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कौन हैं रतन टाटा के करीबी विजय सिंह, जिन्‍हें हटाए जाने पर ग्रुप में हो गया बवाल, दो गुट में बंट गया टाटा संस

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वेटरन रतन टाटा के निधन के बाद से ही टाटा समूह में सबकुछ अच्‍छा नहीं चल रहा है. शुरुआत में तो यह बातें अंदरखाने ही चलती रहीं, लेकिन धीरे-धीरे सबकुछ सतह पर आ गया. अब तो हालात इतने बिगड़ गए हैं कि सरकार को भी इसमें हस्‍तक्षेप करना पड़ा है. टाटा समूह में जारी विवाद पर विराम लगाने के लिए सोमवार को दिल्‍ली में केंद्र सरकार के मंत्रियों और टाटा समूह के शीर्ष अधिकारियों के बीच बातचीत भी हुई. सुनने में आ रहा है कि सबसे ज्‍यादा विवाद रतन टाटा के करीबी माने जाने वाले विजय सिंह को हटाए जाने को लेकर हो रहा है. आखिर विजय सिंह कौन हैं और सारे विवाद के केंद्र में उनका नाम क्‍यों आ रहा है.
विजय सिंह को रतन टाटा का करीबी माना जाता है. वह 1970 बैच के मध्‍य प्रदेश कैडर के आईएएस अधिकारी हैं. उन्‍होंने साल 2007 से 2009 तक भारत के रक्षा सचिव के रूप में भी काम किया और रिटायर होने के बाद रतन टाटा ने उन्‍हें अपने साथ जोड़ लिया. रतन टाटा उन्‍हें ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस के बोर्ड में टाटा ट्रस्‍ट के नामित निदेशक के रूप में नियुक्‍त कर दिया था. उनकी आयु 70 साल पूरी होने पर साल 2018 में वह बोर्ड से हट गए थे, लेकिन रतन टाटा ने साल 2022 में आयु सीमा में छूट देकर उन्‍हें दोबारा शामिल कर लिया. बाद में उन्‍हें टाटा ट्रस्‍ट का उपाध्‍यक्ष भी बना दिया गया.

क्‍यों शुरू हुआ विवाद
विजय सिंह को हटाए जाने का विवाद पिछले साल अक्‍टूबर में रतन टाटा के निधन के बाद से ही शुरू हो गया था. समूह में पनपे आंतरिक मतभेदों की वजह से विजय सिंह को हटाने की कवायद शुरू हो गई. पिछले महीने सितंबर में टाटा ट्रस्‍ट की बोर्ड मीटिंग में 7 ट्रस्‍टी में से 4 ट्रस्टियों ने रतन टाटा के रहने के दौरान ही उनकी नियुक्ति का विरोध किया था. इसमें प्रमित झावेरी, डेरियस खंबाटा, मेहली मिस्‍त्री और जहांगीर ने विजय सिंह का विरोध किया था. ट्रस्टियों ने सिंह को बोर्ड में होने वाली चर्चाओं की जानकारी व अन्‍य फैसलों का अपडेट नहीं देते थे.

नोएल से अलग जाकर लिया फैसला
रतन टाटा के करीबी होने के नाते नोएल टाटा ने भी विजय सिंह का हमेशा समर्थन किया था. इसके साथ वेणु श्रीनिवासन ने भी उनका समर्थन किया, लेकिन वोटिंग के जरिये उन्‍हें हटा दिया गया. हालांकि, विवाद बढ़ाने पर सिंह ने खुद ही इस्‍तीफा दे दिया, फिर भी वह ट्रस्‍टी बने रहे. विजय सिंह को हटाने के बाद टाटा ट्रस्‍ट में दो गुट बन गए. इस विवाद से टाटा संस के नियंत्रण, नामित निदेशकों की नियुक्ति और टाटा कैपिटल के आईपीओ को लेकर विवाद बढ़ा है. एक ट्रस्‍टी ने ईमेल करके वेणु श्रीनिवासन को हटाने की बात कही थी. इससे टाटा संस पर कब्‍जा किए जाने जैसी स्थिति पैदा हो गई.

सरकार ने किया हस्‍तक्षेप
टाटा संस का विवाद इस कदर बढ़ गया है कि सरकार को भी इस 157 साल पुराने कारोबारी समूह को चिंता शुरू हो गई. टाटा समूह देश का सबसे बड़ा औद्योगिक घराना है और इसीलिए सरकार को लेकर लेकर चिंता हो रही है. यही वजह है कि सरकार के दो मंत्रियों और नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन, एन चंद्रशेखरन और डेरियस खंबाटा के साथ बैठक की है. सरकार की मंशा है कि ट्रस्‍टीज के बीच सुलह हो और टाटा संस की लिस्टिंग सुनिश्चित हो सकेगी. सरकार ने यह हस्‍तक्षेप करोड़ों निवेशकों और राष्‍ट्रीय हितों को देखते हुए किया है.

