी.

वोटर यात्रा के दौरान उन्होंने महागठबंधन के भीतर एकजुटता का मैसेज दिया क्योंकि पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव ने कांग्रेस से टिकट न मिलने के बाद निर्दलीय आरजेडी के खिलाफ चुनाव लड़ा था और लालू प्रसाद यादव के परिवार से रिश्ते बिगड़ गए थे. वोटर अधिकार के यात्रा पूर्णिया पहुंचने पर पप्पू यादव और तेजस्वी यादव के बीच आपसी रिश्ते फिर से जुड़ने जैसा मैसेज दिया गया. राहुल गांधी ने अपने संबोधनों के दौरान बेरोजगारी, कृषि और शिक्षा के मुद्दों पर राज्य और केंद्र दोनों सरकारों पर हमला बोला था.

ओवैसी की एंट्री से किसको नुकसान? इन सब के अलावा सीमांचल में एआईएमआईएम और जन सुराज की मौजूदगी ने सियासी ड्रामे को और भी रोचक बना दिया है. एआईएमआईएम ने 2020 के विधानसभा चुनावों में सीमांचल में पांच विधानसभा सीटें हासिल की थीं, लेकिन इनमें से बाद में 4 विधायक आरजेडी में शामिल हो गए थे. अभी अमौर से उसका एकमात्र विधायक बचा है. यहां ओवैसी ने कांग्रेस और आरजेडी का समीकरण बिगाड़कर रख दिया है क्योंकि मुस्लिम वोट का ध्रुवीकरण हुआ है. पार्टी फिर से वापसी करने और इस क्षेत्र में अपना प्रभाव स्थापित करने के लिए ताबड़तोड़ मेहनत कर रही है.

इधर, राजनीतिक रणनीतिकार से कार्यकर्ता बने प्रशांत किशोर भी अपने जन सुराज आंदोलन के जरिए सीमांचल में काफी समय खर्च कर रहे हैं. वो लगातार दावा कर रहे हैं कि ओवैसी, लालू और नीतीश कुमार ने मुसलमानों का भला नहीं किया है. अब वे विकास के जरिए उनकी स्थिति बदलने वाले है. वे रूपौली, कस्बा, बनमनखी और बैसी जैसे विधानसभा क्षेत्रों में अपना फोकस किए हुए हैं. राजनीति के जानकारों का मानना है कि प्रशांत किशोर की एंट्री से सीमांचल में मुसलमानों का वोट बंटेगा, जिससे महागठबंधन को नुकसान हो सकता है और एनडीए गठबंधन को फायदा पहुंच सकता है.

सीमांचल में कितने फीसदी मुसलमान? बिहार के सीमांचल में किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया जिले आते हैं और ये इलाका पश्चिम बंगाल और असम से सटा हुआ है. इन जिलों में 24 विधानसभा सीटें आती हैं. अररिया जिले में 6, किशनगंज में 4, पूर्णिया 7 और कटिहार में 7 विधानसभा सीटें हैं, जो चुनावी समीकरण को बनाने और बिगाड़ने का काम करती हैं. यहां खासबात ये है कि मुस्लिम आबादी ज्यादा है, जिसके चलते राजनीतिक दल अपने दांव-पेंच से उन्हें अपने पाले में करने में जुटे रहते हैं.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक, सीमांचल में औसतन 46 फीसदी मुसलमान हैं. अररिया में 43 फीसदी, किशनगंज में 68 फीसदी, पूर्णिया में 38 फीसदी, कटिहार में 44 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं. इसके अलावा यादवों और अति पिछड़े वर्गों (ईबीसी) की अच्छी-खासी उपस्थिति है, जिसके चलते राजनीतिक समीकरण निर्णायक बन जाता है.

2015 और 2020 चुनाव के आंकड़े अगर पिछले चुनावों की बात करें तो सीमांचल में कांग्रेस और आरजेडी की दबदबा रहा है, लेकिन ओवैसी के अकेले दम पर साल 2020 का चुनाव लड़ने से आरजेडी और कांग्रेस का समीकरण गड़बड़ा गया था. इलाके की 24 सीटों में से कांग्रेस ने 5, आरजेडी और लेफ्ट ने एक-एक सीट पर जीत दर्ज की थी, जबकि एआईएमआईएम ने पांच सीटों पर विजय पताका फहराई थी. इस लड़ाई में बीजेपी को फायदा पहुंचा और उसने सबसे ज्यादा 8 सीटें हासिल कर लीं और जेडीयू के खाते में 4 सीटें गईं. सबसे ज्यादा नुकसान आरजेडी को हुआ था. वहीं, 2015 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 5, जेडीयू ने 5, कांग्रेस ने 5 सीटों पर विजय पताका फहराई थी. इसके अलावा आरजेडी ने सबसे ज्यादा 9 सीटें जीती थीं.

