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बाघ की खाल, महंगी शराब, 12 करोड़ की संपत्ति… EOW जांच के बाद लापता डिप्टी कमिश्नर के घर से क्या कुछ मिला

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बाघ की खाल, महंगी शराब की दर्जनों बोतलें, करोड़ों की संपत्ति के दस्तावेज, लाखों के जेवरात… ये सब मध्य प्रदेश के एक डिप्टी कमिश्नर के ठिकानों से मिला है. डिप्टी कमिश्नर के यहां आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) की टीम ने छापेमारी की थी. खास बात यह है कि इस छापेमारी के बाद संबंधित अधिकारी रहस्यमयी ढंग से लापता हो गए. उनका फोन बंद है. वो कहां है इसकी किसी को जानकारी नहीं है. मामला मध्य प्रदेश के आदिम जाति कल्याण विभाग के डिप्टी कमिश्नर जगदीश सरवटे का है. जगदीश सरवटे जबलपुर में तैनात थे. उनके घर से बाघ की खाल मिलने के बाद अधिकारी की मां को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है.

करोड़ों की संपत्ति और अवैध शराब, बाघ की खाल जब्त
मिली जानकारी के अनुसार EOW की टीम ने 22 जुलाई को सरवटे के शंकर शाह नगर स्थित सरकारी आवास सहित कई ठिकानों पर छापेमारी की थी. सरकारी आवास के अलावा भोपाल, मंडला, सागर के स्थित उनके अन्य ठिकानों पर टीम ने दबिश दी थी.

इस दौरान डिप्टी कमिश्नर के ठिकानों से करीब 12 करोड़ रुपए की संपत्ति, जमीनों के दस्तावेज, लाखों रुपए के सोने-चांदी के जेवरात, महंगी शराब की कई बोतलें, बाघ की खाल मिले.

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि सरवटे और उनके परिजनों के नाम पर कान्हा नेशनल पार्क (मंडला) और बांधवगढ़ में रिसोर्ट भी हैं. साथ ही जबलपुर-मंडला रोड पर एक रेस्टोरेंट भी चल रहा है.

EOW रेड में डिप्टी कमिश्नर जगदीश सरवटे के ठिकानों से क्या कुछ मिला?
EOW की जांच में मिली डिप्टी कमिश्नर के घर से एक लाख से ज्यादा की महंगी शराब की 56 बोतलें मिली.इसके अलावा मण्डला में भी जगदीश सरवटे का आलीशान रिसोर्ट और जमीन भी मिली.एनएच 30 बबेहा में जायका नामक एक ढाबा भी मिला.कान्हा में जमीन और निर्माणाधीन रिसोर्ट भी मिली.10 कमरों का निर्माणाधीन रिसोर्ट ओर दुकानें मिली.मोचा गांव में जमीन और मकान मिली.कान्हा के होटल के अलावा एक ढाबा भी मिला.जांच के दौरान सरवटे और उनके परिजनों के 10 बैंक खातों का भी पता चला है.अधिकारी और परिजनों के 10 बैंक खाते से भारी लेन-देन का शक
लापता अधिकारी के हर ठिकानों पर रखी जा रही नजर
अधिकारी के घर से जब्त शराब के मामले में थाना गोरखपुर में डिप्टी कमिश्नर के खिलाफ आबकारी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया गया. अधिकारियों को शक है कि इन खातों के जरिए भारी लेन-देन हुआ है. ईओडब्ल्यू की टीमें अब उनके संभावित ठिकानों की गुप्त रूप से निगरानी कर रही हैं.

एशिया कप में तीन बार हो सकती है भारत-पाकिस्तान टक्कर, देखें भारत के ग्रुप मैचों का शेड्यूल

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एशियाई क्रिकेट परिषद (ACC) के अध्यक्ष मोहसिन नकवी ने शनिवार को घोषणा की कि पुरुषों का एशिया कप (Asia Cup 2025) नौ से 28 सितंबर तक संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में आयोजित किया जाएगा. और उनके एशिया कप के आयोजन की तारीखों के ऐलान के बाद ही टूर्नामेंट में भारत के कार्यक्रम की भी पुष्टि हो गई है. शुरुआती कार्यक्रम के अनुसार भारत और पाकिस्तान के बीच बहुप्रतीक्षित ग्रुप चरण मैच रविवार (14 सितंबर) को दुबई अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम में होगा. भारत और पाकिस्तान की टीमें एक ही ग्रुप में है और शेड्यूल की सबसे अहम बात यह है कि अगर संयोग बना, तो दोनों पड़ोसी देश एक नहीं, बल्कि टूर्नामेंट में तीन बार एक-दूसरे से भिड़ सकते हैं. 14 सितंबर के बाद 21 सितंबर को सुपर-4 में भी फैंस को फिर से एक और टक्कर देखने को मिल सकती है.

इस दिन करेगा भारत अभियान की शुरुआत
भारत अपने अभियान की शुरुआत 10 सितंबर को यूएई के खिलाफ करेगा और उसके सभी मैच दुबई में खेले जाने की संभावना है. भारत, पाकिस्तान, यूएई और ओमान को ग्रुप ए में रखा गया है, जबकि श्रीलंका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और हांगकांग ग्रुप बी में हैं. एसीसी 19 मैचों के इस टूर्नामेंट के लिए 17 सदस्यीय टीम को अनुमति देगा तथा मैच दुबई तथा अबुधाबी में खेले जाएंगे.

तो हो सकती है तीसरी भारत-पाक भिड़ंत
टूर्नामेंट का मेजबान बीसीसीआई है, लेकिन इसे यूएई में आयोजित किया जा रहा है क्योंकि भारत और पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच मौजूदा तनाव के कारण 2027 तक केवल तटस्थ स्थानों पर प्रतिस्पर्धा करने पर पारस्परिक रूप से सहमति व्यक्त की है. एसीसी के प्रसारकों के साथ हुए समझौते के अनुसार भारत और पाकिस्तान एक ही ग्रुप में हैं और सुपर फोर चरण में भी उन्हें एक-दूसरे से भिड़ने का एक और मौका मिलेगा. दोनों टीम अगर फाइनल में पहुंचती है तो टूर्नामेंट में तीसरे मैच की भी संभावना होगी.