श्रीलंकाई लुटेरों ने समुद्र में मचाया कहर, 11 मछुआरों को दरांती से काटा, लूट ले गए नाव का इंजन और कीमती सामान

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समुद्र में मछली पकड़ने का काम तमिलनाडु के तटीय गांवों के लोगों की आजीविका का आधार है, लेकिन यह काम खतरों से भरा हुआ भी है. दरअसल, हाल ही में नागपट्टिनम जिले के नाम्बियार नगर गांव के 11 मछुआरों पर श्रीलंका से आए समुद्री लुटेरों ने क्रूर तरीके से हमला कर दिया. यह हमला इतना भयानक था कि सभी मछुआरे गंभीर रूप से घायल हो गए और उनमें से एक की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है. लुटेरों ने न केवल मछुआरों से मारपीट की, बल्कि उनकी नाव, मछली और कीमती उपकरण भी लूटकर ले गए. यह घटना मछुआरों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा करती है. स्थानीय लोग और मछुआरा संगठन सरकार से तत्काल कार्रवाई की मांग कर रहे हैं.
हमले का भयावह दृश्य
दरअसल, यह दर्दनाक घटना तब हुई, जब नाम्बियार नगर के 11 मछुआरे रोजाना की तरह नाव लेकर अरब सागर में मछली पकड़ने निकले थे. पुलिस के अनुसार, यह हमला समुद्र के बीच हुआ, जब श्रीलंका की ओर से आए समुद्री लुटेरे अचानक उनकी नाव के पास पहुंचे. लुटेरों ने मछुआरों पर धारदार दरांती, लोहे की रॉड और मोटे लकड़ी के डंडों से ताबड़तोड़ हमला कर दिया. मछुआरे इस अचानक हमले के लिए तैयार नहीं थे और उन्हें बचाव का मौका भी नहीं मिला. हमलावरों ने बेरहमी से उन पर प्रहार किए, जिससे सभी मछुआरे बुरी तरह घायल हो गए.

दिल्ली के ‘तीन मूर्ति’ का इजरायल कनेक्शन, हाइफा के बच्चे भी जानेंगे, क्या आपने सोचा किसकी हैं वो तीनों मूर्तियां

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इजरायल में लोग कह रहे हैं कि वो अपनी किताबों में जो इतिहास पढ़ाया जाता है वो दुरुस्त करेंगे? ये मत सोचना कि उनका इतिहास है, वो जानें कि वो अपने बच्चों का क्या पढ़ाएंगे, हम तो यहां अपने इतिहास से ही जूझ रहे हैं. जो इजरायल में करने जा रहे हैं, उसका हमसे सीधा नाता है और वो जो अपने बच्चों को पढ़ाने जा रहे हैं वो हमें भी अपने बच्चों को पढ़ाने की जरूरत है. उससे पहले ये तो जान लें कि वो है क्या? अभी जब ब्रिटेन ने भी फिलीस्तीन को मान्यता दे दी कुछ दिन पहले तो कई लोगों ने इतिहास भी खंगाला कि ब्रिटेन का रोल क्या था इजरायल बनाने में और इतने दिनों तक वो फिलीस्तीन को क्यों नहीं मान्यता दे रहा था.
ऐसे में कहानी गई पिछली सदी में क्योंकि कहानी ये है जहां अब इजरायल है वहां तुर्की का राज हुआ करता था. वो ऑटोमन तुर्क साम्राज्य का हिस्सा था. तुर्कों का बहुत बड़ा साम्राज्य था- ऑटोमन तुर्क साम्राज्य. तुर्की से पूरे अरब से लेकर उत्तरी अफ़्रीका तक फैले राज्य में ये इलाका भी था, जहां आज इजरायल है. फिलीस्तीन कहते थे इलाके को, हालांकि कोई ऐसा नक्शा काट कर बॉर्डर बना कर कोई देश नहीं था लेकिन ये इलाका भी तुर्क साम्राज्य में था.यहां बंजर रेगिस्तान था ज्यादातर तो तुर्क जागीरदार, यहां अपनी मिल्कियत चलाते थे. पहली वर्ल्ड वॉर हुई, उसमें ऑटोमन तुर्क जर्मनी के साथ थे और ब्रिटेन था दूसरी तरफ. उस जंग में ब्रिटेन ने तुर्कों को हरा दिया था और इस फिलीस्तीन वाले इलाके पर जब कब्जा कर लिया था. उसके बाद ही तो ब्रिटेन ने वहां दुनिया भर के यहूदियों को जमीनें देने की योजना शुरू की थी कि यहूदी यहां आ कर बस जाएं. 1918 में जंग जीतने के बाद ब्रिटेन ने ये किया था और ये आगे चल कर यहूदियों का देश ही बन गया. आज तक फिलीस्तीनी वही तो लड़ाई लड़ रहे हैं कि यहां पर बसाए गए और फिर वहां अपना देश ही बना लिया.
हाइफा की जंग ब्रिटेन नहीं, भारत ने जीती थी
अब आप कहोगे कि वो तो ठीक है लेकिन इसका हमसे क्या मतलब? तो सुनिये इजरायल क्या करने जा रहा है अपनी किताबों में. जहां उसकी किताबों में ये पढ़ाया जाता थी कि ब्रिटेन की फौज ने ये जमीन आजाद करवा कर दी जिस पर आ कर यहूदी बसे और इजरायल बना, वहां पर अब किताबों में ये पढ़ाया जाएगा कि भारतीय फौजियों ने ये जमीन आजाद करवा कर दी, जहां पर यहूदी बस सके और इजरायल बन सका. वो क्यों? क्योंकि पहली वर्ल्ड वॉर में जो अंग्रेजों की सेना लड़ी थी उसमें कौन लड़े थे? भारतीय सैनिक ही तो थे. ये उसी जंग की कहानी है जिसको हमारे यहां भी लोग भूल चुके हैं- हाइफा की जंग. इसे भारतीय सैनिकों ने लड़ा था.