SIR में सबसे ज्यादा वोट पूर्णिया और किशनगंज से हटाए अभी हाल ही में हुए वोटर लिस्ट के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर भी जमकर सियासत देखी गई. एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि मुस्लिम बहुल सीमांचल क्षेत्र के चार जिलों में से दो जिले ऐसे हैं जहां सबसे ज्यादा वोट काटे गए हैं. हालांकि यूपी से सटे गोपालगंज पहला जिला था जहां सबसे अधिक 15.1 फीसदी मतदाता सूची हटाए गए. इसके बाद सीमांचल के पूर्णिया और किशनगंज जिलों का नंबर देखने को मिला. दोनों जिलों में क्रमशः 12.08 फीसदी और 11.82 फीसदी वोट हटाए गए, कटिहार में 8.27 फीसदी और अररिया में 7.59 फीसदी वोटों को हटाया गया.

“पीएम के दौरे पर तेजस्वी यादव ने किस मंत्री को बरखास्त करने की मांग की, पूछा- क्या मंत्री के खिलाफ FIR होगी?”

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बिहार में सियासी हलचल तेज है. इस बीच आरजेडी के नेता तेजस्वी यादव ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इस मौके पर उन्होंने नीतीश सरकार पर जमकर निशाना साधा. उन्होंने मंत्री जिबेश मिश्रा पर आरोप लगाए.

तेजस्वी यादव ने कहा, आपके सामने बिहार के नगर विकास एवं आवास मंत्री जिबेश मिश्रा की करतूतों को पेश करना चाहता हूं. वो एक फर्जी ड्रग मामले में भी दोषी पाए गए हैं. तेजस्वी यादव ने आगे कहा, मंत्री रहते हुए उन्होंने एक गंभीर अपराध किया है, जिसका वीडियो मैं आपके सामने पेश कर रहा हूं. जब मंत्री जी अपने निर्वाचन क्षेत्र के दौरे पर थे, तो एक पिछड़े समुदाय से आने वाले पत्रकार ने उनसे सड़कों के बारे में सवाल पूछा. सवाल पूछे जाने पर मंत्री जी ने उनके साथ मारपीट की और गाली-गलौज की.

पीएम के दौरे पर क्या मांग की? इस वीडियो को दिखाने के बाद तेजस्वी यादव ने कहा, बिहार में पूरी तरह अराजकता है. क्या इस सीएम को पता है कि मंत्री को फर्जी ड्रग मामले में दोषी ठहराया गया है? पीएम आज यहां आ रहे हैं. क्या इस पत्रकार की मां नहीं है? क्या उसे न्याय मिलेगा?. आप (पीएम) अपने बारे में बोलेंगे, लेकिन क्या आप इस पत्रकार को न्याय दिलाएंगे और मंत्री को बर्खास्त करेंगे? क्या मंत्री के खिलाफ एफआईआर होगी? क्या उन्हें सजा मिलेगी? तेजस्वी यादव ने नीतीश सरकार पर हमला करते हुए कहा, सरकार और सरकार में बैठे लोग सब अपराधी हैं. सम्राट और विजय अपराधी हो गए हैं. साथ ही उन्होंने कहा, सिर्फ एफआईआर नहीं बल्कि कार्यवाही हो.

पीएम के दौरे पर पूछे सवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज बिहार की यात्रा करेंगे. इस दौरान वो राज्य को कई बड़ी सौगात दे सकते हैं. पीएम के दौरे के मौके पर तेजस्वी यादव ने निशाना साधा. उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो पोस्ट कर के कहा, पीएम मोदी, आज पूर्णिया में जुमलों की बारिश करने से पूर्व कृपया अपने सभा स्थल से 2-3 किलोमीटर के दायरे में अवस्थित जर्जर ग्रामीण सड़क, स्कूल, बदहाल स्वास्थ्य केंद्र और महंगाई, गरीबी, बेरोजगारी-पलायन से परेशान महिलाओं और युवाओं की जनसमस्या आपको जाननी चाहिए. पूर्णिया के मेडिकल कॉलेज की बदहाल स्थिति कल आपने जरूर ही देखी होगी.