एशिया कप के ग्रुप चरण में भारत का कार्यक्रम:
तारीख बनाम
10 सितंबर : भारत बनाम यूएई

14 सितंबर: भारत बनाम पाकिस्तान

19 सितंबर: भारत बनाम ओमान

सुपर चार कार्यक्रम
20 सितंबर: बी 1 बनाम बी 2

21 सितंबर: ए 1 बनाम ए 2 (भारत बनाम पाकिस्तान का संभावित मुकाबला)

23 सितंबर: ए 2 बनाम बी 1

24 सितंबर: ए 1 बनाम बी 2

25 सितंबर: ए 2 बनाम बी 2

26 सितंबर: ए 1 बनाम बी 1

28 सितंबर: फाइनलuyjhmn

तेलंगाना में सीएम रेवंत रेड्डी ने कराए फीमेल सेलिब्रिटीज के फोन टैप! बीआरएस विधायक के दावों से सनसनी

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तेलंगाना में फोन टैपिंग का मामला गर्माता जा रहा है. भारत राष्‍ट्र समिति (बीआरएस) के विधायक पदी कौशिक रेड्डी ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी पर बड़े स्‍तर पर अवैध फोन निगरानी का आरोप लगाया है. एक प्रेस कॉन्‍फ्रेंस में जो काफी नाटकीय थी, उसमें पदी कौशिक रेड्डी ने दावा किया है कि पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (केसीआर), के.टी. रामा राव (केटीआर) और टी. हरीश राव समेत प्रमुख बीआरएस नेताओं के फोन अवैध रूप से टैप किए जा रहे हैं. सिर्फ इतना ही नहीं रेड्डी पर आरोप है कि उनकी सरकार में कई फीमेल सेलिब्रिटीज के फोन भी टैप किए गए हैं.

सीएम ने मानी टैपिंग की बात
बीआरएस का दावा है कि इस काम को अंजाम देने के लिए रेवंत रेड्डी ने प्राइवेट हैकर्स तक को हायर किया था. कौशिक रेड्डी ने चौंकाने वाले दावा में कहा कि मुख्यमंत्री ने खुद फोन टैपिंग की बात को स्वीकार किया है. कौशिक रेड्डी की मानें तो सीएम रेड्डी ने कहा है कि ‘क्या हो रहा है’ यह जानना जरूरी है. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उनकी पत्नी का फोन भी टैप किया जा रहा था. उनका कहना है कि रेवंत रेड्डी ने दो मंत्रियों के बीच टैप की गई बातचीत से मिली जानकारी का इस्तेमाल उनमें से एक को फटकार लगाने के लिए किया था.

लाई डिटेक्‍टर टेस्‍ट की चुनौती
कौशिक रेड्डी ने इस पूरे मामले में सीबीआई और ईडी जांच की मांग की है. साथ ही उन्‍होंने सवाल उठाया है कि फोन टैपिंग से जुड़ी उनकी पिछली शिकायत पर मामला क्यों नहीं दर्ज किया गया. पदी कौशिक रेड्डी से पहले बीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष केटीआर की तरफ से भी इसी तरह के दावे किए गए थे. केटीआर ने सीएम रेवंत रेड्डी पर तीखा हमला किया था. केटीआर ने रेवंत रेड्डी पर उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमार्क, राजस्व मंत्री पोंगुलेटी श्रीनिवास रेड्डी और सिंचाई मंत्री उत्तम कुमार रेड्डी सहित अपने ही कैबिनेट सहयोगियों के फोन टैप करने का आरोप लगाया था. केटीआर ने रेवंत रेड्डी को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए लाई डिटेक्टर टेस्ट कराने की चुनौती भी दी थी.

कांग्रेस ने किया पलटवार
वहीं, सत्तारूढ़ कांग्रेस ने मौजूदा फोन टैपिंग के आरोपों का पुरजोर खंडन किया है. कांग्रेस सांसद चमाला किरण कुमार रेड्डी ने केटीआर के दावों के जवाब में पलटवार किया और कहा कि बीआरएस के सत्ता में रहने के दौरान केटीआर ने खुद अपनी बहन के. कविता के फोन टैपिंग के आदेश दिए थे. उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमार्क ने भी केटीआर के फोन टैपिंग के दावों का सार्वजनिक तौर पर खंडन किया है. हालांकि मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने एक अनौपचारिक बातचीत में कहा था कि अगर ‘सही अनुमति’ के साथ फोन टैपिंग की जाए तो यह गैरकानूनी नहीं है और उनकी सरकार इसमें शामिल है. लेकिन इस बयान की आलोचना हुई है और पिछले फोन टैपिंग की चल रही जांच की वैधता पर सवाल उठे हैं.

एक मामले की जांच जारी
इस बीच एक स्‍पेशल इनवेस्टिगेशन टीम (एसआईटी) पिछले बीआरएस कार्यकाल के दौरान हुई अवैध फोन टैपिंग के विस्‍तृत आरोपों की सक्रिय तौर पर जांच कर रहा है. एसआईटी की जांच में बड़े पैमाने पर फोन टैपिंग का खुलासा हुआ है. रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि राजनेताओं, व्यापारियों, न्यायाधीशों, पत्रकारों और यहां तक कि आईपीएस और आईएएस अधिकारियों के फोन टैप किए गए थे. इस जांच में पूर्व विशेष खुफिया ब्यूरो (एसआईबी) प्रमुख टी. प्रभाकर राव मुख्य आरोपी हैं और कई पुलिस अधिकारियों को गिरफ्तार किया गया है. केंद्रीय मंत्री बंदी संजय कुमार और तेलंगाना प्रदेश कांग्रेस कमेटी (टीपीसीसी) के अध्यक्ष बी महेश कुमार गौड़ सहित कई नेताओं ने एसआईटी के समक्ष गवाही दी है. उन्‍होंने दावा किया है कि बीआरएस कार्यकाल के दौरान उनके फोन भी अवैध तौर पर इंटरसेप्‍ट किए गए थे. 8520/

अनिल अंबानी की कंपनियों पर तीसरे दिन भी ED की छापेमारी, 3000 करोड़ का कर्ज, झूठ और रिश्वत

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रिलायंस समूह के अध्यक्ष अनिल अंबानी (Anil Ambani) के सितारे पिछले कुछ वक्‍त से गर्दिश में हैं और अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) भी उनके खिलाफ शिकंजा कस रहा है. मुंबई में अनिल अंबानी की कंपनियों के खिलाफ ED की छापेमारी की कार्रवाई शनिवार को तीसरे दिन भी जारी रही. एजेंसी ने कई स्थानों से बड़ी संख्या में दस्तावेज और कंप्यूटर उपकरण जब्त किये हैं. आधिकारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी. संघीय जांच एजेंसी ने 24 जुलाई को कथित तौर पर 3,000 करोड़ रुपये के बैंक ऋण धोखाधड़ी से जुड़े धन शोधन मामले के तहत छापेमारी शुरू की थी. इसके अलावा कुछ कंपनियों द्वारा करोड़ों रुपये की वित्तीय अनियमितताओं के कई अन्य आरोप भी हैं.

सूत्रों ने बताया कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत बृहस्पतिवार को छापेमारी की कार्रवाई शुरू की गई थी और मुंबई में 35 से अधिक परिसरों में से कुछ स्थानों पर यह शनिवार को भी जारी रही.

3000 करोड़ के लोन मामले में छापेमारी
उन्होंने बताया कि ये परिसर 50 कंपनियों और 25 लोगों के हैं, जिनमें अनिल अंबानी समूह की कंपनियों के कई अधिकारी भी शामिल हैं.