दिल्ली में तीन मूर्ति चौक से लोग गुजर जाते हैं. तीन मूर्ति भवन के बारे में शायद लोग जानते भी हैं कि वहां नेहरू रहते थे जब प्रधानमंत्री थे और अब वो म्यूजियम है. पर वो तीन मूर्ती क्या है और वो तीन मूर्तियां किनकी हैं ज्यादातर लोग नहीं जानते. वो तीन मूर्तियां उन्हीं फौजियों की याद में हैं, जिन्होंने वो जमीन तुर्कों से आजाद करवाई थी, जहां आज इजरायल है. वो मूर्तियां तीन ही क्यों हैं उस की भी बात करेंगे लेकिन अब तो इजरायल भी अपने बच्चों को पढ़ा रहा है कि भारतीय फौजियों का क्या रोल था उसके बनने में, तो आप भी तो जान लीजिये. ये उस भूली हुई जंग की कहानी है जो जानना सबके लिए ज़रूरी है.
जब मशीनों और तोपों से लड़ गए तलवार और भाले

ये कहानी 1918 की है, जब दुनिया आग और धुएं में जल रही थी. पहला विश्व युद्ध हो रहा था, हर तरफ ख़ून, मिट्टी और बारूद. दूर उन रेगिस्तानी पहाड़ों में, भारत की धरती से गए कुछ घुड़सवार सैनिक इतिहास रचने वाले थे. ये हिंदुस्तान के साधारण परिवारों के लोग थे, रेगिस्तान और मैदानों के बेटे, जो आजादी की उम्मीद में, ब्रिटिश झंडे तले लड़ रहे थे. उनकी कहानी सिर्फ एक जंग की नहीं, बल्कि एक नए देश इजराइल के जन्म की कहानी है. इस कहानी ने दिल्ली की सड़कों से लेकर हाइफा की किताबों तक छाप छोड़ी. 1918 में हिंदुस्तान आजाद नहीं था. ब्रिटिश राज था, जैसे कोई बड़ा शतरंज का खेल, जहां अंग्रेज हिंदुस्तानियों को अपनी मोहरों की तरह इस्तेमाल करते थे. पहली वर्ल्ड वॉर हुई तो अंग्रेजों ने 10 लाख से ज्यादा हिंदुस्तानी सेना में भर्ती कर लिये. कुछ पैसे के लिए भर्ती हुए, कुछ रोमांच के लिए, कुछ बस ज़िंदा रहने के लिए. 74,000 से ज्यादा शहीद हो गए ब्रिटेन के लिए लड़ते हुए, लेकिन उनके नाम रेत में लिखे निशान की तरह मिट गए. वैसे दिल्ली में इंडिया गेट पर उनमें कई के नाम जरूर लिखे हैं, लेकिन बहुत से गुमनाम रह गए. उधर पश्चिम एशिया में दुश्मन था ऑटोमन साम्राज्य, तुर्की से अरब तक फैला विशाल साम्राज्य, जो जर्मनी का दोस्त था. उसके कब्जे में था हाइफा, जो आज इजराइल का हिस्सा है, लेकिन तब तुर्की का एक धूल भरा बंदरगाह था. वहां तैनात थीं जर्मन मशीनगनें और तोपें क्योंकि पहली वर्ल्ड वॉर में पहली बार बड़े पैमाने पर मशीनगन का इस्तेमाल हुआ था. मशीनगनों ने कई जंगों की बाजी पलट दी थी वर्ल्ड वॉर में. अंग्रेजों को हाइफा चाहिए था क्योंकि हाइफा बंदरगाह भूमध्य सागर में था और उसी रास्ते से तुर्कों को यूरोप से यानी जर्मनी से सारा असलहा भी मिल रहा था. अंग्रेजों की कैलकुलेशन ये थी कि अगर हाइफा पर कब्जा हो जाए तो समुद्र से उसके रास्ते इस पूरे इलाके में सेना की एंट्री हो सकती थी. यानी ये हाइफा बंदरगाह उनके लिए जिंदगी की डोर था, खाना, हथियार, और जीत की राह. दिक्कत ये थी कि जर्मनी और तुर्कों ने यहां मशीन गनें लगाई हुई थी और ब्रिटिश सेना ने यहां उतारे घुड़सवार सैनिक, भाले लिये हुए. 15वीं इंपीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड, उसमें थे लगभग 400 घुड़सवार, जो भारत के तीन रजवाड़ों से आए थे. जोधपुर, मैसूर, हैदराबाद- ये वो रियासतें थीं, जिनके शासकों ने अपनी सेनाएं अंग्रेजों को दीं थीं. उन्हीं के ये घुड़सवार सैनिक थे और इनके लीडर थे मेजर दलपत सिंह, जोधपुर लैंसर्स के एक शांत, ऊंचे कद के राजपूत योद्धा. उनके पास थे मराठा घोड़े, लंबे भाले, तलवारें, और हिम्मत का जज्बा. न तोप, न मशीन गन, बस घोड़े और दिलेरी.
घोड़ों की टाप से बारूद का नशा हुआ चूर
23 सितंबर 1918 को हुक्म आया- हाइफा पर हमला. सामने थे 1,500 ऑटोमन तुर्क और जर्मन सैनिक. माउंट कार्मेल की चट्टानों में छिपे, 17 तोपों और मशीनगनों के साथ. नीचे दलदल जैसी नदी थी. मशीनगन के सामने घोड़ों पर चढ़कर लड़ना मौत को बुलावा देने जैसा था. जंग के इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ था लेकिन मेजर दलपत सिंह ने अपने जवानों को इकठ्ठा किया. सबने अपनी पगड़ियां कसीं और घोड़ों को एड़ लगाई और शुरू हुई हाइफा की जंग, इतिहास की आखिरी घुड़सवार से लड़ी गई जंग. सुबह गर्म थी, धुंध भरी. जोधपुर लैंसर्स, नीली पगड़ियों में, शहर के दक्षिण से आगे बढ़े. मशीनगन की गोलियां हवा में गूंजने लगीं. दलपत ने देखा, पहाड़ी पर दुश्मन की मुख्य तोपें थीं, वो फायर कर के हर चीज को चूर-चूर कर रही थीं. मेजर दलपत ने इशारा किया- हमला करो, और दो टुकड़ियां यानि लगभग 200 घुड़सवार, तोपों की तरफ दौड़े. घोड़ों की टापों ने जमीन हिला दी, धूल का गुबार उठा. तुर्की के सैनिक आत्मविश्वास से भरे थे कि मशीनगनों के सामने घोड़े? उनको लगा ये कौन पागल हैं जो सिर्फ भालों से लड़ते हुए मौत के मुंह में आ रहे हैं. लैंसर्स गोलियों के तूफान से निकले, भाले तने हुए. 90 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से वो तोपों पर टूट पड़े. तलवारें चमकीं, भाले चुभे. तुर्क सैनिक चीखते हुए भागे. दलपत खुद आगे थे, तलवार उठाए, पर एक गोली ने उन्हें ढूंढ लिया. वो गिरे, रेत खून से लाल हो गई.