तेजस्वी यादव ने आगे कहा, आपकी एक रैली से बिहार जैसे गरीब राज्य पर 100 करोड़ का भारी-भरकम वित्तीय बोझ पड़ता है. आप बिहार में कई रैलियां कर चुके हैं. हजारों करोड़ की इतनी बड़ी धनराशि से तो बिहार के स्कूलों की चारदीवारी, खेल के मैदान और लड़कियों के लिए स्कूल में अलग से शौचालय का निर्माण हो सकता था.

ऐसे ही झूठ और जुमले बेचने आ रहे हैं तेजस्वी यादव ने पीएम के पुराने वादे याद दिलाते हुए कहा, पीएम, क्या आपको याद है आपने 11.5 वर्ष पूर्व इसी पूर्णिया जिला से बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने का वादा किया था? क्या हुआ आपकी उस जुबान का? क्या आप फिर चुनाव पूर्व बिहारवासियों को ऐसे ही झूठ और जुमले बेचने आ रहे हैं? प्रधानमंत्री जी, आप 11 वर्षों की अपनी केंद्र और 20 सालों की NDA सरकार की विफलताएं देख जोर-जोर से जंगलराज-जंगलराज कहिए ताकि आपकी असफलताएं और जनहित के मुद्दे इस काल्पनिक शोर में दब जाएं. लेकिन बिहार और बिहारवासी आपके बनावटीपन से अब अच्छे से अवगत हो चुके हैं इसलिए बिहार में अब फिर झूठ नहीं चलेगा.

“पाकिस्तान, तुर्की, सऊदी और कतर.57 मुस्लिम देशों से भी क्यों नहीं डरता इजराइल”

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आज कतर की राजधानी दोहा में अरब-इस्लामी समिट होने वाली है. इसमें अरब लीग और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) के 57 मुस्लिम देश भी शामिल हो रहे हैं. इजराइल ने 9 सितंबर के हमास के नेताओं को निशाना बनाकर कतर पर हवाई हमले किए थे.

जिसके बाद कतर ने इमरजेंसी समिट बुलाई है. अब तक इजराइल के खिलाफ OIC की कई बैठकें हो चुकी है. पिछले एक साल में ही 3 बैठक हुई है, लेकिन बात निंदा से आगे बढ़ ही नहीं पाई. सवाल उठ रहा है कि इजराइल इन देशों से क्यों नहीं डरता है.

इसकी वजह है कई मुस्लिम देशों के साथ उसके समझौते.

अजरबैजान-इजराइल के बीच तेल समझौता अजरबैजान, इजराइल की जरूरत का 60% तेल सप्लाई करता है. यह देश इजराइल का सबसे बड़ा तेल सप्लायर है. मार्च 2025 में दोनों देशों ने एक गैस एक्सप्लोरेशन एग्रीमेंट पर दस्तखत किए थे, जिसके तहत अजरबैजान की राष्ट्रीय तेल कंपनी SOCAR को इजराइली क्षेत्रों में गैस खोजने का लाइसेंस मिला. अक्टूबर 2023 में जब हमास-इजराइल युद्ध के कारण अशदोद और हाइफा बंदरगाह बंद हुए थे, तब अजरबैजान ने इजराइल की ऊर्जा जरूरतें पूरी करने में अहम भूमिका निभाई.

यूएई और इजराइल के बीच अब्राहम समझौता सितंबर 2020 में दोनों देशों के बीच अब्राहम समझौता हुआ था. इसके तहत UAE, इजराइल को मान्यता देने वाला पहला अरब राष्ट्र बना. बाद में बहरीन, मोरक्को और सूडान भी इसमें शामिल हुए. 2024 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार में इजाफा देखा गया. इजराइल, UAE से अपनी जरूरत के 10% पेट्रोलियम उत्पाद खरीदता है. UAE और इजराइल के बीच पर्यटन, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार और सुरक्षा के क्षेत्रों में व्यापक सहयोग शुरू हुआ है. हालांकि, गाजा युद्ध के बाद UAE ने चेतावनी दी है कि वेस्ट बैंक के कब्जे की योजनाओं के कारण अब्राहम समझौता खतरे में पड़ सकता है.

और इजराइल के बीच गैस समझौता मिस्र और इजराइल के बीच प्राकृतिक गैस समझौता दोनों देशों की ऊर्जा सुरक्षा के लिए अहम है. इजराइल की लेवियाथन और तामार गैस फील्ड्स से निकली गैस मिस्र के LNG (लिक्विफाइड नेचुरल गैस) टर्मिनलों के जरिए यूरोप तक पहुंचाई जाती है. 2018 में हुए डेल्फिन समझौते के तहत इजराइल को मिस्र से नेचुरल गैस की सप्लाई मिलती है. मिस्र के साथ गैस व्यापार से इजराइल को हर साल अरबों डॉलर की कमाई होती है. गैस पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर के माध्यम से दोनों देश इलाके में ऊर्जा हब बनने की दिशा में काम कर रहे हैं.