ईडी सूत्रों ने बताया कि 2017 से 2019 के बीच यस बैंक से लिये लगभग 3,000 करोड़ रुपये के ऋण के गलत इस्तेमाल के आरोपों में ये छापेमारी की जा रही है.

ED की कार्रवाई का असर नहीं: रिलायंस
समूह की दो कंपनी ‘रिलायंस पावर’ और ‘रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर’ ने शेयर बाजार को बृहस्पतिवार को दी अलग-अलग सूचना में कहा कि ईडी की कार्रवाई का उनके व्यवसाय संचालन, वित्तीय प्रदर्शन, शेयरधारकों, कर्मचारियों या किसी अन्य हितधारक पर कोई असर नहीं पड़ा है.

कंपनियों ने कहा, ‘‘मीडिया में आई खबरों में जो जानकारी दी गई है वह 10 साल से भी पुरानी कंपनी ‘रिलायंस कम्युनिकेशन्स लिमिटेड’ (आरसीओएम) या ‘रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड’ (आरएचएफएल) के लेन-देन से संबंधित आरोपों से जुड़ी प्रतीत होती हैं.”

रिश्‍वत के लेनेदेन का संकेत!
सूत्रों ने बताया कि जांच में यह सामने आया है कि ऋण दिए जाने से ठीक पहले, यस बैंक के प्रवर्तकों को उनके संस्थानों में धनराशि ‘‘प्राप्त” हुई थी जो ‘‘रिश्वत” के लेनदेन का संकेत देता है. एजेंसी ‘‘रिश्वत” और ऋण से जुड़े मामले की जांच कर रही है.

सूत्रों ने बताया कि संघीय एजेंसी यस बैंक द्वारा रिलायंस अंबानी समूह की कंपनियों को दी गई ऋण स्वीकृतियों में पिछली तारीख के ऋण दस्तावेज, बैंक की ऋण नीति का स्पष्ट उल्लंघन कर बिना किसी उचित जांच या ऋण विश्लेषण के निवेश प्रस्तावित करना जैसे ‘‘घोर उल्लंघनों” के आरोपों की जांच कर रही है.

सूत्रों ने बताया कि कथित तौर पर इन ऋणों को संबंधित संस्थाओं द्वारा समूह की कई कंपनियों और मुखौटा कंपनियों में गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया.

सूत्रों ने बताया कि एजेंसी कमजोर वित्तीय स्थिति वाली संस्थाओं को दिए गए ऋणों, ऋणों के उचित दस्तावेजीकरण और उचित जांच-पड़ताल के अभाव, समान पते वाले ऋणदाताओं और उनकी कंपनियों में समान निदेशकों आदि के मामलों की भी जांच कर रही
है.
जनता के रुपयों का गलत इस्‍तेमाल!
उन्होंने बताया कि धनशोधन का यह मामला सीबीआई द्वारा दर्ज कम से कम दो प्राथमिकियों और राष्ट्रीय आवास बैंक, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी), राष्ट्रीय वित्तीय रिपोर्टिंग प्राधिकरण (एनएफआरए) तथा बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा साझा की गई रिपोर्ट से जुड़ा है.

सूत्रों के अनुसार इन रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि बैंकों, शेयरधारकों, निवेशकों और अन्य सार्वजनिक संस्थानों को धोखा देकर जनता के रुपयों का गलत तरीके से इस्तेमाल करने या हड़पना की यह एक ‘‘पूर्व-नियोजित और सोच-समझी साजिश” थी.

केंद्र सरकार ने हाल ही में संसद को सूचित किया था कि भारतीय स्टेट बैंक ने अंबानी के साथ-साथ आरकॉम को भी ‘धोखाधड़ी’ के रूप में वर्गीकृत किया है और वह सीबीआई में शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया में है.

1,050 करोड़ का बैंक ऋण भी जांच के दायरे में
सूत्रों ने बताया कि कुछ ‘अघोषित’ विदेशी बैंक खातों और संपत्तियों के अलावा आरकॉम और केनरा बैंक के बीच 1,050 करोड़ रुपये से अधिक का बैंक ऋण ‘धोखाधड़ी’ भी ईडी की जांच के दायरे में है.

उन्होंने बताया कि रिलायंस म्यूचुअल फंड ने भी एटी-1 बांड में 2,850 करोड़ रुपये का निवेश किया है और संघीय एजेंसी को इसमें ‘परस्पर लाभ पहुंचाने’ का संदेह है.

एडिशनल टियर 1 (एटी-1) बैंकों द्वारा अपना पूंजी आधार बढ़ाने के लिए जारी किए जाने वाले स्थायी बॉन्ड होते हैं और ये उच्च ब्याज दर वाले पारंपरिक बॉन्ड की तुलना में अधिक जोखिम भरे होते हैं. रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े लगभग 10,000 करोड़ रुपये के कथित ऋण कोष के दुरुपयोग का मामला भी एजेंसी की जांच के दायरे में है.

माना जा रहा है कि ‘रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड’ (आरएचएफएल) के संबंध में सेबी की एक रिपोर्ट भी ईडी की जांच का आधार बनी.

बाजार नियामक के निष्कर्षों के अनुसार, आरएचएफएल द्वारा दिए गए कॉर्पोरेट ऋणों में वृद्धि देखी गई जो वित्त वर्ष 2017-18 में 3,742.60 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2018-19 में 8,670.80 करोड़ रुपये हो गए.

कंपनियों ने शेयर बाजार को दी जानकारी में यह भी कहा कि अनिल अंबानी न तो ‘रिलायंस पावर’ और न ही ‘रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर’ के बोर्ड में थे और उनकी ‘रिलायंस कम्युनिकेशन्स’ या ‘रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड’ से कोई व्यावसायिक या वित्तीय संबंध नहीं हैं.

कंपनियों ने कहा कि ‘रिलायंस कम्युनिकेशन्स’ या ‘रिलायंस होम फाइनेंस लिमिटेड’ के खिलाफ की गई किसी भी कार्रवाई का ‘रिलायंस पावर’ या ‘रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर’ के संचालन व प्रबंधन पर कोई असर नहीं पड़ेगा.rtfgvb

शिक्षा मंत्रालय का स्‍कूलों-छात्रों से जुड़ी संरचनाओं के ऑडिट का निर्देश, हालिया हादसों के बाद उठाया कदम

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कूल जाने वाले छात्रों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के उद्देश्‍य से शिक्षा मंत्रालय ने सभी राज्‍यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सुरक्षा के लिए तत्काल कदम उठाने का निर्देश दिया है. शिक्षा मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सभी स्कूलों, सार्वजनिक सुविधाओं और इमारतों के आपातकालीन निकास सहित सभी आधारभूत संरचनाओं का सुरक्षा ऑडिट कराए जाने के लिए कहा है. सरकार की ओर से स्‍कूलों और छात्रों के साथ सामने आए विभिन्‍न हादसों के बाद यह निर्देश जारी किए गए हैं.