कौन था हाइफा का हीरो?
“हाइफ़ा का हीरो” 42 साल की उम्र में चला गया, मगर उनके जवान नहीं रुके. मिनटों में उन्होंने तोपखाने पर कब्जा कर लिया, 30 बंदी बना लिए, 2 मशीनगनों पर कब्जा कर लिया और ऊंटों पर लदी तोपें हथिया लीं. फिर पूर्व की दिसा से मैसूर लैंसर्स आए और हरी पगड़ियों में दक्षिण भारत के शेर थे. उन्होंने ऑस्ट्रियाई तोपखाने को चुप करा दिया, फिर हैदराबाद लैंसर्स ने पीछे से मोर्चा संभाला, तलवारें तैयार. मिलकर वो हाइफा के दरवाजों पर टूट पड़े. तुर्क निशानची छतों से गोलियां चलाते रहे, औरतें-बच्चे डर से दुबके थे. हालांकि लैंसर्स बाढ़ की तरह घुसे, तोपचियों को भाला मारा, दीवारें लांघीं और सूरज ढलते-ढलते जंग खत्म और हाइफा शहर उनके कब्जे में आ गया. 1,350 बंदी बना लिए, उनमें 35 ऑटोमन तुर्क अफसर थे, 2 जर्मन थे, 17 तोपें, 11 मशीनगनें हथिया लीं. मेजर दलपत सिंह का पार्थिव शरीर हीरो की तरह घर लाया गया.
ये युद्ध नहीं चमत्कार था …
इतिहासकार कहते हैं ये चमत्कार था. आधुनिक युद्ध में पहली बार घुड़सवारों ने एक किलेबंद शहर जीता, वो भी मशीनगन से लड़ते हुए. मिलिटरी इतिहास में दर्ज है हाइफा की जंग कि कैसे घोड़े पर भाले लिए हुए सैनिकों ने मशीनगन वाले सैनिकों को हराकर एक बंदरगाह पर कब्जा कर लिया. ब्रिटिश जनरल एडमंड एलनबी ने लंदन संदेश भेजा कि इस पूरी जंग में इससे ज़्यादा हैरतअंगेज हमला नहीं हुआ. हाइफ़ा पर कब्जा जंग का वो पड़ाव था जिसने पूरी जंग को ही मोड़ दिया. तुर्क टूट गए, उनका साम्राज्य बिखर गया और 2 महीने बाद उनको घुटने टेकने पड़े. इस हमले ने फिलिस्तीन में ब्रिटिश जहाजों को रास्ता दिया और उसी वजह के इलाके पर ब्रिटेन का कब्जा हो सका था और ये सिर्फ ब्रिटिश सेना की जीत नहीं थी. यहीं से इज़राइल बनने की कहानी शुरू हुई.

यहां से पड़ी इजरायल की नींव
ऑटोमन राज में फिलिस्तीन टुकड़ों में बंटा था, कोई यहूदी देश नहीं था, बस तुर्क हाकिमों की जमीनों के टुकड़े थे. अंग्रेजों ने घोषणा कर दी कि वहां यहूदियों को बसने के लिए ज़मीनें देंगे. उनको युद्ध के लिए यहूदी समर्थन चाहिए था और तेल से भरे इलाके पर कब्जा चाहिए था. हाइफा की जीत इस सब की चाभी थी. बंदरगाह खुला तो ब्रिटिश सैनिक लहरों की तरह आए और ऑटोमन तुर्कों को हटाया. यहूदी नेताओ ने मौका देखा और यूरोप से यहूदी शरणार्थी आए, उन्होंने जमीनें खरीदीं और बस्तियां बनाईं. हाइफा जैसे बंदरगाहों से उनके जहाज उतरे लेकिन इतिहास में ये सब ब्रिटिश सेना की जीत दर्ज हुई. हिंदुस्तानी सिपाहियों को किसी ने याद नहीं किया और उन सिपाहियों को भी तब नहीं पता था कि ब्रिटिश सेना के लिए लड़ते हुए, उन्होंने अनजाने में एक यहूदी वतन की राह खोली. अगर उन जांबाज घुड़सवारों ने अगर तोपों को और मशीनगन को ना हराया होता तो शायद तुर्क इतनी जल्दी न हारते, ब्रिटिश सेना का कब्जा और टलता. खैर, जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद के शासकों ने 1922 में दिल्ली में एक स्मारक बनवाया. तीन कांस्य मूर्तियां – लैंसर्स की. लैंसर यानी भाले से वार करने वाला.
अब सच्चा इतिहास पढ़ेंगे इजरायल के बच्चे
अब 2025 में, इज़रायल में हाइफ़ा में स्कूलों की किताबें बदल रही हैं. बच्चे पहले पढ़ते थे ब्रिटिश सेना ने उन्हें आज़ाद किया. अब पढ़ेंगे वो जाबांज़ हिंदुस्तानी थे. मेजर दलपत सिंह की अगुवाई में लैंसर्स ने भाले और तलवारों से लोहा लिया था मशीन गन से. ऐसी जंग जो मिलिट्री हिस्ट्री में कभी नहीं हुई कि घोड़े पर बैठे सैनिकों ने भालों से मशीन गन को हरा दिया हो. अब तो इजरायल में भी किताबों में पढ़ा रहे हैं तो आप तो जान लो और आने वाली पीढियों को भी बताना. बैटल ऑफ हाइफा. जोधुपर, मैसूर और हैदराबाद के लैंसर और तीन मूर्ति के बारे में भी.