सऊदी हूती से परेशान, इजराइल न हो तो मुश्किलें बढ़ेगी सऊदी अरब हूती विद्रोहियों की वजह से परेशान है. हूती विद्रोही 2014 से यमन में सक्रिय है और सऊदी अरब पर रॉकेट और ड्रोन हमले करते रहते हैं. अगर इस क्षेत्र में इजराइल कमजोर पड़ता है, तो ईरान की शक्ति और बढ़ेगी, जिससे हूती समूह और मजबूती हो जाएंगे. सऊदी अरब समझता है कि इजराइल की मौजूदगी से ईरानी विस्तारवाद पर रोक लगती है. हूती विद्रोहियों ने सऊदी में तेल डिपो पर कई बार हमले किए हैं, जिससे तेल का वैश्विक बाजार भी प्रभावित हुआ. वहीं इजराइल, यमन में हूती विद्रोहियों पर लगातार हमले करता है. इजराइल के न होने से सऊदी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

तुर्की पर्दे के पीछे से व्यापार कर रहा मई 2024 में गाजा युद्ध के कारण तुर्की ने इजराइल के साथ व्यापारिक संबंध तोड़ दिए, लेकिन तुर्की का दूतावास अभी भी तेल अवीव में सक्रिय है. दोनों देशों के बीच पर्दे के पीछे से व्यापार जारी है. NATO सदस्य के रूप में तुर्की के इजराइल के साथ दशकों पुराने रक्षा संबंध हैं. तुर्की की कंपनियां तीसरे देशों जैसे कि जॉर्जिया और आर्मेनिया के माध्यम से इजराइल के साथ व्यापार कर रही हैं. 2024 में यह व्यापार $1.2 बिलियन तक पहुंचा है. तुर्की में 26,000 की यहूदी आबादी भी है. एर्दोगन सरकार सार्वजनिक रूप से फिलिस्तीन के समर्थन में बयान देती है, लेकिन व्यावसायिक हितों की वजह से इजराइल से संबंध बनाए हुए है.

पाकिस्तान और अमेरिकी दबाव पाकिस्तान और इजराइल के बीच संबंध स्थापना में अमेरिका की भूमिका जटिल है. अमेरिका चाहता है कि अधिक से अधिक मुस्लिम देश इजराइल को मान्यता दें, लेकिन पाकिस्तान में जनता का बड़ा हिस्सा फिलिस्तीनी समर्थक है. अमेरिकी आर्थिक और सैन्य सहायता के मजे लूट रहा पाकिस्तान दुविधा में है. IMF से लोन और अमेरिकी सहायता के लिए पाकिस्तान को अमेरिकी दबाव का सामना करना पड़ता है. चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) की वजह से अमेरिका पाकिस्तान पर और दबाव बना रहा है. अगर पाकिस्तान ने इजराइल को मान्यता दी तो घर में ही विरोध का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए पाकिस्तान अब तक कोई फैसला नहीं ले पाया है.

“चरमरा गई है चीन की अर्थव्यवस्था, मंदी से पूरे देश में मचा हाहाकार, पैसा खर्च करने से कतरा रहे हैं लोग!”

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चीन की विकास दर अब धीमी हो रही है. अगस्त महीने में औद्योगिक उत्पादन और खुदरा बिक्री दोनों ही उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाए. नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स (NBS) के अनुसार, अगस्त में औद्योगिक उत्पादन 5.2% बढ़ा, जबकि जुलाई में यह 5.7% था.

बाजार की उम्मीदें भी 5.7% की थीं, इसलिए यह संख्या निराशाजनक रही. यह पिछले साल के अगस्त के बाद सबसे धीमी वृद्धि है. चीन में इस साल सबसे तेज गर्मी और सबसे लंबा मानसून भी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए चुनौती बना.