अपने आदेश में शिक्षा मंत्रालय ने कहा कि कर्मचारियों और छात्रों को आपातकालीन तैयारियों में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए, जिसमें निकासी अभ्यास, प्राथमिक चिकित्सा और सुरक्षा प्रोटोकॉल शामिल हैं.

स्‍थानीय अधिकारियों से सहयोग मजबूत करने पर जोर
साथ ही शिक्षा मंत्रालय के आदेशों में स्थानीय अधिकारियों (एनडीएमए, अग्निशमन सेवाओं, पुलिस और चिकित्सा एजेंसियों) के साथ सहयोग को मजबूत करने पर भी जोर दिया गया है.

मंत्रालय ने कहा कि किसी भी खतरनाक स्थिति की जानकारी और घटना की रिपोर्ट 24 घंटों के भीतर नामित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश प्राधिकरण को दी जानी चाहिए. साथ ही देरी, लापरवाही या कार्य करने में विफलता के मामलों में सख्त जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए भी कहा गया है.

बिना देरी के निर्देशों का पालन करने के लिए कहा
शिक्षा मंत्रालय ने अपने निर्देश में कहा कि माता-पिता, अभिभावकों, सामुदायिक नेताओं और स्थानीय निकायों को स्कूल जाने के साधन और रास्ते अगर असुरक्षित हैं तो रिपोर्ट किया जाए.

मंत्रालय ने शिक्षा विभागों, स्कूल बोर्डों और संबद्ध प्राधिकरण बिना किसी देरी के उपरोक्त उपायों को लागू करने के निर्देश दिए हैं.

पिछले कुछ दिनों में देश के अलग-अलग इलाकों से स्‍कूलों और स्‍कूलों के बाहर छात्रों के साथ हुए हादसों के बाद मंत्रालय ने यह आदेश जारी किए हैं. इन हादसों में सबसे बड़ा हादसा राजस्‍थान के झालावाड़ में हुआ था, जहां पर एक स्‍कूल की छत गिरने से सात बच्‍चों की मौत हो गई थी और कुछ अन्‍य छात्र गंभीर रूप से घायल हो गए थे.

CSIR UGC NET का एडमिट कार्ड हुआ जारी, इस डायरेक्ट लिंक से करें Hall Ticket बुक

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राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) ने CSIR UGC NET जुलाई 2025 परीक्षा के एडमिट कार्ड जारी कर दिए हैं. इस परीक्षा में शामिल होने वाले छात्र अब आधिकारिक वेबसाइट csirnet.nta.ac.in से अपने हॉल टिकट डाउनलोड कर सकते हैं. आपको बता दें कि सभी विषयों के लिए परीक्षा 28 जुलाई, 2025 को आयोजित की जाएगी.

बता दें कि CSIR UGC NET परीक्षा यह तय करने के लिए आयोजित की जाती है कि कौन जूनियर रिसर्च फेलोशिप (JRF) के लिए या भारतीय विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में विज्ञान विषयों में सहायक प्रोफेसर बनने के लिए योग्य है.

स्टूडेंट्स के लिए ये 12 websites हैं बहुत काम की, भाषा सीखने से लेकर नोट्स तक कर सकते हैं तैयार….

कैसे करें CSIR NET एडमिट कार्ड डाउनलोड
csirnet.nta.ac.in पर जाएं
अब आप “CSIR UGC NET July 2025 Admit Card” लिंक पर क्लिक करें
यहां अपना एप्लिकेशन नंबर, date of birth और Security pin की डिटेल भरिए.
अब आप डिटेल सबमिट करिए.
आपका एडमिट कार्ड स्क्रीन पर दिखाई देगा – इसे डाउनलोड करें और प्रिंट निकाल लीजिए.
सीएसआईआर नेट एडमिट कार्ड 2025 डाउनलोड करने का डायरेक्ट लिंक यहां है.. https://csirnet.ntaonline.in/admitcard/index

दृश्‍यम’ स्‍टाइल में पति का मर्डर कर शव टाइल्स के नीचे छिपाने वाली पत्नी पकड़ी गई, प्रेमी भी गिरफ्तार

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मुंबई से सटे पालघर जिले के नालासोपारा में एक महिला पर प्रेमी संग मिलकर फिल्‍म ‘दृश्‍यम’ के स्‍टाइल में अपने पति का मर्डर करने (Nalasopara Murder) का आरोप लगा था. आरोप के मुताबिक, उसने घर में पति के शव को गाड़कर ऊपर से टाइल्‍स बिछा दी थीं और खुद प्रेमी संग फरार हो गई थी. पुलिस ने आरोपी पत्नी कोमल देवी और उसके प्रेमी मोनू को मंगलवार रात गिरफ्तार कर लिया. हत्या के बाद से दोनों फरार चल रहे थे.

पति का मर्डर करने वाली पत्नी गिरफ्तार
पकड़े गए दोनों आरोपियों को बुधवार को वसई कोर्ट में पेश किया जाएगा. मृतक विजय के छोटे भाई अखिलेश ने दावा किया है कि कोमल देवी विजय का बच्चा भी अपने साथ ले गई थी. उसी बच्चे ने उसे बताया कि उसकी मां अपने प्रेमी मोनू संग पहले कलम बीच गई थी. वहां पर वह एक दिन रही इसके बाद वे पुणे के लिए निकल गए. दावा यह भी किया गया है पुणे में मोनू और कोमल एक किराये के घर में रह रहे थे.

पति की हत्या कर टाइल्स के नीचे दफनाया
बता दें कि मंबई से सटे नालासोपारा पूर्व के गडगापाड़ा इलाके में रहे वाले विजय चव्हाण पिछले 17 दिन पहले लापता हो गए थे. विजय के दोनों भाई उन्‍हें ढूंढने में जुटे हुए थे. चार दिन पहले विजय की पत्नी कोमल चव्हाण भी लापता हो गई थी. पुलिस के मुताबिक, पड़ोस में रहने वाला मोनू शर्मा भी लापता था. इस बीच खुलासा हुआ कि कोमल और मोनू के बीच प्रेम संबंध थे.

पैदा होते ही गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज हुआ इस बच्चे का नाम, महज 21 हफ्तों में हुआ जन्म,

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पिछले साल जुलाई में संयुक्त राज्य अमेरिका में केवल 21 सप्ताह के गर्भ के बाद जन्में नन्हे बच्चे ने आधिकारिक तौर पर दुनिया के सबसे समयपूर्व जन्मे बच्चे यानी वर्ल्ड मोस्ट प्रीमेच्य़ोर बेबी का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड (GWR) के अनुसार, नैश कीन (Nash Keen) का जन्म 5 जुलाई, 2024 को आयोवा सिटी, आयोवा में हुआ था. जन्म के समय उसका वजन केवल 10 औंस (10 ounces) था, और वह अपनी नियत तारीख से 133 दिन या लगभग 19 सप्ताह पहले पैदा हुआ था. इस महीने की शुरुआत में अपना जन्मदिन मनाने के बाद, उसे आधिकारिक तौर पर मोस्ट प्रीमेच्य़ोर बच्चे का GWR पुरस्कार मिला, जिसने संगठन के पिछले रिकॉर्ड धारक, 2020 में अलबामा में पैदा हुए बच्चे को केवल एक दिन से पीछे छोड़ दिया.