जांच से पहले मेरे बेटे को अपराधी… एयर इंडिया क्रैश में मारे गए पायलट के पिता की भावुक अपील, ALPA को लिखा Email

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अहमदाबाद विमान हादसे में जान गंवाने वाले पायलट कैप्टन सुमीत सभरवाल के पिता पुष्कर राज सभरवाल ने अपने बेटे की गरिमा बचाने के लिए एक भावुक अपील की है. उन्होंने एयर लाइन पायलट्स’ एसोसिएशन (ALPA) को एक ईमेल भेजकर तत्काल कानूनी हस्तक्षेप की मांग की है.
पुष्कर सभरवाल ने कहा कि उनके बेटे को “जांच पूरी होने से पहले ही अपराधी ठहराया जा रहा है.” यह न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि एक जिम्मेदार और अनुभवी पायलट की पेशेवर साख पर गहरी चोट भी है.

12 जून 2025 का दिन गुजरात, भारत और पूरी दुनिया के लिए एक काली याद बन गया. इसी दिन एयर इंडिया का ड्रीमलाइनर विमान अहमदाबाद से दिल्ली के लिए उड़ान भरने के कुछ ही मिनट बाद नियंत्रण खो बैठा और अहमदाबाद के मेघाणीनगर थाना क्षेत्र में स्थित एक मेडिकल हॉस्टल और मेडिकल मेस से टकराकर गिर गया.

टक्कर के तुरंत बाद विमान में भीषण आग लग गई और पूरे इलाके में अफरा-तफरी मच गई. इस हादसे में 241 यात्री और कई स्थानीय लोग मारे गए थे. यह भारत के इतिहास के सबसे भयानक हवाई हादसों में से एक है.
AAIB टीम की टिप्पणी से आहत हुआ परिवार
कैप्टन सुमीत के पिता ने अपने पत्र में लिखा कि 30 अगस्त 2025 की शाम एयरक्राफ्ट एक्सिडेंट इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (AAIB) की एक टीम उनके घर आई थी. टीम ने औपचारिक रूप से संवेदना व्यक्त की, लेकिन बातचीत के दौरान कुछ सदस्यों ने “कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डर” (CVR) और “लेयर्ड वॉयस एनालिसिस” के आधार पर दावा किया कि उनके बेटे ने “फ्यूल कंट्रोल स्विचेस” को RUN से CUT OFF कर दिया था. यानी जानबूझकर इंजन बंद कर दिए.
पुष्कर राज सभरवाल ने लिखा, “यह बात न तो किसी आधिकारिक रिपोर्ट में कही गई है. और न ही इसकी पुष्टि किसी तकनीकी साक्ष्य से हुई है. ऐसे बयानों से मेरे बेटे की गरिमा को ठेस पहुंची है और हमारे परिवार पर गहरा भावनात्मक असर हुआ है.”
“15,000 घंटे उड़ाने वाला पायलट गलती नहीं, जिम्मेदारी जानता था”
कैप्टन सुमीत सभरवाल के पिता ने कहा कि उनका बेटा 15,000 से ज्यादा घंटे की उड़ान का अनुभवी पायलट था, जिसने अपने पूरे करियर में सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी. उन्होंने अपने ईमेल में लिखा “वह अपने काम को लेकर बेहद अनुशासित और सजग था. बिना किसी ठोस जांच के ‘पायलट एरर’ कहना न केवल अन्याय है, बल्कि पेशे की गरिमा के खिलाफ भी.”
उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी जांच में निष्कर्ष तभी निकाला जाना चाहिए जब सभी तकनीकी और मानवीय पहलुओं की निष्पक्ष जांच हो जाए. उन्होंने अपने ईमेल में आगे कहा, “अगर किसी भी पायलट को जांच से पहले दोषी ठहराया जाएगा, तो यह पूरे एविएशन सेक्टर के लिए एक खतरनाक उदाहरण बनेगा,” उन्होंने जोड़ा.
ALPA से न्याय की अपील: यह सिर्फ मेरे बेटे की बात नहीं
पुष्कर राज सभरवाल ने ALPA से आग्रह किया है कि वे इस मामले को न्यायिक मंच पर ले जाएं ताकि तथ्यों की पारदर्शी और निष्पक्ष जांच हो सके. उन्होंने लिखा, “यह केवल मेरे बेटे की प्रतिष्ठा का सवाल नहीं, बल्कि पूरे पायलट समुदाय के नैतिक मानदंडों और प्रक्रिया की निष्पक्षता की परीक्षा है.” अंत में उन्होंने कहा कि उन्हें विश्वास है कि ALPA इस न्याय की लड़ाई में उनके साथ खड़ा रहेगा और सच्चाई को सामने लाने में मदद करेगा.