उपभोक्ता खर्च में कमी खुदरा बिक्री के आंकड़े भी बहुत खास नहीं रहे. अगस्त में यह 3.4% बढ़ी, जो जुलाई के 3.7% से कम है और विशेषज्ञों की 3.9% की उम्मीदों से पीछे रही. उपभोक्ता खर्च में गिरावट की बड़ी वजह प्रॉपर्टी सेक्टर की मंदी और नौकरी बाजार की सुस्ती बताई जा रही है. प्रॉपर्टी की कीमतों में लगातार गिरावट और रोजगार के अवसरों की कमी ने लोगों की खर्च करने की क्षमता और इच्छा दोनों को प्रभावित किया है. इसके अलावा, कारोबारियों का भरोसा भी कम हुआ है, जो आर्थिक वृद्धि को और धीमा कर रहा है. प्रॉपर्टी निवेश जनवरी से अगस्त के बीच पिछले साल की तुलना में 12.9% कम हुआ, जबकि नए घरों की बिक्री में भी 4.7% की गिरावट दर्ज की गई है.

आर्थिक जोखिम बरकरार चीन की सरकार ने हालात को लेकर सतर्कता जाहिर की है. नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टैटिस्टिक्स के अधिकारियों ने माना है कि अर्थव्यवस्था अभी स्थिर जरूर है, लेकिन कई अनिश्चित और अस्थिर कारक मौजूद हैं. साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, प्रवक्ता फू लिंगहुई ने स्पष्ट किया कि वर्तमान आर्थिक माहौल में कई जोखिम और चुनौतियां हैं. उन्होंने नीति निर्माताओं को चेतावनी दी कि मैक्रोइकोनॉमिक नीतियों को मजबूती से लागू करना जरूरी है. साथ ही, नौकरी, व्यापार, बाजार और उपभोक्ता उम्मीदों को स्थिर बनाए रखना प्राथमिकता होनी चाहिए.

बेरोजगारी दर में भी बढ़ोतरी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अगस्त में शहरी बेरोजगारी दर बढ़कर 5.3% हो गई, जो जुलाई के 5.2% से बढ़ी है. यह संकेत देता है कि रोजगार के अवसर अभी भी सीमित हैं. प्रॉपर्टी क्षेत्र की स्थिति भी चिंताजनक बनी हुई है, जहां नए घरों की कीमतें महीने-दर-महीने 0.3% और साल-दर-साल 2.5% गिर गई हैं. निवेश में गिरावट और बिक्री में कमी इस क्षेत्र की कमजोरी को दर्शाती है, जो पूरे आर्थिक ढांचे पर असर डाल रही है.

“GST 2.0 ने मचाया धमाल, शेयर बाजार में आया 6 लाख करोड़ का उछाल”

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“GST 2.0 ने मचाया धमाल, शेयर बाजार में आया 6 लाख करोड़ का उछाल”

भारतीय बाजार में सुस्ती के कारण पिछले कुछ समय से निवेशकों को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था. लेकिन 14 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा GST को आसान और किफायती बनाने की घोषणा के बाद, ऑटो और कंजम्प्शन से जुड़ी कंपनियों के शेयरों में जबरदस्त तेजी आई है.

इस तेजी के चलते एक महीने के भीतर शेयर बाजार में करीब 6 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी दर्ज हुई है.

निफ्टी ऑटो इंडेक्स ने पिछले महीने 11% से ज्यादा की बढ़त हासिल की है. ET की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस बीच ऑटो कंपनियों की टोटल मार्केट वैल्यू अब 5.13 लाख करोड़ रुपये के पार चला गया है. खास बात यह है कि रॉयल एनफील्ड बनाने वाली आयशर मोटर्स के शेयर 19% तक बढ़े, जबकि भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी के शेयरों में 18% की तेजी देखी गई.

ऑटो सेक्टर पर GST रिफॉर्म का असर सरकार ने 22 सितंबर से लागू होने वाले नए GST नियमों के तहत छोटी कारों पर टैक्स दर को 28-31% से घटाकर 18% कर दिया है. वहीं बड़ी एसयूवी पर भी GST की दर को घटाकर लगभग 40% किया गया है. इसी तरह 350 cc से कम क्षमता वाले दोपहिया वाहनों पर GST दर 28% से घटाकर 18% की गई है. इस बदलाव से वाहनों की कीमतों में कमी आएगी जिससे खरीदारों को फायदा होगा और बिक्री में इजाफा होगा.

कंज्यूमर ड्यूरेबल्स प्रोडक्ट्स में भी बढ़ी मांग ET की एक रिपोर्ट के अनुसार, GST कटौती का असर सिर्फ ऑटो सेक्टर तक सीमित नहीं रहा. कंज्यूमर ड्यूरेबल्स सेक्टर ने भी जबरदस्त प्रदर्शन किया है. निफ्टी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स इंडेक्स में 5.6% की बढ़ोतरी हुई है, जिससे इस सेक्टर का मार्केट वैल्यू 78,000 करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया. फुटवियर कंपनी बाटा इंडिया के शेयरों में 20% तक की बढ़त आई है. सरकार ने 2500 रुपये से कम कीमत वाले फुटवियर पर GST को 12% से घटाकर 5% कर दिया है.