महीनों चला इलाज

GWR के अनुसार, प्यार से “नैश पोटैटो” कहे जाने वाले इस बच्चे ने जनवरी में अपने माता-पिता, मोली और रान्डेल कीन के साथ घर जाने की अनुमति मिलने से पहले, यूनिवर्सिटी ऑफ़ आयोवा हेल्थ केयर स्टीड फैमिली चिल्ड्रन हॉस्पिटल के नवजात गहन चिकित्सा इकाई में छह महीने बिताए.

नैश की मां, मोली ने कहा, “सच कहूं तो, यह अवास्तविक सा लगता है. एक साल पहले, हमें यकीन नहीं था कि उसका भविष्य कैसा होगा, और अब हमने उसका पहला जन्मदिन मनाया है.”

उन्होंने आगे कहा, “यह कई मायनों में भावनात्मक है: गर्व और थोड़ा दुःख भी कि उसका सफ़र कितना अलग रहा है. लेकिन सबसे बढ़कर, यह एक जीत जैसा लगता है. वह इतना आगे आ गया है, और यह मील का पत्थर सिर्फ़ एक साल का होना नहीं है, आशा और यहां तक पहुंचने के लिए उसने जो कुछ भी पार किया है, उसके बारे में है.”

चकोतरा फल से भी कम था वजन

अपने जन्म के समय, नैश का वज़न सिर्फ़ 285 ग्राम था यानी एक चकोतरा (Grapefruit) से भी कम और उसकी लंबाई सिर्फ़ 24 सेमी थी. मोली ने याद करते हुए कहा, “वह इतना छोटा था कि मैं उसे अपनी छाती पर भी मुश्किल से महसूस कर पाती थी.”

वह आगे बोलीं, “वह तारों और मॉनिटरों से ढका हुआ था, और मैं बहुत घबराई हुई थी… लेकिन जैसे ही उसे मेरी छाती पर रखा गया, मेरी सारी घबराहट गायब हो गई. मैंने उस स्किन टू स्किन कॉन्टैक्ट के लिए इतने लंबे समय से इंतज़ार किया था – ठीक-ठीक तीन हफ़्ते – और यह एक साथ शुद्ध राहत और प्यार जैसा महसूस हुआ,”

मां ने बताया कि नैश का दुनिया में जल्दी आना उसकी 20-हफ़्ते की प्रसवपूर्व जांच के बाद हुआ, जहां उसे पता चला कि उसका गर्भाशय पहले से ही 2 सेंटीमीटर फैल चुका था. कुछ दिनों बाद उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो गई.

लगभग छह महीने एनआईसीयू में देखभाल के बाद, नैश को जनवरी 2025 की शुरुआत में घर लौटने की इजाजत मिल गई. तब से, उसकी हालत लगातार बेहतर होती जा रही है, हालांकि उसे अभी भी कुछ अतिरिक्त सहायता की ज़रूरत है क्योंकि वह विकसित हो रहा है.

जस्टिस वर्मा केस के बहाने समझें महाभियोग की पूरी ABCD… आज तक क्‍यों नहीं हटाए जा सके कोई जज?

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मॉनसून सत्र का पहला हफ्ता काफी गहमागहमी भरा रहा. उपराष्‍ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्‍तीफे के पीछे चल रही चर्चाओं के बीच ‘महाभियोग’ के मुद्दे ने भी ध्‍यान खींचा. इसकी पृष्‍ठभूमि में जाएं तो पहुंचेंगे, 14 मार्च की तारीख पर, जिस दिन आई एक खबर ने देश को हिलाकर रख दिया. ये खबर थी, दिल्‍ली हाईकोर्ट के एक जज के आवास में आग लगने की खबर. लेकिन खबर बड़ी इसलिए नहीं थी कि जज के घर में आग लग गई, बल्कि इसलिए क्‍योंकि इस आगजनी के बाद कथित तौर पर भारी मात्रा में जले हुए नोट बरामद हुए थे. जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इन-हाउस कमिटी बनाई. कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ कैश छिपाने और न्यायिक मर्यादा के उल्लंघन की बात कही. जस्टिस वर्मा इनकार करते रहे.

खैर… सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बीआर गवई ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग के प्रस्‍ताव की सिफारिश कर दी. फिर संसद के मॉनसून सत्र से पहले हुई सर्वदलीय बैठक के बाद केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने बताया कि महाभियोग प्रस्‍ताव के लिए पक्ष और विपक्ष के 100 से ज्‍यादा सांसदों ने नोटिस पर हस्‍ताक्षर किए हैं. दूसरी ओर राज्‍यसभा में 50 से ज्‍यादा सदस्‍यों के हस्‍ताक्षर वाले प्रस्‍ताव को तत्‍कालीन सभापति जगदीप धनखड़ (उपराष्‍ट्रपति) ने स्‍वीकार भी कर लिया. इससे पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ भी उच्‍च सदन में महाभियोग प्रस्‍ताव लाया गया, जिसकी प्रक्रिया अभी चल ही रही है.

जस्टिस वर्मा को अक्‍टूबर 2021 में दिल्ली हाई कोर्ट में जज नियुक्त किया गया था और वे अप्रैल 2025 तक इस पद पर रहे. विवादों के बाद उनका वापस दिल्‍ली से इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर दिया गया, जहां से वे आए थे. इस बीच राज्‍यसभा में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्‍ताव स्‍वीकृत करने वाले जगदीप धनखड़ पद से इस्‍तीफा दे चुके हैं. महाभियोग प्रस्‍ताव एक जटिल और लंबी प्रक्रिया है.

इसपर आगे क्‍या होगा, पूरी प्रक्रिया क्‍या है, महाभियोग प्रस्‍ताव होने के बाद जस्टिस वर्मा पर क्‍या कार्रवाई हो सकती है, क्‍या उन्‍हें पदमुक्‍त कर दिया जाएगा? ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब आपको इस लेख में मिलेंगे. आपको ये जानकर आश्‍चर्य भी होगा कि आज तक किसी जज को महाभियोग के जरिये हटाया नहीं गया है. तो पहली बार महाभियोग कब लाया गया? देश के इतिहास में ऐसा कब-कब हुआ? क्‍या कार्रवाइयां हुईं? ये सारी जानकारी भी हम यहां देने जा रहे हैं.
महाभियोग जैसे जटिल विषय को विस्‍तार से जानने, समझने के लिए हमने संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ, राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकार में कार्य कर चुके एक जज, पटना हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे एक जानकार एडवोकेट और यूपीएससी की तैयारी कराने वाले एक चर्चित कोचिंग सेंटर में संविधान पढ़ाने वाले एक शिक्षक से बातचीत की है. तो चलिए शुरू करते हैं…

संविधान में ‘महाभियोग’ का प्रावधान
जैसा कि आप जानते हैं, भारतीय लोकतंत्र के तीन महत्‍वपूर्ण स्‍तंभ हैं- विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका. इनमें न्यायपालिका का स्थान इसलिए विशेष है, क्‍योंकि ये न्‍याय सुनिश्चित करती है. और इसके लिए संसद और सरकार के फैसलों की समीक्षा भी करती है. तभी तो संविधान में इसे ‘स्‍वतंत्र और निष्‍पक्ष’ बनाए रखने के लिए जजों को विशेषाधिकार दिए गए हैं. खास तौर पर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों को.