CG Weather Report: राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा स्थापित राज्य स्तरीय बाढ़ नियंत्रण, औसत वर्षा रिकार्ड – 

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छत्तीसगढ़ में 1 जून से अब तक 1191.2 मि.मी. औसत वर्षा रिकार्ड की जा चुकी है। राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा स्थापित राज्य स्तरीय बाढ़ नियंत्रण कक्ष से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रदेश में अब तक दंतेवाड़ा जिले में सर्वाधिक 1618.3 मि.मी. वर्षा रिकार्ड की गई है। बेमेतरा जिले में सबसे कम 546.8 मि.मी. वर्षा दर्ज हुई है।

रायपुर और बिलासपुर संभाग में हुई कितनी बारिश

रायपुर संभाग में रायपुर जिले में 1132.9 मि.मी., बलौदाबाजार में 985.7 मि.मी., गरियाबंद में 1213.4 मि.मी., महासमुंद में 1035.5 मि.मी. और धमतरी में 1138.8 मि.मी. औसत वर्षा दर्ज हुई है। बिलासपुर संभाग में बिलासपुर जिले में 1184.7 मि.मी., मुंगेली में 1157.5 मि.मी., रायगढ़ में 1370.0 मि.मी., सारंगढ़-बिलाईगढ़ में 1098.7 मि.मी., जांजगीर-चांपा में 1381.9 मि.मी., सक्ती में 1254.4 मि.मी., कोरबा में 1168.2 मि.मी. और गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही 1094.2 मि.मी. औसत वर्षा दर्ज हुई है।

दुर्गसरगुजा और बस्तर संभाग में बारिश का औसत

दुर्ग संभाग में दुर्ग जिले में 932.0 मि.मी., कबीरधाम में 856.6 मि.मी., राजनांदगांव में 1002.0 मि.मी., मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी में 1454.5 मि.मी., खैरागढ़-छुईखदान-गंडई में 890.0 मि.मी. और बालोद में 1288.7 मि.मी. औसत वर्षा दर्ज हुई है। सरगुजा संभाग में सरगुजा जिले में 791.8 मि.मी., सूरजपुर में 1174.0 मि.मी., बलरामपुर में 1578.4 मि.मी., जशपुर में 1086.2 मि.मी., कोरिया में 1243.3 मि.मी. और मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर में 1123.6 मि.मी. औसत वर्षा दर्ज हुई है।

बस्तर संभाग में बस्तर जिले में 1595.8 मि.मी., कोंडागांव जिले में 1187.8 मि.मी., कांकेर में 1388.8 मि.मी., नारायणपुर में 1448.7 मि.मी., सुकमा जिले में 1272.4 मि.मी. और बीजापुर जिले में 1613.0 मि.मी. की औसत वर्षा रिकार्ड की जा चुकी है।

CG: साहित्यिक, सांस्कृतिक और कलात्मक परंपराओं को नई ऊर्जा देने के उद्देश्य से राज्य स्तरीय युवा कवि सम्मेलन का आयोजन…

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मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि प्रभु श्रीराम के ननिहाल और माता शबरी की पावन भूमि पर छत्तीसगढ़ की साहित्यिक, सांस्कृतिक और कलात्मक परंपराओं को नई ऊर्जा देने के उद्देश्य से राज्य स्तरीय युवा कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया।

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि प्रभु श्रीराम के ननिहाल और माता शबरी की पावन भूमि पर छत्तीसगढ़ की साहित्यिक, सांस्कृतिक और कलात्मक परंपराओं को नई ऊर्जा देने के उद्देश्य से राज्य स्तरीय युवा कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम में कहा कि छत्तीसगढ़ की धरती सदा से साहित्य और संस्कृति की धरा रही है। उन्होंने महाकवि कालिदास, गजानन माधव मुक्तिबोध और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जैसे साहित्यकारों के योगदान का स्मरण किया। इसके साथ ही पूर्व संसदीय क्षेत्र रायगढ़ के संगीत सम्राट राजा चक्रधर सिंह को श्रद्धापूर्वक याद किया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य युवा आयोग और खेल एवं युवा कल्याण विभाग का यह अभिनव प्रयास युवा साहित्यकारों, रचनाकारों और कलाकारों को मंच प्रदान करने और उन्हें प्रोत्साहित करने का उत्कृष्ट माध्यम है। उन्होंने संभाग स्तरीय प्रतियोगिताओं से चयनित विजेताओं को बधाई दी और कहा कि इस मंच के माध्यम से युवा कवियों को देश के ख्यातिलब्ध कवियों से मार्गदर्शन मिलेगा, जो उनके रचनात्मक विकास को नई दिशा देगा।

उपमुख्यमंत्री एवं खेल और युवा कल्याण मंत्री ने कहा कि यह सम्मेलन केवल प्रतियोगिता नहीं बल्कि युवा कवियों के लिए सीखने और सृजन की प्रेरणा का अवसर है। उन्होंने प्रदेश की समृद्ध कला, लोकगीत, नृत्य और वाद्य परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रदेश संतों, महात्माओं और कवियों की कर्मभूमि रहा है।

सम्मेलन में देश के प्रतिष्ठित कवियों ने अपनी ओजपूर्ण और भावनात्मक कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। राज्य स्तरीय युवा कवि प्रतियोगिता में बिलासपुर की निधि तिवारी ने प्रथम स्थान, मीरा मृदु ने द्वितीय स्थान और कोरिया की अलीशा शेख ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। मुख्यमंत्री ने विजेताओं को सम्मानित किया और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की।

इस अवसर पर उच्च शिक्षा मंत्री, महिला एवं बाल विकास मंत्री, कौशल विकास मंत्री, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री, विधायक, राज्य युवा आयोग के अध्यक्ष सहित अन्य जनप्रतिनिधि, साहित्यकार और कवि मौजूद थे।

CG: NCRB की रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2023 से जून 2025 तक राज्य में साइबर ठगी की 67,000 से ज्यादा शिकायतें दर्ज…

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छत्तीसगढ़ में बढ़ रहा साइबर अपराध चिंता का विषय बना हुआ है। आंकड़ों के अनुसार यहां हर 20 मिनट में एक साइबर ठगी का केस दर्ज हो रहा है। जनवरी 2023 से जून 2025 तक राज्य में साइबर ठगी की 67,000 से ज्यादा शिकायतें प्राप्त हुई हैं।