भारत के कंसम्पशन सेक्टर में यह बदलाव एक बड़े पैमाने पर रिस्ट्रकचरिंग का संकेत देता है. स्वतंत्रता दिवस पर GST सुधार के ऐलान ने कंज्यूमर मार्केट में जबरदस्त तेजी ला दी है, जिससे निवेशकों और कंपनियों दोनों को लाभ हो रहा है. माना दा रहा है कि अगले कुछ महीनों में इस तेजी का असर और भी स्पष्ट होगा, जो अर्थव्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संकेत है.

PM मोदी का दिवाली तोहफा: एसी, फ्रिज, टीवी, कार समेत ये चीजें सस्ती!”

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दिवाली की खुशियाँ इस बार केंद्र सरकार ने पहले ही शुरू कर दी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को बड़ी सौगात देते हुए 175 से अधिक उत्पादों पर GST दरों में कटौती की घोषणा की है।

यह निर्णय 56वीं जीएसटी काउंसिल की बैठक में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में लिया गया, जिसमें सभी राज्यों के वित्त मंत्री भी शामिल हुए। यह बदलाव 22 सितंबर से प्रभावी होंगे।

रोजमर्रा की जरूरतों पर बड़ा फायदा इस फैसले का सीधा लाभ आम जनता को होगा, क्योंकि घरेलू उपयोग की कई आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में कमी आएगी। खासतौर पर खाद्य पदार्थ, इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू उपकरणों की GST दरें कम की गई हैं, जिससे इन वस्तुओं की उपलब्धता सस्ती हो जाएगी।

महत्वपूर्ण कटौती के उदाहरण: घी, मक्खन, पनीर, चीज़, डेयरी स्प्रेड्स पर GST दर 12% से घटाकर 5% कर दी गई है। नमकीन, भुजिया, मिक्सचर (पैक्ड) पर 12% से 5% किया गया। बर्तन (Utensils) पर अब 12% की जगह 5% GST लगेगा। हेयर ऑयल, शैम्पू, टूथपेस्ट, टॉयलेट सोप, टूथब्रश, शेविंग क्रीम पर GST दर 18% से घटकर 5% हो गई है।

इलेक्ट्रॉनिक्स और वाहन भी सस्ते होंगे मूल्य में कटौती केवल घरेलू सामान तक सीमित नहीं है। बड़े उपकरण और वाहन भी अब किफायती हो जाएंगे। एसी (Air Conditioners) पर GST दर 28% से घटाकर 18% कर दी गई है। टीवी (32 इंच से बड़े LED और LCD) पर 28% से 18% किया गया। मॉनिटर्स और प्रोजेक्टर पर भी अब 18% GST के दायरे में आएंगे। डिशवॉशिंग मशीन पर GST दर घटाकर 18% की गई। सिलाई मशीन व उसके पुर्ज़े पर 12% से घटाकर 5% किया गया।

दिवाली से पहले ऑटोमोबाइल्स भी सस्ते पेट्रोल/डीजल हाइब्रिड, LPG, CNG छोटी कारें पर GST 28% से 18%, डीज़ल/हाइब्रिड कारें (1500cc, 4000mm तक) पर 28% से 18%, तीन पहिया वाहन पर 28% से 18%, मोटरसाइकिल (350cc तक) 28% से 18%, मालवाहक वाहन पर GST 28% से 18% हो गया हैं।

GST दरों में यह कटौती से क्या होगा असर? GST दरों में यह कटौती महंगाई पर रोक लगाने और उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति बढ़ाने में मददगार साबित होगी। घरेलू उपकरणों, खाद्य पदार्थों और इलेक्ट्रॉनिक्स की कीमतों में कमी आने से बाजार में मांग बढ़ेगी और उद्योगों को भी फायदा होगा। इसके साथ ही दिवाली के त्योहार पर उपभोक्ताओं को सस्ती चीजें खरीदने का सुनहरा मौका मिलेगा।

“रूसी बाजार में भारत: अमेरिका के उड़ेंगे होश! तेजी से भारत और रूस के बीच व्यापारिक रिश्ते मजबूत…