इन जजों पर कार्यपालिका का सीधा नियंत्रण नहीं होता. उनके वेतन और सेवा शर्तों में संसद भी कटौती नहीं कर सकती और यहां तक कि उन्हें कार्यकाल के दौरान आसानी से हटाया भी नहीं जा सकता. इनका वेतन भी कॉन्‍सॉलिडेटेड फंड से दिया जाता है, ताकि उन पर बाहरी दबाव न हो.

लेकिन यहां एक महत्‍वपूर्ण सवाल ये है कि जब हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के कोई जज पद की गरिमा का उल्‍लंघन करें या फिर गलत आचरण में लिप्‍त पाए जाएं तो उन्‍हें जवाबदेह कौन बनाएगा?
द फ्लेचर स्‍कूल ऑफ लॉ एंड डिप्‍लोमेसी, बोस्‍टन (अमेरिका) से इंटरनेशनल लॉ की पढ़ाई कर चुके संवैधानिक मामलों के जानकार कुमार आंजनेय शानू ने NDTV से बातचीत में बताया कि भारतीय संविधान में सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के जज को पद से हटाना एक बेहद असाधारण स्थिति मानी जाती है. इसे आम तौर पर ‘महाभियोग’ (Impeachment) की प्रक्रिया के रूप में जाना जाता है. हालांकि संविधान में इस शब्‍द का जिक्र नहीं है. संविधान के अनुच्‍छेद 124(1) में सुप्रीम कोर्ट की संरचना और जजों की नियुक्ति का प्रावधान है, जबकि उन्‍हें हटाए जाने की एकमात्र प्रक्रिया, संविधान के अनुच्छेद 124(4) में दी गई है, जिसे न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 (Judges Enquiry Act 1968) के जरिए व्यावहारिक बनाया गया है. वहीं अनुच्‍छेद 218 ये कहता है कि हाईकोर्ट के जज के मामले में भी यही प्रक्रिया लागू होगी.

महाभियोग की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट, न्यायपालिका का सर्वोच्च शिखर है और फिर हाई कोर्ट. न्‍याय के इन मंदिरों में बैठे जजों को संविधान का संरक्षक माना जाता है. अगर इनमें से कोई जज संविधान से हटकर आचरण करे तो उन्‍हें जवाबदेह ठहराया जा सकता है. जैसा कि हमने ऊपर बताया संविधान में महाभियोग की प्रक्रिया के प्रावधान हैं. महत्‍वपूर्ण बात ये है कि महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने के केवल दो आधार हो सकते हैं. पहला- दुराचार (Misbehaviour) और दूसरा- अयोग्यता (Incapacity). यानी कि कोई ऐसा कार्य, जिससे न्‍यायमूर्ति पद की गरिमा धूमिल होती हो. देश में आज तक किसी भी सुप्रीम कोर्ट के जज को महाभियोग के जरिये बर्खास्त नहीं किया गया या फिर कोशिश तो हुई, पर ऐसा नहीं किया जा सका. आगे उसकी चर्चा करेंगे, पहले ये जान लेते हैं कि महाभियोग की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है.

1). पहला चरण: प्रस्ताव की शुरुआत
सबसे पहले, दुराचार के आरोपी या अक्षम जज के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन यानी लोकसभा या राज्यसभा में लाया जा सकता है. इसकी कुछ बुनियादी शर्तें हैं. जैसे कि यदि यदि प्रस्ताव लोकसभा में लाया जा रहा है, तो उसे कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए. वहीं, ये प्रस्ताव अगर राज्यसभा से शुरू होता है, तो कम से कम 50 सदस्‍यों का समर्थन जरूरी है. ये लिखित प्रस्‍ताव होता है, जिसमें जज के खिलाफ सामने आए आरोपों का स्‍पष्‍ट उल्‍लेख होता है. इसे लोकसभा में स्‍पीकर या फिर राज्‍यसभा में सभापति/चेयरमैन को सौंपा जाता है.

2). दूसरा चरण: प्रारंभिक जांच और निर्णय
राज्‍य विधिक सेवा प्राधिकार से रिटायर्ड एक जज ने बातचीत के क्रम में बताया कि लिखित प्रस्‍ताव में उन आरोपों का आधार भी प्रस्‍तुत किया जाता है. महाभियोग के लिए प्रस्‍ताव आने के बाद ये पूरी प्रक्रिया स्पीकर या चेयरमैन के विवेक पर आ जाती है कि वे इसे स्‍वीकार करें या खारिज करें. निर्णय लेने से पहले उन्‍हें जरूरी लगे तोवे परामर्श ले सकते हैं, दस्तावेजों की जांच कर सकते हैं और ये मूल्यांकन कर सकते हैं कि आरोप प्रथम दृष्टया कितने कितने गंभीर और प्रमाणित हैं. ऐसा इसलिए भी जरूरी होता है, ताकि इस प्रक्रिया का राजनीतिक दुरुपयोग न हो.

3). तीसरा चरण: जांच समिति का गठन
अगर स्पीकर या चेयरमैन प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं, तो अगला कदम होता है एक तीन सदस्यीय जांच समिति (Inquiry Committee) का गठन. स्पीकर या सभापति, जहां प्रस्ताव दिया गया है, वो शिकायत की जांच के लिए तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन करते हैं. ये समिति ‘महाभियोग प्रक्रिया’ का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो आरोपों की निष्पक्ष और विशेषज्ञता के साथ जांच के लिए होती है. इस समिति में तीन सदस्‍य होते हैं:-

एक सुप्रीम कोर्ट का जज (देश के चीफ जस्टिसको प्राथमिकता)
एक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस
एक प्रतिष्ठित कानूनविद (जो स्पीकर या चेयरमैन की राय में उपयुक्‍त हों)

4). चौथा चरण: समिति की जांच और रिपोर्ट
ये समिति जज के खिलाफ आरोपों की चार्जशीट तैयार करती है, और उन आरोपों की जांच शुरू करती है. आरोपों की एक प्रति संबंधित जज को भेजी जाती है ताकि उन्हें जवाब देने का उचित अवसर मिल सके. यदि आरोप मानसिक या शारीरिक अक्षमता से जुड़ा हो तो मेडिकल टेस्‍ट भी कराया जा सकता है.