राज्य में साइबर अपराध बेकाबू होते जा रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक जनवरी 2023 से जून 2025 तक राज्य में साइबर ठगी की 67,000 से ज्यादा शिकायतें दर्ज की गईं, जिनसे 791 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि औसतन हर 20 मिनट में साइबर ठगी का एक नया मामला दर्ज हो रहा है। सिर्फ साल 2024 में ही 31,000 से अधिक शिकायतें दर्ज हुईं और 200 करोड़ रुपये से ज्यादा की चपत लोगों को लगी। जुलाई 2025 तक के 18 महीनों में ही 1,301 मामलों में 107 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है। बढ़ते साइबर अपराधों ने पुलिस और साइबर सेल की नींद उड़ा दी है।

उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा ने जुलाई महीने में यह आंकड़ा विधानसभा में रखा था। विधायक सुनील सोनी के सवाल और गजेंद्र यादव के पूरक प्रश्न के जवाब में उन्होंने बताया था औसतन हर 20 मिनट में साइबर ठगी का एक नया मामला सामने आ रहा है।

वहीं एनसीआरबी के आंकड़े बताते है कि मुंबई के लोग सबसे अधिक साइबर अपराधों के शिकार हुए हैं। वहीं छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वर्ष 2024 में रायपुर में ही 17,000 से अधिक शिकायतें दर्ज हुई है और 48 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान लोगों को उठाना पड़ा है।

दुर्ग, बिलासपुर भी सबसे अधिक प्रभावित

रायपुर के बाद दुर्ग और बिलासपुर जिले भी साइबर अपराधियों से सबसे अधिक प्रभावित जिले रहे। लेकिन चिंताजनक तथ्य यह है कि इतनी बड़ी संख्या में शिकायतों और नुकसान के बावजूद, केवल 107 पीडि़तों को ही पैसा वापस मिल पाया है। बैंक से जुड़ी धोखाधड़ी में तो अब तक सिर्फ तीन गिरफ्तारी और सात सजाएं हुई हैं। शिकायतों की बड़ी संख्या का मतलब धोखाधड़ी के उद्देश्य से किया गया काल है, चाहे उसमें ठगी हो पाई हो या नहीं।

साइबर अपराधियों के साफ्ट टारगेट में छत्तीसगढ़िया

पुलिस और साइबर सेल ने जांच में पाया गया कि बिहार, झारखंड, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों के ठग गिरोह बीमा, नौकरी और लोन के नाम पर लोगों को फंसाते हैं। वहीं राजस्थान के ठग सेक्सटार्शन जैसे मामलों से छत्तीसगढ़ के लोगों को जाल में फंसा रहे हैं। मतलब साफ है कि छत्तीसगढ़ देशभर के साइबर अपराधियों के लिए एक साफ्ट टारगेट बन चुका है।

ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता की कमी और स्मार्टफोन-इंटरनेट के तेजी से फैलते इस्तेमाल ने अपराधियों के लिए रास्ता और आसान कर दिया है। ठगी के शिकार लोगों में बैंक मैनेजर, उपक्रमों के महाप्रबंधक, यहां तक कि पुलिस और विजिलेंस के अधिकारी भी शामिल हैं।

 

”सचिन पायलट का राहुल गांधी पर BJP के आरोपों पर पलटवार, बोले- ‘हम वोट चोरी की पोल खोलेंगे”

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लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी विदेशों में दिए अपने बयान की वजह से एक बार फिर बीजेपी के निशाने पर हैं। कांग्रेस सांसद ने कोलंबिया में कहा था कि भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली पर हमला हो रहा है।

इसके जवाब में बीजेपी ने उन पर तीखा हमला बोलते हुए प्रोपगैंडा फैलाने का आरोप लगाया था। अब राजस्थान कांग्रेस के बड़े नेता और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट राहुल के समर्थन में उतरे हैं। उन्होंने कहा कि बीजेपी के लोग लोकसभा में नेता विपक्ष पर निजी हमले कर रहे हैं।

कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने एक बार फिर केंद्र और चुनाव आयोग पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी ने जिस तरह से देश में बड़े पैमाने पर चल रही वोट चोरी को उजागर किया है, उसके बाद सरकार लगातार उन्हें निशाना बना रही है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस तरह से उन पर निजी हमले हो रहे हैं वह बिल्कुल भी ठीक नहीं है।

Sachin Pilot ने राहुल गांधी का किया समर्थन

सचिन पायलट ने राहुल गांधी पर बीजेपी के हमले पर पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता विपक्ष ने यह दिखाया है कि वोट चोरी सिस्टमेटिक तरीके से हो रही है और इसके पीछे जिन लोगों का हाथ है, उन्हें चुनाव आयोग का संरक्षण मिला हुआ है। सचिन पायलट ने कहा, ‘सरकार पर सवाल उठाने और जवाबदेही की मांग करने के लिए किसी को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाना गलत है। राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी पूरी तरह से इन ताकतों से लड़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं।’

‘Vote Chori का मुद्दा कांग्रेस पार्टी पूरे देश में उठाएगी’

सचिन पायलट ने दौसा में मीडिया से बात करते हुए कहा कि कांग्रेस पार्टी देशभर में वोट चोरी के मुद्दे पर एक बड़ा अभियान चलाएगी। पायलट ने यह भी जोर देकर कहा कि लोग चाहते हैं कि सरकार और चुनाव आयोग अपने कर्तव्यों के प्रति जवाबदेह हों।

उन्होंने कहा, ‘जनता ने यह तय कर लिया है कि वोट चोरी के मामलों में जिम्मेदारों को बेनकाब किया जाना चाहिए। कांग्रेस नेताओं का यह बयान ऐसे समय में आया है जब आगामी चुनावों को लेकर राजनीतिक तापमान बढ़ रहा है। पार्टी ने देशभर में अपने अभियान को और मजबूत करने का ऐलान किया है, जिसमें वोटिंग सिस्टम और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।’