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अमेरिका की ट्रैरिफ नीति और रूस-यूक्रेन युद्ध से अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में आए बदलावों ने भारत के लिए एक अभूतपूर्व अवसर तैयार कर दिया है। पश्चिमी देशों की कंपनियों के रूस से हटने के बाद जो खाली जगह बनी है, उसे भरने का मौका अब भारतीय कंपनियों, खासकर एमएसएमई सेक्टर के पास है।

जिस तेजी से भारत और रूस के बीच व्यापारिक रिश्ते मजबूत हो रहे हैं, उससे साफ है कि आने वाले वर्षों में भारतीय उत्पादों की मौजूदगी रूसी बाजार में बड़े स्तर पर बढ़ने वाली है।

क्यों रूस में है भारत के लिए सुनहरा मौका? हाल के वर्षों में पश्चिमी प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक तनावों के चलते रूस को वैकल्पिक साझेदारों की तलाश है और भारत एक मजबूत विकल्प के रूप में उभर रहा है। रूस को खाद्य सामग्री, दवाएं, इंजीनियरिंग सामान, तकनीकी उपकरण, टेक्सटाइल और मशीनरी जैसे क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर आपूर्ति की जरूरत है। और भारत इन सभी क्षेत्रों में न केवल उत्पादन करता है, बल्कि लागत और गुणवत्ता दोनों के मामले में प्रतिस्पर्धी भी है। MSME के लिए खुला दरवाज़ा भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) अब रूस में अपनी जड़ें जमाने की स्थिति में हैं। रूस की अग्रणी एग्जिबिशन कंपनी ITE Group के सीईओ दिमित्री जावगोरोडनी ने भी माना कि भारत के लिए यह मौका सिर्फ असाधारण नहीं, बल्कि ऐतिहासिक है।

ITE ग्रुप भारत में रोड शो आयोजित कर रहा है ताकि छोटे भारतीय उद्यमियों को रूसी बाजार की संभावनाओं से जोड़ा जा सके व्यापार में असंतुलन: भारत के लिए अवसर? भले ही भारत-रूस का द्विपक्षीय व्यापार 68.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया हो, लेकिन यह संतुलित नहीं है। भारत रूस से बहुत ज्यादा आयात कर रहा है (मुख्यतः तेल और उर्वरक), जबकि भारतीय निर्यात मात्र 4.88 अरब डॉलर के आसपास है। यह अंतर दिखाता है कि भारत को अब निर्यात बढ़ाने के प्रयासों में तेजी लाने की जरूरत है। ITE ग्रुप और भारतीय दूतावास जैसे संस्थानों की कोशिश यही है की भारत के कारोबारियों को प्रोत्साहित किया जाए कि वे आगे आएं और रूसी बाजारों को समझें।

अमेरिका और पश्चिमी देशों की बढ़ेगी चिंता? बता दें की जैसे-जैसे भारत रूस के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत कर रहा है, यह अमेरिका और यूरोप की भूराजनीतिक रणनीति के लिए चुनौती बनता जा रहा है। भारत का यह रुख साफ संकेत देता है कि वह स्वतंत्र विदेश नीति और व्यापारिक संतुलन की ओर बढ़ रहा है, जिसमें पश्चिमी देशों पर निर्भरता घटाकर बहुपक्षीय साझेदारियों को बढ़ावा दिया जा सके।

“राहुल गांधी आज रहेंगे पंजाब दौरे पर, बाढ़ पीड़ित परिवारों से करेंगे मुलाकात”

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कांग्रेस नेता राहुल गांधी सोमवार को पंजाब के बाढ़ प्रभावित इलाकों का दौरा करेंगे। पार्टी सूत्रों ने यह जानकारी दी। सूत्रों ने रविवार को बताया कि एक दिवसीय दौरे के दौरान गांधी अमृतसर और गुरदासपुर जिलों के बाढ़ प्रभावित इलाकों का दौरा करेंगे।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी राज्य की अपनी यात्रा के दौरान बाढ़ प्रभावित परिवारों से भी मिलेंगे।

पंजाब 1988 के बाद से सबसे भीषण बाढ़ से जूझ रहा है। पंजाब को दशकों में अपनी सबसे भीषण बाढ़ आपदाओं में से एक का सामना करना पड़ा। यह बाढ़ सतलुज, व्यास और रावी नदियों के उफान के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश के कारण मौसमी नालों में उफान का नतीजा थी। इसके अलावा पंजाब में भारी बारिश के कारण भी बाढ़ की स्थिति और गंभीर हो गई है।