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जांच समिति को पूरी स्वतंत्रता होती है कि वो अपनी प्रक्रिया खुद तय करे, वो चाहे तो गवाह बुला सकती है, दस्तावेज मांग सकती है, और क्रॉस-एग्जामिनेशन कर सकती है. कई मामलों में समिति एक वकील को नियुक्त करती है जो आरोप तय करते हैं और जज के खिलाफ बहस करते हैं. उदाहरण के तौर पर जस्टिस वी रामास्वामी के खिलाफ समिति गठित हुई थी तब जानी-मानी सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह अभियोजन पक्ष की भूमिका में थीं. वहीं कपिल सिब्‍बल बचाव पक्ष में थे.

5). पांचवा चरण: संसद में बहस और वोटिंग
जब जांच पूरी हो जाती है, तो समिति अपनी रिपोर्ट तैयार करती है और उसे उसी सदन में सौंप देती है जहां से महाभियोग प्रस्ताव इनिशिएट किया गया था. रिपोर्ट में समिति यह सिफारिश करती है कि आरोप सिद्ध हुए या नहीं हुए. समिति ने अगर आरोपों को झूठा या असत्यापित पाया, तो प्रस्ताव वहीं समाप्त हो जाता है. लेकिन अगर आरोपों को सही पाया गया, जज को गलत पाया गया तो संसद में इस पर वोटिंग होती है.

महाभियोग का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों, लोकसभा और राज्यसभा में पारित किया जाना जरूरी होता है. वो भी एक ही सत्र में. इसके लिए दोहरी शर्त होती है.

सदन की कुल सदस्यता का बहुमत
सदन में मौजूद और मतदान कर रहे सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत
‘दो-तिहाई बहुमत’ की अनिवार्यता बेहद जरूर है, जो ये दिखाता है कि दोषी पाए गए जज को हटाने के निर्णय में बड़े हिस्‍से की सहमति है. यदि प्रस्ताव को पहले सदन में सफलतापूर्वक बहुमत मिला तो इसे फिर दूसरे सदन में विचार और मतदान के लिए भेजा जाता है. दूसरे सदन में भी दो-तिहाई बहुमत या उससे ज्‍यादा समर्थन के बाद जज को हटाया जाना तय हो जाता है.

6). छठा चरण: राष्ट्रपति का आदेश
यदि लोकसभा और राज्यसभा दोनों में प्रस्ताव पास हो जाता है, तो अब संसद ‘राष्ट्रपति को एक संकल्प’ भेजती है, जिसमें दोषी पाए गए जज को हटाने की सिफारिश होती है. राष्ट्रपति तब जज को हटाने का आदेश (order)जारी करते हैं. ये महाभियोग प्रक्रिया का अंतिम चरण होता है. राष्ट्रपति की ओर से ये आदेश जारी करना काफी हद तक औपचारिक ही होता है. यानी जिनके आदेश से जज की नियुक्ति हुई थी, उन्‍हीं के आदेश से उसे हटाया भी जा सकता है.

एक और बेहद महत्‍वपूर्ण बात ये है कि महाभियोग की प्रक्रिया के दौरान अगर जज स्‍वेच्‍छा से इस्‍तीफा दे देते हैं, तो प्रक्रिया वहीं रुक जाएगी और इस तरह वे कार्रवाई से बच जाएंगे. साल 2011 में कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस सौमित्र सेन के मामले में यही हुआ था. राज्यसभा में ऐतिहासिक तौर पर प्रस्ताव पारित हुआ था, मगर वोटिंग से पहले ही उन्‍होंने त्यागपत्र दे दिया और कार्रवाई से बच गए.

भारतीय इतिहास में कई उदाहरण, लेकिन…
भारत के इतिहास में अब तक किसी भी जज को महाभियोग के जरिए बर्खास्त नहीं किया गया है. लेकिन ऐसी कोशिशें जरूर हुई है. इनमें सबसे चर्चित मामला था, जस्टिस वी रामास्वामी केस, जो कि महाभियोग का पहला उदाहरण है. देश में किसी जज के खिलाफ महाभियोग बेहद दुर्लभ घटना है.

सबसे चर्चित: जस्टिस वी रामास्वामी मामला (1991-1993)
जस्टिस वी रामास्वामी का मामला देश के न्यायिक इतिहास में सबसे पहला उदाहरण है. राजधानी दिल्‍ली के एक बड़े कोचिंग संस्‍थान में संविधान और लॉ से जुड़े विषय पढ़ाने वाले एक शिक्षक और टिप्‍पणीकार ने एनडीटीवी से बातचीत में इस केस के बारे में विस्‍तार से बात की. उन्‍होंने कहा, ‘ये पहली बार था, जब सुप्रीम कोर्ट के जज के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू की गई थी.’ अक्टूबर 1989 में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत होने के कई महीनों बाद उनके लिए परेशानियां शुरू हुईं. उनके खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगाए गए, जो कि पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में उनके कार्यकाल से संबंधित थे. एक इंटरनल ऑडिट और महालेखाकार (CAG) की जांच से सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का खुलासा हुआ था.

तत्कालीन CJI सब्यसाची मुखर्जी ने ऑडिट रिपोर्ट का हवाला देते हुए 20 जुलाई, 1990 को एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए जस्टिस रामास्वामी को, जांच लंबित रहने तक ‘न्यायिक कार्यों के निर्वहन पर रोक’ की सलाह दी. जस्टिस रामास्वामी छुट्टी पर चले गए. महाभियोग प्रक्रिया औपचारिक रूप से 13 मार्च, 1991 को शुरू हुई, जब स्पीकर रबी राय ने नौवीं लोकसभा के भंग होने से ठीक एक दिन पहले 108 संसद सदस्यों के हस्ताक्षरित प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया.

उन्‍होंने बताया, ‘ सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पीबी सावंत की अध्‍यक्षता में तीन सदस्‍यीय जांच समिति बनी, जिसमें जस्टिस पीडी देसाई (बॉम्बे हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश) और कानूनविद् के तौर पर जस्टिस ओ चिनप्पा रेड्डी (सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज) शामिल थे. समिति ने अपनी जांच पूरी की और 1993 में रिपोर्ट दी. जस्टिस रामास्वामी सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और फिजूलखर्ची के दोषी पाए गए.

महाभियोग प्रस्ताव पर 10 मई, 1993 को लोकसभा में बहस के लिए लाया गया. दो दिनों तक 16 घंटे तक बहस चली. प्रस्ताव पेश करने वाले सोमनाथ चटर्जी ने जस्टिस के कथित प्रयासों की आलोचना की. वहीं दूसरी ओर जस्टिस रामास्वामी के वकील के रूप में कपिल सिब्बल ने सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के सभी 11 आरोपों का खंडन किया. दावा किया कि उनके मुवक्किल ‘भ्रष्ट’ नहीं थे.
11 मई, 1993 को वो निर्णायक क्षण आया, जब प्रस्ताव पर मतदान हुआ. सदन में मौजूद 401 सदस्यों में से 196 सदस्यों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया, जबकि 205 सदस्य अनुपस्थित रहे. इस तरह दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया. बताया जाता है कि सत्तारूढ़ कांग्रेस और उसके सहयोगी पार्टियों के सांसद ‘ऊपर से मिले निर्देश’ के चलते मतदान से अनुपस्थित रहे. ऐसे में जस्टिस रामास्वामी कार्रवाई से बचे रहे. वे अपने पद पर बने रहे और फरवरी 1994 में सेवानिवृत्त हुए.