CG: छत्तीसगढ़ माइनिंग कॉन्क्लेव 2025 का आयोजन, राष्ट्रीय मछुआरा जागरूकता सम्मेलन में मुख्यमंत्री की सहभागिता…

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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में आज “छत्तीसगढ़ माइनिंग कॉन्क्लेव 2025” का आयोजन किया गया, जिसमें मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने शिरकत की। इस अवसर पर राज्य में खनन क्षेत्र के विकास और भविष्य की संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा की गई। मुख्यमंत्री ने इस मंच से रेत नीति 2025 का औपचारिक शुभारंभ किया, जिसके तहत अब प्रदेश में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से रेत की नीलामी की जाएगी, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा मिलेगा।

इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने DMF 2.0 पोर्टल और खनिज 2.0 पोर्टल का भी शुभारंभ किया, जिससे खनिज संसाधनों से जुड़ी जानकारी एवं प्रबंधन अब और अधिक डिजिटल और सुगम हो सकेगा। साथ ही, माइनिंग सेक्टर में तकनीकी सहयोग के लिए कोल इंडिया और IIT धनबाद के साथ महत्वपूर्ण समझौता (MoU) भी किया गया है, जो भविष्य में नवाचार और स्थायी खनन पद्धतियों को प्रोत्साहित करेगा।

राष्ट्रीय मछुआरा जागरूकता सम्मेलन में मुख्यमंत्री की सहभागिता

माइनिंग कॉन्क्लेव के उपरांत मुख्यमंत्री दोपहर 2 बजे बलवीर सिंह जुनेजा इंडोर स्टेडियम पहुंचे, जहां उन्होंने “राष्ट्रीय मछुआरा जागरूकता सम्मेलन” में भाग लिया। इस आयोजन का उद्देश्य मछुआरा समुदाय को सशक्त बनाना और उन्हें सरकारी योजनाओं की जानकारी देना है। सम्मेलन के पश्चात मुख्यमंत्री दोपहर 3 बजे अपने निवास लौटे।

राष्ट्रीय डाक सप्ताह 6 से 10 अक्टूबर तक

हर वर्ष की तरह इस बार भी राष्ट्रीय डाक सप्ताह का आयोजन 6 अक्टूबर से 10 अक्टूबर 2025 तक किया जा रहा है। इस दौरान 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस मनाया जाएगा। इस सप्ताह का उद्देश्य नागरिकों और संस्थानों में डाक सेवाओं की भूमिका, उनकी उपयोगिता और सामाजिक-आर्थिक विकास में योगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

 

“BIG BREAKING: 22 नवंबर से पहले होगा बिहार में विधानसभा चुनाव, EC ने बताया कैसी है पूरी तैयारी”

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चुनाव आयोग ने रविवार को पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट कर दिया है कि 22 नवंबर को विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो रहा है और इससे पहले चुनाव संपन्न हो जाएंगे।

प्रेस वार्ता की शुरुआत में उन्होंने कहा कि बिहार में सफलता के साथ SIR की प्रक्रिया पूरी हुई है। इसके लिए उन्होंने एसआईआर के जरिए वोटर लिस्ट को शुद्ध करने वाले BLO का धन्यवाद किया।

चुनाव आयुक्‍त ने बताया कि जिनके वोटर कार्ड के डाटा में कोई परिवर्तन होगा, उन्हें 15 दिनों के अंदर ईपिक मिल जाएगा। वोटर की जांच किस तरह करनी है, उसी के तहत जांच की गई है। जिन लोगों ने मतदाता सूची के लिए नामांकन भरा होगा, वह आधार देने के लिए बाध्य नहीं हैं। चुनाव आयोग, आधार अथॉरिटी के नियम और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत आधार न जन्मतिथि, न नागरिकता और न ही नागरिकता का प्रमाणपत्र है।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया तो हमने पुनरीक्षण में आधार कार्ड लेने की व्यवस्था दी। संविधान के तहत, मतदाता बनने के लिए भारत का नागरिक होना जरूरी है। वोटर जहां रहता है, उसके आसपास के बूथ का मतदाता हो सकता है। गैर-भारतीय होने के आधार पर कितने नाम कटे, इसपर मुख्य चुनाव आयुक्त ने स्पष्ट जानकारी नहीं दी। उन्होंने कहा कि सभी चिह्नित अयोग्य मतदाताओं का नाम हटाया गया है। इसकी सूची जिला निर्वाचन पदाधिकारियों के पास भी है और राजनीतिक दलों के पास भी है।

चुनाव आयुक्‍त ने भोजपुरी में किया बिहार के मतदाताओं का अभिवादन

प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का अनोखा अंदाज देखने मिला। वो भोजपुरी में बिहार के मतदाताओं का अभिवादन करते हुए नजर आए। उन्होंने कहा कि जिस तरह हम अपने पर्व-त्योहारों और विशेष रूप से लोक आस्था के महापर्व छठ को मनाते हैं, उसी तरह बिहार विधानसभा चुनाव में मतदान को उत्साह के साथ मनाएं।

मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने PC में बताया कि बिहार में विधानसभा की कुल 243 सीटों में 38 सीटें अनुसूचित जाति और दो सीटें अनुसूचित जनजाति वर्गों के लिए आरक्षित हैं। बिहार चुनाव को लेकर निर्वाचन आयोग की टीम दो दिनों के राज्य के दौरे पर रहीं। इस दौरान चुनाव आयोग के अधिकारियों ने पुलिस-प्रशासन के अधिकारियों के साथ ही बैठक की।