बाढ़ के कारण मरने वालों की संख्या वर्तमान में 56 है, जबकि 1.98 लाख हेक्टेयर में लगी फसलें बर्बाद हो गई हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नौ सितंबर को अपनी यात्रा के दौरान बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण करने के बाद पंजाब में बाढ़ की स्थिति और नुकसान की समीक्षा की थी।

“60,000 बेसिक सैलरी और 10 साल की सर्विस पर कितनी ग्रेच्युटी मिलेगी? देखें पूरी कैलकुलेशन”

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अगर आपने एक ही कंपनी में 10 साल तक नौकरी की है और आपकी मासिक बेसिक सैलरी 60,000 है, तो रिटायरमेंट या नौकरी छोड़ने पर मिलने वाली ग्रेच्युटी एक बड़ा फाइनेंशियल बेनिफिट हो सकता है।

यह रकम सिर्फ आपकी सेवाओं के सम्मान में नहीं, बल्कि एक कानूनी हक के तौर पर दी जाती है। पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 के तहत इसकी गणना एक तय फॉर्मूले से की जाती है। आइए जानते हैं, 60,000 की बेसिक सैलरी और 10 साल की सर्विस पर आपको कितनी ग्रेच्युटी मिल सकती है – पूरी कैलकुलेशन के साथ।

ग्रेच्युटी क्या है? ग्रेच्युटी एक तरह का थैंक यू बोनस है जो कंपनी अपने उन कर्मचारियों को देती है जिन्होंने कंपनी में वर्षों तक सेवा दी हो। यह राशि कर्मचारी की अंतिम सैलरी और सेवा अवधि के आधार पर तय की जाती है। इसकी गणना एक निर्धारित फॉर्मूले से होती है जो पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट, 1972 के तहत आता है।

कौन होता है ग्रेच्युटी का हकदार? ग्रेच्युटी का फायदा उन्हीं कर्मचारियों को मिलता है जिन्होंने एक ही कंपनी में लगातार कम से कम 5 साल काम किया हो। कुछ परिस्थितियों में – जैसे मृत्यु या विकलांगता – यह 5 साल की न्यूनतम सीमा भी जरूरी नहीं होती। इसके अलावा, जिस कंपनी में 10 या उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत हों, वहां ग्रेच्युटी नियमों का पालन अनिवार्य होता है। हालांकि, कुछ छोटी कंपनियां अपनी नीति के अनुसार स्वेच्छा से भी यह सुविधा दे सकती हैं।

ग्रेच्युटी का कैलकुलेशन कैसे होता है? ग्रेच्युटी निकालने का फॉर्मूला सरल है: ग्रेच्युटी = (बेसिक सैलरी + डीए) × 15/26 × कुल सेवा के साल यहां:15/26 का मतलब है 15 दिन की सैलरी प्रति साल के लिए (क्योंकि महीने में औसतन 26 कार्य दिवस माने जाते हैं), यानी महंगाई भत्ता (अगर अलग से दिया गया है, तो बेसिक में जोड़ना होगा),और कुल सेवा के साल का मतलब है पूरे किए गए साल (6 महीने से ज्यादा समय हो, तो अगला साल जोड़ा जाएगा)।

उदाहरण से समझिए – 10 साल की नौकरी पर कितना मिलेगा? मान लीजिए, किसी कर्मचारी की अंतिम बेसिक सैलरी 60,000 है और उसने कंपनी में 10 साल तक काम किया। तो ग्रेच्युटी की गणना होगी: 60,000 × 15/26 × 10 = 60,000 × 0.5769 × 10 = 34,614 × 10 = 3,46,140 यानि, 10 साल की सेवा पर लगभग  साढ़े तीन लाख रुपये की ग्रेच्युटी मिलेगी।

सेवा अवधि कैसे गिनी जाती है? अगर कोई कर्मचारी 7 साल और 8 महीने तक कंपनी में रहा, तो उसे 8 साल माना जाएगा। वहीं, अगर सेवा 7 साल और 3 महीने की रही, तो केवल  7 साल  ही गिने जाएंगे। यह नियम भी ग्रेच्युटी की राशि को प्रभावित करता है, इसलिए आपकी जॉइनिंग और रिलीविंग डेट्स पर विशेष ध्यान देना जरूरी होता है। यह बोनस नहीं, हक है ग्रेच्युटी को महज बोनस समझना गलत होगा। यह एक कानूनी अधिकार है जो कर्मचारी की सेवा अवधि के बदले दिया जाता है। यदि आपकी कंपनी एक्ट के दायरे में आती है और आपने 5 साल पूरे कर लिए हैं, तो ग्रेच्युटी मिलना तय है।