बैंकों, सरकार,जमीन माफियाओं मिली भगत से भारत की सरकारी जमीन सफाई से बेचीं जा रही हैं जनता अंजान, सरकारी ऑनलाइन भूइयां SITE में भी फर्जी नाम चढ़ा दिए गए

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छत्तीसगढ़ में ज़मीन घोटाला सामने आया है, जिसमें सरकारी ज़मीनों का अवैध सौदा कर करोड़ों रुपये का नुकसान किया गया है.एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि एक गांव में 190 एकड़ ज़मीन की गड़बड़ी हुई है. आनन-फानन में जांच शुरू कर दी गई है. रायपुर, दुर्ग, कोरबा और कोरिया जैसे ज़िलों से जुड़े लोगों के तार इस गड़बड़झाले से जुड़े पाए गए हैं. इस घोटाले में बैंकों पर भी फर्जी दस्तावेजों के आधार पर लोन देने के आरोप लगे हैं. शासकीय ज़मीन पर निजी व्यक्तियों को 82 लाख रुपये का कर्ज दिया गया. अब बैंक प्रबंधन ने भी जांच शुरू कर दी है. राज्य में सरकारी ज़मीन को फर्जी तरीके से निजी करने का खेल चल रहा है, जिससे राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं.

191 एकड़ सरकारी ज़मीन को बता दिया निजी जमीन
ऑनलाइन सिस्टम से गड़बड़ी की गई है. , हैं. सवाल उठता है कि पटवारी और तहसीलदार की किस आईडी को हैक कर यह गड़बड़ी की गई? बैंकों ने लोन देने से पहले गंभीरता से जांच क्यों नहीं की? राज्य में हजारों एकड़ शासकीय भूमि का अवैध कारोबार चल रहा है और शासकीय ज़मीनों पर लोन दिलाने वाला गिरोह सक्रिय है. पड़ताल में सबसे बड़ी गड़बड़ी दुर्ग जिले के अछोटी गांव में सामने आई है. यहां 52 फर्जी खसरे बनाए गए, जिनमें कथित तौर पर 191 एकड़ सरकारी ज़मीन को निजी बता दिया गया. जिनके नाम सामने आए उनमें दीनूराम यादव, एसराम, शियाकांत वर्मा, हरिशचंद्र निषाद और सुरेंद्र कुमार शामिल हैं.

दलाल सक्रिय, कौन बेच रहा, किसे बेच रहे कुछ नहीं पता
दीनूराम के नाम बनी ऋण पुस्तिका पर दुर्ग तहसीलदार की मोहर और साइन हैं, जबकि अछोटी गांव अहिवारा तहसील में आता है. ग्राम कोटवार नंदलाल चौहान ने बताया कि यहां दलाल लोग सक्रिय हैं, किसे बेच रहे हैं, किसे नहीं, पता नहीं चलता. जब पटवारी इस्तहार जारी करता है, तब जाकर ही कुछ पता चलता है. दीनूराम और अन्य जिनके नाम सामने आए हैं, उनका रिकॉर्ड में कोई जिक्र नहीं है. सरकारी ज़मीन, फर्जी खसरा और फिर फर्जी लोन बुक — ये पूरा खेल सामने आया है. 25 जून 2025 को दीनूराम को ₹46 लाख का लोन मिला और 2 जुलाई 2025 को एसराम को ₹36 लाख का लोन मिला. वो भी कथित तौर पर बड़े सरकारी बैंक से. ना कोई वेरिफिकेशन, ना फील्ड इंस्पेक्शन — सीधे करोड़ों का लोन पास कर दिया गया. NDTV के सवालों का बैंक ने कोई जवाब नहीं दिया.

100 करोड़ का घोटाला
अछोटी गांव से सटे मेन रोड में जिस 191 एकड़ ज़मीन का कथित घोटाला हुआ, अकेले उसकी कीमत 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा बताई जा रही है. लेकिन मामला सिर्फ अछोटी का नहीं है. कोरबा में 250 एकड़ से ज़्यादा सरकारी ज़मीन पर इसी तरह का खेल हुआ है, जहां कलेक्टर के आदेश पर मामला दर्ज हुआ है. कोरिया में अवैध बिक्री की जांच जारी है. रायपुर में ऐसे ही मामले में पटवारी को निलंबित किया गया है. भिलाई में गरीबों के लिए आरक्षित EWS ज़मीन को निजी बताकर बेचने की साजिश का आरोप है. नगर निगम भिलाई के एमआईसी सदस्य आदित्य सिंह ने बताया कि राधिका नगर में मैत्री विहार सोसायटी की EWS ज़मीन पर भू-माफियाओं ने कहीं और के खसरे की बची हुई ज़मीन लाकर बैठा दी, फिर छोटे भूखंड बनाकर उसकी प्लॉटिंग की और बेचने का काम शुरू कर दिया.

एनडीटीवी की रिपोर्ट में क्या पता चला
तफ्तीश में कई संदिग्धों का पता चला, जिन्होंने कैमरे पर बात करने से इंकार कर दिया. लेकिन जो जानकारी हाथ लगी उसके मुताबिक कई ज़िलों में ज़मीन माफिया सिंडिकेट बन गया है. राजस्व अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध है. लोन पर 10% तक कमीशन की डील के आरोप हैं. आरोप है कि पटवारी की ID हैक कर फर्जी खसरे बनाए गए. सिंडिकेट का नेटवर्क रायपुर, दुर्ग, कोरबा, कोरिया और जांजगीर-चांपा तक फैला है. फर्जी ID, फर्जी खसरे, फर्जी लोन बुक — सबका रेट तय है. राजस्व विभाग, बैंक और दलालों की मिलीभगत हो रही है.

संभागायुक्त दुर्ग एसएन राठौर ने NDTV को बताया कि हमारा पहला उद्देश्य है कि जो ज़मीनें गड़बड़ी कर निजी लोगों के नाम दर्ज कर ली गई हैं, उन्हें वापस शासकीय खाते में डलवाया जाए. जांच की जा रही है और जांच में जो भी दोषी होंगे, उन पर कार्रवाई की जाएगी. छत्तीसगढ़ में बीते कुछ सालों से एक के बाद एक कई घोटाले सामने आ रहे हैं. राज्य में कई अफसर और नेता केंद्रीय एजेंसियों के रडार पर हैं. ऐसे में यह नया ज़मीन घोटाला सामने आया है. सवाल यह है कि क्या इसमें निष्पक्ष जांच होगी या यह भी सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह जाएगा?