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‘विकास शब्द पर पाबंदी लगाई जाए’, सामना के जरिए बीजेपी और शिंदे पर भड़के…

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राज्यसभा सांसद संजय राऊत ने शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के मुखपत्र सामना में लिखे अपने तीखे लेख के जरिए चुनावी प्रक्रिया, ईवीएम, पैसों की राजनीति और ‘विकास’ के नाम पर हो रही उठापटक पर सीधे सवाल खड़े किए हैं.

राऊत का कहना है कि मौजूदा दौर में लोकतंत्र नहीं, बल्कि पैसे का राज चल रहा है.

राऊत का कहना हैं कि मुंबई समेत 29 महानगरपालिकाओं के नतीजे आए काफी वक्त हो चुका है. मुंबई में भले ही शिवसेना-मनसे की सत्ता नहीं बनी, लेकिन भाजपा की सत्ता पर पूरी तरह अंकुश भी नहीं लग पाया. उनके मुताबिक, शिवसेना-मनसे के 71 नगरसेवक चुने गए, जो यह दिखाता है कि मुंबई के मराठी मतदाताओं ने आज भी ‘ठाकरे ब्रांड’ पर भरोसा जताया है.

‘विपक्ष की जीत चुरा ली गई’

सामना में राऊत ने आरोप लगाया कि महानगरपालिका चुनाव निष्पक्ष नहीं थे. उन्होंने कहा कि सत्ताधारियों ने वोटों और जीत की खुली लूट की और कई जगहों पर विपक्ष की जीत छीन ली गई. राऊत ने इसे लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत बताया.

राऊत ने जलगांव महानगरपालिका का उदाहरण देते हुए बताया कि शिवसेना (उद्धव ठाकरे) के जिलाप्रमुख कुलभूषण पाटील चुनाव जीत चुके थे. ईवीएम गिनती में जीत दिखने के बावजूद चुनाव अधिकारी ने नतीजा घोषित नहीं किया और बाद में किसी दूसरे उम्मीदवार को विजयी घोषित कर दिया. पुनर्मतगणना की मांग ठुकरा दी गई और विरोध करने पर पुलिस बुलाकर लाठीचार्ज तक किया गया. राऊत के मुताबिक यह सीधा चुनावी घोटाला है.

पुणे में ईवीएम पर संदेह

पुणे के वसंत उर्फ तात्या मोरे का जिक्र करते हुए राऊत कहा हैं कि मतगणना के दौरान मोरे बढ़त बनाए हुए थे. तभी अचानक ईवीएम बंद होने की बात कही गई. नई मशीनें लाई गईं और उसी प्रक्रिया के बाद मोरे हार गए. राऊत का दावा है कि कुल मतदान और गिने गए वोटों में 1,108 वोटों का अंतर था और उतने ही अंतर से मोरे की हार हुई. सवाल यह है कि ये वोट गए कहां?

राऊत का कहना है कि ऐसे ‘चमत्कार’ मुंबई, ठाणे, कल्याण-डोंबिवली और पुणे जैसी जगहों पर भी हुए. जो नेता सदन में भाजपा के कामकाज पर सवाल उठाते थे, उन्हें चुनाव में इसी तरह हराया गया. उन्होंने पूछा कि क्या यही लोकतंत्र है?

राऊत ने आरोप लगाया कि चुनाव से पहले ही 70 नगरसेवक निर्विरोध चुन लिए गए और बाद में चुने गए प्रतिनिधियों को पैसों के दम पर तोड़ा गया. कई नेता ‘विकास’ के नाम पर सत्ताधारी गुट में शामिल हो गए. राऊत ने इसे ‘चूहों की भगदड़’ करार दिया और कहा कि आज की राजनीति में सिद्धांतों की कोई जगह नहीं बची.

सामना में राऊत ने तीखा तंज कसते हुए कहा कि ‘विकास’ शब्द इतना बदनाम हो चुका है कि उस पर ही पाबंदी लगा देनी चाहिए. उन्होंने उदाहरण दिए कि कैसे नेता विकास के नाम पर पार्टी बदलते हैं. उनके मुताबिक, न पार्टी बदलने से विकास रुकता है और न ही पार्टी में रहने से तेज होता है.

शिंदे-भाजपा पर सीधा हमला

राऊत ने आरोप लगाया कि एकनाथ शिंदे और भारतीय जनता पार्टी के पास बेहिसाब पैसा है. उन्होंने दावा किया कि उम्मीदवारों को करोड़ों रुपये दिए गए और बाद की जोड़-तोड़ में भी भारी रकम खर्च हुई. उनके मुताबिक, अब राजनीति समाज के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ पैसों के लिए हो रही है.

मुंबई के महापौर पद को लेकर नाराजगी

राऊत ने लिखा कि खुद को शिवसेना कहने वाले लोग मुंबई के महापौर पद के लिए दिल्ली के चक्कर लगा रहे हैं, जो बालासाहेब ठाकरे का अपमान है. उनका कहना है कि बालासाहेब के जन्मशताब्दी वर्ष में पैसे के दम पर मुंबई पर कब्जा करने की कोशिश हो रही है.

‘मुंबई पर पैसे का राज नहीं चलेगा’

राऊत ने साफ कहा कि मुंबई पर पैसे का राज नहीं होना चाहिए. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यही हाल रहा तो आम आदमी चुनाव से बाहर हो जाएगा और लोकतंत्र सिर्फ अमीरों का खेल बनकर रह जाएगा.