Home राजनीति ना उगल पा रही कांग्रेस, ना निगल पा रही, सियासी दलों के...

ना उगल पा रही कांग्रेस, ना निगल पा रही, सियासी दलों के लिए ओवैसी कैसे

4
0

बिहार विधानसभा चुनाव और उसके बाद महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में AIMIM के प्रदर्शन से कांग्रेस की चिंता बढ़ गई है. वर्षों से अल्पसंख्यक वोट बैंक के सहारे राजनीति करने वाली कांग्रेस को अब खतरा महसूस हो रहा है.

उसे लग रहा है कि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी धीरे-धीरे मुसलमानों में उसकी पारंपरिक पकड़ कमजोर कर रही है. जिसका सीधा फायदा बीजेपी उठा रही है.

सेक्युलर दलों के लिए दुविधा बने ओवैसी

राजनीतिक एक्सपर्टों के मुताबिक, ओवैसी की पार्टी के आगे बढ़ने से अब तक ज्यादा आरजेडी, सपा, जेडीयू और एनसीपी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों को हुआ है. लेकिन मुस्लिम इलाकों में AIMIM की स्वीकार्यता अगर ऐसे ही आगे बढ़ती गई तो आने वाले समय में कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है. इसका सबसे बड़ा नुकसान उसे यूपी में भुगतना पड़ सकता है. जहां पर पार्टी दोबारा से अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश कर रही है.

राजनीतिक पंडितों के मुताबिक, कथित सेक्युलर दलों के लिए ओवैसी एक डिलेमा बन चुके हैं. जिसे न उगलते बन रहा है और न ही निगलते. अगर वे ओवैसी को साथ लेते हैं तो इससे हिंदू वोटों के धुव्रीकरण का खतरा बढ़ जाता है और अगर उनसे किनारा करते हैं तो मुस्लिम वोट छिटक जाते हैं. बिहार चुनावों में भी यह नजारा साफ दिखाई दिया था.

मुसलमानों के बन गए एकछत्र नेता

उन चुनाव में ओवैसी ने कांग्रेस-आरजेडी के महागठबंधन से 5 सीटें मांगी थी. लेकिन दोनों दलों ने AIMIM को बीजेपी की बी टीम कहते हुए प्रस्ताव खारिज कर दिया. इसके बाद सामने आए चुनाव नतीजों में ओवैसी की पार्टी 5 सीटों पर जीत गई. जबकि उससे कई गुणा सीटों पर लड़ने वाली कांग्रेस भी महज 6 सीटें ही जीत पाईं.

कांग्रेस नेताओं का मानना है कि मजहबी राजनीति और पिछड़ेपन के मुद्दे उठाकर ओवैसी ने बिहार के सीमांचल जैसे मुस्लिम बहुल इलाको में अपनी पैठ बढ़ाई है. वहीं कांग्रेस और दूसरे कथित सेक्युलर दल उन्हें महज वोट कटुआ कहकर लोगों से सावधान रहने को कहते रहे. इसके चलते लोगों ने कांग्रेस छोड़ ओवैसी को चुन लिया.

महाराष्ट्र निकाय चुनाव के नतीजों से झटका

इन सेक्युलर दलों को ताजा झटका अब महाराष्ट्र नगर निकाय चुनावों के नतीजों ने दिया है. इसमें AIMIM ने अपने बलबूते 13 नगर निगमों में कुल 124 सीटें जीत लीं. कई इलाके तो ऐसे रहे, जहां सीटों की संख्या में कांग्रेस काफी पीछे छूट गई. अकेले छत्रपति संभाजीनगर में AIMIM ने 33 सीटें जीतकर कांग्रेस को काफी पीछे धकेल दिया.

इसी तरह विदर्भ में ओवैसी की पार्टी ने 21 सीटें, मालेगांव में 21, नांदेड़ में 14 और धुले में 10 सीटों पर जीत हासिल की. बीएमसी चुनाव में भी AIMIM 8 सीटें जीतने में कामयाब रही, जो कि राज ठाकरे की मनसे से 1 सीट ज्यादा थी. AIMIM ने मुंबई में सपा नेता अबू आसिम आज़मी के गढ़ यानी गोवंडी-मानखुर्द को जीतकर उन्हें भी बड़ा झटका दे दिया.

बंगाल और असम में बनेंगे बड़ा खतरा

ओवैसी केवल इतने से नहीं रुके हैं. अब वे असम और पश्चिम बंगाल में अपनी पार्टी को मजबूत करने में लगे हैं. चर्चाएं हैं कि वे बंगाल में अब्बास सिद्दीकी की पार्टी से हाथ मिला सकते हैं. वहीं असम में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी के साथ गठबंधन कर सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो इसका सबसे बड़ा नुकसान कांग्रेस और ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी को होगा.

यही नहीं, यूपी में ओवैसी चंद्रशेखर आजाद की पार्टी आसपा और स्वामी प्रसाद के साथ गठबंधन की राहें तलाश रहे हैं. अगर ऐसा होता है तो 2027 के यूपी असेंबली चुनाव और 2029 के संसदीय चुनाव में सपा, बसपा और कांग्रेस को बड़ा नुकसान हो सकता है.

कांग्रेस को सबसे ज्यादा चिंता उत्तर प्रदेश को लेकर है. पार्टी के भीतर चर्चा है कि अगर ओवैसी की पार्टी चंद्रशेखर आज़ाद और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नेताओं के साथ गठबंधन करती है, तो इसका असर सिर्फ विधानसभा चुनावों पर ही नहीं, बल्कि 2029 के लोकसभा चुनावों तक पड़ सकता है.

तेलंगाना में दोनों के मजेदार रिश्ते

मजेदार बात ये है कि देश के दूसरे हिस्सों में कांग्रेस और AIMIM आमने-सामने हैं. वहीं तेलंगाना में दोनों के रिश्ते शानदार हैं. सीएम रेवंत रेड्डी और ओवैसी के बीच शानदार ट्यूनिंग कई बार देखी गई है. इसका नजारा तब दिखाई दिया, AIMIM ने जुबिली हिल्स उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार का समर्थन किया. ओवैसी के इस समर्थन से वह सीट कांग्रेस को वापस मिल गई.

अब कांग्रेस के लिए बड़ी रणनीतिक उलझन की घड़ी आ गगई है. उसे समझ नहीं आ रहा है कि ओवैसी के साथ डील कैसे किया जाए. उसे ओवैसी को साथ लेने और दूर करने, दोनों में डर लग रहा है. उसे एक तरफ अल्पसंख्यक वोट खिसकने का डर दिख रहा है. वहीं दूसरी ओर ज्यादा नरमी दिखाने से हिंदू वोटर्स के नाराज होने की आशंका खा रही है. उसकी यही दुविधा आज कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन चुकी है.